सभा पर्व · अध्याय 84
शकुनि की चुनौती
पाण्डव सभा में प्रवेश करके राजाओं के बीच अपने आसनों पर बैठते हैं, और शकुनि युधिष्ठिर को खेल आरम्भ करने का निमन्त्रण देता है। युधिष्ठिर द्यूत को पराक्रमहीन छल बताकर उसकी निन्दा करते हैं और मुनि असित देवल का वचन सुनाते हैं, पर शकुनि उत्तर देता है कि हर प्रतियोगिता में श्रेष्ठ कौशल ही जीतता है, और भय हो तो खेल से हट जाने की चुनौती देता है। ललकार से कभी पीछे न हटने के व्रत से बँधे युधिष्ठिर पूछते हैं कि उनसे कौन खेलेगा; दुर्योधन कहता है कि दाँव वह देगा और उसकी ओर से शकुनि पासे फेंकेगा, और युधिष्ठिर इसे अनुचित मानते हुए भी खेल आरम्भ होने देते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.84.1)
प्रविश्य तां सभां पार्था युधिष्ठिरपुरोगमाः । समेत्य पार्थिवान्सर्वान्पूजार्हानभिपूज्य च ॥
praviśya tāṃ sabhāṃ pārthā yudhiṣṭhirapurogamāḥ | sametya pārthivānsarvānpūjārhānabhipūjya ca
युधिष्ठिर को आगे करके कुन्तीपुत्रों ने उस सभा में प्रवेश किया, सब राजाओं से मिले और पूजनीयों का पूजन किया।
श्लोक 2 (2.84.2)
यथावयः समेयाना उपविष्टा यथार्हतः । आसनेषु विचित्रेषु स्पर्द्ध्यास्तरणवत्सु च ॥
yathāvayaḥ sameyānā upaviṣṭā yathārhataḥ | āsaneṣu vicitreṣu sparddhyāstaraṇavatsu ca
आयु के क्रम से सबसे मिलकर वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार ऐसे विचित्र आसनों पर बैठे जिन पर बहुमूल्य बिछावन बिछे थे।
श्लोक 3 (2.84.3)
तेषु तत्रोपविष्टेषु सर्वेष्वथ नृपेषु च । शकुनिः सौबलस्तत्र युधिष्ठिरमभाषत ॥
teṣu tatropaviṣṭeṣu sarveṣvatha nṛpeṣu ca | śakuniḥ saubalastatra yudhiṣṭhiramabhāṣata
जब वे और सब राजा वहाँ बैठ गए, तब सुबलपुत्र शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा।
शकुनिरुवाच
श्लोक 4 (2.84.4)
उपस्तीर्णा सभा राजन्सर्वे त्वयि कृतक्षणाः । अक्षानुप्त्वा देवनस्य समयोऽस्तु युधिष्ठिर ॥
upastīrṇā sabhā rājansarve tvayi kṛtakṣaṇāḥ | akṣānuptvā devanasya samayo'stu yudhiṣṭhira
"हे राजन्, सभा बिछ चुकी है और सब आपकी प्रतीक्षा में हैं। हे युधिष्ठिर, पासे डाले जाएँ और खेल के नियम तय हों।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 5 (2.84.5)
निकृतिर्देवनं पापं न क्षात्रोऽत्र पराक्रमः । न च नीतिर्ध्रुवा राजन्किं त्वं द्यूतं प्रशंससि ॥
nikṛtirdevanaṃ pāpaṃ na kṣātro'tra parākramaḥ | na ca nītirdhruvā rājankiṃ tvaṃ dyūtaṃ praśaṃsasi
"द्यूत छल है और पाप का कारण है। इसमें न क्षत्रियोचित पराक्रम है, न कोई निश्चित नीति। हे राजन्, आप द्यूत की प्रशंसा क्यों करते हैं?
