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सौप्तिक पर्व · अध्याय 17

महादेव और प्राणियों की सृष्टि

शोकाकुल युधिष्ठिर कृष्ण से पूछते हैं कि अकेला द्रोणपुत्र इतने महारथियों को कैसे मार सका। कृष्ण उत्तर देते हैं कि अश्वत्थामा अवश्य महादेव की शरण गया होगा, जो कोई भी वर दे सकते हैं, और वे उस देव की कथा कहने लगते हैं: ब्रह्मा ने रुद्र से प्राणियों की सृष्टि करने को कहा, रुद्र तप करने के लिए जल में डूब गए, तब दक्ष ने प्राणियों की रचना की और ब्रह्मा ने उन्हें अन्न दिया। जब रुद्र जल से उठे और सृष्टि हो चुकी देखी, तो क्रोध में उन्होंने अपने लिङ्ग को बींध डाला, वह भूमि में गड़ा रह गया, और वे तप करने के लिए मुञ्जवान् पर्वत को चले गए।

अध्याय 16अध्याय-सूचीअध्याय 18

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (10.17.1)

हतेषु सर्वसैन्येषु सौप्तिके तै रथैस्त्रिभिः । शोचन्युधिष्ठिरो राजा दाशार्हमिदमब्रवीत् ॥

hateṣu sarvasainyeṣu sauptike tai rathaistribhiḥ | śocanyudhiṣṭhiro rājā dāśārhamidamabravīt

रात के आक्रमण में उन तीन रथियों द्वारा सारी सेनाओं के मारे जाने पर राजा युधिष्ठिर ने शोक करते हुए दाशार्ह कृष्ण से यह कहा—

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 2 (10.17.2)

कथं नु कृष्ण पापेन क्षुद्रेण शठबुद्धिना । द्रौणिना निहताः सर्वे मम पुत्रा महारथाः ॥

kathaṃ nu kṛṣṇa pāpena kṣudreṇa śaṭhabuddhinā | drauṇinā nihatāḥ sarve mama putrā mahārathāḥ

'हे कृष्ण, पापी, क्षुद्र और कुटिल बुद्धिवाले द्रोणपुत्र ने मेरे सभी महारथी पुत्रों को कैसे मार डाला?

श्लोक 3 (10.17.3)

तथा कृतास्त्रविक्रान्ताः सङ्ग्रामेष्वपलायिनः । द्रुपदस्यात्मजाश्चैव द्रोणपुत्रेण पातिताः ॥

tathā kṛtāstravikrāntāḥ saṅgrāmeṣvapalāyinaḥ | drupadasyātmajāścaiva droṇaputreṇa pātitāḥ

और अस्त्रविद्या में निपुण, पराक्रमी तथा युद्धों में कभी पीछे न हटनेवाले द्रुपद के पुत्र भी द्रोणपुत्र के हाथों गिरा दिए गए।

श्लोक 4 (10.17.4)

यस्य द्रोणो महेष्वासो न प्रादादाहवे मुखम् । निजघ्ने रथिनां श्रेष्ठं धृष्टद्युम्नं कथं नु सः ॥

yasya droṇo maheṣvāso na prādādāhave mukham | nijaghne rathināṃ śreṣṭhaṃ dhṛṣṭadyumnaṃ kathaṃ nu saḥ

जिसका सामना महाधनुर्धर द्रोण ने भी युद्ध में नहीं किया, रथियों में श्रेष्ठ उस धृष्टद्युम्न को उसने कैसे मार डाला?

श्लोक 5 (10.17.5)

किन्नु तेन कृतं कर्म तथायुक्तं नरर्षभ । यदेकः समरे सर्वानवधीन्नो गुरोः सुतः ॥

kinnu tena kṛtaṃ karma tathāyuktaṃ nararṣabha | yadekaḥ samare sarvānavadhīnno guroḥ sutaḥ

हे नरश्रेष्ठ, उसने ऐसा कौन-सा कर्म किया था कि गुरुपुत्र अकेला ही युद्ध में हम सबको मार गया?'

