सौप्तिक पर्व · अध्याय 4
कृप का विश्राम का आग्रह; अश्वत्थामा को नींद नहीं
कृप अश्वत्थामा के प्रतिशोध के संकल्प को सराहता है, पर आग्रह करता है कि आज रात वह विश्राम करे: सवेरे वह और कृतवर्मा उसके साथ चलेंगे और तीनों मिलकर पाञ्चालों तथा पाण्डवों का नाश करेंगे। अश्वत्थामा क्रोध में उत्तर देता है कि शोक, क्रोध और पिता की मृत्यु की स्मृति से पीड़ित मनुष्य को नींद नहीं आ सकती। वह पिता के वध, जंघा टूटे दुर्योधन के विलाप और मित्रों की पराजय का स्मरण करता है और कहता है कि उसे अपने निश्चय से कोई नहीं हटा सकता; रात का संहार करने के बाद ही वह विश्राम करेगा।
कृप उवाच
श्लोक 1 (10.4.1)
दिष्ट्या ते प्रतिकर्तव्ये मतिर्जातेयमच्युत । न त्वां वारयितुं शक्तो वज्रपाणिरपि स्वयम् ॥
diṣṭyā te pratikartavye matirjāteyamacyuta | na tvāṃ vārayituṃ śakto vajrapāṇirapi svayam
हे अच्युत, सौभाग्य से तुम्हारे मन में प्रतिकार का यह विचार आया है; हाथ में वज्र लिए स्वयं इन्द्र भी तुम्हें रोकने में समर्थ नहीं है।
श्लोक 2 (10.4.2)
अनुयास्यावहे त्वां तु प्रभाते सहितावुभौ । अद्य रात्रौ विश्रमस्व विमुक्तकवचध्वजः ॥
anuyāsyāvahe tvāṃ tu prabhāte sahitāvubhau | adya rātrau viśramasva vimuktakavacadhvajaḥ
हम दोनों सवेरे साथ-साथ तुम्हारे पीछे चलेंगे; आज रात तुम कवच और ध्वज उतारकर विश्राम करो।
श्लोक 3 (10.4.3)
अहं त्वामनुयास्यामि कृतवर्मा च सात्वतः । परानभिमुखं यान्तं रथावास्थाय दंशितौ ॥
ahaṃ tvāmanuyāsyāmi kṛtavarmā ca sātvataḥ | parānabhimukhaṃ yāntaṃ rathāvāsthāya daṃśitau
जब तुम शत्रुओं की ओर बढ़ोगे, तब मैं और सात्वत कृतवर्मा रथों पर चढ़कर, कवच पहने तुम्हारे पीछे चलेंगे।
श्लोक 4 (10.4.4)
आवाभ्यां सहितः शत्रूञ्श्वो निहन्ता समागमे । विक्रम्य रथिनां श्रेष्ठ पाञ्चालान्सपदानुगान् ॥
āvābhyāṃ sahitaḥ śatrūñśvo nihantā samāgame | vikramya rathināṃ śreṣṭha pāñcālānsapadānugān
हे रथियों में श्रेष्ठ, हम दोनों के साथ तुम कल युद्ध में पराक्रम से पाञ्चालों को उनके अनुयायियों सहित मारोगे।
श्लोक 5 (10.4.5)
शक्तस्त्वमसि विक्रम्य विश्रमस्व निशामिमाम् । चिरं ते जाग्रतस्तात स्वप तावन्निशामिमाम् ॥
śaktastvamasi vikramya viśramasva niśāmimām | ciraṃ te jāgratastāta svapa tāvanniśāmimām
तुम विजय पाने में समर्थ हो; इस रात विश्राम करो। हे तात, तुम्हें जागते हुए बहुत समय हो गया; अब इस रात सो लो।
श्लोक 6 (10.4.6)
विश्रान्तश्च विनिद्रश्च स्वस्थचित्तश्च मानद । समेत्य समरे शत्रून्वधिष्यसि न संशयः ॥
viśrāntaśca vinidraśca svasthacittaśca mānada | sametya samare śatrūnvadhiṣyasi na saṃśayaḥ
हे मान देने वाले, विश्राम करके, नींद लेकर और शान्तचित्त होकर तुम युद्ध में शत्रुओं से भिड़ोगे और उन्हें मारोगे, इसमें सन्देह नहीं।
श्लोक 7 (10.4.7)
न हि त्वां रथिनां श्रेष्ठं प्रगृहीतवरायुधम् । जेतुमुत्सहते कश्चिदपि देवेषु पावकिः ॥
