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शल्य पर्व · अध्याय 22

शकुनि का अश्वारोही आक्रमण और घुड़सवारों का संहार

सञ्जय बताते हैं कि पाण्डवों के प्रहार से टूटी हुई कौरव-सेना सँभलती है और युद्ध प्राणों की बाज़ी का रूप ले लेता है। युधिष्ठिर कृपाचार्य और कृतवर्मा पर आक्रमण करते हैं; दुर्योधन उन पर सात सौ रथ भेजता है, जब तक शिखण्डी आदि उनकी रक्षा को नहीं आ जाते। भयंकर अपशकुन होते हैं, फिर भी क्षत्रिय डटे रहते हैं। शकुनि दस हज़ार घुड़सवारों के साथ पाण्डव-सेना के पिछले भाग पर टूट पड़ता है, और युधिष्ठिर सहदेव को हाथी, घोड़े, पैदल और द्रौपदी के पुत्रों के साथ उसके विरुद्ध भेजते हैं। धूल के बादलों में हुए घुड़सवारों के युद्ध में भूमि मनुष्यों और घोड़ों से पट जाती है; शकुनि हटता है, लौटता है और अन्त में चारों ओर से घिर जाता है।

अध्याय 21अध्याय-सूचीअध्याय 23

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.22.1)

वर्तमाने तदा युद्धे घोररूपे भयानके । अभज्यत बलं तत्र तव पुत्रस्य पाण्डवैः ॥

vartamāne tadā yuddhe ghorarūpe bhayānake | abhajyata balaṃ tatra tava putrasya pāṇḍavaiḥ

इस प्रकार भयंकर और भयानक युद्ध के चलते रहने पर आपके पुत्र की सेना वहाँ पाण्डवों के हाथों टूट गई।

श्लोक 2 (9.22.2)

तांस्तु सर्वान्यत्नेन सन्निवार्य महारथाः । पुत्रास्ते योधयामासुः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥

tāṃstu sarvānyatnena sannivārya mahārathāḥ | putrāste yodhayāmāsuḥ pāṇḍavānāmanīkinīm

परन्तु आपके पुत्रों ने, जो महारथी थे, उन सबको बड़े यत्न से रोककर पाण्डवों की सेना से युद्ध किया।

श्लोक 3 (9.22.3)

निवृत्ताः सहसा योधास्तव पुत्रजयैषिणः । सन्निवृत्तेषु तेष्वेवं युद्धमासीत्सुदारुणम् । तावकानां परेषां च देवासुररणोपमम् ॥

nivṛttāḥ sahasā yodhāstava putrajayaiṣiṇaḥ | sannivṛtteṣu teṣvevaṃ yuddhamāsītsudāruṇam | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca devāsuraraṇopamam

आपके पुत्र की विजय चाहने वाले योद्धा सहसा लौट पड़े। उनके लौट आने पर आपके और शत्रुओं के बीच देवासुर-संग्राम के समान अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा।

श्लोक 4 (9.22.4)

परेषां तावकानां च नासीत्कश्चित्पराङ्मुखः ॥

pareṣāṃ tāvakānāṃ ca nāsītkaścitparāṅmukhaḥ

शत्रुओं की सेना में और आपकी सेना में, कोई भी पीठ दिखाने वाला नहीं था।

श्लोक 5 (9.22.5)

अनुमानेन युध्यन्ते सञ्ज्ञाभिश्च परस्परम् । तेषां क्षयो महानासीद्युध्यतामितरेतरम् ॥

anumānena yudhyante sañjñābhiśca parasparam | teṣāṃ kṣayo mahānāsīdyudhyatāmitaretaram

वे अनुमान से और संकेतों से एक-दूसरे से लड़ रहे थे; परस्पर लड़ते हुए उनका बड़ा संहार हुआ।

श्लोक 6 (9.22.6)

ततो युधिष्ठिरो राजा क्रोधेन महता युतः । जिगीषमाणः सङ्ग्रामे धार्तराष्ट्रान्सराजकान् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā krodhena mahatā yutaḥ | jigīṣamāṇaḥ saṅgrāme dhārtarāṣṭrānsarājakān

तब राजा युधिष्ठिर ने महान् क्रोध से भरकर, युद्ध में धृतराष्ट्र के पुत्रों को उनके राजाओं सहित जीतने की इच्छा से,

श्लोक 7 (9.22.7)

त्रिभिः शारद्वतं विद्ध्वा रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः । चतुर्भिर्निजघानाश्वान्कल्याणान्कृतवर्मणः ॥

tribhiḥ śāradvataṃ viddhvā rukmapuṅkhaiḥ śilāśitaiḥ | caturbhirnijaghānāśvānkalyāṇānkṛtavarmaṇaḥ

सोने के पंखों वाले और पत्थर पर तेज़ किए हुए तीन बाणों से शारद्वत (कृपाचार्य) को बींधा और चार बाणों से कृतवर्मा के सुन्दर घोड़ों को मार डाला।

श्लोक 8 (9.22.8)

अश्वत्थामा तु हार्दिक्यमपोवाह यशस्विनम् । अथ शारद्वतोऽष्टाभिः प्रत्यविध्यद्युधिष्ठिरम् ॥

aśvatthāmā tu hārdikyamapovāha yaśasvinam | atha śāradvato'ṣṭābhiḥ pratyavidhyadyudhiṣṭhiram

तब अश्वत्थामा यशस्वी हार्दिक्य (कृतवर्मा) को वहाँ से हटा ले गया; और शारद्वत ने आठ बाणों से युधिष्ठिर को बदले में बींध दिया।

श्लोक 9 (9.22.9)

ततो दुर्योधनो राजा रथान्सप्तशतान्रणे । प्रैषयद्यत्र राजाऽसौ धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥

tato duryodhano rājā rathānsaptaśatānraṇe | praiṣayadyatra rājā'sau dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

तब राजा दुर्योधन ने सात सौ रथ युद्ध में वहाँ भेजे जहाँ धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर थे।

श्लोक 10 (9.22.10)

ते रथा रथिभिर्युक्ता मनोमारुतरंहसः । अभ्यद्रवन्त सङ्ग्रामे कौन्तेयस्य रथं प्रति ॥

te rathā rathibhiryuktā manomārutaraṃhasaḥ | abhyadravanta saṅgrāme kaunteyasya rathaṃ prati

रथियों से भरे और मन तथा वायु के समान वेग वाले वे रथ युद्ध में कुन्तीपुत्र के रथ की ओर दौड़ पड़े।

