सौप्तिक पर्व · अध्याय 6
द्वार पर भयंकर प्राणी; अश्वत्थामा की शिव-शरण
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि कृप और कृतवर्मा ने क्या किया, और सञ्जय बताते हैं कि अश्वत्थामा पाण्डवों के शिविर के द्वार पर पहुँचा तो वहाँ हृषीकेशों से घिरे, ज्वालामय मुखवाले एक विशाल प्राणी को द्वार रोके खड़ा पाया। उसके छोड़े सब आयुध, बाण, शक्ति, तलवार और गदा, उसने निगल लिए या वे उससे टकराकर टूट गए। निरस्त्र अश्वत्थामा को कृप और कृतवर्मा की चेतावनियाँ याद आती हैं; वह मानता है कि उसने धर्म के विरुद्ध काम किया है, और महादेव की शरण में जाने का निश्चय करता है।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (10.6.1)
द्वारदेशे ततो द्रौणिमवस्थितमवेक्ष्य तौ । अकुर्वतां भोजकृपौ किं सञ्जय वदस्व मे ॥
dvāradeśe tato drauṇimavasthitamavekṣya tau | akurvatāṃ bhojakṛpau kiṃ sañjaya vadasva me
द्रोणपुत्र को द्वार पर खड़ा देखकर उन दोनों, भोज (कृतवर्मा) और कृप, ने क्या किया? सञ्जय, मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 2 (10.6.2)
कृतवर्माणमामन्त्र्य कृपं च स महारथः । द्रौणिर्मन्युपरीतात्मा शिबिरद्वारमासदत् ॥
kṛtavarmāṇamāmantrya kṛpaṃ ca sa mahārathaḥ | drauṇirmanyuparītātmā śibiradvāramāsadat
कृतवर्मा और कृप से विदा लेकर वह महारथी द्रोणपुत्र, क्रोध से भरे हृदय के साथ, शिविर के द्वार पर पहुँचा।
श्लोक 3 (10.6.3)
तत्र भूतं महाकायं चन्द्रार्कसदृशद्युतिम् । सोऽपश्यद्द्वारमावृत्य तिष्ठन्तं रोमहर्षणम् ॥
tatra bhūtaṃ mahākāyaṃ candrārkasadṛśadyutim | so'paśyaddvāramāvṛtya tiṣṭhantaṃ romaharṣaṇam
वहाँ उसने द्वार को रोककर खड़े एक विशाल प्राणी को देखा, जिसकी कान्ति चन्द्रमा और सूर्य के समान थी और जिसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे।
श्लोक 4 (10.6.4)
वसानं चर्म वैयाघ्रं वसारुधिरविस्रवम् । कृष्णाजिनोत्तरासङ्गं नागयज्ञोपवीतिनम् ॥
vasānaṃ carma vaiyāghraṃ vasārudhiravisravam | kṛṣṇājinottarāsaṅgaṃ nāgayajñopavītinam
वह चर्बी और रक्त टपकती बाघ की खाल पहने था, काले मृगचर्म को उत्तरीय की तरह ओढ़े था और सर्प को यज्ञोपवीत बनाए हुए था।
श्लोक 5 (10.6.5)
बाहुभिः स्वायतैर्भीमैर्नानाप्रहरणोद्यतैः । बद्धाङ्गदमहासर्पं ज्वालामालाकुलाननम् ॥
bāhubhiḥ svāyatairbhīmairnānāpraharaṇodyataiḥ | baddhāṅgadamahāsarpaṃ jvālāmālākulānanam
उसकी लम्बी, विशाल भुजाएँ अनेक शस्त्र उठाए हुई थीं; उन पर बाजूबन्द की तरह बड़े-बड़े सर्प बँधे थे और उसका मुख ज्वालाओं की मालाओं से घिरा था।
श्लोक 6 (10.6.6)