na hi tvāṃ rathināṃ śreṣṭhaṃ pragṛhītavarāyudham | jetumutsahate kaścidapi deveṣu pāvakiḥ
श्रेष्ठ आयुध उठाए हुए तुम रथियों में श्रेष्ठ को जीतने का साहस देवताओं में भी कोई नहीं करता, पावकि (स्कन्द) भी नहीं।
श्लोक 8 (10.4.8)
कृपेण सहितं यान्तं गुप्तं च कृतवर्मणा । को द्रौणिं युधि संरब्धं योधयेदपि देवराट् ॥
kṛpeṇa sahitaṃ yāntaṃ guptaṃ ca kṛtavarmaṇā | ko drauṇiṃ yudhi saṃrabdhaṃ yodhayedapi devarāṭ
जब द्रोणपुत्र कृप के साथ और कृतवर्मा से रक्षित होकर क्रुद्ध होकर युद्ध में जाएगा, तब देवराज भी उससे कौन लड़ सकेगा?
श्लोक 9 (10.4.9)
ते वयं निशि विश्रान्ता विनिद्रा विगतज्वराः । प्रभातायां रजन्यां वै निहनिष्याम शात्रवान् ॥
te vayaṃ niśi viśrāntā vinidrā vigatajvarāḥ | prabhātāyāṃ rajanyāṃ vai nihaniṣyāma śātravān
इसलिए रात में विश्राम करके, नींद पूरी करके और ताप से मुक्त होकर, रात बीतने पर हम शत्रुओं को मारेंगे।
श्लोक 10 (10.4.10)
तव ह्यस्त्राणि दिव्यानि मम चैव न संशयः । सात्वतोऽपि महेष्वासो नित्यं युद्धेषु कोविदः ॥
tava hyastrāṇi divyāni mama caiva na saṃśayaḥ | sātvato'pi maheṣvāso nityaṃ yuddheṣu kovidaḥ
तुम्हारे पास दिव्य अस्त्र हैं, और मेरे पास भी, इसमें सन्देह नहीं; और सात्वत भी महान धनुर्धर है, जो युद्धों में सदा कुशल है।
श्लोक 11 (10.4.11)
ते वयं सहितास्तात सर्वाञ्शत्रून्समागतान् । प्रसह्य समरे हत्वा प्रीतिं प्राप्स्याम पुष्कलाम् ॥
te vayaṃ sahitāstāta sarvāñśatrūnsamāgatān | prasahya samare hatvā prītiṃ prāpsyāma puṣkalām
हे तात, हम सब मिलकर इकट्ठे हुए सभी शत्रुओं को युद्ध में बलपूर्वक मारकर भरपूर आनन्द पाएँगे।
श्लोक 12 (10.4.12)
विश्रमस्व त्वमव्यग्रः स्वप चेमां निशां सुखम् । अहं च कृतवर्मा च प्रभाते त्वां नरोत्तमम् ॥
viśramasva tvamavyagraḥ svapa cemāṃ niśāṃ sukham | ahaṃ ca kṛtavarmā ca prabhāte tvāṃ narottamam
तुम निश्चिन्त होकर विश्राम करो और इस रात सुख से सोओ। हे नरश्रेष्ठ, मैं और कृतवर्मा सवेरे तुम्हारे पीछे चलेंगे —
श्लोक 13 (10.4.13)
अनुयास्याव सहितौ धन्विनौ परतापनौ । रथिनं त्वरया यान्तं रथमास्थाय दंशितौ ॥
anuyāsyāva sahitau dhanvinau paratāpanau | rathinaṃ tvarayā yāntaṃ rathamāsthāya daṃśitau
हम दोनों धनुर्धर, शत्रुओं को तपाने वाले, कवच पहने रथ पर चढ़कर, शीघ्रता से रथ में जाते हुए तुम्हारे पीछे-पीछे चलेंगे।
श्लोक 14 (10.4.14)
स गत्वा शिबिरं तेषां नाम विश्राव्य चाहवे । ततः कर्ताऽसि शत्रूणां युध्यतां कदनं महत् ॥
sa gatvā śibiraṃ teṣāṃ nāma viśrāvya cāhave | tataḥ kartā'si śatrūṇāṃ yudhyatāṃ kadanaṃ mahat
उनके शिविर में जाकर और युद्ध में अपना नाम सुनाकर तुम फिर लड़ते हुए शत्रुओं का भारी संहार करोगे।
श्लोक 15 (10.4.15)
कृत्वा च कदनं तेषां प्रभाते विमलेऽहनि । विहरस्व यथा शक्रः सूदयित्वा महासुरान् ॥
