सभा पर्व · अध्याय 83
द्यूत के आमन्त्रण पर युधिष्ठिर का आगमन
धृतराष्ट्र के द्वारा बलपूर्वक भेजे गए विदुर इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर हस्तिनापुर की नई सभा में मित्रतापूर्ण द्यूत का निमन्त्रण देते हैं। युधिष्ठिर द्यूत में कलह देखते हैं और पूछते हैं कि जुआरी कौन-कौन हैं; पर ललकार से पीछे न हटने के अपने व्रत से बँधे और इसमें दैव का विधान देखते हुए वे भाइयों, द्रौपदी और विशाल सेना के साथ राजसी ठाठ से चल पड़ते हैं। हस्तिनापुर में वे धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण, गान्धारी और कौरवों से मिलते हैं; द्रौपदी का वैभव देखकर धृतराष्ट्र की पुत्रवधुएँ खिन्न होती हैं, और रात भर विश्राम के बाद पाण्डव द्यूतसभा में प्रवेश करते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.83.1)
ततः प्रायाद्विदुरोऽश्वैरुदारै- । र्महाजवैर्बलिभिः साधु दान्तैः । बलान्नियुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा । मनीषिणां पाण्डवानां सकाशे ॥
tataḥ prāyādviduro'śvairudārai- | rmahājavairbalibhiḥ sādhu dāntaiḥ | balānniyukto dhṛtarāṣṭreṇa rājñā | manīṣiṇāṃ pāṇḍavānāṃ sakāśe
तब राजा धृतराष्ट्र के द्वारा बलपूर्वक नियुक्त विदुर उत्तम, अत्यन्त वेगवान, बलवान और भली-भाँति सधे हुए घोड़ों के साथ बुद्धिमान पाण्डवों के पास चल पड़े।
श्लोक 2 (2.83.2)
सोऽभिपत्य तदध्वानमासाद्य नृपतेः पुरम् । प्रविवेश महाबुद्धिः पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥
so'bhipatya tadadhvānamāsādya nṛpateḥ puram | praviveśa mahābuddhiḥ pūjyamāno dvijātibhiḥ
वह मार्ग तय करके महाबुद्धिमान विदुर राजा के नगर में पहुँचे और द्विजों से सम्मानित होते हुए उसमें प्रविष्ट हुए।
श्लोक 3 (2.83.3)
स राजगृहमासाद्य कुबेरभवनोपमम् । अभ्यागच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥
sa rājagṛhamāsādya kuberabhavanopamam | abhyāgacchata dharmātmā dharmaputraṃ yudhiṣṭhiram
कुबेर के भवन के समान राजमहल में पहुँचकर धर्मात्मा विदुर धर्मपुत्र युधिष्ठिर के पास गए।
श्लोक 4 (2.83.4)
तं वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा । अजातशत्रुर्विदुरं यथावत् । पूजापूर्वं प्रतिगृह्याजमीढ- । स्ततोऽपृच्छद्धृतराष्ट्रं सपुत्रम् ॥
taṃ vai rājā satyadhṛtirmahātmā | ajātaśatrurviduraṃ yathāvat | pūjāpūrvaṃ pratigṛhyājamīḍha- | stato'pṛcchaddhṛtarāṣṭraṃ saputram
सत्य में दृढ़ रहने वाले महात्मा राजा अजातशत्रु अजमीढ़वंशी युधिष्ठिर ने विदुर का यथोचित पूजन करके स्वागत किया और फिर पुत्रों सहित धृतराष्ट्र का कुशल पूछा।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (2.83.5)
विज्ञायते ते मनसोऽप्रहर्षः । कच्चित्क्षत्तः कुशलेनागतोऽसि । कच्चित्पुत्राः स्थविरस्यानुलोमा । वशानुगाश्चापि विशोऽथ कच्चित् ॥
vijñāyate te manaso'praharṣaḥ | kaccitkṣattaḥ kuśalenāgato'si | kaccitputrāḥ sthavirasyānulomā | vaśānugāścāpi viśo'tha kaccit
"आपका मन प्रसन्न नहीं जान पड़ता। हे क्षत्ता, आप कुशल से तो आए हैं? क्या वृद्ध राजा के पुत्र उनके अनुकूल चलते हैं? और क्या प्रजा भी उनके वश में है?"
