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सभा पर्व · अध्याय 78

दुर्योधन द्वारा राजसूय में आई भेंटों का वर्णन

दुर्योधन धृतराष्ट्र को बताता है कि राजसूय में युधिष्ठिर के लिए उसने कैसा धन आते देखा — काम्बोजराज के ऊनी वस्त्र और घोड़े, अर्जुन को दिया गया सोने की माला वाला वह शंख जिसके नाद से राजा गिर पड़े और पाण्डव तथा कृष्ण उस पर हँसे, और काश्मीर, कलिंग, वंग, पाण्ड्य, चोल, केरल, सिन्धु, अवन्ती, काशी तथा अनेक अन्य राजाओं की भेंटें। पर्वतों, सीमान्तों और समुद्र-तट के लोग भेंट देने तक द्वार पर रोके रहते हैं; गन्धर्व चित्ररथ और तुम्बुरु, विराट, द्रुपद और कृष्ण भरपूर उपहार देते हैं। अन्त में वह युधिष्ठिर द्वारा पाले जाने वाले विशाल परिवार, हर अतिथि के लिए द्रौपदी की चिन्ता और उस दुःख का वर्णन करता है जिससे उसके मन में मरने की इच्छा जागती है।

अध्याय 77अध्याय-सूचीअध्याय 79

दुर्योधन उवाच

श्लोक 1 (2.78.1)

यन्मया पाण्डवेयानां दृष्टं तच्छृणु भारत । आहृतं भूमिपालैर्हि वसु मुख्यं ततस्ततः ॥

yanmayā pāṇḍaveyānāṃ dṛṣṭaṃ tacchṛṇu bhārata | āhṛtaṃ bhūmipālairhi vasu mukhyaṃ tatastataḥ

हे भारत, पाण्डवों के यहाँ मैंने जो देखा, वह सुनिए — पृथ्वी के राजाओं द्वारा जहाँ-तहाँ से लाया गया श्रेष्ठ धन।

श्लोक 2 (2.78.2)

नाविदं मूढमात्मानं दृष्ट्वाहं तदरेर्धनम् । फलतो भूमितो वाऽपि प्रतिपद्यस्व भारत ॥

nāvidaṃ mūḍhamātmānaṃ dṛṣṭvāhaṃ tadarerdhanam | phalato bhūmito vā'pi pratipadyasva bhārata

शत्रु के उस धन को देखकर मैं ऐसा मूढ़ हो गया कि अपने आप को भी न पहचान सका। फिर भी, हे भारत, उसे जानिए — जो उपज से उत्पन्न हुआ और जो भूमि से निकला।

श्लोक 3 (2.78.3)

और्णान्बैलान्वार्षदंशान् जातरूपपरिष्कृतान् । प्रावाराजिनमुख्यांश्च काम्भोजः प्रददौ बहून् ॥

aurṇānbailānvārṣadaṃśān jātarūpapariṣkṛtān | prāvārājinamukhyāṃśca kāmbhojaḥ pradadau bahūn

काम्बोजराज ने बहुत-से ऊनी वस्त्र, बिलों में रहने वाले पशुओं और बिलावों के रोम से बने स्वर्णजटित वस्त्र, तथा उत्तम चादरें और मृगचर्म भेंट किए।

श्लोक 4 (2.78.4)

अश्वांस्तित्तिरिकल्माषांस्त्रिशतं शुकनासिकान् । उष्ट्रवामीस्त्रिगर्ताश्च पुष्टाः पीलुशमीङ्गुदैः ॥

aśvāṃstittirikalmāṣāṃstriśataṃ śukanāsikān | uṣṭravāmīstrigartāśca puṣṭāḥ pīluśamīṅgudaiḥ

तीतर की भाँति चितकबरे और तोते जैसी नाक वाले तीन सौ घोड़े, तथा पीलु, शमी और इंगुद खाकर पुष्ट हुए त्रिगर्त देश के ऊँट और गदहियाँ भी दीं।

श्लोक 5 (2.78.5)

गोपाः स्वीयेन सहितास्तदादाय चतुष्पदम् । वसातयोऽन्यद्द्रव्यं द्वारि तस्यावतस्थिरे ॥

gopāḥ svīyena sahitāstadādāya catuṣpadam | vasātayo'nyaddravyaṃ dvāri tasyāvatasthire

ग्वाले अपने लोगों के साथ पशुधन लेकर आए, और वसाति अन्य वस्तुएँ लेकर; वे सब उनके द्वार पर खड़े रहे।

श्लोक 6 (2.78.6)

कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाञ्छिवान् । रत्नानि च हिरण्यं च सुवर्णं चैव केवलम् ॥

kamaṇḍalūnupādāya jātarūpamayāñchivān | ratnāni ca hiraṇyaṃ ca suvarṇaṃ caiva kevalam

सोने के बने सुन्दर कमण्डलु, रत्न, स्वर्णमुद्राएँ और शुद्ध सोना लेकर,

श्लोक 7 (2.78.7)

प्रीयमाणः प्रसन्नात्मा स्वयं स्वजनसंवृतः । त्रैखर्वो रथमुख्येशः पाण्डवाय न्यवेदयत् ॥

prīyamāṇaḥ prasannātmā svayaṃ svajanasaṃvṛtaḥ | traikharvo rathamukhyeśaḥ pāṇḍavāya nyavedayat

प्रधान रथियों के स्वामी ने प्रसन्न और प्रफुल्लित मन से, अपने स्वजनों से घिरे हुए, स्वयं पाण्डव को तीन खर्व की भेंट अर्पित की।

श्लोक 8 (2.78.8)

यश्च स द्विजमुख्येन राज्ञः शङ्खो निवेदितः । प्रीत्या दत्तः कुविन्देन धर्मराजाय धीमते ॥

yaśca sa dvijamukhyena rājñaḥ śaṅkho niveditaḥ | prītyā dattaḥ kuvindena dharmarājāya dhīmate

और वह शंख, जो एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ने राजा को भेंट किया था और जिसे कुविन्द ने प्रेमपूर्वक बुद्धिमान धर्मराज को दिया था —

श्लोक 9 (2.78.9)

तं सर्वे भ्रातरो भ्रात्रे ददुः शङ्खं किरीटिने । तं प्रत्यगृह्णाद्बीभत्सुस्तोयजं हेममालिनम् ॥

taṃ sarve bhrātaro bhrātre daduḥ śaṅkhaṃ kirīṭine | taṃ pratyagṛhṇādbībhatsustoyajaṃ hemamālinam

उस शंख को सब भाइयों ने अपने भाई किरीटी को दे दिया, और बीभत्सु (अर्जुन) ने सोने की माला से सजे उस जलजात शंख को ग्रहण किया।

श्लोक 10 (2.78.10)

चित्रं निष्कसहस्रेण भ्राजमानं स्वतेजसा । रुचिरं दर्शनीयं च पूजितं विश्वकर्मणा ॥

citraṃ niṣkasahasreṇa bhrājamānaṃ svatejasā | ruciraṃ darśanīyaṃ ca pūjitaṃ viśvakarmaṇā

वह सहस्र निष्कों से चित्रित, अपने तेज से दमकता हुआ, मनोहर, दर्शनीय और विश्वकर्मा द्वारा पूजित था।

श्लोक 11 (2.78.11)

अधारयच्च धर्मश्च तं नमस्य पुनः पुनः । योऽनादनेऽपि नदति स ननादाधिकं तदा ॥

adhārayacca dharmaśca taṃ namasya punaḥ punaḥ | yo'nādane'pi nadati sa nanādādhikaṃ tadā

धर्मराज ने भी बार-बार उसे प्रणाम करके धारण किया। जो शंख बिना बजाए भी गूँजता है, वह उस समय और भी ज़ोर से गूँजा।

श्लोक 12 (2.78.12)

प्रणादाद्भूमिपास्तस्य पेतुर्हीनाः स्वतेजसा । धृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः ॥

praṇādādbhūmipāstasya peturhīnāḥ svatejasā | dhṛṣṭadyumnaḥ pāṇḍavāśca sātyakiḥ keśavo'ṣṭamaḥ

उसके नाद से राजा अपने तेज से हीन होकर गिर पड़े। धृष्टद्युम्न, पाण्डव, सात्यकि और आठवें केशव —

श्लोक 13 (2.78.13)

सत्वेन स्वेन सम्पन्ना अन्योन्यप्रियकारिणः । विसञ्ज्ञान्भूमिपान्दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा ॥

satvena svena sampannā anyonyapriyakāriṇaḥ | visañjñānbhūmipāndṛṣṭvā māṃ ca te prāhasaṃstadā

जो अपने बल से सम्पन्न और एक-दूसरे का प्रिय करने वाले हैं, राजाओं को और मुझे भी अचेत देखकर हँस पड़े।

श्लोक 14 (2.78.14)

