सौप्तिक पर्व · अध्याय 18
रुद्र द्वारा देवताओं के यज्ञ का विध्वंस
कृष्ण महादेव की कथा आगे कहते हैं। जब देवताओं ने रुद्र को न जानते हुए अपने यज्ञ में उनका भाग नियत नहीं किया, तो उन्होंने यज्ञों से धनुष बनाया और क्रोध में यज्ञ-स्थल पर आए; मृग का रूप धरकर भागते यज्ञ को बाण से बींधा और सविता की भुजाएँ, भग की आँखें तथा पूषा के दाँत तोड़ डाले। देवताओं ने उनके धनुष की प्रत्यञ्चा काट दी और उनकी शरण ली; वे प्रसन्न हुए, जो कुछ लिया था वह लौटा दिया और उन्हें उनका भाग दिया गया। कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि पुत्रों और पाञ्चालों का मारा जाना महादेव की कृपा थी, द्रोणपुत्र का किया नहीं, और उनसे अब आगे का कर्तव्य निभाने को कहते हैं। यहाँ सौप्तिक पर्व समाप्त होता है।
श्रीभगवानुवाच
श्लोक 1 (10.18.1)
ततो देवयुगेऽतीते देवा वै समकल्पयन् । यज्ञवेदप्रमाणेन विधिवद्यष्टुमीप्सवः ॥
tato devayuge'tīte devā vai samakalpayan | yajñavedapramāṇena vidhivadyaṣṭumīpsavaḥ
फिर देवयुग बीत जाने पर देवताओं ने यज्ञ और वेद की प्रमाणता के अनुसार विधिपूर्वक यज्ञ करने की इच्छा से तैयारी की।
श्लोक 2 (10.18.2)
कल्पयामासुरथ ते साधनानि हवींषि च । भागार्हा देवताश्चैव यज्ञियं द्रव्यमेव च ॥
kalpayāmāsuratha te sādhanāni havīṃṣi ca | bhāgārhā devatāścaiva yajñiyaṃ dravyameva ca
उन्होंने साधन और हवि, भाग के योग्य देवता, और यज्ञ के योग्य सामग्री जुटाई।
श्लोक 3 (10.18.3)
ता वै रुद्रमजानन्त्यो याथातथ्येन देवताः । नाकल्पयन्त देवस्य स्थाणोर्भागं नराधिप ॥
tā vai rudramajānantyo yāthātathyena devatāḥ | nākalpayanta devasya sthāṇorbhāgaṃ narādhipa
हे नराधिप, उन देवताओं ने रुद्र को उनके यथार्थ रूप में न जानते हुए स्थाणु देव का भाग नियत नहीं किया।
श्लोक 4 (10.18.4)
सोऽकल्प्यमाने भागे तु कृत्तिवासा मखेऽमरैः । तपसा यज्ञमन्विच्छन्धनुरादौ ससर्ज ह ॥
so'kalpyamāne bhāge tu kṛttivāsā makhe'maraiḥ | tapasā yajñamanvicchandhanurādau sasarja ha
देवताओं द्वारा यज्ञ में अपना भाग नियत न किए जाने पर कृत्तिवासा ने तप से यज्ञ को पाने की इच्छा करके सबसे पहले एक धनुष रचा।
श्लोक 5 (10.18.5)
लोकयज्ञः क्रियायज्ञो गृहयज्ञः सनातनः । पञ्चभूतनृयज्ञश्च जज्ञे सर्वमिदं जगत् ॥
lokayajñaḥ kriyāyajño gṛhayajñaḥ sanātanaḥ | pañcabhūtanṛyajñaśca jajñe sarvamidaṃ jagat
लोकयज्ञ, क्रियायज्ञ, सनातन गृहयज्ञ, और पञ्चभूत तथा नर का यज्ञ—इनसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ।
श्लोक 6 (10.18.6)
लोकयज्ञैर्नृयज्ञैश्च कपर्दी विदधे धनुः । धनुः सृष्टमभूत्तस्य षष्टिकिष्कुप्रमाणतः ॥
lokayajñairnṛyajñaiśca kapardī vidadhe dhanuḥ | dhanuḥ sṛṣṭamabhūttasya ṣaṣṭikiṣkupramāṇataḥ
लोकयज्ञों और नृयज्ञों से कपर्दी ने धनुष बनाया; उस रचे हुए धनुष का माप साठ किष्कु था।
श्लोक 7 (10.18.7)
वषट्कारोऽभवज्ज्या तु धनुषस्तस्य भारत । यज्ञाङ्गानि च चत्वारि तस्य सन्नहनेऽभवन् ॥
vaṣaṭkāro'bhavajjyā tu dhanuṣastasya bhārata | yajñāṅgāni ca catvāri tasya sannahane'bhavan
हे भारत, उस धनुष की प्रत्यञ्चा वषट्कार हुआ और यज्ञ के चार अङ्ग उसके साज-सामान बने।
श्लोक 8 (10.18.8)
