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शल्य पर्व · अध्याय 3

कृप का दुर्योधन को सन्धि का परामर्श

सञ्जय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि कर्ण के गिरने के बाद क्या हुआ। उजड़े रणक्षेत्र और घबराई हुई सेना को देखकर कृप करुणा से भर उठते हैं और दुर्योधन से कहते हैं कि महारथी चले गए, अर्जुन, भीम और सात्यकि का सामना नहीं हो सकता, और दुर्बल पक्ष को सन्धि ढूँढनी चाहिए। वे राजा से युधिष्ठिर के आगे झुकने का आग्रह करते हैं, जो धृतराष्ट्र और कृष्ण के कहने पर उसे फिर राज्य सौंप देंगे, और अन्त में शोक में डूब जाते हैं।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.3.1)

शृणु राजन्नवहितो यथावृत्तो महान्क्षयः । कुरूणां पाण्डवानां च समासाद्य परस्परम् ॥

śṛṇu rājannavahito yathāvṛtto mahānkṣayaḥ | kurūṇāṃ pāṇḍavānāṃ ca samāsādya parasparam

हे राजन्, ध्यान से सुनिए कि कौरवों और पाण्डवों के आपस में टकराने पर वह महान् संहार किस प्रकार हुआ।

श्लोक 2 (9.3.2)

निहते सूतपुत्रे च फल्गुनेन महात्मना । विद्रुतेषु च सैन्येषु समानीतेषु चासकृत् ॥

nihate sūtaputre ca phalgunena mahātmanā | vidruteṣu ca sainyeṣu samānīteṣu cāsakṛt

जब महात्मा फल्गुन (अर्जुन) के हाथों सूतपुत्र कर्ण मारा गया और भागी हुई सेनाएँ बार-बार इकट्ठी की जा रही थीं,

श्लोक 3 (9.3.3)

विमुखे तव पुत्रे च शोकोपहतचेतसि । भृशोद्विग्नेषु सैन्येषु दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् ॥

vimukhe tava putre ca śokopahatacetasi | bhṛśodvigneṣu sainyeṣu dṛṣṭvā pārthasya vikramam

जब आपका पुत्र शोक से आहत चित्त होकर युद्ध से विमुख हो गया था, और पार्थ का पराक्रम देखकर सेनाएँ अत्यन्त घबरा गई थीं,

श्लोक 4 (9.3.4)

ध्यायमानेषु योधेषु दुःखं प्राप्तेषु भारत । बलानां मथ्यमानानां श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ॥

dhyāyamāneṣu yodheṣu duḥkhaṃ prāpteṣu bhārata | balānāṃ mathyamānānāṃ śrutvā ninadamuttamam

जब दुःख में डूबे हुए, सोच में पड़े योद्धाओं ने, हे भारत, कुचली जा रही सेनाओं का भारी कोलाहल सुना,

श्लोक 5 (9.3.5)

अभिज्ञानं नरेन्द्राणां विकृतं प्रेक्ष्य संयुगे । पतितानवनीपालान्ध्वजांश्चैव महात्मनाम् । रणे विनिहतान्नागान्दृष्ट्वा पत्तींश्च भारत ॥

abhijñānaṃ narendrāṇāṃ vikṛtaṃ prekṣya saṃyuge | patitānavanīpālāndhvajāṃścaiva mahātmanām | raṇe vinihatānnāgāndṛṣṭvā pattīṃśca bhārata

रणभूमि में राजाओं के बिगड़े हुए चिह्न, गिरे हुए भूपालों और महात्माओं की ध्वजाओं, तथा युद्ध में मारे गए हाथियों और पैदल सैनिकों को देखकर, हे भारत,

श्लोक 6 (9.3.6)

आयोधनं महाघोरं रुद्रस्याक्रीडसन्निभम् । अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रशः ॥

āyodhanaṃ mahāghoraṃ rudrasyākrīḍasannibham | aprakhyātiṃ gatānāṃ tu rājñāṃ śatasahasraśaḥ

और उस अति भयंकर रणक्षेत्र को, जो रुद्र की क्रीड़ाभूमि जैसा था और जहाँ लाखों-लाख राजा नाम-निशान खोकर पड़े थे —

श्लोक 7 (9.3.7)

