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सौप्तिक पर्व · अध्याय 5

कृप सोये हुओं के वध से रोकता है; अश्वत्थामा शिविर की ओर चल पड़ता है

कृप अश्वत्थामा से कहता है कि सोए हुए, निःशस्त्र या शरण में आए लोगों का वध धर्म के विरुद्ध है, और उसे मित्रों की सलाह मानकर दिन की प्रतीक्षा करने को कहता है। अश्वत्थामा उत्तर देता है कि पाण्डवों और पाञ्चालों ने धर्म का सेतु बहुत पहले तोड़ दिया था; वह द्रोण, कर्ण, भीष्म, भूरिश्रवा और दुर्योधन के अधर्मपूर्वक मारे जाने का स्मरण करता है और कहता है कि इस संहार से उसे कोई नहीं लौटा सकता। वह रथ जोतकर शत्रु-शिविर की ओर चल पड़ता है; उसका साथ न छोड़ने वाले कृप और कृतवर्मा भी उसके पीछे चलते हैं, और वह सोये हुए शिविर के द्वार पर रुक जाता है।

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

कृप उवाच

श्लोक 1 (10.5.1)

शुश्रूषुरपि दुर्मेधाः पुरुषोऽनियतेन्द्रियः । नालं वेदयितुं कृत्स्नौ धर्मार्थाविति मे मतिः ॥

śuśrūṣurapi durmedhāḥ puruṣo'niyatendriyaḥ | nālaṃ vedayituṃ kṛtsnau dharmārthāviti me matiḥ

जो सीखना चाहता भी हो, पर मन्दबुद्धि और अजितेन्द्रिय हो, वह धर्म और अर्थ दोनों को पूरी तरह नहीं समझ सकता: ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 2 (10.5.2)

तथैव तावन्मेधावी विनयं यो न शिक्षते । न च किञ्चन जानाति सोऽपि धर्मार्थनिश्चयम् ॥

tathaiva tāvanmedhāvī vinayaṃ yo na śikṣate | na ca kiñcana jānāti so'pi dharmārthaniścayam

इसी प्रकार जो बुद्धिमान होकर भी विनय नहीं सीखता, वह कुछ नहीं जानता और धर्म तथा अर्थ का निश्चय भी उसे नहीं होता।

श्लोक 3 (10.5.3)

चिरं ह्यपि जडः शूरः पण्डितं पर्युपास्य ह । न स धर्मान्विजानाति दर्वी सूपरसानिव ॥

ciraṃ hyapi jaḍaḥ śūraḥ paṇḍitaṃ paryupāsya ha | na sa dharmānvijānāti darvī sūparasāniva

मूर्ख चाहे शूर हो, पण्डित की बहुत समय तक सेवा करके भी धर्मों को नहीं समझता, जैसे कलछी सूप के स्वादों को नहीं जानती।

श्लोक 4 (10.5.4)

मुहूर्तमपि तं प्राज्ञः पण्डितं पर्युपास्य हि । क्षिप्रं धर्मान्विजानाति जिह्वा सूपरसानिव ॥

muhūrtamapi taṃ prājñaḥ paṇḍitaṃ paryupāsya hi | kṣipraṃ dharmānvijānāti jihvā sūparasāniva

परन्तु बुद्धिमान पुरुष पण्डित की क्षणभर सेवा करके भी धर्मों को शीघ्र समझ लेता है, जैसे जीभ सूप के स्वादों को।

श्लोक 5 (10.5.5)

शुश्रूषुस्त्वेव मेधावी पुरुषो नियतेन्द्रियः । जानीयादागमान्सर्वान्ग्राह्यं च न विरोधयेत् ॥

śuśrūṣustveva medhāvī puruṣo niyatendriyaḥ | jānīyādāgamānsarvāngrāhyaṃ ca na virodhayet

पर जो बुद्धिमान सीखने की इच्छा रखता है और इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सब शास्त्रों को समझ लेता है और ग्रहण करने योग्य बात का विरोध नहीं करता।

