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सभा पर्व · अध्याय 86

विदुर का धृतराष्ट्र से द्यूत रोकने का आग्रह

जब सर्वनाशी द्यूत चल रहा था, तब विदुर ने धृतराष्ट्र को चेताया कि जन्म के समय गीदड़ की तरह रोने वाला दुर्योधन भरतवंश का नाश कर देगा। शुक्राचार्य की इस नीति का हवाला देकर कि कुल की रक्षा के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है, सोना उगलने वाले पक्षियों को सताने वाले राजा की कथा और पेड़ों की देखभाल करने वाले माली का उदाहरण देकर उन्होंने राजा से आग्रह किया कि वे दुर्योधन को रोकें, शकुनि को लौटा दें और पाण्डवों के धन के बदले स्वयं पाण्डवों को अपनाएँ।

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वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (2.86.1)

एवं प्रवर्तिते द्यूते घोरे सर्वापहारिणि । सर्वसंशयनिर्मोक्ता विदुरो वाक्यमब्रवीत् ॥

evaṃ pravartite dyūte ghore sarvāpahāriṇi | sarvasaṃśayanirmoktā viduro vākyamabravīt

इस प्रकार जब सब कुछ हर लेने वाला वह भयानक द्यूत चल रहा था, तब सब संशयों को दूर करने वाले विदुर ने यह वचन कहा।

विदुर उवाच

श्लोक 2 (2.86.2)

महाराज विजानीहि यत्त्वां वक्ष्यामि भारत । मुमूर्षोरौषधमिव न रोचेतापि ते श्रुतम् ॥

mahārāja vijānīhi yattvāṃ vakṣyāmi bhārata | mumūrṣorauṣadhamiva na rocetāpi te śrutam

महाराज, हे भारत! मैं जो आपसे कहने जा रहा हूँ उसे समझिए, यद्यपि जैसे मरणासन्न व्यक्ति को औषधि नहीं रुचती, वैसे ही यह सुनना आपको अच्छा नहीं लगेगा।

श्लोक 3 (2.86.3)

यद्वै पुरा जातमात्रो रुराव । गोमायुवद्विस्वरं पापचेताः । दुर्योधनो भारतानां कुलघ्नः । सोऽयं युक्तो भवतां कालहेतुः ॥

yadvai purā jātamātro rurāva | gomāyuvadvisvaraṃ pāpacetāḥ | duryodhano bhāratānāṃ kulaghnaḥ | so'yaṃ yukto bhavatāṃ kālahetuḥ

बहुत पहले, जन्म लेते ही इस पापबुद्धि दुर्योधन ने गीदड़ की तरह कर्कश स्वर में रुदन किया था। यह भरतवंश का नाश करने वाला है; यही आप सबकी मृत्यु का कारण बन गया है।

श्लोक 4 (2.86.4)

गृहे वसन्तं गोमायुं त्वं वै मोहान्न बुध्यसे । दुर्योधनस्य रूपेण शृणु काव्यां गिरं मम ॥

gṛhe vasantaṃ gomāyuṃ tvaṃ vai mohānna budhyase | duryodhanasya rūpeṇa śṛṇu kāvyāṃ giraṃ mama

मोहवश आप नहीं जान पा रहे कि दुर्योधन के रूप में आपके घर में एक गीदड़ रह रहा है। मुझसे शुक्राचार्य की नीति-वाणी सुनिए।

श्लोक 5 (2.86.5)

मधु वै माध्विको लब्ध्वा प्रपातं नैव बुध्यते । आरुह्य तं मज्जति वा पतनं चाधिगच्छति ॥

madhu vai mādhviko labdhvā prapātaṃ naiva budhyate | āruhya taṃ majjati vā patanaṃ cādhigacchati

मधु बटोरने वाला मधु पाकर सामने की खाई को नहीं देखता। वह उसके लिए ऊपर चढ़ जाता है और या तो वहीं विपत्ति में डूब जाता है या नीचे गिर पड़ता है।

