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शल्य पर्व · अध्याय 12

शल्य का पाँच पाण्डव वीरों को अकेले रोके रखना

सात्यकि, भीमसेन, नकुल, सहदेव और युधिष्ठिर शल्य को घेर लेते हैं, पर वह हर बाण का उत्तर बाण से देता है, उनके धनुष काट डालता है और उनके फेंके शस्त्रों को रोक देता है। युधिष्ठिर उसके चक्ररक्षक को मार गिराते हैं, फिर भी शल्य पाण्डव-सेना को बाणों के अन्धकार से ढक देता है और देवता तथा मुनि विस्मित होते हैं। चिन्तित युधिष्ठिर कृष्ण के महान् वचन का स्मरण करते हैं और डरते हैं कि क्रुद्ध शल्य कहीं उनकी सेना का नाश न कर दे।

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.12.1)

पीडिते धर्मराजे तु मद्रराजेन मारिष । सात्यकिर्भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । परिवार्य रथैः शल्यं पीडयामासुराहवे ॥

pīḍite dharmarāje tu madrarājena māriṣa | sātyakirbhīmasenaśca mādrīputrau ca pāṇḍavau | parivārya rathaiḥ śalyaṃ pīḍayāmāsurāhave

हे आर्य, जब मद्रराज ने धर्मराज को पीड़ित कर दिया, तब सात्यकि, भीमसेन और माद्री के दोनों पुत्र, पाण्डव नकुल और सहदेव, रथों से शल्य को घेरकर युद्ध में उसे पीड़ित करने लगे।

श्लोक 2 (9.12.2)

तमेकं बहुभिर्दृष्ट्वा पीड्यमानं महारथैः । साधुवादो महाञ्जज्ञे सिद्धाश्चासन्प्रहर्षिताः ॥

tamekaṃ bahubhirdṛṣṭvā pīḍyamānaṃ mahārathaiḥ | sādhuvādo mahāñjajñe siddhāścāsanpraharṣitāḥ

उस अकेले को इतने महारथियों से पीड़ित होते देखकर बड़ा साधुवाद उठा और सिद्ध हर्ष से भर गए।

श्लोक 3 (9.12.3)

आश्चर्यमित्यभाषन्त मुनयश्चापि सङ्गताः ॥

āścaryamityabhāṣanta munayaścāpi saṅgatāḥ

वहाँ एकत्र हुए मुनियों ने भी कहा, "यह तो आश्चर्य है!"

श्लोक 4 (9.12.4)

भीमसेनो रणे शल्यं शल्यभूतं पराक्रमे । एकेन विद्ध्वा बाणेन पुनर्विव्याध सप्तभिः ॥

bhīmaseno raṇe śalyaṃ śalyabhūtaṃ parākrame | ekena viddhvā bāṇena punarvivyādha saptabhiḥ

भीमसेन ने युद्ध में पराक्रम से शूल के समान चुभने वाले शल्य को एक बाण से बींधकर फिर सात बाणों से बींध दिया।

श्लोक 5 (9.12.5)

सात्यकिश्च शतेनैनं धर्मपुत्रपरीप्सया । मद्रेश्वरमवाकीर्य सिंहनादमथानदत् ॥

sātyakiśca śatenainaṃ dharmaputraparīpsayā | madreśvaramavākīrya siṃhanādamathānadat

सात्यकि ने धर्मपुत्र की रक्षा की इच्छा से मद्रराज पर सौ बाण बरसाए और सिंहनाद किया।

श्लोक 6 (9.12.6)

नकुलः पञ्चभिश्चैनं सहदेवश्च पञ्चभिः । विद्ध्वा तं तु पुनस्तूर्णं ततो विव्याध सप्तभिः ॥

nakulaḥ pañcabhiścainaṃ sahadevaśca pañcabhiḥ | viddhvā taṃ tu punastūrṇaṃ tato vivyādha saptabhiḥ

नकुल ने उसे पाँच बाणों से और सहदेव ने भी पाँच बाणों से बींधा; और बींधकर फिर तुरन्त सात-सात बाणों से उसे घायल किया।

