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सौप्तिक पर्व · अध्याय 1

उल्लू और कौए; अश्वत्थामा का भयंकर निश्चय

बचे हुए तीन कौरव योद्धा, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा, पाण्डवों के शिविर से भागकर सूर्यास्त के समय एक घने वन में रुकते हैं और एक विशाल बरगद के नीचे बैठ जाते हैं; बीच में धृतराष्ट्र अपने पुत्र के पतन पर विलाप करते हैं और सञ्जय से पूछते हैं कि उन्होंने क्या किया। रात में कृपाचार्य और कृतवर्मा सो जाते हैं, पर क्रोध से भरा अश्वत्थामा जागता रहता है और देखता है कि एक उल्लू पेड़ पर सोए हुए कौओं को मार डालता है। उल्लू के इस कर्म को शिक्षा मानकर वह सोए हुए पाण्डवों और पाञ्चालों को छल से मार डालने का निश्चय करता है, अपने दोनों साथियों को जगाता है, उन्हें दुर्योधन की मृत्यु और पाण्डवों की विजय की बात बताता है और पूछता है कि तीनों के लिए क्या श्रेयस्कर है।

अध्याय-सूचीअध्याय 2

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (10.1.1)

ततस्ते सहिताः सर्वे प्रयाता दक्षिणामुखाः । उपास्तमयवेलायां शिबिराभ्याशमागताः ॥

tataste sahitāḥ sarve prayātā dakṣiṇāmukhāḥ | upāstamayavelāyāṃ śibirābhyāśamāgatāḥ

तब वे सब एक साथ दक्षिण की ओर मुख करके चले और सूर्यास्त के समय शिविर के निकट पहुँच गए।

श्लोक 2 (10.1.2)

विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीताः समनुबोधनात् । गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते ॥

vimucya vāhāṃstvaritā bhītāḥ samanubodhanāt | gahanaṃ deśamāsādya pracchannā nyaviśanta te

घोड़ों को शीघ्रता से खोलकर, पहचाने जाने के भय से डरे हुए वे एक घने स्थान में पहुँचे और वहाँ छिपकर बैठ गए।

श्लोक 3 (10.1.3)

सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिताः । निकृत्ता निशितैः शस्त्रैः समन्तात्क्षतविक्षताः । दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य पाण्डवानन्वचिन्तयन् ॥

senāniveśamabhito nātidūramavasthitāḥ | nikṛttā niśitaiḥ śastraiḥ samantātkṣatavikṣatāḥ | dīrghamuṣṇaṃ ca niḥśvasya pāṇḍavānanvacintayan

वे शिविर से अधिक दूर नहीं रुके; तीखे शस्त्रों से वे चारों ओर कटे-फटे और घायल थे। लम्बी और गरम साँसें भरते हुए वे पाण्डवों के विषय में सोचने लगे।

श्लोक 4 (10.1.4)

श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्डवानां जयैषिणाम् । अनुसारभयाद्भीताः प्राङ्मुखाः प्राद्रवन्पुनः ॥

śrutvā ca ninadaṃ ghoraṃ pāṇḍavānāṃ jayaiṣiṇām | anusārabhayādbhītāḥ prāṅmukhāḥ prādravanpunaḥ

विजय की इच्छा रखने वाले पाण्डवों का भयानक गर्जन सुनकर, पीछा किए जाने के भय से वे डरे हुए फिर पूर्व की ओर मुख करके भाग चले।

श्लोक 5 (10.1.5)

ते मुहूर्तात्ततो गत्वा श्रान्तवाहाः पिपासिताः । नामृष्यन्त महेष्वासाः क्रोधामर्षवशङ्गताः ॥

te muhūrtāttato gatvā śrāntavāhāḥ pipāsitāḥ | nāmṛṣyanta maheṣvāsāḥ krodhāmarṣavaśaṅgatāḥ

थोड़ी देर आगे जाने पर घोड़े थक गए और वे स्वयं प्यासे हो उठे; वे महान् धनुर्धर क्रोध और अमर्ष के वश में होकर यह सह न सके।

श्लोक 6 (10.1.6)

राज्ञो वधेन सन्तप्ता मुहूर्तं समवस्थिताः ॥

rājño vadhena santaptā muhūrtaṃ samavasthitāḥ

राजा के वध से सन्तप्त होकर वे क्षणभर वहीं ठहरे रहे।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 7 (10.1.7)

अश्रद्धेयमिदं कर्म कृतं भीमेन सञ्जय । यत्स नागायुतप्राणः पुत्रो मम निपातितः ॥

aśraddheyamidaṃ karma kṛtaṃ bhīmena sañjaya | yatsa nāgāyutaprāṇaḥ putro mama nipātitaḥ

सञ्जय! भीम का यह कर्म विश्वास के योग्य नहीं है कि दस हज़ार हाथियों के बल वाले मेरे पुत्र को गिरा दिया गया।

श्लोक 8 (10.1.8)

