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सौप्तिक पर्व · अध्याय 16

अश्वत्थामा को शाप और द्रौपदी को मणि

कृष्ण द्रोणपुत्र को उस पुरानी भविष्यवाणी की याद दिलाते हैं कि उत्तरा का पुत्र परिक्षित् कहलाएगा, उसे तीन हजार वर्ष तक अकेले, तिरस्कृत और रोग से दुर्गन्धित होकर पृथ्वी पर भटकने का शाप देते हैं और स्वयं उस बालक को जिलाने का वचन देते हैं। व्यास शाप का समर्थन करते हैं, और अश्वत्थामा अपनी मणि देकर वन को चला जाता है। पाण्डव मणि द्रौपदी के पास ले जाते हैं; भीम उसे देकर उसके कहे वचनों और लिए गए बदले की याद दिलाते हैं, और उसके कहने पर युधिष्ठिर मणि को अपने मस्तक पर धारण करते हैं। फिर द्रौपदी उठ खड़ी होती है और युधिष्ठिर कृष्ण से प्रश्न करने लगते हैं।

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (10.16.1)

तदाज्ञाय हृषीकेशो विकृष्टं पापकर्मणा । हृष्यमाण इदं वाक्यं द्रौणिं प्रत्यब्रवीत्तदा ॥

tadājñāya hṛṣīkeśo vikṛṣṭaṃ pāpakarmaṇā | hṛṣyamāṇa idaṃ vākyaṃ drauṇiṃ pratyabravīttadā

यह जानकर कि पापकर्मी द्रोणपुत्र ने अस्त्र छोड़ दिया है, हृषीकेश ने प्रसन्न होकर तब द्रोणपुत्र से यह वचन कहा।

वासुदेव उवाच

श्लोक 2 (10.16.2)

विराटस्य सुतां पूर्वं स्नुषां गाण्डीवधन्वनः । उपप्लाव्यगतां दृष्ट्वा ऋतवाग्ब्राह्मणोऽब्रवीत् ॥

virāṭasya sutāṃ pūrvaṃ snuṣāṃ gāṇḍīvadhanvanaḥ | upaplāvyagatāṃ dṛṣṭvā ṛtavāgbrāhmaṇo'bravīt

पहले उपप्लव्य नगर में आई हुई विराट की पुत्री को, जो गाण्डीवधारी अर्जुन की पुत्रवधू है, देखकर एक सत्यवादी ब्राह्मण ने कहा था—

श्लोक 3 (10.16.3)

परिक्षीणेषु कुरुषु पुत्रस्तव भविष्यति । एतदस्य परिक्षित्त्वं गर्भस्थस्य भविष्यति ॥

parikṣīṇeṣu kuruṣu putrastava bhaviṣyati | etadasya parikṣittvaṃ garbhasthasya bhaviṣyati

'कुरुवंश के क्षीण हो जाने पर तुम्हारे पुत्र होगा; गर्भ में रहते हुए ही उसका यह नाम परिक्षित् पड़ेगा।'

श्लोक 4 (10.16.4)

तस्य तद्वचनं साधोः सत्यमेव भविष्यति । परिक्षिद्भविता ह्येषां पुनर्वंशकरः सुतः ॥

tasya tadvacanaṃ sādhoḥ satyameva bhaviṣyati | parikṣidbhavitā hyeṣāṃ punarvaṃśakaraḥ sutaḥ

उस साधु पुरुष का वह वचन सत्य ही होगा; परिक्षित् इन कुरुओं के वंश को फिर चलानेवाला पुत्र होगा।

श्लोक 5 (10.16.5)

त्वां तु कापुरुषं पापं विदुः सर्वे मनीषिणः । असकृत्पापकर्माणं बालजीवितघातकम् ॥

tvāṃ tu kāpuruṣaṃ pāpaṃ viduḥ sarve manīṣiṇaḥ | asakṛtpāpakarmāṇaṃ bālajīvitaghātakam

