शल्य पर्व · अध्याय 1
शल्य का सेनापतित्व; सञ्जय द्वारा धृतराष्ट्र को समाचार
जनमेजय पूछते हैं कि कर्ण के गिरने के बाद शेष बचे थोड़े-से कौरवों ने क्या किया, और वैशम्पायन संक्षेप में बताते हैं: दुर्योधन शल्य को सेनापति बनाता है, शल्य दोपहर में युधिष्ठिर के हाथों मारे जाते हैं, और सरोवर में छिपा दुर्योधन पुकारे जाने पर भीम के हाथों गिरा दिया जाता है। फिर सञ्जय रोते हुए हस्तिनापुर में प्रवेश करता है और अन्धे धृतराष्ट्र को राजाओं और सेनाओं के संहार तथा दोनों ओर बचे थोड़े-से योद्धाओं की बात बताता है। राजा, विदुर, गान्धारी और कुरु-स्त्रियाँ मूर्च्छित हो जाती हैं; होश में आने पर धृतराष्ट्र स्त्रियों को विदा कर देते हैं और विदुर लौटकर उन्हें धीरज बँधाते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (9.1.1)
एवं निपातिते कर्णे समरे सव्यसाचिना । अल्पावशिष्टाः कुरवः किमकुर्वत वै द्विज ॥
evaṃ nipātite karṇe samare savyasācinā | alpāvaśiṣṭāḥ kuravaḥ kimakurvata vai dvija
हे द्विज! सव्यसाची (अर्जुन) के द्वारा युद्ध में कर्ण के मारे जाने पर शेष बचे थोड़े-से कौरवों ने क्या किया?
श्लोक 2 (9.1.2)
विदीर्यमाणं च बलं दृष्ट्वा राजा सुयोधनः । पाण्डवैः प्राप्तकालं च किं प्रापद्यत कौरवः ॥
vidīryamāṇaṃ ca balaṃ dṛṣṭvā rājā suyodhanaḥ | pāṇḍavaiḥ prāptakālaṃ ca kiṃ prāpadyata kauravaḥ
अपनी सेना को बिखरते देखकर और पाण्डवों से निपटने का समय आया जानकर कौरव राजा सुयोधन ने क्या किया?
श्लोक 3 (9.1.3)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तदाचक्ष्व द्विजोत्तम । न हि तृप्यामि पूर्वेषां शृण्वानश्चरितं महत् ॥
etadicchāmyahaṃ śrotuṃ tadācakṣva dvijottama | na hi tṛpyāmi pūrveṣāṃ śṛṇvānaścaritaṃ mahat
हे द्विजश्रेष्ठ! मैं यह सुनना चाहता हूँ, आप इसे कहिए; क्योंकि अपने पूर्वजों का महान् चरित सुनते हुए मैं तृप्त नहीं होता।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 4 (9.1.4)
ततः कर्णे हते राजन्धार्तराष्ट्रः सुयोधनः । भृशं शोकार्णवे मग्नो निराशः सर्वतोऽभवत् ॥
tataḥ karṇe hate rājandhārtarāṣṭraḥ suyodhanaḥ | bhṛśaṃ śokārṇave magno nirāśaḥ sarvato'bhavat
हे राजन्! तब कर्ण के मारे जाने पर धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन शोक के सागर में डूब गया और सब ओर से निराश हो गया।
श्लोक 5 (9.1.5)
हाकर्ण हाकर्ण इति शोचमानो मुहुर्मुहुः । कृच्छ्रात्स्वशिबिरं प्रायाद्धतशिष्टैर्नृपैः सह ॥
hākarṇa hākarṇa iti śocamāno muhurmuhuḥ | kṛcchrātsvaśibiraṃ prāyāddhataśiṣṭairnṛpaiḥ saha
