शल्य पर्व · अध्याय 13
अर्जुन और अश्वत्थामा का युद्ध; सुरथ का वध
सञ्जय बताते हैं कि अश्वत्थामा और त्रिगर्त योद्धाओं के आक्रमण पर अर्जुन कौरव-सेना को बाणों से ढक देता है और रणभूमि टूटे रथों तथा कटे अंगों से पट जाती है। फिर अश्वत्थामा द्वन्द्व-युद्ध में उसके सामने आता है; अर्जुन उसका रथ तोड़ देता है और उसके फेंके लोहे के मूसल और परिघ को टुकड़े-टुकड़े कर देता है। पाञ्चाल सुरथ के टूट पड़ने पर अश्वत्थामा एक बाण से उसे मार डालता है और संशप्तकों से घिरा हुआ मध्याह्न तक अर्जुन से लड़ता रहता है।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.13.1)
अर्जुनो द्रौणिना विद्धो युद्धे बहुभिरायसैः । तस्य चानुचरैः शूरैस्त्रिगर्तानां महारथैः ॥
arjuno drauṇinā viddho yuddhe bahubhirāyasaiḥ | tasya cānucaraiḥ śūraistrigartānāṃ mahārathaiḥ
अर्जुन युद्ध में द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) के बहुत-से लोहे के बाणों से और उसके शूर अनुचरों—त्रिगर्तों के महारथियों—से बींधा गया।
श्लोक 2 (9.13.2)
द्रौणिं विव्याध समरे त्रिभिरेव शिलीमुखैः । तथेतरान्महेष्वासान्द्वाभ्यां द्वाभ्यां धनञ्जयः । भूयश्चैव महाराज शरवर्षैरवाकिरत् ॥
drauṇiṃ vivyādha samare tribhireva śilīmukhaiḥ | tathetarānmaheṣvāsāndvābhyāṃ dvābhyāṃ dhanañjayaḥ | bhūyaścaiva mahārāja śaravarṣairavākirat
धनञ्जय ने रण में द्रोणपुत्र को केवल तीन बाणों से बींधा और दूसरे महाधनुर्धरों को दो-दो बाणों से; और हे महाराज, उसने फिर भी उन पर बाणों की वर्षा कर दी।
श्लोक 3 (9.13.3)
शरकण्टकितास्ते तु तावका भरतर्षभ । न जहुः पार्थमासाद्य ताड्यमानाः शितैः शरैः ॥
śarakaṇṭakitāste tu tāvakā bharatarṣabha | na jahuḥ pārthamāsādya tāḍyamānāḥ śitaiḥ śaraiḥ
हे भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे सैनिक बाणों के काँटों से बिंधे होने पर भी, तीखे बाणों से मारे जाते हुए, पार्थ के पास पहुँचकर उसे छोड़कर नहीं हटे।
श्लोक 4 (9.13.4)
अर्जुनं रथवंशेन द्रोणपुत्रपुरोगमाः । परिवार्य मुदा युक्ता योधयन्तश्चकाशिरे ॥
arjunaṃ rathavaṃśena droṇaputrapurogamāḥ | parivārya mudā yuktā yodhayantaścakāśire
द्रोणपुत्र को आगे करके रथों की पंक्ति ने अर्जुन को घेर लिया, और हर्ष से भरे हुए वे लड़ते हुए शोभित हो रहे थे।
श्लोक 5 (9.13.5)
तैस्तु क्षिप्ताः शरा राजन्कार्तस्वरविभूषिताः । अर्जुनस्य रथोपस्थं पूरयामासुरञ्जसा ॥
taistu kṣiptāḥ śarā rājankārtasvaravibhūṣitāḥ | arjunasya rathopasthaṃ pūrayāmāsurañjasā
