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सौप्तिक पर्व · अध्याय 3

अश्वत्थामा का सोते हुए पाञ्चालों के वध का निश्चय

कृप की सलाह से आहत अश्वत्थामा कृप और कृतवर्मा को उत्तर देता है। वह कहता है कि हर मनुष्य उसी मत को पकड़े रहता है जो उसे उस समय ठीक लगता है, और प्रत्येक वर्ण में कोई एक श्रेष्ठ गुण स्थापित है; तेजहीन क्षत्रिय मरे हुए के समान है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्म निभाते हुए वह घोषणा करता है कि आज रात वह अपने पिता का बदला लेगा, और धृष्टद्युम्न के नेतृत्व वाले पाञ्चालों और पाण्डवों पर, जब वे शिविर में निश्चिन्त सो रहे होंगे, टूट पड़ेगा तथा इस प्रकार पिता के ऋण से मुक्त होगा।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (10.3.1)

कृपस्य वचनं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं शुभम् । अश्वत्थामा महाराज दुःखशोकसमन्वितः ॥

kṛpasya vacanaṃ śrutvā dharmārthasahitaṃ śubham | aśvatthāmā mahārāja duḥkhaśokasamanvitaḥ

कृप के धर्म और हित से भरे शुभ वचन सुनकर, हे महाराज, अश्वत्थामा दुःख और शोक से भर गया।

श्लोक 2 (10.3.2)

दह्यमानस्तु शोकेन प्रदीप्तेनाग्निना यथा । क्रूरं मनस्ततः कृत्वा तावुभौ प्रत्यभाषत ॥

dahyamānastu śokena pradīptenāgninā yathā | krūraṃ manastataḥ kṛtvā tāvubhau pratyabhāṣata

धधकती आग की तरह शोक से जलता हुआ वह मन को क्रूर करके उन दोनों से बोला।

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 3 (10.3.3)

पुरुषेपुरुषे बुद्धिर्याया भवति शोभना । तुष्यन्ति च पृथक्सर्वे प्रज्ञया ते स्वयास्वया ॥

puruṣepuruṣe buddhiryāyā bhavati śobhanā | tuṣyanti ca pṛthaksarve prajñayā te svayāsvayā

हर-एक मनुष्य में जो भी बुद्धि होती है, वह उसे अच्छी ही लगती है; सब अलग-अलग अपनी-अपनी समझ से सन्तुष्ट रहते हैं।

श्लोक 4 (10.3.4)

सर्वो हि मन्यते लोक आत्मानं बुद्धिमत्तरम् । सर्वस्यात्मा बहुमतः सर्वोत्मानं प्रशंसति ॥

sarvo hi manyate loka ātmānaṃ buddhimattaram | sarvasyātmā bahumataḥ sarvotmānaṃ praśaṃsati

संसार में सभी अपने को अधिक बुद्धिमान मानते हैं; सबको अपना आप ही प्रिय है और सब अपनी ही प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 5 (10.3.5)

सर्वस्य हि स्वका प्रज्ञा साधुवादे प्रतिष्ठिता । परबुद्धिं च निन्दन्ति स्वां प्रशंसन्ति चासकृत् ॥

sarvasya hi svakā prajñā sādhuvāde pratiṣṭhitā | parabuddhiṃ ca nindanti svāṃ praśaṃsanti cāsakṛt

सबकी अपनी समझ अपनी ही वाहवाही पर टिकी होती है; वे दूसरे की बुद्धि की निन्दा करते हैं और बार-बार अपनी की प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 6 (10.3.6)

कारणान्तरयोगेन येषां संवदते मतिः । तेऽन्योन्येन च तुष्यन्ति बहुमन्यन्ति चासकृत् ॥

kāraṇāntarayogena yeṣāṃ saṃvadate matiḥ | te'nyonyena ca tuṣyanti bahumanyanti cāsakṛt

जिनकी मति किसी अन्य कारण से मेल खा जाती है, वे एक-दूसरे से सन्तुष्ट रहते हैं और बार-बार एक-दूसरे का आदर करते हैं।

श्लोक 7 (10.3.7)

तस्यैव तु मनुष्यस्य सासा बुद्धिस्तदातदा । कालयोगे विपर्यासं प्राप्यान्योन्यं विपद्यते ॥

tasyaiva tu manuṣyasya sāsā buddhistadātadā | kālayoge viparyāsaṃ prāpyānyonyaṃ vipadyate