श्लोक 6 (10.5.6)

अनयस्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुषः । दिष्टमुत्सृज्य कल्याणं करोति बहुपातकम् ॥

anayastvavamānī yo durātmā pāpapūruṣaḥ | diṣṭamutsṛjya kalyāṇaṃ karoti bahupātakam

परन्तु जो अनीतिपरायण, अपमान करने वाला, दुष्टात्मा और पापी पुरुष है, वह विधान किए हुए कल्याण को छोड़कर बहुत-से पाप करता है।

श्लोक 7 (10.5.7)

नाथवन्तं तु सुहृदः प्रतिषेधन्ति पातकात् । निवर्तते तु लक्ष्मीवान्नालक्ष्मीवान्निवर्तते ॥

nāthavantaṃ tu suhṛdaḥ pratiṣedhanti pātakāt | nivartate tu lakṣmīvānnālakṣmīvānnivartate

जिसका कोई रक्षक होता है, उसे मित्र पाप से रोकते हैं; जो भाग्यवान है वह लौट आता है, भाग्यहीन नहीं लौटता।

श्लोक 8 (10.5.8)

यथा ह्युच्चावचैर्वाक्यैः क्षिप्तचित्तो नियम्यते । तथैव सुहृदा शक्यो नशक्यस्त्ववसीदति ॥

yathā hyuccāvacairvākyaiḥ kṣiptacitto niyamyate | tathaiva suhṛdā śakyo naśakyastvavasīdati

जैसे विक्षिप्त चित्त वाले को तरह-तरह की बातों से वश में किया जाता है, वैसे ही मित्र जिसे रोक सकता है उसे रोक लेता है; जो नहीं रुक सकता, वह डूब जाता है।

श्लोक 9 (10.5.9)

तथैव सुहृदोऽप्राज्ञान्कुर्वाणान्कर्म पापकम् । प्राज्ञाः सम्प्रतिषेधन्ति यथाशक्ति पुनःपुनः ॥

tathaiva suhṛdo'prājñānkurvāṇānkarma pāpakam | prājñāḥ sampratiṣedhanti yathāśakti punaḥpunaḥ

इसी प्रकार बुद्धिमान लोग पाप कर्म करने वाले अपने नासमझ मित्रों को यथाशक्ति बार-बार रोकते हैं।

श्लोक 10 (10.5.10)

स कल्याणे मनः कृत्वा नियम्यात्मानमात्मना । कुरु मे वचनं तात येन पश्चान्न तप्स्यसे ॥

sa kalyāṇe manaḥ kṛtvā niyamyātmānamātmanā | kuru me vacanaṃ tāta yena paścānna tapsyase

इसलिए कल्याण में मन लगाकर, अपने को स्वयं संयम में रखकर, हे तात, मेरी बात मानो, जिससे तुम्हें बाद में पछताना न पड़े।

श्लोक 11 (10.5.11)

न वधः पूज्यते लोके सुप्तानामिह धर्मतः । तथैव न्यस्तशस्त्राणां विमुक्तरथवाजिनाम् ॥

na vadhaḥ pūjyate loke suptānāmiha dharmataḥ | tathaiva nyastaśastrāṇāṃ vimuktarathavājinām

धर्म की दृष्टि से संसार में सोए हुओं का वध नहीं सराहा जाता, और वैसे ही उनका भी नहीं जिन्होंने शस्त्र रख दिए हों या जिनके रथ और घोड़े छूट गए हों।

श्लोक 12 (10.5.12)

ये च ब्रूयुस्तवास्मीति ये च स्युः शरणागताः । विमुक्तमूर्धजा ये च ये चापि हतवाहनाः ॥

ye ca brūyustavāsmīti ye ca syuḥ śaraṇāgatāḥ | vimuktamūrdhajā ye ca ye cāpi hatavāhanāḥ

