शल्य पर्व · अध्याय 10
शल्य का आक्रमण और भीम की गदा
दोनों सेनाएँ एक-दूसरे को काट रही हैं; कौरव-सेना को डूबती देखकर शल्य पाण्डवों पर चढ़ आता है और भयंकर अपशकुन प्रकट होते हैं। वह युधिष्ठिर तथा अन्य पाण्डव योद्धाओं पर बाणों की वर्षा करता है, और कृतवर्मा, कृप, उलूक, शकुनि, अश्वत्थामा तथा दुर्योधन अनेक द्वन्द्व-युद्धों में जूझते हैं। घोड़े मारे जाने पर भीम गदा लेकर रथ से उतर पड़ता है और सहदेव शल्य के पुत्र को मार डालता है। शल्य भीम की छाती में तोमर गाड़ता है; भीम उसे निकालकर उसी से शल्य के सारथि का हृदय बेध देता है, और शल्य के पीछे हटने पर पाण्डव भीम का सम्मान करते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.10.1)
तस्मिन्विलुलिते सैन्ये वध्यमाने परस्परम् । द्रवमाणेषु योधेषु विद्रवत्सु च दन्तिषु ॥
tasminvilulite sainye vadhyamāne parasparam | dravamāṇeṣu yodheṣu vidravatsu ca dantiṣu
जब वह सेना अस्त-व्यस्त होकर एक-दूसरे के हाथों कट रही थी, योद्धा भाग रहे थे और हाथी भी भाग खड़े हुए थे,
श्लोक 2 (9.10.2)
कूजतां स्तनतां चैव पदातीनां महाहवे । निहतेषु महाराज हयेषु बहुधा तदा ॥
kūjatāṃ stanatāṃ caiva padātīnāṃ mahāhave | nihateṣu mahārāja hayeṣu bahudhā tadā
पैदल सैनिक महायुद्ध में चीख और कराह रहे थे और, हे महाराज, घोड़े अनेक प्रकार से मारे जा चुके थे,
श्लोक 3 (9.10.3)
प्रक्षये दारुणे घोरे संहारे सर्वदेहिनाम् । नानाशस्त्रसमावापे व्यतिषक्तरथद्विपे ॥
prakṣaye dāruṇe ghore saṃhāre sarvadehinām | nānāśastrasamāvāpe vyatiṣaktarathadvipe
समस्त प्राणियों के उस भयंकर, दारुण संहार में, जहाँ नाना शस्त्रों की टक्कर हो रही थी और रथ तथा हाथी उलझे हुए थे,
श्लोक 4 (9.10.4)
हर्षणे युद्धशौण्डानां भीरूणां भयवर्धने । गाहमानेषु योधेषु परस्परवधैषिषु ॥
harṣaṇe yuddhaśauṇḍānāṃ bhīrūṇāṃ bhayavardhane | gāhamāneṣu yodheṣu parasparavadhaiṣiṣu
जो युद्ध-प्रेमियों को हर्ष देने वाला और भीरुओं का भय बढ़ाने वाला था, जब योद्धा एक-दूसरे के वध की इच्छा से भिड़ रहे थे,
श्लोक 5 (9.10.5)
प्राणादाने महाघोरे वर्तमाने दुरोदरे । सङ्ग्रामे घोररूपे तु यमराष्ट्रविवर्धने ॥
prāṇādāne mahāghore vartamāne durodare | saṅgrāme ghorarūpe tu yamarāṣṭravivardhane
प्राणों के उस अत्यन्त घोर हरण में, जब यह द्यूत चल रहा था, उस भयावह संग्राम में जो यमराज के राज्य को बढ़ा रहा था,
श्लोक 6 (9.10.6)
पाण्डवास्तावकं सैन्यं व्यधमन्निशितैः शरैः । तथैव तावका योधा जघ्नुः पाण्डवसैनिकान् ॥
pāṇḍavāstāvakaṃ sainyaṃ vyadhamanniśitaiḥ śaraiḥ | tathaiva tāvakā yodhā jaghnuḥ pāṇḍavasainikān
पाण्डव तीखे बाणों से आपकी सेना को काट रहे थे और उसी प्रकार आपके योद्धा पाण्डव-सैनिकों को मार रहे थे।
श्लोक 7 (9.10.7)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने युद्धे भीरुभयावहे । पूर्वाह्णे चापि सम्प्राप्ते भास्करोदयनं प्रति ॥