कृपाविष्टः कृपो दृष्ट्वा वयः शीलसमन्वितः । अब्रवीत्तत्र तेजस्वी सोऽभिसृत्य जनाधिपम् । दुर्योधनमनुक्रोशाद्वाक्यं वाक्यविशारदः ॥

kṛpāviṣṭaḥ kṛpo dṛṣṭvā vayaḥ śīlasamanvitaḥ | abravīttatra tejasvī so'bhisṛtya janādhipam | duryodhanamanukrośādvākyaṃ vākyaviśāradaḥ

आयु और शील से सम्पन्न कृप यह सब देखकर करुणा से भर उठे; वे तेजस्वी, वाक्य-कुशल कृप राजा के पास जाकर दया के कारण दुर्योधन से यह बोले —

कृप उवाच

श्लोक 8 (9.3.8)

दुर्योधन निबोधेयं यत्त्वां वक्ष्यामि कौरव । श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेऽनघ ॥

duryodhana nibodheyaṃ yattvāṃ vakṣyāmi kaurava | śrutvā kuru mahārāja yadi te rocate'nagha

दुर्योधन, मैं तुमसे जो कहने जा रहा हूँ, उसे सुनो, हे कौरव। हे महाराज, हे निष्पाप, सुनकर यदि तुम्हें ठीक लगे तो वैसा करना।

श्लोक 9 (9.3.9)

न युद्धधर्माच्छ्रेयान्वै पन्था राजेन्द्र विद्यते । यं समाश्रित्य युध्यन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ॥

na yuddhadharmācchreyānvai panthā rājendra vidyate | yaṃ samāśritya yudhyante kṣatriyāḥ kṣatriyarṣabha

हे राजेन्द्र, हे क्षत्रियश्रेष्ठ, युद्ध-धर्म से बढ़कर कोई मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लड़ते हैं।

श्लोक 10 (9.3.10)

पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्रीयो मातुलस्तथा । सम्बन्धिबान्धवाश्चैव योद्धव्याः क्षत्रजीविना ॥

putro bhrātā pitā caiva svasrīyo mātulastathā | sambandhibāndhavāścaiva yoddhavyāḥ kṣatrajīvinā

पुत्र, भाई, पिता, भानजे, मामा, सम्बन्धी और बन्धु-बान्धव — क्षत्रिय-वृत्ति से जीने वाले को इन सबसे भी लड़ना पड़ता है।

श्लोक 11 (9.3.11)

वधे चैव परो धर्मस्तथाऽधर्मः पलायने । ते स्म घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिनः । तदत्र प्रतिवक्ष्यामि किञ्चिदेव हितं वचः ॥

vadhe caiva paro dharmastathā'dharmaḥ palāyane | te sma ghorāṃ samāpannā jīvikāṃ jīvitārthinaḥ | tadatra prativakṣyāmi kiñcideva hitaṃ vacaḥ

वध में परम धर्म है और भागने में अधर्म। जीविका चाहने वाले क्षत्रिय इसी भयानक वृत्ति को अपनाते हैं। इस विषय में अब मैं तुमसे कुछ हितकर बात कहूँगा।

श्लोक 12 (9.3.12)

हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णे चैव महारथे । जयद्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ । लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ॥

hate bhīṣme ca droṇe ca karṇe caiva mahārathe | jayadrathe ca nihate tava bhrātṛṣu cānagha | lakṣmaṇe tava putre ca kiṃ śeṣaṃ paryupāsmahe

भीष्म, द्रोण और महारथी कर्ण के मारे जाने पर, जयद्रथ के मारे जाने पर, और हे निष्पाप, तुम्हारे भाइयों और तुम्हारे पुत्र लक्ष्मण के मारे जाने पर, अब हमारे पास सहारा लेने को क्या बचा है?

