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सभा पर्व · अध्याय 77

मय की सभा में अपने अपमान का दुर्योधन द्वारा वर्णन

जनमेजय विस्तार से सुनना चाहते हैं कि विनाशकारी द्यूत कैसे हुआ, और वैशम्पायन कथा आरम्भ करते हैं। एकान्त में धृतराष्ट्र दुर्योधन से द्यूत छोड़ने का आग्रह करते हैं, क्योंकि बृहस्पति की नीति जानने वाले विदुर इसके विरुद्ध हैं, और उसे याद दिलाते हैं कि उसके पास पहले से क्या-क्या है। दुर्योधन उत्तर देता है कि साधारण लक्ष्मी से उसे सन्तोष नहीं होता, और युधिष्ठिर को मिले उपहारों तथा मय की सभा में हुए अपने उपहास का वर्णन करता है, जहाँ उसने स्फटिक को जल और जल को स्फटिक समझा और एक झूठे द्वार से टकराया।

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जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (2.77.1)

कथं समभवद्द्यूतं भ्रातॄणां तन्महात्ययम् । यत्र तद्व्यसनं प्राप्तं पाण्डवैर्मे पितामहैः ॥

kathaṃ samabhavaddyūtaṃ bhrātṝṇāṃ tanmahātyayam | yatra tadvyasanaṃ prāptaṃ pāṇḍavairme pitāmahaiḥ

भाइयों के बीच वह महाविनाशकारी द्यूत कैसे हुआ, जिसमें मेरे पितामह पाण्डवों पर वह विपत्ति आई?

श्लोक 2 (2.77.2)

के च तत्र सभास्तारा राजानो ब्रह्मवित्तम । के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधयन् ॥

ke ca tatra sabhāstārā rājāno brahmavittama | ke cainamanvamodanta ke cainaṃ pratyaṣedhayan

हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ, उस सभा में कौन-कौन से राजा सभासद थे? किन्होंने उसका समर्थन किया और किन्होंने विरोध?

श्लोक 3 (2.77.3)

विस्तरेणैतदिच्छामि कथ्यमानं त्वया द्विज । मूलं ह्येतद्विनाशस्य पृथिव्या द्विजसत्तम ॥

vistareṇaitadicchāmi kathyamānaṃ tvayā dvija | mūlaṃ hyetadvināśasya pṛthivyā dvijasattama

हे द्विज, मैं यह सब आपके मुख से विस्तार से सुनना चाहता हूँ; क्योंकि हे द्विजश्रेष्ठ, यही पृथ्वी के विनाश का मूल था।

सौतिरुवाच

श्लोक 4 (2.77.4)

एवमुक्तस्ततो राज्ञा व्यासशिष्यः प्रतापवान् । आचचक्षेऽथ यद्वृत्तं तत्सर्वं वेदतत्त्ववित् ॥

evamuktastato rājñā vyāsaśiṣyaḥ pratāpavān | ācacakṣe'tha yadvṛttaṃ tatsarvaṃ vedatattvavit

राजा के ऐसा कहने पर वेदों के तत्त्व को जानने वाले, प्रतापी व्यासशिष्य ने जो कुछ हुआ था वह सब कह सुनाया।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (2.77.5)

विदुरस्य मतिं ज्ञात्वा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । दुर्योधनमिदं वाक्यमुवाच विजने पुनः ॥

vidurasya matiṃ jñātvā dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | duryodhanamidaṃ vākyamuvāca vijane punaḥ

विदुर का मत जानकर अम्बिकापुत्र धृतराष्ट्र ने एकान्त में दुर्योधन से फिर यह बात कही —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 6 (2.77.6)

अलं द्यूतेन गान्धारे विदुरो न प्रशंसति । न ह्यसौ सुमहाबुद्धिरहितं नो वदिष्यति ॥

alaṃ dyūtena gāndhāre viduro na praśaṃsati | na hyasau sumahābuddhirahitaṃ no vadiṣyati

गान्धारीपुत्र, द्यूत रहने दो! विदुर इसकी प्रशंसा नहीं करते। वे परम बुद्धिमान हैं; वे हमें कभी अहितकर बात नहीं बताएँगे।

श्लोक 7 (2.77.7)

हितं हि परमं मन्ये विदुरो यत्प्रभाषते । क्रियतां पुत्र तत्सर्वमेतन्मन्ये हितं तव ॥

hitaṃ hi paramaṃ manye viduro yatprabhāṣate | kriyatāṃ putra tatsarvametanmanye hitaṃ tava

