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शल्य पर्व · अध्याय 21

दुर्योधन द्वारा पाण्डवों को रोकना

सञ्जय बताते हैं कि अकेले दुर्योधन सभी पाण्डवों के सामने डटकर युधिष्ठिर, भीम, नकुल-सहदेव, धृष्टद्युम्न, द्रौपदी के पुत्रों और सात्यकि को घायल करते हैं और उनके बाणों की वर्षा में भी अडिग रहते हैं। अश्वत्थामा भीम को रोकते हैं, शकुनि युधिष्ठिर के घोड़े मार देते हैं और सहदेव राजा को रणभूमि से हटा ले जाते हैं। फिर अनेक द्वन्द्वयुद्ध होते हैं: उलूक और नकुल, सात्यकि और कृतवर्मा, दुर्योधन और धृष्टद्युम्न, कृपाचार्य और द्रौपदी के पुत्र। धूल का घना बादल उठकर थम जाता है और मध्याह्न के द्वन्द्वयुद्ध फिर आरम्भ हो जाते हैं।

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.21.1)

पुत्रस्तु ते महाराज रथस्थो रथिनां वरः । दुरुत्सहो बभौ युद्धे यथा रुद्रः प्रतापवान् ॥

putrastu te mahārāja rathastho rathināṃ varaḥ | durutsaho babhau yuddhe yathā rudraḥ pratāpavān

हे महाराज! रथियों में श्रेष्ठ आपके पुत्र रथ पर खड़े होकर युद्ध में प्रतापी रुद्र के समान दुर्धर्ष शोभित हो रहे थे।

श्लोक 2 (9.21.2)

तस्य बाणसहस्रैस्तु प्रच्छन्ना ह्यभवन्मही । परांश्च सिषिचे बाणैर्धाराभिरिव पर्वतान् ॥

tasya bāṇasahasraistu pracchannā hyabhavanmahī | parāṃśca siṣice bāṇairdhārābhiriva parvatān

उनके हज़ारों बाणों से पृथ्वी ढक गई, और जैसे बादल पर्वतों पर जल की धाराएँ बरसाते हैं, वैसे ही उन्होंने शत्रुओं पर बाणों की वर्षा की।

श्लोक 3 (9.21.3)

न च सोऽस्ति पुमान्कश्चित्पाण्डवानां बलार्णवे । हयो गजो रथो वाऽपि यः स्याद्बाणैरविक्षतः ॥

na ca so'sti pumānkaścitpāṇḍavānāṃ balārṇave | hayo gajo ratho vā'pi yaḥ syādbāṇairavikṣataḥ

पाण्डवों की उस सेना-सागर में ऐसा कोई पुरुष, घोड़ा, हाथी या रथ नहीं था जो उनके बाणों से घायल न हुआ हो।

श्लोक 4 (9.21.4)

यं यं हि समरे योधं प्रपश्यामि विशाम्पते । स स बाणैश्चितोऽभूद्वै पुत्रेण तव भारत ॥

yaṃ yaṃ hi samare yodhaṃ prapaśyāmi viśāmpate | sa sa bāṇaiścito'bhūdvai putreṇa tava bhārata

हे प्रजापति भारत! रणभूमि में मैं जिस-जिस योद्धा को देखता था, वही-वही आपके पुत्र के बाणों से बिंधा हुआ दिखाई देता था।

श्लोक 5 (9.21.5)

यथा सैन्येन रजसा समुद्भूतेन वाहिनी । प्रत्यदृश्यत सञ्छन्ना तथा बाणैर्महात्मनः ॥

yathā sainyena rajasā samudbhūtena vāhinī | pratyadṛśyata sañchannā tathā bāṇairmahātmanaḥ

जैसे सेना अपने ही चलने से उठी धूल से ढकी दिखाई देती है, वैसे ही उन महात्मा के बाणों से पाण्डव-सेना ढकी हुई दिखाई दी।

श्लोक 6 (9.21.6)