tasmiṃstathā vartamāne yuddhe bhīrubhayāvahe | pūrvāhṇe cāpi samprāpte bhāskarodayanaṃ prati
भीरुओं को भयभीत करने वाला वह युद्ध जब इस प्रकार चल रहा था और सूर्य के चढ़ते हुए पूर्वाह्न आ पहुँचा,
श्लोक 8 (9.10.8)
लब्धलक्षाः परे राजन्रक्षितास्तु महात्मना । अयोधयंस्तव बलं मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
labdhalakṣāḥ pare rājanrakṣitāstu mahātmanā | ayodhayaṃstava balaṃ mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
तब हे राजन्, लक्ष्य साध लेने वाले शत्रु, उस महात्मा से रक्षित होकर, मृत्यु को ही लौटने की सीमा बनाकर आपकी सेना से लड़ रहे थे।
श्लोक 9 (9.10.9)
बलिभिः पाण्डवैर्दृप्तैर्लब्धलक्षैः प्रहारिभिः । कौरव्यसीदत्पृतना मृगीवाग्निभयाकुला ॥
balibhiḥ pāṇḍavairdṛptairlabdhalakṣaiḥ prahāribhiḥ | kauravyasīdatpṛtanā mṛgīvāgnibhayākulā
बलवान्, दर्पित, अचूक निशाना लगाने वाले और कठोर प्रहार करने वाले पाण्डवों के सामने कौरव-सेना आग के भय से व्याकुल हरिणी की भाँति डूबने लगी।
श्लोक 10 (9.10.10)
तां दृष्ट्वा सीदतीं सेनां पङ्के गामिव दुर्बलाम् । उज्जिहीर्षुस्तदा शल्यः प्रायात्पाण्डुसुतान्प्रति ॥
tāṃ dṛṣṭvā sīdatīṃ senāṃ paṅke gāmiva durbalām | ujjihīrṣustadā śalyaḥ prāyātpāṇḍusutānprati
कीचड़ में फँसी दुर्बल गाय की तरह डूबती हुई उस सेना को देखकर उसे उबारने की इच्छा से शल्य तब पाण्डवों की ओर बढ़ा।
श्लोक 11 (9.10.11)
मद्रराजः सुसङ्क्रुद्धो गृहीत्वा धनुरुत्तमम् । अभ्यद्रवत सङ्ग्रामे पाण्डवानाततायिनः ॥
madrarājaḥ susaṅkruddho gṛhītvā dhanuruttamam | abhyadravata saṅgrāme pāṇḍavānātatāyinaḥ
मद्रराज ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपना उत्तम धनुष उठाया और युद्ध में आक्रमण करते हुए पाण्डवों पर टूट पड़ा।
श्लोक 12 (9.10.12)
पाण्डवा अपि भूपाल समरे जितकाशिनः । मद्रराजं समासाद्य बिभिदुर्निशितैः शरैः ॥
pāṇḍavā api bhūpāla samare jitakāśinaḥ | madrarājaṃ samāsādya bibhidurniśitaiḥ śaraiḥ
हे राजन्, विजय के मद में चूर पाण्डवों ने भी रण में मद्रराज के निकट पहुँचकर उसे तीखे बाणों से बींध दिया।
श्लोक 13 (9.10.13)
ततः शरशतैस्तीक्ष्णैर्मद्रराजो महारथः । अर्दयामास तां सेनां धर्मराजस्य पश्यतः ॥
tataḥ śaraśataistīkṣṇairmadrarājo mahārathaḥ | ardayāmāsa tāṃ senāṃ dharmarājasya paśyataḥ
तब महारथी मद्रराज ने सैकड़ों तीखे बाणों से धर्मराज के देखते-देखते उस सेना को पीड़ित किया।
श्लोक 14 (9.10.14)
प्रादुरासन्निमित्तानि नानारूपाण्यनेकशः । चचाल शब्दं कुर्वाणा मही चापि सपर्वता ॥
prādurāsannimittāni nānārūpāṇyanekaśaḥ | cacāla śabdaṃ kurvāṇā mahī cāpi saparvatā
हे राजन्, तब अनेक रूपों वाले बहुत-से अपशकुन प्रकट हुए और पर्वतों सहित पृथ्वी भी गड़गड़ाहट करती हुई काँप उठी।
श्लोक 15 (9.10.15)
सदण्डशूला दीप्ताग्रा दीर्यमाणाः समन्ततः । उल्का भूमिं दिवः पेतुराहत्य रविमण्डलम् ॥