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 6 (10.17.6)

नूनं स देवदेवानामीश्वरेश्वरमव्ययम् । जगाम शरणं द्रौणिरेकस्तेनावधीद्बहून् ॥

nūnaṃ sa devadevānāmīśvareśvaramavyayam | jagāma śaraṇaṃ drauṇirekastenāvadhīdbahūn

निश्चय ही द्रोणपुत्र अकेला देवों के देव, ईश्वरों के भी ईश्वर, अविनाशी महादेव की शरण गया था; इसी से उसने बहुतों को मार डाला।

श्लोक 7 (10.17.7)

प्रसन्नो हि महादेवो दद्यादमरतामपि । वीर्यं च गिरिशो दद्याद्येनेन्द्रमपि शातयेत् ॥

prasanno hi mahādevo dadyādamaratāmapi | vīryaṃ ca giriśo dadyādyenendramapi śātayet

क्योंकि प्रसन्न होने पर महादेव अमरत्व तक दे सकते हैं, और गिरीश वह बल दे सकते हैं जिससे इन्द्र को भी गिराया जा सके।

श्लोक 8 (10.17.8)

वेदाहं हि महादेवं तत्त्वेन भरतर्षभ । यानि चास्यपुराणानि कर्माणि विविधानि च ॥

vedāhaṃ hi mahādevaṃ tattvena bharatarṣabha | yāni cāsyapurāṇāni karmāṇi vividhāni ca

हे भरतश्रेष्ठ, मैं महादेव को यथार्थ रूप से जानता हूँ, और उनके प्राचीन तथा नाना प्रकार के कर्मों को भी।

श्लोक 9 (10.17.9)

आदिरेष हि भूतानां मध्यमन्तश्च भारत । विचेष्टते जगच्चेदं सर्वमस्यैव कर्मणा ॥

ādireṣa hi bhūtānāṃ madhyamantaśca bhārata | viceṣṭate jagaccedaṃ sarvamasyaiva karmaṇā

हे भारत, वे ही प्राणियों के आदि, मध्य और अन्त हैं; यह सारा जगत् उन्हीं के कर्म से चेष्टा करता है।

श्लोक 10 (10.17.10)

एवं सिसृक्षुर्भूतानि ददर्श प्रथमं विभुः । पितामहोऽब्रवीच्चैनं भूतानि सृज माचिरम् ॥

evaṃ sisṛkṣurbhūtāni dadarśa prathamaṃ vibhuḥ | pitāmaho'bravīccainaṃ bhūtāni sṛja māciram

इस प्रकार प्राणियों की सृष्टि करने की इच्छा से प्रभु ने पहले दृष्टि डाली; तब पितामह ने उनसे कहा, 'प्राणियों की सृष्टि करो, देर मत करो।'

श्लोक 11 (10.17.11)

हरिकेशस्तथेत्युक्त्वा दीर्घदर्शी तदा प्रभुः । दीर्घकालं तपस्तेपे मग्नोऽम्भसि महातपाः ॥

harikeśastathetyuktvā dīrghadarśī tadā prabhuḥ | dīrghakālaṃ tapastepe magno'mbhasi mahātapāḥ

'ऐसा ही हो' कहकर दूरदर्शी, महातपस्वी हरिकेश प्रभु पानी में डूबकर बहुत समय तक तप करते रहे।

श्लोक 12 (10.17.12)

सुमहान्तं ततः कालं प्रतीक्ष्यैनं पितामहः । स्रष्टारं सर्वभूतानां ससर्ज मनसाऽपरम् ॥

sumahāntaṃ tataḥ kālaṃ pratīkṣyainaṃ pitāmahaḥ | sraṣṭāraṃ sarvabhūtānāṃ sasarja manasā'param

पितामह ने उनकी बहुत समय तक प्रतीक्षा की; फिर मन से सब प्राणियों के एक और स्रष्टा को उत्पन्न किया।

श्लोक 13 (10.17.13)

सोऽब्रवीत्पितरं दृष्ट्वा गिरिशं सुप्तमम्भसि । यदि मे नाग्रजोऽस्त्यन्यस्ततः स्रक्ष्याम्यहं प्रजाः ॥

so'bravītpitaraṃ dṛṣṭvā giriśaṃ suptamambhasi | yadi me nāgrajo'styanyastataḥ srakṣyāmyahaṃ prajāḥ

