सौप्तिक पर्व · अध्याय 15
अर्जुन द्वारा अस्त्र का उपसंहार और अश्वत्थामा द्वारा गर्भों पर अस्त्र-प्रयोग
दोनों ऋषियों को देखते ही अर्जुन अपना अस्त्र लौटा लेते हैं और कहते हैं कि अन्यथा अश्वत्थामा उन सबको जला डालेगा; ऐसे अस्त्र को लौटाना केवल अर्जुन जैसे ब्रह्मचारी के लिए सम्भव है। अपना अस्त्र न लौटा पाने वाला अश्वत्थामा मानता है कि उसने भीम के भय से उसे छोड़ा था और अब वह पाण्डवों का नाश कर देगा। व्यास कहते हैं कि अर्जुन ने क्रोध से नहीं छोड़ा था; वे उससे अस्त्र लौटाने और माथे की मणि देने को कहते हैं। अश्वत्थामा मणि देने से मना कर देता है और कहता है कि अस्त्र अब पाण्डवों के गर्भों पर ही गिरेगा। कृष्ण कहते हैं कि उत्तरा के गर्भ का मृत जन्मा शिशु वे जीवित करेंगे, और अश्वत्थामा व्यास की अवहेलना करके गर्भों पर अस्त्र छोड़ देता है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (10.15.1)
दृष्ट्वैव मुनिशार्दूलौ तावग्निसमतेजसौ । गाण्डीवधन्वा सञ्चिन्त्य प्राप्तकालं महारथः । सञ्जहार शरं दिव्यं त्वरमाणो धनञ्जयः ॥
dṛṣṭvaiva muniśārdūlau tāvagnisamatejasau | gāṇḍīvadhanvā sañcintya prāptakālaṃ mahārathaḥ | sañjahāra śaraṃ divyaṃ tvaramāṇo dhanañjayaḥ
अग्नि के समान तेजस्वी उन दोनों मुनिश्रेष्ठों को देखते ही गाण्डीवधारी महारथी धनञ्जय ने, समय आया जानकर, शीघ्रता से अपना दिव्य बाण लौटा लिया।
श्लोक 2 (10.15.2)
उवाच वचनं श्रेष्ठस्तावृषी प्राञ्जलिस्तदा । प्रमुक्तमस्त्रमस्त्रेण शाम्यतामिति वै मया ॥
uvāca vacanaṃ śreṣṭhastāvṛṣī prāñjalistadā | pramuktamastramastreṇa śāmyatāmiti vai mayā
वक्ताओं में श्रेष्ठ अर्जुन ने तब हाथ जोड़कर उन दोनों ऋषियों से कहा — “मैंने यह अस्त्र केवल इसलिए छोड़ा था कि अस्त्र अस्त्र से शान्त हो जाए।
अर्जुन उवाच
श्लोक 3 (10.15.3)
संहृते परमास्त्रेऽस्मिन्सर्वानस्मानशेषतः । पापकर्मा ध्रुवं द्रौणिः प्रधक्ष्यत्यस्त्रतेजसा ॥
saṃhṛte paramāstre'sminsarvānasmānaśeṣataḥ | pāpakarmā dhruvaṃ drauṇiḥ pradhakṣyatyastratejasā
इस परमास्त्र के लौटा लेने पर पापकर्मा द्रोणपुत्र अपने अस्त्र के तेज से हम सबको निश्चय ही पूरी तरह जला डालेगा।
श्लोक 4 (10.15.4)
यदत्र हितमस्माकं लोकानां चैव सर्वथा । भवन्तौ देवसङ्काशौ तथा सम्मन्तुमर्हतः ॥
yadatra hitamasmākaṃ lokānāṃ caiva sarvathā | bhavantau devasaṅkāśau tathā sammantumarhataḥ
इस विषय में हमारे और लोकों के लिए सब प्रकार से जो हितकर हो, देवतुल्य आप दोनों को वैसा ही स्वीकार करना चाहिए।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 5 (10.15.5)
इत्युक्त्वा सञ्जहारास्त्रं पुनरेव धनञ्जयः । संहारो दुष्करस्तस्य देवैरपि हि संयुगे ॥
ityuktvā sañjahārāstraṃ punareva dhanañjayaḥ | saṃhāro duṣkarastasya devairapi hi saṃyuge
ऐसा कहकर धनञ्जय ने अस्त्र को फिर लौटा लिया। उसका लौटाना देवताओं के लिए भी युद्ध में कठिन है।
श्लोक 6 (10.15.6)
विसृष्टस्य रणे तस्य परमास्त्रस्य सङ्ग्रहे । अशक्तः पाण्डवादन्यः साक्षादपि शतक्रतुः ॥