विदुर जो कहते हैं, उसे मैं परम हितकर मानता हूँ। बेटा, वही सब करो; मैं उसे तुम्हारे लिए हितकर समझता हूँ।

श्लोक 8 (2.77.8)

देवर्षिर्वासवगुरुर्देवराजाय धीमते । यत्प्राह शास्त्रं भगवान्बृहस्पतिरुदारधीः । तद्वेद विदुरः सर्वं सरहस्यं महाकविः ॥

devarṣirvāsavagururdevarājāya dhīmate | yatprāha śāstraṃ bhagavānbṛhaspatirudāradhīḥ | tadveda viduraḥ sarvaṃ sarahasyaṃ mahākaviḥ

इन्द्र के गुरु, उदारबुद्धि देवर्षि भगवान बृहस्पति ने बुद्धिमान देवराज को जो शास्त्र बताया था, वह सारा का सारा, उसके रहस्यों सहित, महाकवि विदुर जानते हैं।

श्लोक 9 (2.77.9)

स्थितस्तु वचने तस्य सदाऽहमपि पुत्रक । विदुरो वापि मेधावी कुरूणां प्रवरो मतः ॥

sthitastu vacane tasya sadā'hamapi putraka | viduro vāpi medhāvī kurūṇāṃ pravaro mataḥ

और बेटा, मैं भी सदा उनकी बात पर चलता हूँ। मेधावी विदुर कुरुओं में श्रेष्ठ माने जाते हैं,

श्लोक 10 (2.77.10)

उद्धवो वा महाबुद्धिर्वृष्णीनामर्चितो नृप । तदलं पुत्र द्यूतेन द्यूते भेदो हि दृश्यते ॥

uddhavo vā mahābuddhirvṛṣṇīnāmarcito nṛpa | tadalaṃ putra dyūtena dyūte bhedo hi dṛśyate

जैसे वृष्णियों में महाबुद्धिमान उद्धव पूजित हैं, हे राजन्। इसलिए बेटा, द्यूत रहने दो; द्यूत में फूट स्पष्ट दिखाई देती है।

श्लोक 11 (2.77.11)

भेदे विनाशो राज्यस्य तत्पुत्र परिवर्जय ॥

bhede vināśo rājyasya tatputra parivarjaya

फूट में राज्य का विनाश है; इसलिए बेटा, इससे बचो।

श्लोक 12 (2.77.12)

पित्रा मात्रा च पुत्रस्य यद्वै कार्यं परं स्मृतम् । प्राप्तस्त्वमसि तन्नाम पितृपैतामहं पदम् ॥

pitrā mātrā ca putrasya yadvai kāryaṃ paraṃ smṛtam | prāptastvamasi tannāma pitṛpaitāmahaṃ padam

पिता और माता का पुत्र के प्रति जो सबसे बड़ा कर्तव्य माना गया है, वह तुम्हें मिल चुका है — अपने पिता-पितामहों का पद।

श्लोक 13 (2.77.13)

अधीतवान्कृती शास्त्रे लालितः सततं गृहे । भ्रातृज्येष्ठः स्थितो राज्ये विन्दसे किं न शोभनम् ॥

adhītavānkṛtī śāstre lālitaḥ satataṃ gṛhe | bhrātṛjyeṣṭhaḥ sthito rājye vindase kiṃ na śobhanam

तुम विद्वान हो, शास्त्रों में निपुण हो, घर में सदा लाड़-प्यार से पले हो; भाइयों में ज्येष्ठ होकर राज्य पर प्रतिष्ठित हो — तुम्हें कौन-सा सुख नहीं मिला?

श्लोक 14 (2.77.14)

पृथग्जनैरलभ्यं यद्भोजनाच्छादनं परम् । तत्प्राप्तोऽसि महाबाहो कस्माच्छोचसि पुत्रक ॥

pṛthagjanairalabhyaṃ yadbhojanācchādanaṃ param | tatprāpto'si mahābāho kasmācchocasi putraka

हे महाबाहु, जो उत्तम भोजन और वस्त्र साधारण लोगों को नहीं मिलते, वे तुम्हें प्राप्त हैं; फिर बेटा, तुम शोक क्यों करते हो?