हे राजन्! उनके छोड़े हुए, सोने से सजे बाणों ने देखते-देखते अर्जुन के रथ का भीतरी भाग भर दिया।
श्लोक 6 (9.13.6)
तथा कृष्णौ महेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् । विव्यधुश्च शरैर्घोरैः प्रहृष्टा युद्धदुर्मदाः ॥
tathā kṛṣṇau maheṣvāsau vṛṣabhau sarvadhanvinām | vivyadhuśca śarairghoraiḥ prahṛṣṭā yuddhadurmadāḥ
इसी प्रकार उन्होंने, युद्ध के मद में उन्मत्त और हर्षित होकर, समस्त धनुर्धारियों में श्रेष्ठ उन दोनों महाधनुर्धर कृष्णों (कृष्ण और अर्जुन) को भयंकर बाणों से बींध दिया।
श्लोक 7 (9.13.7)
कूबरं रथचक्राणि ईषा योक्त्राणि वा विभो । युगं चैवानुकर्षं च शरभूतमभूत्तदा ॥
kūbaraṃ rathacakrāṇi īṣā yoktrāṇi vā vibho | yugaṃ caivānukarṣaṃ ca śarabhūtamabhūttadā
हे विभो! रथ का अगला दण्ड, पहिये, ईषा-दण्ड, जोतने की रस्सियाँ, जुआ और अनुकर्ष—सब उस समय बाणमय हो गए थे।
श्लोक 8 (9.13.8)
नैतादृशं दृष्टपूर्वं राजन्नेव च नः श्रुतम् । यादृशं तत्र पार्थस्य तावकाः सम्प्रचक्रिरे ॥
naitādṛśaṃ dṛṣṭapūrvaṃ rājanneva ca naḥ śrutam | yādṛśaṃ tatra pārthasya tāvakāḥ sampracakrire
हे राजन्! जैसा कार्य तुम्हारे योद्धाओं ने वहाँ पार्थ के प्रति किया, वैसा न पहले कभी देखा गया और न हमने सुना।
श्लोक 9 (9.13.9)
स रथः सर्वतो भाति चित्रपुङ्खैः शितैः शरैः । उल्काशतैः सम्प्रदीप्तं विमानमिव भूतले ॥
sa rathaḥ sarvato bhāti citrapuṅkhaiḥ śitaiḥ śaraiḥ | ulkāśataiḥ sampradīptaṃ vimānamiva bhūtale
चमकीले पंखों वाले तीखे बाणों से चारों ओर बिंधा हुआ वह रथ सैकड़ों उल्काओं से दीप्त, पृथ्वी पर उतरे हुए विमान के समान शोभित हो रहा था।
श्लोक 10 (9.13.10)
ततोऽर्जुनो महाराज शरैः सन्नतपर्वभिः । अवाकिरत्तां पृतनां मेघो वृष्ट्येव पर्वतम् ॥
tato'rjuno mahārāja śaraiḥ sannataparvabhiḥ | avākirattāṃ pṛtanāṃ megho vṛṣṭyeva parvatam
हे महाराज! तब अर्जुन ने झुकी हुई गाँठों वाले बाणों से उस सेना को वैसे ही ढक दिया जैसे बादल वर्षा से पर्वत को ढक देता है।
श्लोक 11 (9.13.11)
ते वध्यमानाः समरे पार्थनामाङ्कितैः शरैः । पार्थभूतममन्यन्त प्रेक्षमाणास्तथाविधम् ॥
te vadhyamānāḥ samare pārthanāmāṅkitaiḥ śaraiḥ | pārthabhūtamamanyanta prekṣamāṇāstathāvidham
पार्थ के नाम से अंकित बाणों से रण में मारे जाते हुए वे जिधर देखते, उसे पार्थमय ही मानने लगे।
श्लोक 12 (9.13.12)
कोपोद्धूतशरज्वालो धनुःशब्दानिलो महान् । सैन्येन्धनं ददाहाशु तावकं पार्थपावकः ॥
