सभा पर्व · अध्याय 79
दुर्योधन द्वारा युधिष्ठिर के अभिषेक का वर्णन
दुर्योधन धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर के राजसूय के वैभव का वर्णन जारी रखता है — उसकी सेवा में उपस्थित राजा, अभिषेक के लिए हर राजा की लाई भेंटें, अभिषेक करने वाले ऋषि, और वरुण के शंख से जल डालकर कृष्ण द्वारा किया गया अभिषेक। शंखों की ध्वनि से दुर्योधन और दुर्बल राजा मूर्छित हो गए, और पाण्डव, धृष्टद्युम्न, सात्यकि तथा कृष्ण उन पर हँसे। वह कहता है कि प्राचीन काल के किसी राजा के पास ऐसी लक्ष्मी नहीं थी; छोटों को बढ़ते और बड़ों को घटते देखकर उसे शान्ति नहीं मिलती, इसी से वह दुबला और निस्तेज हो गया है।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 1 (2.79.1)
आर्यास्तु ये वै राजानः सत्यसन्धा महाव्रताः । पर्याप्तविद्या वक्तारो वेदान्तावभृथप्लुताः ॥
āryāstu ye vai rājānaḥ satyasandhā mahāvratāḥ | paryāptavidyā vaktāro vedāntāvabhṛthaplutāḥ
आर्य राजा, जो सत्यप्रतिज्ञ और महान व्रतों का पालन करने वाले थे, पूर्ण विद्वान और वाक्पटु थे, और वेदाध्ययन की समाप्ति पर अवभृथ-स्नान कर चुके थे,
श्लोक 2 (2.79.2)
धृतिमन्तो ह्रीनिषेवा धर्मात्मानो यशस्विनः । मूर्धाभिषिक्तास्ते चैनं राजानः पर्युपासते ॥
dhṛtimanto hrīniṣevā dharmātmāno yaśasvinaḥ | mūrdhābhiṣiktāste cainaṃ rājānaḥ paryupāsate
धैर्यवान, लज्जाशील, धर्मात्मा और यशस्वी — ऐसे मूर्धाभिषिक्त राजा उसकी सेवा में उपस्थित रहते थे।
श्लोक 3 (2.79.3)
दक्षिणार्थं समानीता राजभिः कांस्यदोहनाः । आरण्या बहुसाहस्रा अपश्यंस्तत्रतत्र गाः ॥
dakṣiṇārthaṃ samānītā rājabhiḥ kāṃsyadohanāḥ | āraṇyā bahusāhasrā apaśyaṃstatratatra gāḥ
वहाँ जहाँ-तहाँ लोगों ने दक्षिणा के लिए राजाओं की लाई हुई हज़ारों वन्य गौएँ देखीं, जिनके साथ काँसे के दुग्धपात्र थे।
श्लोक 4 (2.79.4)
आजह्रुस्तत्र सत्कृत्य स्वयमुद्यम्य भारत । अभिषेकार्थमव्यग्रा भाण्डमुच्चावचं नृपाः ॥
ājahrustatra satkṛtya svayamudyamya bhārata | abhiṣekārthamavyagrā bhāṇḍamuccāvacaṃ nṛpāḥ
हे भारत, वहाँ राजा स्वयं आदरपूर्वक और शान्त भाव से अभिषेक के लिए तरह-तरह के छोटे-बड़े पात्र उठाकर लाए।
श्लोक 5 (2.79.5)
बाह्लीको रथमाहार्षीज्जाम्बूनदविभूषितम् । सुदक्षिणस्तु युयुजे श्वेतैः काम्बोजजैर्हयैः ॥
bāhlīko rathamāhārṣījjāmbūnadavibhūṣitam | sudakṣiṇastu yuyuje śvetaiḥ kāmbojajairhayaiḥ
बाह्लीक जाम्बूनद स्वर्ण से सजा रथ लाया, और सुदक्षिण ने उसमें काम्बोज देश के श्वेत घोड़े जोते।
