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शल्य पर्व · अध्याय 23

अर्जुन द्वारा कौरव-सेना का संहार

सात हज़ार घुड़सवारों के साथ लौटा शकुनि दुर्योधन के पास पहुँचकर उसे पाण्डवों की रथसेना पर टूटने के लिए उकसाता है। कौरवों को आगे बढ़ते देख अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि दुर्योधन ने शान्ति की हर सलाह ठुकरा दी, और सेना का संहार करके युद्ध समाप्त करने का निश्चय कर उनसे रथ आगे बढ़ाने को कहते हैं। कृष्ण सेना में घुस जाते हैं और अर्जुन के बाण रणभूमि को ढककर सूखे झाड़-झंखाड़ में लगी आग की तरह कौरव-सेना को जला डालते हैं।

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.23.1)

अल्पावशिष्टे सैन्ये तु पाण्डवैर्निहते बले । अश्वैः सप्तसहस्रैस्तु उपावर्तत सौबलः ॥

alpāvaśiṣṭe sainye tu pāṇḍavairnihate bale | aśvaiḥ saptasahasraistu upāvartata saubalaḥ

पाण्डवों के हाथों सेना के मारे जाने पर जब वह थोड़ी-सी ही शेष रह गई, तब सुबलपुत्र शकुनि सात हज़ार घुड़सवारों के साथ लौट आया।

श्लोक 2 (9.23.2)

स यात्वा वाहिनीं तूर्णं चोदयानः स्वकान्युधि । युध्यध्वमिति संहृष्टाः पुनःपुनररिन्दमाः ॥

sa yātvā vāhinīṃ tūrṇaṃ codayānaḥ svakānyudhi | yudhyadhvamiti saṃhṛṣṭāḥ punaḥpunararindamāḥ

उसने शीघ्र ही अपनी सेना के पास पहुँचकर युद्ध में अपने योद्धाओं को ललकारा और बार-बार "लड़ो, लड़ो" पुकारा; तब वे शत्रुदमन वीर हर्ष से भर उठे।

श्लोक 3 (9.23.3)

अपृच्छत्क्षत्रियांस्तत्र क्व नु राजा महाबलः । शकुनेस्तद्वचः श्रुत्वा तमूचुर्भरतर्षभ ॥

apṛcchatkṣatriyāṃstatra kva nu rājā mahābalaḥ | śakunestadvacaḥ śrutvā tamūcurbharatarṣabha

वहाँ उसने क्षत्रियों से पूछा, "महाबली राजा कहाँ हैं?" हे भरतश्रेष्ठ, शकुनि की यह बात सुनकर उन्होंने उसे उत्तर दिया।

योधा ऊचुः

श्लोक 4 (9.23.4)

असौ तिष्ठति कौरव्यो रणमध्ये महाबलः । यत्रैतत्सुमहच्छत्रं पूर्णचन्द्रसमप्रभम् ॥

asau tiṣṭhati kauravyo raṇamadhye mahābalaḥ | yatraitatsumahacchatraṃ pūrṇacandrasamaprabham

"वे महाबली कुरुवंशी रणभूमि के बीच खड़े हैं, जहाँ पूर्णचन्द्र की-सी कान्तिवाला वह विशाल छत्र चमक रहा है,

श्लोक 5 (9.23.5)

यत्र ते सतनुत्राणा रथास्तिष्ठन्ति दंशिताः । यत्रैष तुमुलः शब्दः पर्जन्यनिनदोपमः ॥

yatra te satanutrāṇā rathāstiṣṭhanti daṃśitāḥ | yatraiṣa tumulaḥ śabdaḥ parjanyaninadopamaḥ

जहाँ कवच पहने हुए वे रथ सजे खड़े हैं, और जहाँ मेघ-गर्जन के समान यह भीषण कोलाहल हो रहा है।

सञ्जय उवाच

श्लोक 6 (9.23.6)

तत्र गच्छ द्रुतं राजंस्ततो द्रक्ष्यसि कौरवम् । एवमुक्तस्तु तैर्योधैः शकुनिः सौबलस्तदा ॥

tatra gaccha drutaṃ rājaṃstato drakṣyasi kauravam | evamuktastu tairyodhaiḥ śakuniḥ saubalastadā

हे राजन्, आप शीघ्र वहीं जाइए, तब आपको कुरुराज दिखाई दे जाएँगे।" उन योद्धाओं के ऐसा कहने पर सुबलपुत्र शकुनि तब चल पड़ा

श्लोक 7 (9.23.7)

प्रययौ तत्र यत्रास्ते पुत्रस्तव नराधिप । सर्वतः संवृतो वीरैः समरे चित्रयोधिभिः ॥

prayayau tatra yatrāste putrastava narādhipa | sarvataḥ saṃvṛto vīraiḥ samare citrayodhibhiḥ

