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सभा पर्व · अध्याय 82

शकुनि का द्यूत-प्रस्ताव और सभा का निर्माण

शकुनि दुर्योधन के लिए बिना जोखिम और बिना युद्ध के जुए में युधिष्ठिर की लक्ष्मी जीत लेने का प्रस्ताव रखता है, और दुर्योधन पिता से अनुमति माँगता है। धृतराष्ट्र पहले विदुर से परामर्श करना चाहते हैं, पर दुर्योधन विदुर को पाण्डवों का पक्षपाती बताकर उनकी बात टाल देता है। राजा चेताते हैं कि द्यूत से वैर बढ़ेगा, किन्तु दैव को दुर्लंघ्य मानकर वे झुक जाते हैं और सहस्र खम्भों वाली भव्य सभा बनवाने की आज्ञा देते हैं। सभा पूरी होने पर वे विदुर को युधिष्ठिर को लाने भेजते हैं; विदुर विरोध करते हैं कि द्यूत से कुल में फूट पड़ेगी, पर धृतराष्ट्र कहते हैं कि सारा जगत् विधाता की इच्छा से ही चलता है।

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शकुनिरुवाच

श्लोक 1 (2.82.1)

यां त्वमेतां श्रियं दृष्ट्वा पाण्डुपुत्रे युधिष्ठिरे । तप्यसे तां हरिष्यामि द्यूतेन जयतां वर ॥

yāṃ tvametāṃ śriyaṃ dṛṣṭvā pāṇḍuputre yudhiṣṭhire | tapyase tāṃ hariṣyāmi dyūtena jayatāṃ vara

हे विजेताओं में श्रेष्ठ, पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर में यह जो लक्ष्मी देखकर तुम संतप्त हो रहे हो, उसे मैं जुए के द्वारा हर लूँगा।

श्लोक 2 (2.82.2)

आहूयतां परं राजन्कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः । अगत्वा संशयमहमयुद्ध्वा च चमूमुखे ॥

āhūyatāṃ paraṃ rājankuntīputro yudhiṣṭhiraḥ | agatvā saṃśayamahamayuddhvā ca camūmukhe

हे राजन्, कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को बुलवाया जाए। बिना किसी संकट में पड़े और बिना सेना के मुहाने पर युद्ध किए,

श्लोक 3 (2.82.3)

अक्षान्क्षिपन्नक्षतः सन्विद्वानविदुषो जये । ग्लहान्धनूंषि मे विद्धि शरानक्षांश्च भारत ॥

akṣānkṣipannakṣataḥ sanvidvānaviduṣo jaye | glahāndhanūṃṣi me viddhi śarānakṣāṃśca bhārata

पासे फेंकते हुए और स्वयं अक्षत रहकर मैं, जानकार होकर, अनजानों को जीत लूँगा। हे भारत, दाँवों को मेरे धनुष और पासों को मेरे बाण समझो;

श्लोक 4 (2.82.4)

अक्षाणां हृदयं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्फुरम् ॥

akṣāṇāṃ hṛdayaṃ me jyāṃ rathaṃ viddhi mamāsphuram

पासों का मर्म मेरी प्रत्यंचा है, और जुए की बिसात को मेरा रथ समझो।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 5 (2.82.5)

अयमुत्सहते राजच्छ्रियमाहर्तुमक्षवित् । द्यूतेन पाण्डुपुत्रेभ्यस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥

ayamutsahate rājacchriyamāhartumakṣavit | dyūtena pāṇḍuputrebhyastadanujñātumarhasi

हे राजन्, पासों का यह जानकार जुए के द्वारा पाण्डुपुत्रों की लक्ष्मी छीन लेने को उद्यत है। आप इसे अनुमति दें।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 6 (2.82.6)

स्थितोऽस्मि शासने भ्रातुर्विदुरस्य महात्मनः । तेन सङ्गम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम् ॥

sthito'smi śāsane bhrāturvidurasya mahātmanaḥ | tena saṅgamya vetsyāmi kāryasyāsya viniścayam