श्लोक 11 (9.22.11)

ते समन्तान्महाराज परिवार्य युधिष्ठिरम् । अदृश्यं सायकैश्चक्रुर्मेघा इव दिवाकरम् ॥

te samantānmahārāja parivārya yudhiṣṭhiram | adṛśyaṃ sāyakaiścakrurmeghā iva divākaram

हे महाराज! उन्होंने चारों ओर से युधिष्ठिर को घेर लिया और बादल जैसे सूर्य को ढक लेते हैं, वैसे ही बाणों से उन्हें अदृश्य कर दिया।

श्लोक 12 (9.22.12)

तं दृष्ट्वा धर्मराजानं कौरवेयैस्तथावृतम् । नामृष्यन्त सुसंरब्धाः शिखण्डिप्रमुखा रथाः ॥

taṃ dṛṣṭvā dharmarājānaṃ kauraveyaistathāvṛtam | nāmṛṣyanta susaṃrabdhāḥ śikhaṇḍipramukhā rathāḥ

धर्मराज को कौरवों से इस प्रकार घिरा देखकर शिखण्डी आदि रथी अत्यन्त क्रुद्ध हो गए और उसे सह न सके;

श्लोक 13 (9.22.13)

रथैरश्ववरैर्युक्तैः किङ्किणीजालसंवृतैः । आजग्मुरथ रक्षन्तः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥

rathairaśvavarairyuktaiḥ kiṅkiṇījālasaṃvṛtaiḥ | ājagmuratha rakṣantaḥ kuntīputraṃ yudhiṣṭhiram

उत्तम घोड़ों से जुते और घण्टियों की जालियों से सजे रथों में वे कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर की रक्षा करने के लिए आ पहुँचे।

श्लोक 14 (9.22.14)

ततः प्रववृते रौद्रः सङ्ग्रामः शोणितोदकः । पाण्डवानां कुरूणां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥

tataḥ pravavṛte raudraḥ saṅgrāmaḥ śoṇitodakaḥ | pāṇḍavānāṃ kurūṇāṃ ca yamarāṣṭravivardhanaḥ

तब पाण्डवों और कौरवों के बीच रक्त के जलवाला, यमराज के राज्य को बढ़ाने वाला भयंकर संग्राम छिड़ गया।

श्लोक 15 (9.22.15)

रथान्सप्तशतान्हत्वा कुरूणामाततायिनाम् । पाण्डवाः सह पाञ्चालैः पुनरेवाभ्यवारयन् ॥

rathānsaptaśatānhatvā kurūṇāmātatāyinām | pāṇḍavāḥ saha pāñcālaiḥ punarevābhyavārayan

आक्रमण करने वाले कौरवों के सात सौ रथों को मारकर पाण्डवों ने पाञ्चालों के साथ फिर उन्हें घेर लिया।

श्लोक 16 (9.22.16)

तत्र युद्धं महच्चासीत्तव पुत्रस्य पाण्डवैः । न च तत्तादृशं दृष्टं नैव चापि परिश्रुतम् ॥

tatra yuddhaṃ mahaccāsīttava putrasya pāṇḍavaiḥ | na ca tattādṛśaṃ dṛṣṭaṃ naiva cāpi pariśrutam

वहाँ आपके पुत्र और पाण्डवों के बीच बड़ा युद्ध हुआ; वैसा न हमने कभी देखा था, न सुना ही था।

श्लोक 17 (9.22.17)

वर्तमाने तदा युद्धे निर्मर्यादे समन्ततः । वध्यमानेषु योधेषु तावकेष्वितरेषु च ॥

vartamāne tadā yuddhe nirmaryāde samantataḥ | vadhyamāneṣu yodheṣu tāvakeṣvitareṣu ca

जब चारों ओर मर्यादाहीन युद्ध चल रहा था और आपके तथा शत्रुओं के योद्धा मारे जा रहे थे,

श्लोक 18 (9.22.18)

विनदत्सु च योधेषु शङ्खवर्यैश्च पूरितैः । उत्क्रुष्टैः सिंहनादैश्च गर्जितैश्चैव धन्विनाम् ॥

vinadatsu ca yodheṣu śaṅkhavaryaiśca pūritaiḥ | utkruṣṭaiḥ siṃhanādaiśca garjitaiścaiva dhanvinām

जब योद्धा गरज रहे थे, उत्तम शंख बजाए जा रहे थे, और ललकारों, सिंहनादों तथा धनुर्धारियों की टङ्कारों से दिशाएँ गूँज रही थीं,

श्लोक 19 (9.22.19)

अतिप्रवृत्ते युद्धे च छिद्यमानेषु मर्मसु । धावमानेषु योधेषु जयगृद्धिषु मारिष ॥

atipravṛtte yuddhe ca chidyamāneṣu marmasu | dhāvamāneṣu yodheṣu jayagṛddhiṣu māriṣa

जब युद्ध अत्यन्त बढ़ गया था, मर्मस्थान कट रहे थे और विजय के लोभी योद्धा इधर-उधर दौड़ रहे थे, हे मान्यवर,

श्लोक 20 (9.22.20)

संहारे सर्वतो जाते पृथिव्यां शोकसम्भवे । बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां सीमन्तोद्धरणे कृते ॥

saṃhāre sarvato jāte pṛthivyāṃ śokasambhave | bahvīnāmuttamastrīṇāṃ sīmantoddharaṇe kṛte

जब चारों ओर संहार हो रहा था, पृथ्वी पर शोक उत्पन्न हो रहा था, और बहुत-सी उत्तम स्त्रियों की माँग उजड़ रही थी,

श्लोक 21 (9.22.21)

निर्मर्यादे महायुद्धे वर्तमाने सुदारुणे । प्रादुरासन्विनाशाय तदोत्पाताः सुदारुणाः ॥

nirmaryāde mahāyuddhe vartamāne sudāruṇe | prādurāsanvināśāya tadotpātāḥ sudāruṇāḥ

जब वह मर्यादाहीन, अत्यन्त भयंकर महायुद्ध चल रहा था, तब विनाश के सूचक भयंकर अपशकुन प्रकट हुए।

श्लोक 22 (9.22.22)

चचाल शब्दं कुर्वाणा सपर्वतवना मही । सदण्डाः सोल्मुका राजन्कीर्यमाणाः समन्ततः ॥

cacāla śabdaṃ kurvāṇā saparvatavanā mahī | sadaṇḍāḥ solmukā rājankīryamāṇāḥ samantataḥ

पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी गड़गड़ाहट करती हुई काँप उठी; और हे राजन्, दण्डों तथा जलती लकड़ियों समेत चारों ओर बिखरते हुए

श्लोक 23 (9.22.23)

उल्काः पेतुर्दिवो भूमावाहत्य रविमण्डलम् । विष्वग्वाताः प्रादुरासन्नीचैः शर्करवर्षिणः ॥

ulkāḥ peturdivo bhūmāvāhatya ravimaṇḍalam | viṣvagvātāḥ prādurāsannīcaiḥ śarkaravarṣiṇaḥ

उल्काएँ आकाश से सूर्यमण्डल से टकराकर भूमि पर गिरने लगीं। चारों ओर से बवण्डर उठे, जो नीचे-नीचे बहकर कंकड़ बरसा रहे थे।

श्लोक 24 (9.22.24)

अश्रूणि मुमुचुर्नागा वेपथुं चास्पृशन्भृशम् । एतान्घोराननादृत्य समुत्पातान्सुदारुणान् ॥

aśrūṇi mumucurnāgā vepathuṃ cāspṛśanbhṛśam | etānghorānanādṛtya samutpātānsudāruṇān

हाथी आँसू बहाने लगे और ज़ोर से काँपने लगे। इन भयंकर और दारुण अपशकुनों की उपेक्षा करके

श्लोक 25 (9.22.25)

पुनर्युद्धाय संयत्ताः क्षत्रियास्तस्थुरव्यथाः । रमणीये कुरुक्षेत्रे पुण्ये स्वर्गं यियासवः ॥

punaryuddhāya saṃyattāḥ kṣatriyāstasthuravyathāḥ | ramaṇīye kurukṣetre puṇye svargaṃ yiyāsavaḥ

क्षत्रिय फिर से युद्ध के लिए तत्पर होकर निर्भय खड़े रहे; वे रमणीय, पुण्य कुरुक्षेत्र में स्वर्ग जाने की इच्छा रखते थे।

श्लोक 26 (9.22.26)

ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् । युध्यध्वमग्रतो यावत्पृष्ठतो हन्मि पाण्डवान् ॥

tato gāndhārarājasya putraḥ śakunirabravīt | yudhyadhvamagrato yāvatpṛṣṭhato hanmi pāṇḍavān

तब गान्धारराज के पुत्र शकुनि ने कहा: "तुम आगे से लड़ते रहो, जब तक मैं पीछे से पाण्डवों को मारता हूँ।"

श्लोक 27 (9.22.27)

ततो नः सम्प्रायातानां मद्रयोधास्तरस्विनः । हृष्टाः किलाकिलाशब्दमकुर्वत परे तथा ॥

tato naḥ samprāyātānāṃ madrayodhāstarasvinaḥ | hṛṣṭāḥ kilākilāśabdamakurvata pare tathā

तब हमारे आगे बढ़ने पर वेगवान् मद्रदेशीय योद्धाओं ने हर्षित होकर किलकारियाँ भरीं, और दूसरों ने भी ऐसा ही किया।

श्लोक 28 (9.22.28)

अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्षा दुरासदाः । शरासनानि धुन्वन्तः शरवर्षैरवाकिरन् ॥

asmāṃstu punarāsādya labdhalakṣā durāsadāḥ | śarāsanāni dhunvantaḥ śaravarṣairavākiran

फिर हमसे भिड़कर उन दुर्जेय योद्धाओं ने, जिन्होंने लक्ष्य साध लिया था, धनुष हिलाते हुए हम पर बाणों की वर्षा की।

श्लोक 29 (9.22.29)

ततो हतं परैस्तत्र मद्रराजबलं तदा । दुर्योधनबलं दृष्ट्वा पुनरासीत्पराङ्मुखम् ॥

tato hataṃ paraistatra madrarājabalaṃ tadā | duryodhanabalaṃ dṛṣṭvā punarāsītparāṅmukham

तब शत्रुओं ने वहाँ मद्रराज की सेना को मार गिराया, और दुर्योधन की सेना को देखकर वह फिर पीठ दिखाने लगी।

श्लोक 30 (9.22.30)

गान्धारराजस्तु पुनर्वाक्यमाह ततो बली । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ॥

gāndhārarājastu punarvākyamāha tato balī | nivartadhvamadharmajñā yudhyadhvaṃ kiṃ sṛtena vaḥ

तब बलवान् गान्धारराज ने फिर कहा: "लौटो, अधर्म को न जानने वालो! लड़ो! तुम्हारे भाग जाने से क्या लाभ?"

श्लोक 31 (9.22.31)

अनीकं दशसाहस्रमश्वानां भरतर्षभ । आसीद्गान्धारराजस्य विशालप्रासयोधिनाम् ॥

anīkaṃ daśasāhasramaśvānāṃ bharatarṣabha | āsīdgāndhārarājasya viśālaprāsayodhinām

हे भरतश्रेष्ठ! गान्धारराज के पास चौड़े भाले लेकर लड़ने वाले दस हज़ार घुड़सवारों की सेना थी।

श्लोक 32 (9.22.32)

बलेन तेन विक्रम्य वर्तमाने जनक्षये । पृष्ठतः पाण्डवानीकमभ्यघ्नन्निशितैः शरैः ॥

balena tena vikramya vartamāne janakṣaye | pṛṣṭhataḥ pāṇḍavānīkamabhyaghnanniśitaiḥ śaraiḥ

उसी सेना के बल से पराक्रम दिखाते हुए, जब मनुष्यों का संहार हो रहा था, उसने पीछे की ओर से पाण्डव-सेना पर तीखे बाण बरसाए।

श्लोक 33 (9.22.33)

तदभ्रमिव वातेन क्षिप्यमाणं समन्ततः । अभज्यत महाराज पाण्डूनां सुमहद्बलम् ॥

tadabhramiva vātena kṣipyamāṇaṃ samantataḥ | abhajyata mahārāja pāṇḍūnāṃ sumahadbalam

हे महाराज! हवा से उड़ाए जाते हुए बादल की तरह चारों ओर बिखरती हुई पाण्डवों की वह विशाल सेना टूट गई।

श्लोक 34 (9.22.34)

ततो युधिष्ठिरः प्रेक्ष्य भग्नं स्वबलमन्तिकात् । अभ्यनोदयदव्यग्रः सहदेवं महाबलम् ॥

tato yudhiṣṭhiraḥ prekṣya bhagnaṃ svabalamantikāt | abhyanodayadavyagraḥ sahadevaṃ mahābalam

तब युधिष्ठिर ने अपनी सेना को पास ही टूटते देखकर शान्त भाव से महाबली सहदेव को प्रेरित किया:

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 35 (9.22.35)

असौ सुबलपुत्रो नो जघनं पीड्य दंशितः । सैन्यानि सूदयत्येष पश्य पाण्डव दुर्मतिः ॥

asau subalaputro no jaghanaṃ pīḍya daṃśitaḥ | sainyāni sūdayatyeṣa paśya pāṇḍava durmatiḥ

"यह सुबल का पुत्र कवच पहने हुए हमारे पिछले भाग को दबाकर सेनाओं को मार रहा है। हे पाण्डव! देखो उस दुर्बुद्धि को!