श्लोक 6 (2.84.6)
न हि मानं प्रशंसन्ति निकृतौ कितवस्य हि । शकुने मैवं नोऽजैषीरमार्गेण नृशंसवत् ॥
na hi mānaṃ praśaṃsanti nikṛtau kitavasya hi | śakune maivaṃ no'jaiṣīramārgeṇa nṛśaṃsavat
"जुआरी के छल-कौशल पर किए गए अभिमान की लोग प्रशंसा नहीं करते। हे शकुनि, क्रूर मनुष्य की तरह कुमार्ग से हमें मत जीतो।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 7 (2.84.7)
यो वेत्ति सङ्ख्यां निकृतौ विधिज्ञ- । श्चेष्टास्वखिन्नः कितवोऽक्षजासु । महामतिर्यश्च जानाति द्यूतं । स वै सर्वं सहते प्रक्रियासु ॥
yo vetti saṅkhyāṃ nikṛtau vidhijña- | śceṣṭāsvakhinnaḥ kitavo'kṣajāsu | mahāmatiryaśca jānāti dyūtaṃ | sa vai sarvaṃ sahate prakriyāsu
"जो पासों की गिनती जानता है, दाँव-पेंच की विधि का ज्ञाता है, पासों की चालों में नहीं थकता, और जो महाबुद्धिमान द्यूत को समझता है — वही खेल की हर प्रक्रिया में सब कुछ सह लेता है।
श्लोक 8 (2.84.8)
अक्षग्लहः सोऽभिभवेत्परं न- । स्तेनैव दोषो भवतीह पार्थ । दीव्यामहे पार्थिव मा विशङ्कां । कुरुष्व पाणं च चिरं च मा कृथाः ॥
akṣaglahaḥ so'bhibhavetparaṃ na- | stenaiva doṣo bhavatīha pārtha | dīvyāmahe pārthiva mā viśaṅkāṃ | kuruṣva pāṇaṃ ca ciraṃ ca mā kṛthāḥ
"हे पार्थ, पासों का दाँव ही हमारे प्रतिपक्षी को हराता है; दोष भी यहाँ उसी से होता है। हे राजन्, आइए खेलें; शंका मत कीजिए। दाँव लगाइए और देर मत कीजिए।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 9 (2.84.9)
एवमाहायमसितो देवलो मुनिसत्तमः । इमानि लोकद्वाराणि यो वै भ्राम्यति सर्वदा ॥
evamāhāyamasito devalo munisattamaḥ | imāni lokadvārāṇi yo vai bhrāmyati sarvadā
"मुनिश्रेष्ठ असित देवल ने, जो इन लोकद्वारों में सदा विचरते रहते हैं, ऐसा कहा है—
श्लोक 10 (2.84.10)
इदं वै देवनं पापं निकृत्या कितवैः सह । धर्मेण तु जयो युद्धे तत्परं न तु देवनम् ॥
idaṃ vai devanaṃ pāpaṃ nikṛtyā kitavaiḥ saha | dharmeṇa tu jayo yuddhe tatparaṃ na tu devanam
"'जुआरियों के साथ छलपूर्वक खेला गया यह द्यूत पाप है। धर्म से युद्ध में प्राप्त विजय ही श्रेष्ठ है, द्यूत नहीं।
श्लोक 11 (2.84.11)
नार्या म्लेच्छन्ति भाषाभिर्मायया न चरन्त्युत । अजिह्ममशठं युद्धमेतत्सत्पुरुषव्रतम् ॥
nāryā mlecchanti bhāṣābhirmāyayā na carantyuta | ajihmamaśaṭhaṃ yuddhametatsatpuruṣavratam
"'आर्य लोग म्लेच्छों की तरह अस्पष्ट भाषा नहीं बोलते और न छल से आचरण करते हैं। कुटिलता और शठता से रहित युद्ध ही सत्पुरुषों का व्रत है।'
श्लोक 12 (2.84.12)
शक्तितो ब्राह्मणार्थाय शिक्षितुं प्रयतामहे । तद्वै वित्तं मातिदेवीर्माजैषीः शकुने परान् ॥
śaktito brāhmaṇārthāya śikṣituṃ prayatāmahe | tadvai vittaṃ mātidevīrmājaiṣīḥ śakune parān
"हम यथाशक्ति ब्राह्मणों के लिए धन जुटाने का प्रयत्न करते हैं। हे शकुनि, उस धन को सीमा से बढ़कर दाँव पर मत लगवाओ; इस प्रकार अपने प्रतिपक्षियों को मत जीतो।
श्लोक 13 (2.84.13)
निकृत्या कामये नाहं सुखान्युत धनानि वा । कितवस्येह कृतिनो वृत्तमेतन्न पूज्यते ॥
nikṛtyā kāmaye nāhaṃ sukhānyuta dhanāni vā | kitavasyeha kṛtino vṛttametanna pūjyate
"मैं छल से प्राप्त सुख या धन नहीं चाहता। चालाक जुआरी का यह आचरण यहाँ आदरणीय नहीं माना जाता।"