श्लोक 7 (9.12.7)

स तु शूरो रणे यत्तः पीडितस्तैर्महारथैः । विकृष्य कार्मुकं घोरं भारघ्नं वेगवत्तरम् ॥

sa tu śūro raṇe yattaḥ pīḍitastairmahārathaiḥ | vikṛṣya kārmukaṃ ghoraṃ bhāraghnaṃ vegavattaram

उन महारथियों से पीड़ित वह शूर योद्धा युद्ध में सावधान होकर अपने भयंकर धनुष को खींचकर तैयार हुआ, जो हर भार को सह लेता और अत्यन्त वेग से बाण छोड़ता था।

श्लोक 8 (9.12.8)

सात्यकिं पञ्चविंशत्या शल्यो विव्याध मारिष । भीमसेनं तु सप्तत्या नकुलं सप्तभिस्तथा ॥

sātyakiṃ pañcaviṃśatyā śalyo vivyādha māriṣa | bhīmasenaṃ tu saptatyā nakulaṃ saptabhistathā

हे आर्य, शल्य ने सात्यकि को पचीस बाणों से, भीमसेन को सत्तर से और नकुल को सात बाणों से बींध दिया।

श्लोक 9 (9.12.9)

ततः स विशिखं चापं सहदेवस्य धन्विनः । छित्त्वा भल्लेन समरे विव्याधैनं त्रिसप्तभिः ॥

tataḥ sa viśikhaṃ cāpaṃ sahadevasya dhanvinaḥ | chittvā bhallena samare vivyādhainaṃ trisaptabhiḥ

फिर उसने युद्ध में एक भल्ल से धनुर्धर सहदेव के बाण-सहित धनुष को काट डाला और उसे इक्कीस बाणों से बींध दिया।

श्लोक 10 (9.12.10)

सहदेवस्तु समरे मातुलं भूरिवर्चसम् । सज्यमन्यद्धनुः कृत्वा पञ्चभिः समताडयत् । शरैराशीविषाकारैर्ज्वलज्ज्वलनसन्निभैः ॥

sahadevastu samare mātulaṃ bhūrivarcasam | sajyamanyaddhanuḥ kṛtvā pañcabhiḥ samatāḍayat | śarairāśīviṣākārairjvalajjvalanasannibhaiḥ

सहदेव ने युद्ध में दूसरा धनुष चढ़ाकर अपने महातेजस्वी मामा को पाँच बाणों से मारा, ऐसे बाणों से जो विषैले सर्पों जैसे थे और जलती आग के समान दहकते थे।

श्लोक 11 (9.12.11)

सारथिं चास्य समरे शरेणानतपर्वणा । विव्याध भृशसङ्क्रुद्धस्तं वै भूयस्त्रिभिः शरैः ॥

sārathiṃ cāsya samare śareṇānataparvaṇā | vivyādha bhṛśasaṅkruddhastaṃ vai bhūyastribhiḥ śaraiḥ

उसने झुकी गाँठ वाले एक बाण से शल्य के सारथि को भी बींधा और अत्यन्त क्रुद्ध होकर शल्य को फिर तीन बाणों से घायल किया।

श्लोक 12 (9.12.12)

भीमसेनस्तु सप्तत्या सात्यकिर्नवभिः शरैः । धर्मराजस्तथा षष्ट्या गात्रे शल्यं समार्पयत् ॥

bhīmasenastu saptatyā sātyakirnavabhiḥ śaraiḥ | dharmarājastathā ṣaṣṭyā gātre śalyaṃ samārpayat

भीमसेन ने सत्तर, सात्यकि ने नौ और धर्मराज ने भी साठ बाणों से शल्य के शरीर को बींध डाला।

श्लोक 13 (9.12.13)

ततः शल्यो महाराज निर्विद्धस्तैर्महारथैः । सुस्राव रुधिरं गात्रैर्गैरिकं पर्वतो यथा ॥

tataḥ śalyo mahārāja nirviddhastairmahārathaiḥ | susrāva rudhiraṃ gātrairgairikaṃ parvato yathā