विदुर उवाच
श्लोक 6 (2.83.6)
राजा महात्मा कुशली सपुत्र । आस्ते वृतो ज्ञातिभिरिन्द्रकल्पः । प्रीतो राजन्पुत्रगुणैर्विनीतो । विशोक एवात्मरतिर्महात्मा ॥
rājā mahātmā kuśalī saputra | āste vṛto jñātibhirindrakalpaḥ | prīto rājanputraguṇairvinīto | viśoka evātmaratirmahātmā
"महात्मा राजा पुत्रों सहित सकुशल हैं। वे इन्द्र के समान अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे रहते हैं। हे राजन्, वे अपने पुत्रों के गुणों से प्रसन्न, विनीत, शोकरहित और आत्मसन्तुष्ट हैं।
श्लोक 7 (2.83.7)
इदं तु त्वां कुरुराजोऽभ्युवाच । पूर्वं पृष्ट्वा कुशलं चाव्ययं च । इयं सभा त्वत्सभातुल्यरूपा । भ्रातॄणां ते दृश्यतामेत्य पुत्र ॥
idaṃ tu tvāṃ kururājo'bhyuvāca | pūrvaṃ pṛṣṭvā kuśalaṃ cāvyayaṃ ca | iyaṃ sabhā tvatsabhātulyarūpā | bhrātṝṇāṃ te dṛśyatāmetya putra
"परन्तु कुरुराज ने पहले आपका कुशल-क्षेम और धन की सुरक्षा पूछकर आपसे यह कहलाया है— 'पुत्र, तुम्हारे भाइयों की यह सभा रूप में तुम्हारी सभा के ही समान है; आकर इसे देखो।
श्लोक 8 (2.83.8)
समागम्य भ्रातृभिः पार्थ तस्यां । सुहृद्द्यूतं क्रियतां रम्यतां च । प्रीयामहे भवतां सङ्गमेन । समागताः कुरवश्चापि सर्वे ॥
samāgamya bhrātṛbhiḥ pārtha tasyāṃ | suhṛddyūtaṃ kriyatāṃ ramyatāṃ ca | prīyāmahe bhavatāṃ saṅgamena | samāgatāḥ kuravaścāpi sarve
"'हे पार्थ, वहाँ भाइयों से मिलो; मित्रतापूर्ण द्यूत हो और आमोद-प्रमोद हो। तुम लोगों के समागम से हम प्रसन्न होंगे, और यहाँ एकत्र सब कौरव भी।'
श्लोक 9 (2.83.9)
दुरोदरा विहिता ये तु तत्र । महात्मना धृतराष्ट्रेण राज्ञा । तान्द्रक्ष्यसे कितवान्सन्निविष्टा- । नित्यागतोऽहं नृपते तज्जुषस्व ॥
durodarā vihitā ye tu tatra | mahātmanā dhṛtarāṣṭreṇa rājñā | tāndrakṣyase kitavānsanniviṣṭā- | nityāgato'haṃ nṛpate tajjuṣasva
"महात्मा राजा धृतराष्ट्र ने वहाँ जिन जुआरियों को नियुक्त किया है, उन्हें आप वहाँ बैठे देखेंगे। इसीलिए मैं आया हूँ, हे राजन्; इसे स्वीकार कीजिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (2.83.10)
द्यूते क्षत्तः कलहो विद्यते नः । को वै द्यूतं रोचयेद्बुध्यमानः । किं वा भवान्मन्यते युक्तरूपं । भवद्वाक्ये सर्व एव स्थिताः स्मः ॥
dyūte kṣattaḥ kalaho vidyate naḥ | ko vai dyūtaṃ rocayedbudhyamānaḥ | kiṃ vā bhavānmanyate yuktarūpaṃ | bhavadvākye sarva eva sthitāḥ smaḥ
"हे क्षत्ता, द्यूत में कलह होता है। कौन समझदार व्यक्ति द्यूत को पसन्द करेगा? अथवा आप क्या उचित समझते हैं? हम सब आपकी बात पर ही चलते हैं।"
विदुर उवाच
श्लोक 11 (2.83.11)
जानाम्यहं द्यूतमनर्थमूलं । कृतश्च यत्नोऽस्य मया निवारणे । राजा च मां प्राहिणोत्त्वत्सकाशं । श्रुत्वा विद्वञ्श्रेय इहाचरस्व ॥
jānāmyahaṃ dyūtamanarthamūlaṃ | kṛtaśca yatno'sya mayā nivāraṇe | rājā ca māṃ prāhiṇottvatsakāśaṃ | śrutvā vidvañśreya ihācarasva
"मैं जानता हूँ कि द्यूत अनर्थ की जड़ है, और मैंने इसे रोकने का प्रयत्न भी किया। फिर भी राजा ने मुझे आपके पास भेजा है। हे विद्वन्, यह सुनकर यहाँ जो कल्याणकारी हो वही कीजिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 12 (2.83.12)
के तत्रान्ये कितवा दीव्यमाना । विना राज्ञो धृतराष्ट्रस्य पुत्रैः । पृच्छामि त्वां विदुर ब्रूहि नस्तान् । यैर्दीव्यामः शतशः सन्निपत्य ॥
