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सौप्तिक पर्व · अध्याय 2

कृपाचार्य का अश्वत्थामा को परामर्श

कृपाचार्य अश्वत्थामा की योजना का उत्तर देते हैं। वे समझाते हैं कि मनुष्यों के सब काम दैव और पुरुषार्थ, इन दो पर टिके हैं और एक के बिना दूसरा सफल नहीं होता; उदाहरण के लिए वे वर्षा और जुते हुए खेत की बात कहते हैं। वे समर्थ पुरुषों के उद्यम की प्रशंसा करते हैं, कर्म आरम्भ करने से पहले वृद्धों से पूछने का उपदेश देते हैं और कहते हैं कि दुर्योधन ने लोभ के कारण, सब सलाह के विरुद्ध और अपनी सामर्थ्य से बाहर यह युद्ध आरम्भ किया था। कृपाचार्य मानते हैं कि इस विपत्ति से उनकी अपनी बुद्धि भी उलझ गई है, और प्रस्ताव रखते हैं कि वे तीनों धृतराष्ट्र, गान्धारी और विदुर के पास जाकर पूछें कि क्या करना चाहिए।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

कृप उवाच

श्लोक 1 (10.2.1)

श्रुतं ते वचनं सर्वं हेतुयुक्तं मया विभो । ममापि तु वचः किञ्चिच्छृणुष्वाद्य महाभुज ॥

śrutaṃ te vacanaṃ sarvaṃ hetuyuktaṃ mayā vibho | mamāpi tu vacaḥ kiñcicchṛṇuṣvādya mahābhuja

हे विभो! मैंने आपकी सारी बात सुन ली है, वह युक्तियुक्त है। हे महाबाहो! अब मेरी भी कुछ बात आज सुनिए।

श्लोक 2 (10.2.2)

आबद्धा मानुषाः सर्वे निबद्धाः कर्मणोर्द्वयोः । दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते ॥

ābaddhā mānuṣāḥ sarve nibaddhāḥ karmaṇordvayoḥ | daive puruṣakāre ca paraṃ tābhyāṃ na vidyate

सब मनुष्य दो ही बन्धनों से बँधे हैं, दैव और पुरुषार्थ; इन दोनों से परे कुछ नहीं है।

श्लोक 3 (10.2.3)

न हि दैवेन सिध्यन्ति कार्याण्येकेन सत्तम । न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धिस्तु योगतः ॥

na hi daivena sidhyanti kāryāṇyekena sattama | na cāpi karmaṇaikena dvābhyāṃ siddhistu yogataḥ

हे सत्तम! कार्य न केवल दैव से सिद्ध होते हैं और न केवल कर्म से; सिद्धि तो दोनों के संयोग से होती है।

श्लोक 4 (10.2.4)

ताभ्यामुभाभ्यां सर्वार्था निबद्धा अधमोत्तमाः । प्रवृत्ताश्चैव दृश्यन्ते निवृत्ताश्चैव सर्वशः ॥

tābhyāmubhābhyāṃ sarvārthā nibaddhā adhamottamāḥ | pravṛttāścaiva dṛśyante nivṛttāścaiva sarvaśaḥ

छोटे-बड़े सब प्रयोजन इन्हीं दोनों से बँधे हैं; इन्हीं के कारण मनुष्य सब प्रकार से प्रवृत्त होते और निवृत्त होते दिखाई देते हैं।

श्लोक 5 (10.2.5)

पर्जन्यः पर्वते वर्षन्किन्नु साधयते फलम् । कृष्टे क्षेत्रे तथा वर्षन्किं न साधयते फलम् ॥

parjanyaḥ parvate varṣankinnu sādhayate phalam | kṛṣṭe kṣetre tathā varṣankiṃ na sādhayate phalam

पर्वत पर बरसता हुआ मेघ कौन-सा फल उत्पन्न करता है? और जुते हुए खेत में बरसकर क्या वह फल नहीं उत्पन्न करता?

