सौप्तिक पर्व · अध्याय 9
दुर्योधन का देहावसान
अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा टूटी जाँघों वाले, मरणासन्न दुर्योधन को रणभूमि में पशुओं से घिरा पाते हैं और उसके लिए विलाप करते हैं। अश्वत्थामा उसे बताता है कि उसने रात में धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्रों और सब पांचालों को मार डाला है; यह सुनकर प्रसन्न दुर्योधन उनसे विदा लेकर प्राण त्याग देता है। तीनों भोर में चले जाते हैं; सञ्जय धृतराष्ट्र को बताता है कि उसकी दिव्य दृष्टि नष्ट हो गई है, और राजा चिन्ता में डूब जाता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (10.9.1)
ते हत्वा सर्वपाञ्चालान्द्रौपदेयांश्च सर्वशः । आगच्छन्सहितास्तत्र यत्र दुर्योधनो हतः ॥
te hatvā sarvapāñcālāndraupadeyāṃśca sarvaśaḥ | āgacchansahitāstatra yatra duryodhano hataḥ
पांचालों और द्रौपदी के सभी पुत्रों का सब ओर से संहार करके वे सब एक साथ वहाँ आए, जहाँ दुर्योधन गिरा पड़ा था।
श्लोक 2 (10.9.2)
गत्वा चैनमपश्यन्त किञ्चित्प्राणं जनाधिपम् । ततो रथेभ्यः प्रस्कन्द्य परिवव्रुस्तवात्मजम् ॥
gatvā cainamapaśyanta kiñcitprāṇaṃ janādhipam | tato rathebhyaḥ praskandya parivavrustavātmajam
वहाँ पहुँचकर उन्होंने आपके पुत्र राजा को थोड़े-से प्राण लिए पड़े देखा, और रथों से कूदकर उसे चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 3 (10.9.3)
तं भग्नसक्थं राजेन्द्र कृच्छ्रप्राणमचेतसम् । वमन्तं रुधिरं वक्त्रादपश्यन्वसुधातले ॥
taṃ bhagnasakthaṃ rājendra kṛcchraprāṇamacetasam | vamantaṃ rudhiraṃ vaktrādapaśyanvasudhātale
हे राजेन्द्र! उन्होंने उसे भूमि पर इस दशा में देखा कि जाँघें टूटी हुई थीं, प्राण बड़ी कठिनाई से टिके थे, चेतना जा चुकी थी और मुख से रक्त उगल रहा था।
श्लोक 4 (10.9.4)
वृतं समन्ताद्बहुभिः श्वापदैर्घोरदर्शनैः । सालावृकगणैश्चैव भक्षयिष्यद्भिरन्तिकात् ॥
vṛtaṃ samantādbahubhiḥ śvāpadairghoradarśanaiḥ | sālāvṛkagaṇaiścaiva bhakṣayiṣyadbhirantikāt
वह चारों ओर से बहुत-से भयंकर दिखने वाले हिंस्र पशुओं और सियारों-भेड़ियों के झुंडों से घिरा था, जो पास से ही उसे खा जाना चाहते थे।
श्लोक 5 (10.9.5)
निवारयन्तं कृच्छ्रात्ताञ्श्वापदांश्च चिखादिषून् । विवेष्टमानमुरुभ्यां सुभृशं गाढवेदनम् ॥
nivārayantaṃ kṛcchrāttāñśvāpadāṃśca cikhādiṣūn | viveṣṭamānamurubhyāṃ subhṛśaṃ gāḍhavedanam
वह बड़े कष्ट से उन खा जाने को उत्सुक पशुओं को हटा रहा था, और जाँघों की गहरी पीड़ा से बुरी तरह तड़प रहा था।
श्लोक 6 (10.9.6)
तं शयानं तथा दृष्ट्वा भूमौ सुरुधिरोक्षितम् । हतशिष्टास्त्रयो वीराः शोकार्ताः पर्यदेवयन् । अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ॥
taṃ śayānaṃ tathā dṛṣṭvā bhūmau surudhirokṣitam | hataśiṣṭāstrayo vīrāḥ śokārtāḥ paryadevayan | aśvatthāmā kṛpaścaiva kṛtavarmā ca sātvataḥ
उसे इस प्रकार रक्त से लथपथ भूमि पर पड़ा देखकर बचे हुए तीनों वीर, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और सात्वत कृतवर्मा, शोक से व्याकुल होकर विलाप करने लगे।
श्लोक 7 (10.9.7)
तैस्त्रिभिः शोणितादिग्धैर्निःश्वसद्भिर्महारथैः । शुशुभे स वृतो राजा वेदी त्रिभिरिवाग्निभिः ॥