ke tatrānye kitavā dīvyamānā | vinā rājño dhṛtarāṣṭrasya putraiḥ | pṛcchāmi tvāṃ vidura brūhi nastān | yairdīvyāmaḥ śataśaḥ sannipatya
"राजा धृतराष्ट्र के पुत्रों के अतिरिक्त वहाँ और कौन-कौन जुआरी खेल रहे हैं? हे विदुर, मैं आपसे पूछता हूँ, हमें उनके नाम बताइए, जिनके साथ मिलकर हम सैकड़ों की बाज़ी लगाकर खेलेंगे।"
विदुर उवाच
श्लोक 13 (2.83.13)
गन्धारराजः शकुनिर्विशाम्पते । राजाऽतिदेवी कृतहस्तो मताक्षः । विविंशतिश्चित्रसेनश्च राजा । सत्यव्रतः पुरुमित्रो जयश्च ॥
gandhārarājaḥ śakunirviśāmpate | rājā'tidevī kṛtahasto matākṣaḥ | viviṃśatiścitrasenaśca rājā | satyavrataḥ purumitro jayaśca
"हे प्रजानाथ, गान्धारराज शकुनि, जो सबसे बढ़कर खेलने वाला राजा है, हाथ का सधा हुआ और पासों का पारखी; तथा विविंशति, राजा चित्रसेन, सत्यव्रत, पुरुमित्र और जय।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 14 (2.83.14)
महाभयाः कितवाः सन्निविष्टा । मायोपधा देवितारोऽत्र सन्ति । धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं । सर्वं जगत्तिष्ठति न स्वतन्त्रम् ॥
mahābhayāḥ kitavāḥ sanniviṣṭā | māyopadhā devitāro'tra santi | dhātrā tu diṣṭasya vaśe kiledaṃ | sarvaṃ jagattiṣṭhati na svatantram
"वहाँ बड़े भयंकर जुआरी जमा हैं, जो छल-कपट का सहारा लेकर खेलते हैं। परन्तु कहते हैं कि यह सारा जगत् विधाता के विधान के वश में स्थित है, स्वतन्त्र नहीं है।
श्लोक 15 (2.83.15)
नाहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य शासना- । न्न गन्तुमिच्छामि कवे दुरोदरम् । इष्टो हि पुत्रस्य पिता सदैव । तदस्मि कर्ता विदुरात्थ मां यथा ॥
nāhaṃ rājño dhṛtarāṣṭrasya śāsanā- | nna gantumicchāmi kave durodaram | iṣṭo hi putrasya pitā sadaiva | tadasmi kartā vidurāttha māṃ yathā
"हे विद्वन्, राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा है, इसलिए मैं द्यूत में जाने से इनकार नहीं करना चाहता; क्योंकि पुत्र को पिता सदा प्रिय होता है। इसलिए हे विदुर, आपने मुझसे जैसा कहा है, मैं वैसा ही करूँगा।
श्लोक 16 (2.83.16)
न चाकामः शकुनिना देविताहं । न चेन्मां जिष्णुराह्वयिता सभायाम् । आहूतोऽहं न निवर्ते कदाचित् । तदाहितं शाश्वतं वै व्रतं मे ॥
na cākāmaḥ śakuninā devitāhaṃ | na cenmāṃ jiṣṇurāhvayitā sabhāyām | āhūto'haṃ na nivarte kadācit | tadāhitaṃ śāśvataṃ vai vrataṃ me
"यदि वह विजेता मुझे सभा में ललकारे नहीं, तो मैं अपनी इच्छा से शकुनि के साथ नहीं खेलूँगा। पर ललकारे जाने पर मैं कभी पीछे नहीं हटता; यह मेरा सदा का धारण किया हुआ व्रत है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 17 (2.83.17)
एवमुक्त्वा विदुरं धर्मराजः । प्रायात्रिकं सर्वमाज्ञाप्य तूर्णम् । प्रायाच्छ्वोभूते सगणः सानुयात्रः । सह स्त्रीभिर्द्रौपदीमादि कृत्वा ॥
evamuktvā viduraṃ dharmarājaḥ | prāyātrikaṃ sarvamājñāpya tūrṇam | prāyācchvobhūte sagaṇaḥ sānuyātraḥ | saha strībhirdraupadīmādi kṛtvā
विदुर से ऐसा कहकर धर्मराज ने शीघ्र ही यात्रा की सारी तैयारी की आज्ञा दी और अगले दिन प्रातः अपने परिजनों और अनुचरों के साथ, द्रौपदी आदि स्त्रियों को साथ लेकर चल पड़े।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (2.83.18)
दैवं हि प्रज्ञां मुष्णाति चक्षुस्तेज इवापतत् । धातुश्च वशमन्वेति पाशैरिव नरः सितः ॥