एक ही मनुष्य की भी वह-वह बुद्धि, समय के फेर से उलटकर, एक के बाद दूसरी के आगे ढह जाती है।

श्लोक 8 (10.3.8)

अनित्यत्वात्तु चित्तानां मनुष्याणां विशेषतः । चित्तवैक्लब्यमासाद्य सासा बुद्धिः प्रजायते ॥

anityatvāttu cittānāṃ manuṣyāṇāṃ viśeṣataḥ | cittavaiklabyamāsādya sāsā buddhiḥ prajāyate

चित्त अस्थिर होते हैं, और मनुष्यों के तो विशेष रूप से; इसलिए चित्त की चंचलता से वह-वह बुद्धि उत्पन्न होती रहती है।

श्लोक 9 (10.3.9)

यथा हि वैद्यः कुशलो ज्ञात्वा व्याधिं यथाविधि । भैषज्यं कुरुते योगात्प्रशमार्थमिति प्रभो ॥

yathā hi vaidyaḥ kuśalo jñātvā vyādhiṃ yathāvidhi | bhaiṣajyaṃ kurute yogātpraśamārthamiti prabho

हे प्रभो, जैसे कुशल वैद्य विधिपूर्वक रोग को जानकर उसके शमन के लिए औषधियों का योग करके दवा बनाता है,

श्लोक 10 (10.3.10)

एवं कार्यस्य योगार्थं बुद्धिं कुर्वन्ति मानवाः । प्रज्ञया च स्वया युक्त्या तां च गृह्णन्ति वै बुधाः ॥

evaṃ kāryasya yogārthaṃ buddhiṃ kurvanti mānavāḥ | prajñayā ca svayā yuktyā tāṃ ca gṛhṇanti vai budhāḥ

वैसे ही मनुष्य अपने कार्य की सिद्धि के लिए कोई मत बना लेते हैं, और बुद्धिमान लोग अपनी समझ और युक्ति से उसी को पकड़े रहते हैं।

श्लोक 11 (10.3.11)

अन्यया यौवने बाल्ये बुद्ध्या भवति मोहितः । मध्येऽन्यया जरायां तु सोऽन्यां रोचयते मतिम् ॥

anyayā yauvane bālye buddhyā bhavati mohitaḥ | madhye'nyayā jarāyāṃ tu so'nyāṃ rocayate matim

बचपन और जवानी में मनुष्य एक प्रकार की बुद्धि से मोहित रहता है, अधेड़ अवस्था में दूसरी से, और बुढ़ापे में वह किसी और ही मति को पसन्द करने लगता है।

श्लोक 12 (10.3.12)

व्यसनं वा महाघोरं समृद्धिं चापि तादृशीम् । अवाप्य पुरुषो भोज कुरुते बुद्धिवैकृतम् ॥

vyasanaṃ vā mahāghoraṃ samṛddhiṃ cāpi tādṛśīm | avāpya puruṣo bhoja kurute buddhivaikṛtam

हे भोज, कोई घोर विपत्ति हो या वैसी ही बड़ी समृद्धि, उसे पाकर मनुष्य की बुद्धि बदल जाती है।

श्लोक 13 (10.3.13)

एकस्मिन्नेव पुरुषे सासा बुद्धिस्तदातदा । भवत्यनित्या प्रज्ञा हि सा तस्यैव न रोचते ॥

ekasminneva puruṣe sāsā buddhistadātadā | bhavatyanityā prajñā hi sā tasyaiva na rocate

एक ही मनुष्य में वह-वह बुद्धि अनित्य होती है; जो उसी की अपनी थी, वही फिर उसे नहीं भाती।

श्लोक 14 (10.3.14)

निश्चित्य तु यथाप्रज्ञं यां मतिं साधु पश्यति । तया प्रकुरुते भावं सा तस्योद्योगकारिका ॥

niścitya tu yathāprajñaṃ yāṃ matiṃ sādhu paśyati | tayā prakurute bhāvaṃ sā tasyodyogakārikā

अपनी समझ के अनुसार विचार करके मनुष्य जिस मति को ठीक देखता है, उसी में अपना भाव लगाता है, और वही उसे उद्योग में प्रवृत्त करती है।

श्लोक 15 (10.3.15)

