सौप्तिक पर्व · अध्याय 8
पाण्डव-शिविर में रात्रि-संहार
धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा अपनी योजना में सफल हुए या नहीं। सञ्जय बताते हैं कि अश्वत्थामा ने शेष दोनों को शिविर के पास छोड़कर रात में पाण्डवों के शिविर में प्रवेश किया और सोए हुए धृष्टद्युम्न तथा उत्तमौजा को, फिर युधामन्यु, द्रौपदी के पुत्रों, शिखण्डी और अनेक पाञ्चालों तथा सोमकों को मार डाला; जागी हुई सेना घबराकर अँधेरे में आपस में ही कट मरी। कृप और कृतवर्मा ने भागने वालों को काटा और शिविर में आग लगा दी। धृतराष्ट्र के पूछने पर कि अश्वत्थामा ने पहले ऐसा क्यों नहीं किया, सञ्जय कहते हैं कि वह पाण्डवों, कृष्ण और सात्यकि से डरता था, जो वहाँ नहीं थे; प्रभात के समय वह उन दोनों से मिला और तीनों ने हर्ष मनाया।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (10.8.1)
तथा प्रयाते शिबिरं द्रोणपुत्रे महारथे । कच्चित्कृपश्च भोजश्च भयार्तौ न व्यवर्तताम् ॥
tathā prayāte śibiraṃ droṇaputre mahārathe | kaccitkṛpaśca bhojaśca bhayārtau na vyavartatām
जब महारथी द्रोणपुत्र शिविर की ओर चले गए, तब आशा है कि भय से पीड़ित कृप और भोज (कृतवर्मा) पीछे नहीं लौटे होंगे।
श्लोक 2 (10.8.2)
कच्चिन्न वारितौ क्षुद्रौ रक्षिभिर्नोपलक्षितौ । असह्यमिति मन्वानौ न निवृत्तौ महारथौ ॥
kaccinna vāritau kṣudrau rakṣibhirnopalakṣitau | asahyamiti manvānau na nivṛttau mahārathau
आशा है कि उन दोनों को क्षुद्र रक्षकों ने न रोका होगा और पहरेदारों ने उन्हें देखा न होगा; और वे दोनों महारथी इस काम को असह्य मानकर लौट न गए होंगे।
श्लोक 3 (10.8.3)
कच्चिदुन्मथ्य शिबिरं हत्वा सोमकपाण्डवान् । कृता प्रतिज्ञा सफला कच्चित्सञ्जय सा निशि ॥
kaccidunmathya śibiraṃ hatvā somakapāṇḍavān | kṛtā pratijñā saphalā kaccitsañjaya sā niśi
क्या उन्होंने शिविर को रौंदकर सोमकों और पाण्डवों को मार डाला? और हे सञ्जय, क्या उस रात की गई उनकी प्रतिज्ञा सफल हुई?
श्लोक 4 (10.8.4)
दुर्योधनस्य पदवीं कच्चित्परमिकां रणे । गत्वातिष्ठदसौ द्रौणिः कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ॥
duryodhanasya padavīṃ kaccitparamikāṃ raṇe | gatvātiṣṭhadasau drauṇiḥ kṛtvā karma suduṣkaram
क्या द्रोणपुत्र उस अत्यन्त कठिन कर्म को करके युद्ध में दुर्योधन के परम पद को पाकर वहाँ स्थित हुए?
श्लोक 5 (10.8.5)
धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्यां द्रौपद्याश्च सुतैः किल । सञ्छन्ना मेदिनी सुप्तैर्निहतैः पाण्डुसैनिकैः ॥
dhṛṣṭadyumnaśikhaṇḍibhyāṃ draupadyāśca sutaiḥ kila | sañchannā medinī suptairnihataiḥ pāṇḍusainikaiḥ
क्या सचमुच धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और द्रौपदी के पुत्रों के साथ सोते हुए मारे गए पाण्डवों के सैनिकों से पृथ्वी पट गई है?
श्लोक 6 (10.8.6)
पाञ्चालैर्वा विनिहतैः शयानै रुधिरोक्षितैः । कच्चिन्महीतलं छन्नं तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
pāñcālairvā vinihataiḥ śayānai rudhirokṣitaiḥ | kaccinmahītalaṃ channaṃ tanmamācakṣva sañjaya
अथवा क्या भूमि रक्त से भीगे, मरे पड़े पाञ्चालों से पट गई है? हे सञ्जय, यह मुझे बताओ।
श्लोक 7 (10.8.7)
पाञ्चालैर्निहतौ वीरौ कच्चित्तु स्वपतां क्षितौ । कच्चित्ताभ्यां कृतं कर्म तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥
pāñcālairnihatau vīrau kaccittu svapatāṃ kṣitau | kaccittābhyāṃ kṛtaṃ karma tanmamācakṣva sañjaya
क्या वे दोनों वीर पाञ्चालों द्वारा मारे गए, जब लोग भूमि पर सोए पड़े थे? क्या उन दोनों ने अपना कार्य पूरा किया? हे सञ्जय, यह मुझे बताओ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 8 (10.8.8)
तस्मिन्प्रयाते शिबिरं द्रोणपुत्रे महात्मनि । कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिमेवाभ्यवर्तताम् ॥
tasminprayāte śibiraṃ droṇaputre mahātmani | kṛpaśca kṛtavarmā ca drauṇimevābhyavartatām
जब महात्मा द्रोणपुत्र शिविर की ओर चल पड़े, तब कृप और कृतवर्मा द्रौणि के पास आ गए।
श्लोक 9 (10.8.9)
अश्वत्थामा तु तौ दृष्ट्वा यत्नवन्तौ महारथौ । प्रहृष्टः शनकै राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥
aśvatthāmā tu tau dṛṣṭvā yatnavantau mahārathau | prahṛṣṭaḥ śanakai rājannidaṃ vacanamabravīt
उन दोनों महारथियों को उद्यत देखकर अश्वत्थामा प्रसन्न हुए और हे राजन्, उन्होंने धीरे से यह वचन कहा।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 10 (10.8.10)
यत्तौ भवन्तौ पर्याप्तौ सर्वक्षत्रस्य नाशने । किम्पुनर्योधशेषस्य प्रसुप्तस्य विशेषतः ॥
yattau bhavantau paryāptau sarvakṣatrasya nāśane | kimpunaryodhaśeṣasya prasuptasya viśeṣataḥ
आप दोनों समस्त क्षत्रियों का नाश करने के लिए पर्याप्त हैं; फिर बचे हुए योद्धाओं की तो बात ही क्या, और वह भी तब जब वे सोए हुए हैं!
श्लोक 11 (10.8.11)
अहं प्रवेक्ष्ये शिबिरं चरिष्यामि च कालवत् । यथा न कश्चिदपि वां जीवन्मुच्येत मानवः । तथा भवद्भ्यां कार्यं स्यादिति मे निश्चिता मतिः ॥
ahaṃ pravekṣye śibiraṃ cariṣyāmi ca kālavat | yathā na kaścidapi vāṃ jīvanmucyeta mānavaḥ | tathā bhavadbhyāṃ kāryaṃ syāditi me niścitā matiḥ
मैं शिविर में घुसूँगा और काल के समान विचरण करूँगा। आप दोनों ऐसा करें कि कोई भी मनुष्य आपसे जीवित न बच निकले; यही मेरा दृढ़ निश्चय है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 12 (10.8.12)
इत्युक्त्वा प्राविशद्द्रौणिः पार्थानां शिबिरं महत् । अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्य विहाय भयमात्मनः ॥
ityuktvā prāviśaddrauṇiḥ pārthānāṃ śibiraṃ mahat | advāreṇābhyavaskandya vihāya bhayamātmanaḥ
यह कहकर द्रौणि ने अपना भय त्याग दिया और द्वार से नहीं, दूसरी ओर से धावा बोलकर पार्थों के विशाल शिविर में प्रवेश किया।
श्लोक 13 (10.8.13)
स प्रविश्य महाबाहुरुद्देशज्ञश्च तस्य ह । द्रौणिः परमसङ्क्रुद्धस्तेजसा प्रज्वलन्निव । ततः पर्यचरत्सर्वं सम्प्रसुप्तं जनं निशि ॥
sa praviśya mahābāhuruddeśajñaśca tasya ha | drauṇiḥ paramasaṅkruddhastejasā prajvalanniva | tataḥ paryacaratsarvaṃ samprasuptaṃ janaṃ niśi
भीतर पहुँचकर उस महाबाहु ने, जो उस स्थान को भली-भाँति जानता था, परम क्रोध से भरकर मानो अपने तेज से जलते हुए, रात में गहरी नींद सोए हुए सारे जनसमूह के बीच चक्कर लगाया।
श्लोक 14 (10.8.14)
धृष्टद्युम्नस्य निलयं शनकैरभ्युपागमत् ॥
dhṛṣṭadyumnasya nilayaṃ śanakairabhyupāgamat
वे धीरे-धीरे धृष्टद्युम्न के निवास तक पहुँचे।
श्लोक 15 (10.8.15)
ते तु कृत्वा महत्कर्म श्रान्ताश्च बलवद्रणे । प्रसुप्ता वै सुविश्वस्ताः स्वसैन्यपरिवारिताः ॥
te tu kṛtvā mahatkarma śrāntāśca balavadraṇe | prasuptā vai suviśvastāḥ svasainyaparivāritāḥ
वे बड़ा पराक्रम करके युद्ध में बहुत थक चुके थे, इसलिए अपनी सेना से घिरे हुए पूरे विश्वास के साथ गहरी नींद में सोए थे।
श्लोक 16 (10.8.16)
अथ प्रविश्य तद्वेश्म धृष्टद्युम्नस्य भारत । पाञ्चाल्यं शयने द्रौणिरपश्यत्सुप्तमन्तिकात् ॥
atha praviśya tadveśma dhṛṣṭadyumnasya bhārata | pāñcālyaṃ śayane drauṇirapaśyatsuptamantikāt
हे भारत, तब धृष्टद्युम्न के उस कक्ष में प्रवेश करके द्रौणि ने पाञ्चाल को शय्या पर पास ही सोया हुआ देखा।
श्लोक 17 (10.8.17)
क्षौमावदाते महति स्पर्ध्यास्तरणसंवृते । माल्यप्रवरसंयुक्ते धूपैश्चूर्णैश्च वासिते ॥
kṣaumāvadāte mahati spardhyāstaraṇasaṃvṛte | mālyapravarasaṃyukte dhūpaiścūrṇaiśca vāsite
वह रेशमी चादर से उजली, बहुमूल्य बिछौने से ढकी, उत्तम मालाओं से सजी तथा धूप और सुगन्धित चूर्णों से महकती एक विशाल शय्या पर सोया था।
श्लोक 18 (10.8.18)