daivaṃ hi prajñāṃ muṣṇāti cakṣusteja ivāpatat | dhātuśca vaśamanveti pāśairiva naraḥ sitaḥ
"दैव मनुष्य की बुद्धि को वैसे ही हर लेता है जैसे आँख पर पड़ता तीव्र प्रकाश दृष्टि को; और मनुष्य मानो फंदों में बँधा हुआ विधाता के वश में चलता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (2.83.19)
इत्युक्त्वा प्रययौ राजा सह क्षत्त्रा युधिष्ठिरः । अमृष्यमाणस्तस्याथ समाह्वानमरिन्दमः ॥
ityuktvā prayayau rājā saha kṣattrā yudhiṣṭhiraḥ | amṛṣyamāṇastasyātha samāhvānamarindamaḥ
ऐसा कहकर शत्रुदमन राजा युधिष्ठिर उस ललकार को सहन न कर पाने के कारण क्षत्ता विदुर के साथ चल पड़े।
श्लोक 20 (2.83.20)
बाह्लिकेन रथं यत्तमास्थाय परवीरहा । परिच्छन्नो ययौ पार्थो भ्रातृभिः सह पाण्डवः । राजश्रिया दीप्यमानो ययौ ब्रह्मपुरःसरः ॥
bāhlikena rathaṃ yattamāsthāya paravīrahā | paricchanno yayau pārtho bhrātṛbhiḥ saha pāṇḍavaḥ | rājaśriyā dīpyamāno yayau brahmapuraḥsaraḥ
बाह्लीक द्वारा सजाए गए रथ पर बैठकर शत्रुवीरों के संहारक पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर अपने परिजनों से घिरे भाइयों के साथ चले। राजलक्ष्मी से देदीप्यमान वे ब्राह्मणों को आगे करके चल रहे थे।
श्लोक 21 (2.83.21)
सन्दिदेश ततः प्रेष्यानागतान्नगरं प्रति । ततस्ते नृपशार्दूल चक्रुर्वै नृपशासनम् ॥
sandideśa tataḥ preṣyānāgatānnagaraṃ prati | tataste nṛpaśārdūla cakrurvai nṛpaśāsanam
तब उन्होंने आए हुए सेवकों को नगर की यात्रा के सम्बन्ध में आदेश दिया; और हे नृपश्रेष्ठ, उन्होंने राजा की आज्ञा का पालन किया।
श्लोक 22 (2.83.22)
ततो राजा महातेजाः संयम्य सपरिच्छदम् । ब्राह्मणैः स्वस्ति वाच्याथ प्रययौ मन्दिराद्बहिः ॥
tato rājā mahātejāḥ saṃyamya saparicchadam | brāhmaṇaiḥ svasti vācyātha prayayau mandirādbahiḥ
फिर महातेजस्वी राजा ने अपने परिजनों को व्यवस्थित किया और ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराकर अपने भवन से बाहर निकले।
श्लोक 23 (2.83.23)
ब्राह्मणेभ्यो धनं दत्त्वा गत्यर्थं स यथाविधि । अन्येभ्यः स तु दत्त्वा च गन्तुमेवोपचक्रमे ॥
brāhmaṇebhyo dhanaṃ dattvā gatyarthaṃ sa yathāvidhi | anyebhyaḥ sa tu dattvā ca gantumevopacakrame
यात्रा के निमित्त विधिपूर्वक ब्राह्मणों को धन देकर, और दूसरों को भी दान देकर, वे चलने को उद्यत हुए।
श्लोक 24 (2.83.24)
सर्वलक्षणसम्पन्नं राजहंसपरिच्छदम् । तमारुह्य महाराजो गजेन्द्रं षष्टिहायनम् ॥
sarvalakṣaṇasampannaṃ rājahaṃsaparicchadam | tamāruhya mahārājo gajendraṃ ṣaṣṭihāyanam
सब शुभ लक्षणों से युक्त, राजहंस के समान श्वेत साज-सज्जा से सुशोभित, साठ वर्ष के गजराज पर महाराज आरूढ़ हुए।
श्लोक 25 (2.83.25)
हारी किरीटी हेमाभः सर्वाभरणभूषितः । रराज राजन्पार्थो वै परया नृपशोभया ॥
hārī kirīṭī hemābhaḥ sarvābharaṇabhūṣitaḥ | rarāja rājanpārtho vai parayā nṛpaśobhayā
हार और किरीट धारण किए, स्वर्ण-सी कान्तिवाले, सब आभूषणों से विभूषित पार्थ हे राजन्, परम राजशोभा से सुशोभित हुए,
श्लोक 26 (2.83.26)
रुक्मवेदिगतः प्राज्यो ज्वलन्निव हुताशनः । ततो जगाम राजा स प्रहृष्टनरवाहनः ॥
rukmavedigataḥ prājyo jvalanniva hutāśanaḥ | tato jagāma rājā sa prahṛṣṭanaravāhanaḥ