श्लोक 6 (10.2.6)

उत्थानं चापि दैवस्य ह्यनुत्थानं च दैवतम् । व्यर्थं भवति सर्वत्र पूर्वस्तत्र विनिश्चयः ॥

utthānaṃ cāpi daivasya hyanutthānaṃ ca daivatam | vyarthaṃ bhavati sarvatra pūrvastatra viniścayaḥ

दैव के भरोसे किया गया उद्यम और उद्यम का अभाव, जो दैव का क्षेत्र है, दोनों सर्वत्र व्यर्थ होते हैं; इस विषय में पहला पक्ष ही निश्चित सिद्धान्त है।

श्लोक 7 (10.2.7)

सुवृष्टे च यथा देवे सम्यक् क्षेत्रे च कर्षिते । बीजं महागुणं भूयात्तथा सिद्धिर्हि मानुषी ॥

suvṛṣṭe ca yathā deve samyak kṣetre ca karṣite | bījaṃ mahāguṇaṃ bhūyāttathā siddhirhi mānuṣī

जब वर्षा भली प्रकार हो चुकी हो और खेत ठीक से जोता गया हो, तब बीज बड़ी उपज देता है; मनुष्य की सिद्धि भी ऐसी ही है।

श्लोक 8 (10.2.8)

तयोर्दैवं तु दुश्चिन्त्यं स्ववशेनैव वर्तते । प्राज्ञाः पुरुषकारे तु वर्तन्ते देवमास्थिताः ॥

tayordaivaṃ tu duścintyaṃ svavaśenaiva vartate | prājñāḥ puruṣakāre tu vartante devamāsthitāḥ

इन दोनों में दैव को समझना कठिन है और वह अपनी इच्छा से ही चलता है; किन्तु बुद्धिमान् लोग दैव का आश्रय लेकर पुरुषार्थ में लगते हैं।

श्लोक 9 (10.2.9)

ताभ्यां सर्वे हि कार्यार्था मनुष्याणां नरर्षभ । विचेष्टन्तः स्म दृश्यन्ते निवृत्तास्तु तथैव च ॥

tābhyāṃ sarve hi kāryārthā manuṣyāṇāṃ nararṣabha | viceṣṭantaḥ sma dṛśyante nivṛttāstu tathaiva ca

हे नरश्रेष्ठ! मनुष्यों के सब प्रयोजन इन्हीं दोनों के द्वारा चेष्टा करते हुए दिखाई देते हैं, और उसी प्रकार छूटते हुए भी।

श्लोक 10 (10.2.10)

कृतः पुरुषकारश्च सोऽपि दैवेन सिध्यति । तथास्य कर्मणः कर्तुरभिनिर्वर्तते फलम् ॥

kṛtaḥ puruṣakāraśca so'pi daivena sidhyati | tathāsya karmaṇaḥ karturabhinirvartate phalam

किया हुआ पुरुषार्थ भी दैव से ही सिद्ध होता है; इसी प्रकार कर्ता के कर्म का फल प्रकट होता है।

श्लोक 11 (10.2.11)

उत्थानं च मनुष्याणां दक्षाणां दैववर्जितम् । अफलं दृश्यते लोके सम्यगप्युपपादितम् ॥

utthānaṃ ca manuṣyāṇāṃ dakṣāṇāṃ daivavarjitam | aphalaṃ dṛśyate loke samyagapyupapāditam

समर्थ मनुष्यों का उद्यम, यदि उसमें दैव का साथ न हो, तो ठीक से सम्पन्न किए जाने पर भी संसार में निष्फल दिखाई देता है।

श्लोक 12 (10.2.12)

तत्रालसा मनुष्याणां ये भवन्त्यमनस्विनः । उत्थानं ते विगर्हन्ति प्राज्ञानां तन्न रोचते ॥

tatrālasā manuṣyāṇāṃ ye bhavantyamanasvinaḥ | utthānaṃ te vigarhanti prājñānāṃ tanna rocate

इस विषय में जो मनुष्य आलसी और मन के दुर्बल हैं, वे उद्यम की निन्दा करते हैं; ज्ञानियों को यह बात नहीं रुचती।

श्लोक 13 (10.2.13)

प्रायशो हि कृतं कर्म नाफलं दृश्यते भुवि । अकृत्वा च पुनर्दुःखं कर्म पश्येन्महाफलम् ॥

prāyaśo hi kṛtaṃ karma nāphalaṃ dṛśyate bhuvi | akṛtvā ca punarduḥkhaṃ karma paśyenmahāphalam

