सभा पर्व · अध्याय 85
युधिष्ठिर की हार का आरम्भ
धृतराष्ट्र को आगे करके राजा सभा में प्रवेश करते हैं, भीष्म, द्रोण, कृप और विदुर अनमने भाव से पीछे चलते हैं, और द्यूत आरम्भ होता है। युधिष्ठिर क्रम से समुद्र से उत्पन्न बहुमूल्य मणि, स्वर्ण से भरी पेटियाँ, आठ घोड़ों वाला अपना राजरथ, एक लाख दासियाँ, उतने ही दास, एक हज़ार हाथी, उतने ही रथ, चित्ररथ द्वारा अर्जुन को दिए गए गन्धर्व घोड़े, दसियों हज़ार रथ और छकड़े सहित साठ हज़ार योद्धा, और स्वर्ण की चार सौ निधियाँ दाँव पर लगाते हैं। हर बार छल का सहारा लेकर शकुनि पासा फेंकता है और कहता है— "जीत लिया!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (2.85.1)
उपोह्यमाने द्यूते तु राजानः सर्व एव ते । धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य विविशुस्तां सभां ततः ॥
upohyamāne dyūte tu rājānaḥ sarva eva te | dhṛtarāṣṭraṃ puraskṛtya viviśustāṃ sabhāṃ tataḥ
जब द्यूत की तैयारी हो रही थी, तब वे सब राजा धृतराष्ट्र को आगे करके उस सभा में प्रविष्ट हुए।
श्लोक 2 (2.85.2)
भीष्मो द्रोणः कृपश्चैव विदुरश्च महामतिः । नातिप्रीतेन मनसा तेऽन्ववर्तन्त भारत ॥
bhīṣmo droṇaḥ kṛpaścaiva viduraśca mahāmatiḥ | nātiprītena manasā te'nvavartanta bhārata
हे भारत, भीष्म, द्रोण, कृप और महाबुद्धिमान विदुर भी अनमने भाव से उनके पीछे चले।
श्लोक 3 (2.85.3)
ते द्वन्द्वशः पृथक्चैव सिंहग्रीवा महौजसः । सिंहासनानि भूरीणि विचित्राणि च भेजिरे ॥
te dvandvaśaḥ pṛthakcaiva siṃhagrīvā mahaujasaḥ | siṃhāsanāni bhūrīṇi vicitrāṇi ca bhejire
सिंह जैसी ग्रीवा वाले वे महातेजस्वी जोड़ों में और अलग-अलग अनेक विचित्र सिंहासनों पर बैठ गए।
श्लोक 4 (2.85.4)
शुशुभे सा सभा राजन्राजभिस्तैः समागतैः । देवैरिव महाभागैः समवेतैस्त्रिविष्टपम् ॥
śuśubhe sā sabhā rājanrājabhistaiḥ samāgataiḥ | devairiva mahābhāgaiḥ samavetaistriviṣṭapam
हे राजन्, वहाँ एकत्र उन राजाओं से वह सभा वैसे ही सुशोभित हुई जैसे एकत्र महाभाग देवताओं से स्वर्ग।
श्लोक 5 (2.85.5)
सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे भास्वरमूर्तयः । प्रवर्तत महाराज सुहृद्द्यूतमनन्तरम् ॥
sarve vedavidaḥ śūrāḥ sarve bhāsvaramūrtayaḥ | pravartata mahārāja suhṛddyūtamanantaram
वे सब वेदज्ञ, शूरवीर और तेजस्वी रूपवाले थे। हे महाराज, तदनन्तर मित्रतापूर्ण द्यूत आरम्भ हुआ।
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 6 (2.85.6)
अयं बहुधनो राजन्सागरावर्तसम्भवः । मणिर्हारोत्तरः श्रीमान्कनकोत्तमभूषणः ॥
ayaṃ bahudhano rājansāgarāvartasambhavaḥ | maṇirhārottaraḥ śrīmānkanakottamabhūṣaṇaḥ
"हे राजन्, यह समुद्र के भँवरों से उत्पन्न बहुमूल्य मणि है — श्रेष्ठ हार में जड़ी हुई, शोभायुक्त और उत्तम स्वर्ण से अलंकृत।
श्लोक 7 (2.85.7)
एतद्राजन्मम धनं प्रतिपाणोऽस्ति कस्तव । येन मां त्वं महाराज धनेन प्रतिदीव्यसे ॥
etadrājanmama dhanaṃ pratipāṇo'sti kastava | yena māṃ tvaṃ mahārāja dhanena pratidīvyase
"हे राजन्, यह मेरा धन है। हे महाराज, तुम्हारा प्रतिदाँव क्या है, जिस धन से तुम मेरे विरुद्ध खेलोगे?"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 8 (2.85.8)