visṛṣṭasya raṇe tasya paramāstrasya saṅgrahe | aśaktaḥ pāṇḍavādanyaḥ sākṣādapi śatakratuḥ
रण में छोड़े गए उस परमास्त्र को लौटाने में पाण्डव के सिवा कोई समर्थ नहीं है, साक्षात् इन्द्र भी नहीं।
श्लोक 7 (10.15.7)
ब्रह्मतेजोद्भवं तद्धि विसृष्टमकृतात्मना । न शक्यमावर्तयितुं ब्रह्मचर्यव्रतादृते ॥
brahmatejodbhavaṃ taddhi visṛṣṭamakṛtātmanā | na śakyamāvartayituṃ brahmacaryavratādṛte
वह ब्रह्मतेज से उत्पन्न है; अशुद्ध आत्मा वाले के द्वारा छोड़ दिए जाने पर उसे ब्रह्मचर्य-व्रत वाले के सिवा कोई लौटा नहीं सकता।
श्लोक 8 (10.15.8)
अचीर्णब्रह्मचर्यो यः सृष्ट्वाऽऽवर्तयते पुनः । तदस्त्रं सानुबन्धस्य मूर्धानं तस्य कृन्तति ॥
acīrṇabrahmacaryo yaḥ sṛṣṭvā''vartayate punaḥ | tadastraṃ sānubandhasya mūrdhānaṃ tasya kṛntati
जिसने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया, वह यदि इसे छोड़कर फिर लौटाने का प्रयत्न करे, तो वह अस्त्र उसके और उसके सम्बन्धियों के सिर काट देता है।
श्लोक 9 (10.15.9)
ब्रह्मचारी व्रती चापि दुरवापमवाप्य तत् । परमव्यसनार्तोऽपि नार्जुनोऽस्त्रं व्यमुञ्चत ॥
brahmacārī vratī cāpi duravāpamavāpya tat | paramavyasanārto'pi nārjuno'straṃ vyamuñcata
अर्जुन ब्रह्मचारी और व्रती थे; उस दुर्लभ अस्त्र को पाकर भी उन्होंने घोर संकट से पीड़ित होने पर भी उसे नहीं छोड़ा।
श्लोक 10 (10.15.10)
सत्यव्रतधरः शूरो ब्रह्मचारी च पाण्डवः । गुरुवर्ती च तेनास्त्रं सञ्जहारार्जुनः पुनः ॥
satyavratadharaḥ śūro brahmacārī ca pāṇḍavaḥ | guruvartī ca tenāstraṃ sañjahārārjunaḥ punaḥ
पाण्डव सत्यव्रत में दृढ़, शूर, ब्रह्मचारी और गुरुजनों का आज्ञाकारी है; इसीलिए अर्जुन उस अस्त्र को फिर लौटा सके।
श्लोक 11 (10.15.11)
द्रौणिरप्यथ सम्प्रेक्ष्य सोऽन्तरा तावृषी स्थितौ । न शशाक पुनर्घोरमस्त्रं संहर्तुमोजसा ॥
drauṇirapyatha samprekṣya so'ntarā tāvṛṣī sthitau | na śaśāka punarghoramastraṃ saṃhartumojasā
द्रोणपुत्र भी उन दोनों ऋषियों को बीच में खड़ा देखकर अपने बल से उस भयंकर अस्त्र को फिर नहीं लौटा सका।
श्लोक 12 (10.15.12)
अशक्तः प्रतिसंहारे परमास्त्रस्य संयुगे । द्रौणिर्दीनमना राजन्द्वैपायनमभाषत ॥
aśaktaḥ pratisaṃhāre paramāstrasya saṃyuge | drauṇirdīnamanā rājandvaipāyanamabhāṣata
युद्ध में परमास्त्र को लौटाने में असमर्थ द्रोणपुत्र ने, हे राजन्, खिन्न मन से द्वैपायन से कहा।
द्रौणिरुवाच
श्लोक 13 (10.15.13)
उत्तमव्यसनार्तेन प्राणत्राणमभीप्सुना । मयैतदस्त्रमुत्सृष्टं भीमसेनभयान्मुने ॥
uttamavyasanārtena prāṇatrāṇamabhīpsunā | mayaitadastramutsṛṣṭaṃ bhīmasenabhayānmune
“घोर संकट से पीड़ित और प्राण बचाने की इच्छा वाले मैंने, हे मुनि, भीमसेन के भय से यह अस्त्र छोड़ा।
श्लोक 14 (10.15.14)
अधर्मश्च कृतोऽनेन धार्तराष्ट्रं जिघांसता । मिथ्याचारेण भगवन्भीमसेनेन संयुगे ॥
adharmaśca kṛto'nena dhārtarāṣṭraṃ jighāṃsatā | mithyācāreṇa bhagavanbhīmasenena saṃyuge