तं शयानं महात्मानं विस्रब्धमकुतोभयम् । अपोथयत पादेन शयनस्थं महीपते ॥
taṃ śayānaṃ mahātmānaṃ visrabdhamakutobhayam | apothayata pādena śayanasthaṃ mahīpate
हे पृथ्वीपति, शय्या पर विश्वास के साथ निर्भय पड़े उस महात्मा को द्रौणि ने पैर से ठोकर मारी।
श्लोक 19 (10.8.19)
सम्बुध्य चरणस्पर्शादुत्थाय रणदुर्मदः । अभ्यजानादमेयात्मा द्रोणपुत्रं महारथम् ॥
sambudhya caraṇasparśādutthāya raṇadurmadaḥ | abhyajānādameyātmā droṇaputraṃ mahāratham
पैर के स्पर्श से जागकर रण में प्रचण्ड और अपरिमित आत्मबल वाले धृष्टद्युम्न उठे और उन्होंने महारथी द्रोणपुत्र को पहचान लिया।
श्लोक 20 (10.8.20)
तमुत्पतन्तं शयनादश्वत्थामा महाबलः । केशेष्वालभ्य पाणिभ्यां निष्पिपेष महीतले ॥
tamutpatantaṃ śayanādaśvatthāmā mahābalaḥ | keśeṣvālabhya pāṇibhyāṃ niṣpipeṣa mahītale
शय्या से उठते हुए उन्हें महाबली अश्वत्थामा ने दोनों हाथों से केशों से पकड़कर भूमि पर रगड़ दिया।
श्लोक 21 (10.8.21)
स बलात्तेन निष्पिष्टः साध्वसेन च भारत । अभ्याक्रान्तश्च निद्रान्धो नाशकच्चेष्टितुं तदा ॥
sa balāttena niṣpiṣṭaḥ sādhvasena ca bhārata | abhyākrāntaśca nidrāndho nāśakacceṣṭituṃ tadā
हे भारत, उस बल से कुचले जाने, भय से दब जाने और नींद से अन्धे होने के कारण वे उस समय हिल भी न सके।
श्लोक 22 (10.8.22)
निष्पिष्य तु ततो भूमौ पाञ्चाल्यं द्रौणिरञ्जसा । धनुषो ज्यां विमुच्याशु क्रूरबुद्धिरमर्षणः ॥
niṣpiṣya tu tato bhūmau pāñcālyaṃ drauṇirañjasā | dhanuṣo jyāṃ vimucyāśu krūrabuddhiramarṣaṇaḥ
पाञ्चाल को बलपूर्वक भूमि पर रगड़कर क्रूर बुद्धि और अमर्षी द्रौणि ने झट अपने धनुष की डोरी खोल ली,
श्लोक 23 (10.8.23)
तस्य कण्ठेऽथ बद्ध्वा तां त्वरितः क्रोधमूर्च्छितः । द्रौणिः क्रूरं मनः कृत्वा पाञ्चाल्यमवधीत्तदा ॥
tasya kaṇṭhe'tha baddhvā tāṃ tvaritaḥ krodhamūrcchitaḥ | drauṇiḥ krūraṃ manaḥ kṛtvā pāñcālyamavadhīttadā
और क्रोध से मूर्च्छित-से होकर जल्दी से उसे उनके गले में बाँध दिया। फिर मन को कठोर करके द्रौणि ने पाञ्चाल को मार डाला।
श्लोक 24 (10.8.24)
तमाक्रम्य पदा राजन्कण्ठे चोरसि पादयोः । नदन्तं विस्फुरन्तं च पशुमारममारयत् ॥
tamākramya padā rājankaṇṭhe corasi pādayoḥ | nadantaṃ visphurantaṃ ca paśumāramamārayat
हे राजन्, गले और छाती पर पैरों से दबाकर द्रौणि ने उन्हें पशु की भाँति मार डाला, जब वे गरजते और छटपटाते रहे।
श्लोक 25 (10.8.25)
स वार्यमाणस्तरसा बलाद्बलवता बली । तुदन्नखैस्तु स द्रौणिं नातिव्यक्तमुदाहरत् ॥
sa vāryamāṇastarasā balādbalavatā balī | tudannakhaistu sa drauṇiṃ nātivyaktamudāharat
वे स्वयं बलवान थे, फिर भी अधिक बलवान द्वारा बलपूर्वक दबाए जाने पर नाखूनों से द्रौणि को नोचते हुए बहुत अस्पष्ट स्वर में बोले—
धृष्टद्युम्न उवाच
श्लोक 26 (10.8.26)
आचार्यपुत्र शस्त्रेण जहि मां मा चिरं कृथाः । त्वत्कृते सुकृतां लोकान्गच्छेयं द्विपदांवर ॥
ācāryaputra śastreṇa jahi māṃ mā ciraṃ kṛthāḥ | tvatkṛte sukṛtāṃ lokāngaccheyaṃ dvipadāṃvara
आचार्य के पुत्र, मुझे शस्त्र से मारो, देर मत करो! हे नरश्रेष्ठ, तुम्हारे कारण मैं पुण्यात्माओं के लोकों को जाऊँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 27 (10.8.27)
एवमुक्त्वा तु वचनं विरराम परन्तपः । सुतः पाञ्चालराजस्य आक्रान्तो बलिना भृशम् ॥
evamuktvā tu vacanaṃ virarāma parantapaḥ | sutaḥ pāñcālarājasya ākrānto balinā bhṛśam
यह वचन कहकर बलवान द्वारा बुरी तरह दबाए गए पाञ्चालराज के पुत्र, वह शत्रुओं को तपाने वाला वीर, चुप हो गया।
श्लोक 28 (10.8.28)
तस्याव्यक्तां तु तां वाचं संश्रुत्य द्रौणिरब्रवीत् । आचार्यघातिनां लोका न सन्ति कुलपांसन । तस्माच्छस्त्रेण निधनं न त्वमर्हसि दुर्मते ॥
tasyāvyaktāṃ tu tāṃ vācaṃ saṃśrutya drauṇirabravīt | ācāryaghātināṃ lokā na santi kulapāṃsana | tasmācchastreṇa nidhanaṃ na tvamarhasi durmate
उन अस्पष्ट शब्दों को सुनकर द्रौणि ने कहा, "हे कुलकलंक, आचार्य की हत्या करने वालों के लिए कोई लोक नहीं होते। इसलिए हे दुर्बुद्धि, तू शस्त्र से मृत्यु पाने के योग्य नहीं है।"
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 29 (10.8.29)
नृशंसेनातिवृत्तेन त्वया मे निहतः पिता । तस्मात्त्वमपि वध्यश्च नृशंसेन नृशंसकृत् ॥
nṛśaṃsenātivṛttena tvayā me nihataḥ pitā | tasmāttvamapi vadhyaśca nṛśaṃsena nṛśaṃsakṛt
"तूने क्रूरता से मर्यादा तोड़कर मेरे पिता को मारा; इसलिए हे क्रूर कर्म करने वाले, तू भी क्रूर रीति से मारे जाने योग्य है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 30 (10.8.30)
एवं ब्रुवाणस्तं वीरं सिंहो मत्तमिव द्विपम् । मर्मस्वभ्यवधीत्क्रुद्धः पादघातैः सुदारुणैः ॥
evaṃ bruvāṇastaṃ vīraṃ siṃho mattamiva dvipam | marmasvabhyavadhītkruddhaḥ pādaghātaiḥ sudāruṇaiḥ
यह कहते हुए ही उन्होंने क्रुद्ध होकर उस वीर के मर्मस्थानों पर भयंकर लातों से प्रहार किए, जैसे सिंह मतवाले हाथी पर प्रहार करता है।
श्लोक 31 (10.8.31)
तस्य वीरस्य शब्देन मार्यमाणस्य वेश्मनि । अबुध्यन्त महाराज स्त्रियो ये चास्य रक्षिणः ॥
tasya vīrasya śabdena māryamāṇasya veśmani | abudhyanta mahārāja striyo ye cāsya rakṣiṇaḥ
हे महाराज, अपने कक्ष में मारे जाते हुए उस वीर की चीख से स्त्रियाँ और उसके रक्षक जाग उठे।
श्लोक 32 (10.8.32)
ते दृष्ट्वा धर्षयन्तं तमतिमानुषविक्रमम् । भूतमित्यध्यवस्यन्तो न स्म प्रव्याहरन्भयात् ॥
te dṛṣṭvā dharṣayantaṃ tamatimānuṣavikramam | bhūtamityadhyavasyanto na sma pravyāharanbhayāt
मनुष्य से परे पराक्रम वाले उस आक्रमणकारी को देखकर उन्होंने उसे कोई भूत समझा और भय के मारे कुछ नहीं बोले।
श्लोक 33 (10.8.33)
तं तु तेनाभ्युपायेन गमयित्वा यमक्षयम् । अध्यतिष्ठत तेजस्वी रथं प्राप्य सुदर्शनम् ॥
taṃ tu tenābhyupāyena gamayitvā yamakṣayam | adhyatiṣṭhata tejasvī rathaṃ prāpya sudarśanam
इस उपाय से उन्हें यमलोक पहुँचाकर वह तेजस्वी द्रौणि अपने सुन्दर रथ पर सवार हो गया।
श्लोक 34 (10.8.34)
स तस्य भवनाद्राजन्निष्क्रम्यानादयन्दिशः । रथेन शिबिरं प्रायाज्जिघांसुर्द्विषतो बली ॥
sa tasya bhavanādrājanniṣkramyānādayandiśaḥ | rathena śibiraṃ prāyājjighāṃsurdviṣato balī
हे राजन्, उस भवन से निकलकर दिशाओं को गुँजाता हुआ वह बली शत्रुओं को मारने की इच्छा से रथ में शिविर में आगे बढ़ा।
श्लोक 35 (10.8.35)
अपक्रान्ते ततस्तस्मिन्द्रोणपुत्रे महारथे । सहितैः रक्षिभिः सर्वैः प्राणेदुर्योषितस्तदा ॥
apakrānte tatastasmindroṇaputre mahārathe | sahitaiḥ rakṣibhiḥ sarvaiḥ prāṇeduryoṣitastadā
जब महारथी द्रोणपुत्र वहाँ से चले गए, तब सब रक्षकों के साथ स्त्रियाँ चीख उठीं।
श्लोक 36 (10.8.36)
राजानं निहतं दृष्ट्वा भृशं शोकपरायणाः । व्याक्रोशन्क्षत्रियाः सर्वे धृष्टद्युम्नस्य भारत ॥
rājānaṃ nihataṃ dṛṣṭvā bhṛśaṃ śokaparāyaṇāḥ | vyākrośankṣatriyāḥ sarve dhṛṣṭadyumnasya bhārata
हे भारत, राजा को मरा हुआ देखकर धृष्टद्युम्न के सभी क्षत्रिय गहरे शोक में डूबकर ऊँचे स्वर में विलाप करने लगे।
श्लोक 37 (10.8.37)
तासां तु तेन शब्देन समीपे क्षत्रियर्षभाः । सम्भ्रान्ताः समनह्यन्त किमेतदिति चाब्रुवन् ॥
tāsāṃ tu tena śabdena samīpe kṣatriyarṣabhāḥ | sambhrāntāḥ samanahyanta kimetaditi cābruvan
उन स्त्रियों के उस शोर से समीप के प्रमुख क्षत्रिय घबराकर कवच पहनने लगे और पूछने लगे, "यह क्या है?"
श्लोक 38 (10.8.38)
स्त्रियस्तु राजन्वित्रस्ता भारद्वाजं निरीक्ष्य ताः । अब्रुवन्दीनकण्ठेन क्षिप्रमाद्रवतेति वै ॥
striyastu rājanvitrastā bhāradvājaṃ nirīkṣya tāḥ | abruvandīnakaṇṭhena kṣipramādravateti vai
हे राजन्, भयभीत स्त्रियों ने भारद्वाज के पुत्र को देखकर दीन स्वर में कहा, "शीघ्र उस पर टूट पड़ो!"