न उनका जो कहें “मैं आपका हूँ”, न उनका जो शरण में आए हों, न उनका जिनके केश खुले हों, और न उनका जिनके वाहन मारे जा चुके हों।

श्लोक 13 (10.5.13)

अद्य स्वप्स्यन्ति पाञ्चाला विमुक्तकवचा विभो । विश्वस्ता रजनीं सर्वे प्रेता इव विचेतसः ॥

adya svapsyanti pāñcālā vimuktakavacā vibho | viśvastā rajanīṃ sarve pretā iva vicetasaḥ

हे प्रभो, आज रात सब पाञ्चाल कवच उतारकर निश्चिन्त सोएँगे, मृतकों की तरह अचेत।

श्लोक 14 (10.5.14)

यस्तेषां तदवस्थानां द्रुह्येत पुरुषोऽनृजुः । व्यक्तं स नरके मज्जेदगाधे विपुलेऽप्लुवे ॥

yasteṣāṃ tadavasthānāṃ druhyeta puruṣo'nṛjuḥ | vyaktaṃ sa narake majjedagādhe vipule'pluve

जो कुटिल पुरुष उन्हें उस दशा में पाकर उनसे द्रोह करेगा, वह निश्चय ही अथाह, विशाल और बिना नौका के नरक में डूबेगा।

श्लोक 15 (10.5.15)

सर्वास्त्रविदुषां लोके श्रेष्ठस्त्वमसि विश्रुतः । न च ते जातु लोकेऽस्मिन्सुसूक्ष्ममपि किल्बिषम् ॥

sarvāstraviduṣāṃ loke śreṣṭhastvamasi viśrutaḥ | na ca te jātu loke'sminsusūkṣmamapi kilbiṣam

तुम सब अस्त्रवेत्ताओं में संसार में श्रेष्ठ विख्यात हो, और इस लोक में तुममें कभी रत्तीभर भी दोष नहीं रहा।

श्लोक 16 (10.5.16)

त्वं पुनः सूर्यसङ्काशः श्वोभूत उदिते रवौ । प्रकाशे सर्वभूतानां विजेता युधि शात्रवान् ॥

tvaṃ punaḥ sūryasaṅkāśaḥ śvobhūta udite ravau | prakāśe sarvabhūtānāṃ vijetā yudhi śātravān

कल सूर्य के उदय होने पर तुम सूर्य के समान तेजस्वी होकर सब प्राणियों के सामने युद्ध में शत्रुओं को जीतोगे।

श्लोक 17 (10.5.17)

असम्भावितरूपं हि त्वयि कर्म विगर्हितम् । शुक्ले रक्तमिव न्यस्तं भवेदिति मतिर्मम ॥

asambhāvitarūpaṃ hi tvayi karma vigarhitam | śukle raktamiva nyastaṃ bhavediti matirmama

तुम्हारे जैसे में ऐसा निन्दित कर्म अकल्पनीय है; मुझे लगता है वह श्वेत वस्त्र पर लगे लाल दाग के समान होगा।

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 18 (10.5.18)

एवमेव यथाऽऽत्थ त्वमनुशाससि मातुल । तैस्तु पूर्वमयं सेतुः समन्ताद्विह्वलीकृतः ॥

evameva yathā''ttha tvamanuśāsasi mātula | taistu pūrvamayaṃ setuḥ samantādvihvalīkṛtaḥ

मामाजी, आप जैसा कहते और सिखाते हैं, बात वैसी ही है। परन्तु धर्म के इस सेतु को उन्होंने पहले ही चारों ओर से छिन्न-भिन्न कर दिया है।

श्लोक 19 (10.5.19)

प्रत्यक्षं भूमिपालानां भवतां चापि सन्निधौ । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥

pratyakṣaṃ bhūmipālānāṃ bhavatāṃ cāpi sannidhau | nyastaśastro mama pitā dhṛṣṭadyumnena pātitaḥ

