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शल्य पर्व · अध्याय 2

धृतराष्ट्र का विलाप

स्त्रियों के चले जाने पर धृतराष्ट्र सञ्जय के सामने विलाप करते हैं: पुत्रों की मृत्यु सुनकर भी उनका हृदय फटा क्यों नहीं, वे दुर्योधन के उस विश्वास को याद करते हैं जो उसे अपने पक्ष के राजाओं और कर्ण पर था, और एक-एक गिरे हुए योद्धा का नाम गिनाकर पूछते हैं कि यह भाग्य के सिवा और क्या है। वे कहते हैं कि भीम के कठोर वचन सुनने से अच्छा वन चले जाना है। फिर वे सञ्जय से पूछते हैं कि कर्ण के गिरने पर सेनापति कौन बना, और शल्य तथा दुर्योधन के वध से लेकर बचे हुए वीरों की गति तक पूरा वृत्तान्त सुनाने को कहते हैं।

अध्याय 1अध्याय-सूचीअध्याय 3

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (9.2.1)

विसृष्टास्वथ नारीषु धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । विललाप महाराज दुःखाद्दुःखतरं गतः ॥

visṛṣṭāsvatha nārīṣu dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | vilalāpa mahārāja duḥkhādduḥkhataraṃ gataḥ

हे महाराज! स्त्रियों के विदा कर दिए जाने पर अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र दुःख से और भी गहरे दुःख में डूबकर विलाप करने लगे।

श्लोक 2 (9.2.2)

सधूममिव निःश्वस्य करौ धुन्वन्पुनःपुनः । बहु सञ्चिन्तयित्वा तु सञ्जयं वाक्यमब्रवीत् ॥

sadhūmamiva niḥśvasya karau dhunvanpunaḥpunaḥ | bahu sañcintayitvā tu sañjayaṃ vākyamabravīt

धुएँ के समान साँस छोड़ते हुए, बार-बार हाथ मलते हुए और बहुत देर तक सोचकर उन्होंने सञ्जय से कहा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 3 (9.2.3)

अहो बत महद्दुःखं यदहं पाण्डवान्रणे । क्षेमिणश्चाव्ययांश्चैव त्वत्तः सूत शृणोमि वै ॥

aho bata mahadduḥkhaṃ yadahaṃ pāṇḍavānraṇe | kṣemiṇaścāvyayāṃścaiva tvattaḥ sūta śṛṇomi vai

हाय! यह कितना बड़ा दुःख है कि हे सूत! मैं तुम्हारे मुँह से सुन रहा हूँ कि पाण्डव युद्ध में सकुशल और अक्षत रहे।

श्लोक 4 (9.2.4)

वज्रसारमयं नूनं हृदयं सुदृढं मम । यच्छ्रुत्वा निहतान्पुत्रान्दीर्यते न सहस्रधा ॥

vajrasāramayaṃ nūnaṃ hṛdayaṃ sudṛḍhaṃ mama | yacchrutvā nihatānputrāndīryate na sahasradhā

निश्चय ही मेरा हृदय वज्र के सार से बना, बहुत कठोर है; तभी पुत्रों के मारे जाने की बात सुनकर भी वह हज़ार टुकड़े नहीं हो जाता।

श्लोक 5 (9.2.5)

चिन्तयित्वा वचस्तेषां बालक्रीडां च सञ्जय । अद्य चैव हताञ्श्रुत्वा दीर्यते मे भृशं मनः ॥

cintayitvā vacasteṣāṃ bālakrīḍāṃ ca sañjaya | adya caiva hatāñśrutvā dīryate me bhṛśaṃ manaḥ

हे सञ्जय! उनके वचनों और उनकी बाल-क्रीड़ाओं को याद करके और आज उनके मारे जाने की बात सुनकर मेरा मन बहुत विदीर्ण हो रहा है।

श्लोक 6 (9.2.6)

अन्धत्वाद्यदि पुत्राणां न मे रूपिनिदर्शनम् । पुत्रस्नेहकृता प्रीतिर्नित्यमेतेषु धारिता ॥

andhatvādyadi putrāṇāṃ na me rūpinidarśanam | putrasnehakṛtā prītirnityameteṣu dhāritā

अन्धा होने के कारण यद्यपि मैंने अपने पुत्रों का रूप कभी नहीं देखा, फिर भी पुत्र-स्नेह से उपजी प्रीति मैंने उनके प्रति सदा बनाए रखी।

श्लोक 7 (9.2.7)

बालभावमतिक्रम्य यौवनस्थांश्च तानहम् । श्रियं प्राप्तांश्च ताञ्श्रुत्वा हृष्ट आसं तदाऽनघ ॥

bālabhāvamatikramya yauvanasthāṃśca tānaham | śriyaṃ prāptāṃśca tāñśrutvā hṛṣṭa āsaṃ tadā'nagha