taistribhiḥ śoṇitādigdhairniḥśvasadbhirmahārathaiḥ | śuśubhe sa vṛto rājā vedī tribhirivāgnibhiḥ
रक्त से सने, लम्बी साँसें भरते उन तीन महारथियों से घिरा हुआ वह राजा ऐसा शोभित हुआ, जैसे तीन अग्नियों से घिरी हुई यज्ञवेदी।
श्लोक 8 (10.9.8)
ते तं शयानं सम्प्रेक्ष्य राजानमतथोचितम् । अविषह्येन दुःखेन ततस्ते रुरुदुस्त्रयः ॥
te taṃ śayānaṃ samprekṣya rājānamatathocitam | aviṣahyena duḥkhena tataste rurudustrayaḥ
राजा को ऐसी अयोग्य दशा में पड़ा देखकर वे तीनों असह्य दुःख से रो पड़े।
श्लोक 9 (10.9.9)
ततस्तु रुधिरं हस्तैर्मुखान्निर्मृज्य तस्य हि । रणे राज्ञः शयानस्य कृपः सम्पर्यदेवयत् ॥
tatastu rudhiraṃ hastairmukhānnirmṛjya tasya hi | raṇe rājñaḥ śayānasya kṛpaḥ samparyadevayat
तब कृपाचार्य ने रणभूमि में पड़े राजा के मुख से अपने हाथों से रक्त पोंछकर विलाप किया।
कृप उवाच
श्लोक 10 (10.9.10)
न दैवस्यातिभारोऽस्ति यदयं रुधिरोक्षितः । एकादशचमूभर्ता शेते दुर्योधनो हतः ॥
na daivasyātibhāro'sti yadayaṃ rudhirokṣitaḥ | ekādaśacamūbhartā śete duryodhano hataḥ
दैव के लिए कुछ भी अधिक भारी नहीं है: ग्यारह अक्षौहिणी सेना का स्वामी यह दुर्योधन मारा जाकर रक्त से लथपथ यहाँ पड़ा है।
श्लोक 11 (10.9.11)
पश्य चामीकराभस्य चामीकरविभूषिताम् । गदां गदाप्रियस्येमां समीपे पतितां भुवि ॥
paśya cāmīkarābhasya cāmīkaravibhūṣitām | gadāṃ gadāpriyasyemāṃ samīpe patitāṃ bhuvi
देखो, सोने जैसी कान्ति वाले और गदा से प्रेम करने वाले इस राजा की सोने से सजी यह गदा इसके पास भूमि पर पड़ी है।
श्लोक 12 (10.9.12)
इयमेनं गदा शूरं न जहाति रणेरणे । स्वर्गायापि व्रजन्तं हि न जहाति यशस्विनम् ॥
iyamenaṃ gadā śūraṃ na jahāti raṇeraṇe | svargāyāpi vrajantaṃ hi na jahāti yaśasvinam
यह गदा हर युद्ध में इस शूर को कभी नहीं छोड़ती थी; स्वर्ग को जाते हुए इस यशस्वी को भी यह नहीं छोड़ रही।
श्लोक 13 (10.9.13)
पश्येमां सह वीरेण जाम्बूनदविभूषिताम् । शयानां शयने हर्म्ये भार्यां प्रीतिमतीमिव ॥
paśyemāṃ saha vīreṇa jāmbūnadavibhūṣitām | śayānāṃ śayane harmye bhāryāṃ prītimatīmiva
देखो, जाम्बूनद सोने से सजी यह गदा वीर के साथ ऐसे सोई है, जैसे महल के शयन-कक्ष में पति के साथ सोई हुई प्रेम करने वाली पत्नी।
श्लोक 14 (10.9.14)
योऽयं मूर्धाभिषिक्तानामग्रे याति परन्तपः । स हतो ग्रसते पांसून्पश्य कालस्य पर्ययम् ॥
yo'yaṃ mūrdhābhiṣiktānāmagre yāti parantapaḥ | sa hato grasate pāṃsūnpaśya kālasya paryayam
जो शत्रुओं को तपाने वाला राजा मूर्धाभिषिक्त राजाओं के आगे-आगे चलता था, वही आज मारा जाकर धूल फाँक रहा है। काल का यह फेर देखो।
श्लोक 15 (10.9.15)
येनाजौ निहता भूमौ शेरते क्षत्रियर्षभाः । स भूमौ निहतः शेते कुरुराजः परैरयम् ॥
yenājau nihatā bhūmau śerate kṣatriyarṣabhāḥ | sa bhūmau nihataḥ śete kururājaḥ parairayam
जिसके द्वारा युद्ध में मारे गए श्रेष्ठ क्षत्रिय भूमि पर सोते हैं, वही यह कुरुराज शत्रुओं के हाथों मारा जाकर भूमि पर पड़ा है।
श्लोक 16 (10.9.16)
भयान्नमन्ति राजानो यस्य स्म शतसङ्घशः । स वीरशयने शेते क्रव्याद्भिः परिवारितः ॥