मानो स्वर्ण-वेदी पर प्रचुर प्रज्वलित अग्नि हो। तब राजा चल पड़े; उनके लोग और वाहन हर्ष से भरे थे।
श्लोक 27 (2.83.27)
रथघोषेण महता पूरयन्वै नभःस्थलम् । संस्तूयमानः स्तुतिभिः सूतमागधबन्दिभिः ॥
rathaghoṣeṇa mahatā pūrayanvai nabhaḥsthalam | saṃstūyamānaḥ stutibhiḥ sūtamāgadhabandibhiḥ
रथों के प्रचण्ड घोष से आकाश को भरते हुए, और सूत, मागध तथा बन्दीजनों की स्तुतियों से प्रशंसित होते हुए।
श्लोक 28 (2.83.28)
महासैन्येन सहितो यथादित्यः स्वरश्मिभिः । पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥
mahāsainyena sahito yathādityaḥ svaraśmibhiḥ | pāṇḍureṇātapatreṇa dhriyamāṇena mūrdhani
विशाल सेना के साथ वे अपनी किरणों से युक्त सूर्य के समान थे, और उनके सिर पर श्वेत छत्र धारण किया हुआ था।
श्लोक 29 (2.83.29)
बभौ युधिष्ठिरो राजा पौर्णमास्यामिवोडुराट् । चामरैर्हेमदण्डैश्च धूयमानः समन्ततः ॥
babhau yudhiṣṭhiro rājā paurṇamāsyāmivoḍurāṭ | cāmarairhemadaṇḍaiśca dhūyamānaḥ samantataḥ
पूर्णिमा की रात्रि के चन्द्रमा के समान राजा युधिष्ठिर शोभा पा रहे थे, और चारों ओर से स्वर्ण-दण्ड वाले चँवर उन पर डुलाए जा रहे थे।
श्लोक 30 (2.83.30)
जयाशिषः प्रहृष्टानां नराणां पथि पाण्डवः । प्रत्यगृह्णाद्यथान्यायं यथावद्भरतर्षभः ॥
jayāśiṣaḥ prahṛṣṭānāṃ narāṇāṃ pathi pāṇḍavaḥ | pratyagṛhṇādyathānyāyaṃ yathāvadbharatarṣabhaḥ
मार्ग में भरतश्रेष्ठ पाण्डुपुत्र ने हर्षित लोगों के विजय-आशीर्वादों को यथायोग्य स्वीकार किया।
श्लोक 31 (2.83.31)
तथैव सैनिका राजन्राजानमनुयान्ति ये । तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्धः प्रतिष्ठितः ॥
tathaiva sainikā rājanrājānamanuyānti ye | teṣāṃ halahalāśabdo divaṃ stabdhaḥ pratiṣṭhitaḥ
इसी प्रकार हे राजन्, जो सैनिक राजा के पीछे चल रहे थे, उनका कोलाहल आकाश तक पहुँचकर वहीं ठहर गया।
श्लोक 32 (2.83.32)
नृपस्याग्रे ययौ राजन्भीमसेनो रथी बली । उभौ पार्श्वगतौ राज्ञः सतल्पौ वै सुकल्पितौ ॥
nṛpasyāgre yayau rājanbhīmaseno rathī balī | ubhau pārśvagatau rājñaḥ satalpau vai sukalpitau
हे राजन्, राजा के आगे बलवान रथी भीमसेन चल रहे थे। राजा के दोनों ओर आसनों से युक्त, भली-भाँति सजे हुए दो वाहन थे,
श्लोक 33 (2.83.33)
अधिरूढौ यमौ चापि जग्मतुर्भरतर्षभ । शोभयन्तौ महासैन्यं तावुभौ रूपशालिनौ ॥
adhirūḍhau yamau cāpi jagmaturbharatarṣabha | śobhayantau mahāsainyaṃ tāvubhau rūpaśālinau
और हे भरतश्रेष्ठ, उन पर आरूढ़ होकर दोनों रूपवान यमज भाई भी विशाल सेना की शोभा बढ़ाते हुए चल रहे थे।
श्लोक 34 (2.83.34)
पृष्ठतोऽनुययौ जिष्णुर्वीरः शस्त्रभृतां वरः । श्वेताश्वो गाण्डिवं गृह्य अग्निदत्तं रथं गतः ॥
pṛṣṭhato'nuyayau jiṣṇurvīraḥ śastrabhṛtāṃ varaḥ | śvetāśvo gāṇḍivaṃ gṛhya agnidattaṃ rathaṃ gataḥ
पीछे-पीछे शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ वीर जिष्णु (अर्जुन) चल रहे थे — श्वेत घोड़ों वाले, गाण्डीव धारण किए, अग्नि के दिए हुए रथ पर आरूढ़।
श्लोक 35 (2.83.35)
सैन्यमध्ये ययौ राजन्कुरुराजो युधिष्ठिरः । द्रौपदीप्रमुखा नार्यः सानुगाः सपरिच्छदाः ॥
sainyamadhye yayau rājankururājo yudhiṣṭhiraḥ | draupadīpramukhā nāryaḥ sānugāḥ saparicchadāḥ
हे राजन्, सेना के मध्य में कुरुराज युधिष्ठिर चल रहे थे। द्रौपदी आदि स्त्रियाँ अपने अनुचरों और परिजनों के साथ,