अवध्यः सर्वभूतानां वज्रसंहननो युवा । पाण्डवैः समरे पुत्रो निहतो मम निपातितः ॥

avadhyaḥ sarvabhūtānāṃ vajrasaṃhanano yuvā | pāṇḍavaiḥ samare putro nihato mama nipātitaḥ

वह किसी भी प्राणी से अवध्य था, तरुण था और उसका शरीर वज्र के समान कठोर था; फिर भी मेरा पुत्र युद्ध में पाण्डवों के हाथों मारा गया, गिरा दिया गया।

श्लोक 9 (10.1.9)

न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक्यं गावल्गणे नरैः । यत्समेत्य रणे पार्थैः पुत्रो मम निपातितः ॥

na diṣṭamabhyatikrāntuṃ śakyaṃ gāvalgaṇe naraiḥ | yatsametya raṇe pārthaiḥ putro mama nipātitaḥ

हे गवल्गण के पुत्र! मनुष्य नियति का उल्लंघन नहीं कर सकते, क्योंकि मेरा पुत्र युद्ध में कुन्ती के पुत्रों से भिड़कर गिरा दिया गया।

श्लोक 10 (10.1.10)

अद्रिसारमयं नूनं हृदयं मम सञ्जय । हतं पुत्रशतं श्रुत्वा यन्न दीर्णं सहस्रधा ॥

adrisāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ mama sañjaya | hataṃ putraśataṃ śrutvā yanna dīrṇaṃ sahasradhā

सञ्जय! मेरा हृदय निश्चय ही पत्थर के सार से बना है, क्योंकि सौ पुत्रों के मारे जाने की बात सुनकर भी वह हज़ार टुकड़े नहीं हो गया।

श्लोक 11 (10.1.11)

कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्रं भविष्यति । न ह्यहं पाण्डुपुत्रस्य विषये वस्तुमुत्सहे ॥

kathaṃ hi vṛddhamithunaṃ hataputraṃ bhaviṣyati | na hyahaṃ pāṇḍuputrasya viṣaye vastumutsahe

जिनके पुत्र मारे जा चुके हैं, ऐसे वृद्ध दम्पति का जीवन कैसे चलेगा? मैं तो पाण्डु के पुत्र के राज्य में रहना सहन नहीं कर सकता।

श्लोक 12 (10.1.12)

कथं राज्ञः पिता भूत्वा स्वयं राजा च सञ्जय । प्रेष्यभूतः प्रवर्तेयं पाण्डवेयस्य शासनात् ॥

kathaṃ rājñaḥ pitā bhūtvā svayaṃ rājā ca sañjaya | preṣyabhūtaḥ pravarteyaṃ pāṇḍaveyasya śāsanāt

सञ्जय! राजा का पिता होकर और स्वयं भी राजा रहकर मैं पाण्डव के शासन में सेवक बनकर कैसे रहूँगा?

श्लोक 13 (10.1.13)

प्रभुज्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्धनि सञ्जय । कथमद्य भविष्यामि श्रोतुं शक्ष्यामि सञ्जय ॥

prabhujya pṛthivīṃ sarvāṃ sthitvā mūrdhani sañjaya | kathamadya bhaviṣyāmi śrotuṃ śakṣyāmi sañjaya

सञ्जय! सारी पृथ्वी का भोग करके और उसके शीर्ष पर प्रतिष्ठित रहकर आज मैं कैसा हो जाऊँगा? सञ्जय! क्या मैं यह सुन सकूँगा?

श्लोक 14 (10.1.14)

येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम । कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्य महात्मनः ॥

yena putraśataṃ pūrṇamekena nihataṃ mama | kṛtaṃ satyaṃ vacastasya vidurasya mahātmanaḥ

जिसने अकेले ही मेरे पूरे सौ पुत्रों को मार डाला, उसने महात्मा विदुर के वचन को सत्य कर दिखाया।

श्लोक 15 (10.1.15)

अकुर्वता वचस्तस्य मम पुत्रेण सञ्जय । अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम ॥

akurvatā vacastasya mama putreṇa sañjaya | adharmeṇa hate tāta putre duryodhane mama

सञ्जय! मेरे पुत्र ने विदुर की बात नहीं मानी; और हे तात! अब जब मेरा पुत्र दुर्योधन अधर्म से मारा गया है,

श्लोक 16 (10.1.16)

कृतवर्मा कृपो द्रौणिः किमकुर्वत सञ्जय ॥

kṛtavarmā kṛpo drauṇiḥ kimakurvata sañjaya

तब कृतवर्मा, कृपाचार्य और द्रोणपुत्र ने क्या किया, सञ्जय?