दंष्ट्राकरालवदनं व्यादितास्यं भयानकम् । नयनानां सहस्रैश्च विचित्रैरभिभूषितम् ॥
daṃṣṭrākarālavadanaṃ vyāditāsyaṃ bhayānakam | nayanānāṃ sahasraiśca vicitrairabhibhūṣitam
उसका मुख दाढ़ों से विकराल और खुला हुआ था, वह भयानक था और हज़ारों विचित्र नेत्रों से सजा हुआ था।
श्लोक 7 (10.6.7)
नैव तस्य वपुः शक्यं प्रवक्तुं वेष एव च । सर्वथा तु तदालक्ष्य स्फुटेयुरपि पर्वताः ॥
naiva tasya vapuḥ śakyaṃ pravaktuṃ veṣa eva ca | sarvathā tu tadālakṣya sphuṭeyurapi parvatāḥ
न उसके शरीर का वर्णन किया जा सकता था, न उसके वेश का; उसे देखकर तो पर्वत भी फट जाते।
श्लोक 8 (10.6.8)
तस्यास्यनासिकाभ्यां च श्रवणाभ्यां च सर्वशः । तेभ्यश्चाक्षिसहस्रेभ्यः प्रादुरासन्महार्चिषः ॥
tasyāsyanāsikābhyāṃ ca śravaṇābhyāṃ ca sarvaśaḥ | tebhyaścākṣisahasrebhyaḥ prādurāsanmahārciṣaḥ
उसके मुख, नासिकाओं और कानों से चारों ओर, तथा उन हज़ार नेत्रों से, बड़ी-बड़ी ज्वालाएँ फूट निकलती थीं।
श्लोक 9 (10.6.9)
तथा तेजोमरीचिभ्यः शङ्खचक्रगदाधराः । प्रादुरासन्हृषीकेशाः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tathā tejomarīcibhyaḥ śaṅkhacakragadādharāḥ | prādurāsanhṛṣīkeśāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ
और उसके तेज की किरणों से शङ्ख, चक्र और गदा धारण किए सैकड़ों-हज़ारों हृषीकेश प्रकट होने लगे।
श्लोक 10 (10.6.10)
तदत्यद्भुतमालोक्य भूतं लोकभयङ्करम् । द्रौणिरव्यथितो दिव्यैरस्त्रवर्षैरवाकिरत् ॥
tadatyadbhutamālokya bhūtaṃ lokabhayaṅkaram | drauṇiravyathito divyairastravarṣairavākirat
लोक को भयभीत करनेवाले उस अत्यन्त अद्भुत प्राणी को देखकर भी द्रोणपुत्र विचलित नहीं हुआ और उसने उस पर दिव्य अस्त्रों की वर्षा कर दी।
श्लोक 11 (10.6.11)
द्रौणिमुक्ताञ्छरांस्तांस्तु तद्भूतं महदग्रसत् । उदधेरिव वार्योघान्पावको बडबामुखः ॥
drauṇimuktāñcharāṃstāṃstu tadbhūtaṃ mahadagrasat | udadheriva vāryoghānpāvako baḍabāmukhaḥ
परन्तु उस महान् प्राणी ने द्रोणपुत्र के छोड़े बाणों को वैसे ही निगल लिया, जैसे समुद्र की जलधाराओं को बड़वानल निगल जाता है।
श्लोक 12 (10.6.12)
अश्वत्थामा तु सम्प्रेक्ष्य शरौघांस्तान्निरर्थकान् । रथशक्तिं मुमोचास्मै दीप्तामग्निशिखामिव ॥
aśvatthāmā tu samprekṣya śaraughāṃstānnirarthakān | rathaśaktiṃ mumocāsmai dīptāmagniśikhāmiva
उन बाणों की झड़ी को व्यर्थ होते देखकर अश्वत्थामा ने उस पर अग्नि की लपट के समान दहकती हुई रथशक्ति फेंकी।
श्लोक 13 (10.6.13)
सा तमाहत्य दीप्ताग्रा रथशक्तिरदीर्यत । युगान्ते सूर्यमाहत्य महोल्केव दिवश्च्युता ॥