हे निष्पाप! यह सुनकर कि वे बाल्यावस्था पार कर यौवन में पहुँचे और ऐश्वर्य को प्राप्त हुए, मैं तब हर्षित हुआ था।

श्लोक 8 (9.2.8)

तानद्य निहताञ्श्रुत्वा हतैश्वर्यान्हतौजसः । न लभेयं क्वचिच्छान्तिं पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥

tānadya nihatāñśrutvā hataiśvaryānhataujasaḥ | na labheyaṃ kvacicchāntiṃ putrādhibhirabhiplutaḥ

आज उन्हें ऐश्वर्य और तेज से रहित होकर मारा गया सुनकर, पुत्रों की मानसिक पीड़ा से घिरा हुआ मैं कहीं भी शान्ति नहीं पाता।

श्लोक 9 (9.2.9)

एह्येहि वत्स राजेन्द्र ममानाथस्य पुत्रक । त्वया हीनो महाबाहो कां नु यास्याम्यहं गतिम् ॥

ehyehi vatsa rājendra mamānāthasya putraka | tvayā hīno mahābāho kāṃ nu yāsyāmyahaṃ gatim

आओ, आओ, मेरे पुत्र, राजेन्द्र! अब मुझ अनाथ के पास आओ। हे महाबाहो! तुम्हारे बिना मैं किस शरण में जाऊँगा?

श्लोक 10 (9.2.10)

कथं त्वं पृथिवीपालांस्त्यक्त्वा तात समागतान् । शेषे विनिहतो भूमौ प्राकृतः कुनृपो यथा ॥

kathaṃ tvaṃ pṛthivīpālāṃstyaktvā tāta samāgatān | śeṣe vinihato bhūmau prākṛtaḥ kunṛpo yathā

हे तात! एकत्र हुए राजाओं को छोड़कर तुम साधारण, तुच्छ राजा की तरह मारे जाकर भूमि पर कैसे पड़े हो?

श्लोक 11 (9.2.11)

गतिर्भूत्वा महाराज ज्ञातीनां सुहृदां तथा । अन्धं वृद्धं च मां वीर विहाय क्व नु यास्यसि ॥

gatirbhūtvā mahārāja jñātīnāṃ suhṛdāṃ tathā | andhaṃ vṛddhaṃ ca māṃ vīra vihāya kva nu yāsyasi

हे महाराज! तुम बन्धुओं और मित्रों के सहारे थे; हे वीर! मुझ अन्धे और बूढ़े को छोड़कर तुम कहाँ जाओगे?

श्लोक 12 (9.2.12)

सा कृपा सा च ते प्रीतिः सा च राजसु मानिता । कथं त्वं निहतः पार्थैः संयुगेष्वपराजितः ॥

sā kṛpā sā ca te prītiḥ sā ca rājasu mānitā | kathaṃ tvaṃ nihataḥ pārthaiḥ saṃyugeṣvaparājitaḥ

वह तुम्हारी कृपा कहाँ गई, वह प्रीति और राजाओं के बीच वह सम्मान कहाँ गया? युद्धों में कभी न हारने वाले तुम पार्थों के हाथों कैसे मारे गए?

श्लोक 13 (9.2.13)

को नु मामुत्थितः काले ताततातेति वक्ष्यति । महाराजेति सततं लोकनाथेति चासकृत् ॥

ko nu māmutthitaḥ kāle tātatāteti vakṣyati | mahārājeti satataṃ lokanātheti cāsakṛt

अब ठीक समय पर उठने पर कौन मुझसे "तात, तात", "महाराज", "लोकनाथ" कहकर बार-बार पुकारेगा?

श्लोक 14 (9.2.14)

परिष्वज्य च मां कण्ठे स्नेहेन क्लिन्नलोचनः । अनुशाधीति कौरव्य तत्साधु वद मे वचः ॥

pariṣvajya ca māṃ kaṇṭhe snehena klinnalocanaḥ | anuśādhīti kauravya tatsādhu vada me vacaḥ

स्नेह से भीगी आँखों वाला कौन मुझे गले लगाकर कहेगा, "हे कौरव्य! मुझे उपदेश दीजिए, मुझसे वे शुभ वचन कहिए"?

श्लोक 15 (9.2.15)

ननु नामाहमश्रौषं वचनं तव पुत्रक । भूयसी मम पृथ्वीयं तात पार्थस्य नो तथा ॥

nanu nāmāhamaśrauṣaṃ vacanaṃ tava putraka | bhūyasī mama pṛthvīyaṃ tāta pārthasya no tathā

हे पुत्र! क्या मैंने तुम्हें यह कहते नहीं सुना था कि "तात! यह पृथ्वी अधिकतर मेरी है, पार्थ की वैसी नहीं है"?