"हाय कर्ण! हाय कर्ण!" यह कहकर बार-बार विलाप करता हुआ वह बचे हुए राजाओं के साथ बड़ी कठिनाई से अपने शिविर को लौटा।
श्लोक 6 (9.1.6)
स समाश्वास्यमानोऽपि हेतुभिः शास्त्रनिश्चितैः । राजन्विभूतिमिच्छद्भिः सूतपुत्रमनुस्मरन् ॥
sa samāśvāsyamāno'pi hetubhiḥ śāstraniścitaiḥ | rājanvibhūtimicchadbhiḥ sūtaputramanusmaran
हे राजन्! शास्त्र से निश्चित युक्तियों द्वारा उसका हित चाहने वालों से सान्त्वना दिए जाने पर भी वह सूतपुत्र कर्ण का ही स्मरण करता रहा।
श्लोक 7 (9.1.7)
स दैवं बलवन्मत्वा प्रभाते विमले सति । सङ्ग्रामे निश्चयं कृत्वा पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥
sa daivaṃ balavanmatvā prabhāte vimale sati | saṅgrāme niścayaṃ kṛtvā punaryuddhāya niryayau
दैव को बलवान् मानकर उसने युद्ध का निश्चय किया और निर्मल प्रभात होने पर फिर युद्ध के लिए निकल पड़ा।
श्लोक 8 (9.1.8)
शल्यं सेनापतिं कृत्वा विधिवद्राजसत्तमम् । रणाय निर्ययौ राजा हतशिष्टैर्नृपैः सह ॥
śalyaṃ senāpatiṃ kṛtvā vidhivadrājasattamam | raṇāya niryayau rājā hataśiṣṭairnṛpaiḥ saha
राजाओं में श्रेष्ठ शल्य को विधिपूर्वक सेनापति बनाकर राजा दुर्योधन बचे हुए राजाओं के साथ युद्ध के लिए निकला।
श्लोक 9 (9.1.9)
ततः सुतुमुलं युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः । बभूव भरतश्रेष्ठ देवासुररणोपमम् ॥
tataḥ sutumulaṃ yuddhaṃ kurupāṇḍavasenayoḥ | babhūva bharataśreṣṭha devāsuraraṇopamam
हे भरतश्रेष्ठ! तब कौरव और पाण्डव सेनाओं में देवासुर-संग्राम के समान अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया।
श्लोक 10 (9.1.10)
ततः शल्यो महाराज कृत्वा कदनमाहवे । पाण्डुसैन्येऽथ मध्याह्ने धर्मराजेन पातितः ॥
tataḥ śalyo mahārāja kṛtvā kadanamāhave | pāṇḍusainye'tha madhyāhne dharmarājena pātitaḥ
हे महाराज! तब पाण्डव-सेना में युद्ध के बीच भारी संहार करके शल्य दोपहर के समय धर्मराज युधिष्ठिर के हाथों गिरा दिया गया।
श्लोक 11 (9.1.11)
ततो दुर्योधनो राजा हतबन्धू रणाजिरात् । अपसृत्य ह्रदं घोरं विवेश रिपुजाद्भयात् ॥
tato duryodhano rājā hatabandhū raṇājirāt | apasṛtya hradaṃ ghoraṃ viveśa ripujādbhayāt
तब बन्धुओं के मारे जाने पर राजा दुर्योधन रणभूमि से हटकर शत्रुओं के भय से एक भयंकर सरोवर में घुस गया।
श्लोक 12 (9.1.12)
अथापराह्णे तस्याह्नः परिवार्य महारथैः । ह्रदादाहूय युद्धाय भीमसेनेन पातितः ॥
athāparāhṇe tasyāhnaḥ parivārya mahārathaiḥ | hradādāhūya yuddhāya bhīmasenena pātitaḥ
फिर उसी दिन अपराह्न में महारथियों के घेर लेने पर सरोवर से युद्ध के लिए पुकारा गया और भीमसेन के हाथों गिरा दिया गया।
श्लोक 13 (9.1.13)