राजाओं के देखते-देखते और आप लोगों की उपस्थिति में भी शस्त्र रख चुके मेरे पिता को धृष्टद्युम्न ने गिरा दिया।

श्लोक 20 (10.5.20)

कर्णश्च पतिते चक्रे उत्थास्यन्रथिनां वरः । उत्तमे व्यसने मग्नो हतो गाण्डीवधन्वना ॥

karṇaśca patite cakre utthāsyanrathināṃ varaḥ | uttame vyasane magno hato gāṇḍīvadhanvanā

और रथियों में श्रेष्ठ कर्ण का चक्र जब धँस गया था और वह उठने को था, तब परम संकट में डूबे उस कर्ण को गाण्डीवधारी ने मार डाला।

श्लोक 21 (10.5.21)

तथा शान्तनवो भीष्मो न्यस्तशस्त्रो निरायुधः । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य हतो गाण्डीवधन्वना ॥

tathā śāntanavo bhīṣmo nyastaśastro nirāyudhaḥ | śikhaṇḍinaṃ puraskṛtya hato gāṇḍīvadhanvanā

वैसे ही शान्तनुपुत्र भीष्म को, जो शस्त्र रखकर निरस्त्र हो गए थे, शिखण्डी को आगे करके गाण्डीवधारी ने मार डाला।

श्लोक 22 (10.5.22)

भूरिश्रवा महेष्वासस्तथा प्रायगतो रणे । क्रोशतां भूमिपालानां युयुधानेन पातितः ॥

bhūriśravā maheṣvāsastathā prāyagato raṇe | krośatāṃ bhūmipālānāṃ yuyudhānena pātitaḥ

महाधनुर्धर भूरिश्रवा को, जो युद्ध में प्रायोपवेशन कर बैठा था, राजाओं के चिल्लाते रहने पर भी युयुधान ने मार गिराया।

श्लोक 23 (10.5.23)

दुर्योधनश्च भीमेन समेत्य गदया मृधे । पश्यतां भूमिपालानामधर्मेण निपातितः ॥

duryodhanaśca bhīmena sametya gadayā mṛdhe | paśyatāṃ bhūmipālānāmadharmeṇa nipātitaḥ

और दुर्योधन को, गदा-युद्ध में भीम से भिड़ने पर, राजाओं के देखते-देखते अधर्म से गिरा दिया गया।

श्लोक 24 (10.5.24)

एकाकी बहुभिस्तत्र परिवार्य महारथैः । अधर्मेण नरव्याघ्रो भीमसेनेन पातितः ॥

ekākī bahubhistatra parivārya mahārathaiḥ | adharmeṇa naravyāghro bhīmasenena pātitaḥ

अकेले, वहाँ अनेक महारथियों से घिरे हुए उस पुरुषसिंह को भीमसेन ने अधर्म से गिरा दिया।

श्लोक 25 (10.5.25)

विलापो भग्नसक्थस्य यो मे राज्ञः परिश्रुतः । वादिकानां कथयतां स मे मर्माणि कृन्तति ॥

vilāpo bhagnasakthasya yo me rājñaḥ pariśrutaḥ | vādikānāṃ kathayatāṃ sa me marmāṇi kṛntati

जंघाएँ टूटे हुए राजा का वह विलाप, जो मैंने समाचार कहने वालों के मुँह से सुना, मेरे मर्मों को काटता है।

श्लोक 26 (10.5.26)

एवं चाधार्मिकाः पापाः पाञ्चाला भिन्नसेतवः । तानेवं भिन्नमर्यादान्किं भवान्न विगर्हति ॥

evaṃ cādhārmikāḥ pāpāḥ pāñcālā bhinnasetavaḥ | tānevaṃ bhinnamaryādānkiṃ bhavānna vigarhati

इस प्रकार पाञ्चाल अधार्मिक, पापी और मर्यादा का सेतु तोड़ने वाले हैं; इन मर्यादा तोड़ने वालों की आप निन्दा क्यों नहीं करते?