श्लोक 13 (9.3.13)

येषु भारं समासज्य राज्ये मतिमकुर्महि । ते सन्त्यज्य तनूर्याताः शूरा ब्रह्मविदां गतिम् ॥

yeṣu bhāraṃ samāsajya rājye matimakurmahi | te santyajya tanūryātāḥ śūrā brahmavidāṃ gatim

जिन पर भार डालकर हमने राज्य की आशा बाँधी थी, वे शूरवीर शरीर त्यागकर ब्रह्मवेत्ताओं की गति को चले गए।

श्लोक 14 (9.3.14)

वयं त्विह विनाभूता गुणवद्भिर्महारथैः । कृपणं वर्तयिष्यामः पातयित्वा नृपान्बहून् ॥

vayaṃ tviha vinābhūtā guṇavadbhirmahārathaiḥ | kṛpaṇaṃ vartayiṣyāmaḥ pātayitvā nṛpānbahūn

उन गुणवान् महारथियों से बिछुड़कर, बहुत-से राजाओं को गिरा चुकने के बाद भी, हम यहाँ दीन-हीन जीवन बिताएँगे।

श्लोक 15 (9.3.15)

सर्वैरथ च जीवद्भिर्बीभत्सुरपराजितः । कृष्णनेत्रो महाबाहुर्देवैरपि दुरासदः ॥

sarvairatha ca jīvadbhirbībhatsuraparājitaḥ | kṛṣṇanetro mahābāhurdevairapi durāsadaḥ

हम सबके जीवित रहते हुए भी बीभत्सु (अर्जुन) अपराजित है — वह महाबाहु, जिसके नेता कृष्ण हैं, देवताओं के लिए भी दुर्जेय है।

श्लोक 16 (9.3.16)

इन्द्रकार्मुकवज्राभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् । वानरं केतुमासाद्य सञ्चचाल महाचमूः ॥

indrakārmukavajrābhamindraketumivocchritam | vānaraṃ ketumāsādya sañcacāla mahācamūḥ

इन्द्र के धनुष और वज्र की-सी आभा वाली, इन्द्रध्वज की भाँति ऊँची उठी हुई वानर-ध्वजा के सामने पहुँचकर विशाल सेना काँप उठी।

श्लोक 17 (9.3.17)

सिंहनादेन भीमस्य पाञ्चजन्यस्वनेन च । गाण्डीवस्य च निर्घोषात्सम्मुह्यन्ते मनांसि नः ॥

siṃhanādena bhīmasya pāñcajanyasvanena ca | gāṇḍīvasya ca nirghoṣātsammuhyante manāṃsi naḥ

भीम की सिंहगर्जना, पाञ्चजन्य के नाद और गाण्डीव की टंकार से हमारे मन घबरा उठते हैं।

श्लोक 18 (9.3.18)

स्फुरन्तीव महाविद्युन्मुष्णन्ती नयनप्रभाम् । अलातमिव चाविद्धं गाण्डीवं समदृश्यत ॥

sphurantīva mahāvidyunmuṣṇantī nayanaprabhām | alātamiva cāviddhaṃ gāṇḍīvaṃ samadṛśyata

गाण्डीव कौंधती हुई बड़ी बिजली-सा, आँखों की ज्योति हर लेता हुआ, और घुमाए गए जलते कुन्दे-सा दिखाई देता था।

श्लोक 19 (9.3.19)

जाम्बूनदविचित्रं च धूयमानं महद्धनुः । दृश्यते दिक्षु सर्वासु विद्युदभ्रघनेष्विव ॥

jāmbūnadavicitraṃ ca dhūyamānaṃ mahaddhanuḥ | dṛśyate dikṣu sarvāsu vidyudabhraghaneṣviva

सोने से जगमगाता वह विशाल धनुष खींचा और घुमाया जाता हुआ सब दिशाओं में ऐसा दीखता था, जैसे घने बादलों में बिजली।

श्लोक 20 (9.3.20)

उह्यमानश्च कृष्णेन वायुनेव बलाहकः । तावकं तद्बलं राजन्नर्जुनोऽस्त्रविशारदः । गहनं शिशिरापाये ददाहाग्निरिवोल्बणः ॥

uhyamānaśca kṛṣṇena vāyuneva balāhakaḥ | tāvakaṃ tadbalaṃ rājannarjuno'straviśāradaḥ | gahanaṃ śiśirāpāye dadāhāgnirivolbaṇaḥ

कृष्ण द्वारा वहन किया जाता हुआ, वायु से उड़ाए गए बादल की तरह, अस्त्रविद्या में निपुण अर्जुन ने, हे राजन्, आपकी उस सेना को शिशिर के अन्त में सघन वन को धधकती आग की भाँति जला डाला।

श्लोक 21 (9.3.21)