तस्मिंस्तु निहते वीरे महेष्वासास्त्रयो रणे । कृतवर्मा कृपो द्रौणिर्जघ्नुः पाण्डवसैनिकान् ॥
tasmiṃstu nihate vīre maheṣvāsāstrayo raṇe | kṛtavarmā kṛpo drauṇirjaghnuḥ pāṇḍavasainikān
उस वीर के मारे जाने पर तीन महान् धनुर्धर कृतवर्मा, कृपाचार्य और द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा ने पाण्डवों के सैनिकों को मार डाला।
श्लोक 14 (9.1.14)
ततः पूर्वाह्णसमये शिबिरादेत्य सञ्जयः । प्रविवेश पुरीं दीनो दुःखशोकसमन्वितः ॥
tataḥ pūrvāhṇasamaye śibirādetya sañjayaḥ | praviveśa purīṃ dīno duḥkhaśokasamanvitaḥ
फिर पूर्वाह्न के समय सञ्जय शिविर से आकर दीन और दुःख-शोक से भरा हुआ नगर में पहुँचा।
श्लोक 15 (9.1.15)
स प्रविश्य पुरीं सूतो भुजावुच्छ्रित्य दुःखितः । वेपमानस्ततो राज्ञः प्रविवेश निवेशनम् ॥
sa praviśya purīṃ sūto bhujāvucchritya duḥkhitaḥ | vepamānastato rājñaḥ praviveśa niveśanam
नगर में प्रवेश करके दुःखी सूत सञ्जय भुजाएँ उठाए, काँपता हुआ राजा के भवन में गया।
श्लोक 16 (9.1.16)
धावतश्चाप्यपश्यच्च तत्रत्यान्पुरुषर्षभान् । नष्टचित्तानिवोन्मत्ताञ्शोकेन भृशदुःखितान् ॥
dhāvataścāpyapaśyacca tatratyānpuruṣarṣabhān | naṣṭacittānivonmattāñśokena bhṛśaduḥkhitān
दौड़ते हुए उसने वहाँ के श्रेष्ठ पुरुषों को भी देखा, जो शोक से अत्यन्त दुःखी होकर पागलों की तरह अपनी सुध-बुध खो बैठे थे।
सञ्जय उवाच
श्लोक 17 (9.1.17)
दृष्ट्वैव च नराञ्शीघ्रं व्याजहारातिदुःखितः । अहो बत विपन्नोऽस्मि निधनेन महात्मनः ॥
dṛṣṭvaiva ca narāñśīghraṃ vyājahārātiduḥkhitaḥ | aho bata vipanno'smi nidhanena mahātmanaḥ
उन लोगों को देखते ही अत्यन्त दुःखी सञ्जय ने शीघ्र पुकार कहा, "हाय! उस महात्मा के वध से मैं तो बरबाद हो गया!"
श्लोक 18 (9.1.18)
अहो सुबलवान्कालो गतिश्च परमा तथा । शक्रतुल्यबलाः सर्वे यत्राहन्यन्त पार्थिवाः ॥
aho subalavānkālo gatiśca paramā tathā | śakratulyabalāḥ sarve yatrāhanyanta pārthivāḥ
"हाय! काल कितना बलवान् है और गति कितनी प्रबल कि इन्द्र के समान बलशाली सभी राजा मार डाले गए!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 19 (9.1.19)
तं दृष्ट्वैव पुरे राजञ्जनः सर्वः स्म सञ्जयम् । प्ररुरोद भयोद्विग्नो हा राजन्निति सुस्वरम् ॥
taṃ dṛṣṭvaiva pure rājañjanaḥ sarvaḥ sma sañjayam | praruroda bhayodvigno hā rājanniti susvaram
हे राजन्! सञ्जय को देखते ही नगर के सब लोग भय से व्याकुल होकर "हा राजन्!" कहते हुए ऊँचे स्वर से रोने लगे।
श्लोक 20 (9.1.20)
आकुमारं नरव्याघ्र तत्पुरं वै समन्ततः । आर्तनादं महच्चक्रे श्रुत्वा विनिहतं नृपम् ॥