ततः प्रहृष्टो बीभत्सुरददाद्धेमशृङ्गिणः । शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्याय भारत ॥

tataḥ prahṛṣṭo bībhatsuradadāddhemaśṛṅgiṇaḥ | śatānyanaḍuhāṃ pañca dvijamukhyāya bhārata

तब हर्षित होकर बीभत्सु ने, हे भारत, उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को सोने के सींगों वाले पाँच सौ बैल दिए।

श्लोक 15 (2.78.15)

सुमुखेन बलिर्मुख्यः प्रेषितोऽजातशत्रवे । कुविन्देन हिरण्यं च वासांसि विविधानि च ॥

sumukhena balirmukhyaḥ preṣito'jātaśatrave | kuvindena hiraṇyaṃ ca vāsāṃsi vividhāni ca

सुमुख ने अजातशत्रु के पास उत्तम भेंट भेजी, और कुविन्द ने सोना तथा अनेक प्रकार के वस्त्र।

श्लोक 16 (2.78.16)

काश्मीरराजो मार्द्वीकं शुद्धं च सरसं मधु । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवायाभ्युपागमत् ॥

kāśmīrarājo mārdvīkaṃ śuddhaṃ ca sarasaṃ madhu | baliṃ ca kṛtsnamādāya pāṇḍavāyābhyupāgamat

काश्मीर के राजा अंगूरी मदिरा, शुद्ध और रसीला मधु तथा अपनी पूरी भेंट लेकर पाण्डव के पास आए।

श्लोक 17 (2.78.17)

यवना हयानुपादाय पार्वतीयान्मनोजवान् । आसनानि महार्हाणि कम्बलांश्च महाधनान् ॥

yavanā hayānupādāya pārvatīyānmanojavān | āsanāni mahārhāṇi kambalāṃśca mahādhanān

यवन लोग मन के समान वेगवान पहाड़ी घोड़े, बहुमूल्य आसन और महँगे कम्बल लेकर आए,

श्लोक 18 (2.78.18)

नवान्सूक्ष्मांश्च हृद्यांश्च परार्ध्यान्सुप्रदर्शनान् । अन्यच्च विविधं रत्नं द्वारि ते न्यवतस्थिरे ॥

navānsūkṣmāṃśca hṛdyāṃśca parārdhyānsupradarśanān | anyacca vividhaṃ ratnaṃ dvāri te nyavatasthire

जो नए, महीन, मनभावन, अत्यन्त मूल्यवान और देखने में सुन्दर थे; साथ ही अनेक प्रकार के अन्य रत्न भी — और वे द्वार पर खड़े रहे।

श्लोक 19 (2.78.19)

श्रुतायुरपि कालिङ्गो मणिरत्नमनुत्तमम् । अङ्गः स्त्रियो दर्शनीया जातरूपविभूषिताः ॥

śrutāyurapi kāliṅgo maṇiratnamanuttamam | aṅgaḥ striyo darśanīyā jātarūpavibhūṣitāḥ

कलिंगराज श्रुतायु ने अनुपम मणिरत्न दिया; अंगराज ने सोने के आभूषणों से सजी सुन्दर स्त्रियाँ;

श्लोक 20 (2.78.20)

वङ्गो जाम्बूनदमयान्पर्यङ्काञ्छतशो नृप । दक्षिणात्सागराभ्याशात्प्रावारांश्च परश्शतम् ॥

vaṅgo jāmbūnadamayānparyaṅkāñchataśo nṛpa | dakṣiṇātsāgarābhyāśātprāvārāṃśca paraśśatam

वंगराज ने, हे राजन्, जाम्बूनद सोने के सैकड़ों पलंग, और दक्षिण सागर के तट से सौ से अधिक चादरें,

श्लोक 21 (2.78.21)

औदकानि सरत्नानि बलिं चादाय भारत । अन्येभ्यो भूमिपालेभ्यः पाण्डवाय न्यवेदयत् ॥

audakāni saratnāni baliṃ cādāya bhārata | anyebhyo bhūmipālebhyaḥ pāṇḍavāya nyavedayat

और समुद्र से उत्पन्न वस्तुएँ तथा रत्न; और अन्य राजाओं से भी भेंट लेकर, हे भारत, उसने पाण्डव को अर्पित की।

श्लोक 22 (2.78.22)

दार्दुरं चन्दनं मुख्यं भारं षण्णवतिं द्रुतम् । पाण्डवाय ददौ पाण्ड्यः शङ्खांस्तावत एव च ॥

dārduraṃ candanaṃ mukhyaṃ bhāraṃ ṣaṇṇavatiṃ drutam | pāṇḍavāya dadau pāṇḍyaḥ śaṅkhāṃstāvata eva ca

पाण्ड्यराज ने पाण्डव को दर्दुर पर्वत के उत्तम चन्दन के छियानवे भार तुरन्त दिए, और उतने ही शंख भी।

श्लोक 23 (2.78.23)

चन्दनागरु चानन्तं मुक्तावैडूर्यचित्रिताः । चोलश्च केरलश्चोभौ ददतुः पाण्डवाय वै ॥

candanāgaru cānantaṃ muktāvaiḍūryacitritāḥ | colaśca keralaścobhau dadatuḥ pāṇḍavāya vai

चोल और केरल दोनों राजाओं ने पाण्डव को असीम चन्दन और अगरु, तथा मोतियों और वैदूर्य से जड़ी वस्तुएँ दीं।

श्लोक 24 (2.78.24)

अश्मको हेमशृङ्गीश्च दोग्ध्रीर्हेमविभूषितः । सवत्साः कुम्भदोहाश्च सहस्राण्यददाद्दश ॥

aśmako hemaśṛṅgīśca dogdhrīrhemavibhūṣitaḥ | savatsāḥ kumbhadohāśca sahasrāṇyadadāddaśa

सोने से अलंकृत अश्मकराज ने बछड़ों सहित, घड़ा भर दूध देने वाली, सुनहरे सींगों वाली दस हज़ार दुधारू गायें दीं।

श्लोक 25 (2.78.25)

सैन्धवानां सहस्राणि हयानां पञ्चविंशतिम् । अददात्सैन्धवो राजा हेममाल्यैरलङ्कृतान् ॥

saindhavānāṃ sahasrāṇi hayānāṃ pañcaviṃśatim | adadātsaindhavo rājā hemamālyairalaṅkṛtān

सिन्धुराज ने सोने की मालाओं से सजे पच्चीस हज़ार सिन्धी घोड़े दिए।

श्लोक 26 (2.78.26)

सौवीरो हस्तिभिर्युक्तान्रथांश्च त्रिशतं परान् । जातरूपपरिष्कारान्मणिरत्नविभूषितान् ॥

sauvīro hastibhiryuktānrathāṃśca triśataṃ parān | jātarūpapariṣkārānmaṇiratnavibhūṣitān

सौवीरराज ने हाथियों से जुते, सोने से मढ़े और मणिरत्नों से जड़े तीन सौ उत्तम रथ दिए,

श्लोक 27 (2.78.27)

मध्यन्दिनार्कप्रतिमांस्तेजसा ज्वलितानिव । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत् ॥

madhyandinārkapratimāṃstejasā jvalitāniva | baliṃ ca kṛtsnamādāya pāṇḍavāya nyavedayat

जो दोपहर के सूर्य के समान तेज से मानो जल रहे थे; और अपनी पूरी भेंट लेकर पाण्डव को अर्पित की।

श्लोक 28 (2.78.28)

अवन्तिराजो रत्नानि विविधानि सहस्रशः । हाराङ्गदांश्च मुख्यान्वै विविधं च विभूषणम् ॥

avantirājo ratnāni vividhāni sahasraśaḥ | hārāṅgadāṃśca mukhyānvai vividhaṃ ca vibhūṣaṇam

अवन्तिराज हज़ारों प्रकार के रत्न, उत्तम हार और बाजूबन्द तथा भाँति-भाँति के आभूषण,

श्लोक 29 (2.78.29)

दासीनामयुतं चापि बलिमादाय भारत । सभाद्वारि नरश्रेष्ठ दिदृक्षुरवतिष्ठते ॥

dāsīnāmayutaṃ cāpi balimādāya bhārata | sabhādvāri naraśreṣṭha didṛkṣuravatiṣṭhate

और दस हज़ार दासियाँ भेंट में लेकर, हे भारत, हे नरश्रेष्ठ, दर्शन की इच्छा से सभा के द्वार पर खड़े हैं।

श्लोक 30 (2.78.30)

दशार्णश्चेदिराजश्च शूरसेनश्च वीर्यवान् । वस्त्राणि मुख्यान्यादाय रत्नानि विविधानि च । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत् ॥

daśārṇaścedirājaśca śūrasenaśca vīryavān | vastrāṇi mukhyānyādāya ratnāni vividhāni ca | baliṃ ca kṛtsnamādāya pāṇḍavāya nyavedayat

दशार्णराज, चेदिराज और पराक्रमी शूरसेन ने उत्तम वस्त्र और अनेक प्रकार के रत्न लेकर अपनी पूरी भेंट पाण्डव को अर्पित की।