sā tamāhatya dīptāgrā rathaśaktiradīryata | yugānte sūryamāhatya maholkeva divaścyutā
उससे टकराकर वह दहकती नोकवाली शक्ति टूट गई, मानो युग के अन्त में सूर्य से टकराकर कोई महान् उल्का आकाश से गिर पड़ी हो।
श्लोक 14 (10.6.14)
अथ हेमत्सरुं दिव्यं खङ्गमाकाशवर्चसम् । कोशात्समुद्बबर्हाशु बिलाद्दीप्तमिवोरगम् ॥
atha hematsaruṃ divyaṃ khaṅgamākāśavarcasam | kośātsamudbabarhāśu bilāddīptamivoragam
तब उसने सुनहरी मूठवाली, आकाश के समान चमकती दिव्य तलवार को म्यान से झट खींच निकाला, मानो बिल से कोई दमकता सर्प निकला हो।
श्लोक 15 (10.6.15)
ततः खङ्गवरं धीमान्भूताय प्राहिणोत्तदा । स तदासाद्य भूतं वै विलयं तूलवद्ययौ ॥
tataḥ khaṅgavaraṃ dhīmānbhūtāya prāhiṇottadā | sa tadāsādya bhūtaṃ vai vilayaṃ tūlavadyayau
फिर उस बुद्धिमान ने वह उत्तम तलवार उस प्राणी पर चला दी; परन्तु उसके पास पहुँचते ही वह रुई की तरह विलीन हो गई।
श्लोक 16 (10.6.16)
ततः स कुपितो द्रौणिरिन्द्रकेतुनिभां गदाम् । ज्वलन्तीं प्राहिणोत्तस्मै भूतं तामपि चाग्रसत् ॥
tataḥ sa kupito drauṇirindraketunibhāṃ gadām | jvalantīṃ prāhiṇottasmai bhūtaṃ tāmapi cāgrasat
तब क्रुद्ध द्रोणपुत्र ने इन्द्रध्वज के समान जलती हुई गदा उस पर फेंकी; उस प्राणी ने उसे भी निगल लिया।
श्लोक 17 (10.6.17)
ततः सर्वायुधाभावे वीक्षमाणस्ततस्ततः । अपश्यत्कृतमाकाशमनाकाशं जनार्दनैः ॥
tataḥ sarvāyudhābhāve vīkṣamāṇastatastataḥ | apaśyatkṛtamākāśamanākāśaṃ janārdanaiḥ
तब सब आयुध समाप्त हो जाने पर, इधर-उधर देखते हुए उसने आकाश को जनार्दनों से ऐसा भरा देखा कि उसमें तिल भर जगह नहीं बची थी।
श्लोक 18 (10.6.18)
तदद्भुततमं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रो निरायुधः । अचिन्तयत्सुसन्त्रस्तः कृपभोजवचः स्मरन् ॥
tadadbhutatamaṃ dṛṣṭvā droṇaputro nirāyudhaḥ | acintayatsusantrastaḥ kṛpabhojavacaḥ smaran
उस परम अद्भुत दृश्य को देखकर निरस्त्र और अत्यन्त भयभीत द्रोणपुत्र, कृप और भोज की बातों को याद करता हुआ, सोचने लगा।
श्लोक 19 (10.6.19)
ब्रुवतामप्रियं पथ्यं सुहृदां न शृणोति यः । स शोचत्यापदं प्राप्य यथाऽहमवमत्य तौ ॥
bruvatāmapriyaṃ pathyaṃ suhṛdāṃ na śṛṇoti yaḥ | sa śocatyāpadaṃ prāpya yathā'hamavamatya tau
जो मनुष्य हितैषियों की अप्रिय किन्तु हितकर बात नहीं सुनता, वह विपत्ति में पड़कर वैसे ही शोक करता है, जैसे उन दोनों की अवहेलना करके मैं कर रहा हूँ।
श्लोक 20 (10.6.20)
शास्त्रदृष्टानविद्वान्यः समतीत्य जिघांसति । स पथः प्रच्युतो धर्म्यात्कुपथे प्रतिहन्यते ॥