sadaṇḍaśūlā dīptāgrā dīryamāṇāḥ samantataḥ | ulkā bhūmiṃ divaḥ peturāhatya ravimaṇḍalam
डण्डों और शूलों के आकार की, नोकों पर दहकती हुई उल्काएँ चारों ओर टूट-टूटकर सूर्यमण्डल से टकराकर आकाश से पृथ्वी पर गिरीं।
श्लोक 16 (9.10.16)
मृगाश्च महिषाश्चापि पक्षिणश्च विशाम्पते । अपसव्यं तदा चक्रुः सेनां ते बहुशो नृप ॥
mṛgāśca mahiṣāścāpi pakṣiṇaśca viśāmpate | apasavyaṃ tadā cakruḥ senāṃ te bahuśo nṛpa
हे प्रजापालक, हरिण, भैंसे और पक्षी भी बार-बार सेना को अपने बायीं ओर रखकर अशुभ रीति से उसकी परिक्रमा करने लगे, हे राजन्।
श्लोक 17 (9.10.17)
भृगुसूनुधरापुत्रौ शशिजेन समन्वितौ । चरमं पाण्डुपुत्राणां पुरस्तात्सर्वभूभुजाम् ॥
bhṛgusūnudharāputrau śaśijena samanvitau | caramaṃ pāṇḍuputrāṇāṃ purastātsarvabhūbhujām
भृगुपुत्र और पृथ्वीपुत्र, चन्द्रपुत्र के साथ मिलकर, पाण्डवों के पीछे और सब राजाओं के आगे स्थित थे।
श्लोक 18 (9.10.18)
शस्त्राग्रेष्वभवज्ज्वाला नेत्राण्याहत्य वर्षती । शिरः स्वलीयन्त भृशं काकोलूकाश्च केतुषु ॥
śastrāgreṣvabhavajjvālā netrāṇyāhatya varṣatī | śiraḥ svalīyanta bhṛśaṃ kākolūkāśca ketuṣu
शस्त्रों की नोकों पर ज्वाला उठी, जो बरसते हुए आँखों से टकराती थी; और कौओं तथा उल्लुओं के झुंड सिरों और ध्वजाओं पर आकर बैठ गए।
श्लोक 19 (9.10.19)
ततस्तद्युद्धमत्युग्रमभवत्सहचारिणाम् । तथा सर्वाण्यनीकानि सन्निपत्य जनाधिप ॥
tatastadyuddhamatyugramabhavatsahacāriṇām | tathā sarvāṇyanīkāni sannipatya janādhipa
तब साथ-साथ लड़ने वाले योद्धाओं का वह युद्ध अत्यन्त उग्र हो गया, हे जनाधिप, क्योंकि सब सेनाएँ परस्पर भिड़ गई थीं।
श्लोक 20 (9.10.20)
अभ्यघ्नत्कौरवो राजा पाण्डवानामनीकिनीम् । शल्यस्तु शरवर्षेण वर्षन्निव सहस्रदृक् ॥
abhyaghnatkauravo rājā pāṇḍavānāmanīkinīm | śalyastu śaravarṣeṇa varṣanniva sahasradṛk
कौरव राजा ने पाण्डव-सेना पर प्रहार किया; और शल्य ने सहस्रनेत्र इन्द्र की भाँति बाणों की वर्षा करते हुए
श्लोक 21 (9.10.21)
अभ्यवर्षत धर्मात्मा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । भीमसेनं शरैश्चापि रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ॥
abhyavarṣata dharmātmā kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram | bhīmasenaṃ śaraiścāpi rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ
धर्मात्मा होकर कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर पर तथा सोने के पंख वाले, पत्थर पर तेज किए हुए बाणों से भीमसेन पर वर्षा की,
श्लोक 22 (9.10.22)
द्रौपदेयांस्तथा सर्वान्माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । धृष्टद्युम्नं च शैनेयं शिखण्डिनमथापि च ॥
draupadeyāṃstathā sarvānmādrīputrau ca pāṇḍavau | dhṛṣṭadyumnaṃ ca śaineyaṃ śikhaṇḍinamathāpi ca
और द्रौपदी के सब पुत्रों, माद्री के दोनों पाण्डव पुत्रों, धृष्टद्युम्न, शैनेय और शिखण्डी पर भी,
श्लोक 23 (9.10.23)