श्लोक 6 (2.86.6)

सोऽयं मत्तोऽक्षद्यूतेन मधुवन्न परीक्षते । प्रपातं बुध्यते नैव वैरं कृत्वा महारथैः ॥

so'yaṃ matto'kṣadyūtena madhuvanna parīkṣate | prapātaṃ budhyate naiva vairaṃ kṛtvā mahārathaiḥ

इसी प्रकार यह दुर्योधन पासों के खेल में मतवाला होकर, मधु के लोभी की भाँति, आगे की परख नहीं करता। महारथियों से वैर करके यह अपने सामने के पतन को नहीं देख पाता।

श्लोक 7 (2.86.7)

विदितं मे महाप्राज्ञ भोजेष्वेवासमञ्जसम् । पुत्रं संत्यक्तवान्पूर्वं पौराणां हितकाम्यया ॥

viditaṃ me mahāprājña bhojeṣvevāsamañjasam | putraṃ saṃtyaktavānpūrvaṃ paurāṇāṃ hitakāmyayā

हे महाप्राज्ञ, मैं जानता हूँ कि भोजवंश में एक अयोग्य के साथ क्या हुआ था—प्राचीन काल में पुरवासियों के हित की कामना से एक पुत्र का त्याग कर दिया गया था।

श्लोक 8 (2.86.8)

अन्धका यादवा भोजाः समेताः कंसमत्यजन् । नियोगात्तु हते तस्मिन्कृष्णेनामित्रघातिना ॥

andhakā yādavā bhojāḥ sametāḥ kaṃsamatyajan | niyogāttu hate tasminkṛṣṇenāmitraghātinā

अन्धक, यादव और भोज—सबने मिलकर कंस का परित्याग कर दिया; और जब दैवयोग से शत्रुनाशक कृष्ण ने उसका वध किया,

श्लोक 9 (2.86.9)

एवं ते ज्ञातयः सर्वे मोदमानाः शतं समाः । त्वन्नियुक्तः सव्यसाची निगृह्णातु सुयोधनम् ॥

evaṃ te jñātayaḥ sarve modamānāḥ śataṃ samāḥ | tvanniyuktaḥ savyasācī nigṛhṇātu suyodhanam

तब उसके सब सजातीय सौ वर्षों तक आनन्द से रहे। आपकी आज्ञा पाकर सव्यसाची अर्जुन सुयोधन को वश में करें।

श्लोक 10 (2.86.10)

निग्रहादस्य पापस्य मोदन्तां कुरवः सुखम् । काकेनेमांश्चित्रवर्हाञ्शार्दूलान्क्रोष्टुकेन च । क्रीणीष्व पाण्डवान्राजन्मा मज्जीः शोकसागरे ॥

nigrahādasya pāpasya modantāṃ kuravaḥ sukham | kākenemāṃścitravarhāñśārdūlānkroṣṭukena ca | krīṇīṣva pāṇḍavānrājanmā majjīḥ śokasāgare

इस पापी के निग्रह से कुरुवंशी सुखपूर्वक आनन्द करें। एक कौए के बदले इन मोरों को, एक गीदड़ के बदले इन बाघों को—हे राजन्, पाण्डवों को मोल ले लीजिए और शोक के सागर में मत डूबिए।

श्लोक 11 (2.86.11)

त्यजेत्कुलार्थे पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥

tyajetkulārthe puruṣaṃ grāmasyārthe kulaṃ tyajet | grāmaṃ janapadasyārthe ātmārthe pṛthivīṃ tyajet

कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग कर दे, गाँव के लिए कुल का, जनपद के लिए गाँव का और अपनी आत्मा के लिए पृथ्वी का भी त्याग कर दे।

श्लोक 12 (2.86.12)