श्लोक 15 (2.77.15)

स्फीतं राष्ट्रं महाबाहो पितृपैतामहं महत् । नित्यमाज्ञापयन्भासि दिवि देवेश्वरो यथा ॥

sphītaṃ rāṣṭraṃ mahābāho pitṛpaitāmahaṃ mahat | nityamājñāpayanbhāsi divi deveśvaro yathā

हे महाबाहु, पिता-पितामहों से प्राप्त विशाल और समृद्ध राज्य पर सदा आज्ञा चलाते हुए तुम ऐसे शोभित हो जैसे स्वर्ग में देवराज।

श्लोक 16 (2.77.16)

यादृशं च तवैश्वर्यं तदन्येषां सुदुर्लभम् । ये चोपभोगास्ते राजन्मया ते परिकीर्तिताः ॥

yādṛśaṃ ca tavaiśvaryaṃ tadanyeṣāṃ sudurlabham | ye copabhogāste rājanmayā te parikīrtitāḥ

तुम्हारे जैसा ऐश्वर्य दूसरों के लिए अत्यन्त दुर्लभ है, और हे राजन्, तुम्हारे जो भोग हैं, उनका वर्णन मैं तुमसे कर चुका हूँ।

श्लोक 17 (2.77.17)

तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् । समुत्थितं दुःखकरं तन्मे शंसितुमर्हसि ॥

tasya te viditaprajña śokamūlamidaṃ katham | samutthitaṃ duḥkhakaraṃ tanme śaṃsitumarhasi

तब हे प्रसिद्ध बुद्धि वाले, तुम्हारे भीतर यह शोक का मूल, यह दुःख देने वाली बात कैसे उत्पन्न हुई? मुझे बताओ।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 18 (2.77.18)

अश्नाम्याच्छादयामीति प्रपश्यन्हीनपौरुषः । नामर्षं कुरुते यस्तु पुरुषः सोऽधमः स्मृतः ॥

aśnāmyācchādayāmīti prapaśyanhīnapauruṣaḥ | nāmarṣaṃ kurute yastu puruṣaḥ so'dhamaḥ smṛtaḥ

जो पौरुषहीन व्यक्ति "मैं खाता हूँ, पहनता हूँ" — इतना ही देखकर असहिष्णुता का भाव नहीं रखता, वह अधम पुरुष कहा जाता है।

श्लोक 19 (2.77.19)

न मां प्रीणाति राजेन्द्र लक्ष्मीः साधारणी विभो । ज्वलितामेव कौन्तेये श्रियं दृष्ट्वा च विव्यथे ॥

na māṃ prīṇāti rājendra lakṣmīḥ sādhāraṇī vibho | jvalitāmeva kaunteye śriyaṃ dṛṣṭvā ca vivyathe

हे राजेन्द्र, हे प्रभो, साधारण लक्ष्मी मुझे प्रसन्न नहीं करती; कुन्तीपुत्र के पास वह दमकती लक्ष्मी देखकर मैं व्यथित हूँ।

श्लोक 20 (2.77.20)

सर्वां च पृथिवीं चैव युधिष्ठिरवशानुगाम् । स्थिरोऽस्मि योऽहं जीवामि दुःखादेतद्ब्रवीमि ते ॥

sarvāṃ ca pṛthivīṃ caiva yudhiṣṭhiravaśānugām | sthiro'smi yo'haṃ jīvāmi duḥkhādetadbravīmi te

और सारी पृथ्वी को युधिष्ठिर के वश में देखकर भी मैं जीवित हूँ, तो मैं सचमुच कठोर हूँ; यह बात मैं दुःख से कह रहा हूँ।

श्लोक 21 (2.77.21)

आवर्जिता इवाभान्ति नीपाश्चित्रककौकुराः । कारस्करा लोहजङ्घा युधिष्ठिरनिवेशने ॥

āvarjitā ivābhānti nīpāścitrakakaukurāḥ | kāraskarā lohajaṅghā yudhiṣṭhiraniveśane

नीप, चित्रक और कौकुर, कारस्कर और लोहजंघ — ये सब युधिष्ठिर के महल में दासों की तरह वश में पड़े दिखते हैं।

श्लोक 22 (2.77.22)

हिमवत्सागरानूपाः सर्वे रत्नाकरास्तथा । अन्त्याः सर्वे पर्युदस्ता युधिष्ठिरनिवेशने ॥

himavatsāgarānūpāḥ sarve ratnākarāstathā | antyāḥ sarve paryudastā yudhiṣṭhiraniveśane