ततः क्रुद्धो महादेवस्तदुपादाय कार्मुकम् । आजगामाथ तत्रैव यत्र देवाः समीजिरे ॥
tataḥ kruddho mahādevastadupādāya kārmukam | ājagāmātha tatraiva yatra devāḥ samījire
तब क्रुद्ध महादेव उस धनुष को लेकर उसी स्थान पर आ पहुँचे जहाँ देवता यज्ञ कर रहे थे।
श्लोक 9 (10.18.9)
तमात्तकार्मुकं दृष्ट्वा ब्रह्मचारिणमव्ययम् । विव्यथे पृथिवी देवी पर्वताश्च चकम्पिरे ॥
tamāttakārmukaṃ dṛṣṭvā brahmacāriṇamavyayam | vivyathe pṛthivī devī parvatāśca cakampire
धनुष लिए हुए उन अविनाशी ब्रह्मचारी को देखकर पृथ्वी देवी काँप उठी और पर्वत हिल गए।
श्लोक 10 (10.18.10)
न ववौ पवनश्चैव नाग्निर्जज्वाल चैधितः । व्यभ्रमच्चापि संविग्नं दिवि नक्षत्रमण्डलम् ॥
na vavau pavanaścaiva nāgnirjajvāla caidhitaḥ | vyabhramaccāpi saṃvignaṃ divi nakṣatramaṇḍalam
वायु नहीं चली, प्रज्वलित अग्नि नहीं जली, और आकाश में नक्षत्रमण्डल घबराकर चक्कर खाने लगा।
श्लोक 11 (10.18.11)
न बभौ भास्करश्चापि सोमः श्रीमुक्तमण्डलः । तिमिरेणाकुलं सर्वमाकाशं चाभवद्वृतम् ॥
na babhau bhāskaraścāpi somaḥ śrīmuktamaṇḍalaḥ | timireṇākulaṃ sarvamākāśaṃ cābhavadvṛtam
सूर्य नहीं चमका, और कान्तिहीन मण्डलवाला चन्द्रमा भी नहीं चमका; सारा आकाश अन्धकार से व्याकुल होकर ढक गया।
श्लोक 12 (10.18.12)
अभिभूतास्ततो देवा विषयान्न प्रजज्ञिरे । न प्रत्यभाच्च यज्ञः स देवतास्त्रेसिरे तथा ॥
abhibhūtāstato devā viṣayānna prajajñire | na pratyabhācca yajñaḥ sa devatāstresire tathā
तब देवता अभिभूत होकर दिशाओं और विषयों को नहीं पहचान सके; यज्ञ प्रकट नहीं हुआ और देवता काँप उठे।
श्लोक 13 (10.18.13)
ततः स यज्ञं विव्याध रौद्रेण हृदि पत्रिणा । अपक्रान्तस्ततो यज्ञो मृगो भूत्वा सपावकः ॥
tataḥ sa yajñaṃ vivyādha raudreṇa hṛdi patriṇā | apakrāntastato yajño mṛgo bhūtvā sapāvakaḥ
तब उन्होंने भयंकर बाण से यज्ञ के हृदय को बींध दिया; यज्ञ अग्नि के साथ मृग बनकर भाग निकला।
श्लोक 14 (10.18.14)
स तु तेनैव रूपेण दिविस्थो वै व्यराजत । अन्वीयमानो रुद्रेण युधिष्ठिर नभस्तले ॥
sa tu tenaiva rūpeṇa divistho vai vyarājata | anvīyamāno rudreṇa yudhiṣṭhira nabhastale
हे युधिष्ठिर, उसी रूप में आकाश में स्थित होकर वह शोभित हो रहा था, और रुद्र आकाश में उसका पीछा कर रहे थे।
श्लोक 15 (10.18.15)
अपक्रान्ते ततो यज्ञे संज्ञा न प्रत्यभात्सुरान् । नष्टसंज्ञेषु देवेषु न प्राज्ञायत किञ्चन ॥
apakrānte tato yajñe saṃjñā na pratyabhātsurān | naṣṭasaṃjñeṣu deveṣu na prājñāyata kiñcana
यज्ञ के चले जाने पर देवताओं को होश नहीं रहा; देवताओं की चेतना नष्ट हो जाने पर कुछ भी जान नहीं पड़ता था।
श्लोक 16 (10.18.16)
त्र्यम्बकः सवितुर्बाहू भगस्य नयने तथा । पूष्णश्च दशनान्क्रुद्धो धनुष्कोट्या व्यशातयत् ॥
tryambakaḥ saviturbāhū bhagasya nayane tathā | pūṣṇaśca daśanānkruddho dhanuṣkoṭyā vyaśātayat
त्र्यम्बक ने क्रोध से अपने धनुष की नोक से सविता की भुजाएँ, भग की आँखें और पूषा के दाँत तोड़ डाले।
श्लोक 17 (10.18.17)
प्राद्रवन् ततो देवा यज्ञाङ्गानि च सर्वशः । केचित्तत्रैव घूर्णन्तो गतासव इवाभवन् ॥
prādravan tato devā yajñāṅgāni ca sarvaśaḥ | kecittatraiva ghūrṇanto gatāsava ivābhavan