एकैकं दशभिर्बाणैर्विव्याध स महाबलः । ततोऽसृजद्बाणवर्षं घर्मान्ते मघवानिव ॥
ekaikaṃ daśabhirbāṇairvivyādha sa mahābalaḥ | tato'sṛjadbāṇavarṣaṃ gharmānte maghavāniva
उस महाबली ने एक-एक को दस-दस बाणों से बींध दिया; फिर ग्रीष्म के अन्त में इन्द्र की तरह उसने बाणों की वर्षा की।
श्लोक 24 (9.10.24)
ततः प्रभद्रका राजन्सोमकाश्च सहस्रशः । पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्ते शल्यसायकैः ॥
tataḥ prabhadrakā rājansomakāśca sahasraśaḥ | patitāḥ pātyamānāśca dṛśyante śalyasāyakaiḥ
तब हे राजन्, प्रभद्रक और सोमक हज़ारों की संख्या में शल्य के बाणों से गिरे और गिराए जाते दिखाई दिए।
श्लोक 25 (9.10.25)
भ्रमराणामिव व्राताः शलभानामिव व्रजाः । हादिन्य इव मेघेभ्यः शल्यस्य न्यपतञ्शराः ॥
bhramarāṇāmiva vrātāḥ śalabhānāmiva vrajāḥ | hādinya iva meghebhyaḥ śalyasya nyapatañśarāḥ
भौंरों के झुंडों की तरह, टिड्डियों के दलों की तरह और बादलों से गिरती बिजलियों की तरह शल्य के बाण गिरने लगे।
श्लोक 26 (9.10.26)
द्विरदास्तुरगाश्चार्ताः पत्तयो रथिनस्तथा । शल्यस्य बाणैरपतन्बभ्रमुर्व्यनदंस्तथा ॥
dviradāsturagāścārtāḥ pattayo rathinastathā | śalyasya bāṇairapatanbabhramurvyanadaṃstathā
हाथी, पीड़ित घोड़े, पैदल सैनिक और रथी शल्य के बाणों से गिरते थे, चक्कर खाते थे और चिल्लाते थे।
श्लोक 27 (9.10.27)
आविष्ट इव मद्रेशो मन्युना पौरुषेण च । प्राच्छादयदरीन्सङ्ख्ये कालसृष्ट इवान्तकः । विनर्दमानो मद्रेशो मेघहादो महाबलः ॥
āviṣṭa iva madreśo manyunā pauruṣeṇa ca | prācchādayadarīnsaṅkhye kālasṛṣṭa ivāntakaḥ | vinardamāno madreśo meghahādo mahābalaḥ
मानो क्रोध और पौरुष से आविष्ट मद्रराज रण में शत्रुओं को काल द्वारा छोड़े गए यमराज की तरह ढकता जाता था; वह महाबली बादल की गर्जना के समान दहाड़ रहा था।
श्लोक 28 (9.10.28)
सा वध्यमाना शल्येन पाण्डवानामनीकिनी । अजातशत्रुं कौन्तेयमभ्यधावद्युधिष्ठिरम् ॥
sā vadhyamānā śalyena pāṇḍavānāmanīkinī | ajātaśatruṃ kaunteyamabhyadhāvadyudhiṣṭhiram
शल्य से मारी जाती हुई वह पाण्डव-सेना अजातशत्रु कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की ओर दौड़ी।
श्लोक 29 (9.10.29)
तां सम्मर्द्य शतैः सङ्ख्ये लघुहस्तः शितैः शरैः । बाणवर्षेण महता युधिष्ठिरमताडयत् ॥
tāṃ sammardya śataiḥ saṅkhye laghuhastaḥ śitaiḥ śaraiḥ | bāṇavarṣeṇa mahatā yudhiṣṭhiramatāḍayat
रण में सैकड़ों तीखे बाणों से उसे कुचलकर फुर्तीले हाथों वाले शल्य ने बाणों की भारी वर्षा से युधिष्ठिर को पीटा।
श्लोक 30 (9.10.30)
तमापतन्तं जात्यश्वैः क्रुद्धो राजा युधिष्ठिरः । अवारयच्छरैस्तीक्ष्णैर्महाद्विपमिवाङ्कुशैः ॥
tamāpatantaṃ jātyaśvaiḥ kruddho rājā yudhiṣṭhiraḥ | avārayaccharaistīkṣṇairmahādvipamivāṅkuśaiḥ
अपने जातिवन्त घोड़ों के साथ आते हुए उस पर क्रुद्ध राजा युधिष्ठिर ने तीखे बाणों से रोक लगाई, जैसे अंकुशों से बड़े हाथी को रोका जाता है।