श्लोक 16 (9.2.16)

भगदत्तः कृपः शल्य आवन्त्योऽथ जयद्रथः । भूरिश्रवाः सोमदत्तो महाराजश्च बाह्लिकः ॥

bhagadattaḥ kṛpaḥ śalya āvantyo'tha jayadrathaḥ | bhūriśravāḥ somadatto mahārājaśca bāhlikaḥ

भगदत्त, कृपाचार्य, शल्य, अवन्ती का राजा और जयद्रथ; भूरिश्रवा, सोमदत्त और महाराज बाह्लिक;

श्लोक 17 (9.2.17)

अश्वत्थामा च भोजश्च मागधश्च महाबलः । बृहद्बलश्च क्राथश्च शकुनिश्चापि सौबलः ॥

aśvatthāmā ca bhojaśca māgadhaśca mahābalaḥ | bṛhadbalaśca krāthaśca śakuniścāpi saubalaḥ

अश्वत्थामा, भोज और महाबली मागध; बृहद्बल, क्राथ और सुबल-पुत्र शकुनि;

श्लोक 18 (9.2.18)

म्लेच्छाश्च शतसाहस्राः शकाश्च यवनैः सह । सुदक्षिणश्च काम्भोजस्त्रिगर्ताधिपतिस्तथा ॥

mlecchāśca śatasāhasrāḥ śakāśca yavanaiḥ saha | sudakṣiṇaśca kāmbhojastrigartādhipatistathā

लाखों म्लेच्छ, यवनों के साथ शक; काम्बोज सुदक्षिण और त्रिगर्तों का स्वामी;

श्लोक 19 (9.2.19)

भीष्मः पितामहश्चैव भारद्वाजोऽथ गौतमः । श्रुतायुश्चाश्रुतायुश्च शतायुश्चापि वीर्यवान् ॥

bhīṣmaḥ pitāmahaścaiva bhāradvājo'tha gautamaḥ | śrutāyuścāśrutāyuśca śatāyuścāpi vīryavān

पितामह भीष्म, भारद्वाज (द्रोण) और गौतम (कृप); श्रुतायु, अच्युतायु और पराक्रमी शतायु;

श्लोक 20 (9.2.20)

जलसन्धोऽथार्ष्यशृङ्गी राक्षसश्चाप्यलायुधः । अलम्बुसो वीरबाहुः सुबाहुश्च महारथः ॥

jalasandho'thārṣyaśṛṅgī rākṣasaścāpyalāyudhaḥ | alambuso vīrabāhuḥ subāhuśca mahārathaḥ

जलसन्ध, आर्ष्यशृङ्गी और राक्षस अलायुध; अलम्बुस, वीरबाहु और महारथी सुबाहु।

श्लोक 21 (9.2.21)

एते चान्ये च बहवो राजानो राजसत्तम । मदर्थं प्रहरिष्यन्ति प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ॥

ete cānye ca bahavo rājāno rājasattama | madarthaṃ prahariṣyanti prāṇāṃstyaktvā dhanāni ca

हे राजश्रेष्ठ! ये और अन्य बहुत-से राजा मेरे लिए प्राण और धन त्यागकर प्रहार करेंगे।

श्लोक 22 (9.2.22)

तेषां मध्ये स्थितो युद्धे भ्रातृभिः परिवारितः । योधयिष्याम्यहं पार्थान्पाञ्चालांश्चैव सर्वशः ॥

teṣāṃ madhye sthito yuddhe bhrātṛbhiḥ parivāritaḥ | yodhayiṣyāmyahaṃ pārthānpāñcālāṃścaiva sarvaśaḥ

उनके बीच युद्ध में अपने भाइयों से घिरा हुआ खड़ा होकर मैं पार्थों और सब पाञ्चालों से लड़ूँगा,

श्लोक 23 (9.2.23)

चेदींश्च नृपशार्दूल द्रौपदेयांश्च संयुगे । सात्यकिं कुन्तिभोजं च राक्षसं च घटोत्कचम् ॥

cedīṃśca nṛpaśārdūla draupadeyāṃśca saṃyuge | sātyakiṃ kuntibhojaṃ ca rākṣasaṃ ca ghaṭotkacam

और हे नृपशार्दूल! चेदियों से, संग्राम में द्रौपदी के पुत्रों से, सात्यकि, कुन्तिभोज और राक्षस घटोत्कच से भी।

श्लोक 24 (9.2.24)

एकोऽप्येषां महाराज समर्थः सन्निवारणे । समरे पाण्डवेयानां सङ्क्रुद्धो ह्यभिधावताम् ॥

eko'pyeṣāṃ mahārāja samarthaḥ sannivāraṇe | samare pāṇḍaveyānāṃ saṅkruddho hyabhidhāvatām

हे महाराज! इनमें से अकेला एक भी क्रुद्ध होकर युद्ध में टूट पड़ने वाले पाण्डवों को रोक सकने में समर्थ है।

श्लोक 25 (9.2.25)