श्लोक 31 (2.78.31)

काशिराजेन हृष्टेन बली राज्ञि निवेदितः । अशीतिगोसहस्राणि शतान्यष्टौ च दन्तिनाम् ॥

kāśirājena hṛṣṭena balī rājñi niveditaḥ | aśītigosahasrāṇi śatānyaṣṭau ca dantinām

काशिराज ने प्रसन्न होकर राजा को भेंट अर्पित की — अस्सी हज़ार गायें और आठ सौ हाथी,

श्लोक 32 (2.78.32)

अयुतं च नदीजानां हयानां हेममालिनाम् । विविधानि च रत्नानि काशिराजो बलिं ददौ ॥

ayutaṃ ca nadījānāṃ hayānāṃ hemamālinām | vividhāni ca ratnāni kāśirājo baliṃ dadau

सोने की मालाओं वाले, नदी-तटों पर पले दस हज़ार घोड़े और अनेक प्रकार के रत्न — यह भेंट काशिराज ने दी।

श्लोक 33 (2.78.33)

कृतक्षणश्च वैदेहः कौसलश्च बृहद्बलः । ददतुर्वाजिमुख्यांश्च सहस्राणि चतुर्दश ॥

kṛtakṣaṇaśca vaidehaḥ kausalaśca bṛhadbalaḥ | dadaturvājimukhyāṃśca sahasrāṇi caturdaśa

विदेहराज कृतक्षण और कोसलराज बृहद्बल ने चौदह हज़ार उत्तम घोड़े दिए।

श्लोक 34 (2.78.34)

शैब्यो वसातिभिः सार्धं त्रिगर्तो मालवैः सह । तेभ्यो रत्नानि ददतुरेकैको भूमिपोऽमितम् ॥

śaibyo vasātibhiḥ sārdhaṃ trigarto mālavaiḥ saha | tebhyo ratnāni dadaturekaiko bhūmipo'mitam

वसातियों के साथ शैब्य और मालवों के साथ त्रिगर्तराज — इनमें से प्रत्येक राजा ने उन्हें अपार रत्न दिए,

श्लोक 35 (2.78.35)

हारान्मुख्यान्परार्ध्यांश्च विविधं च विभूषणम् । शतं दासीसहस्राणि कार्पासिकनिवासिनाम् ॥

hārānmukhyānparārdhyāṃśca vividhaṃ ca vibhūṣaṇam | śataṃ dāsīsahasrāṇi kārpāsikanivāsinām

और उत्तम, बहुमूल्य हार तथा अनेक प्रकार के आभूषण भी। कार्पासिक देश की एक लाख दासियाँ,

श्लोक 36 (2.78.36)

श्यामास्तन्वीर्दीर्घकेशीर्हेमाभरणभूषिताः । बलिं च कृत्स्नमादाय भारुकच्छो नरर्षभ ॥

śyāmāstanvīrdīrghakeśīrhemābharaṇabhūṣitāḥ | baliṃ ca kṛtsnamādāya bhārukaccho nararṣabha

जो साँवली, छरहरी, लम्बे केशों वाली और सोने के गहनों से सजी थीं — इन्हें और अपनी पूरी भेंट लेकर, हे नरश्रेष्ठ, भरुकच्छ के राजा ने

श्लोक 37 (2.78.37)

शुद्धान्विप्रोत्तमार्हांश्च कम्बलप्रवरान्ददौ । ते सर्वे पाण्डुपुत्रस्य द्वार्यतिष्ठन्दिदृक्षवः ॥

śuddhānviprottamārhāṃśca kambalapravarāndadau | te sarve pāṇḍuputrasya dvāryatiṣṭhandidṛkṣavaḥ

श्रेष्ठ ब्राह्मणों के योग्य शुद्ध और उत्तम कम्बलों सहित दिया। वे सब पाण्डुपुत्र के द्वार पर उनके दर्शन की इच्छा से खड़े रहे।

श्लोक 38 (2.78.38)

उपायनं यदा दद्युस्तदा द्वारमलभ्यत । इन्द्रकृष्टैर्वर्धयन्ति धान्यैर्नदमुखैस्तु ये ॥

upāyanaṃ yadā dadyustadā dvāramalabhyata | indrakṛṣṭairvardhayanti dhānyairnadamukhaistu ye

जब वे भेंट दे देते, तभी उन्हें द्वार मिलता। जो इन्द्र की वर्षा से और नदियों के मुहानों पर उपजे अन्न से समृद्ध होते हैं,

श्लोक 39 (2.78.39)

समुद्रनिकटे जाताः परिसिन्धुनिवासिनः । ते वै द्रुमाः पारदाश्च काश्यकैरातकैः सह ॥

samudranikaṭe jātāḥ parisindhunivāsinaḥ | te vai drumāḥ pāradāśca kāśyakairātakaiḥ saha

जो समुद्र के निकट जन्मे और सिन्धु के आसपास बसे हैं — वे द्रुम और पारद, काश्यकों और कैरातकों के साथ —

श्लोक 40 (2.78.40)

बलिं विविधमादाय रत्नानि विविधानि च । अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्रं फलवन्मधु ॥

baliṃ vividhamādāya ratnāni vividhāni ca | ajāvikaṃ gohiraṇyaṃ kharoṣṭraṃ phalavanmadhu

अनेक प्रकार की भेंट और अनेक प्रकार के रत्न, बकरियाँ और भेड़ें, गायें और सोना, गधे और ऊँट तथा फलों से बना मधु,

श्लोक 41 (2.78.41)

कम्बलान्विविधांश्चैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । प्राग्ज्योतिषपतिः शूरो म्लेच्छानामधिपो बली ॥

kambalānvividhāṃścaiva dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | prāgjyotiṣapatiḥ śūro mlecchānāmadhipo balī

और भाँति-भाँति के कम्बल लेकर, द्वार पर रोके हुए खड़े हैं। प्राग्ज्योतिष के स्वामी, म्लेच्छों के बलवान और शूरवीर अधिपति,

श्लोक 42 (2.78.42)

यवनैः सहितो राजा भगदत्तो महाबलः । आजानेयान्हयाञ्छीघ्रमादायानिलरंहसः ॥

yavanaiḥ sahito rājā bhagadatto mahābalaḥ | ājāneyānhayāñchīghramādāyānilaraṃhasaḥ

महाबली राजा भगदत्त, यवनों के साथ, वायु के समान वेगवान उत्तम नस्ल के घोड़े शीघ्र लेकर,

श्लोक 43 (2.78.43)

बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठति वारितः । अश्मसारमयान्भाण्डाञ्छुभान्दन्तत्सरूनसीन् ॥

baliṃ ca kṛtsnamādāya dvāri tiṣṭhati vāritaḥ | aśmasāramayānbhāṇḍāñchubhāndantatsarūnasīn

और अपनी पूरी भेंट लेकर द्वार पर रोका हुआ खड़ा है। लोहे के सुन्दर पात्र और हाथीदाँत की मूठ वाली तलवारें —

श्लोक 44 (2.78.44)

प्राग्ज्योतिषाधिपो दत्त्वा भगदत्तोऽव्रजत्तदा । द्व्यक्षांस्त्र्यक्षांल्ललाटाक्षान्नानादिग्भ्यः समागतान् ॥

prāgjyotiṣādhipo dattvā bhagadatto'vrajattadā | dvyakṣāṃstryakṣāṃllalāṭākṣānnānādigbhyaḥ samāgatān

प्राग्ज्योतिषपति भगदत्त ये देकर तब चला गया। दो आँखों वाले, तीन आँखों वाले, ललाट पर आँख वाले, अनेक दिशाओं से आए हुए लोग,

श्लोक 45 (2.78.45)

औष्णीषानहयांश्चैव बाहुकान्पुरुषादकान् । एकपादांश्च तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान् ॥

auṣṇīṣānahayāṃścaiva bāhukānpuruṣādakān | ekapādāṃśca tatrāhamapaśyaṃ dvāri vāritān

औष्णीष और अहय, बाहुक और नरभक्षी, और एक पैर वाले लोग — इन्हें मैंने वहाँ द्वार पर रोके हुए देखा।

श्लोक 46 (2.78.46)

बल्यर्थं ददतस्तस्य हिरण्यं रजतं वसु । इन्द्रगोपकसङ्काशाञ्छुकवर्णान्मनोजवान् ॥

balyarthaṃ dadatastasya hiraṇyaṃ rajataṃ vasu | indragopakasaṅkāśāñchukavarṇānmanojavān

उसे भेंट के रूप में सोना, चाँदी और धन देते हुए, और इन्द्रगोप कीट के रंग के, तोते जैसे हरे, मन के समान वेगवान घोड़े,

श्लोक 47 (2.78.47)

तथैवेन्द्रायुधनिभान्सन्ध्याभ्रसदृशानपि । अनेकवर्णानारण्यान्गृहीत्वाश्वांस्तथा बहून् ॥

tathaivendrāyudhanibhānsandhyābhrasadṛśānapi | anekavarṇānāraṇyāngṛhītvāśvāṃstathā bahūn