श्लोक 36 (9.22.36)

गच्छ त्वं द्रौपदेयैश्च शकुनिं सौबलं जहि । रथानीकमहं धक्ष्ये पाञ्चालसहितोऽनघ ॥

gaccha tvaṃ draupadeyaiśca śakuniṃ saubalaṃ jahi | rathānīkamahaṃ dhakṣye pāñcālasahito'nagha

तुम द्रौपदी के पुत्रों के साथ जाओ और सुबलपुत्र शकुनि को मारो। हे निष्पाप! मैं पाञ्चालों के साथ रथ-सेना को भस्म कर दूँगा।

श्लोक 37 (9.22.37)

गच्छन्तु कुञ्जराः सर्वे वाजिनश्च सह त्वया । पादाताश्च त्रिसाहस्राः शकुनिं तैर्वृतो जहि ॥

gacchantu kuñjarāḥ sarve vājinaśca saha tvayā | pādātāśca trisāhasrāḥ śakuniṃ tairvṛto jahi

सब हाथी और घोड़े तुम्हारे साथ जाएँ और तीन हज़ार पैदल सैनिक भी; उनसे घिरे हुए तुम शकुनि को मारो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 38 (9.22.38)

ततो गजाः सप्तशताश्चापपाणिभिरास्थिताः । पञ्च चाश्वसहस्राणि सहदेवश्च वीर्यवान् ॥

tato gajāḥ saptaśatāścāpapāṇibhirāsthitāḥ | pañca cāśvasahasrāṇi sahadevaśca vīryavān

तब हाथों में धनुष लिए योद्धाओं से सजे सात सौ हाथी, पाँच हज़ार घोड़े और पराक्रमी सहदेव,

श्लोक 39 (9.22.39)

पादाताश्च त्रिसाहस्रा द्रौपदेयाश्च सर्वशः । रणे ह्यभ्यद्रवंस्ते तु शकुनिं युद्धदुर्मदम् ॥

pādātāśca trisāhasrā draupadeyāśca sarvaśaḥ | raṇe hyabhyadravaṃste tu śakuniṃ yuddhadurmadam

तीन हज़ार पैदल सैनिक और द्रौपदी के सभी पुत्र, युद्ध के मद में चूर शकुनि पर रणभूमि में टूट पड़े।

श्लोक 40 (9.22.40)

ततस्तु सौबलो राजन्नभ्यतिक्रम्य पाण्डवान् । जघान पृष्ठतः सेनां जयगृद्धः प्रतापवान् ॥

tatastu saubalo rājannabhyatikramya pāṇḍavān | jaghāna pṛṣṭhataḥ senāṃ jayagṛddhaḥ pratāpavān

परन्तु हे राजन्, विजय के लोभी प्रतापी सौबल पाण्डवों को लाँघकर निकल गया और पीछे से सेना पर प्रहार करने लगा।

श्लोक 41 (9.22.41)

अश्वारोहास्तु संरब्धाः पाण्डवानां तरस्विनाम् । प्राविशन्सौबलानीकमभ्यतिक्रम्य तान्रथान् ॥

aśvārohāstu saṃrabdhāḥ pāṇḍavānāṃ tarasvinām | prāviśansaubalānīkamabhyatikramya tānrathān

तब वेगवान् पाण्डवों के क्रुद्ध घुड़सवार उन रथों को लाँघकर सौबल की सेना में घुस गए।

श्लोक 42 (9.22.42)

ते तत्र सादिनः शूराः सौबलस्य महद्बलम् । रणमध्ये व्यतिष्ठन्त शरवर्षैरवाकिरन् ॥

te tatra sādinaḥ śūrāḥ saubalasya mahadbalam | raṇamadhye vyatiṣṭhanta śaravarṣairavākiran

वे शूर घुड़सवार वहाँ युद्ध के बीच सौबल की विशाल सेना के सामने डटकर खड़े हो गए और उस पर बाणों की वर्षा करने लगे।

श्लोक 43 (9.22.43)

तदुद्यतगदाप्रासमकापुरुषसेवितम् । प्रावर्तत महद्युद्धं राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

tadudyatagadāprāsamakāpuruṣasevitam | prāvartata mahadyuddhaṃ rājandurmantrite tava

हे राजन्! आपकी बुरी मन्त्रणा के फलस्वरूप गदाएँ और भाले उठाए हुए, कायरों से रहित एक महायुद्ध छिड़ गया।

श्लोक 44 (9.22.44)

उपारमन्त ज्याशब्दाः प्रेक्षका रथिनोऽभवन् । न हि स्वेषां परेषां वा विशेषः प्रत्यदृश्यत ॥

upāramanta jyāśabdāḥ prekṣakā rathino'bhavan | na hi sveṣāṃ pareṣāṃ vā viśeṣaḥ pratyadṛśyata

धनुष की डोरियों की टङ्कारें थम गईं और रथी केवल दर्शक बन गए; क्योंकि अपनों और शत्रुओं में कोई भेद नहीं दिखाई देता था।

श्लोक 45 (9.22.45)

शूरबाहुविसृष्टानां शक्तीनां भरतर्षभ । ज्योतिषामिव सम्पातमपश्यन्कुरुपाण्डवाः ॥

śūrabāhuvisṛṣṭānāṃ śaktīnāṃ bharatarṣabha | jyotiṣāmiva sampātamapaśyankurupāṇḍavāḥ

हे भरतश्रेष्ठ! कौरवों और पाण्डवों ने शूरों की भुजाओं से छोड़ी गई शक्तियों का गिरना ऐसे देखा जैसे ज्योतियों (उल्काओं) का गिरना हो।

श्लोक 46 (9.22.46)

ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च तत्रतत्र विशाम्पते । सम्पतन्तीभिराकाशमावृतं बह्वशोभत ॥