परन्तु तुम्हें सब विद्वान् नीच कायर और पापी जानते हैं—बार-बार पाप करनेवाला और बालकों के प्राण हरनेवाला।

श्लोक 6 (10.16.6)

तस्मात्त्वमस्य पापस्य कर्मणः फलमाप्नुहि । त्रीणि वर्षसहस्राणि चरिष्यसि महीमिमाम् ॥

tasmāttvamasya pāpasya karmaṇaḥ phalamāpnuhi | trīṇi varṣasahasrāṇi cariṣyasi mahīmimām

इसलिए इस पापकर्म का फल पाओ; तीन हजार वर्ष तक तुम इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे,

श्लोक 7 (10.16.7)

अप्राप्नुवन्क्वचित्काञ्चित्संविदं जातु केनचित् । निर्जनानसहायस्त्वं देशान्प्रविचरिष्यसि ॥

aprāpnuvankvacitkāñcitsaṃvidaṃ jātu kenacit | nirjanānasahāyastvaṃ deśānpravicariṣyasi

कहीं किसी के साथ कभी बातचीत न पाते हुए, निर्जन देशों में असहाय और अकेले घूमोगे।

श्लोक 8 (10.16.8)

भवित्री न हि ते क्षुद्र जनमध्येषु संस्थितिः । पूयशोणिगन्धी च दुर्गकान्तारसंश्रयः । विचरिष्यसि पापात्मंश्चिरमेको वसुन्धराम् ॥

bhavitrī na hi te kṣudra janamadhyeṣu saṃsthitiḥ | pūyaśoṇigandhī ca durgakāntārasaṃśrayaḥ | vicariṣyasi pāpātmaṃścirameko vasundharām

हे क्षुद्र, मनुष्यों के बीच तुम्हारा रहना नहीं होगा; तुम्हारे शरीर से मवाद और रक्त की गन्ध आएगी और तुम दुर्गम वनों में शरण लोगे। हे पापात्मा, तुम बहुत समय तक अकेले पृथ्वी पर भटकोगे।

श्लोक 9 (10.16.9)

वयः प्राप्य परिक्षित्तु देवव्रतमवाप्य च । कृपाच्छारद्वताच्छूरः सर्वास्त्राण्युपपत्स्यते ॥

vayaḥ prāpya parikṣittu devavratamavāpya ca | kṛpācchāradvatācchūraḥ sarvāstrāṇyupapatsyate

और परिक्षित् बड़ा होकर पवित्र व्रत धारण करेगा तथा शारद्वत कृपाचार्य से सब अस्त्र प्राप्त करेगा; वह वीर

श्लोक 10 (10.16.10)

विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते स्थितः । षष्टिं वर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति ॥

viditvā paramāstrāṇi kṣatradharmavrate sthitaḥ | ṣaṣṭiṃ varṣāṇi dharmātmā vasudhāṃ pālayiṣyati

परम अस्त्रों को जानकर क्षत्रिय-धर्म के व्रत में स्थिर रहेगा; वह धर्मात्मा साठ वर्ष तक पृथ्वी का पालन करेगा।

श्लोक 11 (10.16.11)

इतश्चोर्ध्वं महाबाहुः कुरुराजो भविष्यति । परिक्षिन्नाम नृपतिर्मिषतस्ते सुदुर्मते ॥

itaścordhvaṃ mahābāhuḥ kururājo bhaviṣyati | parikṣinnāma nṛpatirmiṣataste sudurmate

इसके बाद वह महाबाहु कुरुओं का राजा होगा; हे दुर्बुद्धि, तेरे देखते-देखते परिक्षित् नाम का राजा होगा।

श्लोक 12 (10.16.12)

अहं तं जीवयिष्यामि दग्धं शस्त्राग्नितेजसा । पश्य मे तपसो वीर्यं सत्यस्य च नराधम ॥

ahaṃ taṃ jīvayiṣyāmi dagdhaṃ śastrāgnitejasā | paśya me tapaso vīryaṃ satyasya ca narādhama