प्रायः पृथ्वी पर किया हुआ कर्म निष्फल नहीं दिखता; और जिसने कर्म नहीं किया उसे दुःख मिलता है और वह कर्म को महान् फल देने वाला देखेगा।

श्लोक 14 (10.2.14)

चेष्टामकुर्वंल्लभते यदि किञ्चिद्यदृच्छया । यो वा न लभते कृत्वा दुर्दर्शौ तावुभावपि ॥

ceṣṭāmakurvaṃllabhate yadi kiñcidyadṛcchayā | yo vā na labhate kṛtvā durdarśau tāvubhāvapi

यदि कोई चेष्टा न करते हुए संयोग से कुछ पा ले, या कर्म करके भी कुछ न पाए, तो ऐसे दोनों उदाहरण दुर्लभ हैं।

श्लोक 15 (10.2.15)

शक्नोति जीवितुं दक्षो नालसः सुखमेधते । दृश्यन्ते जीवलोकेऽस्मिन्दक्षाः प्रायो हितैषिणः ॥

śaknoti jīvituṃ dakṣo nālasaḥ sukhamedhate | dṛśyante jīvaloke'smindakṣāḥ prāyo hitaiṣiṇaḥ

समर्थ मनुष्य जी सकता है, आलसी सुख से नहीं बढ़ता। इस जीव-जगत् में समर्थ लोग प्रायः अपने हित की चिन्ता करने वाले दिखाई देते हैं।

श्लोक 16 (10.2.16)

यदि दक्षः समारम्भात्कर्मणो नाश्नुते फलम् । नास्य वाच्यं भवेत्किञ्चिल्लब्धव्यं वाऽधिगच्छति ॥

yadi dakṣaḥ samārambhātkarmaṇo nāśnute phalam | nāsya vācyaṃ bhavetkiñcillabdhavyaṃ vā'dhigacchati

यदि कोई समर्थ पुरुष कर्म आरम्भ करके भी उसका फल न पाए, तो उसे कुछ नहीं कहा जा सकता; अथवा वह वही पा लेता है जो उसे पाना था।

श्लोक 17 (10.2.17)

नाकृत्वा कर्म लोके हि फलं विन्दति कर्हिचित् । स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्यो भवति भूयशः ॥

nākṛtvā karma loke hi phalaṃ vindati karhicit | sa tu vaktavyatāṃ yāti dveṣyo bhavati bhūyaśaḥ

संसार में कर्म किए बिना कोई कभी फल नहीं पाता; ऐसा मनुष्य निन्दा का पात्र होता है और प्रायः सबका अप्रिय बन जाता है।

श्लोक 18 (10.2.18)

एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतोऽन्यथा । स करोत्यात्मनोऽनर्थानेष बुद्धिमतां नयः ॥

evametadanādṛtya vartate yastvato'nyathā | sa karotyātmano'narthāneṣa buddhimatāṃ nayaḥ

जो इसकी उपेक्षा करके इससे भिन्न रीति से चलता है, वह अपनी ही हानि करता है; यही बुद्धिमानों की नीति है।

श्लोक 19 (10.2.19)

हीनं पुरुषकारेण यदि दैवेन वा पुनः । कारणाभ्यामथैताभ्यामुत्थानमफलं भवेत् ॥

hīnaṃ puruṣakāreṇa yadi daivena vā punaḥ | kāraṇābhyāmathaitābhyāmutthānamaphalaṃ bhavet

यदि उद्यम में पुरुषार्थ की कमी हो, अथवा दैव की कमी हो, तो इन दोनों कारणों से वह उद्यम निष्फल हो सकता है।

श्लोक 20 (10.2.20)

हीनं पुरुषकारेण कर्म त्विह न सिध्यति ॥

hīnaṃ puruṣakāreṇa karma tviha na sidhyati

पुरुषार्थ से रहित कर्म यहाँ सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 21 (10.2.21)

दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान्सम्यगीहते । दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघैर्विहन्यते ॥

daivatebhyo namaskṛtya yastvarthānsamyagīhate | dakṣo dākṣiṇyasampanno na sa moghairvihanyate

जो देवताओं को प्रणाम करके अपने प्रयोजनों को ठीक रीति से साधता है, वह समर्थ और विनयशील पुरुष व्यर्थ के विघ्नों से नहीं हारता।