bhayānnamanti rājāno yasya sma śatasaṅghaśaḥ | sa vīraśayane śete kravyādbhiḥ parivāritaḥ
जिसके भय से सैकड़ों-सैकड़ों राजा झुकते थे, वही मांसभक्षी जीवों से घिरा हुआ वीरशय्या पर पड़ा है।
श्लोक 17 (10.9.17)
यमुपासन्नृपाः पूर्वमर्थहेतोर्महीपतिम् । उपासते च तं ह्यद्य क्रव्यादा मांसगृद्धिनः ॥
yamupāsannṛpāḥ pūrvamarthahetormahīpatim | upāsate ca taṃ hyadya kravyādā māṃsagṛddhinaḥ
जिस राजा की सेवा में पहले राजा लोग धन के लिए रहते थे, उसी की सेवा आज मांस के लोभी मांसभक्षी जीव कर रहे हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 18 (10.9.18)
तं शयानं कुरुश्रेष्ठं ततो भरतसत्तमम् । अश्वत्थामा समालिङ्ग्य करुणं पर्यदेवयत् ॥
taṃ śayānaṃ kuruśreṣṭhaṃ tato bharatasattamam | aśvatthāmā samāliṅgya karuṇaṃ paryadevayat
तब अश्वत्थामा ने भूमि पर पड़े उस कुरुश्रेष्ठ, भरतवंश के सर्वोत्तम राजा को गले लगाकर करुण विलाप किया।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 19 (10.9.19)
आहुस्त्वां राजशार्दूल मुख्यं सर्वधनुष्मताम् । धनाध्यक्षोपमं युद्धे शिष्यं सङ्कर्षणस्य च ॥
āhustvāṃ rājaśārdūla mukhyaṃ sarvadhanuṣmatām | dhanādhyakṣopamaṃ yuddhe śiṣyaṃ saṅkarṣaṇasya ca
हे राजाओं में सिंह! लोग तुम्हें समस्त धनुर्धारियों में प्रमुख, युद्ध में धनाध्यक्ष कुबेर के समान और संकर्षण (बलराम) का शिष्य कहते थे।
श्लोक 20 (10.9.20)
कथं विवरमद्राक्षीद्भीमसेनस्तवानघ । बलिनं कृतिनो नित्यं सूदः पापात्मवान्नृप ॥
kathaṃ vivaramadrākṣīdbhīmasenastavānagha | balinaṃ kṛtino nityaṃ sūdaḥ pāpātmavānnṛpa
हे निष्पाप! वह पापी रसोइया भीमसेन तुम्हारी कोई दुर्बलता कैसे पा गया, जबकि तुम बलवान और सदा कृतकार्य थे?
श्लोक 21 (10.9.21)
कालो नूनं महाराज लोकेऽस्मिन्बलवत्तरः । पश्यामो निहतं त्वां च भीमसेनेन संयुगे ॥
kālo nūnaṃ mahārāja loke'sminbalavattaraḥ | paśyāmo nihataṃ tvāṃ ca bhīmasenena saṃyuge
हे महाराज! निश्चय ही इस संसार में काल सबसे बलवान है, तभी हम तुम्हें युद्ध में भीमसेन के हाथों मारा गया देख रहे हैं।
श्लोक 22 (10.9.22)
कथं त्वां सर्वधर्मज्ञं क्षुद्रः पापो वृकोदरः । निकृत्या हतवान्मन्दो नूनं कालो दुरत्ययः ॥
kathaṃ tvāṃ sarvadharmajñaṃ kṣudraḥ pāpo vṛkodaraḥ | nikṛtyā hatavānmando nūnaṃ kālo duratyayaḥ
सब धर्मों को जानने वाले तुम्हें वह नीच, पापी और मूर्ख वृकोदर छल से कैसे मार सका? निश्चय ही काल का उल्लंघन करना कठिन है।
श्लोक 23 (10.9.23)
द्वन्द्वयुद्धे ह्यधर्मेण समाहूयौजसा मृधे । गदया भीमसेनेन निर्भग्ने सक्थिनी तव ॥
dvandvayuddhe hyadharmeṇa samāhūyaujasā mṛdhe | gadayā bhīmasenena nirbhagne sakthinī tava
द्वन्द्वयुद्ध के लिए ललकारे जाने के बाद अधर्म से लड़ते हुए युद्ध में भीमसेन की गदा से तुम्हारी दोनों जाँघें तोड़ दी गईं।
श्लोक 24 (10.9.24)
अधर्मेण हतस्याजौ मृद्यमानं पदा शिरः । य उपेक्षितवान्क्षुद्रं धिक्तमस्तु युधिष्ठिरम् ॥
adharmeṇa hatasyājau mṛdyamānaṃ padā śiraḥ | ya upekṣitavānkṣudraṃ dhiktamastu yudhiṣṭhiram
युद्ध में अधर्म से मारे गए तुम्हारे सिर को पैर से कुचला जा रहा था, और जिस क्षुद्र ने उसकी उपेक्षा की, उस युधिष्ठिर को धिक्कार है!