गाहमानमनीकानि महेन्द्रसदृशप्रभम् । विक्षोभयन्तं सेनां वै त्रासयन्तं च पार्थिवान् । धनञ्जयमपश्याम नलिनीमिव कुञ्जरम् ॥

gāhamānamanīkāni mahendrasadṛśaprabham | vikṣobhayantaṃ senāṃ vai trāsayantaṃ ca pārthivān | dhanañjayamapaśyāma nalinīmiva kuñjaram

हमने धनञ्जय को देखा — पंक्तियों में घुसते हुए, महेन्द्र-जैसी कान्ति वाले, सेना को क्षुब्ध करते और राजाओं को त्रस्त करते हुए, जैसे कमलिनी-वन में हाथी।

श्लोक 22 (9.3.22)

त्रासयन्तं तथा योधान्धनुर्घोषेण पाण्डवम् । भूय एनमपश्याम सिंहं मृगगणानिव ॥

trāsayantaṃ tathā yodhāndhanurghoṣeṇa pāṇḍavam | bhūya enamapaśyāma siṃhaṃ mṛgagaṇāniva

फिर हमने उस पाण्डव को धनुष की टंकार से योद्धाओं को डराते देखा, जैसे सिंह मृगों के झुण्डों को।

श्लोक 23 (9.3.23)

सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् । आमुक्तकवचौ कृष्णौ लोकमध्ये विरेजतुः ॥

sarvalokamaheṣvāsau vṛṣabhau sarvadhanvinām | āmuktakavacau kṛṣṇau lokamadhye virejatuḥ

सारे जगत् के महान् धनुर्धर, सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ, कवच बाँधे हुए वे दोनों कृष्ण संसार के बीच दमक रहे थे।

श्लोक 24 (9.3.24)

अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत । सङ्ग्रामस्यातिघोरस्य युध्यतां चाभितो युधि ॥

adya saptadaśāhāni vartamānasya bhārata | saṅgrāmasyātighorasya yudhyatāṃ cābhito yudhi

हे भारत, इस अति भयंकर संग्राम को, जिसमें योद्धा चारों ओर युद्ध कर रहे हैं, चलते हुए आज सत्रह दिन हो गए।

श्लोक 25 (9.3.25)

वायुनेव विधूतानि एव सैन्यानि गच्छता । शरदम्भोदजालानि विशीर्यन्ते समन्ततः ॥

vāyuneva vidhūtāni eva sainyāni gacchatā | śaradambhodajālāni viśīryante samantataḥ

जैसे बहती हवा से शरद् ऋतु के बादलों के समूह छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, वैसे ही आपकी सेनाएँ चारों ओर बिखर रही हैं।

श्लोक 26 (9.3.26)

तां नावमिव पर्यस्तां मज्जमानां महार्णवे । तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पयत् ॥

tāṃ nāvamiva paryastāṃ majjamānāṃ mahārṇave | tava senāṃ mahārāja savyasācī vyakampayat

हे महाराज, महासागर में उलटकर डूबती हुई नाव की तरह सव्यसाची ने आपकी सेना को झकझोर डाला है।

श्लोक 27 (9.3.27)

क्वनु ते सूतपुत्रोऽभूत्क्वनु द्रोणः सहात्मजः । अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्च तथा क्वनु ॥

kvanu te sūtaputro'bhūtkvanu droṇaḥ sahātmajaḥ | ahaṃ kva ca kva cātmā te hārdikyaśca tathā kvanu

कहाँ गया सूतपुत्र कर्ण, और कहाँ हैं पुत्र सहित द्रोण? मैं कहाँ हूँ, और स्वयं आप कहाँ हैं? और हार्दिक्य (कृतवर्मा) कहाँ है?

श्लोक 28 (9.3.28)

दुःशासनश्च ते भ्राता भ्रातृभिः सहितः क्वनु ॥

duḥśāsanaśca te bhrātā bhrātṛbhiḥ sahitaḥ kvanu

और आपका भाई दुःशासन अपने भाइयों सहित कहाँ है?