बाणभूतामपश्याम पृथिवीं पृथिवीपते । दुर्योधनेन प्रकृतां क्षिप्रहस्तेन धन्विना ॥

bāṇabhūtāmapaśyāma pṛthivīṃ pṛthivīpate | duryodhanena prakṛtāṃ kṣiprahastena dhanvinā

हे पृथ्वीपति! हमने देखा कि फुर्तीले हाथों वाले उस धनुर्धर दुर्योधन ने पृथ्वी को मानो बाणों की ही बना दिया था।

श्लोक 7 (9.21.7)

तेषु योधसहस्रेषु तावकेषु परेषु च । नास्ति दुर्योधनसमः पुमानिति मतिर्मम ॥

teṣu yodhasahasreṣu tāvakeṣu pareṣu ca | nāsti duryodhanasamaḥ pumāniti matirmama

आपके और शत्रुओं के उन सहस्रों योद्धाओं में दुर्योधन के समान कोई पुरुष नहीं है, ऐसा मेरा मत है।

श्लोक 8 (9.21.8)

तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य विक्रमम् । यदेकं सहिताः पार्था नाभ्यवर्तन्त भारत ॥

tatrādbhutamapaśyāma tava putrasya vikramam | yadekaṃ sahitāḥ pārthā nābhyavartanta bhārata

हे भारत! वहाँ हमने आपके पुत्र का एक अद्भुत पराक्रम देखा कि संगठित होकर भी पाण्डव अकेले उनके सामने आगे नहीं बढ़ सके।

श्लोक 9 (9.21.9)

युधिष्ठिरं शतेनाजौ विव्याध भरतर्षभ । भीमसेनं च सप्तत्या सहदेवं च पञ्चभिः ॥

yudhiṣṭhiraṃ śatenājau vivyādha bharatarṣabha | bhīmasenaṃ ca saptatyā sahadevaṃ ca pañcabhiḥ

हे भरतश्रेष्ठ! उन्होंने युद्ध में युधिष्ठिर को सौ बाणों से, भीमसेन को सत्तर से और सहदेव को पाँच से बींध दिया।

श्लोक 10 (9.21.10)

नकुलं च चतुःषष्ट्या धृष्टद्युम्नं च पञ्चभिः । पञ्चभिर्द्रौपदेयांश्च त्रिभिर्विव्याध सात्यकिम् ॥

nakulaṃ ca catuḥṣaṣṭyā dhṛṣṭadyumnaṃ ca pañcabhiḥ | pañcabhirdraupadeyāṃśca tribhirvivyādha sātyakim

नकुल को चौंसठ से, धृष्टद्युम्न को पाँच से, द्रौपदी के पुत्रों को पाँच से और सात्यकि को तीन बाणों से बींध दिया।

श्लोक 11 (9.21.11)

धनुश्चिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष । तदपास्य धनुश्छिन्नं माद्रीपुत्रः प्रतापवान् ॥

dhanuściccheda bhallena sahadevasya māriṣa | tadapāsya dhanuśchinnaṃ mādrīputraḥ pratāpavān

हे मान्यवर! उन्होंने एक भल्ल से सहदेव का धनुष काट डाला। उस कटे धनुष को फेंककर प्रतापी माद्रीपुत्र ने

श्लोक 12 (9.21.12)

अभ्यद्रवत राजानं प्रगृह्यान्यन्महद्धनुः । ततो दुर्योधनं सङ्ख्ये विव्याध दशभिः शरैः ॥

abhyadravata rājānaṃ pragṛhyānyanmahaddhanuḥ | tato duryodhanaṃ saṅkhye vivyādha daśabhiḥ śaraiḥ

दूसरा विशाल धनुष उठाया और राजा पर टूट पड़ा, फिर युद्ध में दस बाणों से दुर्योधन को बींध दिया।

श्लोक 13 (9.21.13)