शकुनिरुवाच
श्लोक 14 (2.84.14)
श्रोत्रियः श्रोत्रियानेति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥
śrotriyaḥ śrotriyāneti nikṛtyaiva yudhiṣṭhira | vidvānaviduṣo'bhyeti nāhustāṃ nikṛtiṃ janāḥ
"हे युधिष्ठिर, एक वेदज्ञ दूसरे वेदज्ञों से चातुरी के बल पर ही आगे निकलता है; विद्वान अविद्वानों को पराजित करता है — और लोग इसे छल नहीं कहते।
श्लोक 15 (2.84.15)
अक्षैर्हि शिक्षितोऽभ्येति निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥
akṣairhi śikṣito'bhyeti nikṛtyaiva yudhiṣṭhira | vidvānaviduṣo'bhyeti nāhustāṃ nikṛtiṃ janāḥ
"हे युधिष्ठिर, पासों में निपुण व्यक्ति चातुरी से ही दूसरों को जीतता है; विद्वान अविद्वानों को पराजित करता है — और लोग इसे छल नहीं कहते।
श्लोक 16 (2.84.16)
अकृतास्त्रं कृतास्त्रश्च दुर्बलं बलवत्तरः । एवं कर्मसु सर्वेषु निकृत्यैव युधिष्ठिर । विद्वानविदुषोऽभ्येति नाहुस्तां निकृतिं जनाः ॥
akṛtāstraṃ kṛtāstraśca durbalaṃ balavattaraḥ | evaṃ karmasu sarveṣu nikṛtyaiva yudhiṣṭhira | vidvānaviduṣo'bhyeti nāhustāṃ nikṛtiṃ janāḥ
"शस्त्रविद्या में निपुण अनाड़ी को, और अधिक बलवान दुर्बल को जीतता है। हे युधिष्ठिर, इसी प्रकार सब कर्मों में चातुरी से ही विजय होती है। विद्वान अविद्वानों को पराजित करता है — और लोग इसे छल नहीं कहते।
श्लोक 17 (2.84.17)
एवं त्वं मामिहाभ्येत्य निकृतिं यदि मन्यसे । देवनाद्विनिवर्तस्व यदि ते विद्यते भयम् ॥
evaṃ tvaṃ māmihābhyetya nikṛtiṃ yadi manyase | devanādvinivartasva yadi te vidyate bhayam
"यदि यहाँ मेरे सामने आकर तुम इसे छल समझते हो, और यदि तुम्हें भय है, तो द्यूत से हट जाओ।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 18 (2.84.18)
आहूतो न निवर्तेयमिति मे व्रतमाहितम् । विधिश्च बलवान्राजन्दिष्टस्यास्मि वशे स्थितः ॥
āhūto na nivarteyamiti me vratamāhitam | vidhiśca balavānrājandiṣṭasyāsmi vaśe sthitaḥ
"ललकारे जाने पर मैं पीछे नहीं हटूँगा — यह मेरा धारण किया हुआ व्रत है। हे राजन्, विधाता बलवान है; मैं प्रारब्ध के वश में हूँ।
श्लोक 19 (2.84.19)
अस्मिन्समागमे केन देवनं मे भविष्यति । प्रतिपाणश्च कोऽन्योऽस्ति ततो द्यूतं प्रवर्तताम् ॥
asminsamāgame kena devanaṃ me bhaviṣyati | pratipāṇaśca ko'nyo'sti tato dyūtaṃ pravartatām
"इस सभा में मेरा खेल किसके साथ होगा? और मेरे दाँव के बराबर दाँव लगाने वाला दूसरा कौन है? फिर खेल आरम्भ हो।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 20 (2.84.20)
अहं दातास्मि रत्नानां धनानां च विशाम्पते । मदर्थे देविता चायं शकुनिर्मातुलो मम ॥
ahaṃ dātāsmi ratnānāṃ dhanānāṃ ca viśāmpate | madarthe devitā cāyaṃ śakunirmātulo mama
"हे प्रजानाथ, रत्न और धन मैं दूँगा; और मेरी ओर से ये मेरे मामा शकुनि खेलेंगे।"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 21 (2.84.21)
अन्येनान्यस्य वै द्यूतं विषमं प्रतिभाति मे । एतद्विद्वन्नुपादत्स्व काममेवं प्रवर्तताम् ॥
anyenānyasya vai dyūtaṃ viṣamaṃ pratibhāti me | etadvidvannupādatsva kāmamevaṃ pravartatām
"एक व्यक्ति का दूसरे की ओर से खेलना मुझे विषम प्रतीत होता है। हे विद्वन्, इसे ध्यान में रखिए; फिर भी जैसी आपकी इच्छा, खेल आरम्भ हो।"