सञ्जय उवाच

श्लोक 17 (10.1.17)

गत्वा तु तावका राजन्नातिदूरं मनस्विनः । अपश्यन्त वनं घोरं नानाद्रुमलतावृतम् ॥

gatvā tu tāvakā rājannātidūraṃ manasvinaḥ | apaśyanta vanaṃ ghoraṃ nānādrumalatāvṛtam

राजन्! आपके वे उदार पुरुष अधिक दूर नहीं गए थे कि उन्होंने अनेक प्रकार के वृक्षों और लताओं से घिरा हुआ एक भयानक वन देखा।

श्लोक 18 (10.1.18)

ते मुहूर्तं तु विश्रम्य लब्धतोयैर्हयोत्तमैः । सूर्यास्तमयवेलायां कौरवेयस्य शासनात् ॥

te muhūrtaṃ tu viśramya labdhatoyairhayottamaiḥ | sūryāstamayavelāyāṃ kauraveyasya śāsanāt

थोड़ी देर विश्राम करके और अपने उत्तम घोड़ों को पानी पिलाकर वे सूर्यास्त के समय कौरव की आज्ञा के अनुसार आगे बढ़े।

श्लोक 19 (10.1.19)

नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिभिराकुलम् । नानाद्रुमलताच्छन्नं नानाव्यालनिषेवितम् ॥

nānāmṛgagaṇairjuṣṭaṃ nānāpakṣibhirākulam | nānādrumalatācchannaṃ nānāvyālaniṣevitam

वह वन अनेक मृगयूथों से सेवित और अनेक पक्षियों से भरा हुआ था; वह अनेक वृक्षों और लताओं से ढका था और अनेक हिंस्र पशुओं का निवास था।

श्लोक 20 (10.1.20)

नानातोयसमाकीर्णैस्तटाकैरुपशोभितम् । पद्मिनीशतसञ्छन्नं नीलोत्पलसमायुतम् ॥

nānātoyasamākīrṇaistaṭākairupaśobhitam | padminīśatasañchannaṃ nīlotpalasamāyutam

वह अनेक प्रकार के जल से भरे सरोवरों से शोभित था, सैकड़ों कमलिनियों से ढका था और नीले कमलों से भरा हुआ था।

श्लोक 21 (10.1.21)

प्रविश्य तद्वनं घोरं वीक्षमाणाः समन्ततः । शाखासहस्रसञ्छन्नं न्यग्रोधं ददृशुस्ततः ॥

praviśya tadvanaṃ ghoraṃ vīkṣamāṇāḥ samantataḥ | śākhāsahasrasañchannaṃ nyagrodhaṃ dadṛśustataḥ

उस भयानक वन में प्रवेश करके चारों ओर देखते हुए उन्होंने तब हज़ारों शाखाओं से ढका हुआ एक बरगद देखा।

श्लोक 22 (10.1.22)

उपेत्य तु तदा राजन्न्यग्रोधं ते महारथाः । ददृशुर्द्विपदां श्रेष्ठाः श्रेष्ठं तं वै वनस्पतिम् ॥

upetya tu tadā rājannyagrodhaṃ te mahārathāḥ | dadṛśurdvipadāṃ śreṣṭhāḥ śreṣṭhaṃ taṃ vai vanaspatim

राजन्! उस बरगद के पास पहुँचकर उन श्रेष्ठ महारथियों ने वनस्पतियों में उस श्रेष्ठ वृक्ष को देखा।

श्लोक 23 (10.1.23)

तेऽवतीर्य रथेभ्यश्च विप्रमुच्य च वाजिनः । उपस्पृश्य यथान्यायं सन्ध्यामन्वासत प्रभो ॥

te'vatīrya rathebhyaśca vipramucya ca vājinaḥ | upaspṛśya yathānyāyaṃ sandhyāmanvāsata prabho

वे रथों से उतरे और घोड़ों को खोलकर, विधिपूर्वक आचमन करके, हे प्रभो! सन्ध्योपासना में बैठ गए।

श्लोक 24 (10.1.24)

ततोऽस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे । सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी प्रत्यपद्यत ॥

tato'staṃ parvataśreṣṭhamanuprāpte divākare | sarvasya jagato dhātrī śarvarī pratyapadyata

फिर जब सूर्य पर्वतश्रेष्ठ अस्ताचल पर पहुँच गया, तब सम्पूर्ण जगत् को पालने वाली रात्रि आ पहुँची।

श्लोक 25 (10.1.25)

ग्रहनक्षत्रताराभिः प्रकीर्णाभिरलङ्कृतम् । नभोऽंशुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥

grahanakṣatratārābhiḥ prakīrṇābhiralaṅkṛtam | nabho'ṃśukamivābhāti prekṣaṇīyaṃ samantataḥ

ग्रहों, नक्षत्रों और बिखरे हुए तारों से सजा आकाश चारों ओर देखने योग्य होकर महीन वस्त्र के समान शोभित हो रहा था।

श्लोक 26 (10.1.26)

इच्छया ते प्रवल्गन्ति ये सत्वा रात्रिचारिणः । दिवाचराश्च ये सत्वास्ते निद्रावशमागताः ॥

icchayā te pravalganti ye satvā rātricāriṇaḥ | divācarāśca ye satvāste nidrāvaśamāgatāḥ