श्लोक 31 (9.10.31)
तस्य शल्यः शरं घोरं मुमोचाशीविषोपमम् । सोऽभ्यविध्यन्महात्मानं वेगेनाभ्यपतच्च गाम् ॥
tasya śalyaḥ śaraṃ ghoraṃ mumocāśīviṣopamam | so'bhyavidhyanmahātmānaṃ vegenābhyapatacca gām
शल्य ने उस पर विषैले सर्प के समान घोर बाण छोड़ा; वह महात्मा को बेधकर वेग से पृथ्वी में जा गिरा।
श्लोक 32 (9.10.32)
ततो वृकोदरः क्रुद्धः शल्यं विव्याध सप्तभिः । पञ्चभिः सहदेवस्तु नकुलो दशभिः शरैः ॥
tato vṛkodaraḥ kruddhaḥ śalyaṃ vivyādha saptabhiḥ | pañcabhiḥ sahadevastu nakulo daśabhiḥ śaraiḥ
तब क्रुद्ध वृकोदर ने शल्य को सात बाणों से, सहदेव ने पाँच से और नकुल ने दस बाणों से बींधा।
श्लोक 33 (9.10.33)
द्रौपदेयाश्च शत्रुघ्नं शूरमार्तायनिं शरैः । अभ्यवर्षन्महाराज मेघा इव महीधरम् ॥
draupadeyāśca śatrughnaṃ śūramārtāyaniṃ śaraiḥ | abhyavarṣanmahārāja meghā iva mahīdharam
और द्रौपदी के पुत्रों ने शत्रुनाशक, शूर आर्तायनि (शल्य) पर, हे महाराज, बाणों की वर्षा की, जैसे बादल पर्वत पर बरसते हैं।
श्लोक 34 (9.10.34)
ततो दृष्ट्वा वार्यमाणं शल्यं पार्थैः समन्ततः । कृतवर्मा कृपश्चैव सङ्क्रुद्धावभ्यधावताम् ॥
tato dṛṣṭvā vāryamāṇaṃ śalyaṃ pārthaiḥ samantataḥ | kṛtavarmā kṛpaścaiva saṅkruddhāvabhyadhāvatām
तब शल्य को पार्थों द्वारा चारों ओर से रोका जाता देखकर कृतवर्मा और कृप क्रुद्ध होकर उसकी ओर दौड़े।
श्लोक 35 (9.10.35)
उलूकश्च महावीर्यः शकुनिश्चापि सौबलः । समागम्याथ शनकैरश्वत्थामा महाबलः । तव पुत्राश्च कार्त्स्न्येन जुगुपुः शल्यमाहवे ॥
ulūkaśca mahāvīryaḥ śakuniścāpi saubalaḥ | samāgamyātha śanakairaśvatthāmā mahābalaḥ | tava putrāśca kārtsnyena jugupuḥ śalyamāhave
महापराक्रमी उलूक, सुबलपुत्र शकुनि, और फिर धीरे-धीरे आकर महाबली अश्वत्थामा तथा आपके पुत्रों ने सब मिलकर युद्ध में शल्य की रक्षा की।
श्लोक 36 (9.10.36)
भीमसेनं त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्मा शिलीमुखैः । बाणवर्षेण महता क्रुद्धरूपमवारयत् । धृष्टद्युम्नं ततः क्रुद्धो बाणवर्षैरपीडयत् ॥
bhīmasenaṃ tribhirviddhvā kṛtavarmā śilīmukhaiḥ | bāṇavarṣeṇa mahatā kruddharūpamavārayat | dhṛṣṭadyumnaṃ tataḥ kruddho bāṇavarṣairapīḍayat
कृतवर्मा ने तीन बाणों से भीमसेन को बींधकर बाणों की बड़ी वर्षा से क्रुद्ध भीम को रोका; फिर क्रोध में आकर उसने बाणों की वर्षा से धृष्टद्युम्न को पीड़ित किया।
श्लोक 37 (9.10.37)
द्रौपदेयांश्च शकुनिर्यमौ च द्रौणिरभ्ययात् ॥
draupadeyāṃśca śakuniryamau ca drauṇirabhyayāt
शकुनि द्रौपदी के पुत्रों पर और द्रोणपुत्र दोनों जुड़वाँ भाइयों पर चढ़ आया।
श्लोक 38 (9.10.38)
दुर्योधनो युधांश्रेष्ठ आहवे केशवार्जुनौ । समभ्ययादुग्रतेजाः शरैश्चाप्यहनद्बली ॥
duryodhano yudhāṃśreṣṭha āhave keśavārjunau | samabhyayādugratejāḥ śaraiścāpyahanadbalī