किं पुनः सहिता वीराः कृतवैराश्च पाण्डवैः । अथवा सर्व एवैते पाण्डवस्यानुयायिभिः ॥

kiṃ punaḥ sahitā vīrāḥ kṛtavairāśca pāṇḍavaiḥ | athavā sarva evaite pāṇḍavasyānuyāyibhiḥ

फिर सब वीर मिलकर खड़े हों, जिन्होंने पाण्डवों से वैर बाँध रखा है, तब तो कहना ही क्या! अथवा ये सभी पाण्डव के अनुयायियों के साथ

श्लोक 26 (9.2.26)

योत्स्यन्ते सह राजेन्द्र हनिष्यन्ति च तान्मृधे । कर्ण एको मया सार्धं निहनिष्यति पाण्डवान् ॥

yotsyante saha rājendra haniṣyanti ca tānmṛdhe | karṇa eko mayā sārdhaṃ nihaniṣyati pāṇḍavān

हे राजेन्द्र! एक साथ युद्ध करेंगे और उन्हें युद्ध में मार डालेंगे। कर्ण अकेला ही मेरे साथ पाण्डवों को मार डालेगा।

श्लोक 27 (9.2.27)

ते वै नृपतयो वीराः स्थास्यन्ति मम शासने ॥

te vai nṛpatayo vīrāḥ sthāsyanti mama śāsane

तब वे वीर राजा मेरे शासन में ही रहेंगे।

श्लोक 28 (9.2.28)

यश्च तेषां प्रणेता वै वासुदेवो महाबलः । न स सन्नह्यते राजन्निति मामब्रवीद्वचः ॥

yaśca teṣāṃ praṇetā vai vāsudevo mahābalaḥ | na sa sannahyate rājanniti māmabravīdvacaḥ

और उनका जो नेता है, महाबली वासुदेव, "वह हे राजन्! कमर नहीं कसता (युद्ध के लिए सन्नद्ध नहीं होता)"—ऐसा उसने मुझसे कहा था।

श्लोक 29 (9.2.29)

एवं च वदतः सूत बहुशो मम सन्निधौ । युक्तितो ह्यनुपश्यामि निहतान्पाण्डवान्रणे ॥

evaṃ ca vadataḥ sūta bahuśo mama sannidhau | yuktito hyanupaśyāmi nihatānpāṇḍavānraṇe

हे सूत! मेरे सामने उसके बार-बार ऐसा कहते रहने पर मैंने भी युक्ति से यही देखा कि पाण्डव युद्ध में मारे गए हैं।

श्लोक 30 (9.2.30)

तेषां मध्ये स्थिता यत्र हन्यन्ते मम पुत्रकाः । व्यायच्छमानाः समरे किमन्यद्भागधेयतः ॥

teṣāṃ madhye sthitā yatra hanyante mama putrakāḥ | vyāyacchamānāḥ samare kimanyadbhāgadheyataḥ

फिर भी जहाँ उनके बीच खड़े मेरे पुत्र युद्ध में जूझते हुए मारे जा रहे हैं, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 31 (9.2.31)

भीष्मश्च निहतो यत्र लोकनाथः प्रतापवान् । शिखण्डिनं समासाद्य मृगेन्द्र इव जम्बुकम् ॥

bhīṣmaśca nihato yatra lokanāthaḥ pratāpavān | śikhaṇḍinaṃ samāsādya mṛgendra iva jambukam

जहाँ लोकनाथ प्रतापी भीष्म शिखण्डी के सामने जाकर, सिंह के सियार के सामने जाने की तरह, मारे गए,

श्लोक 32 (9.2.32)

द्रोणश्च ब्राह्मणो यत्र सर्वशस्त्रास्त्रपारगः । निहतः पाण्डवैः सङ्ख्ये किमन्यद्भागधेयतः ॥

droṇaśca brāhmaṇo yatra sarvaśastrāstrapāragaḥ | nihataḥ pāṇḍavaiḥ saṅkhye kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ सब शस्त्रों और अस्त्रों के पारंगत ब्राह्मण द्रोण पाण्डवों के हाथों युद्ध में मारे गए, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 33 (9.2.33)

कर्णश्च निहतः सङ्ख्ये दिव्यास्त्रज्ञो महाबलः । भूरिश्रवा हतो यत्र सोमदत्तश्च संयुगे । बाह्लिकश्च महाराज किमन्यद्भागधेयतः ॥

karṇaśca nihataḥ saṅkhye divyāstrajño mahābalaḥ | bhūriśravā hato yatra somadattaśca saṃyuge | bāhlikaśca mahārāja kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता महाबली कर्ण युद्ध में मारे गए; जहाँ भूरिश्रवा और संग्राम में सोमदत्त मारे गए, और हे महाराज! बाह्लिक भी, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 34 (9.2.34)

भगदत्तो हतो यत्र गजयुद्धविशारदः । जयद्रथश्च निहतः किमन्यद्भागधेयतः ॥

bhagadatto hato yatra gajayuddhaviśāradaḥ | jayadrathaśca nihataḥ kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ हाथी की लड़ाई में निपुण भगदत्त मारे गए और जयद्रथ भी मारा गया, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 35 (9.2.35)