नकुलस्तु ततो वीरो राजानं नवभिः शरैः । घोररूपैर्महेष्वासो विव्याध च ननाद च ॥

nakulastu tato vīro rājānaṃ navabhiḥ śaraiḥ | ghorarūpairmaheṣvāso vivyādha ca nanāda ca

तब महाधनुर्धर वीर नकुल ने भी भयंकर रूप वाले नौ बाणों से राजा को बींधा और गर्जना की।

श्लोक 14 (9.21.14)

सात्यकिश्चैव राजानं शरेणानतपर्वणा । द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या धर्मराजश्च पञ्चभिः । अशीत्या भीमसेनश्च शरै राजानमार्पयन् ॥

sātyakiścaiva rājānaṃ śareṇānataparvaṇā | draupadeyāstrisaptatyā dharmarājaśca pañcabhiḥ | aśītyā bhīmasenaśca śarai rājānamārpayan

सात्यकि ने सीधी गाँठ वाले एक बाण से राजा को मारा; द्रौपदी के पुत्रों ने तिहत्तर से, धर्मराज युधिष्ठिर ने पाँच से और भीमसेन ने अस्सी बाणों से राजा को घायल किया।

श्लोक 15 (9.21.15)

समन्तात्कीर्यमाणस्तु बाणसङ्घैर्महात्मभिः । न चचाल महाराज सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥

samantātkīryamāṇastu bāṇasaṅghairmahātmabhiḥ | na cacāla mahārāja sarvasainyasya paśyataḥ

हे महाराज! उन महात्माओं के बाण-समूहों की चारों ओर से वर्षा होने पर भी वे समस्त सेना के देखते-देखते विचलित नहीं हुए।

श्लोक 16 (9.21.16)

लाघवात्सौष्ठवाच्चापि वीर्याच्चापि महात्मनः । अति सर्वाणि भूतानि ददृशुः सर्वपार्थिवाः ॥

lāghavātsauṣṭhavāccāpi vīryāccāpi mahātmanaḥ | ati sarvāṇi bhūtāni dadṛśuḥ sarvapārthivāḥ

समस्त राजाओं ने देखा कि वे महात्मा अपनी फुर्ती, कुशलता और बल में सभी प्राणियों से बढ़कर थे।

श्लोक 17 (9.21.17)

धार्तराष्ट्रा हि राजेन्द्र योधास्तु स्वल्पमन्तरम् । अपश्यमाना राजानं पर्यवर्तन्त दंशिताः ॥

dhārtarāṣṭrā hi rājendra yodhāstu svalpamantaram | apaśyamānā rājānaṃ paryavartanta daṃśitāḥ

हे राजेन्द्र! धृतराष्ट्र के पक्ष के योद्धा, जो थोड़ी ही दूरी पर थे, राजा को न देखकर कवच बाँधे हुए लौट पड़े।

श्लोक 18 (9.21.18)

तेषामापततां घोरस्तुमुलः समपद्यत । क्षुब्धस्य हि समुद्रस्य प्रावृट्‌काले यथा स्वनः ॥

teṣāmāpatatāṃ ghorastumulaḥ samapadyata | kṣubdhasya hi samudrasya prāvṛṭkāle yathā svanaḥ

उनके टूट पड़ने पर वर्षा ऋतु में क्षुब्ध समुद्र की गर्जना के समान भयंकर कोलाहल मच गया।

श्लोक 19 (9.21.19)

समासाद्य रणे ते तु राजानमपराजितम् । प्रत्युद्ययुर्महेष्वासाः पाण्डवानाततायिनः ॥

samāsādya raṇe te tu rājānamaparājitam | pratyudyayurmaheṣvāsāḥ pāṇḍavānātatāyinaḥ

रणभूमि में अपराजित राजा के पास पहुँचकर वे महाधनुर्धर आक्रमण करने वाले पाण्डवों का सामना करने बढ़े।

श्लोक 20 (9.21.20)