श्लोक 22 (10.2.22)

सम्यगीहा पुनरियं या वृद्धानुपसेवते । आपृच्छति च यच्छ्रेयः करोति च हितं वचः ॥

samyagīhā punariyaṃ yā vṛddhānupasevate | āpṛcchati ca yacchreyaḥ karoti ca hitaṃ vacaḥ

सही उद्यम यह है कि मनुष्य वृद्धों की सेवा करे, जो श्रेयस्कर हो उसे पूछे और हितकर वचन के अनुसार करे।

श्लोक 23 (10.2.23)

उत्थायोत्थाय हि सदा प्रष्टव्या वृद्धसम्मताः । ते स्म योगे परं मूलं तन्मूला सिद्धिरुच्यते ॥

utthāyotthāya hi sadā praṣṭavyā vṛddhasammatāḥ | te sma yoge paraṃ mūlaṃ tanmūlā siddhirucyate

बार-बार उठकर सम्मानित वृद्धों से पूछना चाहिए; वे इस उद्योग में प्रधान मूल हैं और सिद्धि उन्हीं में जड़ जमाए कही जाती है।

श्लोक 24 (10.2.24)

वृद्धानां वचनं श्रुत्वा योऽभ्युत्थानं प्रयोजयेत् । उत्थानस्य फलं सम्यक्तदा स लभतेऽचिरात् ॥

vṛddhānāṃ vacanaṃ śrutvā yo'bhyutthānaṃ prayojayet | utthānasya phalaṃ samyaktadā sa labhate'cirāt

जो वृद्धों की बात सुनकर उद्यम में लगता है, वह शीघ्र ही उस उद्यम का पूरा फल पाता है।

श्लोक 25 (10.2.25)

रागात्क्रोधाद्भयाल्लोभाद्योऽर्थानीहेत मानवः । अनीशश्चावमानी च स शीघ्रं भ्रश्यते श्रियः ॥

rāgātkrodhādbhayāllobhādyo'rthānīheta mānavaḥ | anīśaścāvamānī ca sa śīghraṃ bhraśyate śriyaḥ

जो मनुष्य राग, क्रोध, भय या लोभ से प्रयोजन साधना चाहता है, जो अपने ऊपर संयम नहीं रखता और दूसरों का अपमान करता है, वह शीघ्र ही लक्ष्मी से भ्रष्ट हो जाता है।

श्लोक 26 (10.2.26)

सोऽयं दुर्योधनेनार्थो लुब्धेनादीर्घदर्शिना । असमर्थः समारब्धो मूढत्वादविचिन्तितः ॥

so'yaṃ duryodhanenārtho lubdhenādīrghadarśinā | asamarthaḥ samārabdho mūḍhatvādavicintitaḥ

लोभी और अदूरदर्शी दुर्योधन ने यह कार्य अपनी सामर्थ्य से बाहर होते हुए भी मूढ़ता के कारण बिना सोचे-समझे आरम्भ कर दिया था।

श्लोक 27 (10.2.27)

हितबुद्धीननादृत्य सम्मन्त्र्यासाधुभिः सह । वार्यमाणोऽकरोद्वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरैः ॥

hitabuddhīnanādṛtya sammantryāsādhubhiḥ saha | vāryamāṇo'karodvairaṃ pāṇḍavairguṇavattaraiḥ

हितचाहने वालों की बात न मानकर और दुष्टों के साथ मन्त्रणा करके, रोके जाने पर भी उसने गुणों में कहीं बढ़कर पाण्डवों से वैर किया।

श्लोक 28 (10.2.28)

पूर्वमप्यतिदुःशीलो न धैर्यं कर्तुमर्हति । तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणां न कृतं वचः ॥

pūrvamapyatiduḥśīlo na dhairyaṃ kartumarhati | tapatyarthe vipanne hi mitrāṇāṃ na kṛtaṃ vacaḥ

वह पहले से ही अत्यन्त दुःशील था और स्थिर रहने योग्य नहीं है। अब जब उसका प्रयोजन बिगड़ गया है, तो वह इस बात से जल रहा है कि मित्रों की बात नहीं मानी गई।

श्लोक 29 (10.2.29)