श्लोक 6 (2.79.6)
सुनीथः प्रीतिमांश्चैव ह्यनुकर्षं महाबलः । ध्वजं चेदिपतिश्चैवमहार्षीत्स्वयमुद्यतम् ॥
sunīthaḥ prītimāṃścaiva hyanukarṣaṃ mahābalaḥ | dhvajaṃ cedipatiścaivamahārṣītsvayamudyatam
महाबली सुनीथ ने प्रसन्न होकर रथ का अनुकर्ष (नीचे का ढाँचा) दिया, और चेदिराज स्वयं ध्वजा उठाकर लाया।
श्लोक 7 (2.79.7)
दाक्षिणात्यः सन्नहनं स्रगुष्णीषे च मागधः । वसुदानो महेष्वासो गजेन्द्रं षष्टिहायनम् ॥
dākṣiṇātyaḥ sannahanaṃ sraguṣṇīṣe ca māgadhaḥ | vasudāno maheṣvāso gajendraṃ ṣaṣṭihāyanam
दक्षिण के राजा ने कवच, मगधराज ने माला और पगड़ी, और महाधनुर्धर वसुदान ने साठ वर्ष का गजराज दिया;
श्लोक 8 (2.79.8)
मत्स्यस्त्वक्षान्हेमनद्धानेकलव्य उपानहौ । आवन्त्यस्त्वभिषेकार्थमपो बहुविधास्तथा ॥
matsyastvakṣānhemanaddhānekalavya upānahau | āvantyastvabhiṣekārthamapo bahuvidhāstathā
मत्स्यराज ने सोने से मढ़े धुरे, एकलव्य ने जूतों की जोड़ी, और अवन्तिराज ने अभिषेक के लिए अनेक प्रकार का जल दिया।
श्लोक 9 (2.79.9)
चेकितान उपासङ्गं धनुः काश्य उपाहरत् । असिं च सुत्सरुं शल्यः शैक्यं काञ्चनभूषणम् ॥
cekitāna upāsaṅgaṃ dhanuḥ kāśya upāharat | asiṃ ca sutsaruṃ śalyaḥ śaikyaṃ kāñcanabhūṣaṇam
चेकितान ने तरकश, काशिराज ने धनुष, और शल्य ने सुन्दर मूठ वाली तलवार तथा सोने से अलंकृत छींका भेंट किया।
श्लोक 10 (2.79.10)
अभ्यषिञ्चत्ततो धौम्यो व्यासश्च सुमहातपाः । नारदं च पुरस्कृत्य देवलं चासितं मुनिम् ॥
abhyaṣiñcattato dhaumyo vyāsaśca sumahātapāḥ | nāradaṃ ca puraskṛtya devalaṃ cāsitaṃ munim
तब धौम्य और महातपस्वी व्यास ने नारद को आगे करके, देवल और असित मुनि के साथ, उसका अभिषेक किया।
श्लोक 11 (2.79.11)
प्रीतिमन्त उपातिष्ठन्नभिषेकं महर्षयः । जामदग्न्येन सहितास्तथान्ये वेदपारगाः ॥
prītimanta upātiṣṭhannabhiṣekaṃ maharṣayaḥ | jāmadagnyena sahitāstathānye vedapāragāḥ
जमदग्निनन्दन परशुराम तथा अन्य वेदपारगामी विद्वानों के साथ महर्षि प्रसन्न होकर अभिषेक में उपस्थित हुए।
श्लोक 12 (2.79.12)
अभिजग्मुर्महात्मानो मन्त्रवद्भूरिदक्षिणम् । महेन्द्रमिव देवेन्द्रं दिवि सप्तर्षयो यथा ॥
abhijagmurmahātmāno mantravadbhūridakṣiṇam | mahendramiva devendraṃ divi saptarṣayo yathā
जैसे स्वर्ग में सप्तर्षि देवराज महेन्द्र के पास जाते हैं, वैसे ही वे महात्मा मन्त्रोच्चार करते हुए प्रचुर दक्षिणा देने वाले उस राजा के पास पहुँचे।
श्लोक 13 (2.79.13)
अधारयच्छत्रमस्य सात्यकिः सत्यविक्रमः । धनञ्जयश्च व्यजने भीमसेनश्च पाण्डवः ॥