जल में सोए हुए गिरिश को देखकर उसने पिता से कहा, 'यदि मुझसे पहले जन्मा कोई दूसरा नहीं है तो मैं प्रजा की सृष्टि करूँगा।'

श्लोक 14 (10.17.14)

तमब्रवीत्पिता नास्ति त्वदन्यः पुरुषोऽग्रजः । स्थाणुरेष जले मग्नो विस्रब्धः कुरु वै प्रजाः ॥

tamabravītpitā nāsti tvadanyaḥ puruṣo'grajaḥ | sthāṇureṣa jale magno visrabdhaḥ kuru vai prajāḥ

पिता ने उससे कहा, 'तुमसे पहले जन्मा कोई दूसरा पुरुष नहीं है। ये स्थाणु जल में डूबे हुए हैं; तुम निश्चिन्त होकर प्रजा की सृष्टि करो।'

श्लोक 15 (10.17.15)

भूतान्यन्वसृजत्सप्त दक्षः क्षिप्रं प्रजापतिः । यैरिमं व्यकरोत्सर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् ॥

bhūtānyanvasṛjatsapta dakṣaḥ kṣipraṃ prajāpatiḥ | yairimaṃ vyakarotsarvaṃ bhūtagrāmaṃ caturvidham

प्रजापति दक्ष ने शीघ्र ही सात प्रकार के प्राणी रचे, जिनसे उसने चार प्रकार के इस सारे प्राणिसमूह को बनाया।

श्लोक 16 (10.17.16)

ताः सृष्टमात्राः क्षुधिताः प्रजाः सर्वाः प्रजापतिम् । बिभक्षयिषवो राजन्सहसा प्राद्रवंस्तदा ॥

tāḥ sṛṣṭamātrāḥ kṣudhitāḥ prajāḥ sarvāḥ prajāpatim | bibhakṣayiṣavo rājansahasā prādravaṃstadā

हे राजन्, वे सब प्रजाएँ उत्पन्न होते ही भूखी होकर प्रजापति को खा जाने की इच्छा से अचानक उसकी ओर दौड़ीं।

श्लोक 17 (10.17.17)

स भक्ष्यमाणस्त्राणार्थी पितामहमुपाद्रवत् । आभ्यो मां भगवांस्त्रातु वृत्तिरासां विधीयताम् ॥

sa bhakṣyamāṇastrāṇārthī pitāmahamupādravat | ābhyo māṃ bhagavāṃstrātu vṛttirāsāṃ vidhīyatām

खाए जाते हुए उसने रक्षा के लिए पितामह की शरण ली, 'भगवन्, मुझे इनसे बचाइए और इनके लिए जीविका का विधान कीजिए।'

श्लोक 18 (10.17.18)

ततस्ताभ्यो ददावन्नमोषधीः स्थावराणि च । जङ्गमानि च भूतानि दुर्बलानि बलीयसाम् ॥

tatastābhyo dadāvannamoṣadhīḥ sthāvarāṇi ca | jaṅgamāni ca bhūtāni durbalāni balīyasām

तब पितामह ने उन्हें अन्न दिया—ओषधियाँ और स्थावर वस्तुएँ, तथा चलनेवाले दुर्बल प्राणी बलवानों के लिए।

श्लोक 19 (10.17.19)

विहितान्नाः प्रजास्तास्तु जग्मुस्तुष्टा यथागतम् । ततो ववृधिरे राजन्प्रीतिमत्यः स्वयोनिषु ॥

vihitānnāḥ prajāstāstu jagmustuṣṭā yathāgatam | tato vavṛdhire rājanprītimatyaḥ svayoniṣu

जीविका पाकर वे प्रजाएँ सन्तुष्ट होकर जैसे आई थीं वैसे लौट गईं; हे राजन्, फिर वे अपनी-अपनी योनियों में प्रसन्न होकर बढ़ने लगीं।

श्लोक 20 (10.17.20)