हिमालय के, समुद्र के और तटवर्ती दलदली प्रदेशों के लोग, रत्नों की सब खानों वाले देश, और सीमान्त की सभी जातियाँ युधिष्ठिर के महल में दूर पीछे हटा दी गई थीं।

श्लोक 23 (2.77.23)

ज्येष्ठोऽयमिति मां मत्वा श्रेष्ठश्चेति विशाम्पते । युधिष्ठिरेण सत्कृत्य युक्तो रत्नपरिग्रहे ॥

jyeṣṭho'yamiti māṃ matvā śreṣṭhaśceti viśāmpate | yudhiṣṭhireṇa satkṛtya yukto ratnaparigrahe

हे प्रजानाथ, मुझे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ मानकर युधिष्ठिर ने मेरा सत्कार किया और रत्नों को ग्रहण करने के काम पर नियुक्त किया।

श्लोक 24 (2.77.24)

उपस्थितानां रत्नानां श्रेष्ठानामर्घहारिणाम् । नादृश्यत परः पारो नापरस्तत्र भारत ॥

upasthitānāṃ ratnānāṃ śreṣṭhānāmarghahāriṇām | nādṛśyata paraḥ pāro nāparastatra bhārata

हे भारत, वहाँ आए हुए श्रेष्ठ और बहुमूल्य रत्नों का न आगे कोई छोर दिखता था, न पीछे।

श्लोक 25 (2.77.25)

न मे हस्तः समभवद्वसु तत्प्रतिगृह्णतः । अतिष्ठन्त मयि श्रान्ते गृह्य दूराहृतं वसु ॥

na me hastaḥ samabhavadvasu tatpratigṛhṇataḥ | atiṣṭhanta mayi śrānte gṛhya dūrāhṛtaṃ vasu

वह धन ग्रहण करते-करते मेरे हाथ थक गए; जब मैं थक गया, तो लोग दूर से लाया हुआ धन लिए खड़े प्रतीक्षा करते रहे।

श्लोक 26 (2.77.26)

कृतां बिन्दुसरोरत्नैर्मयेन स्फाटिकच्छदाम् । अपश्यं नलिनीं पूर्णामुदकस्येव भारत ॥

kṛtāṃ bindusaroratnairmayena sphāṭikacchadām | apaśyaṃ nalinīṃ pūrṇāmudakasyeva bhārata

हे भारत, मैंने मय द्वारा बिन्दुसर के रत्नों से बनाई, स्फटिक से ढकी एक कमल-तलैया देखी, जो जल से भरी हुई-सी लगती थी।

श्लोक 27 (2.77.27)

वस्त्रमुत्कर्षति मयि प्राहसत्स वृकोदरः । शत्रोर्ऋद्धिविशेषेण विमूढं रत्नवर्जितम् ॥

vastramutkarṣati mayi prāhasatsa vṛkodaraḥ | śatrorṛddhiviśeṣeṇa vimūḍhaṃ ratnavarjitam

जब मैं वस्त्र ऊपर उठा रहा था, तब वृकोदर मुझ पर हँसा — मुझ पर, जो शत्रु के विलक्षण वैभव से चकित था और रत्नों से रहित था।

श्लोक 28 (2.77.28)

तत्र स्म यदि शक्तः स्यां पातयेऽहं वृकोदरम् । यदि कुर्यां समारम्भं भीमं हन्तुं नराधिप ॥

tatra sma yadi śaktaḥ syāṃ pātaye'haṃ vṛkodaram | yadi kuryāṃ samārambhaṃ bhīmaṃ hantuṃ narādhipa

यदि वहाँ मुझमें सामर्थ्य होता तो मैं वृकोदर को गिरा देता। पर हे नरेश, यदि मैं भीम को मारने का उपक्रम करता,

श्लोक 29 (2.77.29)

शिशुपाल इवास्माकं गतिः स्यान्नात्र संशयः । सपत्नेनावहासो मे स मां दहति भारत ॥

śiśupāla ivāsmākaṃ gatiḥ syānnātra saṃśayaḥ | sapatnenāvahāso me sa māṃ dahati bhārata

तो निःसन्देह हमारी भी वही गति होती जो शिशुपाल की हुई। हे भारत, शत्रु द्वारा किया गया वह उपहास मुझे जलाता है।

श्लोक 30 (2.77.30)

पुनश्च तादृशीमेव वापीं जलजशालिनीम् । मत्वा शिलासमां तोये पतितोऽस्मि नराधिप ॥

punaśca tādṛśīmeva vāpīṃ jalajaśālinīm | matvā śilāsamāṃ toye patito'smi narādhipa