सर्वज्ञः सर्वभावज्ञः सर्वशत्रुभयङ्करः । इति स्म भाषते काव्यो जम्भत्यागे महाऽसुरान् ॥

sarvajñaḥ sarvabhāvajñaḥ sarvaśatrubhayaṅkaraḥ | iti sma bhāṣate kāvyo jambhatyāge mahā'surān

सर्वज्ञ, सबके भावों को जानने वाले और सब शत्रुओं को भय देने वाले शुक्राचार्य ने जम्भ के त्याग के समय महान असुरों से यही कहा था।

श्लोक 13 (2.86.13)

हिरण्यष्ठीविनः कांश्चित्पक्षिणो वनगोचरान् । गृहे किल कृतावासाँल्लोभाद्राजा न्यपीडयत् । स चोपभोगलोभान्धो हिरण्यार्थी परन्तप ॥

hiraṇyaṣṭhīvinaḥ kāṃścitpakṣiṇo vanagocarān | gṛhe kila kṛtāvāsām̐llobhādrājā nyapīḍayat | sa copabhogalobhāndho hiraṇyārthī parantapa

कहते हैं, सोना उगलने वाले कुछ वनवासी पक्षी किसी राजा के घर में बसेरा किए हुए थे, और लोभवश राजा ने उन्हें सताया। हे परन्तप, भोग के लोभ में अन्धा और सोने का इच्छुक वह राजा

श्लोक 14 (2.86.14)

आयतिं च तदात्वं च उभे सद्यो व्यनाशयत् । तदर्थकामस्तद्वत्त्वं माद्रुहः पाण्डवान्नृप ॥

āyatiṃ ca tadātvaṃ ca ubhe sadyo vyanāśayat | tadarthakāmastadvattvaṃ mādruhaḥ pāṇḍavānnṛpa

भविष्य और वर्तमान—दोनों को एक साथ नष्ट कर बैठा। इसलिए, हे नृप, उसी की तरह धन की कामना से पाण्डवों से द्रोह मत कीजिए।

श्लोक 15 (2.86.15)

मोहात्मा तप्स्यसे पश्चात्पत्रिहा पुरुषो यथा । जातञ्जातं पाण्डवेभ्यः पुष्पमादत्स्व भारत ॥

mohātmā tapsyase paścātpatrihā puruṣo yathā | jātañjātaṃ pāṇḍavebhyaḥ puṣpamādatsva bhārata

नहीं तो पक्षियों को मारने वाले उस पुरुष की तरह मोह में पड़े आप बाद में पछताएँगे। हे भारत, पाण्डवों से जो-जो फूल खिले, उसे चुनते रहिए,

श्लोक 16 (2.86.16)

मालाकार इवारामे स्नेहं कुर्वन्पुनः पुनः । वृक्षानङ्गारकारीव मैनान्धाक्षीः समूलकान् । मा गमः ससुतामात्यः सबलश्च यमक्षयम् ॥

mālākāra ivārāme snehaṃ kurvanpunaḥ punaḥ | vṛkṣānaṅgārakārīva maināndhākṣīḥ samūlakān | mā gamaḥ sasutāmātyaḥ sabalaśca yamakṣayam

जैसे माली उपवन में बार-बार स्नेह से पेड़ों की देखभाल करता है। कोयला बनाने वाले की तरह इन्हें जड़ समेत मत जलाइए। पुत्रों, मन्त्रियों और सेना सहित यमलोक को मत जाइए।

श्लोक 17 (2.86.17)

समवेतान्हि कः पार्थान्प्रतियुध्येत भारत । मरुद्भिः सहितो राजन्नपि साक्षान्मरुत्पतिः ॥

samavetānhi kaḥ pārthānpratiyudhyeta bhārata | marudbhiḥ sahito rājannapi sākṣānmarutpatiḥ

हे भारत, एकजुट हुए पृथापुत्रों से भला कौन लड़ सकता है? हे राजन्, मरुद्गणों के साथ स्वयं मरुतों के स्वामी इन्द्र भी नहीं।