और इन्द्रधनुष तथा सन्ध्या के बादलों जैसे, अनेक रंगों वाले जंगली घोड़े — ऐसे बहुत-से घोड़े लेकर,

श्लोक 48 (2.78.48)

जातरूपमनर्घ्यं च ददुस्तस्यैकपादकाः । सिंहलश्च तदा राजा परिगृह्य धनं बहु ॥

jātarūpamanarghyaṃ ca dadustasyaikapādakāḥ | siṃhalaśca tadā rājā parigṛhya dhanaṃ bahu

एक पैर वालों ने उसे अमूल्य सोना भी दिया। फिर सिंहल का राजा बहुत-सा धन लेकर,

श्लोक 49 (2.78.49)

गोशीर्षं हरितश्यामं चन्दनप्रवरं महत् । भाराणां शतमेकं तु द्वारि तिष्ठति वारितः ॥

gośīrṣaṃ haritaśyāmaṃ candanapravaraṃ mahat | bhārāṇāṃ śatamekaṃ tu dvāri tiṣṭhati vāritaḥ

और हरे-साँवले, श्रेष्ठ गोशीर्ष चन्दन के सौ भार लेकर, द्वार पर रोका हुआ खड़ा है।

श्लोक 50 (2.78.50)

ये नग्नविषया राजन्बर्बरेयाश्च विश्रुताः । शतं दासीसहस्राणां कम्बलांश्च सहस्रशः । परिगृह्य महाराज द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥

ye nagnaviṣayā rājanbarbareyāśca viśrutāḥ | śataṃ dāsīsahasrāṇāṃ kambalāṃśca sahasraśaḥ | parigṛhya mahārāja dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ

हे राजन्, नग्न देशों के लोग और प्रसिद्ध बर्बरेय, एक लाख दासियाँ और हज़ारों कम्बल लेकर, हे महाराज, द्वार पर रोके हुए खड़े हैं।

श्लोक 51 (2.78.51)

पौण्ड्राश्च दामलिप्ताश्च यथाकामकृतो नृपाः । कालेयकं च रूप्यं च परिगृह्य परिच्छदान् ॥

pauṇḍrāśca dāmaliptāśca yathākāmakṛto nṛpāḥ | kāleyakaṃ ca rūpyaṃ ca parigṛhya paricchadān

पौण्ड्र और दामलिप्त, जो मनमाना आचरण करने वाले राजा हैं, कालेयक, चाँदी और ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र लेकर,

श्लोक 52 (2.78.52)

अगरून्स्फाटिकांश्चैव दन्ताञ्जातीफलानि च । तक्कोलांश्च लवङ्गाश्च कर्पूरांश्च महाबल ॥

agarūnsphāṭikāṃścaiva dantāñjātīphalāni ca | takkolāṃśca lavaṅgāśca karpūrāṃśca mahābala

हे महाबली, अगरु, स्फटिक, हाथीदाँत और जायफल, तक्कोल, लौंग और कपूर,

श्लोक 53 (2.78.53)

अन्यांश्च विविधान्द्रव्यान्परिगृह्योपतस्थिरे । एते सर्वे महात्मानो द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥

anyāṃśca vividhāndravyānparigṛhyopatasthire | ete sarve mahātmāno dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ

और अनेक प्रकार की अन्य वस्तुएँ लेकर सेवा में उपस्थित हुए हैं। ये सब महानुभाव द्वार पर रोके हुए खड़े हैं।

श्लोक 54 (2.78.54)

शैलेयश्च ततो राजा पत्रोर्णान्परिगृह्य सः । द्वारि तिष्ठन्महाराज द्वारपालैर्निवारितः ॥

śaileyaśca tato rājā patrorṇānparigṛhya saḥ | dvāri tiṣṭhanmahārāja dvārapālairnivāritaḥ

फिर शैलेय राजा पत्रोर्ण (रेशमी वस्त्र) लेकर, हे महाराज, द्वारपालों द्वारा रोका हुआ द्वार पर खड़ा है।

श्लोक 55 (2.78.55)

चीना हूणाः कषाः काचाः पर्वतान्तरवासिनः । आहार्षुर्दशसाहस्रान्विनीतान्दिक्षु विश्रुतान् ॥

cīnā hūṇāḥ kaṣāḥ kācāḥ parvatāntaravāsinaḥ | āhārṣurdaśasāhasrānvinītāndikṣu viśrutān

पर्वतों के बीच बसने वाले चीन, हूण, कष और काच दस हज़ार (पशु) लाए, जो सुशिक्षित और सब दिशाओं में प्रसिद्ध थे;

श्लोक 56 (2.78.56)

औष्णीकं कम्बलं चैव कीटजं मणिजं तथा । प्रमाणरागस्पर्शाढ्यं बाह्लीचीनसमुद्भवम् ॥

auṣṇīkaṃ kambalaṃ caiva kīṭajaṃ maṇijaṃ tathā | pramāṇarāgasparśāḍhyaṃ bāhlīcīnasamudbhavam

पगड़ी के वस्त्र, कम्बल, कीटों से बना (रेशमी) वस्त्र और मणिजटित वस्त्र, जो नाप, रंग और स्पर्श में उत्तम थे और बाह्लीक तथा चीन में बने थे;

श्लोक 57 (2.78.57)

रसान् गन्धान्प्रशंसन्तस्ततो द्वारमलभ्यत । खर्वटास्तोमराश्चैव शूरा वर्धनकास्तथा ॥

rasān gandhānpraśaṃsantastato dvāramalabhyata | kharvaṭāstomarāścaiva śūrā vardhanakāstathā

अपने रसों और सुगन्धों की प्रशंसा करते हुए तब उन्हें द्वार मिला। खर्वट, तोमर और शूरवीर वर्धनक भी,

श्लोक 58 (2.78.58)

चेलान्बहुविधान्गृह्य द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । प्राक्कोटा नाटकेयाश्च नन्दीनगरकास्तथा ॥

celānbahuvidhāngṛhya dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | prākkoṭā nāṭakeyāśca nandīnagarakāstathā

अनेक प्रकार के वस्त्र लेकर द्वार पर रोके हुए खड़े हैं। प्राक्कोट, नाटकेय और नन्दीनगरक,

श्लोक 59 (2.78.59)

नापितास्त्रैपुराश्चैव पञ्चमेयाः सहोरुजाः । तथा चाटविकाः सर्वे नानाद्रव्यपरिच्छदान् ॥

nāpitāstraipurāścaiva pañcameyāḥ sahorujāḥ | tathā cāṭavikāḥ sarve nānādravyaparicchadān

नापित, त्रैपुर, पञ्चमेय और सहोरुज, तथा सारे वनवासी लोग, अनेक प्रकार की वस्तुएँ और सामग्री

श्लोक 60 (2.78.60)

परिगृह्य महाराज द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । शकास्तुषाराः कौरव्य रोमकाः शृङ्गिणोऽश्मकाः ॥

parigṛhya mahārāja dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | śakāstuṣārāḥ kauravya romakāḥ śṛṅgiṇo'śmakāḥ

लेकर, हे महाराज, द्वार पर रोके हुए खड़े हैं। हे कौरव्य, शक, तुषार, रोमक, सींग वाले लोग और अश्मक,

श्लोक 61 (2.78.61)

बलादूरुगमा राजन्गणितं चार्बुदं मया । कूटीकृतं सुवर्णं च पद्मकिञ्जल्कसंनिभम् ॥

balādūrugamā rājangaṇitaṃ cārbudaṃ mayā | kūṭīkṛtaṃ suvarṇaṃ ca padmakiñjalkasaṃnibham

हे राजन्, बलवान और तेज़ चलने वाले — मैंने उन्हें दस करोड़ गिना — कमल के केसर जैसे चमकते सोने के ढेर,

श्लोक 62 (2.78.62)

शितान्दीर्घानसीनन्यान्यष्टिशक्तिपरश्वथान् । श्लक्ष्णं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम् ॥

śitāndīrghānasīnanyānyaṣṭiśaktiparaśvathān | ślakṣṇaṃ vastramakārpāsamāvikaṃ mṛdu cājinam

तीखी लम्बी तलवारें और अन्य शस्त्र, लाठियाँ, शक्तियाँ और फरसे, बिना कपास का चिकना वस्त्र, मुलायम ऊनी वस्त्र और मृगचर्म,

श्लोक 63 (2.78.63)

बलं मत्तं समादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । आसनानि महार्हाणि यानानि शयनानि च ॥

balaṃ mattaṃ samādāya dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | āsanāni mahārhāṇi yānāni śayanāni ca

उन्मत्त सेना के साथ आकर वे द्वार पर रोके हुए खड़े हैं। बहुमूल्य आसन, सवारियाँ और शय्याएँ,

श्लोक 64 (2.78.64)