kopoddhūtaśarajvālo dhanuḥśabdānilo mahān | sainyendhanaṃ dadāhāśu tāvakaṃ pārthapāvakaḥ
क्रोध से भड़की बाणरूपी लपटों और धनुष की टंकाररूपी प्रचण्ड वायु वाली पार्थरूपी अग्नि ने तुम्हारी सेनारूपी ईंधन को शीघ्र जला डाला।
श्लोक 13 (9.13.13)
चक्राणां पततां चापि युगानां च धरातले । तूणीराणां पताकानां ध्वजानां च रथैः सह ॥
cakrāṇāṃ patatāṃ cāpi yugānāṃ ca dharātale | tūṇīrāṇāṃ patākānāṃ dhvajānāṃ ca rathaiḥ saha
भूमि पर गिरे हुए पहियों और जुओं के, तरकशों, पताकाओं और रथों सहित ध्वजाओं के ढेर—
श्लोक 14 (9.13.14)
ईषाणामनुकर्षाणां त्रिवेणूनां च भारत । अक्षाणामथ योक्त्राणां प्रतोदानां च राशयः ॥
īṣāṇāmanukarṣāṇāṃ triveṇūnāṃ ca bhārata | akṣāṇāmatha yoktrāṇāṃ pratodānāṃ ca rāśayaḥ
हे भारत! ईषा-दण्डों, अनुकर्षों और त्रिवेणुओं के, धुरों, जोतों और चाबुकों के ढेर—
श्लोक 15 (9.13.15)
शिरसां पततां चापि कुण्डलोष्णीषधारिणाम् । भुजानां च महाभाग स्कन्धानां च समन्ततः ॥
śirasāṃ patatāṃ cāpi kuṇḍaloṣṇīṣadhāriṇām | bhujānāṃ ca mahābhāga skandhānāṃ ca samantataḥ
कुण्डल और पगड़ी पहने गिरते हुए सिरों के, हे महाभाग! भुजाओं के और चारों ओर कन्धों के ढेर—
श्लोक 16 (9.13.16)
छत्राणां व्यजनैः सार्धं मकुटानां च राशयः । समदृश्यन्त पार्थस्य रथमार्गेषु भारत ॥
chatrāṇāṃ vyajanaiḥ sārdhaṃ makuṭānāṃ ca rāśayaḥ | samadṛśyanta pārthasya rathamārgeṣu bhārata
छत्रों के पंखों समेत और मुकुटों के ढेर, हे भारत! पार्थ के रथ के मार्गों पर दिखाई देते थे।
श्लोक 17 (9.13.17)
अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा । भीरूणां त्रासजननी शूराणां हर्षवर्धिनी । बभूव भरतश्रेष्ठ रुद्रस्याक्रीडनं यथा ॥
agamyarūpā pṛthivī māṃsaśoṇitakardamā | bhīrūṇāṃ trāsajananī śūrāṇāṃ harṣavardhinī | babhūva bharataśreṣṭha rudrasyākrīḍanaṃ yathā
रक्त-मांस के कीचड़ से भरी पृथ्वी चलने योग्य नहीं रही; वह कायरों में भय जगाने वाली और शूरों का हर्ष बढ़ाने वाली थी; हे भरतश्रेष्ठ! वह रुद्र की क्रीड़ास्थली (श्मशान) जैसी हो गई।
श्लोक 18 (9.13.18)
हत्वा तु समरे पार्थः सहस्रे द्वे परन्तपः । रथानां सवरूथानां विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥
hatvā tu samare pārthaḥ sahasre dve parantapaḥ | rathānāṃ savarūthānāṃ vidhūmo'gniriva jvalan
रण में कवच-आवरणों सहित दो हज़ार रथों को मारकर शत्रुओं को तपाने वाले पार्थ ने धूमरहित जलती अग्नि की भाँति शोभा पाई।