śāstradṛṣṭānavidvānyaḥ samatītya jighāṃsati | sa pathaḥ pracyuto dharmyātkupathe pratihanyate
जो अज्ञानी शास्त्र में बताई मर्यादा को लाँघकर मारने पर उतारू होता है, वह धर्म के मार्ग से भ्रष्ट होकर कुमार्ग में चोट खाता है।
श्लोक 21 (10.6.21)
गोब्राह्मणनृपस्त्रीषु सख्युर्मातुर्गुरोस्तथा । वृद्धबालजडान्धेषु सुप्तभीतोत्थितेषु च ॥
gobrāhmaṇanṛpastrīṣu sakhyurmāturgurostathā | vṛddhabālajaḍāndheṣu suptabhītotthiteṣu ca
गौ, ब्राह्मण, राजा, स्त्री, मित्र, माता, गुरु, वृद्ध, बालक, जड़ और अन्धे, सोए हुए, भयभीत और अभी-अभी उठे हुए लोग,
श्लोक 22 (10.6.22)
मत्तोन्मत्तप्रमत्तेषु न शस्त्राणि च पातयेत् । इत्येवं गुरुभिः पूर्वमुपदिष्टं नृणां सदा ॥
mattonmattapramatteṣu na śastrāṇi ca pātayet | ityevaṃ gurubhiḥ pūrvamupadiṣṭaṃ nṛṇāṃ sadā
तथा मतवाले, उन्मत्त और असावधान लोग: इन पर शस्त्र नहीं चलाना चाहिए। गुरुजनों ने मनुष्यों को सदा यही उपदेश दिया है।
श्लोक 23 (10.6.23)
सोऽहमुत्क्रम्य पन्थानं शास्त्रदृष्टं सनातनम् । अमार्गेणैवमारभ्य घोरामापदमागतः ॥
so'hamutkramya panthānaṃ śāstradṛṣṭaṃ sanātanam | amārgeṇaivamārabhya ghorāmāpadamāgataḥ
वही मैं, शास्त्र में बताए सनातन मार्ग को छोड़कर, अनुचित मार्ग से यह कार्य आरम्भ करके, भयंकर विपत्ति में आ पड़ा हूँ।
श्लोक 24 (10.6.24)
तां चापदं घोरतरां प्रवदन्ति मनीषिणः । यदुद्यम्य महत्कृत्यं भयादपि निवर्तते ॥
tāṃ cāpadaṃ ghoratarāṃ pravadanti manīṣiṇaḥ | yadudyamya mahatkṛtyaṃ bhayādapi nivartate
और विद्वान् उस विपत्ति को और भी भयंकर कहते हैं, जब कोई मनुष्य कोई बड़ा कार्य उठाकर भय से उससे पीछे हट जाता है।
श्लोक 25 (10.6.25)
अशक्यं चैव कः कर्तुं शक्तः शक्तिबलादिह । न हि दैवाद्गरीयो वै मानुष्यं किञ्चिदिष्यते ॥
aśakyaṃ caiva kaḥ kartuṃ śaktaḥ śaktibalādiha | na hi daivādgarīyo vai mānuṣyaṃ kiñcidiṣyate
जो हो ही नहीं सकता, उसे अपनी शक्ति के बल पर कौन कर सकता है? मनुष्य का कोई भी प्रयत्न दैव से बड़ा नहीं माना जाता।
श्लोक 26 (10.6.26)
मानुष्यं कुर्वतः कर्म यदि दैवान्न सिध्यति । स पथः प्रच्युतो धर्म्याद्विपदं प्रतिपद्यते ॥
mānuṣyaṃ kurvataḥ karma yadi daivānna sidhyati | sa pathaḥ pracyuto dharmyādvipadaṃ pratipadyate
यदि मनुष्य के प्रयत्न से किया कर्म दैव के कारण सिद्ध नहीं होता, तो वह धर्म-मार्ग से गिरकर विपत्ति में पड़ता है।
श्लोक 27 (10.6.27)
प्रतिज्ञानं ह्यविज्ञानं प्रवदन्ति मनीषिणः । यदारभ्य क्रियां काञ्चिद्भयादिह निवर्तते ॥