और हे भगवन्, धृतराष्ट्र-पुत्र को मारने की इच्छा से भीमसेन ने युद्ध में छल का आचरण करके अधर्म किया था।
श्लोक 15 (10.15.15)
अतः सृष्टमिदं ब्रह्मन्मयाऽस्त्रमकृतात्मना । तस्य भूयोऽपि संहारं कर्तुं नाहमिहोत्सहे ॥
ataḥ sṛṣṭamidaṃ brahmanmayā'stramakṛtātmanā | tasya bhūyo'pi saṃhāraṃ kartuṃ nāhamihotsahe
इसी कारण, हे ब्रह्मन्, अशुद्ध आत्मा वाले मैंने यह अस्त्र छोड़ा; अब इसे फिर लौटाने की सामर्थ्य मुझमें यहाँ नहीं है।
श्लोक 16 (10.15.16)
निसृष्टं हि मया दिव्यमेतदस्त्रं दुरासदम् । अपाण्डवायेति मुने वह्नितेजोऽनुमन्त्र्य वै ॥
nisṛṣṭaṃ hi mayā divyametadastraṃ durāsadam | apāṇḍavāyeti mune vahnitejo'numantrya vai
हे मुने, “पाण्डव न रहें” — इस संकल्प से अग्नि-तेज को अभिमन्त्रित करके मैंने यह दुर्धर्ष दिव्य अस्त्र छोड़ा है।
श्लोक 17 (10.15.17)
तदिदं पाण्डवेयानामन्तायैवाभिसंहितम् । अद्य पाण्डुसुतान्सर्वाञ्जीविताद्भ्रंशयिष्यति ॥
tadidaṃ pāṇḍaveyānāmantāyaivābhisaṃhitam | adya pāṇḍusutānsarvāñjīvitādbhraṃśayiṣyati
वह पाण्डवों के अन्त के लिए ही सन्धान किया गया था; आज वह पाण्डु के सब पुत्रों को प्राणों से वंचित कर देगा।
श्लोक 18 (10.15.18)
कृतं पापमिदं ब्रह्मन्रोषाविष्टेन चेतसा । वधमाशास्य पार्थानां मयास्त्रं सृजता रणे ॥
kṛtaṃ pāpamidaṃ brahmanroṣāviṣṭena cetasā | vadhamāśāsya pārthānāṃ mayāstraṃ sṛjatā raṇe
हे ब्रह्मन्, क्रोध से भरे चित्त से, पार्थों के वध की आशा करके युद्ध में अस्त्र छोड़ते हुए मैंने यह पाप किया है।”
व्यास उवाच
श्लोक 19 (10.15.19)
अस्त्रं ब्रह्मशिरस्तात विद्वान्पार्थो धनञ्जयः । उत्सृष्टवानहिंसार्थं न रोषेण तवाहवे ॥
astraṃ brahmaśirastāta vidvānpārtho dhanañjayaḥ | utsṛṣṭavānahiṃsārthaṃ na roṣeṇa tavāhave
“तात, ब्रह्मशिर अस्त्र को जानने वाले पार्थ धनञ्जय ने उसे रणभूमि में तुम पर क्रोध से नहीं, अहिंसा के उद्देश्य से छोड़ा था।
श्लोक 20 (10.15.20)
अस्त्रमस्त्रेण तु रणे तव संशमयिष्यता । विसृष्टमर्जुनेनेदं पुनश्च प्रतिसंहृतम् ॥
astramastreṇa tu raṇe tava saṃśamayiṣyatā | visṛṣṭamarjunenedaṃ punaśca pratisaṃhṛtam
रण में तुम्हारे अस्त्र को अस्त्र से शान्त करने की इच्छा से अर्जुन ने यह छोड़ा था, और अब उसे फिर लौटा भी लिया है।
श्लोक 21 (10.15.21)
ब्रह्मास्त्रमप्यवाप्यैतदुपदेशात्पितुस्तव । क्षत्रधर्मान्महाबाहुर्नाकम्पत धनञ्जयः ॥
brahmāstramapyavāpyaitadupadeśātpitustava | kṣatradharmānmahābāhurnākampata dhanañjayaḥ
तुम्हारे पिता के उपदेश से ब्रह्मास्त्र पाकर भी महाबाहु धनञ्जय क्षत्रिय-धर्म से विचलित नहीं हुए।
श्लोक 22 (10.15.22)
एवं धृतिमतः साधोः सर्वास्त्रविदुषः सतः । सभ्रातृबन्धोः कस्मात्त्वं वधमस्य चिकीर्षसि ॥
evaṃ dhṛtimataḥ sādhoḥ sarvāstraviduṣaḥ sataḥ | sabhrātṛbandhoḥ kasmāttvaṃ vadhamasya cikīrṣasi
ऐसे धैर्यवान्, साधु और सब अस्त्रों के ज्ञाता पुरुष का, उसके भाइयों और बन्धुओं के साथ, तुम क्यों वध करना चाहते हो?