adhārayacchatramasya sātyakiḥ satyavikramaḥ | dhanañjayaśca vyajane bhīmasenaśca pāṇḍavaḥ
सत्यपराक्रमी सात्यकि ने उस पर छत्र धारण किया; धनंजय और पाण्डुपुत्र भीमसेन ने पंखे थामे;
श्लोक 14 (2.79.14)
चामरे चापि शुद्धे द्वे यमौ जगृहतुस्तथा । उपागृह्णाद्यमिन्द्राय पुराकल्पे प्रजापतिः ॥
cāmare cāpi śuddhe dve yamau jagṛhatustathā | upāgṛhṇādyamindrāya purākalpe prajāpatiḥ
और दोनों जुड़वाँ भाइयों ने दो उज्ज्वल चँवर पकड़े। जिस शंख को प्राचीन कल्प में प्रजापति ने इन्द्र के लिए ग्रहण किया था,
श्लोक 15 (2.79.15)
तमस्मै शङ्खमाहार्षीद्वारुणं कलशोदधिः । शैक्यं निष्कसहस्रेण सुकृतं विश्वकर्मणा ॥
tamasmai śaṅkhamāhārṣīdvāruṇaṃ kalaśodadhiḥ | śaikyaṃ niṣkasahasreṇa sukṛtaṃ viśvakarmaṇā
वरुण का वह शंख समुद्र ने उसके लिए लाकर दिया, साथ ही विश्वकर्मा का बनाया हुआ, सहस्र निष्कों से जड़ा छींका भी।
श्लोक 16 (2.79.16)
तेनाभिषिक्तः कृष्णेन तत्र मे कश्मलोऽभवत् । गच्छन्ति पूर्वादपरं समुद्रं चापि दक्षिणम् ॥
tenābhiṣiktaḥ kṛṣṇena tatra me kaśmalo'bhavat | gacchanti pūrvādaparaṃ samudraṃ cāpi dakṣiṇam
जब कृष्ण ने उसी शंख से उसका अभिषेक किया, तब वहाँ मुझे मूर्छा आ गई। लोग पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र तक और दक्षिणी समुद्र तक भी जाते हैं,
श्लोक 17 (2.79.17)
उत्तरं तु न गच्छन्ति विना तात पतत्रिभिः । तत्र स्म दध्मुः शतशः शङ्खान्मङ्गलकारकान् ॥
uttaraṃ tu na gacchanti vinā tāta patatribhiḥ | tatra sma dadhmuḥ śataśaḥ śaṅkhānmaṅgalakārakān
पर हे तात, उत्तरी समुद्र तक पक्षियों के बिना कोई नहीं जाता। वहाँ सैकड़ों मंगलकारी शंख बजाए गए;
श्लोक 18 (2.79.18)
प्राणदन्त समाध्मातास्ततो रोमाणि मेऽहृषन् । प्रापतन्भूमिपालाश्च ये तु हीनाः स्वतेजसा ॥
prāṇadanta samādhmātāstato romāṇi me'hṛṣan | prāpatanbhūmipālāśca ye tu hīnāḥ svatejasā
एक साथ फूँके जाने पर वे गूँज उठे और मेरे रोंगटे खड़े हो गए। जो राजा अपने तेज में दुर्बल थे, वे भूमि पर गिर पड़े।
श्लोक 19 (2.79.19)
धृष्टद्युम्नः पाण्डवाश्च सात्यकिः केशवोऽष्टमः । सत्वस्था वीर्यसम्पन्ना ह्यन्योन्यप्रियदर्शनाः ॥
dhṛṣṭadyumnaḥ pāṇḍavāśca sātyakiḥ keśavo'ṣṭamaḥ | satvasthā vīryasampannā hyanyonyapriyadarśanāḥ
धृष्टद्युम्न, पाँचों पाण्डव, सात्यकि और आठवें केशव — जो धैर्य में स्थित, पराक्रम से सम्पन्न और एक-दूसरे को प्रिय थे —
श्लोक 20 (2.79.20)