भूतग्रामे विवृद्धे तु सृष्टे देवासुरे तदा । उदतिष्ठज्जलाज्ज्येष्ठः प्रजाश्चेमा ददर्श सः ॥

bhūtagrāme vivṛddhe tu sṛṣṭe devāsure tadā | udatiṣṭhajjalājjyeṣṭhaḥ prajāścemā dadarśa saḥ

जब प्राणियों का समूह बढ़ गया और देवता तथा असुर रचे जा चुके, तब सबसे ज्येष्ठ जल से उठे और इन प्रजाओं को देखा।

श्लोक 21 (10.17.21)

बहुरूपाः प्रजाः सृष्टा विवृद्धाश्च स्वतेजसा । चुक्रोध बलवद्दृष्ट्वा लिङ्गं स्वं चाप्यविध्यत ॥

bahurūpāḥ prajāḥ sṛṣṭā vivṛddhāśca svatejasā | cukrodha balavaddṛṣṭvā liṅgaṃ svaṃ cāpyavidhyata

नाना रूपोंवाली प्रजाओं को अपने तेज से बढ़ा हुआ देखकर वे बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने अपने लिङ्ग को बींध डाला।

श्लोक 22 (10.17.22)

तत्प्रविद्धं तथा भूमौ तथैव प्रत्यतिष्ठत । तमुवाचाव्ययो ब्रह्मा वचोभिः शमयन्निव ॥

tatpraviddhaṃ tathā bhūmau tathaiva pratyatiṣṭhata | tamuvācāvyayo brahmā vacobhiḥ śamayanniva

वह फेंका हुआ लिङ्ग भूमि में वैसा ही खड़ा रह गया। तब अविनाशी ब्रह्मा ने मानो वचनों से उन्हें शान्त करते हुए कहा—

ब्रह्मोवाच

श्लोक 23 (10.17.23)

किं कृतं सलिले शर्व चिरकालस्थितेन ते । किमर्थं चेदमुत्पाद्य लिङ्गं भूमौ प्रवेशितम् ॥

kiṃ kṛtaṃ salile śarva cirakālasthitena te | kimarthaṃ cedamutpādya liṅgaṃ bhūmau praveśitam

'हे शर्व, जल में इतने समय तक रहकर तुमने क्या किया? और इस लिङ्ग को उत्पन्न करके तुमने इसे भूमि में क्यों गाड़ दिया?'

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 24 (10.17.24)

सोऽब्रवीज्जातसंरम्भस्तथा लोकगुरुर्गुरुम् । प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः किं करिष्याम्यनेन वै ॥

so'bravījjātasaṃrambhastathā lokagururgurum | prajāḥ sṛṣṭāḥ pareṇemāḥ kiṃ kariṣyāmyanena vai

तब क्रोध से भरे लोकगुरु ने गुरु से कहा, 'ये प्रजाएँ तो दूसरे ने रच दीं; अब मैं इसका क्या करूँगा?'

महादेव उवाच

श्लोक 25 (10.17.25)

प्रजाः सृष्टाः परेणेमाः प्रजार्थं मे पितामह । ओषध्यः परिवर्तेरन्यथैवं सततं प्रजाः ॥

prajāḥ sṛṣṭāḥ pareṇemāḥ prajārthaṃ me pitāmaha | oṣadhyaḥ parivarteranyathaivaṃ satataṃ prajāḥ

'हे पितामह, ये प्रजाएँ दूसरे ने रची हैं; प्रजाओं के लिए ओषधियाँ बार-बार उगती रहें, जिससे प्रजा निरन्तर इसी प्रकार बनी रहे।'

श्रीभगवानुवाच

श्लोक 26 (10.17.26)

एवमुक्त्वा स सक्रोधो जगाम विमना भवः । गिरेर्मुञ्जवतः पादं तपस्तप्तुं महातपाः ॥

evamuktvā sa sakrodho jagāma vimanā bhavaḥ | girermuñjavataḥ pādaṃ tapastaptuṃ mahātapāḥ

यह कहकर क्रोधित और उदास भव महातपस्वी तप करने के लिए मुञ्जवान् पर्वत की तलहटी की ओर चले गए।

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