श्लोक 23 (10.15.23)
अस्त्रं ब्रह्मशिरो यत्र परमास्त्रेण वध्यते । समा द्वादश पर्जन्यस्तद्राष्ट्रं नाभिवर्षति ॥
astraṃ brahmaśiro yatra paramāstreṇa vadhyate | samā dvādaśa parjanyastadrāṣṭraṃ nābhivarṣati
जिस राष्ट्र में ब्रह्मशिर अस्त्र किसी दूसरे परमास्त्र से काटा जाता है, उस राष्ट्र पर बारह वर्ष तक मेघ वर्षा नहीं करता।
श्लोक 24 (10.15.24)
एतदर्थं महाबाहुः शक्तिमानपि पाण्डवः । न विहन्यात्तदस्त्रं तु प्रजाहितचिकीर्षया ॥
etadarthaṃ mahābāhuḥ śaktimānapi pāṇḍavaḥ | na vihanyāttadastraṃ tu prajāhitacikīrṣayā
इसी कारण समर्थ होते हुए भी महाबाहु पाण्डव प्रजा का हित चाहने से तुम्हारे उस अस्त्र को नष्ट नहीं करेंगे।
श्लोक 25 (10.15.25)
पाण्डवास्त्वं च राष्ट्रं च सदा संरक्ष्यमेव नः । तस्मात्संहर दिव्यं त्वमस्त्रमेतन्महाभुज ॥
pāṇḍavāstvaṃ ca rāṣṭraṃ ca sadā saṃrakṣyameva naḥ | tasmātsaṃhara divyaṃ tvamastrametanmahābhuja
हमें पाण्डवों की, तुम्हारी और राष्ट्र की सदा रक्षा करनी ही है; इसलिए, हे महाबाहो, तुम इस दिव्य अस्त्र को लौटा लो।
श्लोक 26 (10.15.26)
अरोषस्तव चैवास्तु पार्थाः सन्तु निरामयाः । न ह्यधर्मेण राजर्षिः पाण्डवो जेतुमिच्छति ॥
aroṣastava caivāstu pārthāḥ santu nirāmayāḥ | na hyadharmeṇa rājarṣiḥ pāṇḍavo jetumicchati
तुम्हारा क्रोध शान्त हो और पार्थ निरोग रहें; क्योंकि राजर्षि पाण्डव अधर्म से जीतना नहीं चाहता।
श्लोक 27 (10.15.27)
मणिं चैव प्रयच्छाद्य यस्ते शिरसि तिष्ठति । एतदादाय ते प्राणान्प्रतिदास्यन्ति पाण्डवाः ॥
maṇiṃ caiva prayacchādya yaste śirasi tiṣṭhati | etadādāya te prāṇānpratidāsyanti pāṇḍavāḥ
और आज वह मणि इन्हें दे दो जो तुम्हारे मस्तक पर है; उसे लेकर पाण्डव तुम्हें तुम्हारे प्राण लौटा देंगे।”
द्रौणिरुवाच
श्लोक 28 (10.15.28)
पाण्डवैर्यानि रत्नानि यच्चान्यत्कौरवैर्धनम् । अवाप्तमिह तेभ्योऽयं मणिर्मम विशिष्यते ॥
pāṇḍavairyāni ratnāni yaccānyatkauravairdhanam | avāptamiha tebhyo'yaṃ maṇirmama viśiṣyate
“पाण्डवों ने जो रत्न पाए हैं और कौरवों ने जो अन्य धन अर्जित किया है, उन सबसे मेरी यह मणि श्रेष्ठ है।
श्लोक 29 (10.15.29)
यमाबध्य भयं नास्ति शस्त्रव्याधिक्षुधाश्रयम् । देवेभ्यो दानवेभ्यो वा नागेभ्यो वा कथञ्चन ॥
yamābadhya bhayaṃ nāsti śastravyādhikṣudhāśrayam | devebhyo dānavebhyo vā nāgebhyo vā kathañcana
इसे बाँधने वाले को शस्त्र, रोग या भूख से भय नहीं रहता, और देवताओं, दानवों या नागों से भी किसी प्रकार भय नहीं रहता।
श्लोक 30 (10.15.30)
न च रक्षोगणभयं न तस्करभयं तथा । एवंवीर्यो मणिरयं न मे त्याज्यः कथञ्चन ॥