सन्ति मे मणयश्चैव धनानि सुबहूनि च । मत्सरश्च न मेऽर्थेषु जयस्वैनं दुरोदरम् ॥
santi me maṇayaścaiva dhanāni subahūni ca | matsaraśca na me'rtheṣu jayasvainaṃ durodaram
"मेरे पास भी मणियाँ हैं और बहुत-सा धन है; मुझे अपने धन का लोभ नहीं है। इस दाँव को जीतिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (2.85.9)
ततो जग्राह शकुनिस्तानक्षानक्षतत्त्ववित् । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
tato jagrāha śakunistānakṣānakṣatattvavit | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
तब पासों का मर्म जानने वाले शकुनि ने वे पासे उठाए, और शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 10 (2.85.10)
मत्तः कैतवकेनैव यज्जितोऽस्मि दुरोदरे । शकुने हन्त दीव्यामो ग्लहमानाः परस्परम् ॥
mattaḥ kaitavakenaiva yajjito'smi durodare | śakune hanta dīvyāmo glahamānāḥ parasparam
"तुमने केवल छल से ही यह बाज़ी मुझसे जीती है। अच्छा, हे शकुनि, आओ, एक-दूसरे के विरुद्ध दाँव लगाकर खेलें।
श्लोक 11 (2.85.11)
सन्ति निष्कसहस्रस्य भाण्डिन्यो भरिताः शुभाः । कोशो हिरण्यमक्षय्यं जातरूपमनेकशः । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
santi niṣkasahasrasya bhāṇḍinyo bharitāḥ śubhāḥ | kośo hiraṇyamakṣayyaṃ jātarūpamanekaśaḥ | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"मेरे पास हज़ार-हज़ार स्वर्णमुद्राओं से भरी सुन्दर पेटियाँ हैं, सोने का अक्षय कोष है और अनेक प्रकार का शुद्ध स्वर्ण है। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 12 (2.85.12)
कौरवाणां कुलकरं ज्येष्ठं पाण्डवमच्युतम् । इत्युक्तः शकुनिः प्राह जितमित्येव तं नृपम् ॥
kauravāṇāṃ kulakaraṃ jyeṣṭhaṃ pāṇḍavamacyutam | ityuktaḥ śakuniḥ prāha jitamityeva taṃ nṛpam
ऐसा कहे जाने पर शकुनि ने कौरवकुल को चलाने वाले, अपने धर्म से न डिगने वाले ज्येष्ठ पाण्डव राजा से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 13 (2.85.13)
अयं सहस्रसमितो वैयाघ्रः सुप्रतिष्ठितः । सुचक्रोपस्करः श्रीमान्किङ्किणीजालमण्डितः ॥
ayaṃ sahasrasamito vaiyāghraḥ supratiṣṭhitaḥ | sucakropaskaraḥ śrīmānkiṅkiṇījālamaṇḍitaḥ
"यह मेरा राजरथ है, जो सहस्र स्वर्णमुद्राओं के मूल्य का है, व्याघ्रचर्म से मढ़ा और सुदृढ़, उत्तम पहियों और उपकरणों से युक्त, शोभायुक्त और घुँघरुओं की जाली से सजा हुआ;
श्लोक 14 (2.85.14)
संह्रादनो राजरथो य इहास्मानुपावहत् । जैत्रो रथवरः पुण्यो मेघसागरनिःस्वनः ॥
saṃhrādano rājaratho ya ihāsmānupāvahat | jaitro rathavaraḥ puṇyo meghasāgaraniḥsvanaḥ
"गड़गड़ाहट करने वाला वह राजरथ जो हमें यहाँ लाया है — विजयी, पवित्र, श्रेष्ठ रथ, जिसका घोष मेघ और सागर के समान है।
श्लोक 15 (2.85.15)
अष्टौ यं कुररच्छायाः सदश्वा राष्ट्रसंमताः । वहन्ति नैषां मुच्येत पदाद्भूमिमुपस्पृशन् । एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