वहाँ, जहाँ आपका पुत्र था, हे नरेश्वर, जो युद्ध में विचित्र ढंग से लड़नेवाले वीरों से चारों ओर घिरा हुआ था।

श्लोक 8 (9.23.8)

ततो दुर्योधनं दृष्ट्वा रथानीके व्यवस्थितम् । स रथांस्तावकान्सर्वान्हर्षयञ्शकुनिस्ततः ॥

tato duryodhanaṃ dṛṣṭvā rathānīke vyavasthitam | sa rathāṃstāvakānsarvānharṣayañśakunistataḥ

तब रथसेना में स्थित दुर्योधन को देखकर, तथा आपके सब रथियों को हर्षित करता हुआ शकुनि

श्लोक 9 (9.23.9)

दुर्योधनमिदं वाक्यं हृष्टरूपो विशाम्पते । कृतकार्यमिवात्मानं मन्यमानोऽब्रवीन्नृपम् ॥

duryodhanamidaṃ vākyaṃ hṛṣṭarūpo viśāmpate | kṛtakāryamivātmānaṃ manyamāno'bravīnnṛpam

हे प्रजानाथ, हर्ष से भरकर, मानो अपना काम पूरा हो गया ऐसा मानता हुआ राजा दुर्योधन से यह बात बोला।

शकुनिरुवाच

श्लोक 10 (9.23.10)

जहि राजन्रथानीकमश्वाः सर्वे जिता मया । नात्यक्त्वा जीवितं सङ्ख्ये शक्यो जेतुं युधिष्ठिरः ॥

jahi rājanrathānīkamaśvāḥ sarve jitā mayā | nātyaktvā jīvitaṃ saṅkhye śakyo jetuṃ yudhiṣṭhiraḥ

"राजन्, शत्रु की रथसेना को मार डालिए; सारे घोड़े मैंने जीत लिए हैं। प्राणों का मोह छोड़े बिना युद्ध में युधिष्ठिर को जीता नहीं जा सकता।

श्लोक 11 (9.23.11)

हते तस्मिन्रथानीके पाण्डवेनाभिपालिते । गजानेतान्हनिष्यामः पदातींश्चेतरांस्तथा ॥

hate tasminrathānīke pāṇḍavenābhipālite | gajānetānhaniṣyāmaḥ padātīṃścetarāṃstathā

पाण्डव से रक्षित उस रथसेना के मारे जाने पर हम इन हाथियों को, पैदल सैनिकों को और बाकी सबको भी मार डालेंगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 12 (9.23.12)

श्रुत्वा तु वचनं तस्य तावका जयगृद्धिनः । जवेनाभ्यपतन्हृष्टाः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥

śrutvā tu vacanaṃ tasya tāvakā jayagṛddhinaḥ | javenābhyapatanhṛṣṭāḥ pāṇḍavānāmanīkinīm

उसकी बात सुनकर विजय के अभिलाषी आपके योद्धा हर्षित होकर वेग से पाण्डवों की सेना पर टूट पड़े।

श्लोक 13 (9.23.13)

बद्धनिस्त्रिंशहस्ताश्च प्रगृहीतशरासनाः । शरासनानि धून्वानाः सिंहनादान्प्रचक्रिरे ॥

baddhanistriṃśahastāśca pragṛhītaśarāsanāḥ | śarāsanāni dhūnvānāḥ siṃhanādānpracakrire

हाथों में तलवारें बाँधे और धनुष सँभाले हुए वे धनुष हिलाते हुए सिंहनाद करने लगे।

श्लोक 14 (9.23.14)

ततो ज्यातलनिर्धोषः पुनरासीद्विशाम्पते । प्रादुरासीच्छराणां च सुमुक्तानां सुदारुणः ॥

tato jyātalanirdhoṣaḥ punarāsīdviśāmpate | prādurāsīccharāṇāṃ ca sumuktānāṃ sudāruṇaḥ

तब, हे प्रजानाथ, फिर प्रत्यञ्चा और हथेलियों की टंकार गूँज उठी और भली-भाँति छोड़े गए बाणों की भयंकर सनसनाहट सुनाई देने लगी।

श्लोक 15 (9.23.15)

तान्समीपगतान्दृष्ट्वा जनानुद्यतकार्मुकान् । उवाच देवकीपुत्रं कुन्तीपुत्रो धनञ्जयः ॥

tānsamīpagatāndṛṣṭvā janānudyatakārmukān | uvāca devakīputraṃ kuntīputro dhanañjayaḥ