kṛtvā ca kadanaṃ teṣāṃ prabhāte vimale'hani | viharasva yathā śakraḥ sūdayitvā mahāsurān
निर्मल प्रभात में उनका संहार करके तुम उसी प्रकार विहार करोगे जैसे शक्र महान असुरों को मारकर करते हैं।
श्लोक 16 (10.4.16)
त्वं हि शक्तो रणे जेतुं पाञ्चालानां वरूथिनीम् । दैत्यसेनामिव क्रुद्धः सर्वदानवसूदनः ॥
tvaṃ hi śakto raṇe jetuṃ pāñcālānāṃ varūthinīm | daityasenāmiva kruddhaḥ sarvadānavasūdanaḥ
तुम युद्ध में पाञ्चालों की सेना को जीतने में समर्थ हो, जैसे समस्त दानवों का संहार करने वाले (इन्द्र) ने क्रुद्ध होकर दैत्यों की सेना को जीता था।
श्लोक 17 (10.4.17)
मया त्वां सहितं सङ्ख्ये गुप्तं च कृतवर्मणा । न सहेत विभुः साक्षाद्वज्रपाणिरपि स्वयम् ॥
mayā tvāṃ sahitaṃ saṅkhye guptaṃ ca kṛtavarmaṇā | na saheta vibhuḥ sākṣādvajrapāṇirapi svayam
युद्ध में मेरे साथ रहते और कृतवर्मा से रक्षित तुम्हारा सामना वज्रधारी विभु इन्द्र भी साक्षात् नहीं कर सकता।
श्लोक 18 (10.4.18)
न चाहं समरे तात कृतवर्मा न चैव हि । अनिर्जित्य रणे पाण्डूनपयास्यामि कर्हिचित् ॥
na cāhaṃ samare tāta kṛtavarmā na caiva hi | anirjitya raṇe pāṇḍūnapayāsyāmi karhicit
हे तात, न मैं और न कृतवर्मा पाण्डवों को जीते बिना युद्ध से कभी लौटेंगे।
श्लोक 19 (10.4.19)
हत्वा च समरे क्षुद्रान्पाञ्चालान्पाण्डुभिः सह । निवर्तिष्यामहे सर्वे हता वा स्वर्गगा वयम् ॥
hatvā ca samare kṣudrānpāñcālānpāṇḍubhiḥ saha | nivartiṣyāmahe sarve hatā vā svargagā vayam
नीच पाञ्चालों को पाण्डवों सहित मारकर हम सब लौटेंगे, या मारे जाकर स्वर्ग चले जाएँगे।
श्लोक 20 (10.4.20)
सर्वोपायैः सहायास्ते प्रभाते वयमाहवे । सत्यमेतन्महाबाहो प्रब्रवीमि तवानघ ॥
sarvopāyaiḥ sahāyāste prabhāte vayamāhave | satyametanmahābāho prabravīmi tavānagha
हे महाबाहो, प्रभात होने पर युद्ध में हम सब उपायों से तुम्हारे सहायक होंगे; हे निष्पाप, मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 21 (10.4.21)
एवमुक्तस्ततो द्रौणिर्मातुलेन हितं वचः । अब्रवीन्मातुलं राजन्क्रोधादुद्वृत्य लोचने ॥
evamuktastato drauṇirmātulena hitaṃ vacaḥ | abravīnmātulaṃ rājankrodhādudvṛtya locane
हे राजन्, मामा के इस प्रकार हितकर वचन कहने पर द्रोणपुत्र ने क्रोध से आँखें चढ़ाकर अपने मामा को उत्तर दिया।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 22 (10.4.22)
आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च । अर्थांश्चिन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः ॥
āturasya kuto nidrā narasyāmarṣitasya ca | arthāṃścintayataścāpi kāmayānasya vā punaḥ
जो रोगी हो, या क्रोध और असन्तोष से पीड़ित हो, या अपने प्रयोजनों का चिन्तन कर रहा हो, या फिर किसी कामना में लगा हो, उस मनुष्य को नींद कहाँ से आए?