शस्त्र की अग्नि के तेज से जले हुए उसको मैं जीवित कर दूँगा। हे अधम मनुष्य, मेरी तपस्या और सत्य का बल देख।

व्यास उवाच

श्लोक 13 (10.16.13)

यस्मादनादृत्य कृतं त्वयाऽस्मान्कर्म दारुणम् । ब्राह्मणस्य सतश्चेदं वृत्तमन्यायवर्तिनः ॥

yasmādanādṛtya kṛtaṃ tvayā'smānkarma dāruṇam | brāhmaṇasya sataścedaṃ vṛttamanyāyavartinaḥ

'तुमने हमारी उपेक्षा करके यह भयंकर कर्म किया है, और ब्राह्मण होकर भी तुम्हारा यह आचरण अन्याय के मार्ग पर चलनेवाले का है;

श्लोक 14 (10.16.14)

तस्माद्यद्देवकीपुत्र उक्तवानुत्तमं वचः । आलोकात्तव तद्भावि क्षुद्रकर्मन्व्रजेति ह ॥

tasmādyaddevakīputra uktavānuttamaṃ vacaḥ | ālokāttava tadbhāvi kṣudrakarmanvrajeti ha

इसलिए देवकीपुत्र ने जो उत्तम वचन कहा है, हे नीच कर्म करनेवाले, वह सारे संसार के सामने तुम्हारे साथ घटित होगा; जाओ।'

अश्वत्थामोवाच

श्लोक 15 (10.16.15)

सहैव भवता ब्रह्मन्स्थास्यामि पुरुषेष्विह । सत्यवागस्तु भगवानयं च पुरुषोत्तमः ॥

sahaiva bhavatā brahmansthāsyāmi puruṣeṣviha | satyavāgastu bhagavānayaṃ ca puruṣottamaḥ

'हे ब्रह्मन्, मैं मनुष्यों के बीच यहाँ आपके ही साथ रहूँगा; आप भगवान् और ये पुरुषोत्तम सत्यवादी हों।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 16 (10.16.16)

प्रदायाथ मणिं द्रौणिः पाण्डवानां महात्मनाम् । जगाम विमनास्तेषां सर्वेषां पश्यतां वनम् ॥

pradāyātha maṇiṃ drauṇiḥ pāṇḍavānāṃ mahātmanām | jagāma vimanāsteṣāṃ sarveṣāṃ paśyatāṃ vanam

तब द्रोणपुत्र महात्मा पाण्डवों को मणि देकर, उन सबके देखते-देखते उदास मन से वन को चला गया।

श्लोक 17 (10.16.17)

पाण्डवाश्च सदाशार्हास्तानृषीनभिवाद्य च । कृष्णद्वैपायनं चैव नारदं चैव पर्वतम् ॥

pāṇḍavāśca sadāśārhāstānṛṣīnabhivādya ca | kṛṣṇadvaipāyanaṃ caiva nāradaṃ caiva parvatam

और पाण्डव दाशार्ह कृष्ण के साथ उन ऋषियों को—कृष्ण द्वैपायन, नारद और पर्वत को—प्रणाम करके

श्लोक 18 (10.16.18)

द्रोणपुत्रस्य सहजं मणिमादाय सत्वराः । द्रौपदीमभ्यधावन्त प्रायोपेतां मनस्विनीम् ॥

droṇaputrasya sahajaṃ maṇimādāya satvarāḥ | draupadīmabhyadhāvanta prāyopetāṃ manasvinīm

द्रोणपुत्र की सहज मणि लेकर शीघ्रता से, प्रायोपवेशन का व्रत लिए बैठी हुई मनस्विनी द्रौपदी की ओर दौड़े।

श्लोक 19 (10.16.19)

ततस्ते पुरुषव्याघ्राः सदश्वैरनिलोपमैः । अभ्ययुः सहदाशार्हाः शिबिरं पुनरेव हि ॥

tataste puruṣavyāghrāḥ sadaśvairanilopamaiḥ | abhyayuḥ sahadāśārhāḥ śibiraṃ punareva hi