सर्वो हि पुरुषो भोज साध्वेतदिति निश्चितः । कर्तुमारभते प्रीतिं मरणादिषु कर्मसु ॥

sarvo hi puruṣo bhoja sādhvetaditi niścitaḥ | kartumārabhate prītiṃ maraṇādiṣu karmasu

हे भोज, हर मनुष्य जब यह निश्चय कर लेता है कि “यह ठीक है”, तो मृत्यु तक पहुँचाने वाले कर्मों में भी प्रसन्नता से लग जाता है।

श्लोक 16 (10.3.16)

सर्वे हि युक्तां विज्ञाय प्रज्ञां वापि स्वकां नराः । चेष्टन्ते विविधां चेष्टां हितमित्येव जानते ॥

sarve hi yuktāṃ vijñāya prajñāṃ vāpi svakāṃ narāḥ | ceṣṭante vividhāṃ ceṣṭāṃ hitamityeva jānate

सभी मनुष्य उचित बात को जानकर और अपनी बुद्धि का भी भरोसा करके, उसे अपना हित मानते हुए तरह-तरह के प्रयत्न करते हैं।

श्लोक 17 (10.3.17)

उपजाता व्यसनजा येयमद्य मतिर्मम । युवयोस्तां प्रवक्ष्यामि सर्वेषां शोकनाशिनीम् ॥

upajātā vyasanajā yeyamadya matirmama | yuvayostāṃ pravakṣyāmi sarveṣāṃ śokanāśinīm

मेरे मन में आज विपत्ति से जो यह विचार उठा है, उसे मैं तुम दोनों से कहूँगा; यह हम सबके शोक का नाश करने वाला है।

श्लोक 18 (10.3.18)

प्रजापतिः प्रजाः सृष्ट्वा कर्म तासु विधाय च । वर्णेवर्णे समाधत्त ह्येकैकं गुणवत्तरम् ॥

prajāpatiḥ prajāḥ sṛṣṭvā karma tāsu vidhāya ca | varṇevarṇe samādhatta hyekaikaṃ guṇavattaram

प्रजापति ने प्रजा की सृष्टि करके और उनके कर्म निश्चित करके प्रत्येक वर्ण में एक-एक श्रेष्ठतर गुण स्थापित किया।

श्लोक 19 (10.3.19)

ब्राह्मणे वेदमग्र्यं तु क्षत्रिये तेज उत्तमम् । दाक्ष्यं वैश्ये च शूद्रे च सर्ववर्णानुकूलताम् ॥

brāhmaṇe vedamagryaṃ tu kṣatriye teja uttamam | dākṣyaṃ vaiśye ca śūdre ca sarvavarṇānukūlatām

ब्राह्मण में वेद को प्रधान रखा, क्षत्रिय में उत्तम तेज, वैश्य में दक्षता, और शूद्र में सभी वर्णों के अनुकूल रहने का भाव।

श्लोक 20 (10.3.20)

अदान्तो ब्राह्मणोऽसाधुर्निस्तेजाः क्षत्रियो मृतः । अदक्षो निन्द्यते वैश्यः शूद्रश्च प्रतिकूलवान् ॥

adānto brāhmaṇo'sādhurnistejāḥ kṣatriyo mṛtaḥ | adakṣo nindyate vaiśyaḥ śūdraśca pratikūlavān

इन्द्रियों को वश में न रखने वाला ब्राह्मण अच्छा नहीं, तेजहीन क्षत्रिय मरा हुआ है, अकुशल वैश्य निन्दित होता है और प्रतिकूल चलने वाला शूद्र भी निन्दित होता है।

श्लोक 21 (10.3.21)

सोऽस्मि जातः कुले श्रेष्ठे ब्राह्मणैरभिपूजिते । मन्दभाग्यतयाऽस्म्येतं क्षत्रधर्ममनुष्ठितः ॥

so'smi jātaḥ kule śreṣṭhe brāhmaṇairabhipūjite | mandabhāgyatayā'smyetaṃ kṣatradharmamanuṣṭhitaḥ

ऐसा मैं ब्राह्मणों से पूजित श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, और अभाग्यवश इस क्षत्रिय धर्म में लगा हुआ हूँ।

श्लोक 22 (10.3.22)