श्लोक 18 (2.86.18)

द्यूतं मूलं कलहस्याभ्युपैति । मिथो भेदं महते दारुणाय । तदा स्थितोऽयं धृतराष्ट्रस्य पुत्रो । दुर्योधनः सृजते वैरमुग्रम् ॥

dyūtaṃ mūlaṃ kalahasyābhyupaiti | mitho bhedaṃ mahate dāruṇāya | tadā sthito'yaṃ dhṛtarāṣṭrasya putro | duryodhanaḥ sṛjate vairamugram

जुआ कलह की जड़ है; वह आपसी फूट और भयंकर विनाश की ओर ले जाता है। उसी पर अड़ा हुआ धृतराष्ट्र का यह पुत्र दुर्योधन घोर वैर उत्पन्न कर रहा है।

श्लोक 19 (2.86.19)

प्रातिपेयाः शान्तनवा भीमसेनाः सबाह्लिकाः । दुर्योधनापराधेन कृच्छ्रं प्राप्स्यन्ति सर्वशः ॥

prātipeyāḥ śāntanavā bhīmasenāḥ sabāhlikāḥ | duryodhanāparādhena kṛcchraṃ prāpsyanti sarvaśaḥ

प्रतीप के वंशज, शान्तनु के वंशज, भीमसेन के कुल के लोग और बाह्लिक—सभी दुर्योधन के अपराध से घोर संकट में पड़ेंगे।

श्लोक 20 (2.86.20)

दुर्योधनो मदेनैव क्षेमं राष्ट्राद्व्यपोहति । विषाणं गौरिव मदात्स्वयमारुजतात्मनः ॥

duryodhano madenaiva kṣemaṃ rāṣṭrādvyapohati | viṣāṇaṃ gauriva madātsvayamārujatātmanaḥ

दुर्योधन अपने मद से राष्ट्र से कल्याण को दूर भगा रहा है, जैसे मतवाला बैल मद में स्वयं अपना ही सींग तोड़ लेता है।

श्लोक 21 (2.86.21)

यश्चित्तमन्वेति परस्य राजन् । वीरः कविः स्वामवमत्य दृष्टिम् । नावं समुद्र इव बालनेत्रा- । मारुह्य घोरे व्यसने निमज्जेत् ॥

yaścittamanveti parasya rājan | vīraḥ kaviḥ svāmavamatya dṛṣṭim | nāvaṃ samudra iva bālanetrā- | māruhya ghore vyasane nimajjet

हे राजन्, जो वीर और बुद्धिमान होकर भी अपनी दृष्टि की अवहेलना करके दूसरे के मन के पीछे चलता है, वह अनाड़ी नाविक वाली नाव पर समुद्र में उतरे व्यक्ति की तरह घोर विपत्ति में डूब जाता है।

श्लोक 22 (2.86.22)

दुर्योधनो ग्लहते पाण्डवेन । प्रीयायसे त्वं जयतीति तच्च । अतिनर्मा जायते संप्रहारो । यतो विनाशः समुपैति पुंसाम् ॥

duryodhano glahate pāṇḍavena | prīyāyase tvaṃ jayatīti tacca | atinarmā jāyate saṃprahāro | yato vināśaḥ samupaiti puṃsām

दुर्योधन पाण्डव से दाँव लगा रहा है, और "वह जीत रहा है" यह देखकर आप अत्यन्त प्रसन्न हो रहे हैं। ऐसे अति खेल से ही संघर्ष जन्म लेता है, जिससे मनुष्यों का विनाश होता है।

श्लोक 23 (2.86.23)

आकर्षस्तेऽवाक्फलः सुप्रणीतो । हृदि प्रौढो मन्त्रपदः समाधिः । युधिष्ठिरेण कलहस्तवाय- । मचिन्तितोऽभिमतः स्वबन्धुना ॥