मणिकाञ्चनचित्राणि गजदन्तमयानि च । रथांश्च विविधाकाराञ्जाम्बूनदपरिष्कृतान् ॥

maṇikāñcanacitrāṇi gajadantamayāni ca | rathāṃśca vividhākārāñjāmbūnadapariṣkṛtān

मणि और सोने से चित्रित तथा हाथीदाँत से बनी; जाम्बूनद सोने से सजे अनेक आकारों के रथ,

श्लोक 65 (2.78.65)

हयैर्विनीतैः सम्पन्नान्वैयाघ्रपरिवारितान् । विचित्रान्सपरिस्तोमांश्चापानि विविधानि च ॥

hayairvinītaiḥ sampannānvaiyāghraparivāritān | vicitrānsaparistomāṃścāpāni vividhāni ca

सुशिक्षित घोड़ों से युक्त, बाघ की खाल से ढके, सुन्दर झूलों वाले; अनेक प्रकार के धनुष,

श्लोक 66 (2.78.66)

नाराचानर्धनाराचाञ्छस्त्राणि विविधानि च । एतद्द्रव्यं महद्गृह्य पूर्वदेशाधिपो नृपः ॥

nārācānardhanārācāñchastrāṇi vividhāni ca | etaddravyaṃ mahadgṛhya pūrvadeśādhipo nṛpaḥ

नाराच और अर्धनाराच बाण तथा अनेक प्रकार के शस्त्र — यह सारा महान धन लेकर पूर्व देश का राजा

श्लोक 67 (2.78.67)

प्रविष्टो यज्ञसदनं पाण्डवस्य महात्मनः । जन्तुचेलान्द्विसाहस्रान्दुकूलान्ययुतानि च ॥

praviṣṭo yajñasadanaṃ pāṇḍavasya mahātmanaḥ | jantucelāndvisāhasrāndukūlānyayutāni ca

महात्मा पाण्डव के यज्ञमण्डप में प्रविष्ट हुआ। जन्तुओं के तन्तु से बने दो हज़ार वस्त्र, दस हज़ार दुकूल,

श्लोक 68 (2.78.68)

कांस्यानि चैव भाण्डानि महार्हाणि कुथानि च । एतान्यन्यानि रत्नानि ददौ पार्थस्य वै मुदा ॥

kāṃsyāni caiva bhāṇḍāni mahārhāṇi kuthāni ca | etānyanyāni ratnāni dadau pārthasya vai mudā

काँसे के पात्र और बहुमूल्य झूलें — ये तथा अन्य रत्न उसने प्रसन्नता से पार्थ को दिए।

श्लोक 69 (2.78.69)

अन्यान्बहुविधान्राजन्नराः सागरमाश्रिताः । रत्नानि विविधान्गृह्य ददुस्ते पाण्डवाय तु ॥

anyānbahuvidhānrājannarāḥ sāgaramāśritāḥ | ratnāni vividhāngṛhya daduste pāṇḍavāya tu

हे राजन्, समुद्र के आश्रय में रहने वाले अनेक प्रकार के अन्य लोगों ने भाँति-भाँति के रत्न लेकर पाण्डव को दिए।

श्लोक 70 (2.78.70)

मालवाश्च ततो राजन्रत्नानि विविधानि च । गोधूमानां च राजेन्द्र द्रोणानां कोटिसंमितम् ॥

mālavāśca tato rājanratnāni vividhāni ca | godhūmānāṃ ca rājendra droṇānāṃ koṭisaṃmitam

फिर, हे राजन्, मालवराज ने अनेक प्रकार के रत्न और, हे राजेन्द्र, एक करोड़ द्रोण गेहूँ,

श्लोक 71 (2.78.71)

अन्यांश्च विविधान्धान्यान्परिगृह्य महाबलः । पाण्डवाय ददौ प्रीत्या प्रविवेश महाध्वरम् ॥

anyāṃśca vividhāndhānyānparigṛhya mahābalaḥ | pāṇḍavāya dadau prītyā praviveśa mahādhvaram

तथा अन्य अनेक प्रकार के अनाज लेकर उस महाबली ने प्रेमपूर्वक पाण्डव को दिए और महायज्ञ में प्रवेश किया।

श्लोक 72 (2.78.72)

नानारत्नान्बहून्गृह्य सुराष्ट्राधिपतिर्नृपः । तैलकुम्भान्महाराज द्रोणानामयुतानि च ॥

nānāratnānbahūngṛhya surāṣṭrādhipatirnṛpaḥ | tailakumbhānmahārāja droṇānāmayutāni ca

सुराष्ट्र के राजा ने अनेक प्रकार के बहुत-से रत्न, हे महाराज, दस हज़ार द्रोण तेल के घड़े,

श्लोक 73 (2.78.73)

गुडानपि स तान्स्वादून्सहस्रशकटैर्नृपः । एतानि सर्वाण्यादाय ददौ कुन्तीसुताय सः ॥

guḍānapi sa tānsvādūnsahasraśakaṭairnṛpaḥ | etāni sarvāṇyādāya dadau kuntīsutāya saḥ

और हज़ारों छकड़ों में भरा मीठा गुड़ — यह सब लेकर उस राजा ने कुन्तीपुत्र को दिया।

श्लोक 74 (2.78.74)

अन्ये च पार्थिवा राजन्नानादेशसमागताः । रत्नानि विविधान्गृह्य ददुस्ते कौरवाय तु ॥

anye ca pārthivā rājannānādeśasamāgatāḥ | ratnāni vividhāngṛhya daduste kauravāya tu

हे राजन्, अनेक देशों से आए अन्य राजाओं ने भी भाँति-भाँति के रत्न लाकर कौरव (युधिष्ठिर) को दिए।

श्लोक 75 (2.78.75)

जम्बूद्वीपे समस्ते तु सराष्ट्रवनपर्वते । करं तु न प्रयच्छेत नास्ति पार्थस्य पार्थिवः ॥

jambūdvīpe samaste tu sarāṣṭravanaparvate | karaṃ tu na prayaccheta nāsti pārthasya pārthivaḥ

राष्ट्रों, वनों और पर्वतों सहित सम्पूर्ण जम्बूद्वीप में ऐसा कोई राजा नहीं जो पार्थ को कर न दे।

श्लोक 76 (2.78.76)

नरः सप्तसु वर्षेषु तद्यज्ञे नास्ति नागतः । क्रतुर्नानागणैः कीर्णो बभौ शक्रसदो यथा ॥

naraḥ saptasu varṣeṣu tadyajñe nāsti nāgataḥ | kraturnānāgaṇaiḥ kīrṇo babhau śakrasado yathā

सातों वर्षों (महाद्वीपों) में ऐसा कोई मनुष्य नहीं था जो उस यज्ञ में न आया हो। अनेक समूहों से भरा वह यज्ञ इन्द्र की सभा के समान शोभित हुआ।

श्लोक 77 (2.78.77)

इमांश्च दायान्विविधान्निबोध मम पार्थिव । यज्ञार्थे राजभिर्दत्तान्महतो धनसञ्चयान् ॥

imāṃśca dāyānvividhānnibodha mama pārthiva | yajñārthe rājabhirdattānmahato dhanasañcayān

हे राजन्, मुझसे इन अनेक प्रकार की भेंटों के विषय में भी जानिए — यज्ञ के लिए राजाओं द्वारा दिए गए धन के विशाल भण्डार।

श्लोक 78 (2.78.78)

मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥

merumandarayormadhye śailodāmabhito nadīm | ye te kīcakaveṇūnāṃ chāyāṃ ramyāmupāsate

जो मेरु और मन्दर के बीच शैलोदा नदी के दोनों ओर बसते हैं और कीचक बाँसों की रमणीय छाया का सेवन करते हैं —

श्लोक 79 (2.78.79)

खषा एकासनाद्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः । पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्कणाः परतङ्कणाः ॥

khaṣā ekāsanādyarhāḥ pradarā dīrghaveṇavaḥ | pāradāśca kulindāśca taṅkaṇāḥ parataṅkaṇāḥ

खष, एकासन, अद्यर्ह, प्रदर, दीर्घवेणु, पारद, कुलिन्द, तङ्गण और परतङ्गण —

श्लोक 80 (2.78.80)

तद्वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत्पिपीलिकैः । जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नराः ॥

tadvai pipīlikaṃ nāma uddhṛtaṃ yatpipīlikaiḥ | jātarūpaṃ droṇameyamahārṣuḥ puñjaśo narāḥ

वे पिपीलिक नामक सोना लाए, जिसे चींटियाँ खोदकर निकालती हैं; उन लोगों ने द्रोणों से नापा जाने वाला वह सोना ढेरों में भेंट किया।

श्लोक 81 (2.78.81)

कृष्णवालांश्च चमराञ्छुक्लवालांस्तथा परान् । हिमवत्पुष्पजं चैव स्वादुक्षौद्ररसं बहु ॥

kṛṣṇavālāṃśca camarāñchuklavālāṃstathā parān | himavatpuṣpajaṃ caiva svādukṣaudrarasaṃ bahu