स्त्रिय ऊचुः
श्लोक 39 (10.8.39)
राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीम कोन्वयम् । हत्वा पाञ्चालराजानं रथमारुह्य तिष्ठति ॥
rākṣaso vā manuṣyo vā nainaṃ jānīma konvayam | hatvā pāñcālarājānaṃ rathamāruhya tiṣṭhati
"हम नहीं जानते कि यह कौन है, राक्षस है या मनुष्य। पाञ्चालराज को मारकर यह रथ पर चढ़ा खड़ा है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 40 (10.8.40)
ततस्ते योधमुख्यास्तं सहसा पर्यवारयन् । स तानापततः सर्वान्रुद्रास्त्रेण व्यपोथयत् ॥
tataste yodhamukhyāstaṃ sahasā paryavārayan | sa tānāpatataḥ sarvānrudrāstreṇa vyapothayat
तब प्रमुख योद्धाओं ने सहसा उसे घेर लिया, परन्तु टूट पड़ने वाले उन सबको उसने रुद्रास्त्र से मार गिराया।
श्लोक 41 (10.8.41)
धृष्टद्युम्नं च हत्वा स तांश्चैवास्य पदानुगान् । अपश्यच्छयने सुप्तमुत्तमौजसमन्तिके ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ ca hatvā sa tāṃścaivāsya padānugān | apaśyacchayane suptamuttamaujasamantike
धृष्टद्युम्न और उसके अनुयायियों को मारकर उसने पास ही शय्या पर सोए हुए उत्तमौजा को देखा।
श्लोक 42 (10.8.42)
तमप्याक्रम्य पादेन कण्ठे चोरसि तेजसा । तथैव मारयामास विनर्दन्तमरिन्दमम् ॥
tamapyākramya pādena kaṇṭhe corasi tejasā | tathaiva mārayāmāsa vinardantamarindamam
उसे भी पैर से गले और छाती पर बल से दबाकर उसने उसी प्रकार मार डाला; वह शत्रुदमन चिल्लाता ही रह गया।
श्लोक 43 (10.8.43)
युधामन्युश्च विक्रान्तो मत्वा तं राक्षसं स्म सः । गदामुद्यम्य वेगेन हृदि द्रौणिमताडयत् ॥
yudhāmanyuśca vikrānto matvā taṃ rākṣasaṃ sma saḥ | gadāmudyamya vegena hṛdi drauṇimatāḍayat
पराक्रमी युधामन्यु ने उसे राक्षस समझकर गदा उठाई और वेग से द्रौणि की छाती पर प्रहार किया।
श्लोक 44 (10.8.44)
गदाप्रहाराभिहतो नाचलद्द्रौणिराहवे । तमभिद्रुत्य वेगेन क्षितौ चैनमपातयत् ॥
gadāprahārābhihato nācaladdrauṇirāhave | tamabhidrutya vegena kṣitau cainamapātayat
गदा के प्रहार से आहत होकर भी द्रौणि युद्ध में डगमगाए नहीं; उन्होंने वेग से उस पर झपटकर उसे भूमि पर गिरा दिया।
श्लोक 45 (10.8.45)
विस्फुरन्तं च पशुवत्तथैवैनममारयत् । तथा स वीरो हत्वा तं ततोऽन्यान्समुपाद्रवत् ॥
visphurantaṃ ca paśuvattathaivainamamārayat | tathā sa vīro hatvā taṃ tato'nyānsamupādravat
पशु की भाँति छटपटाते हुए उसे भी उसी प्रकार मार डाला। उसे मारकर वह वीर दूसरों पर टूट पड़ा।
श्लोक 46 (10.8.46)
संसुप्तानेव राजेन्द्र तत्र तत्र महारथान् । पाञ्चालवीरानाक्रम्य क्रुद्धो न्यहनदन्तिके । स्फुरतो वेपमानांश्च शमितेव पशून्मखे ॥
saṃsuptāneva rājendra tatra tatra mahārathān | pāñcālavīrānākramya kruddho nyahanadantike | sphurato vepamānāṃśca śamiteva paśūnmakhe
हे राजेन्द्र, जहाँ-तहाँ सोए हुए महारथी पाञ्चाल वीरों पर टूटकर उसने क्रोध में उन्हें पास ही मार डाला; वे फड़फड़ाते और काँपते थे, जैसे यज्ञ में शमिता पशुओं को मारता है।
श्लोक 47 (10.8.47)
ततो निस्त्रिंशमादाय जघानान्यान्पृथक्पृथक् । भागशो विचरन्मार्गानसियुद्धविशारदः ॥
tato nistriṃśamādāya jaghānānyānpṛthakpṛthak | bhāgaśo vicaranmārgānasiyuddhaviśāradaḥ
फिर तलवार लेकर, असियुद्ध में निपुण वह पंक्ति-पंक्ति में मार्गों पर घूमता हुआ दूसरों को एक-एक करके काटता गया।
श्लोक 48 (10.8.48)
तथैव गुल्मे सम्प्रेक्ष्य शयानान्मध्यगौल्मिकान् । श्रान्तान्व्यस्तायुधान्सर्वानसिनैव व्यपोथयत् ॥
tathaiva gulme samprekṣya śayānānmadhyagaulmikān | śrāntānvyastāyudhānsarvānasinaiva vyapothayat
इसी प्रकार टुकड़ी में बीच में थके, हथियार डाले सोए हुए सब सैनिकों को देखकर उसने उन्हें तलवार से ही मार डाला।
श्लोक 49 (10.8.49)
योधानश्वान्द्विपांश्चैव प्राच्छिनत्स वरासिना । रुधिरोक्षितसर्वाङ्गः कालसृष्ट इवान्तकः ॥
yodhānaśvāndvipāṃścaiva prācchinatsa varāsinā | rudhirokṣitasarvāṅgaḥ kālasṛṣṭa ivāntakaḥ
उसने उत्तम तलवार से योद्धाओं, घोड़ों और हाथियों को भी काट डाला; रक्त से तर सारे शरीर वाला वह काल के भेजे हुए अन्तक के समान लग रहा था।
श्लोक 50 (10.8.50)
विस्फुरद्भिश्च तैर्द्रौणिर्निस्त्रिंशस्योद्यमेन च । अवक्षेपेण चैवासेस्त्रिधा रक्तोक्षितोऽभवत् ॥
visphuradbhiśca tairdrauṇirnistriṃśasyodyamena ca | avakṣepeṇa caivāsestridhā raktokṣito'bhavat
द्रौणि तीन प्रकार से रक्त से लथपथ हो गए: उन लोगों के छटपटाने से, तलवार उठाने से और उसे घुमाकर चलाने से।
श्लोक 51 (10.8.51)
तस्य लोहितरक्तस्य दीप्तखड्गस्य युध्यतः । अमानुष इवाकारो बभौ परमभीषणः ॥
tasya lohitaraktasya dīptakhaḍgasya yudhyataḥ | amānuṣa ivākāro babhau paramabhīṣaṇaḥ
रक्त से सने, दीप्त तलवार लिए युद्ध करते हुए उसका रूप अमानवीय-सा और अत्यन्त भयानक लग रहा था।
श्लोक 52 (10.8.52)
ये त्वजाग्रन्त कौरव्य तेऽपि शब्देन मोहिताः । वीक्षमाणास्तु ते तत्र द्रौणिं दृष्ट्वा प्रविव्यथुः ॥
ye tvajāgranta kauravya te'pi śabdena mohitāḥ | vīkṣamāṇāstu te tatra drauṇiṃ dṛṣṭvā pravivyathuḥ
हे कौरव्य, जो जाग रहे थे, वे भी उस शोर से घबरा गए; देखते हुए वे द्रौणि को देखकर व्यथा से काँप उठे।
श्लोक 53 (10.8.53)
तद्रूपं तस्य ते दृष्ट्वा क्षत्रियाः शत्रुकर्शनम् । राक्षसं मन्यमानास्तं नयनानि न्यमीलयन् ॥
tadrūpaṃ tasya te dṛṣṭvā kṣatriyāḥ śatrukarśanam | rākṣasaṃ manyamānāstaṃ nayanāni nyamīlayan
शत्रुओं को पीड़ित करने वाले उसका वह रूप देखकर क्षत्रियों ने उसे राक्षस मानकर अपनी आँखें मूँद लीं।
श्लोक 54 (10.8.54)
स घोररूपो व्यचरत्कालवच्छिबिरे तदा । अपश्यद्द्रौपदीपुत्रानवशिष्टांश्च सोमकान् ॥
sa ghorarūpo vyacaratkālavacchibire tadā | apaśyaddraupadīputrānavaśiṣṭāṃśca somakān
भयंकर रूप वाला वह काल के समान शिविर में घूमता रहा। तब उसने द्रौपदी के पुत्रों और बचे हुए सोमकों को देखा।
श्लोक 55 (10.8.55)
तेन शब्देन वित्रस्ता धनुर्हस्ता महारथाः । धृष्टद्युम्नं हतं श्रुत्वा द्रौपदेया विशाम्पते । अवाकिरञ्शरव्रातैर्भारद्वाजमभीतवत् ॥
tena śabdena vitrastā dhanurhastā mahārathāḥ | dhṛṣṭadyumnaṃ hataṃ śrutvā draupadeyā viśāmpate | avākirañśaravrātairbhāradvājamabhītavat
उस शोर से घबराए हुए धनुर्धर महारथी द्रौपदी के पुत्रों ने, हे प्रजापालक, धृष्टद्युम्न के मारे जाने की बात सुनकर निर्भय होकर भारद्वाज के पुत्र पर बाणों की झड़ी लगा दी।
श्लोक 56 (10.8.56)
ततस्तेन निनादेन सम्प्रबुद्धाः प्रभद्रकाः । शिलीमुखैः शिखण्डी च द्रोणपुत्रं समार्दयन् ॥
tatastena ninādena samprabuddhāḥ prabhadrakāḥ | śilīmukhaiḥ śikhaṇḍī ca droṇaputraṃ samārdayan
तब उस गर्जन से जागे हुए प्रभद्रकों और शिखण्डी ने बाणों से द्रोणपुत्र को पीड़ित किया।
श्लोक 57 (10.8.57)
भारद्वाजः स तान्दृष्ट्वा शरवर्षाणि वर्षतः । ननाद बलवन्नादं जिघांसुस्तान्महारथान् ॥
bhāradvājaḥ sa tāndṛṣṭvā śaravarṣāṇi varṣataḥ | nanāda balavannādaṃ jighāṃsustānmahārathān
उन्हें बाणों की वर्षा करते देखकर भारद्वाज के पुत्र ने उन महारथियों को मारने की इच्छा से बड़ी गर्जना की।
श्लोक 58 (10.8.58)
ततः परमसङ्क्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन् । अवरुह्य रथोपस्थात्त्वरमाणोऽभिदुद्रुवे ॥
tataḥ paramasaṅkruddhaḥ piturvadhamanusmaran | avaruhya rathopasthāttvaramāṇo'bhidudruve
तब अपने पिता के वध को स्मरण करते हुए अत्यन्त क्रुद्ध होकर वह रथ के पटरे से कूदा और शीघ्रता से उन पर झपटा।
श्लोक 59 (10.8.59)
सहस्रचन्द्रविमलं गृहीत्वा चर्म संयुगे । खड्गं च विमलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम् । द्रौपदेयानभिद्रुत्य खड्गेन व्यधमद्बली ॥
sahasracandravimalaṃ gṛhītvā carma saṃyuge | khaḍgaṃ ca vimalaṃ divyaṃ jātarūpapariṣkṛtam | draupadeyānabhidrutya khaḍgena vyadhamadbalī
युद्ध में हज़ार चन्द्रमाओं के समान चमकती ढाल और सोने से सजी निर्मल दिव्य तलवार लेकर उस बली ने द्रौपदी के पुत्रों पर झपटकर उन्हें तलवार से काट डाला।