भीमसेनं रणे क्रुद्धो द्रोणपुत्रो न्यवारयत् । तयोर्बाणैर्महाराज प्रमुक्तैः सर्वतोदिशम् । नाज्ञायन्त रणे वीरा न दिशः प्रदिशस्तथा ॥

bhīmasenaṃ raṇe kruddho droṇaputro nyavārayat | tayorbāṇairmahārāja pramuktaiḥ sarvatodiśam | nājñāyanta raṇe vīrā na diśaḥ pradiśastathā

द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने क्रुद्ध होकर रणभूमि में भीमसेन को रोका। हे महाराज! उन दोनों के छोड़े हुए बाणों से चारों ओर ऐसा अन्धकार हुआ कि वीरों को न दिशाएँ सूझीं, न उपदिशाएँ।

श्लोक 21 (9.21.21)

तावुभौ क्रूरकर्माणावुभौ भारतदुःसहौ । घोररूपमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥

tāvubhau krūrakarmāṇāvubhau bhārataduḥsahau | ghorarūpamayudhyetāṃ kṛtapratikṛtaiṣiṇau

क्रूर कर्म करने वाले, भरतवंशियों के लिए भी दुःसह वे दोनों वीर एक-दूसरे के प्रहार का बदला चुकाने की इच्छा से भयंकर युद्ध करने लगे।

श्लोक 22 (9.21.22)

त्रासयन्तौ दिशः सर्वा ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । शकुनिस्तु रणे वीरो युधिष्ठिरमपीडयत् ॥

trāsayantau diśaḥ sarvā jyākṣepakaṭhinatvacau | śakunistu raṇe vīro yudhiṣṭhiramapīḍayat

बाणों की डोरी की रगड़ से कठोर हुई हथेलियों वाले वे दोनों सब दिशाओं को त्रस्त करते हुए लड़ते रहे। इधर वीर शकुनि ने रणभूमि में युधिष्ठिर को पीड़ित किया।

श्लोक 23 (9.21.23)

तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सुबलस्य सुतो विभो । नादं चकार बलवत्सर्वसैन्यानि कम्पयन् ॥

tasyāśvāṃścaturo hatvā subalasya suto vibho | nādaṃ cakāra balavatsarvasainyāni kampayan

हे विभो! युधिष्ठिर के चारों घोड़ों को मारकर सुबलपुत्र ने ऐसी ज़ोर की गर्जना की कि सारी सेनाएँ काँप उठीं।

श्लोक 24 (9.21.24)

एतस्मिन्नन्तरे वीरं राजानमपराजितम् । अपोवाह रथेनाजौ सहदेवः प्रतापवान् ॥

etasminnantare vīraṃ rājānamaparājitam | apovāha rathenājau sahadevaḥ pratāpavān

इसी बीच प्रतापी सहदेव अपराजित राजा को अपने रथ में बिठाकर युद्धभूमि से हटा ले गए।

श्लोक 25 (9.21.25)

अथान्यं रथमास्थाय धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । शकुनिं नवभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः । ननाद च महानादं प्रवरः सर्वधन्विनाम् ॥

athānyaṃ rathamāsthāya dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ | śakuniṃ navabhirviddhvā punarvivyādha pañcabhiḥ | nanāda ca mahānādaṃ pravaraḥ sarvadhanvinām

तब धर्मपुत्र युधिष्ठिर, जो सब धनुर्धारियों में श्रेष्ठ थे, दूसरे रथ पर चढ़कर शकुनि को पहले नौ बाणों से और फिर पाँच से बींधकर ज़ोर से गरजे।

श्लोक 26 (9.21.26)

तद्युद्धमभवच्चित्रं घोररूपं च मारिष । प्रेक्षतां प्रीतिजननं सिद्धचारणसेवितम् ॥

tadyuddhamabhavaccitraṃ ghorarūpaṃ ca māriṣa | prekṣatāṃ prītijananaṃ siddhacāraṇasevitam

हे मान्यवर! वह युद्ध विचित्र और भयानक था, देखने वालों को आनन्द देने वाला था और सिद्ध-चारण उसे देख रहे थे।