aṣṭau yaṃ kuraracchāyāḥ sadaśvā rāṣṭrasaṃmatāḥ | vahanti naiṣāṃ mucyeta padādbhūmimupaspṛśan | etadrājandhanaṃ mahyaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"इसे कुरर पक्षी के रंग के आठ उत्तम घोड़े खींचते हैं, जो सारे राष्ट्र में सराहे जाते हैं; धरती पर चलने वाला कोई भी इनकी चाल से बच नहीं सकता। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 16 (2.85.16)
एवं श्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
evaṃ śrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
यह सुनकर, दृढ़निश्चयी और छल का आश्रय लिए हुए शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 17 (2.85.17)
शतं दासीसहस्राणि तरुण्यो हेमभद्रिकाः । कम्बुकेयूरधारिण्यो निष्ककण्ठ्यः स्वलङ्कृताः ॥
śataṃ dāsīsahasrāṇi taruṇyo hemabhadrikāḥ | kambukeyūradhāriṇyo niṣkakaṇṭhyaḥ svalaṅkṛtāḥ
"एक लाख दासियाँ, जो युवा हैं, स्वर्णाभूषणों से सुन्दर लगती हैं, शंख के कंगन और बाजूबन्द पहनती हैं, कण्ठ में स्वर्णहार धारण करती हैं और भली-भाँति अलंकृत हैं;
श्लोक 18 (2.85.18)
महार्हमाल्याभरणाः सुवस्त्राश्चन्दनोक्षिताः । मणीन्हेम च बिभ्रत्यश्चतुःषष्टिविशारदाः ॥
mahārhamālyābharaṇāḥ suvastrāścandanokṣitāḥ | maṇīnhema ca bibhratyaścatuḥṣaṣṭiviśāradāḥ
"बहुमूल्य मालाएँ और आभूषण पहने, सुन्दर वस्त्रों वाली, चन्दन से अनुलिप्त, मणि और स्वर्ण धारण करने वाली, चौंसठ कलाओं में निपुण;
श्लोक 19 (2.85.19)
अनुसेवां चरन्तीमाः कुशला नृत्तसामसु । स्नातकानाममात्यानां राज्ञां च मम शासनात् । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
anusevāṃ carantīmāḥ kuśalā nṛttasāmasu | snātakānāmamātyānāṃ rājñāṃ ca mama śāsanāt | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"नृत्य और गायन में कुशल ये दासियाँ मेरी आज्ञा से स्नातकों, मन्त्रियों और राजाओं की सेवा करती हैं। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 20 (2.85.20)
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
यह सुनकर, दृढ़निश्चयी और छल का आश्रय लिए हुए शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 21 (2.85.21)
एतावन्ति च दासानां सहस्राण्युत सन्ति मे । प्रदक्षिणानुलोमाश्च प्रावारवसनाः सदा ॥
etāvanti ca dāsānāṃ sahasrāṇyuta santi me | pradakṣiṇānulomāśca prāvāravasanāḥ sadā
"मेरे पास उतने ही हज़ार दास भी हैं, जो शिष्ट और आज्ञाकारी हैं और सदा उत्तरीय वस्त्र धारण करते हैं;
श्लोक 22 (2.85.22)
प्राज्ञा मेधाविनो दान्ता युवानो मृष्टकुण्डलाः । पात्रीहस्ता दिवारात्रमतिथीन्भोजयन्त्युत । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
prājñā medhāvino dāntā yuvāno mṛṣṭakuṇḍalāḥ | pātrīhastā divārātramatithīnbhojayantyuta | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"बुद्धिमान, मेधावी, संयमी, युवा, चमकते कुण्डलों वाले, जो हाथ में पात्र लिए दिन-रात अतिथियों को भोजन कराते हैं। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (2.85.23)
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
यह सुनकर, दृढ़निश्चयी और छल का आश्रय लिए हुए शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 24 (2.85.24)