हे महाराज, तब उन महारथियों से बिंधा हुआ शल्य अपने अंगों से ऐसे रक्त बहाने लगा जैसे गेरू बहाता हुआ पर्वत।

श्लोक 14 (9.12.14)

तांश्च सर्वान्महेष्वासान्पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः । विव्याध तरसा राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥

tāṃśca sarvānmaheṣvāsānpañcabhiḥ pañcabhiḥ śaraiḥ | vivyādha tarasā rājaṃstadadbhutamivābhavat

और हे राजन्, उसने उन सभी महाधनुर्धरों में से हर एक को वेग से पाँच-पाँच बाणों से बींध दिया; यह एक अद्भुत बात हुई।

श्लोक 15 (9.12.15)

ततोऽपरेण भल्लेन धर्मपुत्रस्य मारिष । धनुश्चिच्छेद समरे सज्यं स सुमहारथः ॥

tato'pareṇa bhallena dharmaputrasya māriṣa | dhanuściccheda samare sajyaṃ sa sumahārathaḥ

हे आर्य, तब उस महारथी ने एक और भल्ल से युद्ध में धर्मपुत्र का डोरी चढ़ा हुआ धनुष काट डाला।

श्लोक 16 (9.12.16)

अथान्यद्धनुरादाय धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । साश्वसूतध्वजरथं शल्यं प्राच्छादयच्छरैः ॥

athānyaddhanurādāya dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | sāśvasūtadhvajarathaṃ śalyaṃ prācchādayaccharaiḥ

तब धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने दूसरा धनुष लेकर घोड़ों, सारथि, ध्वज और रथ सहित शल्य को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 17 (9.12.17)

स च्छाद्यमानः समरे धर्मपुत्रस्य सायकैः । युधिष्ठिरमथाविध्यद्दशभिर्निशितैः शरैः ॥

sa cchādyamānaḥ samare dharmaputrasya sāyakaiḥ | yudhiṣṭhiramathāvidhyaddaśabhirniśitaiḥ śaraiḥ

युद्ध में धर्मपुत्र के बाणों से ढके जाते हुए शल्य ने युधिष्ठिर को दस तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 18 (9.12.18)

सात्यकिस्तु ततः क्रुद्धो धर्मपुत्रे शरार्दिते । मद्राणामधिपं शूरं शरैर्विव्याध पञ्चभिः ॥

sātyakistu tataḥ kruddho dharmaputre śarārdite | madrāṇāmadhipaṃ śūraṃ śarairvivyādha pañcabhiḥ

तब धर्मपुत्र को बाणों से पीड़ित देखकर क्रुद्ध हुए सात्यकि ने मद्रों के शूरवीर अधिपति को पाँच बाणों से बींध दिया।

श्लोक 19 (9.12.19)

स सात्यकेः प्रचिच्छेद क्षुरप्रेण महद्धनुः । भीमसेनमुखांस्तांश्च त्रिभिस्त्रिभिरताडयत् ॥

sa sātyakeḥ praciccheda kṣurapreṇa mahaddhanuḥ | bhīmasenamukhāṃstāṃśca tribhistribhiratāḍayat

शल्य ने क्षुरप्र से सात्यकि का विशाल धनुष काट दिया और भीमसेन आदि उन योद्धाओं में से प्रत्येक को तीन-तीन बाणों से मारा।

श्लोक 20 (9.12.20)

तस्य क्रुद्धो महाराज सात्यकिः सत्यविक्रमः । तोमरं प्रेषयामास स्वर्णदण्डं महारणे ॥

tasya kruddho mahārāja sātyakiḥ satyavikramaḥ | tomaraṃ preṣayāmāsa svarṇadaṇḍaṃ mahāraṇe

हे महाराज, तब सत्य-पराक्रमी सात्यकि ने क्रुद्ध होकर उस महायुद्ध में उस पर सोने के दण्ड वाला तोमर फेंका।

श्लोक 21 (9.12.21)