श्लोक 27 (9.21.27)

उलूकस्तु महेष्वासं नकुलं युद्धदुर्मदम् । अभ्यवर्षदमेयात्मा शरवर्षैः समन्ततः ॥

ulūkastu maheṣvāsaṃ nakulaṃ yuddhadurmadam | abhyavarṣadameyātmā śaravarṣaiḥ samantataḥ

अपरिमित बल वाले उलूक ने युद्ध के मद में चूर महाधनुर्धर नकुल पर चारों ओर से बाणों की वर्षा की।

श्लोक 28 (9.21.28)

तथैव नकुलः शूरः सौबलस्य सुतं रणे । शरवर्षेण महता समन्तात्पर्यवारयत् ॥

tathaiva nakulaḥ śūraḥ saubalasya sutaṃ raṇe | śaravarṣeṇa mahatā samantātparyavārayat

उसी प्रकार शूर नकुल ने भी रणभूमि में सौबल (शकुनि) के पुत्र उलूक को बाणों की भारी वर्षा से चारों ओर घेर लिया।

श्लोक 29 (9.21.29)

तौ तत्र समरे वीरौ कुलपुत्रौ महारथौ । योधयन्तावपश्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥

tau tatra samare vīrau kulaputrau mahārathau | yodhayantāvapaśyetāṃ kṛtapratikṛtaiṣiṇau

कुलीन घरों के पुत्र वे दोनों महारथी वीर वहाँ युद्ध में एक-दूसरे का बदला चुकाने की इच्छा से लड़ते हुए दिखाई दिए।

श्लोक 30 (9.21.30)

तथैव कृतवर्माणं शैनेयः शत्रुतापनः । योधयञ्शुशुभे राजन्बलिं शक्र इवाहवे ॥

tathaiva kṛtavarmāṇaṃ śaineyaḥ śatrutāpanaḥ | yodhayañśuśubhe rājanbaliṃ śakra ivāhave

इसी प्रकार शत्रुओं को तपाने वाले शैनेय (सात्यकि) कृतवर्मा से लड़ते हुए युद्ध में ऐसे शोभित हुए, हे राजन्, जैसे बलि से लड़ते हुए इन्द्र।

श्लोक 31 (9.21.31)

दुर्योधनो धनुश्छित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध निशितैः शरैः ॥

duryodhano dhanuśchittvā dhṛṣṭadyumnasya saṃyuge | athainaṃ chinnadhanvānaṃ vivyādha niśitaiḥ śaraiḥ

दुर्योधन ने युद्ध में धृष्टद्युम्न का धनुष काटकर, फिर उन्हें धनुषहीन देख तीखे बाणों से बींध दिया।

श्लोक 32 (9.21.32)

धृष्टद्युम्नोऽपि समरे प्रगृह्य परमायुधम् । राजानं योधयामास पश्यतां सर्वधन्विनाम् ॥

dhṛṣṭadyumno'pi samare pragṛhya paramāyudham | rājānaṃ yodhayāmāsa paśyatāṃ sarvadhanvinām

धृष्टद्युम्न ने भी उत्तम शस्त्र उठाकर सब धनुर्धारियों के देखते-देखते राजा से युद्ध किया।

श्लोक 33 (9.21.33)

तयोर्युद्धं महच्चासीत्सङ्ग्रामे भरतर्षभ । प्रभिन्नयोर्यथा सक्तं मत्तयोर्वनहस्तिनोः ॥

tayoryuddhaṃ mahaccāsītsaṅgrāme bharatarṣabha | prabhinnayoryathā saktaṃ mattayorvanahastinoḥ

हे भरतश्रेष्ठ! उन दोनों के बीच मद बहाते हुए दो वन-हाथियों के भिड़ने जैसा भारी युद्ध हुआ।

श्लोक 34 (9.21.34)