तब देवता और यज्ञ के सब अङ्ग चारों ओर भाग खड़े हुए; कुछ वहीं चक्कर खाते हुए मानो प्राणहीन हो गए।
श्लोक 18 (10.18.18)
स तु विद्राव्य तत्सर्वं शितिकण्ठोऽवहस्य च । अवष्टभ्य धनुष्कोटिं रुरोध विबुधांस्ततः ॥
sa tu vidrāvya tatsarvaṃ śitikaṇṭho'vahasya ca | avaṣṭabhya dhanuṣkoṭiṃ rurodha vibudhāṃstataḥ
वह शितिकण्ठ उन सबको भगाकर हँसे और धनुष की नोक टेककर देवताओं को आगे बढ़ने से रोक लिया।
श्लोक 19 (10.18.19)
ततो वागमरैरुक्ता ज्यां तस्य धनुषोऽच्छिनत् । अथ तत्सहसा राजंश्छिन्नज्यं विस्फुरद्धनुः ॥
tato vāgamarairuktā jyāṃ tasya dhanuṣo'cchinat | atha tatsahasā rājaṃśchinnajyaṃ visphuraddhanuḥ
तब देवताओं द्वारा कही गई वाणी ने उस धनुष की प्रत्यञ्चा काट दी; हे राजन्, तब प्रत्यञ्चा कटा वह धनुष सहसा काँपता हुआ छिटक गया।
श्लोक 20 (10.18.20)
ततो विधनुषं देवा देवश्रेष्ठमुपागमन् । शरणं सह यज्ञेन प्रसादं चाकरोत्प्रभुः ॥
tato vidhanuṣaṃ devā devaśreṣṭhamupāgaman | śaraṇaṃ saha yajñena prasādaṃ cākarotprabhuḥ
तब देवता धनुषहीन देवश्रेष्ठ के पास यज्ञ-सहित शरण में आए, और प्रभु ने कृपा की।
श्लोक 21 (10.18.21)
ततः प्रसन्नो भगवान्प्रास्यत्कोपं जलाशये । स जलं पावको भूत्वा शोषयत्यनिशं प्रभो ॥
tataḥ prasanno bhagavānprāsyatkopaṃ jalāśaye | sa jalaṃ pāvako bhūtvā śoṣayatyaniśaṃ prabho
तब प्रसन्न होकर भगवान् ने अपना क्रोध जल में डाल दिया; हे प्रभो, वह अग्नि बनकर जल को निरन्तर सुखाता रहता है।
श्लोक 22 (10.18.22)
भगस्य नयने चैव बाहू च सवितुस्तथा । प्रादात्पूष्णश्च दशनान्पुनर्यज्ञांश्च पाण्डव ॥
bhagasya nayane caiva bāhū ca savitustathā | prādātpūṣṇaśca daśanānpunaryajñāṃśca pāṇḍava
उन्होंने भग की आँखें, सविता की भुजाएँ और पूषा के दाँत, तथा यज्ञ भी फिर दे दिए, हे पाण्डव।
श्लोक 23 (10.18.23)
ततः सुस्थमिदं सर्वं बभूव पुनरेव हि । सर्वाणि च हवींष्यस्य देवा भागमकल्पयन् ॥
tataḥ susthamidaṃ sarvaṃ babhūva punareva hi | sarvāṇi ca havīṃṣyasya devā bhāgamakalpayan
तब यह सब फिर पहले की तरह स्वस्थ हो गया, और देवताओं ने उनके लिए सभी हवियों में भाग नियत किया।
श्लोक 24 (10.18.24)
तस्मिन्क्रुद्धेऽभवत्सर्वमसुस्थं भुवनं प्रभो । प्रसन्ने च पुनः सुस्थं जगद्भवति भारत ॥
tasminkruddhe'bhavatsarvamasusthaṃ bhuvanaṃ prabho | prasanne ca punaḥ susthaṃ jagadbhavati bhārata
हे प्रभो, उनके क्रुद्ध होने पर सारा जगत् अस्वस्थ हो गया; और हे भारत, उनके प्रसन्न होने पर जगत् फिर स्वस्थ हो जाता है।
श्लोक 25 (10.18.25)
ततस्ते निहताः सर्वे तव पुत्रा महारथाः । अन्ये च बहवः शूराः पाञ्चालस्य पदानुगाः ॥
tataste nihatāḥ sarve tava putrā mahārathāḥ | anye ca bahavaḥ śūrāḥ pāñcālasya padānugāḥ
इसी प्रकार तुम्हारे सब महारथी पुत्र मारे गए, और अन्य बहुत से शूर, पाञ्चाल के अनुयायी भी।
श्लोक 26 (10.18.26)
न तन्मनसि कर्तव्यं न च तद्द्रौणिना कृतम् । महादेवप्रसादः स कुरुकार्यमनन्तरम् ॥
na tanmanasi kartavyaṃ na ca taddrauṇinā kṛtam | mahādevaprasādaḥ sa kurukāryamanantaram
इसे मन में नहीं लाना चाहिए, और यह द्रोणपुत्र का किया भी नहीं है; वह महादेव की कृपा थी। अब आगे जो करना है, वह करो।