काले बालों वाले और दूसरे सफ़ेद बालों वाले चँवर, तथा हिमालय के फूलों से बना बहुत-सा मीठा मधु;

श्लोक 82 (2.78.82)

उत्तरेभ्यः कुरुभ्यश्च व्यूढमाल्यैर्महात्मभिः । उत्तरादपि कैलासादोषधीः सुमहाबलाः ॥

uttarebhyaḥ kurubhyaśca vyūḍhamālyairmahātmabhiḥ | uttarādapi kailāsādoṣadhīḥ sumahābalāḥ

और विशाल मालाएँ धारण करने वाले महात्मा उत्तर कुरुओं से और कैलास के उत्तर से अत्यन्त प्रभावशाली ओषधियाँ लाए।

श्लोक 83 (2.78.83)

पार्वतीयाश्चराजान आहृत्य प्रणताः स्थिताः । अजातशत्रवे राजन्द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥

pārvatīyāścarājāna āhṛtya praṇatāḥ sthitāḥ | ajātaśatrave rājandvāri tiṣṭhanti vāritāḥ

पर्वतीय राजा ये सब लाकर विनत खड़े हैं; हे राजन्, वे अजातशत्रु के द्वार पर रोके हुए खड़े हैं।

श्लोक 84 (2.78.84)

ये परार्घ्या हिमवतः सूर्योदयगिरेरनु । एवंरूपाः समुद्रान्ते लौहित्यमभितश्च ये ॥

ye parārghyā himavataḥ sūryodayagireranu | evaṃrūpāḥ samudrānte lauhityamabhitaśca ye

जो श्रेष्ठ लोग हिमालय के पार, उदयाचल के समीप रहते हैं, और वैसे ही वे जो समुद्र के छोर पर तथा लौहित्य नदी के दोनों ओर बसते हैं,

श्लोक 85 (2.78.85)

फलमूलाशना ये च किराताश्चर्मवाससः । चन्दनागरुमुख्यानि महार्हान्कम्बलानि च ॥

phalamūlāśanā ye ca kirātāścarmavāsasaḥ | candanāgarumukhyāni mahārhānkambalāni ca

और फल-मूल खाने वाले, चर्मवस्त्रधारी किरात — उत्तम चन्दन और अगरु, बहुमूल्य कम्बल,

श्लोक 86 (2.78.86)

चर्मरत्नसुवर्णानि गन्धानुच्चावचानि च । कैरातकीनामयुतं दासीनां च विशंपते ॥

carmaratnasuvarṇāni gandhānuccāvacāni ca | kairātakīnāmayutaṃ dāsīnāṃ ca viśaṃpate

चर्म, रत्न, सोना और भाँति-भाँति की सुगन्धियाँ, और, हे प्रजानाथ, दस हज़ार किरात दासियाँ,

श्लोक 87 (2.78.87)

आहृत्य रमणीयार्थान्दूरगान्मृगपक्षिणः । निचितं पर्वतेभ्यश्च हिरण्यंभूरिवर्चसम् ॥

āhṛtya ramaṇīyārthāndūragānmṛgapakṣiṇaḥ | nicitaṃ parvatebhyaśca hiraṇyaṃbhūrivarcasam

सुन्दर वस्तुएँ, दूर देशों के पशु-पक्षी और पर्वतों से एकत्र किया गया अत्यन्त चमकीला सोना लेकर,

श्लोक 88 (2.78.88)

बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । कापव्या दरदा दर्वाः शूरा वै यमकास्तथा ॥

baliṃ ca kṛtsnamādāya dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | kāpavyā daradā darvāḥ śūrā vai yamakāstathā

और अपनी पूरी भेंट लेकर द्वार पर रोके हुए खड़े हैं। कापव्य, दरद, दर्व, शूरवीर यमक,

श्लोक 89 (2.78.89)

औदुम्बरा दुर्विभागा द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः । काश्मीराश्च कुमाराश्च गौरका हंसकास्तथा ॥

audumbarā durvibhāgā dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ | kāśmīrāśca kumārāśca gaurakā haṃsakāstathā

औदुम्बर और दुर्विभाग द्वार पर रोके हुए खड़े हैं। काश्मीर, कुमार, गौरक और हंसक,

श्लोक 90 (2.78.90)

शिबित्रैगर्तयौधेया राजन्या मद्रकैः सह । वसुतेयाः समौलेयाः सह क्षुद्रकमालवैः ॥

śibitraigartayaudheyā rājanyā madrakaiḥ saha | vasuteyāḥ samauleyāḥ saha kṣudrakamālavaiḥ

शिबि, त्रैगर्त और यौधेय, मद्रकों सहित राजन्य, वसुतेय और मौलेय, क्षुद्रकों और मालवों के साथ,

श्लोक 91 (2.78.91)

चौण्डिकाश्चौदकाश्चैव साल्वाश्चैव विशम्पते । अङ्कवङ्काश्च यवना अनवद्या गयैः सह ॥

cauṇḍikāścaudakāścaiva sālvāścaiva viśampate | aṅkavaṅkāśca yavanā anavadyā gayaiḥ saha

चौण्डिक, औदक और साल्व, हे प्रजानाथ, अंग और वंग, यवन, और गयों के साथ अनवद्य —

श्लोक 92 (2.78.92)

सुजातयः श्रेणिमन्तः श्रेयांसः शस्त्रधारिणः । आहार्षुः क्षत्रिया वित्तं शतशोऽजातशत्रवे ॥

sujātayaḥ śreṇimantaḥ śreyāṃsaḥ śastradhāriṇaḥ | āhārṣuḥ kṣatriyā vittaṃ śataśo'jātaśatrave

उत्तम कुल के, संघों में संगठित, श्रेष्ठ और शस्त्रधारी क्षत्रिय अजातशत्रु के लिए सैकड़ों की संख्या में धन लाए।

श्लोक 93 (2.78.93)

वङ्काः कलिङ्गा मगधास्ताम्रलिप्ताः सपुण्ड्रकाः । दुकूलं कौशिकं चैव पत्रोर्णं चैव भारत ॥

vaṅkāḥ kaliṅgā magadhāstāmraliptāḥ sapuṇḍrakāḥ | dukūlaṃ kauśikaṃ caiva patrorṇaṃ caiva bhārata

वंग, कलिंग, मगध, ताम्रलिप्त और पुण्ड्रक, हे भारत, दुकूल, कौशेय और पत्रोर्ण वस्त्र लाए।

श्लोक 94 (2.78.94)

उपावृत्ता नृपास्तस्य ददुः प्रीतिं न चागमन् । उच्यन्ते तत्र हि द्वार्स्थैर्बलिमादाय विष्ठिताः ॥

upāvṛttā nṛpāstasya daduḥ prītiṃ na cāgaman | ucyante tatra hi dvārsthairbalimādāya viṣṭhitāḥ

उनके पास आए राजाओं ने उन्हें अपनी प्रीति अर्पित की, पर भीतर न जा सके; क्योंकि भेंट लिए खड़े उन लोगों से वहाँ द्वारपाल कहते थे —

श्लोक 95 (2.78.95)

ईषादन्तान्हेमकक्ष्यान्पद्मवर्णान्कुथावृतान् । शैलाभान्नित्यमत्तांश्चाप्यभितः काम्यकं सरः ॥

īṣādantānhemakakṣyānpadmavarṇānkuthāvṛtān | śailābhānnityamattāṃścāpyabhitaḥ kāmyakaṃ saraḥ

"रथ के धुरे जैसे दाँतों वाले, सुनहरी कसन वाले, कमल के रंग के, झूलों से ढके, पर्वत जैसे विशाल, सदा मदमत्त, काम्यक सरोवर के आसपास के हाथी —

श्लोक 96 (2.78.96)

क्षमावतः कुलीनांश्च कुञ्जरान्सपरिच्छदान् । दत्त्वैकैको दशशतान्द्वारेण प्रविशन्त्विति ॥

kṣamāvataḥ kulīnāṃśca kuñjarānsaparicchadān | dattvaikaiko daśaśatāndvāreṇa praviśantviti

सहनशील, उत्तम कुल के, साज-सामान सहित — ऐसे हज़ार-हज़ार हाथी देकर ही तुममें से प्रत्येक द्वार से प्रवेश करे।"

श्लोक 97 (2.78.97)

वैदेहकाश्च पुण्ड्राश्च गौलेयास्ताम्रलिप्तकाः । मरुकाः काशिका दर्दा भौमेया नटनाटकाः ॥

vaidehakāśca puṇḍrāśca gauleyāstāmraliptakāḥ | marukāḥ kāśikā dardā bhaumeyā naṭanāṭakāḥ

वैदेहक, पुण्ड्र, गौलेय, ताम्रलिप्तक, मरुक, काशिक, दर्द, भौमेय और नटनाटक,

श्लोक 98 (2.78.98)