श्लोक 25 (10.9.25)
युद्धेष्वपवदिष्यन्ति योधा नूनं वृकोदरम् । यावत्स्थास्यन्ति भूतानि निकृत्या ह्यसि पातितः ॥
yuddheṣvapavadiṣyanti yodhā nūnaṃ vṛkodaram | yāvatsthāsyanti bhūtāni nikṛtyā hyasi pātitaḥ
जब तक प्राणी रहेंगे, तब तक योद्धा युद्धों में वृकोदर की निन्दा करेंगे, क्योंकि तुम छल से गिराए गए हो।
श्लोक 26 (10.9.26)
ननु रामोऽब्रवीद्राजंस्त्वां सदा यदुनन्दनः । दुर्योधनसमो नास्ति गदायामिति वीर्यवान् ॥
nanu rāmo'bravīdrājaṃstvāṃ sadā yadunandanaḥ | duryodhanasamo nāsti gadāyāmiti vīryavān
हे राजन्! क्या यदुनन्दन बलराम तुम्हारे विषय में सदा नहीं कहते थे कि गदा में दुर्योधन के समान कोई नहीं है? वे पराक्रमी ऐसा कहते थे।
श्लोक 27 (10.9.27)
श्लाघते त्वां हि वार्ष्णेयो राजन्संसत्सु भारत । स शिष्यो मम कौरव्यो गदायुद्ध इति प्रभो ॥
ślāghate tvāṃ hi vārṣṇeyo rājansaṃsatsu bhārata | sa śiṣyo mama kauravyo gadāyuddha iti prabho
हे भारत! वृष्णिवंशी बलराम सभाओं में तुम्हारी प्रशंसा करते थे, हे प्रभो: "गदायुद्ध में यह कौरव मेरा शिष्य है।"
श्लोक 28 (10.9.28)
यां गतिं क्षत्रियस्याहुः प्रशस्तां परमर्षयः । हतस्याभिमुखस्याजौ प्राप्तस्त्वमसि तां गतिम् ॥
yāṃ gatiṃ kṣatriyasyāhuḥ praśastāṃ paramarṣayaḥ | hatasyābhimukhasyājau prāptastvamasi tāṃ gatim
श्रेष्ठ ऋषि क्षत्रिय के लिए जिस गति को सर्वोत्तम बताते हैं, अर्थात् युद्ध में शत्रु के सम्मुख मारा जाना, वही गति तुमने पाई है।
श्लोक 29 (10.9.29)
दुर्योधन न शोचामि त्वामहं पुरुषर्षभ । हतपुत्रौ तु शोचामि गान्धारीं पितरं च ते ॥
duryodhana na śocāmi tvāmahaṃ puruṣarṣabha | hataputrau tu śocāmi gāndhārīṃ pitaraṃ ca te
हे पुरुषश्रेष्ठ दुर्योधन! मैं तुम्हारे लिए शोक नहीं करता; मैं तो पुत्र खो चुकी गान्धारी और तुम्हारे पिता के लिए शोक करता हूँ।
श्लोक 30 (10.9.30)
द्वावनाथौ कृतौ वीर त्वया नाथेन वर्धितौ । भिक्षुकौ विचरिष्येते शोचन्तौ पृथिवीमिमाम् ॥
dvāvanāthau kṛtau vīra tvayā nāthena vardhitau | bhikṣukau vicariṣyete śocantau pṛthivīmimām
हे वीर! तुम जिनके नाथ बनकर उनका पालन कर रहे थे, उन दोनों को तुमने अनाथ कर दिया; अब वे शोक करते हुए भिखारी बनकर इस पृथ्वी पर भटकेंगे।
श्लोक 31 (10.9.31)
धिगस्तु कृष्णं वार्ष्णेयमर्जुनं चापि दुर्मतिम् । धर्मज्ञमानिमौ यौ त्वां वध्यमानमुपेक्षताम् ॥
dhigastu kṛṣṇaṃ vārṣṇeyamarjunaṃ cāpi durmatim | dharmajñamānimau yau tvāṃ vadhyamānamupekṣatām
वृष्णिवंशी कृष्ण को धिक्कार है, और दुर्बुद्धि अर्जुन को भी, जो अपने को धर्मज्ञ मानते हुए तुम्हें मारा जाते देखते रहे।
श्लोक 32 (10.9.32)
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे किं वक्ष्यन्ति नराधिप । कथं दुर्योधनोऽस्माभिर्हत इत्यनपत्रपाः ॥
pāṇḍavāścāpi te sarve kiṃ vakṣyanti narādhipa | kathaṃ duryodhano'smābhirhata ityanapatrapāḥ
हे नरेश्वर! और सब पाण्डव निर्लज्ज होकर क्या कहेंगे? यही कि "देखो, हमने दुर्योधन को कैसे मार डाला!"