ākumāraṃ naravyāghra tatpuraṃ vai samantataḥ | ārtanādaṃ mahaccakre śrutvā vinihataṃ nṛpam
हे नरव्याघ्र! राजा के मारे जाने की बात सुनकर बच्चों से लेकर सारे नगर ने चारों ओर बड़ा आर्तनाद किया।
श्लोक 21 (9.1.21)
तथा स विह्वलः सूतः प्रविश्य नृपतिक्षयम् । ददर्श नृपतिश्रेष्ठं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् ॥
tathā sa vihvalaḥ sūtaḥ praviśya nṛpatikṣayam | dadarśa nṛpatiśreṣṭhaṃ prajñācakṣuṣamīśvaram
इस प्रकार अत्यन्त विह्वल हुए सूत ने राजभवन में प्रवेश करके राजाओं में श्रेष्ठ, प्रज्ञा के नेत्र से देखने वाले स्वामी धृतराष्ट्र को देखा।
श्लोक 22 (9.1.22)
दृष्ट्वा चासीनमनघं समन्तात्परिवारितम् । स्नुषाभिर्भरतश्रेष्ठ गान्धार्या विदुरेण च । तथाऽन्यैश्च सुहृद्भिश्च ज्ञातिभिश्च हितैषिभिः ॥
dṛṣṭvā cāsīnamanaghaṃ samantātparivāritam | snuṣābhirbharataśreṣṭha gāndhāryā vidureṇa ca | tathā'nyaiśca suhṛdbhiśca jñātibhiśca hitaiṣibhiḥ
हे भरतश्रेष्ठ! उसने उस निष्पाप राजा को बैठा देखा, जिसे चारों ओर से बहुओं, गान्धारी, विदुर तथा अन्य मित्रों, बन्धुओं और हितैषियों ने घेर रखा था।
श्लोक 23 (9.1.23)
तमेव चार्थं ध्यायन्तं कर्णस्य निधनं प्रति । रुदन्नेवाब्रवीद्वाक्यं राजानं जनमेजय ॥
tameva cārthaṃ dhyāyantaṃ karṇasya nidhanaṃ prati | rudannevābravīdvākyaṃ rājānaṃ janamejaya
हे जनमेजय! कर्ण की मृत्यु की उसी बात का चिन्तन करते हुए राजा से सञ्जय ने रोते हुए कहा।
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (9.1.24)
नातिहृष्टमनाः सूतो बाष्पसन्दिग्धया गिरा । सञ्जयोऽहं नरव्याघ्र नमस्ते भरतर्षभ ॥
nātihṛṣṭamanāḥ sūto bāṣpasandigdhayā girā | sañjayo'haṃ naravyāghra namaste bharatarṣabha
आँसुओं से रुँधी वाणी में, जरा भी प्रसन्न मन न होकर सूत ने कहा, "हे नरव्याघ्र! मैं सञ्जय हूँ; हे भरतश्रेष्ठ! आपको प्रणाम है।"
श्लोक 25 (9.1.25)
मद्राधिपो हतः शल्यः शकुनिः सौबलस्तथा । उलूकः पुरुषव्याघ्र कैतव्यो दृढविक्रमः ॥
madrādhipo hataḥ śalyaḥ śakuniḥ saubalastathā | ulūkaḥ puruṣavyāghra kaitavyo dṛḍhavikramaḥ
"मद्रराज शल्य मारे गए, सुबल-पुत्र शकुनि मारे गए, और हे पुरुषव्याघ्र! दृढ़ पराक्रमी कितव-पुत्र उलूक भी मारा गया।"
श्लोक 26 (9.1.26)
संशप्तका हताः सर्वे काम्भोजाश्च शकैः सह । म्लेच्छाश्च पार्वतीयाश्च यवनाश्च निपातिताः ॥
saṃśaptakā hatāḥ sarve kāmbhojāśca śakaiḥ saha | mlecchāśca pārvatīyāśca yavanāśca nipātitāḥ
"संशप्तक सब मारे गए, शकों के साथ कम्बोज भी; म्लेच्छ, पर्वतीय लोग और यवन भी मार गिराए गए।"
श्लोक 27 (9.1.27)