भीमसेनोऽथ नाराचं ज्वलन्तमिव पन्नगम् । नकुलः समरे शक्तिं सहदेवो गदां शुभाम् । धर्मराजः शतघ्नीं च जिघांसुः शल्यमाहवे ॥

bhīmaseno'tha nārācaṃ jvalantamiva pannagam | nakulaḥ samare śaktiṃ sahadevo gadāṃ śubhām | dharmarājaḥ śataghnīṃ ca jighāṃsuḥ śalyamāhave

भीमसेन ने जलते हुए सर्प जैसा नाराच, नकुल ने शक्ति, सहदेव ने सुन्दर गदा और धर्मराज ने शतघ्नी फेंकी; सब युद्ध में शल्य को मार डालना चाहते थे।

श्लोक 22 (9.12.22)

तानापतत एवाशु पञ्चानां वै भुजच्युतान् । वारयामास समरे शस्त्रसङ्घैः स मद्रराट् ॥

tānāpatata evāśu pañcānāṃ vai bhujacyutān | vārayāmāsa samare śastrasaṅghaiḥ sa madrarāṭ

पाँचों की भुजाओं से छूटे हुए उन शस्त्रों को अपनी ओर आते देखकर मद्रराज ने युद्ध में शस्त्रों की बौछार से उन्हें तुरन्त रोक दिया।

श्लोक 23 (9.12.23)

सात्यकिप्रहितं शल्यो भल्लैश्चिच्छेद तोमरम् । प्रहितं भीमसेनेन शरं कनकभूषणम् ॥

sātyakiprahitaṃ śalyo bhallaiściccheda tomaram | prahitaṃ bhīmasenena śaraṃ kanakabhūṣaṇam

शल्य ने सात्यकि के फेंके हुए तोमर को भल्लों से काट दिया, और भीमसेन के भेजे हुए सोने से सजे बाण को

श्लोक 24 (9.12.24)

द्विधा चिच्छेद समरे कृतहस्तः प्रतापवान् । नकुलप्रेषितां शक्तिं हेमदण्डां भयावहाम् ॥

dvidhā ciccheda samare kṛtahastaḥ pratāpavān | nakulapreṣitāṃ śaktiṃ hemadaṇḍāṃ bhayāvahām

उस प्रतापी और कुशल-हस्त वीर ने युद्ध में दो टुकड़े कर दिया; और नकुल की भेजी हुई सोने के दण्ड वाली भयावह शक्ति को भी रोक दिया,

श्लोक 25 (9.12.25)

गदां च सहदेवेन शरौघैः समवारयत् । शराभ्यां च शतघ्नीं तां राज्ञश्चिच्छेद भारत ॥

gadāṃ ca sahadevena śaraughaiḥ samavārayat | śarābhyāṃ ca śataghnīṃ tāṃ rājñaściccheda bhārata

तथा सहदेव की गदा को बाणों की बौछार से रोक दिया; और हे भरतवंशी, दो बाणों से राजा युधिष्ठिर की उस शतघ्नी को भी काट डाला।

श्लोक 26 (9.12.26)

पश्यतां पाण्डुपुत्राणां सिंहनादं ननाद च । नामृष्यत्तत्र शैनेयः शत्रोर्विजयमाहवे ॥

paśyatāṃ pāṇḍuputrāṇāṃ siṃhanādaṃ nanāda ca | nāmṛṣyattatra śaineyaḥ śatrorvijayamāhave

पाण्डवों के देखते-देखते उसने सिंहनाद किया। सात्यकि युद्ध में शत्रु की इस विजय को सह न सका।

श्लोक 27 (9.12.27)

अथान्यद्धनुरादाय सात्यकिः क्रोधमूर्च्छितः । द्वाभ्यां मद्रेश्वरं विद्ध्वा सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥

athānyaddhanurādāya sātyakiḥ krodhamūrcchitaḥ | dvābhyāṃ madreśvaraṃ viddhvā sārathiṃ ca tribhiḥ śaraiḥ

तब क्रोध से मूर्छित-से सात्यकि ने दूसरा धनुष लेकर मद्रराज को दो बाणों से और उसके सारथि को तीन बाणों से बींध दिया।

श्लोक 28 (9.12.28)