जो प्राणी रात में विचरते हैं वे अपनी इच्छा से उछलने-कूदने लगे और जो दिन में विचरते हैं वे निद्रा के वश में हो गए।

श्लोक 27 (10.1.27)

रात्रिञ्चराणां सत्वानां निनादोऽभूत्सुदारुणः । क्रव्यादाश्च प्रमुदिता घोरा प्राप्ता च शर्वरी ॥

rātriñcarāṇāṃ satvānāṃ ninādo'bhūtsudāruṇaḥ | kravyādāśca pramuditā ghorā prāptā ca śarvarī

रात में घूमने वाले प्राणियों का भयंकर कोलाहल उठा; मांसभक्षी प्रसन्न हो उठे, क्योंकि भयानक रात आ गई थी।

श्लोक 28 (10.1.28)

तस्मिन्रात्रिमुखे घोरे दुःखशोकसमन्विताः । कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशुः समम् ॥

tasminrātrimukhe ghore duḥkhaśokasamanvitāḥ | kṛtavarmā kṛpo drauṇirupopaviviśuḥ samam

रात के उस भयानक आरम्भ में दुःख और शोक से भरे हुए कृतवर्मा, कृपाचार्य और द्रोणपुत्र साथ-साथ बैठ गए।

श्लोक 29 (10.1.29)

उपोपविष्टाः शोचन्तो न्यग्रोधस्य समीपतः । तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवयोः क्षयम् ॥

upopaviṣṭāḥ śocanto nyagrodhasya samīpataḥ | tamevārthamatikrāntaṃ kurupāṇḍavayoḥ kṣayam

बरगद के समीप बैठकर वे शोक करते हुए उसी बीती हुई बात पर, कौरवों और पाण्डवों के विनाश पर, विचार करते रहे।

श्लोक 30 (10.1.30)

निद्रया च परीताङ्गा निषेदुर्धरणीतले । श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधैः शरैः ॥

nidrayā ca parītāṅgā niṣedurdharaṇītale | śrameṇa sudṛḍhaṃ yuktā vikṣatā vividhaiḥ śaraiḥ

निद्रा से उनके अंग शिथिल हो गए और वे धरती पर बैठ गए; थकान ने उन्हें कसकर जकड़ लिया था और वे अनेक प्रकार के बाणों से घायल थे।

श्लोक 31 (10.1.31)

ततो निद्रावशं प्राप्तौ कृपभोजौ महाबलौ । सुखोचितावदुःखार्हौ निषण्णौ धरणीतले ॥

tato nidrāvaśaṃ prāptau kṛpabhojau mahābalau | sukhocitāvaduḥkhārhau niṣaṇṇau dharaṇītale

तब वे दोनों महाबली कृपाचार्य और भोज (कृतवर्मा) निद्रा के वश में हो गए; वे सुख के अभ्यासी थे और कष्ट के योग्य नहीं थे, फिर भी धरती पर लेट गए।

श्लोक 32 (10.1.32)

तौ तु सुप्तौ महाराज तस्मिन्देशे महारथौ । महार्हशयनोपेतौ भूमावेव ह्यनाथवत् ॥

tau tu suptau mahārāja tasmindeśe mahārathau | mahārhaśayanopetau bhūmāveva hyanāthavat

महाराज! वे दोनों महारथी उस स्थान पर सो गए; वे बहुमूल्य शय्याओं के अभ्यस्त थे, फिर भी अनाथों के समान नंगी धरती पर पड़े थे।

श्लोक 33 (10.1.33)

क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत । न वै स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन् ॥

krodhāmarṣavaśaṃ prāpto droṇaputrastu bhārata | na vai sma sa jagāmātha nidrāṃ sarpa iva śvasan

भारत! परन्तु द्रोणपुत्र क्रोध और अमर्ष के वश में था; वह साँप की तरह फुफकारता रहा और उसे नींद नहीं आई।

श्लोक 34 (10.1.34)

न लेभे स तु निद्रां वै दह्यमानोऽतिमन्युना । वीक्षाञ्चक्रे महाबाहुस्तद्वनं घोरदर्शनम् ॥

na lebhe sa tu nidrāṃ vai dahyamāno'timanyunā | vīkṣāñcakre mahābāhustadvanaṃ ghoradarśanam

अत्यन्त क्रोध से जलते हुए उसे नींद नहीं आई; उस महाबाहु ने उस भयंकर दिखने वाले वन को चारों ओर देखा।

श्लोक 35 (10.1.35)

वीक्षमाणो वनोद्देशं नानासत्वैर्निषेवितम् । अपश्यत महाबाहुर्न्यग्रोधं वायसावृतम् ॥

vīkṣamāṇo vanoddeśaṃ nānāsatvairniṣevitam | apaśyata mahābāhurnyagrodhaṃ vāyasāvṛtam