सुदक्षिणो हतो यत्र जलसन्धश्च पौरवः । श्रुतायुश्चाश्रुतायुश्च किमन्यद्भागधेयतः ॥

sudakṣiṇo hato yatra jalasandhaśca pauravaḥ | śrutāyuścāśrutāyuśca kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ सुदक्षिण मारे गए, पौरव जलसन्ध, श्रुतायु और अच्युतायु भी, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 36 (9.2.36)

महाबलस्तथा पाण्ड्यः सर्वशस्त्रभृतां वरः । निहतः पाण्डवैः सङ्ख्ये किमन्यद्भागधेयतः ॥

mahābalastathā pāṇḍyaḥ sarvaśastrabhṛtāṃ varaḥ | nihataḥ pāṇḍavaiḥ saṅkhye kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ महाबली पाण्ड्य पाण्डवों के हाथों युद्ध में मारे गए, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 37 (9.2.37)

बृहद्बलो हतो यत्र मागधश्च महाबलः । उग्रायुधश्च विक्रान्तः प्रतिमानं धनुष्मताम् ॥

bṛhadbalo hato yatra māgadhaśca mahābalaḥ | ugrāyudhaśca vikrāntaḥ pratimānaṃ dhanuṣmatām

जहाँ बृहद्बल मारे गए, महाबली मागध और धनुर्धारियों में अद्वितीय पराक्रमी उग्रायुध भी,

श्लोक 38 (9.2.38)

आवन्त्यो निहतो यत्र त्रैगर्तश्च जनाधिपः । संशप्तकाश्च निहताः किमन्यद्भागधेयतः ॥

āvantyo nihato yatra traigartaśca janādhipaḥ | saṃśaptakāśca nihatāḥ kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ अवन्ती-नरेश मारे गए, त्रिगर्तों के स्वामी भी, और संशप्तक भी मारे गए, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 39 (9.2.39)

अलम्बुसस्तथा राजन्राक्षसश्चाप्यलायुधः । आर्ष्यशृङ्गिश्च निहतः किमन्यद्भागधेयतः ॥

alambusastathā rājanrākṣasaścāpyalāyudhaḥ | ārṣyaśṛṅgiśca nihataḥ kimanyadbhāgadheyataḥ

हे राजन्! जहाँ अलम्बुस, राक्षस अलायुध और आर्ष्यशृङ्गी मारे गए, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 40 (9.2.40)

नारायणा हता यत्र गोपाला युद्धदुर्मदाः । म्लेच्छाश्च बहुसाहस्राः किमन्यद्भागधेयतः ॥

nārāyaṇā hatā yatra gopālā yuddhadurmadāḥ | mlecchāśca bahusāhasrāḥ kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ युद्ध के लिए उन्मत्त नारायण नामक गोप-योद्धा मारे गए और कई हज़ार म्लेच्छ भी, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 41 (9.2.41)

शकुनिः सौबलो यत्र कैतव्यश्च महाबलः । निहतः सबलो वीरः किमन्यद्भागधेयतः ॥

śakuniḥ saubalo yatra kaitavyaśca mahābalaḥ | nihataḥ sabalo vīraḥ kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ सुबल-पुत्र शकुनि और महाबली कैतव्य, वह वीर अपनी सेना सहित, मारा गया, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 42 (9.2.42)

एते चान्ये च बहवः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । राजानो राजपुत्राश्च शूराः परिघबाहवः । निहता बहवो यत्र किमन्यद्भागधेयतः ॥

ete cānye ca bahavaḥ kṛtāstrā yuddhadurmadāḥ | rājāno rājaputrāśca śūrāḥ parighabāhavaḥ | nihatā bahavo yatra kimanyadbhāgadheyataḥ

जहाँ ये और अन्य बहुत-से अस्त्र-निपुण, युद्ध के लिए उन्मत्त, लोहे की गदा जैसी भुजाओं वाले वीर राजा और राजकुमार मारे गए, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 43 (9.2.43)

यत्र शूरा महेष्वासाः कृतास्त्रा युद्धदुर्मदाः । बहवो निहताः सूत महेन्द्रसमविक्रमाः ॥

yatra śūrā maheṣvāsāḥ kṛtāstrā yuddhadurmadāḥ | bahavo nihatāḥ sūta mahendrasamavikramāḥ

जहाँ अस्त्र-निपुण, युद्ध के लिए उन्मत्त, महान् धनुर्धर वीर, जो महेन्द्र के समान पराक्रमी थे, बहुत-से मारे गए, हे सूत!