ṛṣṭibhirvimalābhiśca tatratatra viśāmpate | sampatantībhirākāśamāvṛtaṃ bahvaśobhata

हे प्रजानाथ! यहाँ-वहाँ उड़ती हुई चमकीली ऋष्टियों से ढका हुआ आकाश खूब शोभित हुआ।

श्लोक 47 (9.22.47)

प्रासानां पततां राजन्रूपमासीत्समन्ततः । शलभानामिवाकाशे तदा भरतसत्तम ॥

prāsānāṃ patatāṃ rājanrūpamāsītsamantataḥ | śalabhānāmivākāśe tadā bharatasattama

हे राजन्! हे भरतश्रेष्ठ! चारों ओर गिरते हुए प्रासों का दृश्य आकाश में टिड्डियों के झुण्डों जैसा था।

श्लोक 48 (9.22.48)

रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा विप्रविद्धैर्नियन्तृभिः । हयाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ॥

rudhirokṣitasarvāṅgā vipraviddhairniyantṛbhiḥ | hayāḥ paripatanti sma śataśo'tha sahasraśaḥ

जिनके सारे अंग रक्त से लथपथ थे और सारथी गिर चुके थे, ऐसे घोड़े सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में इधर-उधर दौड़ते और गिरते थे।

श्लोक 49 (9.22.49)

अन्योन्यं परिपिष्टाश्च समासाद्य परस्परम् । सुविक्षताः स्म दृश्यन्ते वमन्तो रुधिरं मुखैः ॥

anyonyaṃ paripiṣṭāśca samāsādya parasparam | suvikṣatāḥ sma dṛśyante vamanto rudhiraṃ mukhaiḥ

एक-दूसरे से टकराकर कुचले हुए वे बुरी तरह घायल दिखाई देते थे और मुँह से रक्त उगल रहे थे।

श्लोक 50 (9.22.50)

ततोऽभवत्तमो घोरं सैन्येन रजसा वृतम् । तानपाक्रमतोऽद्राक्षं तस्माद्देशादरिन्दम ॥

tato'bhavattamo ghoraṃ sainyena rajasā vṛtam | tānapākramato'drākṣaṃ tasmāddeśādarindama

तब सेना की धूल से घिरा हुआ भयंकर अन्धकार छा गया। हे शत्रुदमन! मैंने उन्हें उस स्थान से हटते हुए देखा।

श्लोक 51 (9.22.51)

अश्वान्राजन्मनुष्यांश्च रजसा संवृते सति । भूमौ निपतिताश्चान्ये वमन्तो रुधिरं बहु ॥

aśvānrājanmanuṣyāṃśca rajasā saṃvṛte sati | bhūmau nipatitāścānye vamanto rudhiraṃ bahu

हे राजन्! धूल से घोड़ों और मनुष्यों के ढक जाने पर कितने ही दूसरे बहुत-सा रक्त उगलते हुए भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 52 (9.22.52)

केशाकेशि समालग्ना न शेकुश्चेष्टितुं नराः । अन्योन्यमश्वपृष्ठेभ्यो विकर्षन्तो महाबलाः ॥

keśākeśi samālagnā na śekuśceṣṭituṃ narāḥ | anyonyamaśvapṛṣṭhebhyo vikarṣanto mahābalāḥ

बाल से बाल उलझाए हुए वे मनुष्य हिल नहीं पा रहे थे; वे महाबली एक-दूसरे को घोड़ों की पीठ से खींच रहे थे।

श्लोक 53 (9.22.53)

मल्ला इव समासाद्य निजघ्नुरितरेतरम् । अश्वैश्च व्यपकृष्यन्त बहवोऽत्र गतासवः ॥

mallā iva samāsādya nijaghnuritaretaram | aśvaiśca vyapakṛṣyanta bahavo'tra gatāsavaḥ

पहलवानों की तरह भिड़कर वे एक-दूसरे को मारने लगे। वहाँ बहुत-से मरे हुए योद्धा घोड़ों द्वारा घसीटे जा रहे थे।

श्लोक 54 (9.22.54)

भूमौ निपतिताश्चान्ये बहवो विजयैषिणः । तत्रतत्र व्यदृश्यन्त पुरुषाः शूरमानिनः ॥

bhūmau nipatitāścānye bahavo vijayaiṣiṇaḥ | tatratatra vyadṛśyanta puruṣāḥ śūramāninaḥ

विजय की इच्छा वाले और अपने को शूर मानने वाले बहुत-से दूसरे पुरुष भूमि पर गिरे हुए यहाँ-वहाँ दिखाई देते थे।

श्लोक 55 (9.22.55)

रक्तोक्षितैश्छिन्नभुजैरवकृष्टशिरोरुहैः । व्यदृश्यत मही कीर्णा शतशोऽथ सहस्रशः ॥

raktokṣitaiśchinnabhujairavakṛṣṭaśiroruhaiḥ | vyadṛśyata mahī kīrṇā śataśo'tha sahasraśaḥ

रक्त से सने, कटी भुजाओं वाले और खिंचे हुए केशों वाले सैकड़ों-हज़ारों पुरुषों से पृथ्वी पटी हुई दिखाई दे रही थी।

श्लोक 56 (9.22.56)

दूरं न शक्यं तत्रासीद्गन्तुमश्वेन केनचित् । साश्वारोहैर्हतैरश्वैरावृते वसुधातले ॥

dūraṃ na śakyaṃ tatrāsīdgantumaśvena kenacit | sāśvārohairhatairaśvairāvṛte vasudhātale

मरे हुए घोड़ों और घुड़सवारों से पृथ्वी के ढक जाने के कारण वहाँ किसी के लिए घोड़े पर दूर जाना सम्भव नहीं था।

श्लोक 57 (9.22.57)

रुधिरोक्षितसन्नाहैरात्तशस्त्रैरुदायुधैः । नानाप्रहरणैर्घोरैः परस्परवधैषिभिः । सुसन्निकृष्टे सङ्ग्रामे हतभूयिष्ठसैनिके ॥

rudhirokṣitasannāhairāttaśastrairudāyudhaiḥ | nānāpraharaṇairghoraiḥ parasparavadhaiṣibhiḥ | susannikṛṣṭe saṅgrāme hatabhūyiṣṭhasainike

रक्त से सने कवच वाले, शस्त्र पकड़े और उठाए हुए, नाना प्रकार के भयंकर अस्त्र लिए और एक-दूसरे के वध की इच्छा रखने वाले वे योद्धा उस निकट के युद्ध में लड़ रहे थे, जिसमें अधिकांश सैनिक मारे जा चुके थे।