अनेक प्रकार के प्राणियों से सेवित उस वन-प्रदेश को देखते हुए उस महाबाहु ने कौओं से भरा हुआ बरगद देखा।

श्लोक 36 (10.1.36)

तत्र काकसहस्राणि तां निशां पर्यणामयन् । सुखं स्वपन्तः कौरव्य पृथक्पृथगुपाश्रयाः ॥

tatra kākasahasrāṇi tāṃ niśāṃ paryaṇāmayan | sukhaṃ svapantaḥ kauravya pṛthakpṛthagupāśrayāḥ

कुरुवंशी राजन्! वहाँ हज़ारों कौए अलग-अलग अपने आश्रयों में सुख से सोते हुए वह रात बिता रहे थे।

श्लोक 37 (10.1.37)

सुप्तेषु तेषु काकेषु विस्रब्धेषु समन्ततः । सोऽपश्यत्सहसा यान्तमुलूकं घोरदर्शनम् ॥

supteṣu teṣu kākeṣu visrabdheṣu samantataḥ | so'paśyatsahasā yāntamulūkaṃ ghoradarśanam

जब वे कौए चारों ओर निश्चिन्त होकर सो गए, तब उसने अचानक एक भयंकर दिखने वाले उल्लू को आते देखा।

श्लोक 38 (10.1.38)

महास्वनं महाकायं हर्यक्षं बभ्रुपिङ्गलम् । सुतीक्ष्णघोणानखरं सुपर्णमिव वेगितम् ॥

mahāsvanaṃ mahākāyaṃ haryakṣaṃ babhrupiṅgalam | sutīkṣṇaghoṇānakharaṃ suparṇamiva vegitam

वह ऊँची आवाज़ वाला और विशाल शरीर का था, उसकी आँखें पीली-सी और रंग भूरा-पीला था, उसकी चोंच और नाखून बहुत तीखे थे और वह गरुड़ के समान वेगवान् था।

श्लोक 39 (10.1.39)

सोऽथ शब्दं मृदुं कृत्वा लीयमान इवाण्डजः । न्यग्रोधस्य ततः शाखां पातयामास भारत ॥

so'tha śabdaṃ mṛduṃ kṛtvā līyamāna ivāṇḍajaḥ | nyagrodhasya tataḥ śākhāṃ pātayāmāsa bhārata

भारत! धीमी आवाज़ करता हुआ, छिपते हुए पक्षी के समान, वह बरगद की एक शाखा पर उतर आया।

श्लोक 40 (10.1.40)

सन्निपत्य तु शाखायां न्यग्रोधस्य विहङ्गमः । सुप्ताञ्जघान विस्रब्धान्वायसान्वायसान्तकः ॥

sannipatya tu śākhāyāṃ nyagrodhasya vihaṅgamaḥ | suptāñjaghāna visrabdhānvāyasānvāyasāntakaḥ

बरगद की शाखा पर उतरकर कौओं का वह संहारक पक्षी सोए हुए और निश्चिन्त कौओं को मारने लगा।

श्लोक 41 (10.1.41)

केषाञ्चिदच्छिनत्पक्षाञ्शिरांसि च चकर्त ह । चरणांश्चैव केषाञ्चिद्बभञ्ज चरणायुधः ॥

keṣāñcidacchinatpakṣāñśirāṃsi ca cakarta ha | caraṇāṃścaiva keṣāñcidbabhañja caraṇāyudhaḥ

किन्हीं के पंख उसने काट डाले, किन्हीं के सिर काट दिए और किन्हीं के पैर तोड़ दिए, क्योंकि उसके पंजे ही उसके हथियार थे।

श्लोक 42 (10.1.42)

क्षणेनाघ्नत्स बलवान्येऽस्य दृष्टिपथे स्थिताः ॥

kṣaṇenāghnatsa balavānye'sya dṛṣṭipathe sthitāḥ

उस बलवान् पक्षी ने क्षणभर में उन सबको मार डाला जो उसकी दृष्टि के सामने थे।

श्लोक 43 (10.1.43)

तेषां शरीरावयवैः शरीरैश्च विशाम्पते । न्यग्रोधमण्डलं सर्वं सञ्छन्नं पर्वतोपमम् ॥

teṣāṃ śarīrāvayavaiḥ śarīraiśca viśāmpate | nyagrodhamaṇḍalaṃ sarvaṃ sañchannaṃ parvatopamam

हे प्रजापति! उन कौओं के शरीरों और शरीरों के टुकड़ों से बरगद का सारा घेरा पर्वत के समान ढक गया।

श्लोक 44 (10.1.44)

तांस्तु हत्वा ततः काकान्कौशिको मुदितोऽभवत् । प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदनः ॥

tāṃstu hatvā tataḥ kākānkauśiko mudito'bhavat | pratikṛtya yathākāmaṃ śatrūṇāṃ śatrusūdanaḥ