सहस्रसङ्ख्या नागा मे मत्तास्तिष्ठन्ति सौबल । हेमकक्षाः कृतापीडाः पद्मिनो हेममालिनः ॥
sahasrasaṅkhyā nāgā me mattāstiṣṭhanti saubala | hemakakṣāḥ kṛtāpīḍāḥ padmino hemamālinaḥ
"हे सुबलपुत्र, मेरे पास एक हज़ार मतवाले हाथी हैं — सोने की पेटियों वाले, अलंकृत, कमल-चिह्नों से युक्त और स्वर्णमालाएँ पहने हुए;
श्लोक 25 (2.85.25)
सुदान्ता राजवहनाः सर्वशब्दक्षमा युधि । ईषादन्ता महाकायाः सर्वे चाष्टकरेणवः ॥
sudāntā rājavahanāḥ sarvaśabdakṣamā yudhi | īṣādantā mahākāyāḥ sarve cāṣṭakareṇavaḥ
"भली-भाँति सधे हुए, राजाओं की सवारी के योग्य, युद्ध में हर प्रकार का कोलाहल सहने वाले, हल के दण्ड जैसे दाँतों वाले, विशालकाय, और प्रत्येक के साथ आठ-आठ हथिनियाँ;
श्लोक 26 (2.85.26)
सर्वे च पुरभेत्तारो नवमेघनिभा गजाः । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
sarve ca purabhettāro navameghanibhā gajāḥ | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"ये सभी नगरों के प्राकार तोड़ने वाले, नये मेघों जैसे हाथी हैं। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 27 (2.85.27)
इत्येवंवादिनं पार्थं प्रहसन्निव सौबलः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
ityevaṃvādinaṃ pārthaṃ prahasanniva saubalaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
ऐसा कहने वाले पार्थ से सुबलपुत्र शकुनि ने मानो हँसते हुए कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 28 (2.85.28)
रथास्तावन्त एवेमे हेमदण्डाः पताकिनः । हयैर्विनीतैः सम्पन्ना रथिभिश्चित्रयोधिभिः ॥
rathāstāvanta eveme hemadaṇḍāḥ patākinaḥ | hayairvinītaiḥ sampannā rathibhiścitrayodhibhiḥ
"मेरे पास उतने ही रथ हैं, स्वर्णदण्डों और पताकाओं वाले, सधे हुए घोड़ों से युक्त और विचित्र ढंग से युद्ध करने वाले रथियों सहित।
श्लोक 29 (2.85.29)
एकैको ह्यत्र लभते सहस्रपरमां भृतिम् । युध्यतोऽयुध्यतो वापि वेतनं मासकालिकम् । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
ekaiko hyatra labhate sahasraparamāṃ bhṛtim | yudhyato'yudhyato vāpi vetanaṃ māsakālikam | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"इनमें प्रत्येक योद्धा, चाहे युद्ध करे या न करे, प्रतिमास अधिक से अधिक एक हज़ार स्वर्णमुद्राओं का वेतन पाता है। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 30 (2.85.30)
इत्येवमुक्ते वचने कृतवैरो दुरात्मवान् । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
ityevamukte vacane kṛtavairo durātmavān | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
ये वचन कहे जाने पर वैर ठाने हुए दुष्टात्मा शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 31 (2.85.31)
अश्वांस्तित्तिरिकल्माषान्गान्धर्वान्हेममालिनः । ददौ चित्ररथस्तुष्टो यांस्तान्गाण्डीवधन्वने ॥
aśvāṃstittirikalmāṣāngāndharvānhemamālinaḥ | dadau citrarathastuṣṭo yāṃstāngāṇḍīvadhanvane
"तीतर जैसे चितकबरे, स्वर्णमालाओं वाले वे गन्धर्व घोड़े, जिन्हें चित्ररथ ने प्रसन्न होकर गाण्डीवधारी अर्जुन को दिया था,
श्लोक 32 (2.85.32)