कर्णाटाः कांस्यकुट्टाश्च पद्मजालाः सतीनराः । दाक्षिणात्याः पुलिन्दाश्च शवेरास्तङ्कणाः शषाः ॥

karṇāṭāḥ kāṃsyakuṭṭāśca padmajālāḥ satīnarāḥ | dākṣiṇātyāḥ pulindāśca śaverāstaṅkaṇāḥ śaṣāḥ

कर्णाट, कांस्यकुट्ट, पद्मजाल और सतीनर, दाक्षिणात्य, पुलिन्द, शवेर, तङ्कण और शष,

श्लोक 99 (2.78.99)

बर्बरा यवनाश्चैव गर्गराभीरकास्तथा । पल्लवाः शककारूशास्तुम्बकाः काशिकास्तदा ॥

barbarā yavanāścaiva gargarābhīrakāstathā | pallavāḥ śakakārūśāstumbakāḥ kāśikāstadā

बर्बर और यवन, गर्गर और आभीरक, पल्लव, शक और कारूश, तुम्बक और काशिक भी —

श्लोक 100 (2.78.100)

एते चान्ये च बहवो नानादिग्भ्यः समागताः । अन्यैश्चोपहृतान्यत्र रत्नानि हि महात्मभिः ॥

ete cānye ca bahavo nānādigbhyaḥ samāgatāḥ | anyaiścopahṛtānyatra ratnāni hi mahātmabhiḥ

ये और अन्य बहुत-से लोग अनेक दिशाओं से एकत्र हुए; और यहाँ अन्य महात्माओं ने भी रत्न भेंट किए।

श्लोक 101 (2.78.101)

समुद्रसारवैडूर्यान्मुक्ताः शङ्खास्तथैव च । शुभावर्ताञ्छुभाञ्छुक्तीः सिंहलाः समुपाहरन् ॥

samudrasāravaiḍūryānmuktāḥ śaṅkhāstathaiva ca | śubhāvartāñchubhāñchuktīḥ siṃhalāḥ samupāharan

सिंहल के लोग समुद्र की सम्पदा — वैदूर्य, मोती और शंख, तथा सुन्दर आवर्तों वाली सुन्दर सीपियाँ — लाए,

श्लोक 102 (2.78.102)

सम्भृतान्मणिचीरैश्च श्यामांस्ताम्रान्तलोचनान् । राजा चित्ररथो नाम गन्धर्वो वासवानुगः । शतानि चत्वार्यददद्धयानां वातरंहसाम् ॥

sambhṛtānmaṇicīraiśca śyāmāṃstāmrāntalocanān | rājā citraratho nāma gandharvo vāsavānugaḥ | śatāni catvāryadadaddhayānāṃ vātaraṃhasām

और मणिजटित वस्त्रों से सजे, ताँबे जैसे लाल कोरों वाली आँखों के साँवले लोग भी। इन्द्र के अनुचर, चित्ररथ नामक गन्धर्वराज ने वायु के वेग वाले चार सौ घोड़े दिए।

श्लोक 103 (2.78.103)

तुम्बुरुस्तु प्रमुदितो गन्धर्वो वाजिनां शतम् । आम्रपत्रसवर्णानामददद्धेममालिनाम् ॥

tumburustu pramudito gandharvo vājināṃ śatam | āmrapatrasavarṇānāmadadaddhemamālinām

गन्धर्व तुम्बुरु ने प्रसन्न होकर आम के पत्तों के रंग वाले, सोने की मालाओं से सजे सौ घोड़े दिए।

श्लोक 104 (2.78.104)

कृती राजा च कौरव्य शूकराणां विशाम्पते । अददद्गजरत्नानां शतानि सुबहून्यथ ॥

kṛtī rājā ca kauravya śūkarāṇāṃ viśāmpate | adadadgajaratnānāṃ śatāni subahūnyatha

हे कौरव्य, हे प्रजानाथ, शूकर देश के राजा कृती ने सैकड़ों उत्तम हाथी दिए।

श्लोक 105 (2.78.105)

विराटेन तु मत्स्येन बल्यर्थं हेममालिनाम् । कुञ्जराणां सहस्रे द्वे मत्तानां समुपाहृते ॥

virāṭena tu matsyena balyarthaṃ hemamālinām | kuñjarāṇāṃ sahasre dve mattānāṃ samupāhṛte

मत्स्यराज विराट ने भेंट के रूप में सोने की मालाओं वाले दो हज़ार मदमत्त हाथी अर्पित किए।

श्लोक 106 (2.78.106)

पांसुराष्ट्राद्वसुदानो राजा षड्विंशतिं गजान् । अश्वानां चसहस्रे द्वे राजन्काञ्चनमालिनाम् ॥

pāṃsurāṣṭrādvasudāno rājā ṣaḍviṃśatiṃ gajān | aśvānāṃ casahasre dve rājankāñcanamālinām

पांसुराष्ट्र के राजा वसुदान ने छब्बीस हाथी और, हे राजन्, सोने की मालाओं वाले दो हज़ार घोड़े दिए,

श्लोक 107 (2.78.107)

जवसत्वोपपन्नानां वयस्थानां नराधिप । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवेभ्यो न्यवेदयत् ॥

javasatvopapannānāṃ vayasthānāṃ narādhipa | baliṃ ca kṛtsnamādāya pāṇḍavebhyo nyavedayat

जो वेग और बल से युक्त तथा भरी जवानी में थे, हे नरनाथ; और अपनी पूरी भेंट लेकर पाण्डवों को अर्पित की।

श्लोक 108 (2.78.108)

यज्ञसेनेन दासीनां सहस्राणि चतुर्दश । दासानामयुतं चैव सदाराणां विशाम्पते ॥

yajñasenena dāsīnāṃ sahasrāṇi caturdaśa | dāsānāmayutaṃ caiva sadārāṇāṃ viśāmpate

हे प्रजानाथ, यज्ञसेन (द्रुपद) ने चौदह हज़ार दासियाँ और पत्नियों सहित दस हज़ार दास दिए,

श्लोक 109 (2.78.109)

गजयुक्ता महाराज रथाः षड्विंशतिस्तथा । राज्यं च कृत्स्नं पार्थेभ्यो यज्ञार्थं वै निवेदितम् ॥

gajayuktā mahārāja rathāḥ ṣaḍviṃśatistathā | rājyaṃ ca kṛtsnaṃ pārthebhyo yajñārthaṃ vai niveditam

और, हे महाराज, हाथियों से जुते छब्बीस रथ भी; और यज्ञ के लिए अपना सम्पूर्ण राज्य पार्थों को अर्पित कर दिया।

श्लोक 110 (2.78.110)

वासुदेवोऽपि वार्ष्णेयो मानं कुर्वन्किरीटिनः । अददद्गजमुख्यानां सहस्राणि चतुर्दश ॥

vāsudevo'pi vārṣṇeyo mānaṃ kurvankirīṭinaḥ | adadadgajamukhyānāṃ sahasrāṇi caturdaśa

वृष्णिवंशी वासुदेव ने भी किरीटी का मान बढ़ाते हुए चौदह हज़ार श्रेष्ठ हाथी दिए।

श्लोक 111 (2.78.111)

आत्मा हि कृष्णः पार्थस्य कृष्णस्यात्मा धनञ्जयः । यद्ब्रूयादर्जुनः कृष्णं सर्वं कुर्यादसंशयम् ॥

ātmā hi kṛṣṇaḥ pārthasya kṛṣṇasyātmā dhanañjayaḥ | yadbrūyādarjunaḥ kṛṣṇaṃ sarvaṃ kuryādasaṃśayam

क्योंकि कृष्ण पार्थ की आत्मा हैं और धनञ्जय कृष्ण की आत्मा। अर्जुन कृष्ण से जो कुछ कहें, वे निःसन्देह सब कर देंगे।

श्लोक 112 (2.78.112)

कृष्णो धनञ्जयस्यार्थे स्वर्गलोकमपि त्यजेत् । तथैव पार्थः कृष्णार्थे प्राणानपि परित्यजेत् ॥

kṛṣṇo dhanañjayasyārthe svargalokamapi tyajet | tathaiva pārthaḥ kṛṣṇārthe prāṇānapi parityajet

धनञ्जय के लिए कृष्ण स्वर्गलोक भी त्याग दें, और वैसे ही पार्थ कृष्ण के लिए प्राण भी न्योछावर कर दें।

श्लोक 113 (2.78.113)

सुरभींश्चन्दनरसान्हेमकुम्भसमास्थितान् । मलयाद्दर्दुराच्चैव चन्दनागुरुसञ्चयान् ॥

surabhīṃścandanarasānhemakumbhasamāsthitān | malayāddardurāccaiva candanāgurusañcayān

सोने के कलशों में रखे सुगन्धित चन्दन-रस, मलय और दर्दुर पर्वतों से लाए चन्दन और अगरु के ढेर,

श्लोक 114 (2.78.114)