श्लोक 29 (9.3.29)

बाणगोचरसम्प्राप्तं युध्यमानं जयद्रथम् । सम्बन्धिनस्ते भ्रातॄंश्च सहायान्मातुलांस्तथा । सर्वान्विक्रम्य मिषतो लोकमाक्रम्य मूर्धनि ॥

bāṇagocarasamprāptaṃ yudhyamānaṃ jayadratham | sambandhinaste bhrātṝṃśca sahāyānmātulāṃstathā | sarvānvikramya miṣato lokamākramya mūrdhani

बाणों की पहुँच में आकर लड़ते हुए जयद्रथ के साथ ही आपके सम्बन्धियों, भाइयों, सहायकों और मामाओं — इन सबको सबके देखते-देखते पराक्रम से पछाड़कर (अर्जुन) मानो जगत् के सिर पर पैर रखकर खड़ा हो गया।

श्लोक 30 (9.3.30)

जयद्रथो हतो राजन्किन्नु शेषमुपास्महे । को वेह स पुमानास्ते यो विजेष्यति पाण्डवम् ॥

jayadratho hato rājankinnu śeṣamupāsmahe | ko veha sa pumānāste yo vijeṣyati pāṇḍavam

हे राजन्, जयद्रथ मारा गया; अब हमारे पास सहारा लेने को क्या बचा है? और ऐसा कौन पुरुष यहाँ है जो पाण्डव को जीत सके?

श्लोक 31 (9.3.31)

तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विदितानि महात्मनः । गाण्डीवस्य च निर्घोषो धैर्याणि हरते हि नः ॥

tasya cāstrāṇi divyāni viditāni mahātmanaḥ | gāṇḍīvasya ca nirghoṣo dhairyāṇi harate hi naḥ

उस महात्मा के दिव्य अस्त्र सबको ज्ञात हैं, और गाण्डीव की टंकार हमारा धैर्य हर लेती है।

श्लोक 32 (9.3.32)

नष्टचन्द्रा यथा रात्रिः सेनेयं हतनायका । नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीव प्रतिभाति मे ॥

naṣṭacandrā yathā rātriḥ seneyaṃ hatanāyakā | nāgabhagnadrumā śuṣkā nadīva pratibhāti me

नेताओं के मारे जाने से यह सेना मुझे चन्द्रहीन रात-सी, अथवा उस सूखी नदी-सी दीखती है जिसके किनारे के वृक्ष हाथियों ने तोड़ डाले हों।

श्लोक 33 (9.3.33)

ध्वजिन्यां हतनेत्रायां यथेष्टं श्वेतवाहनः । चरिष्यति महाराजः कक्षेष्वग्निरिव ज्वलन् ॥

dhvajinyāṃ hatanetrāyāṃ yatheṣṭaṃ śvetavāhanaḥ | cariṣyati mahārājaḥ kakṣeṣvagniriva jvalan

सेना की आँख फूट जाने पर वे श्वेतवाहन यथेच्छ विचरेंगे, सूखी झाड़ियों में धधकती आग की तरह।

श्लोक 34 (9.3.34)

सात्यकेश्चैव यो वेगो भीमसेनस्य चोभयोः । दारयेत गिरीन्सर्वाञ्शोषयेच्चैव सागरान् ॥

sātyakeścaiva yo vego bhīmasenasya cobhayoḥ | dārayeta girīnsarvāñśoṣayeccaiva sāgarān

सात्यकि और भीमसेन — दोनों का जो वेग है, वह पर्वतों को चीर दे और समुद्रों को सुखा दे।

श्लोक 35 (9.3.35)

उवाच वाक्यं यद्भीमः सभामध्ये विशाम्पते । कृतं तत्सफलं सर्वं भूयश्चैव करिष्यति ॥

uvāca vākyaṃ yadbhīmaḥ sabhāmadhye viśāmpate | kṛtaṃ tatsaphalaṃ sarvaṃ bhūyaścaiva kariṣyati

हे प्रजापति, सभा के बीच भीम ने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे उसने पूरी तरह सफल कर दिखाया है, और आगे भी करेगा।

श्लोक 36 (9.3.36)

प्रमुखस्थे तदा कर्णे बलं पाण्डवरक्षितम् । दुरासदं तदा गुप्तं व्यूढं गाण्डीवधन्वना ॥

pramukhasthe tadā karṇe balaṃ pāṇḍavarakṣitam | durāsadaṃ tadā guptaṃ vyūḍhaṃ gāṇḍīvadhanvanā