श्लोक 58 (9.22.58)

स मुहूर्तं ततो युद्ध्वा सौबलोऽथ विशाम्पते । षट्‌साहस्रैर्हयैः शिष्टैरपायाच्छकुनिस्ततः ॥

sa muhūrtaṃ tato yuddhvā saubalo'tha viśāmpate | ṣaṭsāhasrairhayaiḥ śiṣṭairapāyācchakunistataḥ

तब हे प्रजानाथ! एक मुहूर्त तक लड़कर सौबल शकुनि बचे हुए छह हज़ार घोड़ों के साथ पीछे हट गया।

श्लोक 59 (9.22.59)

तथैव पाण्डवानीकं रुधिरेण समुक्षितम् । षट्‌साहस्रैर्हयैः शिष्टैरपायाच्छ्रान्तवाहनम् ॥

tathaiva pāṇḍavānīkaṃ rudhireṇa samukṣitam | ṣaṭsāhasrairhayaiḥ śiṣṭairapāyācchrāntavāhanam

उसी प्रकार रक्त से भीगी हुई पाण्डव-सेना भी, जिसके वाहन थक चुके थे, छह हज़ार बचे हुए घोड़ों के साथ पीछे हट गई।

श्लोक 60 (9.22.60)

अश्वारोहाश्च पाण्डूनामब्रुवन्रुधिरोक्षिताः । सुसन्निकृष्टे सङ्ग्रामे भूयिष्ठे त्यक्तजीविताः ॥

aśvārohāśca pāṇḍūnāmabruvanrudhirokṣitāḥ | susannikṛṣṭe saṅgrāme bhūyiṣṭhe tyaktajīvitāḥ

और रक्त से सने पाण्डवों के घुड़सवार, जिनमें से अधिकांश उस सटे हुए युद्ध में जीवन की आशा छोड़ चुके थे, बोले:

अश्वारोहा ऊचुः

श्लोक 61 (9.22.61)

न हि शक्यं रथैर्योद्धुं कुत एव महागजैः । रथानेव रथा यान्तु कुञ्जराः कुञ्जरानपि ॥

na hi śakyaṃ rathairyoddhuṃ kuta eva mahāgajaiḥ | rathāneva rathā yāntu kuñjarāḥ kuñjarānapi

"रथों से लड़ना सम्भव नहीं है, बड़े हाथियों से तो और भी नहीं। रथ रथों के सामने जाएँ और हाथी हाथियों के सामने।

श्लोक 62 (9.22.62)

प्रतियातो हि शकुनिः स्वमनीकमवस्थितः । न पुनः सौबलो राजा योद्धुमभ्यागमिष्यति ॥

pratiyāto hi śakuniḥ svamanīkamavasthitaḥ | na punaḥ saubalo rājā yoddhumabhyāgamiṣyati

शकुनि अपनी सेना में लौटकर खड़ा है; राजा सौबल फिर लड़ने के लिए नहीं आएगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 63 (9.22.63)

ततस्तु द्रौपदेयाश्च ते च मत्ता महाद्विपाः । प्रययुर्यत्र पाञ्चाल्यो धृष्टद्युम्नो महारथः ॥

tatastu draupadeyāśca te ca mattā mahādvipāḥ | prayayuryatra pāñcālyo dhṛṣṭadyumno mahārathaḥ

तब द्रौपदी के पुत्र और वे मदमत्त विशाल हाथी वहाँ गए जहाँ पाञ्चाल महारथी धृष्टद्युम्न थे।

श्लोक 64 (9.22.64)

सहदेवोऽपि कौरव्य रजोमेघे समुत्थिते । एकाकी प्रययौ तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ॥

sahadevo'pi kauravya rajomeghe samutthite | ekākī prayayau tatra yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ

हे कौरव! सहदेव भी धूल का बादल उठ जाने पर अकेले ही वहाँ चले गए जहाँ राजा युधिष्ठिर थे।

श्लोक 65 (9.22.65)

ततस्तेषु प्रयातेषु शकुनिः सौबलः पुनः । पार्श्वतोऽभ्यहनत्क्रुद्धो धृष्टद्युम्नस्य वाहिनीम् ॥

tatasteṣu prayāteṣu śakuniḥ saubalaḥ punaḥ | pārśvato'bhyahanatkruddho dhṛṣṭadyumnasya vāhinīm

तब उनके चले जाने पर सुबलपुत्र शकुनि ने क्रुद्ध होकर फिर धृष्टद्युम्न की सेना के पार्श्व पर आक्रमण किया।

श्लोक 66 (9.22.66)

तत्पुनस्तुमुलं युद्धं प्राणांस्त्यक्त्वाऽभ्यवर्तत । तावकानां परेषां च परस्परवधैषिणाम् ॥

tatpunastumulaṃ yuddhaṃ prāṇāṃstyaktvā'bhyavartata | tāvakānāṃ pareṣāṃ ca parasparavadhaiṣiṇām

आपके और शत्रुओं के योद्धाओं का, जो एक-दूसरे का वध चाहते थे, वह तुमुल युद्ध फिर भड़क उठा और वे प्राणों की परवाह छोड़कर लड़ने लगे।

श्लोक 67 (9.22.67)

ते चान्योन्यमवैक्षन्त तस्मिन्वीरसमागमे । योधाः पर्यपतन्राजञ्शतशोऽथ सहस्रशः ॥

te cānyonyamavaikṣanta tasminvīrasamāgame | yodhāḥ paryapatanrājañśataśo'tha sahasraśaḥ

हे राजन्! वीरों के उस समागम में वे एक-दूसरे को देखते थे; योद्धा सैकड़ों और हज़ारों की संख्या में गिर रहे थे।

श्लोक 68 (9.22.68)

असिभिश्छिद्यमानानां शिरसां लोकसंक्षये । प्रादुरासीन्महाञ्शब्दस्तालानां पततामिव ॥

asibhiśchidyamānānāṃ śirasāṃ lokasaṃkṣaye | prādurāsīnmahāñśabdastālānāṃ patatāmiva

संसार के उस विनाश में तलवारों से कटते हुए सिरों की गिरने की बड़ी ध्वनि उठी, जैसे ताड़ के फलों के गिरने की ध्वनि हो।

श्लोक 69 (9.22.69)