ततः शल्यो रणे राजन्सर्वांस्तान्दशभिः शरैः । विव्याध भृशसङ्क्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपान् ॥

tataḥ śalyo raṇe rājansarvāṃstāndaśabhiḥ śaraiḥ | vivyādha bhṛśasaṅkruddhastotrairiva mahādvipān

तब हे राजन्, शल्य ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन सबको दस बाणों से ऐसे बींध दिया जैसे अंकुशों से बड़े हाथियों को बींधा जाता है।

श्लोक 29 (9.12.29)

ते वार्यमाणाः समरे मद्रराज्ञा महारथाः । न शेकुः सम्मुखे स्थातुं तस्य शत्रुनिषूदनाः ॥

te vāryamāṇāḥ samare madrarājñā mahārathāḥ | na śekuḥ sammukhe sthātuṃ tasya śatruniṣūdanāḥ

युद्ध में मद्रराज से रोके जाने पर वे शत्रुसंहारक महारथी उसके सामने टिक न सके।

श्लोक 30 (9.12.30)

ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा शल्यस्य विक्रमम् । निहतान्पाण्डवान्मेने पाञ्चालानथ सृञ्जयान् ॥

tato duryodhano rājā dṛṣṭvā śalyasya vikramam | nihatānpāṇḍavānmene pāñcālānatha sṛñjayān

तब राजा दुर्योधन ने शल्य का पराक्रम देखकर मान लिया कि पाण्डव, पाञ्चाल और सृञ्जय मारे जा चुके।

श्लोक 31 (9.12.31)

तथाविधं महाराज मद्रराजस्य विक्रमम् । असह्यं मानवैर्युद्धे तद्बभूव नरर्षभ ॥

tathāvidhaṃ mahārāja madrarājasya vikramam | asahyaṃ mānavairyuddhe tadbabhūva nararṣabha

हे महाराज, हे नरश्रेष्ठ, मद्रराज का ऐसा पराक्रम था कि युद्ध में मनुष्य उसे सह नहीं सकते थे।

श्लोक 32 (9.12.32)

ततो राजन्महाबाहुर्भीमसेनः प्रतापवान् । सन्त्यज्य मनसा प्राणान्मद्राधिपमयोधयत् ॥

tato rājanmahābāhurbhīmasenaḥ pratāpavān | santyajya manasā prāṇānmadrādhipamayodhayat

तब हे राजन्, महाबाहु पराक्रमी भीमसेन ने प्राणों का मोह मन से त्यागकर मद्रराज से युद्ध किया।

श्लोक 33 (9.12.33)

नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः । परिवार्य तदा शल्यं समन्ताद्व्यकिरञ्शरैः ॥

nakulaḥ sahadevaśca sātyakiśca mahārathaḥ | parivārya tadā śalyaṃ samantādvyakirañśaraiḥ

नकुल, सहदेव और महारथी सात्यकि ने भी तब शल्य को चारों ओर से घेरकर उस पर बाणों की झड़ी लगा दी।

श्लोक 34 (9.12.34)

स चतुर्भिर्महेष्वासैः पाण्डवानां महारथः । वृतस्तान्योधयामास मद्रराजः प्रतापवान् ॥

sa caturbhirmaheṣvāsaiḥ pāṇḍavānāṃ mahārathaḥ | vṛtastānyodhayāmāsa madrarājaḥ pratāpavān

पाण्डवों के उन चार महाधनुर्धर महारथियों से घिरा हुआ पराक्रमी मद्रराज उनसे लड़ता रहा।

श्लोक 35 (9.12.35)

तस्य धर्मसुतो राजन्क्षुरप्रेण महाहवे । चक्ररक्षं जघानाशु मद्रराजस्य पार्थिवः ॥

tasya dharmasuto rājankṣurapreṇa mahāhave | cakrarakṣaṃ jaghānāśu madrarājasya pārthivaḥ

हे राजन्, तब धर्मपुत्र ने उस महायुद्ध में क्षुरप्र से मद्रराज के चक्ररक्षक को तुरन्त मार गिराया।

श्लोक 36 (9.12.36)