श्लोक 60 (10.8.60)
ततः स नरशार्दूलः प्रतिविन्ध्यं महाहवे । कुक्षिदेशेऽवधीद्राजन्स हतो न्यपतद्भुवि ॥
tataḥ sa naraśārdūlaḥ prativindhyaṃ mahāhave | kukṣideśe'vadhīdrājansa hato nyapatadbhuvi
तब उस नरव्याघ्र ने उस महायुद्ध में प्रतिविन्ध्य के पेट पर प्रहार किया, हे राजन्; वह मरकर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 61 (10.8.61)
प्रासेन विद्ध्वा द्रौणिं तु सुतसोमः प्रतापवान् । पुनश्चासिं समुद्यम्य द्रोणपुत्रमुपाद्रवत् ॥
prāsena viddhvā drauṇiṃ tu sutasomaḥ pratāpavān | punaścāsiṃ samudyamya droṇaputramupādravat
प्रतापी सुतसोम ने द्रौणि को बरछी से बींधा और फिर तलवार उठाकर द्रोणपुत्र पर टूट पड़ा।
श्लोक 62 (10.8.62)
सुतसोमस्य सासिं तं बाहुं छित्त्वा नरर्षभ । पुनरप्याहनत्पार्श्वे स भिन्नहृदयोऽपतत् ॥
sutasomasya sāsiṃ taṃ bāhuṃ chittvā nararṣabha | punarapyāhanatpārśve sa bhinnahṛdayo'patat
हे नरश्रेष्ठ, सुतसोम की तलवार सहित बाँह काटकर उसने उसके पार्श्व में फिर प्रहार किया; हृदय विदीर्ण हो जाने से वह गिर पड़ा।
श्लोक 63 (10.8.63)
नाकुलिस्तु शतानीको रथचक्रेण वीर्यवान् । दोर्भ्यामुत्क्षिप्य वेगेन वक्षस्येनमताडयत् ॥
nākulistu śatānīko rathacakreṇa vīryavān | dorbhyāmutkṣipya vegena vakṣasyenamatāḍayat
तब नकुल के पुत्र वीर शतानीक ने दोनों भुजाओं से रथ का पहिया उठाकर वेग से उसकी छाती पर मारा।
श्लोक 64 (10.8.64)
अताडयच्छतानीकं मुक्तचक्रं द्विजस्तु सः । स विह्वलो ययौ भूमिं ततोऽस्यापाहरच्छिरः ॥
atāḍayacchatānīkaṃ muktacakraṃ dvijastu saḥ | sa vihvalo yayau bhūmiṃ tato'syāpāharacchiraḥ
उस द्विज ने पहिया छोड़ चुके शतानीक पर प्रहार किया; वह विह्वल होकर भूमि पर गिर पड़ा और तब द्रौणि ने उसका सिर काट लिया।
श्लोक 65 (10.8.65)
श्रुतकर्मा तु परिघं घोरं गृह्य दुरासदम् । अताडयत्समुद्यम्य वेगेन द्रौणिमुत्स्मयन् ॥
śrutakarmā tu parighaṃ ghoraṃ gṛhya durāsadam | atāḍayatsamudyamya vegena drauṇimutsmayan
श्रुतकर्मा ने भयंकर और दुर्धर्ष परिघ उठाकर मुस्कुराते हुए वेग से द्रौणि पर प्रहार किया।
श्लोक 66 (10.8.66)
स तु तं श्रुतकर्माणमास्ये जघ्ने वरासिना । स हतो न्यपतद्भूमौ विमूर्धा विकृताननः ॥
sa tu taṃ śrutakarmāṇamāsye jaghne varāsinā | sa hato nyapatadbhūmau vimūrdhā vikṛtānanaḥ
परन्तु द्रौणि ने उस श्रुतकर्मा के मुँह पर उत्तम तलवार से वार किया; वह सिर कटा और चेहरा विकृत हुआ मरकर भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 67 (10.8.67)
तेन शब्देन वीरस्तु श्रुतकीर्तिरबुध्यत । अश्वत्थामानमासाद्य शरवर्षैरवाकिरत् ॥
tena śabdena vīrastu śrutakīrtirabudhyata | aśvatthāmānamāsādya śaravarṣairavākirat
उस शोर से वीर श्रुतकीर्ति जाग उठा; उसने अश्वत्थामा के पास पहुँचकर उन पर बाणों की वर्षा कर दी।
श्लोक 68 (10.8.68)
शरैराच्छादितस्तेन द्रोणपुत्रो महारथः । अदृश्यत महाराज श्वाविच्छललितो यथा ॥
śarairācchāditastena droṇaputro mahārathaḥ | adṛśyata mahārāja śvāvicchalalito yathā
हे महाराज, उसके बाणों से ढके हुए महारथी द्रोणपुत्र शल्लकी (साही) की भाँति काँटों से भरे दिखाई देने लगे।
श्लोक 69 (10.8.69)
तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः । सकुण्डलं शिरः कायाद्भ्राजमानमपाहरत् ॥
tasyāpi śaravarṣāṇi carmaṇā prativārya saḥ | sakuṇḍalaṃ śiraḥ kāyādbhrājamānamapāharat
उसकी भी बाणवर्षा को ढाल से रोककर द्रौणि ने कुण्डलों से चमकता हुआ उसका सिर धड़ से काट लिया।
श्लोक 70 (10.8.70)
ततो भीष्मनिहन्तारं सह सर्वैः प्रभद्रकैः । आहनत्सर्वतो वीरं नानाप्रहरणैर्बलात् ॥
tato bhīṣmanihantāraṃ saha sarvaiḥ prabhadrakaiḥ | āhanatsarvato vīraṃ nānāpraharaṇairbalāt
तब उसने भीष्म के हत्यारे उस वीर को सब प्रभद्रकों के साथ चारों ओर से नाना प्रकार के शस्त्रों से बलपूर्वक मारा।
श्लोक 71 (10.8.71)
शिलीमुखेन चाप्येनं भ्रुवोर्मध्ये समार्पयत् ॥
śilīmukhena cāpyenaṃ bhruvormadhye samārpayat
और एक शिलीमुख बाण से उसके भौंहों के बीच वार किया।
श्लोक 72 (10.8.72)
स तु क्रोधसमाविष्टो द्रोणपुत्रो महाबलः । शिखण्डिनं समासाद्य द्विधा चिच्छेद सोसिना ॥
sa tu krodhasamāviṣṭo droṇaputro mahābalaḥ | śikhaṇḍinaṃ samāsādya dvidhā ciccheda sosinā
तब क्रोध से भरे महाबली द्रोणपुत्र ने शिखण्डी के पास पहुँचकर तलवार से उसे दो टुकड़े कर दिया।
श्लोक 73 (10.8.73)
शिखण्डिनं ततो हत्वा क्रोधाविष्टः परन्तपः । प्रभद्रकगणान्सर्वानभिदुद्राव वेगवान् ॥
śikhaṇḍinaṃ tato hatvā krodhāviṣṭaḥ parantapaḥ | prabhadrakagaṇānsarvānabhidudrāva vegavān
शिखण्डी को मारकर शत्रुओं को तपाने वाला वह क्रोध से भरा वेगवान वीर समस्त प्रभद्रक-गणों पर टूट पड़ा।
श्लोक 74 (10.8.74)
यच्च शिष्टं विराटस्य बलं तु भृशमाद्रवत् । द्रुपदस्य च पुत्राणां पौत्राणां सुहृदामपि । चकार कदनं घोरं दृष्ट्वा तत्र महाबलः ॥
yacca śiṣṭaṃ virāṭasya balaṃ tu bhṛśamādravat | drupadasya ca putrāṇāṃ pautrāṇāṃ suhṛdāmapi | cakāra kadanaṃ ghoraṃ dṛṣṭvā tatra mahābalaḥ
विराट की जो सेना बची थी और जो उग्रता से आ टूटी थी, तथा द्रुपद के पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को भी जहाँ देखा, उन सब पर उस महाबली ने भयंकर संहार किया।
श्लोक 75 (10.8.75)
अन्यानन्यांश्च पुरुषानभिसृत्याभिसृत्य च । न्यकृन्तदसिना द्रौणिरसिमार्गविशारदः ॥
anyānanyāṃśca puruṣānabhisṛtyābhisṛtya ca | nyakṛntadasinā drauṇirasimārgaviśāradaḥ
बार-बार एक के बाद एक पुरुष पर झपटकर, तलवार के मार्गों में निपुण द्रौणि ने तलवार से उन्हें काट डाला।
श्लोक 76 (10.8.76)
कालीं रक्तास्यनयनां रक्तमाल्यानुलेपनाम् । रक्ताम्बरधरां घोरां पाशहस्तां कुटुम्बिनीम् ॥
kālīṃ raktāsyanayanāṃ raktamālyānulepanām | raktāmbaradharāṃ ghorāṃ pāśahastāṃ kuṭumbinīm
उन्होंने काली को देखा—लाल मुख और नेत्रों वाली, लाल माला और लेप धारण किए, लाल वस्त्र पहने, भयंकर, हाथ में पाश लिए गृहिणी-सी।
श्लोक 77 (10.8.77)
ददृशुः कालरात्रिं ते स्मयमानामिव स्थिताम् । नराश्वकुञ्जरान्पाशैर्बद्ध्वा घोरैः प्रतस्थुषीम् ॥
dadṛśuḥ kālarātriṃ te smayamānāmiva sthitām | narāśvakuñjarānpāśairbaddhvā ghoraiḥ pratasthuṣīm
उन्होंने कालरात्रि को मानो मुस्कुराते हुए खड़े देखा, जो मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को भयानक पाशों से बाँधकर चली जा रही थी,
श्लोक 78 (10.8.78)
वहन्तीं विविधान्प्रेतान्पाशबद्धान्विमूर्धजान् । तथैव च सदा राजन्न्यस्तशस्त्रान्महारथान् ॥
vahantīṃ vividhānpretānpāśabaddhānvimūrdhajān | tathaiva ca sadā rājannyastaśastrānmahārathān
और पाश में बँधे, बिखरे केशों वाले अनेक प्रकार के मृतकों को ढोती हुई, तथा हे राजन्, शस्त्र डाल चुके महारथियों को भी उसी प्रकार ले जा रही थी।
श्लोक 79 (10.8.79)
स्वप्ने सुप्तान्नयन्तीं तां रात्रिष्वन्यासु मारिष । ददृशुर्योधमुख्यास्ते घ्नन्तं द्रौणिं च नित्यदा ॥
svapne suptānnayantīṃ tāṃ rātriṣvanyāsu māriṣa | dadṛśuryodhamukhyāste ghnantaṃ drauṇiṃ ca nityadā
हे माननीय, अन्य रातों में भी प्रमुख योद्धाओं ने स्वप्न में उसे सोए हुए लोगों को ले जाते देखा था, और द्रौणि को भी सदा मारते हुए देखा था।
श्लोक 80 (10.8.80)
यतः प्रभृति सङ्ग्रामः कुरुपाण्डवसेनयोः । ततः प्रभृति तां कन्यामपश्यन्द्रौणिमेव च ॥
yataḥ prabhṛti saṅgrāmaḥ kurupāṇḍavasenayoḥ | tataḥ prabhṛti tāṃ kanyāmapaśyandrauṇimeva ca
जब से कौरवों और पाण्डवों की सेनाओं में युद्ध आरम्भ हुआ था, तभी से वे उस कन्या को और द्रौणि को भी देखते आ रहे थे।
श्लोक 81 (10.8.81)
तांस्तु दैवहतान्पूर्वं पश्चाद्द्रौणिर्व्यपातयत् । त्रासयन्सर्वभूतानि विनदन्भैरवान्रवान् ॥
tāṃstu daivahatānpūrvaṃ paścāddrauṇirvyapātayat | trāsayansarvabhūtāni vinadanbhairavānravān
जिन्हें दैव पहले ही मार चुका था, उन्हें बाद में द्रौणि ने गिराया; वह सब प्राणियों को डराता और भयंकर गर्जनाएँ करता था।