pratijñānaṃ hyavijñānaṃ pravadanti manīṣiṇaḥ | yadārabhya kriyāṃ kāñcidbhayādiha nivartate
विद्वान् कहते हैं कि प्रतिज्ञा अज्ञान ही है, यदि मनुष्य कोई कार्य आरम्भ करके यहाँ भय से उससे पीछे हट जाए।
श्लोक 28 (10.6.28)
तदिदं दुष्प्रणीतेन भयं मां समुपस्थितम् । न हि द्रोणसुतः सङ्ख्ये निवर्तेत कथञ्चन ॥
tadidaṃ duṣpraṇītena bhayaṃ māṃ samupasthitam | na hi droṇasutaḥ saṅkhye nivarteta kathañcana
इस प्रकार बुरी तरह किए गए कार्य के कारण यह भय मुझ पर आ पड़ा है; क्योंकि द्रोणपुत्र किसी भी तरह युद्ध से नहीं लौट सकता।
श्लोक 29 (10.6.29)
इदं च सुमहद्भूतं दैवदण्डमिवोद्यतम् । न चैतदभिजानामि चिन्तयन्नपि सर्वथा ॥
idaṃ ca sumahadbhūtaṃ daivadaṇḍamivodyatam | na caitadabhijānāmi cintayannapi sarvathā
और दैव के दण्ड की तरह उठा हुआ यह महान् प्राणी क्या है, यह मैं सोचने पर भी किसी तरह नहीं समझ पाता।
श्लोक 30 (10.6.30)
ध्रुवं येयमधर्मेण प्रहिता कलुषा मतिः । तस्याः फलमिदं घोरं प्रतिघाताय कल्पते ॥
dhruvaṃ yeyamadharmeṇa prahitā kaluṣā matiḥ | tasyāḥ phalamidaṃ ghoraṃ pratighātāya kalpate
निश्चय ही यह भयंकर वस्तु उस पापबुद्धि का फल है, जिसे मैंने अधर्म में प्रवृत्त किया; यह मुझे रोकने के लिए ही आई है।
श्लोक 31 (10.6.31)
तदिदं दैवविहितं मम सङ्ख्ये निवर्तनम् । नान्यत्र दैवादुद्यन्तुमिह शक्यं कथञ्चन ॥
tadidaṃ daivavihitaṃ mama saṅkhye nivartanam | nānyatra daivādudyantumiha śakyaṃ kathañcana
अतः युद्ध में मेरा यह पीछे हटना दैव का ही विधान है; यहाँ दैव के बिना कोई किसी प्रकार उद्यम नहीं कर सकता।
श्लोक 32 (10.6.32)
सोऽहमद्य महादेवं प्रपद्ये शरणं विभुम् । दैवदण्डमिमं घोरं स हि मे नाशयिष्यति ॥
so'hamadya mahādevaṃ prapadye śaraṇaṃ vibhum | daivadaṇḍamimaṃ ghoraṃ sa hi me nāśayiṣyati
इसलिए आज मैं सर्वव्यापी महादेव की शरण लेता हूँ; वही मेरे लिए इस भयंकर दैवदण्ड का नाश करेंगे।
श्लोक 33 (10.6.33)
कपर्दिनं प्रपद्येऽहं देवदेवमुमापतिम् । कपालमालिनं रुद्रं भगनेत्रहरं हरम् ॥
kapardinaṃ prapadye'haṃ devadevamumāpatim | kapālamālinaṃ rudraṃ bhaganetraharaṃ haram
मैं कपर्दी, देवाधिदेव, उमापति, कपालमाला धारण करनेवाले रुद्र, भग के नेत्र हर लेनेवाले हर की शरण लेता हूँ।
श्लोक 34 (10.6.34)
स हि देवोऽत्यगाद्देवांस्तपसा विक्रमेण च । तस्माच्छरणमभ्येष्ये गिरिशं शूलपाणिनम् ॥
sa hi devo'tyagāddevāṃstapasā vikrameṇa ca | tasmāccharaṇamabhyeṣye giriśaṃ śūlapāṇinam
वे देव तप और पराक्रम में देवताओं से भी आगे निकल गए थे; इसलिए मैं त्रिशूलधारी गिरीश की शरण जाऊँगा।