श्लोक 36 (2.83.36)
आरुह्य ता विचित्राङ्ग्यो यानानि विविधानि च । महत्या सेनया राजन्नग्रे राज्ञो ययुस्तदा ॥
āruhya tā vicitrāṅgyo yānāni vividhāni ca | mahatyā senayā rājannagre rājño yayustadā
वे सुन्दर अंगों वाली नारियाँ अनेक प्रकार के वाहनों पर आरूढ़ होकर, हे राजन्, विशाल सेना के साथ राजा के आगे-आगे चलीं।
श्लोक 37 (2.83.37)
समृद्धनरनागाश्वं सपताकरथध्वजम् । संनद्धवरनिस्त्रिंशं पथि निर्घोषनिःस्वनम् ॥
samṛddhanaranāgāśvaṃ sapatākarathadhvajam | saṃnaddhavaranistriṃśaṃ pathi nirghoṣaniḥsvanam
मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों से समृद्ध, पताकाओं वाले रथों और ध्वजों से युक्त, उत्तम तलवारों से सन्नद्ध और मार्ग में घोष से गूँजती हुई,
श्लोक 38 (2.83.38)
शङ्खदुन्दुभितालानां वेणुवीणानुनादितम् । शुशुभे पाण्डवं सैन्यं प्रयास्यत्तत्तदा नृप ॥
śaṅkhadundubhitālānāṃ veṇuvīṇānunāditam | śuśubhe pāṇḍavaṃ sainyaṃ prayāsyattattadā nṛpa
और शंख, दुन्दुभि, करताल, बाँसुरी और वीणा के नाद से गूँजती पाण्डवों की वह सेना, हे राजन्, प्रस्थान करते समय बड़ी शोभायमान हुई।
श्लोक 39 (2.83.39)
यथा कुबेरो लङ्कायां पुरा चात्यन्तशोभया । महत्या सेनया सार्धं गुरुमिन्द्रं स गच्छति ॥
yathā kubero laṅkāyāṃ purā cātyantaśobhayā | mahatyā senayā sārdhaṃ gurumindraṃ sa gacchati
जैसे प्राचीन काल में लंका में कुबेर अत्यन्त शोभा के साथ विशाल सेना लेकर अपने गुरुजन इन्द्र के पास जाते थे,
श्लोक 40 (2.83.40)
तथा ययौ स पार्थोऽपि असङ्ख्येयविभूतिना । सुसमृद्धेन सैन्येन यथा वैश्रवणस्तथा ॥
tathā yayau sa pārtho'pi asaṅkhyeyavibhūtinā | susamṛddhena sainyena yathā vaiśravaṇastathā
वैसे ही पार्थ भी असंख्य वैभव और अत्यन्त समृद्ध सेना के साथ वैश्रवण (कुबेर) के समान चले।
श्लोक 41 (2.83.41)
स सरांसि नदीश्चैव वनान्युपवनानि च । अत्यक्रामन्महाराज पुरीं चाभ्यवपद्यत ॥
sa sarāṃsi nadīścaiva vanānyupavanāni ca | atyakrāmanmahārāja purīṃ cābhyavapadyata
हे महाराज, वे सरोवरों, नदियों, वनों और उपवनों को पार करते हुए नगर के समीप जा पहुँचे।
श्लोक 42 (2.83.42)
स हास्तिनसमीपे तु कुरुराजो युधिष्ठिरः । चक्रे निवेशनं तत्र ततः स सहसैनिकः ॥
sa hāstinasamīpe tu kururājo yudhiṣṭhiraḥ | cakre niveśanaṃ tatra tataḥ sa sahasainikaḥ
हस्तिनापुर के समीप कुरुराज युधिष्ठिर ने पड़ाव डाला, और वहाँ अपने सैनिकों के साथ
श्लोक 43 (2.83.43)
शिवे देशे समे चैव न्यवसत्पाण्डवस्तदा । ततो राजन्समाहूय शोकविह्वलया गिरा ॥
śive deśe same caiva nyavasatpāṇḍavastadā | tato rājansamāhūya śokavihvalayā girā
वह पाण्डुपुत्र शुभ और समतल भूमि पर ठहरे। तब, हे राजन्, विदुर ने उन्हें बुलाकर शोक से विह्वल वाणी में
श्लोक 44 (2.83.44)
एतद्वाक्यं च सर्वस्वं धृतराष्ट्रचिकीर्षितम् । आचचक्षे यथावृत्तं विदुरोऽथ नृपस्य ह ॥
etadvākyaṃ ca sarvasvaṃ dhṛtarāṣṭracikīrṣitam | ācacakṣe yathāvṛttaṃ viduro'tha nṛpasya ha
धृतराष्ट्र का यह सन्देश और उनका सम्पूर्ण अभिप्राय राजा को ज्यों-का-त्यों कह सुनाया।
श्लोक 45 (2.83.45)
तच्छ्रुत्वा भाषितं तेन धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥
tacchrutvā bhāṣitaṃ tena dharmarājo'bravīdidam
उनकी बात सुनकर धर्मराज ने यह कहा—
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 46 (2.83.46)