श्लोक 82 (10.8.82)
तदनुस्मृत्य ते वीरा दर्शनं पूर्वकालिकम् । इदं तदित्यमन्यन्त दैवेनोपनिपीडिताः ॥
tadanusmṛtya te vīrā darśanaṃ pūrvakālikam | idaṃ tadityamanyanta daivenopanipīḍitāḥ
पहले के उस दर्शन को स्मरण करके दैव से पीड़ित वे वीर सोचने लगे, "यह वही है।"
श्लोक 83 (10.8.83)
ततस्तेन निनादेन प्रत्यबुध्यन्त धन्विनः । शिबिरे पाण्डवेयानां शतशोऽथ सहस्रशः ॥
tatastena ninādena pratyabudhyanta dhanvinaḥ | śibire pāṇḍaveyānāṃ śataśo'tha sahasraśaḥ
तब उस कोलाहल से पाण्डवों के शिविर में सैकड़ों-हज़ारों धनुर्धारी जाग उठे।
श्लोक 84 (10.8.84)
सोऽच्छिनत्कस्यचित्पदौ जघनं चैव कस्यचित् । कांश्चिद्बिभेदपार्श्वेषु कालसृष्ट इवान्तकः ॥
so'cchinatkasyacitpadau jaghanaṃ caiva kasyacit | kāṃścidbibhedapārśveṣu kālasṛṣṭa ivāntakaḥ
उसने किसी के दोनों पैर काट डाले, किसी की कमर काट दी और कितनों को पसलियों के पास से चीर डाला; मानो काल का भेजा हुआ यमराज ही हो।
श्लोक 85 (10.8.85)
अत्युग्रप्रतिपिष्टैश्च नदद्भिश्च भृशोत्कटैः । गजाश्वमथितैश्चान्यैर्मही कीर्णाऽभवत्प्रभो ॥
atyugrapratipiṣṭaiśca nadadbhiśca bhṛśotkaṭaiḥ | gajāśvamathitaiścānyairmahī kīrṇā'bhavatprabho
हे प्रभो! भयंकर प्रहारों से कुचले हुए, उन्माद में चीखते हुए तथा हाथी-घोड़ों से रौंदे गए लोगों से सारी भूमि पट गई।
श्लोक 86 (10.8.86)
क्रोशतां किमिदं कोऽयं कः शब्दः किन्नु किं कृतम् । पाञ्चालानां तथा द्रौणिरन्तकः समपद्यत ॥
krośatāṃ kimidaṃ ko'yaṃ kaḥ śabdaḥ kinnu kiṃ kṛtam | pāñcālānāṃ tathā drauṇirantakaḥ samapadyata
वे चिल्ला उठे — "यह क्या है? यह कौन है? यह कैसा शब्द है? क्या हो गया?" — और उसी समय द्रोणपुत्र पाञ्चालों के लिए साक्षात् यमराज बन गया।
श्लोक 87 (10.8.87)
अपेतशस्त्रसन्नाहान्सन्नद्धान्पाण्डुसृञ्जयान् । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय द्रौणिः प्रहरतां वरः ॥
apetaśastrasannāhānsannaddhānpāṇḍusṛñjayān | prāhiṇonmṛtyulokāya drauṇiḥ praharatāṃ varaḥ
योद्धाओं में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र ने उन पाण्डव और सृञ्जय वीरों को, जिन्होंने शस्त्र और कवच उतार रखे थे, यद्यपि वे युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे, मृत्युलोक भेज दिया।
श्लोक 88 (10.8.88)
ततस्तच्छस्त्रवित्रस्ता भयादभ्यपतन्नराः । निद्रान्धा नष्टसंज्ञाश्च तत्रतत्र निपेतिरे ॥
tatastacchastravitrastā bhayādabhyapatannarāḥ | nidrāndhā naṣṭasaṃjñāśca tatratatra nipetire
उसके शस्त्रों से घबराए हुए लोग भय के मारे इधर-उधर झपटे; नींद से अंधे और होश खोए हुए वे जहाँ-तहाँ गिर पड़े।
श्लोक 89 (10.8.89)
ऊरुस्तम्भगृहीताश्च कश्मलाभिहतौजसः । विनदन्तो भृशं त्रस्ता निरैक्षन्त परस्परम् ॥
ūrustambhagṛhītāśca kaśmalābhihataujasaḥ | vinadanto bhṛśaṃ trastā niraikṣanta parasparam
जाँघें जकड़ जाने से और मूर्छा से बल नष्ट हो जाने से वे अत्यन्त भयभीत होकर ज़ोर से चीखते हुए एक-दूसरे की ओर ताकने लगे।
श्लोक 90 (10.8.90)
ततो रथं पुनर्द्रौणिरास्थितो भीमदर्शनः । धनुष्पाणिः शरैरन्यान्प्रैषयद्वै यमक्षयम् ॥
tato rathaṃ punardrauṇirāsthito bhīmadarśanaḥ | dhanuṣpāṇiḥ śarairanyānpraiṣayadvai yamakṣayam
फिर देखने में भयंकर द्रोणपुत्र धनुष हाथ में लेकर पुनः रथ पर चढ़ा और बाणों से दूसरों को यमलोक भेजने लगा।
श्लोक 91 (10.8.91)
पुनरुत्पततश्चापि दूरादपि नरोत्तमान् । शूरान्सम्पततश्चान्यान्कालरात्र्यै न्यवेदयत् ॥
punarutpatataścāpi dūrādapi narottamān | śūrānsampatataścānyānkālarātryai nyavedayat
जो श्रेष्ठ पुरुष फिर उछलकर दूर से भी आते थे और जो दूसरे शूर उस पर टूट पड़ते थे, उन्हें उसने कालरात्रि को सौंप दिया।
श्लोक 92 (10.8.92)
तथैव स्यन्दनाग्रेण प्रमथन्स व्यरोचत । शरवर्षैश्च विविधैरवर्षच्छात्रवांस्ततः ॥
tathaiva syandanāgreṇa pramathansa vyarocata | śaravarṣaiśca vividhairavarṣacchātravāṃstataḥ
इसी प्रकार रथ के अगले भाग से उन्हें कुचलता हुआ वह शोभित हो रहा था, और फिर उसने अनेक प्रकार के बाणों की वर्षा से शत्रुओं को ढक दिया।
श्लोक 93 (10.8.93)
पुनश्च सुविचित्रेण शतचन्द्रेण चर्मणा । तेन चाकाशवर्णेन तथाचरत सोऽसिना ॥
punaśca suvicitreṇa śatacandreṇa carmaṇā | tena cākāśavarṇena tathācarata so'sinā
फिर सैकड़ों चन्द्र-चिह्नों वाली, आकाश के रंग की अत्यन्त विचित्र ढाल और तलवार लेकर वह विचरने लगा।
श्लोक 94 (10.8.94)
तथा स शिबिरं तेषां द्रौणिराहवदुर्मदः । व्यक्षोभयत राजेन्द्र महाह्रदमिव द्विपः ॥
tathā sa śibiraṃ teṣāṃ drauṇirāhavadurmadaḥ | vyakṣobhayata rājendra mahāhradamiva dvipaḥ
इस प्रकार युद्ध के मद में उन्मत्त द्रोणपुत्र ने, हे राजेन्द्र! उनके शिविर को वैसे ही मथ डाला जैसे हाथी किसी विशाल सरोवर को मथ डालता है।
श्लोक 95 (10.8.95)
उत्पेतुस्तेन शब्देन योधा राजन्विचेतसः । निद्रार्ताश्च भयार्ताश्च व्यधावन्त ततस्ततः ॥
utpetustena śabdena yodhā rājanvicetasaḥ | nidrārtāśca bhayārtāśca vyadhāvanta tatastataḥ
हे राजन्! उस शब्द से योद्धा घबराकर उठ खड़े हुए; नींद और भय से व्याकुल होकर वे चारों ओर भागने लगे।
श्लोक 96 (10.8.96)
विस्वरं चुक्रुशुश्चान्ये बह्वबद्धं तथाऽवदन् । न च स्म प्रत्यपद्यन्त शस्त्राणि वसनानि च ॥
visvaraṃ cukruśuścānye bahvabaddhaṃ tathā'vadan | na ca sma pratyapadyanta śastrāṇi vasanāni ca
कुछ बेसुरी आवाज़ में चीखने लगे, दूसरे बहुत-सी असम्बद्ध बातें बकने लगे, और उन्हें अपने शस्त्र और वस्त्र भी नहीं मिल पाए।
श्लोक 97 (10.8.97)
विमुक्तकेशाश्चाप्यन्ये नाभ्यजानन्परस्परम् । उत्पतन्तोऽपतञ्श्रान्ताः केचित्तत्राभ्रमंस्तदा । पुरीषमसृजन्केचित्केचिन्मूत्रं प्रसुस्रुवुः ॥
vimuktakeśāścāpyanye nābhyajānanparasparam | utpatanto'patañśrāntāḥ kecittatrābhramaṃstadā | purīṣamasṛjankecitkecinmūtraṃ prasusruvuḥ
दूसरे लोग, जिनके केश खुल गए थे, एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते थे। कुछ उछलकर थककर गिर पड़ते, कुछ वहाँ भटकते फिरते। कुछ ने मल त्याग दिया और कुछ के मूत्र बह निकला।
श्लोक 98 (10.8.98)
बन्धनानि च राजेन्द्र सञ्छिद्य तुरगा द्विपाः । समं पर्यपतंश्चान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम् ॥
bandhanāni ca rājendra sañchidya turagā dvipāḥ | samaṃ paryapataṃścānye kurvanto mahadākulam
हे राजेन्द्र! घोड़े और हाथी अपने बन्धन तोड़कर दूसरों के साथ मिलकर चारों ओर दौड़ पड़े और भारी हलचल मचाने लगे।
श्लोक 99 (10.8.99)
तत्र केचिन्नरा भीता व्यलीयन्त महीतले । तथैव तान्निपतितानपिंषन्गजवाजिनः ॥
tatra kecinnarā bhītā vyalīyanta mahītale | tathaiva tānnipatitānapiṃṣangajavājinaḥ
वहाँ कुछ भयभीत लोग भूमि पर छिपकर पड़ गए, और गिरे हुए उन लोगों को हाथी-घोड़े पीस डालते थे।
श्लोक 100 (10.8.100)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ । हृष्टानि व्यनदन्नुच्चैर्मुदा युक्तानि सत्तम ॥
tasmiṃstathā vartamāne rakṣāṃsi puruṣarṣabha | hṛṣṭāni vyanadannuccairmudā yuktāni sattama
हे पुरुषश्रेष्ठ! जब यह सब हो रहा था, तब हर्ष से भरे हुए राक्षस आनन्दित होकर ऊँचे स्वर में गरजने लगे।
श्लोक 101 (10.8.101)
स शब्दः प्रेरितो राजन्भूतसङ्घैर्मुदा युतैः । अपूरयद्दिशः सर्वा दिवं चातिमहान्स्वनः ॥
sa śabdaḥ prerito rājanbhūtasaṅghairmudā yutaiḥ | apūrayaddiśaḥ sarvā divaṃ cātimahānsvanaḥ
हे राजन्! आनन्दित भूतगणों द्वारा उठाया हुआ वह महान् शब्द सारी दिशाओं और आकाश में गूँज उठा।
श्लोक 102 (10.8.102)
तेषामार्तरवं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिनः । मुक्ताः पर्यपतन्राजन्मृद्नन्तः शिबिरे जनम् ॥
teṣāmārtaravaṃ śrutvā vitrastā gajavājinaḥ | muktāḥ paryapatanrājanmṛdnantaḥ śibire janam
हे राजन्! उनका आर्तनाद सुनकर घबराए हुए हाथी और घोड़े छूटकर शिविर में लोगों को रौंदते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे।