na ca rakṣogaṇabhayaṃ na taskarabhayaṃ tathā | evaṃvīryo maṇirayaṃ na me tyājyaḥ kathañcana
न राक्षसों के समूह का भय रहता है, न चोरों का। ऐसे प्रभाव वाली यह मणि मैं किसी प्रकार नहीं छोड़ सकता।
श्लोक 31 (10.15.31)
यत्तु मे भगवानाह तन्मे कार्यमनन्तरम् । अयं मणिरयं चाहमिषीका तु पतिष्यति । गर्भेषु पाण्डुपुत्राणामुत्तरायास्तथोदरे ॥
yattu me bhagavānāha tanme kāryamanantaram | ayaṃ maṇirayaṃ cāhamiṣīkā tu patiṣyati | garbheṣu pāṇḍuputrāṇāmuttarāyāstathodare
“परन्तु पूज्य ने जो मुझसे कहा है, उसे मुझे अब करना ही होगा — यह मणि है और यह मैं हूँ; किन्तु यह तिनका पाण्डु-पुत्रों के गर्भों में और उत्तरा के उदर में गिरेगा।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 32 (10.15.32)
प्राह द्रोणसुतं तत्र व्यासः परमदुर्मनाः ॥
prāha droṇasutaṃ tatra vyāsaḥ paramadurmanāḥ
तब अत्यन्त खिन्न व्यास ने वहाँ द्रोणपुत्र से कहा।
व्यास उवाच
श्लोक 33 (10.15.33)
एवं कुरु न चान्यत्र बुद्धिः कार्या कथञ्चन । गर्भेषु पाण्डवेयानां विसृज्यैतदुपारम ॥
evaṃ kuru na cānyatra buddhiḥ kāryā kathañcana | garbheṣu pāṇḍaveyānāṃ visṛjyaitadupārama
“ऐसा ही करो, और तुम्हारी बुद्धि कभी किसी अन्य बात की ओर न जाए; इसे पाण्डवों के गर्भों पर छोड़कर विरत हो जाओ।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (10.15.34)
तमुवाच हृषीकेशः पाण्डवानां हिते मतः । भविष्यमेकमुत्सृज्य गर्भेष्वस्त्रं निपात्यताम् ॥
tamuvāca hṛṣīkeśaḥ pāṇḍavānāṃ hite mataḥ | bhaviṣyamekamutsṛjya garbheṣvastraṃ nipātyatām
तब पाण्डवों के हित में तत्पर हृषीकेश ने उससे कहा — “जो आगे होने वाला है, उस एक को छोड़कर शेष गर्भों पर अस्त्र गिराओ।
वासुदेव उवाच
श्लोक 35 (10.15.35)
अहमेनं ददाम्येषां पिण्डदं कीर्तिवर्धनम् । राजर्षिं पुण्यकर्माणमनेकक्रतुयाजिनम् ॥
ahamenaṃ dadāmyeṣāṃ piṇḍadaṃ kīrtivardhanam | rājarṣiṃ puṇyakarmāṇamanekakratuyājinam
मैं इन्हें यह एक पुत्र दूँगा जो इनके लिए पिण्डदान करने वाला और कीर्ति बढ़ाने वाला होगा — पुण्यकर्मा राजर्षि, अनेक यज्ञ करने वाला।
श्लोक 36 (10.15.36)
एवं कुरु न चान्या ते बुद्धिः कार्या कथञ्चन । आगर्भात्पाण्डवेयानां कृत्वा पातं विनङ्क्ष्यति ॥
evaṃ kuru na cānyā te buddhiḥ kāryā kathañcana | āgarbhātpāṇḍaveyānāṃ kṛtvā pātaṃ vinaṅkṣyati
ऐसा ही करो, और तुम्हारे मन में कोई और विचार कभी न आए। पाण्डवों के गर्भों पर गिरकर वह नष्ट हो जाएगा।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 37 (10.15.37)