प्राच्या हता महाराज दाक्षिणात्याश्च सर्वशः । उदीच्याश्च हताः सर्वे प्रतीच्याश्च नरोत्तमाः । राजानो राजपुत्राश्च सर्वे विनिहता नृप ॥
prācyā hatā mahārāja dākṣiṇātyāśca sarvaśaḥ | udīcyāśca hatāḥ sarve pratīcyāśca narottamāḥ | rājāno rājaputrāśca sarve vinihatā nṛpa
"हे महाराज! पूर्व के लोग मारे गए, दक्षिण के लोग सर्वत्र मारे गए; उत्तर के सब लोग मारे गए और पश्चिम के श्रेष्ठ जन भी; हे राजन्! सभी राजा और राजकुमार मारे गए।"
श्लोक 28 (9.1.28)
कर्णपुत्रो हतः शूरः सत्यसेनो महाबलः ॥
karṇaputro hataḥ śūraḥ satyaseno mahābalaḥ
"कर्ण का पुत्र वीर और महाबली सत्यसेन मारा गया।"
श्लोक 29 (9.1.29)
दुर्योधनो हतो राजा यथोक्तं पाण्डवेन ह । भग्नसक्थो महाराज शेते पांसुषु रूषितः ॥
duryodhano hato rājā yathoktaṃ pāṇḍavena ha | bhagnasaktho mahārāja śete pāṃsuṣu rūṣitaḥ
"हे राजन्! पाण्डव (भीम) के कहे अनुसार राजा दुर्योधन मारा गया; हे महाराज! जाँघें टूट जाने से वह धूल में लथपथ पड़ा है।"
श्लोक 30 (9.1.30)
धृष्टद्युम्नो हतो राजञ्शिखण्डी चापराजितः । उत्तमौजा युधामन्युस्तथा सर्वे प्रभद्रकाः ॥
dhṛṣṭadyumno hato rājañśikhaṇḍī cāparājitaḥ | uttamaujā yudhāmanyustathā sarve prabhadrakāḥ
"हे राजन्! धृष्टद्युम्न मारा गया और अपराजित शिखण्डी भी; उत्तमौजा, युधामन्यु तथा सब प्रभद्रक भी मारे गए।"
श्लोक 31 (9.1.31)
पाञ्चालाश्च नरव्याघ्र चेदयश्च निषूदिताः । तव पुत्रा हताः सर्वे द्रौपदेयाश्च भारत ॥
pāñcālāśca naravyāghra cedayaśca niṣūditāḥ | tava putrā hatāḥ sarve draupadeyāśca bhārata
"हे नरव्याघ्र! पाञ्चाल और चेदि मारे गए; आपके सब पुत्र मारे गए और हे भारत! द्रौपदी के पुत्र भी।"
श्लोक 32 (9.1.32)
नरा विनिहताः सर्वे गजाश्च विनिपातिताः । रथिनश्च नरव्याघ्र हयाश्च निहता युधि ॥
narā vinihatāḥ sarve gajāśca vinipātitāḥ | rathinaśca naravyāghra hayāśca nihatā yudhi
"पैदल सैनिक सब मारे गए, हाथी गिरा दिए गए; हे नरव्याघ्र! रथी और घोड़े भी युद्ध में मारे गए।"
श्लोक 33 (9.1.33)
किञ्चिच्छेषं शिबिरं तावकानां कृतं प्रभो । पाण्डवानां च शूराणां समासाद्य परस्परम् ॥
kiñciccheṣaṃ śibiraṃ tāvakānāṃ kṛtaṃ prabho | pāṇḍavānāṃ ca śūrāṇāṃ samāsādya parasparam
"हे प्रभो! आपके और शूर पाण्डवों के आपस में भिड़ जाने के बाद आपके शिविर में थोड़ा-सा ही शेष रह गया है।"
श्लोक 34 (9.1.34)
प्रायः स्त्रीशेषमभवज्जगत्कालेन मोहितम् । सप्त पाण्डवतः शिष्टा धार्तराष्ट्रास्त्रयोरथाः ॥
prāyaḥ strīśeṣamabhavajjagatkālena mohitam | sapta pāṇḍavataḥ śiṣṭā dhārtarāṣṭrāstrayorathāḥ