श्लोक 27 (10.5.27)

पितृहन्तॄनहं हत्वा पाञ्चालान्निशि सौप्तिके । कामं कीटः पतङ्गो वा जन्म प्राप्य भवामि वै ॥

pitṛhantṝnahaṃ hatvā pāñcālānniśi sauptike | kāmaṃ kīṭaḥ pataṅgo vā janma prāpya bhavāmi vai

रात में सोए हुए पिता के हत्यारे पाञ्चालों को मारकर, चाहे मुझे जन्म लेकर कीड़ा या पतंगा ही क्यों न बनना पड़े, मुझे स्वीकार है।

श्लोक 28 (10.5.28)

त्वरे चाहमनेनाद्य यदिदं मे चिकीर्षितम् । तस्य मे त्वरमाणस्य कुतो निद्रा कुतः सुखम् ॥

tvare cāhamanenādya yadidaṃ me cikīrṣitam | tasya me tvaramāṇasya kuto nidrā kutaḥ sukham

आज मैं जो करना चाहता हूँ उसके लिए मैं उतावला हूँ; इस उतावली में मुझे नींद कहाँ और सुख कहाँ?

श्लोक 29 (10.5.29)

न स जातः पुमाँल्लोके कश्चिन्न स भविष्यति । यो मे व्यावर्तयेदेतां वधे तेषां कृतां मतिम् ॥

na sa jātaḥ pumām̐lloke kaścinna sa bhaviṣyati | yo me vyāvartayedetāṃ vadhe teṣāṃ kṛtāṃ matim

संसार में ऐसा कोई पुरुष न हुआ है, न होगा, जो उनके वध के लिए किए हुए मेरे इस निश्चय को पलट सके।

सञ्जय उवाच

श्लोक 30 (10.5.30)

एवमुक्त्वा महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । एकान्ते योजयित्वाऽश्वान्प्रायादभिमुखः परान् ॥

evamuktvā mahārāja droṇaputraḥ pratāpavān | ekānte yojayitvā'śvānprāyādabhimukhaḥ parān

हे महाराज, ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्र ने एकान्त में घोड़े जोते और शत्रुओं की ओर चल पड़ा।

श्लोक 31 (10.5.31)

तमब्रूतां महात्मानौ भोजशारद्वतावुभौ । किमयं स्यन्दनो युक्तः किं च कार्यं चिकीर्षितम् ॥

tamabrūtāṃ mahātmānau bhojaśāradvatāvubhau | kimayaṃ syandano yuktaḥ kiṃ ca kāryaṃ cikīrṣitam

तब उन दोनों महात्माओं, भोज और शरद्वान् के पुत्र, ने उससे कहा, “तुम्हारा रथ क्यों जुता है, और तुम क्या करना चाहते हो?”

कृपकृतवर्माणावूचतुः

श्लोक 32 (10.5.32)

एकसार्थप्रयातौ स्वस्त्वया सह नरर्षभ । समदुःखसुखौ चापि तस्माच्छंसितुमर्हसि ॥

ekasārthaprayātau svastvayā saha nararṣabha | samaduḥkhasukhau cāpi tasmācchaṃsitumarhasi

“हे नरश्रेष्ठ, हम दोनों तुम्हारे साथ एक ही दल में निकले हैं और सुख-दुःख में समान हैं; इसलिए तुम्हें हमें बता देना चाहिए।”

सञ्जय उवाच

श्लोक 33 (10.5.33)

अश्वत्थामा तु सङ्क्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् । ताभ्यां तथ्यं तथाऽऽचख्यौ यदस्यात्मचिकीर्षितम् ॥

aśvatthāmā tu saṅkruddhaḥ piturvadhamanusmaran | tābhyāṃ tathyaṃ tathā''cakhyau yadasyātmacikīrṣitam

तब पिता के वध को स्मरण करते हुए क्रोध से भरे अश्वत्थामा ने उन दोनों से अपना अभिप्राय ठीक-ठीक कह दिया।