गौतमस्तु रणे क्रुद्धो द्रौपदेयान्महाबलान् । विव्याध बहुभिः शूरः शरैः सन्नतपर्वभिः ॥

gautamastu raṇe kruddho draupadeyānmahābalān | vivyādha bahubhiḥ śūraḥ śaraiḥ sannataparvabhiḥ

गौतम (कृपाचार्य) ने रणभूमि में क्रुद्ध होकर शूरता से द्रौपदी के महाबली पुत्रों को सीधी गाँठ वाले बहुत-से बाणों से बींध दिया।

श्लोक 35 (9.21.35)

तस्य तैरभवद्युद्धमिन्द्रियैरिव देहिनः । घोररूपमसंवार्यं निर्मर्यादमवर्तत ॥

tasya tairabhavadyuddhamindriyairiva dehinaḥ | ghorarūpamasaṃvāryaṃ nirmaryādamavartata

उनके साथ उसका युद्ध ऐसा था जैसे देहधारी जीव का अपनी इन्द्रियों के साथ संघर्ष: भयानक, अनिवार्य और मर्यादा से परे।

श्लोक 36 (9.21.36)

ते च सम्पीडयामासुरिन्द्रियाणीव बालिशम् । स च तान्प्रतिसंरब्धः प्रत्ययोधयदाहवे ॥

te ca sampīḍayāmāsurindriyāṇīva bāliśam | sa ca tānpratisaṃrabdhaḥ pratyayodhayadāhave

उन्होंने उसे वैसे ही पीड़ित किया जैसे इन्द्रियाँ मूर्ख को सताती हैं, और उसने भी क्रुद्ध होकर युद्ध में उनका प्रत्युत्तर दिया।

श्लोक 37 (9.21.37)

एवं चित्रमभूद्युद्धं तस्य तैः सह भारत । उत्थायोत्थाय हि यथा देहिनामिन्द्रियैर्विभो ॥

evaṃ citramabhūdyuddhaṃ tasya taiḥ saha bhārata | utthāyotthāya hi yathā dehināmindriyairvibho

हे भारत! हे विभो! इस प्रकार उसका उनके साथ विचित्र युद्ध हुआ, जैसे देहधारी के विरुद्ध इन्द्रियाँ बार-बार उठ खड़ी होती हैं।

श्लोक 38 (9.21.38)

नराश्चैव नरैः सार्धं दन्तिनो दन्तिभिस्तथा । हया हयैः समासक्ता रथिनो रथिभिः सह ॥

narāścaiva naraiḥ sārdhaṃ dantino dantibhistathā | hayā hayaiḥ samāsaktā rathino rathibhiḥ saha

मनुष्य मनुष्यों से, हाथी हाथियों से, घोड़े घोड़ों से और रथी रथियों से गुँथ गए।

श्लोक 39 (9.21.39)

सङ्कुलं चाभवद्भूयो घोररूपं विशाम्पते ॥

saṅkulaṃ cābhavadbhūyo ghorarūpaṃ viśāmpate

हे प्रजापति! वह घमासान और भी भयंकर हो गया।

श्लोक 40 (9.21.40)

इदं चित्रमिदं घोरमिदं रौद्रमिति प्रभो । युद्धान्यासन्महाराज घोराणि च बहूनि च ॥

idaṃ citramidaṃ ghoramidaṃ raudramiti prabho | yuddhānyāsanmahārāja ghorāṇi ca bahūni ca

हे प्रभो! हे महाराज! "यह विचित्र है, यह भयानक है, यह रौद्र है", इस प्रकार के अनेक भयंकर युद्ध वहाँ हुए।

श्लोक 41 (9.21.41)

ते समासाद्य समरे परस्परमरिन्दमाः । व्यनदंश्चैव जघ्नुश्च समासाद्य महाहवे ॥

te samāsādya samare parasparamarindamāḥ | vyanadaṃścaiva jaghnuśca samāsādya mahāhave

वे शत्रुदमन योद्धा रणभूमि में एक-दूसरे से भिड़कर गरजते और प्रहार करते हुए उस महायुद्ध में लड़ते रहे।