तस्मिंस्तु निहते शूरे चक्ररक्षे महारथे । मद्रराजोऽपि बलवान्सैनिकानावृणोच्छरैः ॥

tasmiṃstu nihate śūre cakrarakṣe mahārathe | madrarājo'pi balavānsainikānāvṛṇoccharaiḥ

उस शूर महारथी चक्ररक्षक के मारे जाने पर बलवान मद्रराज ने भी सैनिकों को बाणों से ढक दिया।

श्लोक 37 (9.12.37)

समावृतांस्ततस्तांस्तु राजन्वीक्ष्य स्वसैनिकान् । चिन्तयामास समरे धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

samāvṛtāṃstatastāṃstu rājanvīkṣya svasainikān | cintayāmāsa samare dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

हे राजन्, अपने सैनिकों को इस प्रकार ढका हुआ देखकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर युद्ध में सोच में पड़ गए।

श्लोक 38 (9.12.38)

कथं नु न भवेत्सत्यं तन्माधववचो महत् । अपि क्रुद्धो रणे राजन्क्षपयेत बलं मम ॥

kathaṃ nu na bhavetsatyaṃ tanmādhavavaco mahat | api kruddho raṇe rājankṣapayeta balaṃ mama

"माधव का वह महान् वचन भला असत्य कैसे हो सकता है? फिर भी हे राजन्, यदि वह युद्ध में क्रुद्ध हो जाए तो मेरी सेना का नाश कर सकता है।"

श्लोक 39 (9.12.39)

अहं मद्भ्रातरश्चैव सात्यकिश्च महारथः । पाञ्चालाः सृञ्जयाश्चैव न शक्तास्म हि मद्रपम् ॥

ahaṃ madbhrātaraścaiva sātyakiśca mahārathaḥ | pāñcālāḥ sṛñjayāścaiva na śaktāsma hi madrapam

"मैं, मेरे भाई, महारथी सात्यकि तथा पाञ्चाल और सृञ्जय मिलकर भी मद्रराज के सामने ठहरने में समर्थ नहीं हैं।

श्लोक 40 (9.12.40)

निहनिष्यति चैवाद्य मातुलोऽस्मान्महाबलः । गोविन्दवचनं सत्यं कथं भवति किन्त्विदम् ॥

nihaniṣyati caivādya mātulo'smānmahābalaḥ | govindavacanaṃ satyaṃ kathaṃ bhavati kintvidam

और मेरे बलवान मामा आज हमें मार डालेंगे। तब गोविन्द का वचन कैसे सत्य होगा?"

श्लोक 41 (9.12.41)

ततः सरथनागाश्वाः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । मद्रराजं समासेदुः पीडयन्तः समन्ततः ॥

tataḥ sarathanāgāśvāḥ pāṇḍavāḥ pāṇḍupūrvaja | madrarājaṃ samāseduḥ pīḍayantaḥ samantataḥ

तब हे पाण्डु के अग्रज, रथों, हाथियों और घोड़ों सहित पाण्डव चारों ओर से उसे दबाते हुए मद्रराज पर टूट पड़े।

श्लोक 42 (9.12.42)

नानाशस्त्रौघबहुलां शस्त्रवृष्टिं समुद्यताम् । व्यधमत्समरे राजा महाभ्राणीव मारुतः ॥

nānāśastraughabahulāṃ śastravṛṣṭiṃ samudyatām | vyadhamatsamare rājā mahābhrāṇīva mārutaḥ

उस राजा ने युद्ध में उठी हुई, नाना शस्त्र-समूहों से भरी उस शस्त्र-वर्षा को ऐसे उड़ा दिया जैसे वायु बड़े-बड़े बादलों को उड़ा देती है।

श्लोक 43 (9.12.43)

ततः कनकपुङ्खां तां शल्यक्षिप्तां वियद्गताम् । शरवृष्टिमपश्याम शलभानामिवायतिम् ॥

tataḥ kanakapuṅkhāṃ tāṃ śalyakṣiptāṃ viyadgatām | śaravṛṣṭimapaśyāma śalabhānāmivāyatim

तब हमने शल्य के चलाए हुए सुनहरे पंखों वाले बाणों की उस वर्षा को आकाश में उड़ते देखा, जो टिड्डियों के दल के आने जैसी थी।