श्लोक 33 (10.9.33)
धन्यस्त्वमसि गान्धारे यस्त्वमायोधने हतः । प्रयातोऽभिमुखः शत्रून्धर्मेण पुरुषर्षभ ॥
dhanyastvamasi gāndhāre yastvamāyodhane hataḥ | prayāto'bhimukhaḥ śatrūndharmeṇa puruṣarṣabha
हे गान्धारीपुत्र! तुम धन्य हो, जो रणभूमि में शत्रुओं के सामने जाकर धर्मपूर्वक मारे गए, हे पुरुषश्रेष्ठ!
श्लोक 34 (10.9.34)
हतपुत्रा हि गान्धारी निहतज्ञातिबान्धवा । प्रज्ञाचक्षुश्च दुर्धर्षः कां दशां प्रतिपत्स्यते ॥
hataputrā hi gāndhārī nihatajñātibāndhavā | prajñācakṣuśca durdharṣaḥ kāṃ daśāṃ pratipatsyate
पुत्र के मारे जाने और जाति-बन्धुओं के नष्ट होने पर गान्धारी और दुर्धर्ष प्रज्ञाचक्षु राजा किस दशा को पहुँचेंगे?
श्लोक 35 (10.9.35)
धिगस्तु कृतवर्माणं मां कृपं च महारथम् । ये वयं न गताः स्वर्गं त्वां पुरस्कृत्य पार्थिवम् ॥
dhigastu kṛtavarmāṇaṃ māṃ kṛpaṃ ca mahāratham | ye vayaṃ na gatāḥ svargaṃ tvāṃ puraskṛtya pārthivam
कृतवर्मा को, मुझे और महारथी कृपाचार्य को धिक्कार है, जो हम तुम राजा को आगे करके स्वर्ग नहीं गए।
श्लोक 36 (10.9.36)
दातारं सर्वकामानां रक्षितारं प्रजाहितम् । यद्वयं नानुगच्छाम त्वां धिगस्मान्नराधमान् ॥
dātāraṃ sarvakāmānāṃ rakṣitāraṃ prajāhitam | yadvayaṃ nānugacchāma tvāṃ dhigasmānnarādhamān
समस्त कामनाओं के दाता और प्रजा के हितैषी रक्षक तुम्हारे पीछे जो हम नहीं जा रहे, उन हम अधम पुरुषों को धिक्कार है!
श्लोक 37 (10.9.37)
कृपस्य तव वीर्येण मम चैव पितुश्च मे । सभृत्यानां नरव्याघ्र रत्नवन्ति गृहाणि च ॥
kṛpasya tava vīryeṇa mama caiva pituśca me | sabhṛtyānāṃ naravyāghra ratnavanti gṛhāṇi ca
हे नरव्याघ्र! तुम्हारे पराक्रम से ही कृपाचार्य के, मेरे और मेरे पिता के घर सेवकों सहित रत्नों से भरे रहे।
श्लोक 38 (10.9.38)
तव प्रसादादस्माभिः समित्रैः सह बान्धवैः । अवाप्ताः क्रतवो मुख्या बहवो भूरिदक्षिणाः ॥
tava prasādādasmābhiḥ samitraiḥ saha bāndhavaiḥ | avāptāḥ kratavo mukhyā bahavo bhūridakṣiṇāḥ
तुम्हारी कृपा से हमने मित्रों और बन्धुओं के साथ बहुत-से श्रेष्ठ यज्ञ किए, जिनमें प्रचुर दक्षिणा दी गई।
श्लोक 39 (10.9.39)
कुतश्चापीदृशं पापाः प्रवर्तिष्यामहे वयम् । यादृशेन पुरस्कृत्य त्वं गतः सर्वपार्थिवान् ॥
kutaścāpīdṛśaṃ pāpāḥ pravartiṣyāmahe vayam | yādṛśena puraskṛtya tvaṃ gataḥ sarvapārthivān
हम पापी लोग ऐसा मार्ग अब कहाँ पाएँगे, जिससे तुम सब राजाओं को आगे करके चले गए?