श्लोक 23 (10.4.23)
तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेऽद्य चतुष्टयम् । यस्य भागश्चतुर्थो मे स्वप्नमह्नाय नाशयेत् ॥
tadidaṃ samanuprāptaṃ paśya me'dya catuṣṭayam | yasya bhāgaścaturtho me svapnamahnāya nāśayet
देखो, आज यह चारों बातें मुझ पर आ पड़ी हैं, जिनका चौथा भाग भी मेरी नींद को तुरन्त नष्ट कर दे।
श्लोक 24 (10.4.24)
किं नाम दुःखं लोकेऽस्मिन्पितुर्वधमनुस्मरन् । हृदयं निर्दहन्मेऽद्य रात्र्यहानि न शाम्यति ॥
kiṃ nāma duḥkhaṃ loke'sminpiturvadhamanusmaran | hṛdayaṃ nirdahanme'dya rātryahāni na śāmyati
इस संसार में इससे बड़ा दुःख और क्या है कि पिता के वध को स्मरण करते हुए मेरा हृदय जल रहा है और दिन-रात शान्त नहीं होता।
श्लोक 25 (10.4.25)
यथा च निहतः पापैः पिता मम विशेषतः । प्रत्यक्षमपि ते सर्वं तन्मे मर्माणि कृन्तति ॥
yathā ca nihataḥ pāpaiḥ pitā mama viśeṣataḥ | pratyakṣamapi te sarvaṃ tanme marmāṇi kṛntati
मेरे पिता को पापियों ने जिस प्रकार, और विशेष रूप से, मारा, वह सब तुमने भी प्रत्यक्ष देखा है; वही मेरे मर्मस्थलों को काटता है।
श्लोक 26 (10.4.26)
कथं हि मादृशो लोके मुहूर्तमपि जीवति । द्रोणहन्तेति यद्वाचः पाञ्चालानां शृणोम्यहम् ॥
kathaṃ hi mādṛśo loke muhūrtamapi jīvati | droṇahanteti yadvācaḥ pāñcālānāṃ śṛṇomyaham
मेरे जैसा मनुष्य एक क्षण भी कैसे जीवित रहे, जब मैं पाञ्चालों के मुँह से “यह द्रोण का हत्यारा है” ऐसी बातें सुनता हूँ?
श्लोक 27 (10.4.27)
धृष्टद्युम्नमहत्वा तु नाहं जीवितुमुत्सहे । स मे पितुर्वधाद्वध्यः पाञ्चाला ये च सङ्गताः ॥
dhṛṣṭadyumnamahatvā tu nāhaṃ jīvitumutsahe | sa me piturvadhādvadhyaḥ pāñcālā ye ca saṅgatāḥ
धृष्टद्युम्न को मारे बिना मैं जीवित रहना सह नहीं सकता; पिता के वध के कारण वह वध्य है, और उसके साथ जुटे हुए पाञ्चाल भी।
श्लोक 28 (10.4.28)
विलापो भग्नसक्थस्य यस्तु राज्ञो मया श्रुतः । स पुनर्हृदयं कस्य क्रूरस्यापि न निर्दहेत् ॥
vilāpo bhagnasakthasya yastu rājño mayā śrutaḥ | sa punarhṛdayaṃ kasya krūrasyāpi na nirdahet
जंघाएँ टूटे हुए राजा का जो विलाप मैंने सुना, वह किस क्रूर के भी हृदय को न जला देगा?