जब कर्ण आगे खड़ा था, तब पाण्डवों से रक्षित वह सेना गाण्डीवधारी द्वारा सुरक्षित और व्यूह में सजी हुई दुर्गम थी।

श्लोक 37 (9.3.37)

युष्माभिस्तानि चीर्णानि यान्यसाधूनि साधुषु । अकारणकृतान्येव तेषां वः फलमागतम् ॥

yuṣmābhistāni cīrṇāni yānyasādhūni sādhuṣu | akāraṇakṛtānyeva teṣāṃ vaḥ phalamāgatam

तुम लोगों ने सज्जनों के साथ जो अनुचित काम किए, वे बिना किसी कारण के किए गए थे; उन्हीं का फल अब तुम पर आ पड़ा है।

श्लोक 38 (9.3.38)

आत्मनोऽर्थे त्वया लोके यत्नतः सर्व आहृतः । स ते संशयितस्तात आत्मा च भरतर्षभ ॥

ātmano'rthe tvayā loke yatnataḥ sarva āhṛtaḥ | sa te saṃśayitastāta ātmā ca bharatarṣabha

तुमने अपने ही प्रयोजन से यत्नपूर्वक सारे संसार को इकट्ठा किया था; हे तात, हे भरतश्रेष्ठ, अब वह सब संकट में है, और तुम्हारा अपना जीवन भी।

श्लोक 39 (9.3.39)

रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् । भिन्ने हि भाजने तात दिशो गच्छति तद्गतम् ॥

rakṣa duryodhanātmānamātmā sarvasya bhājanam | bhinne hi bhājane tāta diśo gacchati tadgatam

दुर्योधन, अपनी रक्षा करो; आत्मा ही सब कुछ का पात्र है। हे तात, पात्र टूट जाने पर उसमें रखा हुआ सब दिशाओं में बिखर जाता है।

श्लोक 40 (9.3.40)

हीयमानेन वै सन्धिः पर्येष्टव्यः समेन वा । विग्रहो वर्धमानेन नीतिरेषा बृहस्पतेः ॥

hīyamānena vai sandhiḥ paryeṣṭavyaḥ samena vā | vigraho vardhamānena nītireṣā bṛhaspateḥ

जो क्षीण हो रहा हो या बराबर का हो, उसे सन्धि खोजनी चाहिए; और जो बढ़ रहा हो, वह युद्ध करे — यह बृहस्पति की नीति है।

श्लोक 41 (9.3.41)

ते वयं पाण्डुपुत्रेभ्यो हीनाः स्म बलशक्तितः । अत्र ते पाण्डवैः सार्धं सन्धिं मन्ये क्षमं प्रभो ॥

te vayaṃ pāṇḍuputrebhyo hīnāḥ sma balaśaktitaḥ | atra te pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ sandhiṃ manye kṣamaṃ prabho

हम बल और सामर्थ्य में पाण्डुपुत्रों से हीन हैं। इस दशा में, हे प्रभो, मैं पाण्डवों के साथ सन्धि को ही उचित मानता हूँ।

श्लोक 42 (9.3.42)

न जानीते हि यः श्रेयः श्रेयसश्चावमन्यते । स क्षिप्रं भ्रश्यते राज्यान्न च श्रेयोऽनुविन्दति ॥

na jānīte hi yaḥ śreyaḥ śreyasaścāvamanyate | sa kṣipraṃ bhraśyate rājyānna ca śreyo'nuvindati

जो अपना कल्याण नहीं जानता और अपने से श्रेष्ठों का अनादर करता है, वह शीघ्र ही राज्य से भ्रष्ट हो जाता है और कल्याण नहीं पाता।

श्लोक 43 (9.3.43)

प्रणिपत्य हि राजानं राज्यं यदि लभेमहि । श्रेयः स्यान्न तु मौढ्येन राजन्गन्तुं पराभवम् ॥

praṇipatya hi rājānaṃ rājyaṃ yadi labhemahi | śreyaḥ syānna tu mauḍhyena rājangantuṃ parābhavam

यदि राजा के आगे झुककर हम राज्य पा सकें, तो वही अच्छा होगा; हे राजन्, मूर्खता से विनाश की ओर जाना ठीक नहीं।

श्लोक 44 (9.3.44)