न मर्षयाम्यहं क्षत्तः समाह्वानं व्रतं हि मे । स्वस्त्यस्तु लोके विप्राणां प्रजानां चैव सर्वदा ॥
na marṣayāmyahaṃ kṣattaḥ samāhvānaṃ vrataṃ hi me | svastyastu loke viprāṇāṃ prajānāṃ caiva sarvadā
"हे क्षत्ता, मैं ललकार को अनसुना नहीं कर सकता; यह मेरा व्रत है। संसार में ब्राह्मणों और समस्त प्रजा का सदा कल्याण हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 47 (2.83.47)
प्रविवेश ततो राजा नगरं नागसाह्वयम् । धृतराष्ट्रेण चाहूतः कालस्य समयेन च ॥
praviveśa tato rājā nagaraṃ nāgasāhvayam | dhṛtarāṣṭreṇa cāhūtaḥ kālasya samayena ca
तब धृतराष्ट्र के बुलाने पर, नियत समय पर, राजा ने हस्तिनापुर नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 48 (2.83.48)
स हास्तिनपुरं गत्वा धृतराष्ट्रगृहं ययौ । समियाय च धर्मात्मा धृतराष्ट्रेण पाण्डवः ॥
sa hāstinapuraṃ gatvā dhṛtarāṣṭragṛhaṃ yayau | samiyāya ca dharmātmā dhṛtarāṣṭreṇa pāṇḍavaḥ
हस्तिनापुर पहुँचकर वे धृतराष्ट्र के महल में गए, और धर्मात्मा पाण्डुपुत्र धृतराष्ट्र से मिले।
श्लोक 49 (2.83.49)
तथा भीष्मेण द्रोणेन कर्णेन च कृपेण च । समियाय यथान्यायं द्रौणिना च विभुः सह ॥
tathā bhīṣmeṇa droṇena karṇena ca kṛpeṇa ca | samiyāya yathānyāyaṃ drauṇinā ca vibhuḥ saha
इसी प्रकार उस प्रभावशाली राजा ने भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप और द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) से यथोचित भेंट की।
श्लोक 50 (2.83.50)
समेत्य च महाबाहुः सोमदत्तेन चैव ह । दुर्योधनेन सभ्रात्रा सौबलेन च वीर्यवान् ॥
sametya ca mahābāhuḥ somadattena caiva ha | duryodhanena sabhrātrā saubalena ca vīryavān
फिर उस पराक्रमी महाबाहु ने सोमदत्त, भाइयों सहित दुर्योधन और सुबलपुत्र (शकुनि) से भेंट की,
श्लोक 51 (2.83.51)
ये चान्ये तत्र राजानः पूर्वमेव समागताः । दुःशासनेन वीरेण सर्वैर्भ्रातृभिरेव च ॥
ye cānye tatra rājānaḥ pūrvameva samāgatāḥ | duḥśāsanena vīreṇa sarvairbhrātṛbhireva ca
और वहाँ पहले से आए हुए अन्य राजाओं से, वीर दुःशासन से तथा उसके सब भाइयों से,
श्लोक 52 (2.83.52)
जयद्रथेन च तथा कुरुभिश्चापि सर्वशः । ततः सर्वैर्महाबाहुर्भ्रातृभिः परिवारितः ॥
jayadrathena ca tathā kurubhiścāpi sarvaśaḥ | tataḥ sarvairmahābāhurbhrātṛbhiḥ parivāritaḥ
जयद्रथ से तथा सब कौरवों से भी मिले। तब अपने सब भाइयों से घिरे हुए वह महाबाहु
श्लोक 53 (2.83.53)
प्रविवेश गृहं राज्ञो धृतराष्ट्रस्य धीमतः । ददर्श तत्र गान्धारीं देवीं पतिमनुव्रताम् ॥
praviveśa gṛhaṃ rājño dhṛtarāṣṭrasya dhīmataḥ | dadarśa tatra gāndhārīṃ devīṃ patimanuvratām
बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्र के भवन में प्रविष्ट हुए। वहाँ उन्होंने पतिव्रता देवी गान्धारी को देखा,
श्लोक 54 (2.83.54)
स्नुषाभिः संवृतां शश्वत्ताराभिरिव रोहिणीम् । अभिवाद्य स गान्धारीं तया च प्रतिनन्दितः ॥
snuṣābhiḥ saṃvṛtāṃ śaśvattārābhiriva rohiṇīm | abhivādya sa gāndhārīṃ tayā ca pratinanditaḥ
जो सदा अपनी पुत्रवधुओं से घिरी रहती थीं, जैसे तारों से घिरी रोहिणी। गान्धारी को प्रणाम करके और उनसे अभिनन्दित होकर
श्लोक 55 (2.83.55)
ददर्श पितरं वृद्धं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ॥