क्षत्रधर्मं विदित्वाऽहं यदि ब्राह्मण्यमाश्रितः । प्रकरिष्ये महत्कर्म न मे तत्साधुसम्मतम् ॥

kṣatradharmaṃ viditvā'haṃ yadi brāhmaṇyamāśritaḥ | prakariṣye mahatkarma na me tatsādhusammatam

यदि मैं क्षत्रिय धर्म को जानते हुए भी ब्राह्मण के जीवन का आश्रय लेकर कोई महान कर्म करूँ, तो वह सज्जनों को मान्य नहीं होगा।

श्लोक 23 (10.3.23)

धारयित्वा धनुर्दिव्यं दिव्यान्यस्त्राणि चाहवे । पितरं निहतं दृष्ट्वा किन्नु वक्ष्यामि संसदि ॥

dhārayitvā dhanurdivyaṃ divyānyastrāṇi cāhave | pitaraṃ nihataṃ dṛṣṭvā kinnu vakṣyāmi saṃsadi

युद्ध में दिव्य धनुष और दिव्य अस्त्र धारण करके भी, अपने पिता को मरा हुआ देखकर, मैं सभा में क्या कहूँगा?

श्लोक 24 (10.3.24)

सोऽहमद्य यथाकामं क्षत्रधर्ममवाप्य च । गन्ताऽस्मि पदवीं राज्ञः पितुश्चापि महात्मनः ॥

so'hamadya yathākāmaṃ kṣatradharmamavāpya ca | gantā'smi padavīṃ rājñaḥ pituścāpi mahātmanaḥ

इसलिए आज मैं अपनी इच्छा के अनुसार क्षत्रिय धर्म को अपनाकर राजा (दुर्योधन) और अपने महात्मा पिता के मार्ग पर चलूँगा।

श्लोक 25 (10.3.25)

अद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विश्वस्ता जितकाशिनः । विमुक्तयुग्यकवचा हर्षेण च समन्विताः । वयं जिता मताश्चैषां श्रान्ता व्यायामकर्शिताः ॥

adya svapsyanti pāñcālā viśvastā jitakāśinaḥ | vimuktayugyakavacā harṣeṇa ca samanvitāḥ | vayaṃ jitā matāścaiṣāṃ śrāntā vyāyāmakarśitāḥ

आज रात विजय के गर्व से भरे पाञ्चाल निश्चिन्त होकर सोएँगे; उनके घोड़े खुले और कवच उतरे होंगे, और वे हर्ष से भरे होंगे; वे हमें हारा हुआ, थका और परिश्रम से क्षीण मानते हैं।

श्लोक 26 (10.3.26)

तेषां निशि प्रसुप्तानां सुस्थानां शिबिरे स्वके । अवस्कन्दं करिष्यामि शिबिरस्याद्य दुष्करम् ॥

teṣāṃ niśi prasuptānāṃ susthānāṃ śibire svake | avaskandaṃ kariṣyāmi śibirasyādya duṣkaram

रात में जब वे अपने शिविर में निश्चिन्त सोए होंगे, तब मैं उस दुष्कर शिविर-आक्रमण को करूँगा।

श्लोक 27 (10.3.27)

तानवस्कन्द्य शिबिरे प्रेतभूतानचेतसः । सूदयिष्यामि विक्रम्य मघवानिव दानवान् ॥

tānavaskandya śibire pretabhūtānacetasaḥ | sūdayiṣyāmi vikramya maghavāniva dānavān

शिविर में मृतों के समान अचेत पड़े उन पर टूटकर मैं पराक्रम से उन्हें उसी प्रकार मारूँगा जैसे इन्द्र ने दानवों को मारा था।

श्लोक 28 (10.3.28)

अद्य तान्सहितान्सर्वान्धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । सूदयिष्यामि विक्रम्य कक्षं दीप्त इवानलः ॥

adya tānsahitānsarvāndhṛṣṭadyumnapurogamān | sūdayiṣyāmi vikramya kakṣaṃ dīpta ivānalaḥ

आज मैं धृष्टद्युम्न को आगे रखने वाले उन सबको एक साथ पराक्रम से उसी प्रकार भस्म कर दूँगा जैसे जलती आग सूखी घास को।

श्लोक 29 (10.3.29)

निहत्य चैव पाञ्चालाञ्शान्तिं लब्धाऽस्मि सत्तम ॥

nihatya caiva pāñcālāñśāntiṃ labdhā'smi sattama

और हे सत्तम, पाञ्चालों को मारकर मैं शान्ति पाऊँगा।

श्लोक 30 (10.3.30)