श्लोक 19 (9.13.19)
यथा हि भगवानग्निर्जगद्दग्ध्वा चराचरम् । विधूमो दृश्यते राजंस्तथा पार्थो धनञ्जयः ॥
yathā hi bhagavānagnirjagaddagdhvā carācaram | vidhūmo dṛśyate rājaṃstathā pārtho dhanañjayaḥ
हे राजन्! जैसे भगवान अग्नि चर-अचर जगत् को जलाकर धूमरहित दिखाई देते हैं, वैसे ही पार्थ धनञ्जय दिखाई दिया।
श्लोक 20 (9.13.20)
द्रौणिस्तु समरे दृष्ट्वा पाण्डवस्य पराक्रमम् । रथेनातिपताकेन पाण्डवं प्रत्यवारयत् ॥
drauṇistu samare dṛṣṭvā pāṇḍavasya parākramam | rathenātipatākena pāṇḍavaṃ pratyavārayat
द्रोणपुत्र ने रण में पाण्डव का पराक्रम देखकर ऊँची पताकाओं वाले रथ से पाण्डव को रोका।
श्लोक 21 (9.13.21)
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ श्वेताश्वौ धन्विनां वरौ । समीयतुस्तदाऽन्योन्यं परस्परवधैषिणौ ॥
tāvubhau puruṣavyāghrau śvetāśvau dhanvināṃ varau | samīyatustadā'nyonyaṃ parasparavadhaiṣiṇau
श्वेत घोड़ों वाले, धनुर्धारियों में श्रेष्ठ वे दोनों पुरुषसिंह उस समय एक-दूसरे के वध की इच्छा से परस्पर भिड़ गए।
श्लोक 22 (9.13.22)
तयोरासीन्महाराज बाणवर्षं सुदारुणम् । जीमूतयोर्यथा वृष्टिस्तपान्ते भरतर्षभ ॥
tayorāsīnmahārāja bāṇavarṣaṃ sudāruṇam | jīmūtayoryathā vṛṣṭistapānte bharatarṣabha
हे महाराज! हे भरतश्रेष्ठ! उन दोनों के बीच ग्रीष्म के अन्त में दो बादलों की वर्षा के समान अत्यन्त भयंकर बाणवर्षा हुई।
श्लोक 23 (9.13.23)
अन्योन्यस्पर्धिनौ तौ तु शरैः सन्नतपर्वभिः । ततक्षतुस्तदाऽन्योन्यं शृङ्गाभ्यां वृषभाविव ॥
anyonyaspardhinau tau tu śaraiḥ sannataparvabhiḥ | tatakṣatustadā'nyonyaṃ śṛṅgābhyāṃ vṛṣabhāviva
एक-दूसरे से होड़ करते वे दोनों झुकी गाँठों वाले बाणों से, सींगों से भिड़ते दो बैलों की तरह, एक-दूसरे को छीलते रहे।
श्लोक 24 (9.13.24)
तयोर्युद्धं महाराज चिरं सममिवाभवत् । शस्त्राणां सङ्गमश्चैव घोरस्तत्राभवत्पुनः ॥
tayoryuddhaṃ mahārāja ciraṃ samamivābhavat | śastrāṇāṃ saṅgamaścaiva ghorastatrābhavatpunaḥ
हे महाराज! उन दोनों का युद्ध बहुत देर तक बराबरी का-सा रहा, और वहाँ शस्त्रों का भयंकर संघर्ष फिर हुआ।
श्लोक 25 (9.13.25)
ततोऽर्जुनं द्वादशभी रुक्मपुङ्खैः सुतेजनैः । वासुदेवं च दशभिर्द्रौणिर्विव्याध भारत ॥
tato'rjunaṃ dvādaśabhī rukmapuṅkhaiḥ sutejanaiḥ | vāsudevaṃ ca daśabhirdrauṇirvivyādha bhārata
हे भारत! तब द्रोणपुत्र ने सोने के पंखों वाले तेज़ किए हुए बारह बाणों से अर्जुन को और दस बाणों से वासुदेव को बींध दिया।