श्लोक 103 (10.8.103)
तैस्तत्र परिधावद्भिश्चरणोदीरितं रजः । अकरोच्छिबिरे तेषां रजन्यां द्विगुणं तमः ॥
taistatra paridhāvadbhiścaraṇodīritaṃ rajaḥ | akarocchibire teṣāṃ rajanyāṃ dviguṇaṃ tamaḥ
वहाँ दौड़ते हुए उन हाथी-घोड़ों के पैरों से उठी धूल ने उस रात शिविर में अँधेरे को दुगुना कर दिया।
श्लोक 104 (10.8.104)
तस्मिंस्तमसि सञ्जाते प्रमूढाः सर्वतो जनाः । नाजानन्पितरः पुत्रान्भ्रातॄन्भ्रातर एव च ॥
tasmiṃstamasi sañjāte pramūḍhāḥ sarvato janāḥ | nājānanpitaraḥ putrānbhrātṝnbhrātara eva ca
उस अँधेरे के छा जाने पर सब ओर लोग घबरा गए; पिता पुत्रों को नहीं पहचानते थे और भाई भाइयों को नहीं।
श्लोक 105 (10.8.105)
गजा गजानतिक्रम्य निर्मनुष्या हया हयान् । अताडयंस्तथाऽभञ्जंस्तथाऽमृद्नंश्च भारत ॥
gajā gajānatikramya nirmanuṣyā hayā hayān | atāḍayaṃstathā'bhañjaṃstathā'mṛdnaṃśca bhārata
हे भारत! हाथी हाथियों को लाँघकर और बिना सवार के घोड़े घोड़ों को लाँघकर उन्हें मारते, तोड़ते और रौंदते थे।
श्लोक 106 (10.8.106)
ते भग्नाः प्रपतन्ति स्म मृद्नन्तश्च परस्परम् । न्यपातयंस्तथा चान्यान्पातयित्वा तदाऽपिषन् ॥
te bhagnāḥ prapatanti sma mṛdnantaśca parasparam | nyapātayaṃstathā cānyānpātayitvā tadā'piṣan
टूटे हुए वे गिर पड़ते और एक-दूसरे को रौंदते थे; वे दूसरों को गिराते और गिराकर पीस डालते थे।
श्लोक 107 (10.8.107)
विचेतसः सनिद्राश्च तमसा चावृता नराः । जघ्नुः स्वानेव तत्राथ कालेनैव प्रचोदिताः ॥
vicetasaḥ sanidrāśca tamasā cāvṛtā narāḥ | jaghnuḥ svāneva tatrātha kālenaiva pracoditāḥ
बेहोश, अधसोए और अँधेरे में लिपटे हुए लोग काल से ही प्रेरित होकर वहाँ अपने ही लोगों को मारने लगे।
श्लोक 108 (10.8.108)
त्यक्त्वाद्वाराणि च द्वाःस्थास्तथागुल्मानिगौल्मिकाः । प्राद्रवन्त यथाशक्ति कांदिशीका विचेतसः ॥
tyaktvādvārāṇi ca dvāḥsthāstathāgulmānigaulmikāḥ | prādravanta yathāśakti kāṃdiśīkā vicetasaḥ
द्वारपाल द्वारों को और गुल्मों के रक्षक अपनी टुकड़ियों को छोड़कर, बदहवास होकर, जिधर बन पड़ा उधर भाग खड़े हुए।
श्लोक 109 (10.8.109)
विप्रनष्टाश्च तेऽन्योन्यं नाजानन्तस्तथा विभो । क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतसः ॥
vipranaṣṭāśca te'nyonyaṃ nājānantastathā vibho | krośantastāta putreti daivopahatacetasaḥ
हे विभो! वे एक-दूसरे से बिछड़ गए, एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते थे, और दैव से मारी गई बुद्धि वाले होकर "पिता जी!", "बेटा!" पुकारते थे।
श्लोक 110 (10.8.110)
पलायतां दिशस्तेषां स्वानप्युत्सृज्य बान्धवान् । गोत्रनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त ततो जनाः ॥
palāyatāṃ diśasteṣāṃ svānapyutsṛjya bāndhavān | gotranāmabhiranyonyamākrandanta tato janāḥ
सब दिशाओं में भागते हुए वे अपने बन्धुओं तक को छोड़ गए, और लोग गोत्र और नाम लेकर एक-दूसरे को पुकारने लगे।
श्लोक 111 (10.8.111)
हाहाकारं च कुर्वाणाः पृथिव्यां शेरते परे । तान्बुद्ध्वा रणमध्येऽसौ द्रोणपुत्रो व्यपोथयत् ॥
hāhākāraṃ ca kurvāṇāḥ pṛthivyāṃ śerate pare | tānbuddhvā raṇamadhye'sau droṇaputro vyapothayat
दूसरे लोग "हाय! हाय!" करते हुए भूमि पर पड़े थे; उन्हें जान लेने पर द्रोणपुत्र ने रणभूमि के बीच उन्हें भी मार डाला।
श्लोक 112 (10.8.112)
तत्रापरे वध्यमाना मुहुर्मुहुरचेतसः । शिबिरान्निष्पतन्ति स्म क्षत्रिया भयपीडिताः ॥
tatrāpare vadhyamānā muhurmuhuracetasaḥ | śibirānniṣpatanti sma kṣatriyā bhayapīḍitāḥ
दूसरे क्षत्रिय, जो बार-बार मारे जाने से अचेत हो रहे थे और भय से पीड़ित थे, शिविर से बाहर निकल भागने लगे।
श्लोक 113 (10.8.113)
तांस्तु निष्पतितांस्त्रस्ताञ्शिबिराज्जीवितैषिणः । कृतवर्मा कृपश्चैव द्वारदेशे निजघ्नतुः ॥
tāṃstu niṣpatitāṃstrastāñśibirājjīvitaiṣiṇaḥ | kṛtavarmā kṛpaścaiva dvāradeśe nijaghnatuḥ
किन्तु प्राण बचाने की इच्छा से भयभीत होकर शिविर से निकलते हुए उन लोगों को कृतवर्मा और कृपाचार्य ने द्वार पर ही मार गिराया।
श्लोक 114 (10.8.114)
विस्रस्तयन्त्रकवचान्मुक्तकेशान्कृताञ्जलीन् । वेपमानान्क्षितौ भीतान्नैव कांश्चिदमुच्यताम् ॥
visrastayantrakavacānmuktakeśānkṛtāñjalīn | vepamānānkṣitau bhītānnaiva kāṃścidamucyatām
जिनके बन्धन और कवच ढीले होकर खिसक गए थे, केश बिखरे थे, जो हाथ जोड़े काँपते और भयभीत होकर भूमि पर पड़े थे — उनमें से किसी को भी उन दोनों ने नहीं छोड़ा।
श्लोक 115 (10.8.115)
नामुच्यत तयोः कश्चिन्निष्क्रान्तः शिबिराद्बहिः । कृपश्चैव महाराज हार्दिक्यश्चैव दुर्मतिः ॥
nāmucyata tayoḥ kaścinniṣkrāntaḥ śibirādbahiḥ | kṛpaścaiva mahārāja hārdikyaścaiva durmatiḥ
हे महाराज! शिविर से बाहर निकले हुए उनमें से किसी को भी कृपाचार्य और दुष्टबुद्धि हृदीकपुत्र कृतवर्मा ने नहीं छोड़ा।
श्लोक 116 (10.8.116)
भूयश्चैव चिकीर्षन्तौ द्रौणपुत्रस्य तौ प्रियम् । त्रिषु देशेषु ददतुः शिबिरस्य हुताशनम् ॥
bhūyaścaiva cikīrṣantau drauṇaputrasya tau priyam | triṣu deśeṣu dadatuḥ śibirasya hutāśanam
द्रोणपुत्र का और भी प्रिय करने की इच्छा से उन दोनों ने शिविर में तीन स्थानों पर आग लगा दी।
श्लोक 117 (10.8.117)
ततः प्रकाशे शिबिरे खड्गेन पितृनन्दनः । अश्वत्थामा महाराज व्यचरत्कृतहस्तवत् ॥
tataḥ prakāśe śibire khaḍgena pitṛnandanaḥ | aśvatthāmā mahārāja vyacaratkṛtahastavat
तब शिविर में उजाला हो जाने पर, हे महाराज! पिता को आनन्द देने वाला अश्वत्थामा सधे हुए हाथ की तरह तलवार लेकर विचरने लगा।
श्लोक 118 (10.8.118)
कांश्चिदापततो वीरानपरांश्चैव धावतः । व्ययोजयत खड्गेन प्राणैर्द्विजवरोत्तमः ॥
kāṃścidāpatato vīrānaparāṃścaiva dhāvataḥ | vyayojayata khaḍgena prāṇairdvijavarottamaḥ
उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने तलवार से, सामने आते हुए कुछ वीरों को और भागते हुए दूसरों को प्राणों से अलग कर दिया।
श्लोक 119 (10.8.119)
कांश्चिद्योधान्स खड्गेन मध्ये सञ्छिद्य वीर्यवान् । अशातयद्द्रोणपुत्रः संरब्धस्तिलकाण्डवत् ॥
kāṃścidyodhānsa khaḍgena madhye sañchidya vīryavān | aśātayaddroṇaputraḥ saṃrabdhastilakāṇḍavat
उस बलवान् द्रोणपुत्र ने क्रोध में भरकर कुछ योद्धाओं को तलवार से बीच में से काटकर तिल के डंठलों की तरह गिरा दिया।
श्लोक 120 (10.8.120)
निनदद्भिर्भृशायस्तैर्नराश्वद्विरदोत्तमैः । पतितैरभवत्कीर्णा मेदिनी भरतर्षभ ॥
ninadadbhirbhṛśāyastairnarāśvadviradottamaiḥ | patitairabhavatkīrṇā medinī bharatarṣabha
हे भरतश्रेष्ठ! चिल्लाते हुए, अत्यन्त पीड़ित, गिरे हुए श्रेष्ठ मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों से पृथ्वी पट गई।
श्लोक 121 (10.8.121)
मानुषाणां सहस्रेषु हतेषु पतितेषु च । उदतिष्ठन्कबन्धानि बहून्युत्थाय चापतन् ॥
mānuṣāṇāṃ sahasreṣu hateṣu patiteṣu ca | udatiṣṭhankabandhāni bahūnyutthāya cāpatan
जब हज़ारों मनुष्य मारे जाकर गिर चुके, तब बहुत-से कबन्ध उठ खड़े हुए और उठकर फिर गिर पड़े।
श्लोक 122 (10.8.122)
सायुधान्साङ्गदान्बाहून्विचकर्त शिरांसि च । हस्तिहस्तोपमानूरून्हस्तान्पादांश्च भारत ॥
sāyudhānsāṅgadānbāhūnvicakarta śirāṃsi ca | hastihastopamānūrūnhastānpādāṃśca bhārata
हे भारत! उसने शस्त्रों और बाजूबन्दों समेत भुजाएँ, सिर, हाथी की सूँड़ जैसी जाँघें, हाथ और पैर काट डाले।
श्लोक 123 (10.8.123)
पृष्ठच्छिन्नान्पार्श्वच्छिन्नाञ्शिरश्छिन्नांस्तथापरान् । स महात्माकरोद्द्रौणिः कांश्चिच्चापि पराङ्मुखान् ॥
pṛṣṭhacchinnānpārśvacchinnāñśiraśchinnāṃstathāparān | sa mahātmākaroddrauṇiḥ kāṃściccāpi parāṅmukhān
उस महात्मा द्रोणपुत्र ने किसी को पीठ पर कटा, किसी को पसली पर कटा और किसी को सिरकटा बना दिया, और कुछ को मुँह फेरकर भागते हुए भी मार डाला।
श्लोक 124 (10.8.124)
मध्यदेशे नरानन्यांश्चिच्छेदान्यांश्च कर्णतः । अंसदेशे निहत्यान्यान्काये प्रावेशयच्छिरः ॥