"काल से मोहित यह जगत् प्रायः स्त्रियों से ही बचा रह गया है; पाण्डवों की ओर से सात बचे हैं और धृतराष्ट्र के पक्ष के तीन रथी।"
श्लोक 35 (9.1.35)
ते चैव भ्रातरः पञ्च वासुदेवोऽथ सात्यकिः । कृपश्च कृतवर्मा च द्रौणिश्च जयतां वरः ॥
te caiva bhrātaraḥ pañca vāsudevo'tha sātyakiḥ | kṛpaśca kṛtavarmā ca drauṇiśca jayatāṃ varaḥ
"वे ही पाँचों भाई, वासुदेव और सात्यकि; कृपाचार्य, कृतवर्मा और विजयी वीरों में श्रेष्ठ द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा।"
श्लोक 36 (9.1.36)
एते शेषा महाराज रथिनो नृपसत्तम । अक्षौहिणीनामष्टानां दशानां च न संशयः ॥
ete śeṣā mahārāja rathino nṛpasattama | akṣauhiṇīnāmaṣṭānāṃ daśānāṃ ca na saṃśayaḥ
"हे महाराज! हे राजाओं में श्रेष्ठ! अठारह (आठ और दस) अक्षौहिणियों में से बचे हुए रथी ये ही हैं, इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 37 (9.1.37)
एते शेषा महाराज सर्वेऽन्ये निधनं गताः । कालेन निहतं सर्वं जगद्वै भरतर्षभ । दुर्योधनं वै पुरतः कृत्वा सर्वे नरा हताः ॥
ete śeṣā mahārāja sarve'nye nidhanaṃ gatāḥ | kālena nihataṃ sarvaṃ jagadvai bharatarṣabha | duryodhanaṃ vai purataḥ kṛtvā sarve narā hatāḥ
"हे महाराज! और सब मृत्यु को प्राप्त हो गए। हे भरतश्रेष्ठ! काल ने सारे जगत् को मार डाला; दुर्योधन को आगे करके सभी मनुष्य मारे गए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 38 (9.1.38)
एतच्छ्रुत्वा वचः क्रूरं धृतराष्ट्रो जनेश्वरः । निपपात स राजेन्द्रो गतसत्वो महीतले ॥
etacchrutvā vacaḥ krūraṃ dhṛtarāṣṭro janeśvaraḥ | nipapāta sa rājendro gatasatvo mahītale
यह कठोर वचन सुनकर जनों के स्वामी राजा धृतराष्ट्र निर्बल होकर धरती पर गिर पड़े।
श्लोक 39 (9.1.39)
तस्मिन्निपतिते वीरे विदुरोऽपि महायशाः । निपपात महाराज शोकव्यसनकर्शितः ॥
tasminnipatite vīre viduro'pi mahāyaśāḥ | nipapāta mahārāja śokavyasanakarśitaḥ
हे महाराज! उन वीर के गिर पड़ने पर यशस्वी विदुर भी शोक और विपत्ति से कृश होकर गिर पड़े।
श्लोक 40 (9.1.40)
गान्धारी च महाभागा सर्वाश्च कुरुयोषितः । पतिताः सहसा भूमौ श्रुत्वा घोरतरं वचः ॥
gāndhārī ca mahābhāgā sarvāśca kuruyoṣitaḥ | patitāḥ sahasā bhūmau śrutvā ghorataraṃ vacaḥ
महाभागा गान्धारी और सब कुरु-स्त्रियाँ वह अत्यन्त भयंकर बात सुनकर सहसा भूमि पर गिर पड़ीं।
श्लोक 41 (9.1.41)
निःसंज्ञं पतितं भूमौ तदाऽऽसीद्राजमण्डलम् । विलापमुक्तोपहतं चित्रं न्यस्तं पटे यथा ॥
niḥsaṃjñaṃ patitaṃ bhūmau tadā''sīdrājamaṇḍalam | vilāpamuktopahataṃ citraṃ nyastaṃ paṭe yathā
वह राजमण्डल अचेत होकर भूमि पर पड़ा था, शोक से आहत और विलाप में डूबा हुआ, मानो कपड़े पर उकेरा हुआ चित्र हो।