मणिरत्नानि भास्वन्ति काञ्चनं सूक्ष्मवस्त्रकम् । चोलपाण्ड्यावपि द्वारं न लेभाते ह्युपस्थितौ ॥

maṇiratnāni bhāsvanti kāñcanaṃ sūkṣmavastrakam | colapāṇḍyāvapi dvāraṃ na lebhāte hyupasthitau

चमकते मणिरत्न, सोना और महीन वस्त्र — ये सब लेकर उपस्थित होने पर भी चोल और पाण्ड्य को द्वार नहीं मिला।

श्लोक 115 (2.78.115)

समुद्रसारं वैदूर्यं मुक्तासङ्घांस्तथैव च । शतशश्च कुथांस्तत्र सिंहलाः समुपाहरन् ॥

samudrasāraṃ vaidūryaṃ muktāsaṅghāṃstathaiva ca | śataśaśca kuthāṃstatra siṃhalāḥ samupāharan

सिंहल के लोग समुद्र की सम्पदा — वैदूर्य और मोतियों के ढेर — तथा सैकड़ों झूलें लाए।

श्लोक 116 (2.78.116)

संवृता मणिचीरैस्तु श्यामास्ताम्रान्तलोचनाः । ता गृहीत्वा नरास्तत्र द्वारि तिष्ठन्ति वारिताः ॥

saṃvṛtā maṇicīraistu śyāmāstāmrāntalocanāḥ | tā gṛhītvā narāstatra dvāri tiṣṭhanti vāritāḥ

मणिजटित वस्त्रों में लिपटी, ताँबे जैसे लाल कोरों वाली आँखों की साँवली स्त्रियाँ — उन्हें लेकर वे लोग वहाँ द्वार पर रोके हुए खड़े हैं।

श्लोक 117 (2.78.117)

प्रीत्यर्थं ब्राह्मणश्चैव क्षत्रियाश्च विनिर्जिताः । उपाजह्रुर्विशश्चैव शूद्राः शुश्रूषवस्तथा ॥

prītyarthaṃ brāhmaṇaścaiva kṣatriyāśca vinirjitāḥ | upājahrurviśaścaiva śūdrāḥ śuśrūṣavastathā

उन्हें प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण, पराजित क्षत्रिय, वैश्य और सेवा के इच्छुक शूद्र भी भेंट लाए।

श्लोक 118 (2.78.118)

प्रीत्या च बहुमानाच्चाप्युपागच्छन्युधिष्ठिरम् । सर्वे म्लेच्छाः सर्ववर्णा आदिमध्यान्तजास्तथा ॥

prītyā ca bahumānāccāpyupāgacchanyudhiṣṭhiram | sarve mlecchāḥ sarvavarṇā ādimadhyāntajāstathā

प्रेम और बड़े आदर से सब युधिष्ठिर के पास आए — सारे म्लेच्छ, और सभी वर्णों के लोग, आदि, मध्य और अन्त में जन्मे हुए।

श्लोक 119 (2.78.119)

नानादेशसमुत्थैश्च नानाजातिभिरेव च । पर्यस्त इव लोकोऽयं युधिष्ठिरनिवेशने ॥

nānādeśasamutthaiśca nānājātibhireva ca | paryasta iva loko'yaṃ yudhiṣṭhiraniveśane

अनेक देशों से आए और अनेक जातियों के लोगों से ऐसा लगता था मानो सारा संसार युधिष्ठिर के भवन में उमड़ आया हो।

श्लोक 120 (2.78.120)

उच्चावचानुपग्राहान्राजभिः प्रापितान्बहून् । शत्रूणां पश्यतो दुःखान्मुमूर्षा मे व्यजायत ॥

uccāvacānupagrāhānrājabhiḥ prāpitānbahūn | śatrūṇāṃ paśyato duḥkhānmumūrṣā me vyajāyata

राजाओं द्वारा भेजी गई छोटी-बड़ी अनगिनत भेंटें शत्रुओं के यहाँ देखकर दुःख से मेरे मन में मर जाने की इच्छा उत्पन्न हुई।

श्लोक 121 (2.78.121)

भृत्यास्तु ये पाण्डवानां तांस्ते वक्ष्यामि पार्थिव । येषामामं च पक्वं च संविधत्ते युधिष्ठिरः ॥

bhṛtyāstu ye pāṇḍavānāṃ tāṃste vakṣyāmi pārthiva | yeṣāmāmaṃ ca pakvaṃ ca saṃvidhatte yudhiṣṭhiraḥ

हे राजन्, अब मैं आपको पाण्डवों के आश्रितों के विषय में बताता हूँ, जिनके लिए युधिष्ठिर कच्चा और पका भोजन जुटाते हैं।

श्लोक 122 (2.78.122)

अयुतं त्रीणि पद्मानि गजारोहाः ससादिनः । रथानामर्बुदं चापि पादाता बहवस्तथा ॥

ayutaṃ trīṇi padmāni gajārohāḥ sasādinaḥ | rathānāmarbudaṃ cāpi pādātā bahavastathā

घुड़सवारों सहित हाथियों पर चढ़ने वाले योद्धा तीन पद्म और दस हज़ार, रथों का एक अर्बुद, और बहुत-से पैदल सैनिक।

श्लोक 123 (2.78.123)

प्रमीयमाणमामं च पच्यमानं तथैव च । विसृज्यमानं चान्यत्र पुण्याहस्वन एव च ॥

pramīyamāṇamāmaṃ ca pacyamānaṃ tathaiva ca | visṛjyamānaṃ cānyatra puṇyāhasvana eva ca

कहीं कच्चा अन्न नापा जा रहा था, कहीं पकाया जा रहा था, कहीं बाँटा जा रहा था, और चारों ओर पुण्याहवाचन का स्वर गूँज रहा था।

श्लोक 124 (2.78.124)

नाभुक्तवन्तं नापीतं नालङ्कृतमसत्कृतम् । अपश्यं सर्ववर्णानां युधिष्ठिरनिवेशने ॥

nābhuktavantaṃ nāpītaṃ nālaṅkṛtamasatkṛtam | apaśyaṃ sarvavarṇānāṃ yudhiṣṭhiraniveśane

युधिष्ठिर के भवन में मैंने किसी भी वर्ण का ऐसा व्यक्ति नहीं देखा जिसने खाया न हो, पिया न हो, जो अलंकृत न हो या जिसका सत्कार न हुआ हो।

श्लोक 125 (2.78.125)

अष्टाशीतिसहस्राणि स्नातका गृहमेधिनः । त्रिंशद्दासीक एकैको यान्बिभर्ति युधिष्ठिरः । सुप्रीताः परितृष्टाश्च ते ह्याशंसन्त्यरिक्षयम् ॥

aṣṭāśītisahasrāṇi snātakā gṛhamedhinaḥ | triṃśaddāsīka ekaiko yānbibharti yudhiṣṭhiraḥ | suprītāḥ paritṛṣṭāśca te hyāśaṃsantyarikṣayam

युधिष्ठिर अट्ठासी हज़ार स्नातक गृहस्थों का भरण-पोषण करते हैं, जिनमें से प्रत्येक के पास तीस दासियाँ हैं; वे अत्यन्त प्रसन्न और सन्तुष्ट होकर उनके शत्रुओं के नाश की कामना करते हैं।

श्लोक 126 (2.78.126)

दशान्यानि सहस्राणि यतीनामूर्ध्वरेतसाम् । भुञ्जते रुक्मपात्रीभिर्युधिष्ठिरनिवेशने ॥

daśānyāni sahasrāṇi yatīnāmūrdhvaretasām | bhuñjate rukmapātrībhiryudhiṣṭhiraniveśane

दस हज़ार अन्य ऊर्ध्वरेता यति युधिष्ठिर के भवन में सोने की थालियों में भोजन करते हैं।

श्लोक 127 (2.78.127)

अभुक्तं भुक्तवद्वापि सर्वमाकुब्जवामनम् । अभुञ्जाना याज्ञसेनी प्रत्यवैक्षद्विशाम्पते ॥

abhuktaṃ bhuktavadvāpi sarvamākubjavāmanam | abhuñjānā yājñasenī pratyavaikṣadviśāmpate

हे प्रजानाथ, याज्ञसेनी (द्रौपदी) स्वयं भोजन किए बिना सबकी, कुबड़ों और बौनों तक की, देखभाल करती थीं — किसने खाया है और किसने नहीं।

श्लोक 128 (2.78.128)

द्वौ करौ न प्रयच्छेतां कुन्तीपुत्राय भारत । साम्बन्धिकेनपाञ्चालाः सख्येनान्धकवृष्णयः ॥

dvau karau na prayacchetāṃ kuntīputrāya bhārata | sāmbandhikenapāñcālāḥ sakhyenāndhakavṛṣṇayaḥ

हे भारत, केवल दो ने कुन्तीपुत्र को कर नहीं दिया — पाञ्चालों ने विवाह-सम्बन्ध के कारण और अन्धक-वृष्णियों ने मैत्री के कारण।

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