श्लोक 44 (9.2.44)

नानादेशसमावृत्ताः क्षत्रिया यत्र सञ्जय । निहताः समरे सर्वे किमन्यद्भागधेयतः ॥

nānādeśasamāvṛttāḥ kṣatriyā yatra sañjaya | nihatāḥ samare sarve kimanyadbhāgadheyataḥ

हे सञ्जय! जहाँ अनेक देशों से आए सब क्षत्रिय युद्ध में मारे गए, वहाँ भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 45 (9.2.45)

पुत्राश्च मे विनिहताः पौत्राश्चैव महाबलाः । वयस्या भ्रातरश्चैव किमन्यद्भागधेयतः ॥

putrāśca me vinihatāḥ pautrāścaiva mahābalāḥ | vayasyā bhrātaraścaiva kimanyadbhāgadheyataḥ

मेरे पुत्र मारे गए, मेरे महाबली पौत्र, मित्र और भाई भी मारे गए; इसमें भाग्य के सिवा और क्या कहा जाए?

श्लोक 46 (9.2.46)

भागधेयसमायुक्तो ध्रुवमुत्पद्यते नरः । यस्तु भाग्यसमायुक्तः स शुभं प्राप्नुयान्नरः ॥

bhāgadheyasamāyukto dhruvamutpadyate naraḥ | yastu bhāgyasamāyuktaḥ sa śubhaṃ prāpnuyānnaraḥ

मनुष्य निश्चय ही अपने भाग्य से जुड़कर जन्म लेता है; जो भाग्य से युक्त है वही शुभ फल पाता है।

श्लोक 47 (9.2.47)

अहं वियुक्तस्तैर्भाग्यैः पुत्रैश्चैवेह सञ्जय । कथमद्य भविष्यामि वृद्धः शत्रुवशं गतः ॥

ahaṃ viyuktastairbhāgyaiḥ putraiścaiveha sañjaya | kathamadya bhaviṣyāmi vṛddhaḥ śatruvaśaṃ gataḥ

हे सञ्जय! मैं अपने भाग्य और पुत्रों से बिछुड़ गया हूँ; अब शत्रु के वश में पड़ा बूढ़ा मैं कैसे जिऊँगा?

श्लोक 48 (9.2.48)

नान्यदत्र परं मन्ये वनवासादृते प्रभो । सोऽहं वनं गमिष्यामि निर्बन्धुर्ज्ञातिसंक्षये ॥

nānyadatra paraṃ manye vanavāsādṛte prabho | so'haṃ vanaṃ gamiṣyāmi nirbandhurjñātisaṃkṣaye

हे प्रभो! मैं समझता हूँ यहाँ वनवास के सिवा और कुछ उचित नहीं; स्वजनों के नष्ट हो जाने पर बन्धुहीन मैं वन को चला जाऊँगा।

श्लोक 49 (9.2.49)

न हि मेऽन्यद्भवेच्छ्रेयो वनाभ्युपगमादृते । इमामवस्थां प्राप्तस्य लूनपक्षस्य सञ्जय ॥

na hi me'nyadbhavecchreyo vanābhyupagamādṛte | imāmavasthāṃ prāptasya lūnapakṣasya sañjaya

हे सञ्जय! इस दशा में पहुँचे, कटे पंखों वाले मेरे लिए वन जाने से बढ़कर और कोई कल्याण का मार्ग नहीं है।

श्लोक 50 (9.2.50)

दुर्योधनो हतो यत्र शल्यश्च निहतो युधि । दुःशासनो विविंशश्च विकर्णश्च महाबलः ॥

duryodhano hato yatra śalyaśca nihato yudhi | duḥśāsano viviṃśaśca vikarṇaśca mahābalaḥ

जहाँ दुर्योधन मारा गया, शल्य युद्ध में गिरे, और दुःशासन, विविंशति तथा महाबली विकर्ण भी,

श्लोक 51 (9.2.51)

कथं हि भीमसेनस्य श्रोष्येऽहं शब्दमुत्तमम् । एकेन समरे येन हतं पुत्रशतं मम ॥

kathaṃ hi bhīmasenasya śroṣye'haṃ śabdamuttamam | ekena samare yena hataṃ putraśataṃ mama

वहाँ मैं भीमसेन की वह भीषण गर्जना कैसे सुन सकूँगा, जिसने अकेले युद्ध में मेरे सौ पुत्र मार डाले?