श्लोक 26 (9.13.26)
ततः प्रहस्य बीभत्सुर्व्याक्षिपद्गाण्डिवं धनुः । मानयित्वा मुहूर्तं तु गुरुपुत्रं महाहवे ॥
tataḥ prahasya bībhatsurvyākṣipadgāṇḍivaṃ dhanuḥ | mānayitvā muhūrtaṃ tu guruputraṃ mahāhave
तब हँसकर बीभत्सु ने गाण्डीव धनुष को टंकारा, उस महायुद्ध में गुरुपुत्र का क्षण भर आदर करके—
श्लोक 27 (9.13.27)
व्यश्वसूतरथं चक्रे सव्यसाची परन्तपः । मृदुपूर्वं ततश्चैनं पुनःपुनरताडयत् ॥
vyaśvasūtarathaṃ cakre savyasācī parantapaḥ | mṛdupūrvaṃ tataścainaṃ punaḥpunaratāḍayat
शत्रुओं को तपाने वाले सव्यसाची ने उसे घोड़ों, सारथि और रथ से हीन कर दिया; पहले कोमलता से, फिर उसे बार-बार मारा।
श्लोक 28 (9.13.28)
हताश्वे तु रथे तिष्ठन्द्रोणपुत्रस्त्वयस्मयम् । मुसलं पाण्डुपुत्राय चिक्षेप परिघोपमम् ॥
hatāśve tu rathe tiṣṭhandroṇaputrastvayasmayam | musalaṃ pāṇḍuputrāya cikṣepa parighopamam
घोड़े मारे जाने पर भी रथ में खड़े द्रोणपुत्र ने पाण्डुपुत्र पर लोहे का एक मूसल फेंका, जो लोहे के परिघ जैसा था।
श्लोक 29 (9.13.29)
तमापतन्तं सहसा हेमपट्टविभूषितम् । चिच्छेद सप्तधा वीरः पार्थः शत्रुनिबर्हणः ॥
tamāpatantaṃ sahasā hemapaṭṭavibhūṣitam | ciccheda saptadhā vīraḥ pārthaḥ śatrunibarhaṇaḥ
सोने की पट्टियों से सजे हुए उस मूसल को सहसा आते देख शत्रुसंहारक वीर पार्थ ने उसके सात टुकड़े कर दिए।
श्लोक 30 (9.13.30)
स च्छिन्नं मुसलं दृष्ट्वा द्रौणिः परमकोपनः । आददे परिघं घोरं नगेन्द्रशिखरोपमम् । चिक्षेप चैव पार्थाय द्रौणिर्युद्धविशारदः ॥
sa cchinnaṃ musalaṃ dṛṣṭvā drauṇiḥ paramakopanaḥ | ādade parighaṃ ghoraṃ nagendraśikharopamam | cikṣepa caiva pārthāya drauṇiryuddhaviśāradaḥ
मूसल कटा देखकर अत्यन्त क्रुद्ध द्रौणि ने पर्वतराज के शिखर-सदृश एक भयंकर परिघ उठाया, और युद्धकुशल द्रौणि ने उसे पार्थ पर फेंक दिया।
श्लोक 31 (9.13.31)
तमन्तकमिव क्रुद्धं परिघं प्रेक्ष्य पाण्डवः । अर्जुनस्त्वरितो जघ्ने पञ्चभिः सायकोत्तमैः ॥
tamantakamiva kruddhaṃ parighaṃ prekṣya pāṇḍavaḥ | arjunastvarito jaghne pañcabhiḥ sāyakottamaiḥ
यमराज के समान क्रुद्ध उस परिघ को आते देख पाण्डव अर्जुन ने शीघ्रता से पाँच उत्तम बाणों से उसे काट डाला।
श्लोक 32 (9.13.32)
स च्छिन्नः पतितो भूमौ पार्थबाणैर्महाहवे । दारयन्पृथिवीन्द्राणां मनः शब्देन भारत ॥
sa cchinnaḥ patito bhūmau pārthabāṇairmahāhave | dārayanpṛthivīndrāṇāṃ manaḥ śabdena bhārata