योद्धाओं में श्रेष्ठ, उग्र तेज वाले दुर्योधन ने युद्ध में केशव और अर्जुन पर आक्रमण किया और उस बलवान् ने उन्हें बाणों से घायल किया।
श्लोक 39 (9.10.39)
एवं द्वन्द्वशतान्यासंस्त्वदीयानां परैः सह । घोररूपाणि चित्राणि तत्रतत्र विशाम्पते ॥
evaṃ dvandvaśatānyāsaṃstvadīyānāṃ paraiḥ saha | ghorarūpāṇi citrāṇi tatratatra viśāmpate
इस प्रकार, हे प्रजापालक, आपके पक्ष के योद्धाओं के शत्रुओं के साथ वहाँ-वहाँ सैकड़ों विचित्र और भयंकर द्वन्द्व-युद्ध हुए।
श्लोक 40 (9.10.40)
ऋक्षवर्णाञ्जघानाश्वान्भोजो भीमस्य संयुगे । सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वात्पाण्डुनन्दनः । कालो दण्डमिवोद्यम्य गदापाणिरयुध्यत ॥
ṛkṣavarṇāñjaghānāśvānbhojo bhīmasya saṃyuge | so'vatīrya rathopasthāddhatāśvātpāṇḍunandanaḥ | kālo daṇḍamivodyamya gadāpāṇirayudhyata
रण में भोज (कृतवर्मा) ने भीम के भूरे रंग के घोड़े मार डाले। तब घोड़े मारे जाने पर पाण्डुपुत्र रथ के पिछले भाग से उतर गया और यमराज के दण्ड की तरह गदा उठाकर हाथ में गदा लिए लड़ने लगा।
श्लोक 41 (9.10.41)
प्रमुखे सहदेवस्य जघानाश्वान्स मद्रराट् । ततः शल्यस्य तनयं सहदेवोऽसिनावधीत् ॥
pramukhe sahadevasya jaghānāśvānsa madrarāṭ | tataḥ śalyasya tanayaṃ sahadevo'sināvadhīt
मद्रराज ने सहदेव के सामने उसके घोड़े मार डाले; तब सहदेव ने तलवार से शल्य के पुत्र को मार गिराया।
श्लोक 42 (9.10.42)
गौतमः पुनराचार्यो धृष्टद्युम्नमयोधयत् । असम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तो यत्नवान्यत्नवत्तरम् ॥
gautamaḥ punarācāryo dhṛṣṭadyumnamayodhayat | asambhrāntamasambhrānto yatnavānyatnavattaram
गौतम (कृपाचार्य) फिर धृष्टद्युम्न से लड़ने लगे, अविचल से अविचल, प्रयत्नशील से और अधिक प्रयत्नशील।
श्लोक 43 (9.10.43)
द्रौपदेयांस्तथा वीरानेकैकं दशभिः शरैः । अविध्यदाचार्यसुतो नातिक्रुद्धो हसन्निव ॥
draupadeyāṃstathā vīrānekaikaṃ daśabhiḥ śaraiḥ | avidhyadācāryasuto nātikruddho hasanniva
और आचार्य-पुत्र ने अधिक क्रुद्ध न होकर मानो हँसते हुए द्रौपदी के प्रत्येक वीर पुत्र को दस-दस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 44 (9.10.44)
पुनश्च भीमसेनस्य जघानाश्वांस्तथाऽऽहवे । सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं हताश्वः पाण्डुनन्दनः ॥
punaśca bhīmasenasya jaghānāśvāṃstathā''have | so'vatīrya rathāttūrṇaṃ hatāśvaḥ pāṇḍunandanaḥ
और फिर उसने रण में भीमसेन के घोड़े मार डाले; घोड़े मारे जाने पर पाण्डुपुत्र शीघ्र रथ से कूद पड़ा,
श्लोक 45 (9.10.45)
कालो दण्डमिवोद्यम्य गदां क्रुद्धो महाबलः । पोथयामास तुरगान्रथं च कृतवर्मणः । कृतवर्मा त्ववप्लुत्य रथात्तस्मादपाक्रमत् ॥
kālo daṇḍamivodyamya gadāṃ kruddho mahābalaḥ | pothayāmāsa turagānrathaṃ ca kṛtavarmaṇaḥ | kṛtavarmā tvavaplutya rathāttasmādapākramat
और क्रुद्ध उस महाबली ने यमराज के दण्ड की तरह गदा उठाकर कृतवर्मा के घोड़ों और रथ को चूर कर दिया; कृतवर्मा उस रथ से कूदकर हट गया।