श्लोक 40 (10.9.40)
वयमेव त्रयो राजन्गच्छन्तं परमां गतिम् । यद्वै त्वां नानुगच्छामस्तेन तप्स्यामहे वयम् ॥
vayameva trayo rājangacchantaṃ paramāṃ gatim | yadvai tvāṃ nānugacchāmastena tapsyāmahe vayam
हे राजन्! परम गति को जाते हुए तुम्हारे पीछे हम तीन ही नहीं जा रहे; इसी कारण हम जीवन भर पछताएँगे।
श्लोक 41 (10.9.41)
तत्स्वर्गहीना हीनार्थाः स्मरन्तः सुकृतस्य ते । किं नाम तद्भवेत्कर्म येन त्वां न व्रजाम वै ॥
tatsvargahīnā hīnārthāḥ smarantaḥ sukṛtasya te | kiṃ nāma tadbhavetkarma yena tvāṃ na vrajāma vai
स्वर्ग से वंचित और धनहीन हम तुम्हारे सुकर्मों को स्मरण करते हुए सोचते हैं: वह कौन-सा कर्म होगा, जिसके कारण हम तुम्हारे पास नहीं जा रहे?
श्लोक 42 (10.9.42)
दुःखं नूनं कुरुश्रेष्ठ चरिष्याम महीमिमाम् । हीनानां नस्त्वया राजन्कुतः शान्तिः कुतः सुखं ॥
duḥkhaṃ nūnaṃ kuruśreṣṭha cariṣyāma mahīmimām | hīnānāṃ nastvayā rājankutaḥ śāntiḥ kutaḥ sukhaṃ
हे कुरुश्रेष्ठ! अब हम निश्चय ही दुःख में इस पृथ्वी पर भटकेंगे। हे राजन्! तुमसे हीन हमें शान्ति कहाँ और सुख कहाँ?
श्लोक 43 (10.9.43)
गत्वैव तु महाराज समेत्य च महारथान् । यथाज्येष्ठं यथाश्रेष्ठं पूजयेर्वचनान्मम ॥
gatvaiva tu mahārāja sametya ca mahārathān | yathājyeṣṭhaṃ yathāśreṣṭhaṃ pūjayervacanānmama
हे महाराज! वहाँ पहुँचकर और महारथियों से मिलकर, मेरी ओर से आयु और श्रेष्ठता के अनुसार उनका सत्कार करना।
श्लोक 44 (10.9.44)
आचार्यं पूजयित्वा च केतुं सर्वधनुष्मताम् । हतं मयाऽद्य शंसेथा धृष्टद्युम्नं नराधिप ॥
ācāryaṃ pūjayitvā ca ketuṃ sarvadhanuṣmatām | hataṃ mayā'dya śaṃsethā dhṛṣṭadyumnaṃ narādhipa
सब धनुर्धारियों के ध्वज, आचार्य द्रोण का सत्कार करके, हे नरेश्वर! उनसे कहना कि धृष्टद्युम्न को आज मैंने मार डाला।
श्लोक 45 (10.9.45)
परिष्वजेथा राजानं बाह्लिकं सुमहारथम् । सैन्धवं सोमदत्तं च भूरिश्रवसमेव च ॥
pariṣvajethā rājānaṃ bāhlikaṃ sumahāratham | saindhavaṃ somadattaṃ ca bhūriśravasameva ca
महारथी राजा बाह्लीक, सैन्धव जयद्रथ, सोमदत्त और भूरिश्रवा को भी गले लगाना।
श्लोक 46 (10.9.46)
तथा पूर्वगतानन्यान्स्वर्गे पार्थिवसत्तमान् । अस्मद्वाक्यात्परिष्वज्य सम्पृच्छेस्त्वमनामयम् ॥
tathā pūrvagatānanyānsvarge pārthivasattamān | asmadvākyātpariṣvajya sampṛcchestvamanāmayam
और स्वर्ग में पहले गए अन्य श्रेष्ठ राजाओं को भी हमारी ओर से गले लगाकर उनका कुशल-क्षेम पूछना।
सञ्जय उवाच
श्लोक 47 (10.9.47)
इत्येवमुक्त्वा राजानं भग्नसक्थमचेतसम् । अश्वत्थामा लघुप्राणं पुनर्वचनमब्रवीत् ॥
ityevamuktvā rājānaṃ bhagnasakthamacetasam | aśvatthāmā laghuprāṇaṃ punarvacanamabravīt
राजा से, जिसकी जाँघें टूटी थीं, जो अचेत था और जिसके प्राण थोड़े ही बचे थे, यह कहकर अश्वत्थामा ने फिर उससे बात की।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 48 (10.9.48)
दुर्योधन जीवसि चेद्वाक्यं श्रोत्रसुखं शृणु । सप्त पाण्डवतः शिष्टा धार्तराष्ट्रास्त्रयो वयम् ॥