श्लोक 42 (9.1.42)
कृच्छ्रेण तु ततो राजा धृतराष्ट्रो महीपतिः । शनैरलभत प्राणान्पुत्रव्यसनकर्शितः ॥
kṛcchreṇa tu tato rājā dhṛtarāṣṭro mahīpatiḥ | śanairalabhata prāṇānputravyasanakarśitaḥ
तब पुत्रों के शोक से कृश राजा धृतराष्ट्र ने बड़ी कठिनाई से धीरे-धीरे चेतना पाई।
श्लोक 43 (9.1.43)
लब्ध्वा तु स नृपः प्राणान्वेपमानः सुदुःखितः । निरीक्ष्य च दिशः सर्वाः क्षत्तारं वाक्यमब्रवीत् ॥
labdhvā tu sa nṛpaḥ prāṇānvepamānaḥ suduḥkhitaḥ | nirīkṣya ca diśaḥ sarvāḥ kṣattāraṃ vākyamabravīt
चेतना पाकर राजा काँपते और अत्यन्त दुःखी होते हुए चारों दिशाओं की ओर देखकर क्षत्ता विदुर से बोले।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 44 (9.1.44)
विद्धि क्षत्तर्महाप्राज्ञ त्वं गतिर्भरतर्षभ । ममानाथस्य सुभृशं पुत्रैर्हीनस्य सर्वशः । एवमुक्त्वा ततो भूयो विसंज्ञो निपपात ह ॥
viddhi kṣattarmahāprājña tvaṃ gatirbharatarṣabha | mamānāthasya subhṛśaṃ putrairhīnasya sarvaśaḥ | evamuktvā tato bhūyo visaṃjño nipapāta ha
"हे महाप्राज्ञ क्षत्ता! हे भरतश्रेष्ठ! जान लो, मुझ अनाथ के, जो सब प्रकार से पुत्रहीन हो गया है, तुम्हीं सहारा हो।" यह कहकर वे फिर बेहोश होकर गिर पड़े।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (9.1.45)
तं तथा पतितं दृष्ट्वा बान्धवा येऽस्य केचन । शीतैस्ते सिषिचुस्तोयैर्विव्यजुर्व्यजनैरपि ॥
taṃ tathā patitaṃ dṛṣṭvā bāndhavā ye'sya kecana | śītaiste siṣicustoyairvivyajurvyajanairapi
उन्हें इस प्रकार गिरा देखकर उनके जो भी बन्धु थे, उन्होंने ठण्डे जल से उन्हें सींचा और पंखों से हवा की।
श्लोक 46 (9.1.46)
स तु दीर्घेण कालेन प्रत्याश्वस्तो नराधिपः । तूष्णीमासीन्महीपालः पुत्रव्यसनकर्शितः ॥
sa tu dīrgheṇa kālena pratyāśvasto narādhipaḥ | tūṣṇīmāsīnmahīpālaḥ putravyasanakarśitaḥ
बहुत देर बाद वे नरेश होश में आए और पुत्रों के शोक से कृश होकर राजा चुपचाप बैठे रहे।
श्लोक 47 (9.1.47)
निःश्वसञ्जिह्मग इव कुम्भक्षिप्तोऽभवन्नृपः ॥
niḥśvasañjihmaga iva kumbhakṣipto'bhavannṛpaḥ
राजा घड़े में बन्द किए हुए साँप की तरह लम्बी साँसें लेने लगे।
श्लोक 48 (9.1.48)
सञ्जयोऽप्यरुदत्तत्र दृष्ट्वा राजानमातुरम् । तथा सर्वाः स्त्रियश्चैव गान्धारी च यशस्विनी ॥
sañjayo'pyarudattatra dṛṣṭvā rājānamāturam | tathā sarvāḥ striyaścaiva gāndhārī ca yaśasvinī
राजा को इस प्रकार व्याकुल देखकर वहाँ सञ्जय भी रोने लगा, और सब स्त्रियाँ तथा यशस्विनी गान्धारी भी।
श्लोक 49 (9.1.49)