श्लोक 44 (9.12.44)

ते शरा मद्रराजेन प्रेषिता रणमूर्धनि । सम्पतन्तः स्म दृश्यन्ते शलभानां व्रजा इव ॥

te śarā madrarājena preṣitā raṇamūrdhani | sampatantaḥ sma dṛśyante śalabhānāṃ vrajā iva

रणभूमि के अग्रभाग में मद्रराज के भेजे हुए वे बाण गिरते हुए टिड्डियों के झुण्डों जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 45 (9.12.45)

मद्रराजधनुर्मुक्तैः शरैः कनकभूषणैः । निरन्तरमिवाकाशं सम्बभूव जनाधिप ॥

madrarājadhanurmuktaiḥ śaraiḥ kanakabhūṣaṇaiḥ | nirantaramivākāśaṃ sambabhūva janādhipa

हे नरेश्वर, मद्रराज के धनुष से छूटे सोने से सजे बाणों से आकाश मानो बिना किसी खाली स्थान का हो गया।

श्लोक 46 (9.12.46)

न पाण्डवानां नास्माकं तत्र किञ्चिद्व्यदृश्यत । बाणान्धकारे महति कृते तत्र महाहवे ॥

na pāṇḍavānāṃ nāsmākaṃ tatra kiñcidvyadṛśyata | bāṇāndhakāre mahati kṛte tatra mahāhave

उस महायुद्ध में बाणों का जो घोर अन्धकार रच दिया गया, उसमें न पाण्डवों का और न हमारे लोगों का कुछ दिखाई देता था।

श्लोक 47 (9.12.47)

मद्रराजेन बलिना लाघवाच्छरवृष्टिभिः । चाल्यमानं तु तं दृष्ट्वा पाण्डवानां बलार्णवम् । विस्मयं परमं जग्मुर्देवगन्धर्वदानवाः ॥

madrarājena balinā lāghavāccharavṛṣṭibhiḥ | cālyamānaṃ tu taṃ dṛṣṭvā pāṇḍavānāṃ balārṇavam | vismayaṃ paramaṃ jagmurdevagandharvadānavāḥ

बलवान मद्रराज की फुर्ती से हुई बाण-वर्षा से पाण्डवों की सेना-सागर को हिलता हुआ देखकर देवता, गन्धर्व और दानव अत्यन्त विस्मय में पड़ गए।

श्लोक 48 (9.12.48)

स तु तान्सर्वतो यत्ताञ्शरैः सञ्छाद्य मारिष । धर्मराजमवच्छाद्य सिंहवद्व्यनदन्मुहुः ॥

sa tu tānsarvato yattāñśaraiḥ sañchādya māriṣa | dharmarājamavacchādya siṃhavadvyanadanmuhuḥ

हे आर्य, अपने चारों ओर जुटे उन सब योद्धाओं को बाणों से ढककर और धर्मराज को भी आच्छादित करके वह बार-बार सिंह की तरह गरजा।

श्लोक 49 (9.12.49)

ते च्छन्नाः समरे तेन पाण्डवानां महारथाः । नाशक्नुवंस्तदा युद्धे प्रत्युद्यातुं महारथम् ॥

te cchannāḥ samare tena pāṇḍavānāṃ mahārathāḥ | nāśaknuvaṃstadā yuddhe pratyudyātuṃ mahāratham

उससे युद्ध में ढक दिए गए पाण्डवों के वे महारथी उस महारथी का सामना करने में उस समय समर्थ न हुए।

श्लोक 50 (9.12.50)

धर्मराजपुरोगास्तु भीमसेनमुखा रथाः । निजघ्नुः समरे शूरं शल्यमाहवशोभिनम् ॥

dharmarājapurogāstu bhīmasenamukhā rathāḥ | nijaghnuḥ samare śūraṃ śalyamāhavaśobhinam

धर्मराज को आगे रखकर और भीमसेन को प्रमुख बनाकर चलने वाले रथों ने रणभूमि में शोभित होते उस वीर शल्य पर प्रहार किया।

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