madhyadeśe narānanyāṃścicchedānyāṃśca karṇataḥ | aṃsadeśe nihatyānyānkāye prāveśayacchiraḥ
उसने कुछ मनुष्यों को बीच से और कुछ को कान के पास से काटा; दूसरों को कंधे पर मारकर उनका सिर धड़ में धँसा दिया।
श्लोक 125 (10.8.125)
एवं हि बहुभिः शस्त्रैर्घ्नतोऽपि बलवत्तरान् । तमसा रजनी घोरा बभौ दारुणदर्शना ॥
evaṃ hi bahubhiḥ śastrairghnato'pi balavattarān | tamasā rajanī ghorā babhau dāruṇadarśanā
इस प्रकार वह बहुत-से शस्त्रों से अधिक बलवान् लोगों को भी मारता रहा, और अँधेरे से भरी वह रात भयानक और देखने में दारुण हो उठी।
श्लोक 126 (10.8.126)
किञ्चित्प्राणैश्च पुरुषैर्हतैश्चान्यैः सहस्रशः । बहुना च गजाश्वेन भूरभूद्भीमदर्शना ॥
kiñcitprāṇaiśca puruṣairhataiścānyaiḥ sahasraśaḥ | bahunā ca gajāśvena bhūrabhūdbhīmadarśanā
जिनमें थोड़े-से प्राण बचे थे ऐसे पुरुषों से, हज़ारों मारे गए दूसरे पुरुषों से तथा बहुत-से हाथी-घोड़ों से भरी हुई पृथ्वी देखने में भयंकर हो गई।
श्लोक 127 (10.8.127)
यक्षरक्षःसमाकीर्णे रथाश्वद्विपदारुणे । क्रुद्धेन द्रोणपुत्रेण सञ्छिन्नाः प्रापतन्भुवि । भ्रातॄनन्ये पितॄनन्ये पुत्रानन्ये विचुक्रुशुः ॥
yakṣarakṣaḥsamākīrṇe rathāśvadvipadāruṇe | kruddhena droṇaputreṇa sañchinnāḥ prāpatanbhuvi | bhrātṝnanye pitṝnanye putrānanye vicukruśuḥ
यक्षों और राक्षसों से भरे हुए तथा रथों, घोड़ों और हाथियों से भयानक उस स्थान पर क्रुद्ध द्रोणपुत्र के काटे हुए लोग भूमि पर गिर पड़े। कुछ भाइयों के लिए, कुछ पिताओं के लिए और कुछ पुत्रों के लिए विलाप करने लगे।
श्लोक 128 (10.8.128)
केचिदूचुर्न तत्क्रुद्धैर्धार्तराष्ट्रैः कृतं रणे । यत्कृतं नः प्रसुप्तानां रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः । असान्निध्याद्धि पार्थानामिदं नः कदनं कृतम् ॥
kecidūcurna tatkruddhairdhārtarāṣṭraiḥ kṛtaṃ raṇe | yatkṛtaṃ naḥ prasuptānāṃ rakṣobhiḥ krūrakarmabhiḥ | asānnidhyāddhi pārthānāmidaṃ naḥ kadanaṃ kṛtam
कुछ ने कहा — "यह काम रण में क्रुद्ध धृतराष्ट्र-पुत्रों ने नहीं किया है। हम सोए हुए लोगों के साथ जो कुछ हुआ, वह क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों ने किया है; पार्थों के पास न रहने से ही हमारा यह संहार हुआ है।"
श्लोक 129 (10.8.129)
न चासुरैर्न गन्धर्वैर्न यक्षैर्न च राक्षसैः । शक्यो विजेतुं कौन्तेयो नेता यस्य जनार्दनः । ब्रह्मण्यः सत्यवाग्दान्तः सर्वभूतानुकम्पकः ॥
na cāsurairna gandharvairna yakṣairna ca rākṣasaiḥ | śakyo vijetuṃ kaunteyo netā yasya janārdanaḥ | brahmaṇyaḥ satyavāgdāntaḥ sarvabhūtānukampakaḥ
"कुन्तीपुत्र को असुर, गन्धर्व, यक्ष या राक्षस नहीं जीत सकते, जिसके नेता जनार्दन हैं — जो ब्राह्मणों के भक्त, सत्यवादी, संयमी और सब प्राणियों पर दया करने वाले हैं।
श्लोक 130 (10.8.130)
न च सुप्तं प्रमत्तं वा न्यस्तशस्त्रं कृताञ्जलिम् । धावन्तं मुक्तकेशं वा हन्ति पार्थो धनञ्जयः ॥
na ca suptaṃ pramattaṃ vā nyastaśastraṃ kṛtāñjalim | dhāvantaṃ muktakeśaṃ vā hanti pārtho dhanañjayaḥ
पृथापुत्र धनञ्जय सोए हुए, असावधान, शस्त्र रख चुके, हाथ जोड़े हुए या खुले केशों से भागते हुए मनुष्य को नहीं मारते।"
श्लोक 131 (10.8.131)
तदिदं नः कृतं घोरं रक्षोभिः क्रूरकर्मभिः । इति लालप्यमानाः स्म शेरते बहवो जनाः ॥
tadidaṃ naḥ kṛtaṃ ghoraṃ rakṣobhiḥ krūrakarmabhiḥ | iti lālapyamānāḥ sma śerate bahavo janāḥ
"क्रूर कर्म करने वाले राक्षसों ने हमारे साथ यह भयंकर कर्म किया है" — इस प्रकार विलाप करते हुए बहुत-से लोग पड़े रहे।
श्लोक 132 (10.8.132)
स्तनतां च मनुष्याणामपरेषां च कूजताम् । ततो मुहूर्तात्प्राशाम्यत्स शब्दस्तुमुलो महान् ॥
stanatāṃ ca manuṣyāṇāmapareṣāṃ ca kūjatām | tato muhūrtātprāśāmyatsa śabdastumulo mahān
कराहते हुए मनुष्यों और दूसरे चीखने वालों का वह महान् कोलाहल थोड़ी देर में शान्त हो गया।
श्लोक 133 (10.8.133)
शोणितव्यतिषिक्तायां वसुधायां च भूमिप । तद्रजस्तुमुलं घोरं क्षणेनान्तरधीयत ॥
śoṇitavyatiṣiktāyāṃ vasudhāyāṃ ca bhūmipa | tadrajastumulaṃ ghoraṃ kṣaṇenāntaradhīyata
हे राजन्! रक्त से भूमि के भीग जाने पर वह घना और भयंकर धूल का गुबार क्षण भर में लुप्त हो गया।
श्लोक 134 (10.8.134)
स चेष्टमानानुद्विग्नान्निरुत्साहान्सहस्रशः । न्यपातयन्नरान्क्रुद्धः पशून्पशुपतिर्यथा ॥
sa ceṣṭamānānudvignānnirutsāhānsahasraśaḥ | nyapātayannarānkruddhaḥ paśūnpaśupatiryathā
तड़पते हुए, व्याकुल और उत्साहहीन हज़ारों लोगों को उसने क्रोध में भरकर वैसे ही मार गिराया जैसे पशुपति पशुओं को मारते हैं।
श्लोक 135 (10.8.135)
अन्योन्यं सम्परिष्वज्य शयानाञ्जीवतोऽपरान् । संलीनान्युध्यमानांश्च सर्वान्द्रौणिरपोथयत् ॥
anyonyaṃ sampariṣvajya śayānāñjīvato'parān | saṃlīnānyudhyamānāṃśca sarvāndrauṇirapothayat
एक-दूसरे से लिपटकर पड़े हुओं को, जीवित बचे दूसरों को, छिपे हुओं को और लड़ते हुओं को — सबको द्रोणपुत्र ने मार डाला।
श्लोक 136 (10.8.136)
दह्यमाना हुताशेन वध्यमानाश्च तेन ते । परस्परं तदा योधाननयद्यमसादनम् ॥
dahyamānā hutāśena vadhyamānāśca tena te | parasparaṃ tadā yodhānanayadyamasādanam
आग से जलते हुए और उसके हाथों मारे जाते हुए उन योद्धाओं को उसने एक के बाद एक यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 137 (10.8.137)
तस्या रजन्यास्त्वर्धेन पाण्डवानां महद्बलम् । गमयामास राजेन्द्र द्रौणिर्यमनिवेशनम् ॥
tasyā rajanyāstvardhena pāṇḍavānāṃ mahadbalam | gamayāmāsa rājendra drauṇiryamaniveśanam
हे राजेन्द्र! उस रात्रि के आधे भाग में ही द्रोणपुत्र ने पाण्डवों की उस विशाल सेना को यमलोक पहुँचा दिया।
श्लोक 138 (10.8.138)
निशाचराणां सत्वानां रात्रिः सा हर्षवर्धिनी । आसीन्नरगजाश्वानां रौद्री क्षयकरी भृशम् ॥
niśācarāṇāṃ satvānāṃ rātriḥ sā harṣavardhinī | āsīnnaragajāśvānāṃ raudrī kṣayakarī bhṛśam
निशाचर प्राणियों को हर्ष देने वाली वह रात्रि मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों के लिए भयंकर और अत्यन्त विनाशकारी थी।
श्लोक 139 (10.8.139)
तत्रादृश्यन्त रक्षांसि पिशाचाश्च पृथग्विधाः । खादन्तो नरमांसानि पिबन्तः शोणितानि च ॥
tatrādṛśyanta rakṣāṃsi piśācāśca pṛthagvidhāḥ | khādanto naramāṃsāni pibantaḥ śoṇitāni ca
वहाँ अनेक प्रकार के राक्षस और पिशाच दिखाई दिए, जो मनुष्यों का मांस खा रहे और रक्त पी रहे थे।
श्लोक 140 (10.8.140)
करालाः पिङ्गला रौद्राः शैलदन्ता रजस्वलाः । जटिला भीमवक्त्राश्च पञ्चपादा महोदराः ॥
karālāḥ piṅgalā raudrāḥ śailadantā rajasvalāḥ | jaṭilā bhīmavaktrāśca pañcapādā mahodarāḥ
वे विकराल, पीले-भूरे, भयंकर, पर्वत जैसे दाँतों वाले, धूल से सने, जटाधारी, भीषण मुखों वाले, पाँच पैरों वाले और बड़े पेट वाले थे।
श्लोक 141 (10.8.141)
पश्चादङ्गुलयो रूक्षा विरूपा भैरवस्वनाः । गजाननाश्च ह्रस्वाश्च नीलवर्णा बिभीषणाः ॥
paścādaṅgulayo rūkṣā virūpā bhairavasvanāḥ | gajānanāśca hrasvāśca nīlavarṇā bibhīṣaṇāḥ
उनकी उँगलियाँ पीछे की ओर मुड़ी थीं; वे कठोर, कुरूप, भयंकर स्वर वाले, हाथी जैसे मुख वाले, ठिगने, नीले रंग के और डरावने थे।
श्लोक 142 (10.8.142)
सपुत्रदाराः सुक्रूराः सुदुर्दर्शाः सुनिर्घृणाः । विविधानि च रूपाणि तत्रादृश्यन्त रक्षसाम् ॥
saputradārāḥ sukrūrāḥ sudurdarśāḥ sunirghṛṇāḥ | vividhāni ca rūpāṇi tatrādṛśyanta rakṣasām
वे स्त्री-पुत्रों सहित थे, अत्यन्त क्रूर, देखने में बहुत भयानक और निर्दय थे; वहाँ राक्षसों के अनेक रूप दिखाई दे रहे थे।
श्लोक 143 (10.8.143)
पीत्वा च शोणितं हृष्टाः प्रानृत्यन्गणशोऽपरे । इदं परमिदं मेध्यमिदं स्वाद्विति चाब्रुवन् ॥
pītvā ca śoṇitaṃ hṛṣṭāḥ prānṛtyangaṇaśo'pare | idaṃ paramidaṃ medhyamidaṃ svādviti cābruvan
रक्त पीकर दूसरे हर्षित होकर टोलियों में नाचने लगे और बोले — "यह उत्तम है, यह पवित्र है, यह स्वादिष्ट है।"
श्लोक 144 (10.8.144)