duryodhana jīvasi cedvākyaṃ śrotrasukhaṃ śṛṇu | sapta pāṇḍavataḥ śiṣṭā dhārtarāṣṭrāstrayo vayam
दुर्योधन! यदि जीवित हो तो कानों को सुख देने वाली बात सुनो: पाण्डवों के पक्ष में सात बचे हैं और धृतराष्ट्र के पुत्रों के पक्ष में हम तीन।
श्लोक 49 (10.9.49)
ते चैव भ्रातरः पञ्च वासुदेवोऽथ सात्यकिः । अहं च कृतवर्मा च कृपः शारद्वतस्तथा ॥
te caiva bhrātaraḥ pañca vāsudevo'tha sātyakiḥ | ahaṃ ca kṛtavarmā ca kṛpaḥ śāradvatastathā
वे पाँचों भाई, वासुदेव और सात्यकि; और हम, मैं, कृतवर्मा तथा शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य।
श्लोक 50 (10.9.50)
द्रौपदेया हताः सर्वे धृष्टद्युम्नस्य चात्मजाः । पञ्चाला निहताः सर्वे मत्स्यशेषं च भारत ॥
draupadeyā hatāḥ sarve dhṛṣṭadyumnasya cātmajāḥ | pañcālā nihatāḥ sarve matsyaśeṣaṃ ca bhārata
द्रौपदी के सब पुत्र मारे गए, धृष्टद्युम्न के पुत्र भी; सब पांचाल मारे गए और मत्स्यों में जो बचे थे वे भी, हे भारत!
श्लोक 51 (10.9.51)
कृते प्रतिकृतं पश्य हतपुत्रा हि पाण्डवाः । सौप्तिके शिबिरं तेषां हतं सनरवाहनम् ॥
kṛte pratikṛtaṃ paśya hataputrā hi pāṇḍavāḥ | sauptike śibiraṃ teṣāṃ hataṃ sanaravāhanam
किए का बदला देखो! पाण्डव पुत्रहीन हो गए। सोते समय उनका शिविर मनुष्यों और वाहनों सहित नष्ट कर दिया गया।
श्लोक 52 (10.9.52)
मया च पापकर्माऽसौ धृष्टद्युम्नो महीपते । प्रविश्य शिबिरं रात्रौ पशुमारेण मारितः ॥
mayā ca pāpakarmā'sau dhṛṣṭadyumno mahīpate | praviśya śibiraṃ rātrau paśumāreṇa māritaḥ
और हे पृथ्वीपति! उस पापकर्मी धृष्टद्युम्न को मैंने रात में शिविर में घुसकर पशु की भाँति मार डाला।
सञ्जय उवाच
श्लोक 53 (10.9.53)
दुर्योधनस्तु तां वाचं निशम्य मनसः प्रियाम् । प्रतिलभ्य पुनश्चेत इदं वचनमब्रवीत् ॥
duryodhanastu tāṃ vācaṃ niśamya manasaḥ priyām | pratilabhya punaśceta idaṃ vacanamabravīt
दुर्योधन ने वे मन को प्रिय लगने वाले वचन सुनकर फिर चेतना पाई और यह बात कही।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 54 (10.9.54)
न मेऽकरोत्तद्गाङ्गेयो न कर्णो न च ते पिता । यत्त्वया कृपभोजाभ्यां सहितेनाद्य मे कृतम् ॥
na me'karottadgāṅgeyo na karṇo na ca te pitā | yattvayā kṛpabhojābhyāṃ sahitenādya me kṛtam
जो गंगापुत्र, कर्ण और तुम्हारे पिता भी मेरे लिए न कर सके, वह आज तुमने कृप और भोज के साथ मिलकर मेरे लिए कर दिखाया।
श्लोक 55 (10.9.55)
स च सेनापतिः क्षुद्रो हतः सार्धं शिखण्डिना । तेन मन्ये मघवता सममात्मानमद्य वै ॥
sa ca senāpatiḥ kṣudro hataḥ sārdhaṃ śikhaṇḍinā | tena manye maghavatā samamātmānamadya vai
वह नीच सेनापति शिखण्डी के साथ मारा गया; इसी से मैं आज अपने को इन्द्र के समान मानता हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 56 (10.9.56)
स्वस्ति प्राप्नुत भद्रं वः स्वर्गे नः सङ्गमः पुनः । इत्येवमुक्त्वा पुत्रस्ते कुरुराजो महामनाः ॥