पाञ्चालेषु चरिष्यामि सूदयन्नद्य संयुगे । पिनाकपाणिः सङ्क्रुद्धः स्वयं रुद्रः पशुष्विव ॥

pāñcāleṣu cariṣyāmi sūdayannadya saṃyuge | pinākapāṇiḥ saṅkruddhaḥ svayaṃ rudraḥ paśuṣviva

आज युद्ध में पाञ्चालों का संहार करता हुआ मैं उनके बीच क्रोधित होकर वैसे विचरूँगा जैसे हाथ में पिनाक लिए स्वयं रुद्र पशुओं के बीच।

श्लोक 31 (10.3.31)

अद्याहं सर्वपाञ्चालान्निकृत्या च निकृष्य च । अर्दयिष्यामि संहृष्टो रणे पाण्डुसुतांस्तथा । सूदयिष्यामि सङ्क्रुद्धः पशूनिव पिनाकधृत् ॥

adyāhaṃ sarvapāñcālānnikṛtyā ca nikṛṣya ca | ardayiṣyāmi saṃhṛṣṭo raṇe pāṇḍusutāṃstathā | sūdayiṣyāmi saṅkruddhaḥ paśūniva pinākadhṛt

आज मैं सब पाञ्चालों को काट-घसीटकर, बड़े हर्ष से युद्ध में पाण्डवों को भी रौंद डालूँगा; क्रोध में उन्हें वैसे ही मारूँगा जैसे पिनाकधारी पशुओं को मारता है।

श्लोक 32 (10.3.32)

अद्याहं सर्वपाञ्चालैः कृत्वा भूमिं शरीरिणीम् । प्रहृत्यैकेन शस्त्रेण भविष्याम्यनृणः पितुः ॥

adyāhaṃ sarvapāñcālaiḥ kṛtvā bhūmiṃ śarīriṇīm | prahṛtyaikena śastreṇa bhaviṣyāmyanṛṇaḥ pituḥ

आज सब पाञ्चालों के शरीरों से पृथ्वी को पाट देने के बाद, एक ही शस्त्र से उन पर प्रहार करके मैं पिता के ऋण से मुक्त हो जाऊँगा।

श्लोक 33 (10.3.33)

दुर्योधनस्य कर्णस्य भीष्मसैन्धवयोरपि । गमिष्यामि निशावेलां पदवीमद्य दुर्गमाम् ॥

duryodhanasya karṇasya bhīṣmasaindhavayorapi | gamiṣyāmi niśāvelāṃ padavīmadya durgamām

आज रात्रि के इस समय मैं दुर्योधन, कर्ण, भीष्म और सैन्धव (जयद्रथ) के उस दुर्गम मार्ग पर जाऊँगा।

श्लोक 34 (10.3.34)

अद्य पाञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नस्य वै निशि । विरात्रे प्रमथिष्यामि पशोरिव शिरो बलात् ॥

adya pāñcālarājasya dhṛṣṭadyumnasya vai niśi | virātre pramathiṣyāmi paśoriva śiro balāt

आज रात, आधी रात में मैं पाञ्चालराज धृष्टद्युम्न का सिर पशु के सिर की तरह बलपूर्वक कुचल दूँगा।

श्लोक 35 (10.3.35)

अद्य पाञ्चालपाण्डूनां शयितानां शिरो निशि । खड्गेन निशितेनाजौ प्रमथिष्यामि गौतम ॥

adya pāñcālapāṇḍūnāṃ śayitānāṃ śiro niśi | khaḍgena niśitenājau pramathiṣyāmi gautama

हे गौतम, आज रात मैं तीखी तलवार से सोए हुए पाञ्चालों और पाण्डवों के सिर कुचल दूँगा।

श्लोक 36 (10.3.36)

अद्य पाञ्चालसेनां तां निहत्य निशि सौप्तिके । कृतकृत्यः सुखी चैव भविष्यामि महामते ॥

adya pāñcālasenāṃ tāṃ nihatya niśi sauptike | kṛtakṛtyaḥ sukhī caiva bhaviṣyāmi mahāmate

हे महामते, आज रात सोई हुई उस पाञ्चाल सेना को मारकर मैं कृतकृत्य और सुखी हो जाऊँगा।

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