मैं अपने महात्मा भाई विदुर के परामर्श पर चलता हूँ। उनसे मिलकर ही मैं इस कार्य का निश्चय जानूँगा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 7 (2.82.7)

कृष्णादभ्यधिकः सोऽपि क्षत्ता बोद्धा विशाम्पते । केवलं धर्ममेवाह न तद्विजयसाधकम् ॥

kṛṣṇādabhyadhikaḥ so'pi kṣattā boddhā viśāmpate | kevalaṃ dharmamevāha na tadvijayasādhakam

हे प्रजानाथ, वह क्षत्ता (विदुर) समझ में कृष्ण से भी बढ़कर है, पर वह केवल धर्म की ही बात करता है, और वह विजय दिलाने वाला नहीं।

श्लोक 8 (2.82.8)

जयश्च धर्मतोऽपेतस्तथैव भरतर्षभ । तस्माद्विनयतो जेता तावुभौ च विरोधिनौ ॥

jayaśca dharmato'petastathaiva bharatarṣabha | tasmādvinayato jetā tāvubhau ca virodhinau

हे भरतश्रेष्ठ, विजय भी उसी प्रकार धर्म से अलग है। इसलिए विजेता नियम से हटकर ही जीतता है; ये दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं।

श्लोक 9 (2.82.9)

व्यपनेष्यति ते बुद्धिं विदुरो मुक्तसंशयः । पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव ॥

vyapaneṣyati te buddhiṃ viduro muktasaṃśayaḥ | pāṇḍavānāṃ hite yukto na tathā mama kaurava

हे कौरव, निःसंशय विदुर आपकी बुद्धि फेर देंगे; वे पाण्डवों के हित में लगे हैं, मेरे हित में वैसे नहीं।

श्लोक 10 (2.82.10)

नारभेतान्यसामर्थ्यात्पुरुषः कार्यमात्मनः । मतिसाम्यं द्वयोर्नास्ति कार्येषु कुरुनन्दन ॥

nārabhetānyasāmarthyātpuruṣaḥ kāryamātmanaḥ | matisāmyaṃ dvayornāsti kāryeṣu kurunandana

हे कुरुनन्दन, मनुष्य को दूसरे के सामर्थ्य के भरोसे अपना कार्य आरम्भ नहीं करना चाहिए; कार्यों के विषय में दो व्यक्तियों की मति एक-सी नहीं होती।

श्लोक 11 (2.82.11)

भयं परिहरन्मत्त आत्मानं परिपालयन् । वर्षासु क्लिन्नकटवत्तिष्ठन्नेवावसीदति ॥

bhayaṃ pariharanmatta ātmānaṃ paripālayan | varṣāsu klinnakaṭavattiṣṭhannevāvasīdati

जो मूढ़ भय से बचता हुआ केवल अपनी रक्षा करता रहता है, वह वर्षा में भीगी चटाई की तरह पड़ा-पड़ा ही गल जाता है।

श्लोक 12 (2.82.12)

न व्याधयो नापि यमः प्राप्तुं श्रेयः प्रतीक्षते । यावदेव भवेत्कल्पस्तावच्छ्रेयः समाचरेत् ॥

na vyādhayo nāpi yamaḥ prāptuṃ śreyaḥ pratīkṣate | yāvadeva bhavetkalpastāvacchreyaḥ samācaret

न रोग और न यम किसी के कल्याण-प्राप्ति की प्रतीक्षा करते हैं। जब तक सामर्थ्य रहे, तब तक कल्याणकारी कार्य कर लेना चाहिए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 13 (2.82.13)

सर्वथा पुत्र बलिभिर्विग्रहो मे न रोचते । वैरं विकारं सृजति तद्वै शस्त्रमनायसम् ॥

sarvathā putra balibhirvigraho me na rocate | vairaṃ vikāraṃ sṛjati tadvai śastramanāyasam