श्लोक 52 (9.2.52)

असकृद्वदतस्तस्य दुर्योधनवधेन च । दुःखशोकाभिसन्तप्तो न श्रोष्ये परुषा गिरः ॥

asakṛdvadatastasya duryodhanavadhena ca | duḥkhaśokābhisantapto na śroṣye paruṣā giraḥ

दुर्योधन के वध की बात वह बार-बार कहेगा; दुःख और शोक से जलता हुआ मैं उसके कठोर वचन नहीं सुन सकूँगा।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 53 (9.2.53)

एवं स शोकसन्तप्तः पार्थिवो हतबान्धवः । मुहुर्मुहुर्मुह्यमानः पुत्राधिभिरभिप्लुतः ॥

evaṃ sa śokasantaptaḥ pārthivo hatabāndhavaḥ | muhurmuhurmuhyamānaḥ putrādhibhirabhiplutaḥ

इस प्रकार शोक से जलता हुआ, बन्धुओं को खो चुका वह राजा बार-बार मूर्च्छित होता और पुत्रों की पीड़ा में डूबता रहा,

श्लोक 54 (9.2.54)

विलप्य सुचिरं कालं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । दीर्घमुष्णं स निःश्वस्य चिन्तयित्वा पराभवम् ॥

vilapya suciraṃ kālaṃ dhṛtarāṣṭro'mbikāsutaḥ | dīrghamuṣṇaṃ sa niḥśvasya cintayitvā parābhavam

अम्बिका-पुत्र धृतराष्ट्र बहुत देर तक विलाप करके, लम्बी और गर्म साँस लेकर तथा पराजय का चिन्तन करके,

श्लोक 55 (9.2.55)

दुःखेन महता राजन्सन्तप्तो भरतर्षभः । पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद्यथातथम् ॥

duḥkhena mahatā rājansantapto bharatarṣabhaḥ | punargāvalgaṇiṃ sūtaṃ paryapṛcchadyathātatham

हे राजन्! हे भरतश्रेष्ठ! भारी दुःख से सन्तप्त होकर गावल्गणि सूत सञ्जय से फिर ठीक-ठीक वृत्तान्त पूछने लगा।

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 56 (9.2.56)

भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा सूतपुत्रं च पातितम् । सेनापतिं प्रणेतारं कमकुर्वत मामकाः ॥

bhīṣmadroṇau hatau śrutvā sūtaputraṃ ca pātitam | senāpatiṃ praṇetāraṃ kamakurvata māmakāḥ

भीष्म और द्रोण के मारे जाने और सूतपुत्र के गिरा दिए जाने की बात सुनकर मेरे लोगों ने किसे सेनापति और नेता बनाया?

श्लोक 57 (9.2.57)

यं यं सेनाप्रणेतारं युधि कुर्वन्ति मामकाः । अचिरेणैव कालेन तं तं निघ्नन्ति पाण्डवाः ॥

yaṃ yaṃ senāpraṇetāraṃ yudhi kurvanti māmakāḥ | acireṇaiva kālena taṃ taṃ nighnanti pāṇḍavāḥ

मेरे लोग युद्ध में जिस-जिसको सेना का नेता बनाते हैं, पाण्डव उस-उसको थोड़े ही समय में मार डालते हैं।

श्लोक 58 (9.2.58)

रणमूर्ध्नि हतो भीष्मः पश्यतां वः किरीटिना । एवमेव हतो द्रोणः सर्वेषामेव पश्यताम् ॥

raṇamūrdhni hato bhīṣmaḥ paśyatāṃ vaḥ kirīṭinā | evameva hato droṇaḥ sarveṣāmeva paśyatām

भीष्म रणभूमि के अग्रभाग में तुम सबके देखते-देखते किरीटी (अर्जुन) के हाथों मारे गए; वैसे ही द्रोण भी सबके देखते-देखते मारे गए।

श्लोक 59 (9.2.59)

एवमेव हतः कर्णः सूतपुत्रः प्रतापवान् । सराजकानां सर्वेषां पश्यतां वः किरीटिना ॥

evameva hataḥ karṇaḥ sūtaputraḥ pratāpavān | sarājakānāṃ sarveṣāṃ paśyatāṃ vaḥ kirīṭinā

उसी प्रकार प्रतापी सूतपुत्र कर्ण भी तुम्हारे और सब राजाओं के देखते-देखते किरीटी के हाथों मारा गया।

श्लोक 60 (9.2.60)

पूर्वमेवाहमुक्तो वै विदुरेण महात्मना । दुर्योधनापराधेन प्रजेयं विनशिष्यति ॥

pūrvamevāhamukto vai vidureṇa mahātmanā | duryodhanāparādhena prajeyaṃ vinaśiṣyati

बहुत पहले महात्मा विदुर ने मुझसे कहा था, "दुर्योधन के अपराध से ये प्रजाजन नष्ट हो जाएँगे।"

श्लोक 61 (9.2.61)

केचिन्न सम्यक्पश्यन्ति मूढाः सम्यगवेक्ष्य च । तदिदं मम मूढस्य तथाभूतं वचः स्म तत् ॥

kecinna samyakpaśyanti mūḍhāḥ samyagavekṣya ca | tadidaṃ mama mūḍhasya tathābhūtaṃ vacaḥ sma tat

कुछ मूर्ख अच्छी तरह देखकर भी ठीक नहीं देख पाते; मुझ मूढ़ की भी वही दशा रही, और वे वचन ठीक वैसे ही सच निकले।

श्लोक 62 (9.2.62)