तब वे पुरुषसिंह वायु के समान तेज़ उत्तम घोड़ों से दाशार्ह के साथ फिर शिविर में पहुँचे।

श्लोक 20 (10.16.20)

अवतीर्य रथेभ्यस्तु त्वरमाणा महारथाः । ददृशुर्द्रौपदीं हृष्टामार्तामार्ततराः स्वयम् ॥

avatīrya rathebhyastu tvaramāṇā mahārathāḥ | dadṛśurdraupadīṃ hṛṣṭāmārtāmārtatarāḥ svayam

रथों से उतरकर शीघ्रता करते हुए उन महारथियों ने द्रौपदी को देखा, जो हर्ष और शोक दोनों से भरी थी; वे स्वयं और भी अधिक शोक में थे।

श्लोक 21 (10.16.21)

तामुपेत्य निरानन्दां दुःखशोकसमन्विताम् । परिवार्य व्यतिष्ठन्त पाण्डवाः सहकेशवाः ॥

tāmupetya nirānandāṃ duḥkhaśokasamanvitām | parivārya vyatiṣṭhanta pāṇḍavāḥ sahakeśavāḥ

आनन्दहीन और दुःख-शोक से भरी हुई उसके पास जाकर केशव के सहित पाण्डव उसे घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 22 (10.16.22)

ततो राज्ञाऽभ्यनुज्ञातो भीमसेनो महाबलः । प्रददौ तं मणिं दिव्यं वचनं चेदमब्रवीत् ॥

tato rājñā'bhyanujñāto bhīmaseno mahābalaḥ | pradadau taṃ maṇiṃ divyaṃ vacanaṃ cedamabravīt

तब राजा की आज्ञा पाकर महाबली भीमसेन ने वह दिव्य मणि उसे दी और यह वचन कहा—

भीमसेन उवाच

श्लोक 23 (10.16.23)

अयं भद्रे तव मणिः पुत्रहन्ता जितश्च ते । उत्तिष्ठ शोकमुत्सृज्य क्षात्रधर्ममनुस्मर ॥

ayaṃ bhadre tava maṇiḥ putrahantā jitaśca te | uttiṣṭha śokamutsṛjya kṣātradharmamanusmara

'हे भद्रे, यह तुम्हारी मणि है; तुम्हारे पुत्रों को मारनेवाला तुम्हारे लिए जीत लिया गया है। उठो, शोक छोड़ो और क्षत्रिय-धर्म को स्मरण करो।

श्लोक 24 (10.16.24)

प्रयाणे वासुदेवस्य शमार्थमसितेक्षणे । यान्युक्तानि त्वया भीरु वाक्यानि मधुघातिनि ॥

prayāṇe vāsudevasya śamārthamasitekṣaṇe | yānyuktāni tvayā bhīru vākyāni madhughātini

जब वासुदेव शान्ति के लिए जा रहे थे, तब हे असित नयनोंवाली, हे भीरु, तुमने मधुसूदन से जो बातें कही थीं—

श्लोक 25 (10.16.25)

नैव मे पतयः सन्ति न पुत्रा भ्रातरो न च । न वै त्वमिति गोविन्द शममिच्छति राजनि ॥

naiva me patayaḥ santi na putrā bhrātaro na ca | na vai tvamiti govinda śamamicchati rājani

'न मेरे पति हैं, न पुत्र, न भाई; और हे गोविन्द, तुम भी मेरे नहीं, यदि राजा शान्ति चाहते हैं'—

श्लोक 26 (10.16.26)

उक्तवत्यसि तीव्राणि वाक्यानि पुरुषोत्तमम् । क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि संस्मर्तुमर्हसि ॥

uktavatyasi tīvrāṇi vākyāni puruṣottamam | kṣatradharmānurūpāṇi tāni saṃsmartumarhasi