युद्धे जितः पराभूतः प्रीतिपूर्वमरिन्दमः । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
yuddhe jitaḥ parābhūtaḥ prītipūrvamarindamaḥ | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"जब वह शत्रुदमन युद्ध में जीता और पराभूत हुआ, तब उसने प्रेमपूर्वक उन्हें दिया था — हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (2.85.33)
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
यह सुनकर, दृढ़निश्चयी और छल का आश्रय लिए हुए शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 34 (2.85.34)
रथानां शकटानां च श्रेष्ठानां चायुतानि मे । युक्तान्येव हि तिष्ठन्ति वाहैरुच्चावचैस्तथा ॥
rathānāṃ śakaṭānāṃ ca śreṣṭhānāṃ cāyutāni me | yuktānyeva hi tiṣṭhanti vāhairuccāvacaistathā
"मेरे पास दसियों हज़ार उत्तम रथ और छकड़े हैं, जो हर प्रकार के वाहन-पशुओं से जुते हुए सदा तैयार खड़े रहते हैं।
श्लोक 35 (2.85.35)
एवं वर्णस्य वर्णस्य समुच्चीय सहस्रशः । यथा समुदिता वीराः सर्वे वीरपराक्रमाः ॥
evaṃ varṇasya varṇasya samuccīya sahasraśaḥ | yathā samuditā vīrāḥ sarve vīraparākramāḥ
"इसी प्रकार हर वर्ण से हज़ारों की संख्या में चुनकर एकत्र किए गए वीर हैं, जो सब वीरोचित पराक्रम वाले हैं;
श्लोक 36 (2.85.36)
क्षीरं पिबन्तस्तिष्ठन्ति भुञ्जानाः शालितण्डुलान् । षष्टिस्तानि सहस्राणि सर्वे विपुलवक्षसः । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
kṣīraṃ pibantastiṣṭhanti bhuñjānāḥ śālitaṇḍulān | ṣaṣṭistāni sahasrāṇi sarve vipulavakṣasaḥ | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"वे दूध पीते और शालि चावल खाते हुए तैयार रहते हैं — ऐसे साठ हज़ार हैं, सब चौड़ी छाती वाले। हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (2.85.37)
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
यह सुनकर, दृढ़निश्चयी और छल का आश्रय लिए हुए शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"
युधिष्ठिर उवाच
श्लोक 38 (2.85.38)
ताम्रलोहैः परिवृता निधयो ये चतुःशताः । पञ्चद्रौणिक एकैकः सुवर्णस्याहतस्य वै ॥
tāmralohaiḥ parivṛtā nidhayo ye catuḥśatāḥ | pañcadrauṇika ekaikaḥ suvarṇasyāhatasya vai
"ताँबे और लोहे से घिरी मेरी जो चार सौ निधियाँ हैं, जिनमें प्रत्येक में पाँच-पाँच द्रोण गढ़ा हुआ सोना भरा है,
श्लोक 39 (2.85.39)
जातरूपस्य मुख्यस्य नार्घो यस्य हि भारत । एतद्राजन्मम धनं तेन दीव्याम्यहं त्वया ॥
jātarūpasya mukhyasya nārgho yasya hi bhārata | etadrājanmama dhanaṃ tena dīvyāmyahaṃ tvayā
"हे भारत, वह उत्तम स्वर्ण जिसका कोई मूल्य नहीं आँका जा सकता — हे राजन्, यह मेरा धन है; इसी से मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (2.85.40)
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः । जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ॥
etacchrutvā vyavasito nikṛtiṃ samupāśritaḥ | jitamityeva śakuniryudhiṣṭhiramabhāṣata
यह सुनकर, दृढ़निश्चयी और छल का आश्रय लिए हुए शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा— "जीत लिया!"