उन कौओं को मारकर शत्रुओं का संहार करने वाला वह उल्लू प्रसन्न हो गया; उसने अपनी इच्छा भर शत्रुओं से बदला ले लिया था।

श्लोक 45 (10.1.45)

तद्दृष्ट्वा तादृशं कर्म कौशिकेन कृतं निशि । तद्भावे कृतसङ्कल्पो द्रौणिरेकोऽन्वचिन्तयत् ॥

taddṛṣṭvā tādṛśaṃ karma kauśikena kṛtaṃ niśi | tadbhāve kṛtasaṅkalpo drauṇireko'nvacintayat

रात में उल्लू के किए उस कर्म को देखकर, उसी के अनुसार निश्चय कर चुका द्रोणपुत्र अकेला विचार करने लगा।

श्लोक 46 (10.1.46)

उपदेशः कृतोऽनेन पक्षिणा मम संयुगे । शत्रूणां क्षपणं युक्तं प्राप्तः कालश्च मे मतः ॥

upadeśaḥ kṛto'nena pakṣiṇā mama saṃyuge | śatrūṇāṃ kṣapaṇaṃ yuktaṃ prāptaḥ kālaśca me mataḥ

उसने सोचा: इस पक्षी ने मुझे युद्ध में उपदेश दे दिया है। शत्रुओं का संहार करना उचित है, और मेरे विचार में उसका समय आ गया है।

श्लोक 47 (10.1.47)

नाद्य शक्यं मया हन्तुं पाण्डवा जितकाशिनः । बलवन्तः कृतोत्साहा लब्धलक्षाः प्रहारिणः ॥

nādya śakyaṃ mayā hantuṃ pāṇḍavā jitakāśinaḥ | balavantaḥ kṛtotsāhā labdhalakṣāḥ prahāriṇaḥ

आज मैं पाण्डवों को नहीं मार सकता; वे विजयी हैं, बलवान् हैं, उत्साह से भरे हैं, उनका निशाना अचूक है और वे सधे हुए प्रहार करने वाले हैं।

श्लोक 48 (10.1.48)

राज्ञः सकाशे तेषां च प्रतिज्ञातो वधो मया । पतङ्गाग्निसमां वृत्तिमास्यायात्मविनाशिनीम् ॥

rājñaḥ sakāśe teṣāṃ ca pratijñāto vadho mayā | pataṅgāgnisamāṃ vṛttimāsyāyātmavināśinīm

मैंने राजा के सामने उनके वध की प्रतिज्ञा की थी; किन्तु पतंगे और अग्नि के समान आचरण अपनाना तो अपना ही नाश करना है।

श्लोक 49 (10.1.49)

न्यायतो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशयः । छद्मना तु भवेत्सिद्धिः शत्रूणां च क्षयो महान् ॥

nyāyato yudhyamānasya prāṇatyāgo na saṃśayaḥ | chadmanā tu bhavetsiddhiḥ śatrūṇāṃ ca kṣayo mahān

जो न्याय से युद्ध करता है उसके प्राण जाना निश्चित है; किन्तु छल से सफलता मिल सकती है और शत्रुओं का बड़ा विनाश हो सकता है।

श्लोक 50 (10.1.50)

तत्र संशयितादर्थाद्योऽर्थो निःसंशयो भवेत् । तं जना बहुमन्यन्ते येऽर्थशास्त्रविशारदाः ॥

tatra saṃśayitādarthādyo'rtho niḥsaṃśayo bhavet | taṃ janā bahumanyante ye'rthaśāstraviśāradāḥ

संदिग्ध लाभ और निश्चित लाभ में से जो लाभ निःसन्देह हो, उसी को अर्थशास्त्र के जानकार लोग अधिक मानते हैं।

श्लोक 51 (10.1.51)

यच्चाप्यत्र भवेत्कार्यं गर्हितं लोकनिन्दितम् । कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता ॥

yaccāpyatra bhavetkāryaṃ garhitaṃ lokaninditam | kartavyaṃ tanmanuṣyeṇa kṣatradharmeṇa vartatā

और जो कर्म निन्दनीय तथा लोक में निन्दित कहा जाए, क्षत्रिय-धर्म का पालन करने वाले मनुष्य को वह भी करना चाहिए।

श्लोक 52 (10.1.52)

निन्दितानि च कर्माणि कुत्सितानि पदेपदे । सोपधानि कृतान्येव पाण्डवैरकृतात्मभिः ॥

ninditāni ca karmāṇi kutsitāni padepade | sopadhāni kṛtānyeva pāṇḍavairakṛtātmabhiḥ

संयम न रखने वाले पाण्डवों ने पग-पग पर निन्दनीय और घृणित कर्म छल के साथ किए ही हैं।

श्लोक 53 (10.1.53)

अस्मिन्नर्थे पुरा गीताः श्रूयन्ते धर्मवित्तमैः । श्लोका न्यायमवेक्षद्भिस्तत्त्वार्थास्तत्त्वदर्शिभिः ॥

asminnarthe purā gītāḥ śrūyante dharmavittamaiḥ | ślokā nyāyamavekṣadbhistattvārthāstattvadarśibhiḥ