वे पुरुषोत्तम से कहे हुए तीखे वचन थे, जो क्षत्रिय-धर्म के अनुरूप थे; उन्हें तुम्हें याद करना चाहिए।

श्लोक 27 (10.16.27)

हतो दुर्योधनः पापो राज्यस्य परिपन्थिकः । दुःशासनस्य रुधिरं पीतं विस्फुरतो मया ॥

hato duryodhanaḥ pāpo rājyasya paripanthikaḥ | duḥśāsanasya rudhiraṃ pītaṃ visphurato mayā

पापी दुर्योधन, जो राज्य का काँटा था, मारा गया है; तड़पते हुए दुःशासन का रक्त मैंने पिया है।

श्लोक 28 (10.16.28)

वैरस्य गतमानृण्यं न स्म वाच्या विवक्षताम् । जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद्गौरवेण च ॥

vairasya gatamānṛṇyaṃ na sma vācyā vivakṣatām | jitvā mukto droṇaputro brāhmaṇyādgauraveṇa ca

वैर का ऋण चुक गया; अब बोलना चाहनेवाले हमें दोष नहीं दे सकते। द्रोणपुत्र को ब्राह्मण होने के आदर के कारण जीतकर छोड़ दिया गया।

श्लोक 29 (10.16.29)

यशोऽस्य पतितं देवि शरीरं त्ववशेषितम् । वियोजितश्च मणिना भ्रंशितश्चायुधं भुवि ॥

yaśo'sya patitaṃ devi śarīraṃ tvavaśeṣitam | viyojitaśca maṇinā bhraṃśitaścāyudhaṃ bhuvi

हे देवी, उसका यश गिर गया, केवल शरीर बचा है; वह मणि से अलग कर दिया गया और उसके हाथ से शस्त्र भूमि पर गिरा दिया गया।'

द्रौपद्युवाच

श्लोक 30 (10.16.30)

केवलानृण्यमाप्ताऽस्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम । शिरस्येतं मणिं राजा ग्रहीतुमनघोऽर्हति ॥

kevalānṛṇyamāptā'smi guruputro gururmama | śirasyetaṃ maṇiṃ rājā grahītumanagho'rhati

'मैं केवल ऋण से उऋण हुई हूँ; गुरुपुत्र मेरे लिए गुरु है। निष्पाप राजा इस मणि को अपने मस्तक पर धारण करने योग्य हैं।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 31 (10.16.31)

तं गृहीत्वा ततो राजा शिरस्येवाकरोत्तदा । गुरोरुच्छेषमित्येव द्रौपद्या वचनादपि ॥

taṃ gṛhītvā tato rājā śirasyevākarottadā | guroruccheṣamityeva draupadyā vacanādapi

तब राजा ने उसे लेकर 'यह गुरु का अवशेष है' कहकर, द्रौपदी के कहने से भी, अपने मस्तक पर रख लिया।

श्लोक 32 (10.16.32)

ततो दिव्यं मणिवरं शिरसा धारयन्प्रभुः । शुशुभे स तदा राजा सचन्द्र इव पर्वतः ॥

tato divyaṃ maṇivaraṃ śirasā dhārayanprabhuḥ | śuśubhe sa tadā rājā sacandra iva parvataḥ

फिर उस उत्तम दिव्य मणि को मस्तक पर धारण किए हुए वह राजा चन्द्रमा से युक्त पर्वत की तरह शोभित हुआ।

श्लोक 33 (10.16.33)

उत्तस्थौ पुत्रशोकार्ता ततः कृष्णा मनस्विनी । कृष्णं चापि महाबाहुः परिपप्रच्छ धर्मराट् ॥

uttasthau putraśokārtā tataḥ kṛṣṇā manasvinī | kṛṣṇaṃ cāpi mahābāhuḥ paripapraccha dharmarāṭ

तब पुत्रशोक से पीड़ित मनस्विनी कृष्णा (द्रौपदी) उठ खड़ी हुई; और महाबाहु धर्मराज ने भी कृष्ण से पूछा।

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