पुत्र, बलवानों से विग्रह मुझे किसी भी प्रकार अच्छा नहीं लगता। वैर मनमुटाव उत्पन्न करता है; वह बिना लोहे का शस्त्र है।

श्लोक 14 (2.82.14)

अनर्थमर्थं मन्यसे राजपुत्र । सङ्ग्रन्थनं कलहस्यातियाति । तद्वै प्रवृत्तं तु यथाकथञ्चित् । सृजेदसीन्निशितान्सायकांश्च ॥

anarthamarthaṃ manyase rājaputra | saṅgranthanaṃ kalahasyātiyāti | tadvai pravṛttaṃ tu yathākathañcit | sṛjedasīnniśitānsāyakāṃśca

राजकुमार, तुम अनर्थ को अर्थ मान रहे हो। कलह की गाँठ बँधते ही सब सीमाएँ लाँघ जाती है; एक बार शुरू हो जाए, तो किसी-न-किसी तरह वह तलवारें और तीखे बाण निकलवा ही देती है।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 15 (2.82.15)

द्यूते पुराणैर्व्यवहारः प्रणीत- । स्तत्रात्ययो नास्ति न सम्प्रहारः । तद्रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य । सभां क्षिप्रं त्वमिहाज्ञापयस्व ॥

dyūte purāṇairvyavahāraḥ praṇīta- | statrātyayo nāsti na samprahāraḥ | tadrocatāṃ śakunervākyamadya | sabhāṃ kṣipraṃ tvamihājñāpayasva

पूर्वजों ने ही द्यूत की रीति चलाई है; उसमें न कोई विनाश है और न मारकाट। आज शकुनि की बात आपको रुचे; आप शीघ्र यहाँ सभा बनाने की आज्ञा दें।

श्लोक 16 (2.82.16)

स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्टं । तद्वर्तिनां चापि तथैव युक्तम् । भवेदेवं ह्यात्मना तुल्यमेव । दुरोदरं पाण्डवैस्त्वं कुरुष्व ॥

svargadvāraṃ dīvyatāṃ no viśiṣṭaṃ | tadvartināṃ cāpi tathaiva yuktam | bhavedevaṃ hyātmanā tulyameva | durodaraṃ pāṇḍavaistvaṃ kuruṣva

हम खेलने वालों के लिए यह स्वर्ग का विशेष द्वार है, और इसमें भाग लेने वालों के लिए भी यह उचित ही है। इस प्रकार यह बराबरी वालों का खेल होगा; आप पाण्डवों के साथ द्यूत का आयोजन कीजिए।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 17 (2.82.17)

वाक्यं न मे रोचते यत्त्वयोक्तं । यत्ते प्रियं तत्क्रियतां नरेन्द्र । पश्चात्तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक्यं । न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम् ॥

vākyaṃ na me rocate yattvayoktaṃ | yatte priyaṃ tatkriyatāṃ narendra | paścāttapsyase tadupākramya vākyaṃ | na hīdṛśaṃ bhāvi vaco hi dharmyam

तुमने जो कहा, वह मुझे अच्छा नहीं लगता। फिर भी, हे नरेन्द्र, जो तुम्हें प्रिय हो वही किया जाए। इस बात पर चलकर तुम बाद में पछताओगे, क्योंकि ऐसी बात धर्मसम्मत सिद्ध नहीं होगी।

श्लोक 18 (2.82.18)

दृष्टं ह्येतद्विदुरेणैव सर्वं । विपश्चिता बुद्धिविद्यानुगेन । तदेवैतदवशस्याभ्युपैति । महद्भयं क्षत्रियजीवघाति ॥

dṛṣṭaṃ hyetadvidureṇaiva sarvaṃ | vipaścitā buddhividyānugena | tadevaitadavaśasyābhyupaiti | mahadbhayaṃ kṣatriyajīvaghāti

बुद्धि और विद्या के अनुगामी विद्वान विदुर ने यह सब पहले ही देख लिया था। और अब वही महान भय, जो क्षत्रियों के प्राण हरने वाला है, मुझ विवश पर आ पड़ा है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 19 (2.82.19)

एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी । दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च । शशासोच्चैः पुरुषान्पुत्रवाक्ये । स्थितो राजा दैवसंमूढचेताः ॥

evamuktvā dhṛtarāṣṭro manīṣī | daivaṃ matvā paramaṃ dustaraṃ ca | śaśāsoccaiḥ puruṣānputravākye | sthito rājā daivasaṃmūḍhacetāḥ

ऐसा कहकर मनीषी राजा धृतराष्ट्र ने दैव को सर्वोपरि और दुर्लंघ्य मानकर, पुत्र की बात पर टिके रहकर, दैव से मोहित चित्त के साथ ऊँचे स्वर में सेवकों को आज्ञा दी —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 20 (2.82.20)

सहस्रस्तम्भां हेमवैदूर्यचित्रां । शतद्वारां तोरणस्फाटिकाढ्याम् । सभामग्र्यां क्रोशमात्रायतां मे । तद्विस्तारामाशु कुर्वन्तु युक्ताः ॥

sahasrastambhāṃ hemavaidūryacitrāṃ | śatadvārāṃ toraṇasphāṭikāḍhyām | sabhāmagryāṃ krośamātrāyatāṃ me | tadvistārāmāśu kurvantu yuktāḥ

कुशल कारीगर शीघ्र ही मेरे लिए एक कोस लम्बी और उतनी ही चौड़ी उत्तम सभा बनाएँ, जिसमें सहस्र खम्भे हों, जो सोने और वैदूर्य से चित्रित हो, जिसके सौ द्वार हों और जो स्फटिक के तोरणों से सम्पन्न हो।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (2.82.21)

श्रुत्वा तस्य त्वरिता निर्विशङ्काः । प्राज्ञा दक्षास्तां तदा चक्रुराशु । सर्वद्रव्याण्युपजह्रुः सभायां । सहस्रशः शिल्पिनश्चैव युक्ताः ॥

śrutvā tasya tvaritā nirviśaṅkāḥ | prājñā dakṣāstāṃ tadā cakrurāśu | sarvadravyāṇyupajahruḥ sabhāyāṃ | sahasraśaḥ śilpinaścaiva yuktāḥ

उनकी आज्ञा सुनकर बुद्धिमान और कुशल लोगों ने बिना हिचक तुरन्त उसे बना डाला; हज़ारों शिल्पी जुट गए और सभा में सब प्रकार की सामग्री ले आए।

श्लोक 22 (2.82.22)

कालेनाल्पेनाथ निष्ठां गतां तां । सभां रम्यां बहुरत्नां विचित्राम् । चित्रैर्हैमैरासनैरभ्युपेता- । माचख्युस्ते तस्य राज्ञः प्रतीताः ॥

kālenālpenātha niṣṭhāṃ gatāṃ tāṃ | sabhāṃ ramyāṃ bahuratnāṃ vicitrām | citrairhaimairāsanairabhyupetā- | mācakhyuste tasya rājñaḥ pratītāḥ

थोड़े ही समय में वह रमणीय, अनेक रत्नों से भरी, विचित्र सभा सुनहरे चित्रित आसनों से युक्त होकर पूरी हो गई, और विश्वस्त सेवकों ने राजा को इसकी सूचना दी।

श्लोक 23 (2.82.23)

ततो विद्वान्विदुरं मन्त्रिमुख्य- । मुवाचेदं धृतराष्ट्रो नरेन्द्रः । युधिष्ठिरं राजपुत्रं च गत्वा । मद्वाक्येन क्षिप्रमिहानयस्व ॥

tato vidvānviduraṃ mantrimukhya- | muvācedaṃ dhṛtarāṣṭro narendraḥ | yudhiṣṭhiraṃ rājaputraṃ ca gatvā | madvākyena kṣipramihānayasva

तब विद्वान राजा धृतराष्ट्र ने मन्त्रियों में प्रमुख विदुर से यह कहा — "राजपुत्र युधिष्ठिर के पास जाकर मेरी आज्ञा से उसे शीघ्र यहाँ ले आओ।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 24 (2.82.24)