इस विषय में पहले के धर्मज्ञ श्रेष्ठ पुरुषों के गाए हुए श्लोक सुने जाते हैं, जो नीति को देखने वाले तत्त्वदर्शियों के रचे हैं और यथार्थ अर्थ वाले हैं।

श्लोक 54 (10.1.54)

परिश्रान्ते विदीर्णे वा भुञ्जाने वाऽपि शत्रुभिः । प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रहर्तव्यं रिपोर्बलम् ॥

pariśrānte vidīrṇe vā bhuñjāne vā'pi śatrubhiḥ | prasthāne vā praveśe vā prahartavyaṃ riporbalam

शत्रु की सेना पर तब प्रहार करना चाहिए जब वह थकी हुई हो, या बिखर गई हो, या भोजन कर रही हो, या प्रस्थान कर रही हो, या कहीं प्रवेश कर रही हो।

श्लोक 55 (10.1.55)

निद्रार्तमर्धरात्रे च तथा नष्टप्रणायकम् । भिन्नयोधं बलं यच्च द्विधा युक्तं च यद्भवेत् ॥

nidrārtamardharātre ca tathā naṣṭapraṇāyakam | bhinnayodhaṃ balaṃ yacca dvidhā yuktaṃ ca yadbhavet

या जब वह आधी रात को नींद से दबी हो, या उसका नायक नष्ट हो गया हो, या उसके योद्धा आपस में फूट गए हों, या वह दो भागों में बँट गई हो।

श्लोक 56 (10.1.56)

इत्येवं निश्चयं चक्रे सुप्तानां निशि मारणे । पाण्डूनां सह पाञ्चालैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ॥

ityevaṃ niścayaṃ cakre suptānāṃ niśi māraṇe | pāṇḍūnāṃ saha pāñcālairdroṇaputraḥ pratāpavān

इस प्रकार प्रतापी द्रोणपुत्र ने रात में सोए हुए पाण्डवों को पाञ्चालों के साथ मार डालने का निश्चय कर लिया।

श्लोक 57 (10.1.57)

स क्रूरां मतिमास्थाय विनिश्चित्य मुहुर्मुहुः । सुप्तौ प्राबोधयत्तौ तु मातुलं भोजमेव च ॥

sa krūrāṃ matimāsthāya viniścitya muhurmuhuḥ | suptau prābodhayattau tu mātulaṃ bhojameva ca

उस क्रूर विचार को अपनाकर और बार-बार निश्चय करके उसने सोए हुए अपने मामा और भोज को जगाया।

श्लोक 58 (10.1.58)

तौ प्रबुद्धौ महात्मानौ कृपभोजौ महाबलौ । नोत्तरं प्रतिपद्येतां तत्र युक्तं हिया वृतौ ॥

tau prabuddhau mahātmānau kṛpabhojau mahābalau | nottaraṃ pratipadyetāṃ tatra yuktaṃ hiyā vṛtau

वे दोनों महात्मा और महाबली कृपाचार्य तथा भोज जागे, किन्तु लज्जा से घिरे होने के कारण कोई उचित उत्तर न दे सके।

श्लोक 59 (10.1.59)

स मुहूर्तमिव ध्यात्वा तावुभौ वाक्यमब्रवीत् ॥

sa muhūrtamiva dhyātvā tāvubhau vākyamabravīt

क्षणभर सोचकर उसने उन दोनों से कहा।

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 60 (10.1.60)

हतो दुर्योधनो राजा एकवीरो महाबलः । यस्यार्थे वैरमस्माभिरासक्तं पाण्डवैः सह ॥

hato duryodhano rājā ekavīro mahābalaḥ | yasyārthe vairamasmābhirāsaktaṃ pāṇḍavaiḥ saha

राजा दुर्योधन मारा गया, वह अकेला महाबली वीर, जिसके लिए हमने पाण्डवों के साथ वैर बाँधा था।

श्लोक 61 (10.1.61)

एकाकी बहुभिः क्षुद्रैराहवे शुद्धविक्रमः । पातितो भीमसेनेन एकादशचमूपतिः ॥

ekākī bahubhiḥ kṣudrairāhave śuddhavikramaḥ | pātito bhīmasenena ekādaśacamūpatiḥ

ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं का वह स्वामी, शुद्ध पराक्रम वाला, युद्ध में अकेला था और अनेक नीच लोगों के बीच भीमसेन के हाथों गिराया गया।

श्लोक 62 (10.1.62)

वृकोदरेण क्षुद्रेण सुनृशंसमिदं कृतम् । मूर्धाभिषिक्तस्य शिरः पादेन परिमृद्नता ॥

vṛkodareṇa kṣudreṇa sunṛśaṃsamidaṃ kṛtam | mūrdhābhiṣiktasya śiraḥ pādena parimṛdnatā