अनुवर्तामहे यत्तु तं वयं पापपूरुषम् । अस्मानप्यनयस्तस्मात्प्राप्तोऽयं दारुणो महान् ॥

anuvartāmahe yattu taṃ vayaṃ pāpapūruṣam | asmānapyanayastasmātprāpto'yaṃ dāruṇo mahān

क्योंकि हम उस पापी पुरुष के पीछे चले, इसलिए यह भयंकर और बड़ा अनर्थ हम पर भी आ पड़ा है।

श्लोक 30 (10.2.30)

अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता । बुद्धिश्चिन्तयते किञ्चित्स्वं श्रेयो नावबुध्यते ॥

anena tu mamādyāpi vyasanenopatāpitā | buddhiścintayate kiñcitsvaṃ śreyo nāvabudhyate

इस विपत्ति से मैं आज भी सन्तप्त हूँ; मेरी बुद्धि कुछ सोचती है, पर अपना श्रेय नहीं समझ पाती।

श्लोक 31 (10.2.31)

मुह्यता तु मनुष्येण प्रष्टव्याः सुहृदो जनाः । तत्रास्य बुद्धिर्विनयस्तत्र श्रेयश्च पश्यति ॥

muhyatā tu manuṣyeṇa praṣṭavyāḥ suhṛdo janāḥ | tatrāsya buddhirvinayastatra śreyaśca paśyati

भ्रम में पड़े मनुष्य को अपने सुहृदों और स्वजनों से पूछना चाहिए; उनसे उसे बुद्धि और विनय मिलती है और वह श्रेयस्कर बात को देखता है।

श्लोक 32 (10.2.32)

ततोऽस्य मूलं कार्याणां बुद्ध्या निश्चित्य वै बुधाः । तेऽत्र पृष्टा यथा ब्रूयुस्तत्कर्तव्यं तथा भवेत् ॥

tato'sya mūlaṃ kāryāṇāṃ buddhyā niścitya vai budhāḥ | te'tra pṛṣṭā yathā brūyustatkartavyaṃ tathā bhavet

तब बुद्धिमान् लोग अपनी बुद्धि से उसके कार्यों का मूल निश्चित करके, इस विषय में पूछे जाने पर जैसा बताएँ, वैसा ही करना चाहिए।

श्लोक 33 (10.2.33)

ते वयं धृतराष्ट्रं च गान्धारीं च यशस्विनीम् । उपपृच्छामहे गत्वा विदुरं च महामतिम् ॥

te vayaṃ dhṛtarāṣṭraṃ ca gāndhārīṃ ca yaśasvinīm | upapṛcchāmahe gatvā viduraṃ ca mahāmatim

हम धृतराष्ट्र, यशस्विनी गान्धारी और बुद्धिमान् विदुर के पास जाकर पूछें।

श्लोक 34 (10.2.34)

ते पृष्टास्तु वदेयुर्यच्छ्रेयो नः समनन्तरम् । तदस्माभिः पुनः कार्यमिति मे नैष्ठिकी मतिः ॥

te pṛṣṭāstu vadeyuryacchreyo naḥ samanantaram | tadasmābhiḥ punaḥ kāryamiti me naiṣṭhikī matiḥ

पूछे जाने पर वे हमारे लिए जो आगे श्रेयस्कर हो वह बताएँगे, और हमें वही करना चाहिए; यह मेरा निश्चित मत है।

श्लोक 35 (10.2.35)

अनारम्भात्तु कार्याणां नार्थः सम्पद्यते क्वचित् ॥

anārambhāttu kāryāṇāṃ nārthaḥ sampadyate kvacit

क्योंकि कार्य आरम्भ किए बिना कहीं कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

श्लोक 36 (10.2.36)

कृते पुरुषकारे तु येषां कार्यं न सिध्यति । दैवेनोपहतास्ते तु नात्र कार्या विचारणा ॥

kṛte puruṣakāre tu yeṣāṃ kāryaṃ na sidhyati | daivenopahatāste tu nātra kāryā vicāraṇā

जिनका कार्य पुरुषार्थ किए जाने पर भी सिद्ध नहीं होता, वे दैव से मारे गए हैं; इस विषय में और विचार करने की आवश्यकता नहीं।

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