सभेयं मे बहुरत्ना विचित्रा । शय्यासनैरुपपन्ना महार्हैः । सा दृश्यतां भ्रातृभिः सार्धमेत्य । सुहृद्द्यूतं वर्ततामत्र चेति ॥

sabheyaṃ me bahuratnā vicitrā | śayyāsanairupapannā mahārhaiḥ | sā dṛśyatāṃ bhrātṛbhiḥ sārdhametya | suhṛddyūtaṃ vartatāmatra ceti

मेरी यह सभा अनेक रत्नों से भरी और विचित्र है, बहुमूल्य शय्याओं और आसनों से सुसज्जित है। वह अपने भाइयों के साथ आकर इसे देखे, और यहाँ मित्रों के बीच द्यूत हो।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (2.82.25)

मतमाज्ञाय पुत्रस्य धृतराष्ट्रो नराधिपः । मत्वा च दुस्तरं दैवमेतद्राजंश्चकार ह ॥

matamājñāya putrasya dhṛtarāṣṭro narādhipaḥ | matvā ca dustaraṃ daivametadrājaṃścakāra ha

हे राजन्, पुत्र का मत जानकर और दैव को दुर्लंघ्य मानकर नरेश धृतराष्ट्र ने ऐसा किया।

श्लोक 26 (2.82.26)

अन्यायेन तथोक्तस्तु विदुरो विदुषां वरः । नाभ्यनन्दद्वचो भ्रातुर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥

anyāyena tathoktastu viduro viduṣāṃ varaḥ | nābhyanandadvaco bhrāturvacanaṃ cedamabravīt

इस प्रकार अनुचित आज्ञा पाकर विद्वानों में श्रेष्ठ विदुर ने भाई की बात का स्वागत नहीं किया और यह कहा —

विदुर उवाच

श्लोक 27 (2.82.27)

नाभिनन्दे नृपते प्रैषमेतं । मैवं कृथाः कुलनाशाद्बिभेमि । पुत्रैर्भिन्नः कलहस्ते ध्रुवं स्या- । देतच्छङ्के द्यूतकृते नरेन्द्र ॥

nābhinande nṛpate praiṣametaṃ | maivaṃ kṛthāḥ kulanāśādbibhemi | putrairbhinnaḥ kalahaste dhruvaṃ syā- | detacchaṅke dyūtakṛte narendra

हे राजन्, मैं इस आदेश का स्वागत नहीं करता। ऐसा मत कीजिए; मुझे कुल के नाश का भय है। पुत्रों में फूट पड़ने से आप पर निश्चय ही कलह आएगा। हे नरेन्द्र, द्यूत के कारण मुझे यही आशंका है।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 28 (2.82.28)

नेह क्षत्तः कलहस्तप्स्यते मां । न चेद्दैवं प्रतिलोमं भविष्यत् । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं । सर्वं जगच्चेष्टति न स्वतन्त्रम् ॥

neha kṣattaḥ kalahastapsyate māṃ | na ceddaivaṃ pratilomaṃ bhaviṣyat | dhātrā tu diṣṭasya vaśe kiledaṃ | sarvaṃ jagacceṣṭati na svatantram

हे क्षत्ता, यदि दैव प्रतिकूल न हुआ तो यहाँ कलह मुझे सन्तप्त नहीं करेगा। यह सारा जगत् विधाता के विधान के वश में ही चेष्टा करता है, स्वतन्त्र होकर नहीं।

श्लोक 29 (2.82.29)

तदद्य विदुर प्राप्य राजानं मम शासनात् । क्षिप्रमानय दुर्धर्षं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

tadadya vidura prāpya rājānaṃ mama śāsanāt | kṣipramānaya durdharṣaṃ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

इसलिए हे विदुर, आज मेरी आज्ञा से राजा के पास जाकर दुर्धर्ष कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को शीघ्र ले आओ।

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83