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 34 (10.5.34)

हत्वा शतसहस्राणि योधानां निशितैः शरैः । न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥

hatvā śatasahasrāṇi yodhānāṃ niśitaiḥ śaraiḥ | nyastaśastro mama pitā dhṛṣṭadyumnena pātitaḥ

तीखे बाणों से लाखों योद्धाओं को मारकर भी मेरे पिता, जब शस्त्र रख चुके थे, धृष्टद्युम्न के हाथों गिराए गए।

श्लोक 35 (10.5.35)

तं तथैव वधिष्यामि न्यस्तवर्माणमद्य वै । पुत्रं पाञ्चालराजस्य पापं पापेन कर्मणा ॥

taṃ tathaiva vadhiṣyāmi nyastavarmāṇamadya vai | putraṃ pāñcālarājasya pāpaṃ pāpena karmaṇā

उसी प्रकार मैं आज उस पाञ्चालराज के पुत्र पापी को, जब उसका कवच उतरा होगा, पाप-कर्म से ही मारूँगा।

श्लोक 36 (10.5.36)

तथा विनिहतः पापः पाञ्चाल्यः पशुवन्मया । शस्त्रेण विजिताँल्लोकान्नाप्नुयादिति मे मतिः ॥

tathā vinihataḥ pāpaḥ pāñcālyaḥ paśuvanmayā | śastreṇa vijitām̐llokānnāpnuyāditi me matiḥ

इस प्रकार मेरे हाथों पशु की तरह मारा जाकर वह पापी पाञ्चाल शस्त्र से जीते हुए लोकों को न पा सके: ऐसा मेरा निश्चय है।

श्लोक 37 (10.5.37)

क्षिप्रं सन्नद्धकवचौ सखड्गावात्तकार्मुकौ । मामेवाद्य प्रतीक्षेतां रथवर्यौ परन्तपौ ॥

kṣipraṃ sannaddhakavacau sakhaḍgāvāttakārmukau | māmevādya pratīkṣetāṃ rathavaryau parantapau

शीघ्र कवच पहनकर, तलवार और धनुष हाथ में लिए, हे शत्रुओं को तपाने वाले श्रेष्ठ रथियो, आज केवल मेरी प्रतीक्षा करो।

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (10.5.38)

इत्युक्त्वा रथमास्थाय प्रायादभिमुखः परान् । तमन्वगात्कृपो राजन्कृतवर्मा च सात्वतः ॥

ityuktvā rathamāsthāya prāyādabhimukhaḥ parān | tamanvagātkṛpo rājankṛtavarmā ca sātvataḥ

यह कहकर वह रथ पर चढ़ा और शत्रुओं की ओर चल पड़ा; हे राजन्, कृप और सात्वत कृतवर्मा भी उसके पीछे चले।

श्लोक 39 (10.5.39)

ते प्रयाता व्यरोचन्त परानभिमुखास्त्रयः । हूयमाना यथा यज्ञे समिद्धा हव्यवाहनाः ॥

te prayātā vyarocanta parānabhimukhāstrayaḥ | hūyamānā yathā yajñe samiddhā havyavāhanāḥ

शत्रुओं की ओर बढ़ते हुए वे तीनों वैसे ही शोभित हुए जैसे यज्ञ में आहुति पाकर प्रज्वलित अग्नियाँ।

श्लोक 40 (10.5.40)

ययुश्च शिबिरं तेषां सम्प्रसुप्तजनं विभो । द्वारदेशमनुप्राप्य द्रौणिस्तस्थौ महारथः ॥

yayuśca śibiraṃ teṣāṃ samprasuptajanaṃ vibho | dvāradeśamanuprāpya drauṇistasthau mahārathaḥ

हे विभो, वे उनके उस शिविर की ओर गए जहाँ सब लोग सो रहे थे; और द्वार पर पहुँचकर महारथी द्रोणपुत्र रुक गया।

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