विमुक्तानां शरीराणां छिन्नानां पततां भुवि । सायुधानां च बाहूनामूरूणां च विशाम्पते । आसीत्कटकटाशब्दः सुमहान्रोमहर्षणः ॥

vimuktānāṃ śarīrāṇāṃ chinnānāṃ patatāṃ bhuvi | sāyudhānāṃ ca bāhūnāmūrūṇāṃ ca viśāmpate | āsītkaṭakaṭāśabdaḥ sumahānromaharṣaṇaḥ

हे प्रजानाथ! प्राणहीन, कटकर भूमि पर गिरते हुए शरीरों, शस्त्रों समेत भुजाओं और जाँघों की रोंगटे खड़े कर देने वाली बड़ी खड़खड़ाहट सुनाई देने लगी।

श्लोक 70 (9.22.70)

निघ्नन्तो निशितैः शस्त्रैर्भ्रातॄन्पुत्रान्सखीनपि । योधाः परिपतन्ति स्म यथाऽऽमिषकृते खगाः ॥

nighnanto niśitaiḥ śastrairbhrātṝnputrānsakhīnapi | yodhāḥ paripatanti sma yathā''miṣakṛte khagāḥ

वे योद्धा तीखे शस्त्रों से भाइयों, पुत्रों और मित्रों तक को मारते हुए, मांस के लिए टूट पड़ने वाले पक्षियों की तरह एक-दूसरे पर गिर रहे थे।

श्लोक 71 (9.22.71)

अन्योन्यं प्रतिसंरब्धाः समासाद्य परस्परम् । अहम्पूर्वमहम्पूर्वमिति निघ्नन्सहस्रशः ॥

anyonyaṃ pratisaṃrabdhāḥ samāsādya parasparam | ahampūrvamahampūrvamiti nighnansahasraśaḥ

एक-दूसरे पर क्रुद्ध होकर, भिड़कर, "मैं पहले! मैं पहले!" कहते हुए वे हज़ारों को मार गिराते थे।

श्लोक 72 (9.22.72)

संयातेनासनभ्रष्टैरश्वारोहैर्गतासुभिः । हयाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ॥

saṃyātenāsanabhraṣṭairaśvārohairgatāsubhiḥ | hayāḥ paripatanti sma śataśo'tha sahasraśaḥ

टक्कर से आसन से गिरे हुए मृत सवारों के साथ घोड़े सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में गिर रहे थे।

श्लोक 73 (9.22.73)

स्फुरतां प्रतिपिष्टानामश्वानां शीघ्रगामिनाम् । स्तनतां च मनुष्याणां सन्नद्धानां विशाम्पते ॥

sphuratāṃ pratipiṣṭānāmaśvānāṃ śīghragāminām | stanatāṃ ca manuṣyāṇāṃ sannaddhānāṃ viśāmpate

हे प्रजानाथ! तड़पते हुए, कुचले हुए तेज़ घोड़ों के और कराहते हुए कवचधारी मनुष्यों के,

श्लोक 74 (9.22.74)

शक्त्यृष्टिप्रासशब्दश्च तुमुलः समपद्यत । भिन्दतां परमर्माणि राजन्दुर्मन्त्रिते तव ॥

śaktyṛṣṭiprāsaśabdaśca tumulaḥ samapadyata | bhindatāṃ paramarmāṇi rājandurmantrite tava

भाले, ऋष्टि और प्रासों का भीषण कोलाहल उठा; हे राजन्! आपकी बुरी मन्त्रणा से वे एक-दूसरे के मर्मस्थान बींध रहे थे।

श्लोक 75 (9.22.75)

श्रमाभिभूताः संरब्धाः श्रान्तवाहाः पिपासवः । विक्षताश्च शितैः शस्त्रैरभ्यवर्तन्त तावकाः ॥

śramābhibhūtāḥ saṃrabdhāḥ śrāntavāhāḥ pipāsavaḥ | vikṣatāśca śitaiḥ śastrairabhyavartanta tāvakāḥ

थकान से चूर, क्रोधित, थके हुए वाहनों वाले, प्यासे और तीखे शस्त्रों से घायल आपके योद्धा फिर भी आगे बढ़ते रहे।

श्लोक 76 (9.22.76)

मत्ता रुधिरगन्धेन बहवोऽत्र विचेतसः । जघ्नुः परान्स्वकांश्चैव प्राप्तान्प्राप्ताननन्तरान् ॥

mattā rudhiragandhena bahavo'tra vicetasaḥ | jaghnuḥ parānsvakāṃścaiva prāptānprāptānanantarān

रक्त की गन्ध से मतवाले और बेसुध हुए बहुत-से योद्धा जो भी पास आता, उस शत्रु या अपने को मारने लगे।

श्लोक 77 (9.22.77)

बहवश्च गतप्राणाः क्षत्रिया जयगृद्धिनः । भूमावभ्यपतन्राजञ्शरवृष्टिभिरावृताः ॥

bahavaśca gataprāṇāḥ kṣatriyā jayagṛddhinaḥ | bhūmāvabhyapatanrājañśaravṛṣṭibhirāvṛtāḥ

हे राजन्! विजय की इच्छा वाले बहुत-से क्षत्रिय प्राणहीन होकर बाणों की वर्षा से ढके हुए भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 78 (9.22.78)

वृकगृध्रशृगालानां तुमुले मोदनेऽहनि । आसीद्बलक्षयो घोरस्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥

vṛkagṛdhraśṛgālānāṃ tumule modane'hani | āsīdbalakṣayo ghorastava putrasya paśyataḥ

भेड़ियों, गिद्धों और सियारों के आनन्द के उस दिन, उस कोलाहल में आपके पुत्र के देखते-देखते सेना का भयंकर संहार हुआ।

श्लोक 79 (9.22.79)

नराश्वकायैः सञ्छन्ना भूमिरासीद्विशाम्पते । रुधिरोदकचित्रा च भीरूणां भयवर्धिनी ॥

narāśvakāyaiḥ sañchannā bhūmirāsīdviśāmpate | rudhirodakacitrā ca bhīrūṇāṃ bhayavardhinī

हे प्रजानाथ! मनुष्यों और घोड़ों के शरीरों से ढकी हुई, रक्त के जल से चित्रित और डरपोकों का भय बढ़ाने वाली भूमि दिखाई देती थी।

श्लोक 80 (9.22.80)

असिभिः पट्टसैः शूलैस्तक्षमाणाः पुनःपुनः । तावकाः पाण्डवेयाश्च न न्यवर्तन्त भारत ॥

asibhiḥ paṭṭasaiḥ śūlaistakṣamāṇāḥ punaḥpunaḥ | tāvakāḥ pāṇḍaveyāśca na nyavartanta bhārata