मेदोमज्जास्थिरक्तानां मांसानां च भृशाशिताः । परे मांसानि खादन्तः क्रव्यादा मांसजीविनः ॥
medomajjāsthiraktānāṃ māṃsānāṃ ca bhṛśāśitāḥ | pare māṃsāni khādantaḥ kravyādā māṃsajīvinaḥ
दूसरे मांसभोजी, मांस पर जीने वाले, मेद, मज्जा, हड्डी, रक्त और मांस से खूब तृप्त होकर भी मांस खाते जा रहे थे।
श्लोक 145 (10.8.145)
वसाश्चैवापरे पीत्वा पर्यधावन्विकुक्षिकाः । नानावक्त्रास्तथा रौद्राः क्रव्यादाः पिशिताशनाः ॥
vasāścaivāpare pītvā paryadhāvanvikukṣikāḥ | nānāvaktrāstathā raudrāḥ kravyādāḥ piśitāśanāḥ
दूसरे वसा पीकर फूले पेट लिए दौड़ रहे थे; उनके मुख अनेक थे, वे भयंकर थे, कच्चा मांस खाने वाले और मांसभक्षी थे।
श्लोक 146 (10.8.146)
अयुतानि च तत्रासन्प्रयुतान्यर्बुदानि च । रक्षसां घोररूपाणां महतां क्रूरकर्मणाम् ॥
ayutāni ca tatrāsanprayutānyarbudāni ca | rakṣasāṃ ghorarūpāṇāṃ mahatāṃ krūrakarmaṇām
वहाँ घोर रूप वाले, बलवान् और क्रूर कर्म करने वाले उन राक्षसों के दस-दस हज़ार, लाखों और करोड़ों की टोलियाँ थीं।
श्लोक 147 (10.8.147)
मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन्महति वैशसे । समेतानि बहून्यासन्भूतानि च जनाधिप ॥
muditānāṃ vitṛptānāṃ tasminmahati vaiśase | sametāni bahūnyāsanbhūtāni ca janādhipa
हे जनाधिप! उस महान् संहार में प्रसन्न और तृप्त होकर बहुत-से प्राणी वहाँ एकत्र हो गए थे।
श्लोक 148 (10.8.148)
एवंविधा हि सा रात्रिः सोमकानां जनक्षये । प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत्सुभृशदारुणा ॥
evaṃvidhā hi sā rātriḥ somakānāṃ janakṣaye | prasuptānāṃ pramattānāmāsītsubhṛśadāruṇā
सोमकों के उस जन-संहार में, सोए हुए और असावधान लोगों के लिए वह रात ऐसी ही अत्यन्त भयानक थी।
श्लोक 149 (10.8.149)
असंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिक्रमः । तादृशा निहता यत्र कृत्वाऽस्माकं जनक्षयम् ॥
asaṃśayaṃ hi kālasya paryāyo duratikramaḥ | tādṛśā nihatā yatra kṛtvā'smākaṃ janakṣayam
निःसन्देह काल का चक्र लाँघना कठिन है, क्योंकि जिन्होंने हमारे लोगों का संहार किया था, वे ही इस प्रकार मारे गए।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 150 (10.8.150)
प्रागेव सुमहत्कर्म द्रौणिरेतन्महारथः । नाकरोदीदृशं कस्मान्मत्पुत्रविजये धृतः ॥
prāgeva sumahatkarma drauṇiretanmahārathaḥ | nākarodīdṛśaṃ kasmānmatputravijaye dhṛtaḥ
मेरे पुत्रों की विजय में लगे रहने वाले उस महारथी द्रोणपुत्र ने पहले ही ऐसा बड़ा कर्म क्यों नहीं किया?
श्लोक 151 (10.8.151)
अथ कस्माद्धते क्षत्रे कर्मेदं कृतवानसौ । द्रोणपुत्रो महात्मा स तन्मे शंसितुमर्हसि ॥
atha kasmāddhate kṣatre karmedaṃ kṛtavānasau | droṇaputro mahātmā sa tanme śaṃsitumarhasi
और क्षत्रियों के मारे जाने के बाद ही उस महात्मा द्रोणपुत्र ने यह कर्म क्यों किया? यह आप मुझे बताइए।
सञ्जय उवाच
श्लोक 152 (10.8.152)
तेषां नूनं भयान्नासौ कृतवान्कुरुनन्दन । असान्निध्याद्धि पार्थानां केशवस्य च धीमतः । सात्यकेश्चापि कर्मेदं द्रोणपुत्रेण साधितम् ॥
teṣāṃ nūnaṃ bhayānnāsau kṛtavānkurunandana | asānnidhyāddhi pārthānāṃ keśavasya ca dhīmataḥ | sātyakeścāpi karmedaṃ droṇaputreṇa sādhitam
हे कुरुनन्दन! निश्चय ही उनके भय से उसने पहले यह नहीं किया। पार्थों, बुद्धिमान् केशव और सात्यकि की अनुपस्थिति में ही द्रोणपुत्र ने यह कर्म सिद्ध किया।
श्लोक 153 (10.8.153)
को हि तेषां समक्षं तान्हन्यादपि मरुत्पतिः । एतदीदृशकं वृत्तं राजन्सुप्तजने विभो ॥
ko hi teṣāṃ samakṣaṃ tānhanyādapi marutpatiḥ | etadīdṛśakaṃ vṛttaṃ rājansuptajane vibho
भला उनके सामने उन्हें कौन मार सकता था, चाहे स्वयं इन्द्र ही क्यों न हों? हे राजन्! हे विभो! सोए हुए लोगों के बीच ऐसी ही घटना घटी।
श्लोक 154 (10.8.154)
ततो जनक्षयं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम् । प्रत्यूषकाले शिबिरात्प्रतिगन्तुमियेष सः ॥
tato janakṣayaṃ kṛtvā pāṇḍavānāṃ mahātyayam | pratyūṣakāle śibirātpratigantumiyeṣa saḥ
तब पाण्डवों के लोगों का वह महान् संहार करके उसने प्रातःकाल के समय शिविर से लौटना चाहा।
श्लोक 155 (10.8.155)
नृशोणितावसिक्तस्य द्रौणेरासीदसित्सरुः । पाणिना सह संश्लिष्ट एकीभूत इव प्रभो ॥
nṛśoṇitāvasiktasya drauṇerāsīdasitsaruḥ | pāṇinā saha saṃśliṣṭa ekībhūta iva prabho
मनुष्यों के रक्त से भीगी हुई द्रोणपुत्र की तलवार की मूठ उसके हाथ से ऐसी चिपक गई थी, हे प्रभो! मानो दोनों एक हो गए हों।
श्लोक 156 (10.8.156)
स निःशेषानरीन्कृत्वा विरराम निशाक्षये । युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावकः ॥
sa niḥśeṣānarīnkṛtvā virarāma niśākṣaye | yugānte sarvabhūtāni bhasma kṛtveva pāvakaḥ
समस्त शत्रुओं को निःशेष करके वह रात्रि के अन्त में रुका, जैसे युग के अन्त में सब प्राणियों को भस्म करके अग्नि शान्त होती है।
श्लोक 157 (10.8.157)
यथाप्रतिज्ञं तत्कर्म कृत्वा द्रौणायनिः प्रभो । दुर्गमां पदवीं गच्छन्पितुरासीद्गतज्वरः ॥
yathāpratijñaṃ tatkarma kṛtvā drauṇāyaniḥ prabho | durgamāṃ padavīṃ gacchanpiturāsīdgatajvaraḥ
हे प्रभो! प्रतिज्ञा के अनुसार वह कर्म पूरा करके द्रोणपुत्र, कठिन मार्ग पर चलते हुए, पिता के शोक की ज्वाला से मुक्त हो गया।
श्लोक 158 (10.8.158)
यथैव संसुप्तजने शिबिरे प्राविशन्निशि । तथैव हत्वा निःशब्दो निश्चक्राम नरर्षभः ॥
yathaiva saṃsuptajane śibire prāviśanniśi | tathaiva hatvā niḥśabdo niścakrāma nararṣabhaḥ
जैसे वह रात में सोए हुए लोगों वाले शिविर में घुसा था, वैसे ही उन्हें मारकर वह नरश्रेष्ठ चुपचाप बाहर निकल आया।
श्लोक 159 (10.8.159)
निष्क्रम्य शिबिरात्तस्मात्ताभ्यां सङ्गम्य वीर्यवान् । आचख्यौ कर्म तत्सर्वं हृष्टः संहर्षयन्विभो ॥
niṣkramya śibirāttasmāttābhyāṃ saṅgamya vīryavān | ācakhyau karma tatsarvaṃ hṛṣṭaḥ saṃharṣayanvibho
हे विभो! उस शिविर से निकलकर उस बलवान् ने उन दोनों से भेंट की और हर्षित होकर, उन्हें हर्ष देते हुए, वह सारा कर्म उन्हें सुनाया।
श्लोक 160 (10.8.160)
तावथाचख्यतुस्तस्मै प्रियं प्रियकरौ तदा । पाञ्चालान्सृञ्जयांश्चैव विनिकृत्तान्सहस्रशः ॥
tāvathācakhyatustasmai priyaṃ priyakarau tadā | pāñcālānsṛñjayāṃścaiva vinikṛttānsahasraśaḥ
तब उन दोनों ने भी, उसका प्रिय करने की इच्छा से, उसे यह प्रिय समाचार सुनाया कि पाञ्चाल और सृञ्जय हज़ारों की संख्या में कट गए हैं।
श्लोक 161 (10.8.161)
प्रीत्या चोच्चैरुदक्रोशंस्तथैवास्फोटयंस्तलान् । दिष्ट्यादिष्ट्येति चान्योन्यं समेत्योचुर्महारथाः ॥
prītyā coccairudakrośaṃstathaivāsphoṭayaṃstalān | diṣṭyādiṣṭyeti cānyonyaṃ sametyocurmahārathāḥ
हर्ष से उन्होंने ऊँचे स्वर में जयघोष किया और ताली बजाई, और मिलकर उन महारथियों ने एक-दूसरे से कहा — "सौभाग्य से! सौभाग्य से!"
श्लोक 162 (10.8.162)
पर्यष्वजत्ततो द्रौणिस्ताभ्यां सम्प्रतिनन्दितः । इदं हर्षात्तु सुमहदाददे वाक्यमुत्तमम् ॥
paryaṣvajattato drauṇistābhyāṃ sampratinanditaḥ | idaṃ harṣāttu sumahadādade vākyamuttamam
तब द्रोणपुत्र ने उन दोनों का आलिंगन किया और उनसे अभिनन्दित होकर हर्ष के साथ यह महान् और उत्तम वचन कहा।
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 163 (10.8.163)
पाञ्चाला निहताः सर्वे द्रौपदेयाश्च सर्वशः । सोमका मत्स्यशेषाश्च सर्वे विनिहता मया ॥
pāñcālā nihatāḥ sarve draupadeyāśca sarvaśaḥ | somakā matsyaśeṣāśca sarve vinihatā mayā
"सभी पाञ्चाल मारे गए, द्रौपदी के सभी पुत्र मारे गए, सोमक और मत्स्यों के बचे हुए लोग भी — सब मेरे हाथों मारे गए।
श्लोक 164 (10.8.164)
इदानीं कृतकृत्याः स्म याम तत्रैव मा चिरम् । यदि जीवति नो राजा तस्मै शंसामहे प्रियम् ॥
idānīṃ kṛtakṛtyāḥ sma yāma tatraiva mā ciram | yadi jīvati no rājā tasmai śaṃsāmahe priyam
अब हमारा कर्तव्य पूरा हो गया है; हम बिना देर किए वहीं लौट चलें। यदि हमारे राजा जीवित हैं तो उन्हें यह प्रिय समाचार सुनाएँ।"