ākarṣaste'vākphalaḥ supraṇīto | hṛdi prauḍho mantrapadaḥ samādhiḥ | yudhiṣṭhireṇa kalahastavāya- | macintito'bhimataḥ svabandhunā

आपका यह भली-भाँति रचा गया जुआ नीचे गिराने वाला फल देता है; यह गुप्त मन्त्रणा से हृदय में पकी हुई योजना है। अपने ही बन्धु युधिष्ठिर के साथ यह कलह आपने बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लिया है।

श्लोक 24 (2.86.24)

प्रातिपेयाः शान्तनवाः शृणुध्वं । काव्यां वाचं संसदि कौरवाणाम् । वैश्वानरं प्रज्वलितं सुघोरं । मा यास्यध्वं मन्दमनुप्रपन्नाः ॥

prātipeyāḥ śāntanavāḥ śṛṇudhvaṃ | kāvyāṃ vācaṃ saṃsadi kauravāṇām | vaiśvānaraṃ prajvalitaṃ sughoraṃ | mā yāsyadhvaṃ mandamanuprapannāḥ

हे प्रतीप और शान्तनु के वंशजो, कौरवों की इस सभा में शुक्राचार्य की यह वाणी सुनो: किसी मूर्ख के पीछे चलकर इस प्रचण्ड, धधकती अग्नि में मत जाओ।

श्लोक 25 (2.86.25)

यदा मन्युं पाण्डवोऽजातशत्रु- । र्न संयच्छेदक्षमदाभिभूतः । वृकोदरः सव्यसाची यमौ च । कोऽत्र द्वीपः स्यात्तुमुले वस्तदानीम् ॥

yadā manyuṃ pāṇḍavo'jātaśatru- | rna saṃyacchedakṣamadābhibhūtaḥ | vṛkodaraḥ savyasācī yamau ca | ko'tra dvīpaḥ syāttumule vastadānīm

जब पासों के नशे से अभिभूत अजातशत्रु युधिष्ठिर अपने क्रोध को रोक न सकेंगे, और न वृकोदर भीम, सव्यसाची अर्जुन तथा दोनों जुड़वाँ भाई—तब उस घमासान में तुम्हारा कौन-सा सहारा होगा?

श्लोक 26 (2.86.26)

महाराज प्रभवस्त्वं धनानां । पुरा द्यूतान्मनसा यावदिच्छेः । बहुवित्तान्पाण्डवांश्चेज्जयस्त्वं । किं ते तत्स्याद्वसु विन्देह पार्थान् ॥

mahārāja prabhavastvaṃ dhanānāṃ | purā dyūtānmanasā yāvadiccheḥ | bahuvittānpāṇḍavāṃścejjayastvaṃ | kiṃ te tatsyādvasu vindeha pārthān

महाराज, इस जुए से पहले भी आप मनचाहे धन के स्वामी थे। यदि आपने बहुत धन वाले पाण्डवों को जीत भी लिया, तो उससे आपको क्या मिलेगा? पृथापुत्रों को ही अपना धन बना लीजिए।

श्लोक 27 (2.86.27)

जानीमहे देवितं सौबलस्य । वेद द्यूते निकृतिं पार्वतीयः । यतः प्राप्तः शकुनिस्तत्र यातु । मा यूयुधो भारत पाण्डवेयान् ॥

jānīmahe devitaṃ saubalasya | veda dyūte nikṛtiṃ pārvatīyaḥ | yataḥ prāptaḥ śakunistatra yātu | mā yūyudho bhārata pāṇḍaveyān

हम सुबलपुत्र के खेल को जानते हैं; यह पहाड़ी राजा जुए के छल-कपट में निपुण है। शकुनि जहाँ से आया है, वहीं लौट जाए। हे भारत, पाण्डवों को युद्ध के लिए विवश मत कीजिए।

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