वैचित्रवीर्यवचनात्कृपाशीलो युधिष्ठिरः । विनियुञ्जीत राज्ये त्वां गोविन्दवचनेन च ॥

vaicitravīryavacanātkṛpāśīlo yudhiṣṭhiraḥ | viniyuñjīta rājye tvāṃ govindavacanena ca

विचित्रवीर्य के पुत्र (धृतराष्ट्र) के कहने से और गोविन्द के कहने से स्वभाव से दयालु युधिष्ठिर तुम्हें फिर राज्य पर बिठा देंगे।

श्लोक 45 (9.3.45)

अजातशत्रुः कौरव्यो गुरुशुश्रूषणे रतः । धृतराष्ट्रस्य वचनं नावमंस्यति धार्मिकः ॥

ajātaśatruḥ kauravyo guruśuśrūṣaṇe rataḥ | dhṛtarāṣṭrasya vacanaṃ nāvamaṃsyati dhārmikaḥ

अजातशत्रु युधिष्ठिर कौरव-वंश के हैं और बड़ों की सेवा में लगे रहते हैं; वे धर्मात्मा धृतराष्ट्र की बात का अनादर नहीं करेंगे।

श्लोक 46 (9.3.46)

कुर्वन्ति भ्रातरश्चास्य वचनं नात्र संशयः ॥

kurvanti bhrātaraścāsya vacanaṃ nātra saṃśayaḥ

और उनके भाई भी उनकी बात मानेंगे; इसमें कोई सन्देह नहीं।

श्लोक 47 (9.3.47)

यद्ब्रूयाद्धि हृषीकेशो राजानमपराजितम् । अर्जुनो भीमसेनश्च सर्वे कुर्युरसंशयम् ॥

yadbrūyāddhi hṛṣīkeśo rājānamaparājitam | arjuno bhīmasenaśca sarve kuryurasaṃśayam

हृषीकेश उस अपराजित राजा से जो कुछ कहें, अर्जुन, भीमसेन और अन्य सब निःसन्देह वही करेंगे।

श्लोक 48 (9.3.48)

नातिक्रमिष्यते कृष्णो वचनं पाण्डवस्य तु । धृतराष्ट्रस्य मन्येऽहं नापि कृष्णस्य पाण्डवः ॥

nātikramiṣyate kṛṣṇo vacanaṃ pāṇḍavasya tu | dhṛtarāṣṭrasya manye'haṃ nāpi kṛṣṇasya pāṇḍavaḥ

कृष्ण पाण्डव (युधिष्ठिर) की बात का उल्लंघन नहीं करेंगे, और मेरी समझ में धृतराष्ट्र की बात का भी नहीं; और पाण्डव कृष्ण की बात का उल्लंघन नहीं करेंगे।

श्लोक 49 (9.3.49)

एतत्क्षममहं मन्ये तव पार्थैरविग्रहम् । न त्वां ब्रवीमि कार्पण्यान्न प्राणपरिरक्षणात् ॥

etatkṣamamahaṃ manye tava pārthairavigraham | na tvāṃ bravīmi kārpaṇyānna prāṇaparirakṣaṇāt

मैं इसी को तुम्हारे लिए उचित मानता हूँ — पार्थों से कलह न रखना। मैं यह कायरता से नहीं कहता, और न प्राण बचाने के लिए।

श्लोक 50 (9.3.50)

पथ्यं राजन्ब्रवीमि त्वां तत्परासुः स्मरिष्यसि ॥

pathyaṃ rājanbravīmi tvāṃ tatparāsuḥ smariṣyasi

हे राजन्, मैं तुम्हारे हित की बात कहता हूँ; प्राण निकलते समय तुम इसे याद करोगे।

सञ्जय उवाच

श्लोक 51 (9.3.51)

इति वृद्धो विलप्यैतत्कृपः शारद्वतो वचः । दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य शुशोच च मुमोह च ॥

iti vṛddho vilapyaitatkṛpaḥ śāradvato vacaḥ | dīrghamuṣṇaṃ ca niḥśvasya śuśoca ca mumoha ca

इस प्रकार विलाप करके वृद्ध शारद्वत कृप ने लम्बी, गरम साँस ली, शोक किया और मूर्छित-से हो गए।

अध्याय 2अध्याय-सूचीअध्याय 4