श्लोक 42 (9.21.42)

तेषां पत्रसमुद्भूतं रजस्तीव्रमदृश्यत । वातेन चोद्धतं राजन्धावद्भिश्चाश्वसादिभिः ॥

teṣāṃ patrasamudbhūtaṃ rajastīvramadṛśyata | vātena coddhataṃ rājandhāvadbhiścāśvasādibhiḥ

हे राजन्! उनके वाहनों से उठी, हवा और दौड़ते घुड़सवारों से उड़ाई हुई घनी धूल दिखाई देने लगी।

श्लोक 43 (9.21.43)

रथनेमिसमुद्भूतं निःश्वासैश्चापि दन्तिनाम् । रजः सन्ध्याभ्रकलिलं दिवाकरपथं ययौ ॥

rathanemisamudbhūtaṃ niḥśvāsaiścāpi dantinām | rajaḥ sandhyābhrakalilaṃ divākarapathaṃ yayau

रथों के पहियों और हाथियों की साँसों से उठी वह धूल, सन्ध्या के बादलों के समूह जैसी, सूर्य के मार्ग तक जा पहुँची।

श्लोक 44 (9.21.44)

रजसा तेन सम्पृक्तो भास्करो निष्प्रभः कृतः । सञ्छादिताऽभवद्भूमिस्ते च शूरा महारथाः ॥

rajasā tena sampṛkto bhāskaro niṣprabhaḥ kṛtaḥ | sañchāditā'bhavadbhūmiste ca śūrā mahārathāḥ

उस धूल से मिलकर सूर्य निस्तेज हो गया; पृथ्वी और वे शूर महारथी ढक गए।

श्लोक 45 (9.21.45)

मुहूर्तादिव संवृत्तं नीरजस्कं समन्ततः । वीरशोणितसिक्तायां भूमौ भरतसत्तम ॥

muhūrtādiva saṃvṛttaṃ nīrajaskaṃ samantataḥ | vīraśoṇitasiktāyāṃ bhūmau bharatasattama

हे भरतश्रेष्ठ! वीरों के रक्त से भूमि के भीग जाने पर एक क्षण में ही चारों ओर मानो धूल रहित हो गया।

श्लोक 46 (9.21.46)

उपाशाम्यत्ततस्तीव्रं तद्रजो घोरदर्शनम् ॥

upāśāmyattatastīvraṃ tadrajo ghoradarśanam

तब वह तीव्र और भयंकर दिखाई देने वाली धूल शान्त हो गई।

श्लोक 47 (9.21.47)

ततोऽपश्यमहं भूयो द्वन्द्वयुद्धानि भारत । यथाप्राणं यथाश्रेष्ठं मध्याह्ने वै सुदारुणम् ॥

tato'paśyamahaṃ bhūyo dvandvayuddhāni bhārata | yathāprāṇaṃ yathāśreṣṭhaṃ madhyāhne vai sudāruṇam

हे भारत! फिर मैंने मध्याह्न में, बल और श्रेष्ठता के अनुसार जोड़ी बने योद्धाओं के अत्यन्त भीषण द्वन्द्वयुद्ध फिर देखे।

श्लोक 48 (9.21.48)

वर्मणां तत्र राजेन्द्र व्यदृश्यन्तोज्ज्वलाः प्रभाः । शब्दश्च तुमुलः सङ्ख्ये शराणां पततामभूत् । महावेणुवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते ॥

varmaṇāṃ tatra rājendra vyadṛśyantojjvalāḥ prabhāḥ | śabdaśca tumulaḥ saṅkhye śarāṇāṃ patatāmabhūt | mahāveṇuvanasyeva dahyamānasya parvate

हे राजेन्द्र! वहाँ कवचों की उज्ज्वल आभा दिखाई देती थी, और रणभूमि में गिरते बाणों का कोलाहल ऐसा था जैसे पर्वत पर जलते हुए विशाल बाँस के वन की ध्वनि।

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