श्लोक 46 (9.10.46)
शल्योऽपि राजन्सङ्क्रुद्धो निघ्नन्सोमकपाण्डवान् । पुनरेव शितैर्बाणैर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥
śalyo'pi rājansaṅkruddho nighnansomakapāṇḍavān | punareva śitairbāṇairyudhiṣṭhiramapīḍayat
हे राजन्, शल्य भी क्रुद्ध होकर सोमकों और पाण्डवों को मारता हुआ फिर तीखे बाणों से युधिष्ठिर को पीड़ित करने लगा।
श्लोक 47 (9.10.47)
तस्य भीमो रणे क्रुद्धः सन्दश्य दशनच्छदम् । विनाशायाभिसन्धाय गदामादाय वीर्यवान् ॥
tasya bhīmo raṇe kruddhaḥ sandaśya daśanacchadam | vināśāyābhisandhāya gadāmādāya vīryavān
तब रण में क्रुद्ध भीम ने होंठ चबाते हुए उसका नाश करने का निश्चय किया और वह पराक्रमी गदा लेकर आगे बढ़ा,
श्लोक 48 (9.10.48)
यमदण्डप्रतीकाशां कालरात्रिमिवोद्यताम् । गजवाजिमनुष्याणां देहान्तकरणीमपि ॥
yamadaṇḍapratīkāśāṃ kālarātrimivodyatām | gajavājimanuṣyāṇāṃ dehāntakaraṇīmapi
जो यमराज के दण्ड-जैसी थी, उठाई हुई कालरात्रि के समान थी और हाथियों, घोड़ों तथा मनुष्यों के शरीरों का अन्त कर देने वाली थी,
श्लोक 49 (9.10.49)
हेमपट्टपरिक्षिप्तामुल्कां प्रज्वलितामिव । शैक्यां व्यालीमिवात्युग्रां वज्रकल्पामयोमयीम् ॥
hemapaṭṭaparikṣiptāmulkāṃ prajvalitāmiva | śaikyāṃ vyālīmivātyugrāṃ vajrakalpāmayomayīm
सोने की पट्टियों से मढ़ी हुई, जलती उल्का-सी, रस्सी के जाल में लटकी भयंकर सर्पिणी-सी उग्र, वज्र के समान कठोर और पूरी लोहे की बनी हुई,
श्लोक 50 (9.10.50)
चन्दनागुरुपङ्काक्तां प्रमदामीप्सितामिव । वसामेदोपदिग्धाङ्गीं जिह्वां वैवस्वतीमिव ॥
candanāgurupaṅkāktāṃ pramadāmīpsitāmiva | vasāmedopadigdhāṅgīṃ jihvāṃ vaivasvatīmiva
चन्दन और अगरु के लेप से सजी, प्रिय स्त्री की तरह, फिर भी चर्बी और मज्जा से लिपटी हुई, वैवस्वत यम की जीभ के समान,
श्लोक 51 (9.10.51)
पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव । निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि ॥
paṭughaṇṭāśataravāṃ vāsavīmaśanīmiva | nirmuktāśīviṣākārāṃ pṛktāṃ gajamadairapi
सैकड़ों तीखी घण्टियों के नाद वाली, इन्द्र के वज्र के समान, केंचुली छोड़े सर्प के आकार की, हाथियों के मद से सनी हुई,
श्लोक 52 (9.10.52)
त्रासनीं सर्वभूतानां स्वसैन्यपरिहर्षिणीम् । मनुष्यलोके विख्यातां गिरिशृङ्गविदारणीम् ॥
trāsanīṃ sarvabhūtānāṃ svasainyapariharṣiṇīm | manuṣyaloke vikhyātāṃ giriśṛṅgavidāraṇīm
सब प्राणियों को त्रास देने वाली, अपनी सेना को हर्ष देने वाली, मनुष्यलोक में विख्यात और पर्वत-शिखरों को चीर देने वाली,
श्लोक 53 (9.10.53)
यया कैलासभवने महेश्वरसखं बली । आह्वयामास कौन्तेयः सङ्क्रुद्धमलकाधिपम् ॥
yayā kailāsabhavane maheśvarasakhaṃ balī | āhvayāmāsa kaunteyaḥ saṅkruddhamalakādhipam
जिस गदा से कैलास में बलवान् कुन्तीपुत्र ने महेश्वर के सखा, क्रुद्ध अलकापति कुबेर को ललकारा था,
श्लोक 54 (9.10.54)