विसञ्ज्ञान्भूमिपान्दृष्ट्वा मां च ते प्राहसंस्तदा । ततः प्रहृष्टो बीभत्सुः प्रादाद्धेमविषाणिनाम् ॥
visañjñānbhūmipāndṛṣṭvā māṃ ca te prāhasaṃstadā | tataḥ prahṛṣṭo bībhatsuḥ prādāddhemaviṣāṇinām
राजाओं को और मुझे भी अचेत देखकर तब हँस पड़े। तब प्रसन्न होकर बीभत्सु (अर्जुन) ने सोने से मढ़े सींगों वाले
श्लोक 21 (2.79.21)
शतान्यनडुहां पञ्च द्विजमुख्येषु भारत । न रन्तिदेवो नाभागो यौवनाश्वो मनुर्न च ॥
śatānyanaḍuhāṃ pañca dvijamukhyeṣu bhārata | na rantidevo nābhāgo yauvanāśvo manurna ca
पाँच सौ बैल, हे भारत, श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान किए। न रन्तिदेव, न नाभाग, न यौवनाश्व और न मनु,
श्लोक 22 (2.79.22)
न च राजा पृथुर्वैन्यो न चाप्यासीद्भगीरथः । ययातिर्नहुषो वापि यथा राजा युधिष्ठिरः ॥
na ca rājā pṛthurvainyo na cāpyāsīdbhagīrathaḥ | yayātirnahuṣo vāpi yathā rājā yudhiṣṭhiraḥ
न वेनपुत्र राजा पृथु, न भगीरथ, न ययाति और न नहुष — कोई भी वैसा नहीं था जैसा राजा युधिष्ठिर है;
श्लोक 23 (2.79.23)
यथाऽतिमात्रं कौन्तेयः श्रिया परमया युतः । राजसूयमवाप्यैवं हरिश्चन्द्र इव प्रभुः ॥
yathā'timātraṃ kaunteyaḥ śriyā paramayā yutaḥ | rājasūyamavāpyaivaṃ hariścandra iva prabhuḥ
राजसूय यज्ञ पूर्ण करके कुन्तीपुत्र हरिश्चन्द्र के समान प्रभुत्वशाली और परम श्री से अत्यन्त सम्पन्न हो गया है।
श्लोक 24 (2.79.24)
एतां दृष्ट्वा श्रियं पार्थे हरिश्चन्द्रे यथा विभो । कथं तु जीवितं श्रेयो मम पश्यसि भारत ॥
etāṃ dṛṣṭvā śriyaṃ pārthe hariścandre yathā vibho | kathaṃ tu jīvitaṃ śreyo mama paśyasi bhārata
हे प्रभो, पृथापुत्र में हरिश्चन्द्र जैसी यह श्री देखकर, हे भारत, आप कैसे समझते हैं कि मेरे लिए जीना कल्याणकारी है?
श्लोक 25 (2.79.25)
अन्धेनेव युगं नद्धं विपर्यस्तं नराधिप । कनीयांसो विवर्धन्ते ज्येष्ठा हीयन्त एव च ॥
andheneva yugaṃ naddhaṃ viparyastaṃ narādhipa | kanīyāṃso vivardhante jyeṣṭhā hīyanta eva ca
हे नरेश्वर, अन्धे के बाँधे हुए जुए की तरह सब उलट-पुलट हो गया है — छोटे बढ़ रहे हैं और बड़े घटते ही जा रहे हैं।
श्लोक 26 (2.79.26)
एवं दृष्ट्वा नाभिविन्दामि शर्म । समीक्षमाणोऽपि कुरुप्रवीर । तेनाहमेवं कृशतां गतश्च । विवर्णतां चैव सशोकतां च ॥
evaṃ dṛṣṭvā nābhivindāmi śarma | samīkṣamāṇo'pi kurupravīra | tenāhamevaṃ kṛśatāṃ gataśca | vivarṇatāṃ caiva saśokatāṃ ca
हे कुरुवीर, यह देखकर बहुत सोचने पर भी मुझे शान्ति नहीं मिलती। इसी कारण मैं ऐसा दुबला, निस्तेज और शोकाकुल हो गया हूँ।