हे भारत! पार्थ के बाणों से कटकर वह महायुद्ध में भूमि पर गिर पड़ा, और अपने शब्द से राजाओं के हृदय को दहला दिया।
श्लोक 33 (9.13.33)
ततोऽपरैस्त्रिभिर्भल्लैर्द्रौणिं विव्याध पाण्डवः ॥
tato'paraistribhirbhallairdrauṇiṃ vivyādha pāṇḍavaḥ
तब पाण्डव ने तीन और भल्लों से द्रोणपुत्र को बींध दिया।
श्लोक 34 (9.13.34)
सोऽतिविद्धो बलवता पार्थेन सुमहात्मना । नाकम्पत तदा द्रौणिः पौरुषेषु व्यवस्थितः ॥
so'tividdho balavatā pārthena sumahātmanā | nākampata tadā drauṇiḥ pauruṣeṣu vyavasthitaḥ
महात्मा बलवान् पार्थ से अत्यन्त बिंधने पर भी द्रौणि उस समय काँपा नहीं; वह अपने पौरुष में दृढ़ बना रहा।
श्लोक 35 (9.13.35)
सुरथं च ततो राजन्भारद्वाजो महारथम् । अवाकिरच्छरव्रातैः सर्वक्षत्रस्य पश्यतः ॥
surathaṃ ca tato rājanbhāradvājo mahāratham | avākiraccharavrātaiḥ sarvakṣatrasya paśyataḥ
हे राजन्! तब भरद्वाज-वंशी द्रोणपुत्र ने समस्त क्षत्रियों के देखते-देखते महारथी सुरथ को बाणों की झड़ी से ढक दिया।
श्लोक 36 (9.13.36)
ततस्तु सुरथोऽप्याजौ पाञ्चालानां महारथः । रथेन मेघघोषेण द्रौणिमेवाभ्यधावत ॥
tatastu suratho'pyājau pāñcālānāṃ mahārathaḥ | rathena meghaghoṣeṇa drauṇimevābhyadhāvata
तब पाञ्चालों का महारथी सुरथ भी मेघ-गर्जन जैसे रथ-घोष वाले रथ से रण में द्रौणि पर ही दौड़ पड़ा।
श्लोक 37 (9.13.37)
विकर्षन्वै धनुःश्रेष्ठं सर्वभारसहं दृढम् । ज्वलनाशीविषनिभैः शरैश्चैनमवाकिरत् ॥
vikarṣanvai dhanuḥśreṣṭhaṃ sarvabhārasahaṃ dṛḍham | jvalanāśīviṣanibhaiḥ śaraiścainamavākirat
सब भार सहने वाले, दृढ़ और श्रेष्ठ धनुष को खींचते हुए उसने जलते हुए विषधर सर्पों जैसे बाणों से उसे ढक दिया।
श्लोक 38 (9.13.38)
सुरथं तं ततः क्रुद्धमापतन्तं महारथम् । चुकोप समरे द्रौणिर्दण्डाहत इवोरगः ॥
surathaṃ taṃ tataḥ kruddhamāpatantaṃ mahāratham | cukopa samare drauṇirdaṇḍāhata ivoragaḥ
क्रुद्ध होकर आते हुए महारथी सुरथ को देखकर द्रौणि रण में डंडे से मारे गए सर्प की तरह कुपित हो उठा।
श्लोक 39 (9.13.39)
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा सृक्विणी परिसंलिहन् । उद्वीक्ष्य सुरथं रोषाद्धनुर्ज्यामवमृज्य च । मुमोच तीक्ष्णं नाराचं यमदण्डोपमद्युतिम् ॥
triśikhāṃ bhrukuṭīṃ kṛtvā sṛkviṇī parisaṃlihan | udvīkṣya surathaṃ roṣāddhanurjyāmavamṛjya ca | mumoca tīkṣṇaṃ nārācaṃ yamadaṇḍopamadyutim