dadarśa pitaraṃ vṛddhaṃ prajñācakṣuṣamīśvaram
उन्होंने अपने वृद्ध पिता, प्रज्ञाचक्षु स्वामी धृतराष्ट्र के दर्शन किए।
श्लोक 56 (2.83.56)
राज्ञा मूर्धन्युपाघ्रातास्ते च कौरवनन्दनाः । चत्वारः पाण्डवा राजन्भीमसेनपुरोगमाः ॥
rājñā mūrdhanyupāghrātāste ca kauravanandanāḥ | catvāraḥ pāṇḍavā rājanbhīmasenapurogamāḥ
हे राजन्, राजा ने भीमसेन आदि उन चारों कुरुनन्दन पाण्डवों का सिर सूँघा।
श्लोक 57 (2.83.57)
ततो हर्षः समभवत्कौरवाणां विशाम्पते । तान्दृष्ट्वा पुरुषव्याघ्रान्पाण्डवान्प्रियदर्शनान् ॥
tato harṣaḥ samabhavatkauravāṇāṃ viśāmpate | tāndṛṣṭvā puruṣavyāghrānpāṇḍavānpriyadarśanān
हे प्रजानाथ, उन प्रियदर्शन पुरुषसिंह पाण्डवों को देखकर कौरवों में हर्ष छा गया।
श्लोक 58 (2.83.58)
विविशुस्तेऽभ्यनुज्ञाता रत्नवन्ति गृहाणि च । ददृशुश्चोपयातारो द्रौपदीप्रमुखाः स्त्रियः ॥
viviśuste'bhyanujñātā ratnavanti gṛhāṇi ca | dadṛśuścopayātāro draupadīpramukhāḥ striyaḥ
आज्ञा पाकर वे रत्नों से भरे भवनों में प्रविष्ट हुए; और देवरानियों-जेठानियों ने पास आकर द्रौपदी आदि स्त्रियों को देखा।
श्लोक 59 (2.83.59)
याज्ञसेन्याः परामृद्धिं दृष्ट्वा प्रज्वलितामिव । स्नुषास्ता धृतराष्ट्रस्य नातिप्रमनसोऽभवन् ॥
yājñasenyāḥ parāmṛddhiṃ dṛṣṭvā prajvalitāmiva | snuṣāstā dhṛtarāṣṭrasya nātipramanaso'bhavan
याज्ञसेनी (द्रौपदी) के मानो प्रज्वलित-से उत्कृष्ट वैभव को देखकर धृतराष्ट्र की पुत्रवधुएँ बहुत प्रसन्न नहीं हुईं।
श्लोक 60 (2.83.60)
ततस्ते पुरुषव्याघ्रा गत्वा स्त्रीभिस्तु संविदम् । कृत्वा व्यायामपूर्वाणि कृत्यानि प्रतिकर्म च ॥
tataste puruṣavyāghrā gatvā strībhistu saṃvidam | kṛtvā vyāyāmapūrvāṇi kṛtyāni pratikarma ca
तब उन पुरुषसिंहों ने स्त्रियों से बातचीत करके व्यायाम आदि कृत्य किए और केश-सज्जा आदि शृंगार किया।
श्लोक 61 (2.83.61)
ततः कृताह्निकाः सर्वे दिव्यचन्दनभूषिताः । कल्याणमनसश्चैव ब्राह्मणान्स्वस्ति वाच्य च ॥
tataḥ kṛtāhnikāḥ sarve divyacandanabhūṣitāḥ | kalyāṇamanasaścaiva brāhmaṇānsvasti vācya ca
फिर नित्यकर्म पूरा करके, दिव्य चन्दन से विभूषित होकर, प्रसन्न मन से उन्होंने ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया,
श्लोक 62 (2.83.62)
मनोज्ञमशनं भुक्त्वा विविशुः शरणान्यथ । उपगीयमाना नारीभिरस्वपन्कुरुपुङ्गवाः ॥
manojñamaśanaṃ bhuktvā viviśuḥ śaraṇānyatha | upagīyamānā nārībhirasvapankurupuṅgavāḥ
और मनोहर भोजन करके अपने शयन-कक्षों में गए; वहाँ स्त्रियाँ उनके लिए गाती रहीं और वे कुरुश्रेष्ठ सो गए।
श्लोक 63 (2.83.63)
जगाम तेषां सा रात्रिः पुण्या रतिविहारिणाम् । स्तूयमानाश्च विश्रान्ताः काले निद्रामथात्यजन् ॥
jagāma teṣāṃ sā rātriḥ puṇyā rativihāriṇām | stūyamānāśca viśrāntāḥ kāle nidrāmathātyajan
आमोद-विहार में रत उन लोगों की वह पुण्य रात्रि बीत गई; और विश्राम कर चुकने पर, स्तुतियों के बीच उन्होंने समय पर निद्रा त्याग दी।
श्लोक 64 (2.83.64)
सुखोषितास्ते रजनीं प्रातः सर्वे कृताह्निकाः । सभां रम्यां प्रविविशुः कितवैरभिनन्दिताः ॥
sukhoṣitāste rajanīṃ prātaḥ sarve kṛtāhnikāḥ | sabhāṃ ramyāṃ praviviśuḥ kitavairabhinanditāḥ
सुखपूर्वक रात बिताकर, प्रातःकाल सब नित्यकर्म करके वे जुआरियों द्वारा अभिनन्दित होते हुए उस रमणीय सभा में प्रविष्ट हुए।