और फिर, हे नरेश, कमलों से भरी वैसी ही एक बावड़ी को पत्थर का फ़र्श समझकर मैं जल में गिर पड़ा।

श्लोक 31 (2.77.31)

तत्र मां प्राहसत्कृष्णः पार्थेन सह सुस्वरम् । द्रौपदी च सह स्त्रीभिर्व्यथयन्ती मनो मम ॥

tatra māṃ prāhasatkṛṣṇaḥ pārthena saha susvaram | draupadī ca saha strībhirvyathayantī mano mama

वहाँ कृष्ण पार्थ के साथ ज़ोर से मुझ पर हँसे, और द्रौपदी भी स्त्रियों के साथ हँसकर मेरे मन को पीड़ा देती रही।

श्लोक 32 (2.77.32)

क्लिन्नवस्त्रस्य तु जले किङ्करा राजनोदिताः । ददुर्वासांसि मेऽन्यानि तच्च दुःखं परं मम ॥

klinnavastrasya tu jale kiṅkarā rājanoditāḥ | dadurvāsāṃsi me'nyāni tacca duḥkhaṃ paraṃ mama

जल में मेरे कपड़े भीग गए थे, तो राजा के भेजे सेवकों ने मुझे दूसरे वस्त्र दिए; वह मेरे लिए सबसे बड़ा दुःख था।

श्लोक 33 (2.77.33)

प्रलम्भं च शृणुष्वान्यद्वदतो मे नराधिप । अद्वारेण विनिर्गच्छन्द्वारसंस्थानरूपिणा । अभिहत्य शिलां भूयो ललाटेनास्मि विक्षतः ॥

pralambhaṃ ca śṛṇuṣvānyadvadato me narādhipa | advāreṇa vinirgacchandvārasaṃsthānarūpiṇā | abhihatya śilāṃ bhūyo lalāṭenāsmi vikṣataḥ

हे नरेश, मुझसे एक और छल की बात सुनिए। द्वार के आकार वाले, पर वास्तव में द्वार न होने वाले मार्ग से निकलते हुए मैं फिर पत्थर से टकराया और मेरा माथा कट गया।

श्लोक 34 (2.77.34)

तत्र मां यमजौ दूरादालोक्याभिहतं तदा । बाहुभिः परिगृह्णीतां शोचन्तौ सहितावुभौ ॥

tatra māṃ yamajau dūrādālokyābhihataṃ tadā | bāhubhiḥ parigṛhṇītāṃ śocantau sahitāvubhau

तब दोनों यमज भाई, दूर से मुझे चोट खाया देखकर, साथ-साथ शोक करते हुए आए और मुझे अपनी बाँहों में सँभाल लिया।

श्लोक 35 (2.77.35)

उवाच सहदेवस्तु तत्र मां विस्मयन्निव । इदं द्वारं धार्तराष्ट्र मा गच्छेति पुनः पुनः ॥

uvāca sahadevastu tatra māṃ vismayanniva | idaṃ dvāraṃ dhārtarāṣṭra mā gaccheti punaḥ punaḥ

सहदेव ने वहाँ मानो विस्मित होकर मुझसे बार-बार कहा — "धृतराष्ट्रपुत्र, द्वार यह है; उधर मत जाइए।"

श्लोक 36 (2.77.36)

भीमसेनेन तत्रोक्तो धृतराष्ट्रात्मजेति च । सम्बोध्य प्रहसित्वा च इतो द्वारं नराधिप ॥

bhīmasenena tatrokto dhṛtarāṣṭrātmajeti ca | sambodhya prahasitvā ca ito dvāraṃ narādhipa

और भीमसेन ने वहाँ मुझे "धृतराष्ट्रपुत्र" कहकर सम्बोधित किया और हँसते हुए कहा — "राजन्, द्वार इधर है।"

श्लोक 37 (2.77.37)

नामधेयानि रत्नानां पुरस्तान्न श्रुतानि मे । यानि दृष्टानि मे तस्यां मनस्तपति तच्च मे ॥

nāmadheyāni ratnānāṃ purastānna śrutāni me | yāni dṛṣṭāni me tasyāṃ manastapati tacca me

उस सभा में मैंने जो रत्न देखे, उनके नाम भी मैंने पहले कभी नहीं सुने थे; यह बात भी मेरे मन को सताती है।

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