श्लोक 29 (10.4.29)
कस्य ह्यकरुणस्यापि नेत्राभ्यामश्रु नाव्रजेत् । नृपतेर्भग्नसक्थस्य श्रुत्वा तादृग्वचः पुनः ॥
kasya hyakaruṇasyāpi netrābhyāmaśru nāvrajet | nṛpaterbhagnasakthasya śrutvā tādṛgvacaḥ punaḥ
जंघाएँ टूटे हुए राजा के वैसे वचन फिर सुनकर किस निर्दयी की भी आँखों से आँसू न बह निकलेंगे?
श्लोक 30 (10.4.30)
यश्चायं मित्रपक्षो मे मयि जीवति निर्जितः । शोकं मे वर्धयत्येष वारिवेग इवार्णवम् ॥
yaścāyaṃ mitrapakṣo me mayi jīvati nirjitaḥ | śokaṃ me vardhayatyeṣa vārivega ivārṇavam
और मेरे जीते-जी पराजित हुआ मेरा यह मित्र-पक्ष मेरे शोक को वैसे ही बढ़ा रहा है जैसे जल का वेग समुद्र को।
श्लोक 31 (10.4.31)
एकाग्रमनसो मेऽद्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ॥
ekāgramanaso me'dya kuto nidrā kutaḥ sukham
एक ही बात में मन लगा होने से आज मुझे नींद कहाँ और सुख कहाँ?
श्लोक 32 (10.4.32)
वासुदेवार्जुनाभ्यां च तानहं परिरक्षितान् । अविषह्यतमान्मन्ये महेन्द्रेणापि सत्तम ॥
vāsudevārjunābhyāṃ ca tānahaṃ parirakṣitān | aviṣahyatamānmanye mahendreṇāpi sattama
हे सत्तम, वासुदेव और अर्जुन से रक्षित उन पाण्डवों को मैं महेन्द्र के लिए भी अजेय मानता हूँ।
श्लोक 33 (10.4.33)
न चापि शक्तः संयन्तुमस्मात्कार्यात्कथञ्चन । तं न पश्यामि लोकेऽस्मिन्यो मां कोपान्निवर्तयेत् ॥
na cāpi śaktaḥ saṃyantumasmātkāryātkathañcana | taṃ na paśyāmi loke'sminyo māṃ kopānnivartayet
मुझे किसी भी प्रकार इस काम से रोका नहीं जा सकता; मैं इस संसार में किसी को नहीं देखता जो मुझे मेरे क्रोध से लौटा सके।
श्लोक 34 (10.4.34)
इति मे निश्चिता बुद्धिरेषा साधुमता मम ॥
iti me niścitā buddhireṣā sādhumatā mama
यही मेरा दृढ़ निश्चय है, और यह मुझे उचित लगता है।
श्लोक 35 (10.4.35)
वादिकैः कथ्यमानस्तु मित्राणां मे पराभवः । पाण्डवानां च विजयो हृदयं दहतीव मे ॥
vādikaiḥ kathyamānastu mitrāṇāṃ me parābhavaḥ | pāṇḍavānāṃ ca vijayo hṛdayaṃ dahatīva me
वार्ता कहने वालों के मुँह से मित्रों की पराजय और पाण्डवों की विजय की बातें सुनकर मेरा हृदय जला जा रहा है।
श्लोक 36 (10.4.36)
अहं तु कदनं कृत्वा शत्रूणामद्य सौप्तिके । ततो विश्रमिता चैव स्वप्ता च विगतज्वरः ॥
ahaṃ tu kadanaṃ kṛtvā śatrūṇāmadya sauptike | tato viśramitā caiva svaptā ca vigatajvaraḥ
परन्तु आज रात सोते हुए शत्रुओं का संहार करके ही मैं विश्राम करूँगा और ताप से मुक्त होकर सोऊँगा।