यया मायामयान्दृप्तान्सुबहून्धनदालये । जघान गुह्यकान्क्रुद्धो मन्दारार्थे महाबलः । निवार्यमाणो बहुभिर्द्रौपद्याः प्रियमास्थितः ॥
yayā māyāmayāndṛptānsubahūndhanadālaye | jaghāna guhyakānkruddho mandārārthe mahābalaḥ | nivāryamāṇo bahubhirdraupadyāḥ priyamāsthitaḥ
जिससे उसने धनद के भवन में मन्दार-पुष्पों के लिए बहुत-से दर्पित, माया-बल वाले गुह्यकों को क्रोध में मार डाला था, यद्यपि बहुतों ने उसे रोका था, क्योंकि वह द्रौपदी का प्रिय करने में लगा था।
श्लोक 55 (9.10.55)
तां वज्रमणिरत्नौघकल्माषां वज्रगौरवाम् । समुद्यम्य महाबाहुः शल्यमभ्यपतद्रणे ॥
tāṃ vajramaṇiratnaughakalmāṣāṃ vajragauravām | samudyamya mahābāhuḥ śalyamabhyapatadraṇe
हीरों, मणियों और रत्नों के समूहों से झिलमिलाती और वज्र के समान भारी उस गदा को उठाकर महाबाहु भीम रण में शल्य पर टूट पड़ा।
श्लोक 56 (9.10.56)
गदया युद्धकुशलस्तया दारुणनादया । पोथयामास शल्यस्य चतुरोऽश्वान्महाजवान् ॥
gadayā yuddhakuśalastayā dāruṇanādayā | pothayāmāsa śalyasya caturo'śvānmahājavān
गदा-युद्ध में निपुण उसने उस भयंकर नाद वाली गदा से शल्य के चारों महावेगवान् घोड़ों को चूर-चूर कर दिया।
श्लोक 57 (9.10.57)
ततः शल्यो रणे क्रुद्धः पीने वक्षसि तोमरम् । निचखान नदन्वीरोवर्म भित्त्वा च सोऽभ्ययात् ॥
tataḥ śalyo raṇe kruddhaḥ pīne vakṣasi tomaram | nicakhāna nadanvīrovarma bhittvā ca so'bhyayāt
तब रण में क्रुद्ध शल्य ने गर्जना करते हुए भीम की चौड़ी छाती में तोमर गाड़ दिया; वह वीर कवच को भेदकर आगे बढ़ा।
श्लोक 58 (9.10.58)
वृकोदरस्त्वसम्भ्रान्तस्तमेवोद्धृत्य तोमरम् । यन्तारं मद्रराजस्य निर्बिभेद तदा हृदि ॥
vṛkodarastvasambhrāntastamevoddhṛtya tomaram | yantāraṃ madrarājasya nirbibheda tadā hṛdi
किन्तु अविचलित वृकोदर ने उसी तोमर को खींचकर उससे मद्रराज के सारथि का हृदय बेध दिया।
श्लोक 59 (9.10.59)
स भिन्नवर्मा रुधिरं वमन्वित्रस्तमानसः । पपाताभिमुखो भीमं मद्रराजस्त्वपाक्रमत् ॥
sa bhinnavarmā rudhiraṃ vamanvitrastamānasaḥ | papātābhimukho bhīmaṃ madrarājastvapākramat
कवच फटा हुआ, रक्त वमन करता हुआ, भय से व्याकुल चित्त वह भीम की ओर मुख किए गिर पड़ा; और मद्रराज पीछे हट गया।
श्लोक 60 (9.10.60)
कृतप्रतिकृतं दृष्ट्वा शल्यो विस्मितमानसः । गदामाश्रित्य धर्मात्मा प्रत्यमित्रमवैक्षत ॥
kṛtapratikṛtaṃ dṛṣṭvā śalyo vismitamānasaḥ | gadāmāśritya dharmātmā pratyamitramavaikṣata
प्रहार का बदले में प्रहार देखकर विस्मित चित्त शल्य ने, धर्मात्मा होकर, गदा का सहारा लेकर शत्रु की ओर देखा।
श्लोक 61 (9.10.61)
ततः सुमनसः पार्था भीमसेनमपूजयन् । ते दृष्ट्वा कर्म सङ्ग्रामे घोरमक्लिष्टकर्मणः ॥
tataḥ sumanasaḥ pārthā bhīmasenamapūjayan | te dṛṣṭvā karma saṅgrāme ghoramakliṣṭakarmaṇaḥ
तब प्रसन्न-चित्त पार्थों ने अक्लिष्टकर्मा भीमसेन का वह घोर कर्म रण में देखकर उसका सम्मान किया।