नीच वृकोदर ने यह अत्यन्त क्रूर कर्म किया कि उसने अभिषिक्त राजा के सिर को पैर से कुचला।

श्लोक 63 (10.1.63)

विनर्दन्ति च पाञ्चालाः क्ष्वेलन्ति च हसन्ति च । धमन्ति शङ्खाञ्शतशो हृष्टा घ्नन्ति च दुन्दुभीन् ॥

vinardanti ca pāñcālāḥ kṣvelanti ca hasanti ca | dhamanti śaṅkhāñśataśo hṛṣṭā ghnanti ca dundubhīn

पाञ्चाल गरज रहे हैं, ठट्ठा कर रहे हैं और हँस रहे हैं; वे हर्ष में भरकर सैकड़ों शंख बजा रहे हैं और नगाड़े पीट रहे हैं।

श्लोक 64 (10.1.64)

वादित्रघोषस्तुमुलो विमिश्रः शङ्खनिःस्वनैः । अनिलेनेरितो घोरो दिशः पूरयतीव ह ॥

vāditraghoṣastumulo vimiśraḥ śaṅkhaniḥsvanaiḥ | anilenerito ghoro diśaḥ pūrayatīva ha

शंखों की ध्वनि में मिला हुआ वाद्यों का तुमुल घोष हवा के साथ फैलकर मानो दिशाओं को भर रहा है।

श्लोक 65 (10.1.65)

अश्वानां हेषमाणानां गजानां चैव बृंहताम् । सिंहनादश्च शूराणां श्रूयते सुमहानयम् ॥

aśvānāṃ heṣamāṇānāṃ gajānāṃ caiva bṛṃhatām | siṃhanādaśca śūrāṇāṃ śrūyate sumahānayam

घोड़ों की हिनहिनाहट, हाथियों की चिंघाड़ और वीरों की सिंहगर्जना, यह विशाल कोलाहल सुनाई दे रहा है।

श्लोक 66 (10.1.66)

दिशं प्राचीं समाश्रित्य हृष्टानां गच्छतां भृशम् । रथनेमिस्वनाश्चैव श्रूयन्ते रोमहर्षणाः ॥

diśaṃ prācīṃ samāśritya hṛṣṭānāṃ gacchatāṃ bhṛśam | rathanemisvanāścaiva śrūyante romaharṣaṇāḥ

हर्ष से भरे लोग तेज़ी से पूर्व दिशा की ओर जा रहे हैं, और उनके रथों के पहियों की रोंगटे खड़े कर देने वाली ध्वनि सुनाई दे रही है।

श्लोक 67 (10.1.67)

पाण्डवैर्धार्तराष्ट्राणां यदिदं कदनं कृतम् । वयमेव त्रयः शिष्टा अस्मिन्महति वैशसे ॥

pāṇḍavairdhārtarāṣṭrāṇāṃ yadidaṃ kadanaṃ kṛtam | vayameva trayaḥ śiṣṭā asminmahati vaiśase

पाण्डवों ने धृतराष्ट्र के पुत्रों का जो यह संहार किया है, उस महान् विनाश में केवल हम तीन ही बचे हैं।

श्लोक 68 (10.1.68)

केचिन्नागशतप्राणाः केचित्सर्वास्त्रकोविदाः । निहताः पाण्डवैर्यस्मिन्मन्ये कालस्य पर्ययम् ॥

kecinnāgaśataprāṇāḥ kecitsarvāstrakovidāḥ | nihatāḥ pāṇḍavairyasminmanye kālasya paryayam

कुछ सौ हाथियों के बल वाले थे, कुछ सब अस्त्रों के ज्ञाता थे, फिर भी वे पाण्डवों के हाथों मारे गए; मैं इसे काल का उलटफेर मानता हूँ।

श्लोक 69 (10.1.69)

एवमेतेन भाव्यं हि नूनं कार्येण तत्त्वतः । यथा ह्यस्येदृशी निष्ठा कृते यत्नेऽपि दुष्करे ॥

evametena bhāvyaṃ hi nūnaṃ kāryeṇa tattvataḥ | yathā hyasyedṛśī niṣṭhā kṛte yatne'pi duṣkare

निश्चय ही यथार्थ में ऐसा ही होना था, क्योंकि कठिन कार्य में प्रयत्न किए जाने पर भी उसका ऐसा ही अन्त हुआ है।

श्लोक 70 (10.1.70)

भवतोस्तु यदि प्रज्ञा न मोहादपचीयते । व्यसनेऽस्मिन्महत्यर्थे यन्नः श्रेयस्तदुच्यताम् ॥

bhavatostu yadi prajñā na mohādapacīyate | vyasane'sminmahatyarthe yannaḥ śreyastaducyatām

यदि मोह से आपकी बुद्धि क्षीण नहीं हुई है, तो इस महान् संकट में हमारे लिए जो श्रेयस्कर हो, वह कहिए।

अध्याय-सूचीअध्याय 2