ततो दीर्घेण कालेन विदुरं वाक्यमब्रवीत् । धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठ मुह्यमानो मुहुर्मुहुः ॥
tato dīrgheṇa kālena viduraṃ vākyamabravīt | dhṛtarāṣṭro naraśreṣṭha muhyamāno muhurmuhuḥ
फिर बहुत देर बाद, बार-बार मूर्च्छित होते हुए नरश्रेष्ठ धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 50 (9.1.50)
गच्छन्तु योषितः सर्वा गान्धारी च यशस्विनी । तथेमे सुहृदः सर्वे मुह्यते मे मनो भृशम् ॥
gacchantu yoṣitaḥ sarvā gāndhārī ca yaśasvinī | tatheme suhṛdaḥ sarve muhyate me mano bhṛśam
"सब स्त्रियाँ चली जाएँ, यशस्विनी गान्धारी भी, और ये सब मित्र भी; मेरा मन बहुत भटक रहा है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 51 (9.1.51)
एवमुक्तस्ततः क्षत्ता ताः स्त्रियो भरतर्षभ । विसर्जयामास शनैर्मुह्यमानः पुनःपुनः ॥
evamuktastataḥ kṣattā tāḥ striyo bharatarṣabha | visarjayāmāsa śanairmuhyamānaḥ punaḥpunaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार कहे जाने पर क्षत्ता विदुर ने, स्वयं बार-बार मोहग्रस्त होते हुए, उन स्त्रियों को धीरे-धीरे विदा किया।
श्लोक 52 (9.1.52)
निश्चक्रमुस्ततः सर्वाः स्त्रियो भरतसत्तम । सुहृदश्च तथा सर्वे दृष्ट्वा राजानमातुरम् ॥
niścakramustataḥ sarvāḥ striyo bharatasattama | suhṛdaśca tathā sarve dṛṣṭvā rājānamāturam
हे भरतश्रेष्ठ! तब राजा को ऐसी व्याकुल दशा में देखकर सब स्त्रियाँ और सब मित्र बाहर चले गए।
श्लोक 53 (9.1.53)
ततो नरपतिस्तत्र लब्ध्वा संज्ञां परन्तपः । गतिर्मे को भवेदद्य इति चिन्तासमाकुलः । अपृच्छत्सञ्जयं तत्र रोदमानं भृशातुरम् ॥
tato narapatistatra labdhvā saṃjñāṃ parantapaḥ | gatirme ko bhavedadya iti cintāsamākulaḥ | apṛcchatsañjayaṃ tatra rodamānaṃ bhṛśāturam
तब शत्रुओं को तपाने वाले राजा ने होश पाकर "अब मेरा सहारा कौन होगा?" ऐसी चिन्ता से व्याकुल होकर वहाँ रोते हुए अत्यन्त दुःखी सञ्जय से पूछा।
श्लोक 54 (9.1.54)
प्राञ्जलिं सञ्जयं दृष्ट्वा रोदमानं मुहुर्मुहुः । ज्ञातीन्स्त्रियोऽथ निर्याप्य प्रविश्य विदुरः पुनः ॥
prāñjaliṃ sañjayaṃ dṛṣṭvā rodamānaṃ muhurmuhuḥ | jñātīnstriyo'tha niryāpya praviśya viduraḥ punaḥ
हाथ जोड़े बार-बार रोते हुए सञ्जय को देखकर, और बन्धुजनों तथा स्त्रियों को बाहर भेजकर, विदुर फिर भीतर आए,
श्लोक 55 (9.1.55)
राजानं शोचमानस्तु तं शोचन्तं मुहुर्मुहुः । समाश्वासयत क्षत्ता वचसा मधुरेण च ॥
rājānaṃ śocamānastu taṃ śocantaṃ muhurmuhuḥ | samāśvāsayata kṣattā vacasā madhureṇa ca
और स्वयं शोक करते हुए भी क्षत्ता ने बार-बार शोक करते हुए राजा को मधुर वचनों से धीरज बँधाया।