svasti prāpnuta bhadraṃ vaḥ svarge naḥ saṅgamaḥ punaḥ | ityevamuktvā putraste kururājo mahāmanāḥ
"तुम्हारा कल्याण और मंगल हो; स्वर्ग में फिर हमारा मिलन होगा।" ऐसा कहकर आपका पुत्र, वह उदार-हृदय कुरुराज,
श्लोक 57 (10.9.57)
प्राणानुपासृजद्वीरः सुहृदां दुःखमादधत् । अपाक्रामद्दिवं पुण्यां शरीरं क्षितिमाविशत् ॥
prāṇānupāsṛjadvīraḥ suhṛdāṃ duḥkhamādadhat | apākrāmaddivaṃ puṇyāṃ śarīraṃ kṣitimāviśat
मित्रों को शोक देता हुआ वह वीर प्राण छोड़ गया; उसकी आत्मा पुण्य स्वर्ग को चली गई और शरीर पृथ्वी में समा गया।
श्लोक 58 (10.9.58)
एवं ते निधनं यातः पुत्रो दुर्योधनो नृप । अग्रे यात्वा रणे शूरः पश्चाद्विनिहतः परैः ॥
evaṃ te nidhanaṃ yātaḥ putro duryodhano nṛpa | agre yātvā raṇe śūraḥ paścādvinihataḥ paraiḥ
हे राजन्! इस प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन मृत्यु को प्राप्त हुआ। वह वीर युद्ध में सबसे आगे जाकर अन्त में शत्रुओं के हाथों मारा गया।
श्लोक 59 (10.9.59)
तथैव ते परिष्वक्ताः परिष्वज्य च ते नृपम् । पुनः पुनः प्रेक्षमाणाः स्वकानारुरुहू रथान् ॥
tathaiva te pariṣvaktāḥ pariṣvajya ca te nṛpam | punaḥ punaḥ prekṣamāṇāḥ svakānāruruhū rathān
इसी प्रकार आलिंगित होकर और आपके राजा को आलिंगन करके, बार-बार उसे देखते हुए वे अपने रथों पर चढ़ गए।
श्लोक 60 (10.9.60)
इत्येवं द्रोणपुत्रस्य निशम्य करुणां गिरम् । प्रत्यूषकाले शोकार्ताः प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥
ityevaṃ droṇaputrasya niśamya karuṇāṃ giram | pratyūṣakāle śokārtāḥ prādravannagaraṃ prati
द्रोणपुत्र की यह करुण वाणी सुनकर शोक से पीड़ित वे भोर के समय नगर की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 61 (10.9.61)
एवमेष क्षयो वृत्तः कुरुपाण्डवसेनयोः । घोरो विशसनो रौद्रो राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥
evameṣa kṣayo vṛttaḥ kurupāṇḍavasenayoḥ | ghoro viśasano raudro rājandurmantrite tava
हे राजन्! आपकी बुरी मन्त्रणा के कारण कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं का यह भयंकर, विनाशकारी और रौद्र संहार हुआ।
श्लोक 62 (10.9.62)
तव पुत्रे गते स्वर्गं शोकार्तस्य ममानघ । ऋषिदत्तं प्रनष्टं तद्दिव्यदर्शित्वमद्य वै ॥
tava putre gate svargaṃ śokārtasya mamānagha | ṛṣidattaṃ pranaṣṭaṃ taddivyadarśitvamadya vai
हे निष्पाप! आपके पुत्र के स्वर्ग चले जाने पर, शोक से पीड़ित मेरी वह दिव्य दृष्टि, जो ऋषि ने दी थी, आज नष्ट हो गई।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 63 (10.9.63)
इति श्रुत्वा स नृपतिर्ज्ञातिपुत्रवधं तदा । निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च ततश्चिन्तापरोऽभवत् ॥
iti śrutvā sa nṛpatirjñātiputravadhaṃ tadā | niḥśvasya dīrghamuṣṇaṃ ca tataścintāparo'bhavat
अपने बन्धुओं और पुत्रों के वध का यह समाचार सुनकर वह राजा तब लम्बी, गर्म साँस लेकर चिन्ता में डूब गया।