तीन रेखाओं वाली भौंहें चढ़ाकर, होंठों के कोने चाटते हुए, क्रोध से सुरथ को ताकते और धनुष की डोरी को पोंछते हुए उसने यमदण्ड के समान दीप्ति वाला एक तीक्ष्ण नाराच छोड़ा।
श्लोक 40 (9.13.40)
स तस्य हृदयं भित्त्वा प्रविवेशातिवेगितः । शक्राशनिरिवोत्सृष्टो विदार्य धरणीतलम् ॥
sa tasya hṛdayaṃ bhittvā praviveśātivegitaḥ | śakrāśanirivotsṛṣṭo vidārya dharaṇītalam
वह अत्यन्त वेग से उसका हृदय बेधकर, इन्द्र के छोड़े वज्र की तरह पृथ्वी की सतह को चीरता हुआ भीतर घुस गया।
श्लोक 41 (9.13.41)
ततः स पतितो भूमौ नाराचेन समाहतः । वज्रेण च यथा शृङ्गं पर्वतस्येव दीर्यतः ॥
tataḥ sa patito bhūmau nārācena samāhataḥ | vajreṇa ca yathā śṛṅgaṃ parvatasyeva dīryataḥ
नाराच से मारा गया वह भूमि पर वैसे ही गिरा जैसे वज्र से फटता हुआ पर्वत का शिखर।
श्लोक 42 (9.13.42)
तस्मिन्विनिहते वीरे द्रोणपुत्रः प्रतापवान् । आरुरोह रथं तूर्णं तमेव रथिनां वरः ॥
tasminvinihate vīre droṇaputraḥ pratāpavān | āruroha rathaṃ tūrṇaṃ tameva rathināṃ varaḥ
उस वीर के मारे जाने पर प्रतापी द्रोणपुत्र, जो रथियों में श्रेष्ठ था, शीघ्र उसी रथ पर चढ़ गया।
श्लोक 43 (9.13.43)
ततः सज्जो महाराज द्रौणिराहवदुर्मदः । अर्जुनं योधयामास संशप्तकवृतो रणे ॥
tataḥ sajjo mahārāja drauṇirāhavadurmadaḥ | arjunaṃ yodhayāmāsa saṃśaptakavṛto raṇe
हे महाराज! तब युद्ध-मद से उन्मत्त द्रौणि तैयार होकर संशप्तकों से घिरा हुआ रण में अर्जुन से लड़ने लगा।
श्लोक 44 (9.13.44)
तत्र युद्धं महच्चासीदर्जुनस्य परैः सह । मध्यन्दिनगते सूर्ये यमराष्ट्रविवर्धनम् ॥
tatra yuddhaṃ mahaccāsīdarjunasya paraiḥ saha | madhyandinagate sūrye yamarāṣṭravivardhanam
वहाँ अर्जुन का शत्रुओं के साथ बड़ा युद्ध हुआ, जो सूर्य के मध्याह्न में पहुँचने पर यमराज के राज्य को बढ़ाने वाला था।
श्लोक 45 (9.13.45)
तत्राश्चर्यमपश्याम दृष्ट्वा तेषां पराक्रमम् । यदेको युगपद्वीरान्समयोधयदर्जुनः ॥
tatrāścaryamapaśyāma dṛṣṭvā teṣāṃ parākramam | yadeko yugapadvīrānsamayodhayadarjunaḥ
वहाँ उनका पराक्रम देखकर हमने एक आश्चर्य देखा कि अकेले अर्जुन ने एक साथ अनेक वीरों से युद्ध किया।
श्लोक 46 (9.13.46)
विमर्दः सुमहानासीदर्जुनस्य परैः सह । शतक्रतोर्यथापूर्वं महत्या दैत्यसेनया ॥
vimardaḥ sumahānāsīdarjunasya paraiḥ saha | śatakratoryathāpūrvaṃ mahatyā daityasenayā
अर्जुन का शत्रुओं के साथ भारी संहार हुआ, जैसा पहले शतक्रतु (इन्द्र) का दैत्यों की विशाल सेना के साथ हुआ था।