यदब्रवीत्स धर्मात्मा विदुरो दीर्घदर्शिवान् । तत्तथा समनुप्राप्तं वचनं सत्यवादिनः ॥

yadabravītsa dharmātmā viduro dīrghadarśivān | tattathā samanuprāptaṃ vacanaṃ satyavādinaḥ

धर्मात्मा और दूरदर्शी विदुर ने मुझसे जो कहा था, सत्यवादी का वह वचन ठीक वैसा ही घटित हुआ।

श्लोक 63 (9.2.63)

दैवोपहतचित्तेन यन्मयाऽनुष्ठितं पुरा । अनयस्य फलं तस्य ब्रूहि गावल्गणे पुनः ॥

daivopahatacittena yanmayā'nuṣṭhitaṃ purā | anayasya phalaṃ tasya brūhi gāvalgaṇe punaḥ

हे गावल्गणि! दैव से मारी गई बुद्धि वाले मैंने पहले जो अनुचित किया था, उसका फल मुझे फिर बताओ।

श्लोक 64 (9.2.64)

को वा मुखमनीकानामासीत्कर्णो निपातिते । अर्जुनं वासुदेवं च को वा प्रत्युद्ययौ रथी ॥

ko vā mukhamanīkānāmāsītkarṇo nipātite | arjunaṃ vāsudevaṃ ca ko vā pratyudyayau rathī

कर्ण के गिर जाने पर सेना के अग्रभाग में कौन खड़ा हुआ? और कौन-सा रथी अर्जुन और वासुदेव के सामने गया?

श्लोक 65 (9.2.65)

केऽरक्षन्दक्षिणं चक्रं मद्रराजस्य संयुगे । वामं च योद्धुकामस्य के वा वीरस्य पृष्ठतः ॥

ke'rakṣandakṣiṇaṃ cakraṃ madrarājasya saṃyuge | vāmaṃ ca yoddhukāmasya ke vā vīrasya pṛṣṭhataḥ

युद्ध में मद्रराज के दाहिने पहिये की रक्षा किसने की और बाएँ की किसने? और युद्ध की इच्छा रखने वाले उस वीर के पीछे कौन था?

श्लोक 66 (9.2.66)

कथं च वः समेतानां मद्रराजो महारथः । निहतः पाण्डवैः सङ्ख्ये पुत्रो वा मम सञ्जय ॥

kathaṃ ca vaḥ sametānāṃ madrarājo mahārathaḥ | nihataḥ pāṇḍavaiḥ saṅkhye putro vā mama sañjaya

और हे सञ्जय! तुम सबके एक साथ होते हुए भी महारथी मद्रराज पाण्डवों के हाथों युद्ध में कैसे मारे गए, और मेरा पुत्र भी?

श्लोक 67 (9.2.67)

ब्रूहि सर्वं यथातत्त्वं भरतानां महाक्षयम् । यथा च निहतः सङ्ख्ये पुत्रो दुर्योधनो मम ॥

brūhi sarvaṃ yathātattvaṃ bharatānāṃ mahākṣayam | yathā ca nihataḥ saṅkhye putro duryodhano mama

भरतवंशियों के उस महान् विनाश का सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बताओ, और यह भी कि मेरा पुत्र दुर्योधन युद्ध में कैसे मारा गया।

श्लोक 68 (9.2.68)

पाञ्चालाश्च यथा सर्वे निहताः सपदानुगाः । धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ॥

pāñcālāśca yathā sarve nihatāḥ sapadānugāḥ | dhṛṣṭadyumnaḥ śikhaṇḍī ca draupadyāḥ pañca cātmajāḥ

और सब पाञ्चाल अपने अनुचरों सहित कैसे मारे गए: धृष्टद्युम्न, शिखण्डी और द्रौपदी के पाँचों पुत्र।

श्लोक 69 (9.2.69)

पाण्डवाश्च यथा मुक्तास्तथोभौ माधवौ युधि । कृपश्च कृतवर्मा च भारद्वाजस्य चात्मजः ॥

pāṇḍavāśca yathā muktāstathobhau mādhavau yudhi | kṛpaśca kṛtavarmā ca bhāradvājasya cātmajaḥ

और पाण्डव युद्ध में कैसे बचे रहे, तथा दोनों माधव, कृपाचार्य, कृतवर्मा और भारद्वाज के पुत्र अश्वत्थामा भी।

श्लोक 70 (9.2.70)

यद्यथा यादृशं चैव युद्धं वृत्तं च साम्प्रतम् । अखिलं श्रोतुमिच्छामि कुशलो ह्यसि सञ्जय ॥

yadyathā yādṛśaṃ caiva yuddhaṃ vṛttaṃ ca sāmpratam | akhilaṃ śrotumicchāmi kuśalo hyasi sañjaya

जो, जैसे और जिस प्रकार का युद्ध अभी हुआ है, वह सब मैं पूरा-पूरा सुनना चाहता हूँ; हे सञ्जय! तुम कुशल हो।

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