एवं ब्रुवाणं गोविन्दं वृषभं सर्वसात्वताम् । द्रौणिः परमसङ्क्रुद्धः प्रत्युवाचेदमुत्तरम् ॥
evaṃ bruvāṇaṃ govindaṃ vṛṣabhaṃ sarvasātvatām | drauṇiḥ paramasaṅkruddhaḥ pratyuvācedamuttaram
सब सात्वतों में श्रेष्ठ गोविन्द के ऐसा कहने पर अत्यन्त क्रुद्ध द्रोणपुत्र ने यह उत्तर दिया —
द्रौणिरुवाच
श्लोक 38 (10.15.38)
नैतदेवं यदात्थ त्वं पक्षपातेन केशव । वचनात्पुण्डरीकाक्ष तव मद्वाक्यमन्यथा ॥
naitadevaṃ yadāttha tvaṃ pakṣapātena keśava | vacanātpuṇḍarīkākṣa tava madvākyamanyathā
“केशव, जैसा तुम पक्षपात से कह रहे हो वैसा नहीं है; हे कमलनयन, तुम्हारे कहने से मेरा वचन अन्यथा नहीं हो सकता।
श्लोक 39 (10.15.39)
पतिष्यत्येतदस्त्रं वै गर्भे तस्या मयोद्यतम् । विराटदुहितुः कृष्ण यं त्वं रक्षितुमर्हसि ॥
patiṣyatyetadastraṃ vai garbhe tasyā mayodyatam | virāṭaduhituḥ kṛṣṇa yaṃ tvaṃ rakṣitumarhasi
मेरा उठाया हुआ यह अस्त्र विराट की उस पुत्री के गर्भ पर अवश्य गिरेगा, कृष्ण, जिसकी तुम रक्षा करना चाहते हो।”
वासुदेव उवाच
श्लोक 40 (10.15.40)
अमोघः परमास्त्रस्य पातस्त्वद्य भविष्यति । अभिमन्योः सृजैषीकां गर्भस्थः शाम्यतां शिशुः ॥
amoghaḥ paramāstrasya pātastvadya bhaviṣyati | abhimanyoḥ sṛjaiṣīkāṃ garbhasthaḥ śāmyatāṃ śiśuḥ
“इस परमास्त्र का गिरना आज निष्फल नहीं होगा; पर तुम अभिमन्यु के गर्भ पर तिनका छोड़ो और गर्भ में स्थित वह शिशु शान्त हो जाए।
श्लोक 41 (10.15.41)
अहमेनं मृतं जातं जीवयिष्यामि बालकम् । स तु गर्भो मृतो जातो दीर्घमायुरवाप्स्यति ॥
ahamenaṃ mṛtaṃ jātaṃ jīvayiṣyāmi bālakam | sa tu garbho mṛto jāto dīrghamāyuravāpsyati
मैं मृत जन्मे हुए इस बालक को जीवित कर दूँगा; वह गर्भ मृत जन्म लेकर भी दीर्घ आयु प्राप्त करेगा।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 42 (10.15.42)
इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं द्रोणपुत्रः स्मयन्निव । यद्यस्त्रदग्धं गोविन्द जीवयस्येवमस्त्विति ॥
ityuktaḥ pratyuvācainaṃ droṇaputraḥ smayanniva | yadyastradagdhaṃ govinda jīvayasyevamastviti
ऐसा कहे जाने पर द्रोणपुत्र ने मानो मुस्कराते हुए उसे उत्तर दिया — “गोविन्द, यदि अस्त्र से जले हुए को तुम जिला सको, तो ऐसा ही हो।”
श्लोक 43 (10.15.43)
ततः परममस्त्रं तु द्रौणिरुद्यतमाहवे । द्वैपायनमनादृत्य गर्भेषु प्रमुमोच ह ॥
tataḥ paramamastraṃ tu drauṇirudyatamāhave | dvaipāyanamanādṛtya garbheṣu pramumoca ha
तब द्रोणपुत्र ने द्वैपायन की अवहेलना करके रण में उठाए हुए उस परमास्त्र को गर्भों पर छोड़ दिया।