हे भारत! तलवारों, पट्टिशों और शूलों से बार-बार एक-दूसरे को काटते हुए आपके योद्धा और पाण्डव पीछे नहीं हटे।

श्लोक 81 (9.22.81)

प्रहरन्तो यथाशक्ति यावत्प्राणस्य धारणम् । योधाः परिपतन्ति स्म वमन्तो रुधिरं मुखैः ॥

praharanto yathāśakti yāvatprāṇasya dhāraṇam | yodhāḥ paripatanti sma vamanto rudhiraṃ mukhaiḥ

वे योद्धा जब तक प्राण रहे, यथाशक्ति प्रहार करते रहे और फिर मुँह से रक्त उगलते हुए गिर पड़े।

श्लोक 82 (9.22.82)

शिरो गृहीत्वा केशेषु कबन्धः स प्रदृश्यते । उद्यम्य च शितं खड्गं रुधिरेण परिप्लुतम् ॥

śiro gṛhītvā keśeṣu kabandhaḥ sa pradṛśyate | udyamya ca śitaṃ khaḍgaṃ rudhireṇa pariplutam

एक कबन्ध सिर को केशों से पकड़े और रक्त से भीगी तीखी तलवार उठाए हुए दिखाई दिया।

श्लोक 83 (9.22.83)

तथोत्थितेषु बहुषु कबन्धेषु नराधिप । तथा रुधिरगन्धेन योधाः कश्मलमाविशन् ॥

tathotthiteṣu bahuṣu kabandheṣu narādhipa | tathā rudhiragandhena yodhāḥ kaśmalamāviśan

हे नरेश! इस प्रकार बहुत-से कबन्धों के खड़े हो जाने पर रक्त की गन्ध से योद्धा मूर्च्छित होने लगे।

श्लोक 84 (9.22.84)

मन्दीभूते ततः शब्दे पाण्डवानां महद्बलम् । अल्पावशिष्टैस्तुरगैरभ्यवर्तत सौबलः ॥

mandībhūte tataḥ śabde pāṇḍavānāṃ mahadbalam | alpāvaśiṣṭaisturagairabhyavartata saubalaḥ

जब कोलाहल मन्द पड़ गया, तब सौबल बचे हुए थोड़े-से घोड़ों के साथ पाण्डवों की उस विशाल सेना पर चढ़ आया।

श्लोक 85 (9.22.85)

ततोऽभ्यधावंस्त्वरिताः पाण्डवा जयगृद्धिनः । पदातयश्च नागाश्च सादिनश्चोद्यतायुधाः ॥

tato'bhyadhāvaṃstvaritāḥ pāṇḍavā jayagṛddhinaḥ | padātayaśca nāgāśca sādinaścodyatāyudhāḥ

तब विजय के लोभी पाण्डव शीघ्रता से टूट पड़े: पैदल, हाथी और घुड़सवार, सब शस्त्र उठाए हुए।

श्लोक 86 (9.22.86)

कोष्ठकीकृत्य चाप्येनं परिक्षिप्य च सर्वशः । शस्त्रैर्नानाविधैर्जघ्नुर्युद्धपारं तितीर्षवः ॥

koṣṭhakīkṛtya cāpyenaṃ parikṣipya ca sarvaśaḥ | śastrairnānāvidhairjaghnuryuddhapāraṃ titīrṣavaḥ

उसे घेरकर और चारों ओर से रोककर वे युद्ध के पार जाने की इच्छा से उस पर नाना प्रकार के शस्त्रों से प्रहार करने लगे।

श्लोक 87 (9.22.87)

त्वदीयास्तांस्तु सम्प्रेक्ष्य सर्वतः समभिद्रुतान् । रथाश्वपत्तिद्विरदाः पाण्डवानभिदुद्रुवुः ॥

tvadīyāstāṃstu samprekṣya sarvataḥ samabhidrutān | rathāśvapattidviradāḥ pāṇḍavānabhidudruvuḥ

उन्हें चारों ओर से आक्रान्त देखकर आपके योद्धा रथों, घोड़ों, पैदलों और हाथियों के साथ पाण्डवों पर टूट पड़े।

श्लोक 88 (9.22.88)

केचित्पदातयः पद्भिर्मुष्टिभिश्च परस्परम् । निजघ्नुः समरे शूराः क्षीणशस्त्रास्ततोऽपतन् ॥

kecitpadātayaḥ padbhirmuṣṭibhiśca parasparam | nijaghnuḥ samare śūrāḥ kṣīṇaśastrāstato'patan

कुछ शूर पैदल सैनिक युद्ध में पैरों और घूँसों से एक-दूसरे को मारने लगे; शस्त्र समाप्त हो जाने पर वे गिर पड़े।

श्लोक 89 (9.22.89)

रथेभ्यो रथिनः पेतुर्द्विपेभ्यो हस्तिसादिनः । विमानेभ्यो दिवो भ्रष्टाः सिद्धाः पुण्यक्षयादिव ॥

rathebhyo rathinaḥ peturdvipebhyo hastisādinaḥ | vimānebhyo divo bhraṣṭāḥ siddhāḥ puṇyakṣayādiva

रथी रथों से और हाथियों के सवार हाथियों से ऐसे गिरे, जैसे पुण्य के क्षीण होने पर सिद्ध विमानों से स्वर्ग से गिर पड़ते हैं।

श्लोक 90 (9.22.90)

एवमन्योन्यमायत्ता योधा जघ्नुर्महाहवे । पितॄन्भ्रातॄन्वयस्यांश्च पुत्रानपि तथा परे ॥

evamanyonyamāyattā yodhā jaghnurmahāhave | pitṝnbhrātṝnvayasyāṃśca putrānapi tathā pare

इस प्रकार परस्पर सटे हुए योद्धा उस महायुद्ध में पिताओं, भाइयों और मित्रों को मारते थे, और दूसरे अपने पुत्रों तक को।

श्लोक 91 (9.22.91)

एवमासीदमर्यादं युद्धं भरतसत्तम । प्रासासिबाणकलिलं वर्तमाने सुदारुणे ॥

evamāsīdamaryādaṃ yuddhaṃ bharatasattama | prāsāsibāṇakalilaṃ vartamāne sudāruṇe

हे भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार वह मर्यादाहीन, भालों, तलवारों और बाणों से भरा अत्यन्त भयंकर युद्ध चलता रहा।

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