उन लोगों को धनुष उठाए पास आते देखकर कुन्तीपुत्र धनञ्जय ने देवकीपुत्र कृष्ण से कहा।

अर्जुन उवाच

श्लोक 16 (9.23.16)

चोदयाश्वानसम्भ्रान्तः प्रविशैतद्बलार्णवम् । अन्तमद्य गमिष्यामि शत्रूणां निशितैः शरैः ॥

codayāśvānasambhrāntaḥ praviśaitadbalārṇavam | antamadya gamiṣyāmi śatrūṇāṃ niśitaiḥ śaraiḥ

"बिना घबराए घोड़ों को हाँकिए और इस सेना-सागर में प्रवेश कीजिए। आज मैं अपने तीखे बाणों से शत्रुओं का अन्त कर दूँगा।

श्लोक 17 (9.23.17)

अष्टादश दिनान्यद्य युद्धस्यास्य जनार्दन । वर्तमानस्य महतः समासाद्य परस्परम् ॥

aṣṭādaśa dinānyadya yuddhasyāsya janārdana | vartamānasya mahataḥ samāsādya parasparam

"जनार्दन, एक-दूसरे से जूझते हुए चल रहे इस महायुद्ध को आज अठारह दिन हो गए।

श्लोक 18 (9.23.18)

अनन्तकल्पा ध्वजिनी भूत्वा ह्येषां महात्मनाम् । क्षयमद्य गता युद्धे पश्य दैवं यथाविधम् ॥

anantakalpā dhvajinī bhūtvā hyeṣāṃ mahātmanām | kṣayamadya gatā yuddhe paśya daivaṃ yathāvidham

"इन महात्माओं की जो सेना कभी अनन्त-सी थी, वह आज युद्ध में नाश को प्राप्त हो गई है; देखिए, दैव कैसा होता है।

श्लोक 19 (9.23.19)

समुद्रकल्पं च बलं धार्तराष्ट्रस्य माधव । अस्मनासाद्य सञ्जातं गोष्पदोपममच्युत ॥

samudrakalpaṃ ca balaṃ dhārtarāṣṭrasya mādhava | asmanāsādya sañjātaṃ goṣpadopamamacyuta

"माधव, धृतराष्ट्रपुत्र की सेना समुद्र के समान थी; अच्युत, हमसे टकराकर वह गोखुर के गड्ढे जैसी रह गई है।

श्लोक 20 (9.23.20)

हते भीष्मे धीर्ममासीच्छमः स्यादिति माधव । न च तत्कृतवान्मूढो धार्तराष्ट्रः सुबालिशः ॥

hate bhīṣme dhīrmamāsīcchamaḥ syāditi mādhava | na ca tatkṛtavānmūḍho dhārtarāṣṭraḥ subāliśaḥ

"माधव, भीष्म के गिरने पर मुझे लगा था कि अब शान्ति हो जाएगी; पर उस मूर्ख, अबोध धृतराष्ट्रपुत्र ने ऐसा नहीं किया।

श्लोक 21 (9.23.21)

उक्तं भीष्मेण यद्वाक्यं हितं तथ्यं च माधव । तच्चापि नासौ कृतवान्वीतबुद्धिः सुयोधनः ॥

uktaṃ bhīṣmeṇa yadvākyaṃ hitaṃ tathyaṃ ca mādhava | taccāpi nāsau kṛtavānvītabuddhiḥ suyodhanaḥ

"माधव, भीष्म ने जो हितकर और यथार्थ बात कही थी, उसे भी उस बुद्धिहीन सुयोधन ने नहीं माना।

श्लोक 22 (9.23.22)

तस्मिंस्तु निहते भीष्मे प्रच्युते पृथिवीपतौ । न जाने कारणं किन्तु येन युद्धमवर्तत ॥

tasmiṃstu nihate bhīṣme pracyute pṛthivīpatau | na jāne kāraṇaṃ kintu yena yuddhamavartata

"पृथ्वी के स्वामी भीष्म के गिरकर अपने पद से च्युत हो जाने पर भी युद्ध किस कारण चलता रहा, यह मैं नहीं जानता।

श्लोक 23 (9.23.23)

मूढांस्तु सर्वथा मन्ये धार्तराष्ट्रान्सुबालिशान् । पतिते शन्तनोः पुत्रे येऽकार्षुः संयुगं पुनः ॥

mūḍhāṃstu sarvathā manye dhārtarāṣṭrānsubāliśān | patite śantanoḥ putre ye'kārṣuḥ saṃyugaṃ punaḥ

"मैं धृतराष्ट्र के पुत्रों को सर्वथा मूढ़ और नादान मानता हूँ, जिन्होंने शन्तनुपुत्र के गिर जाने पर भी फिर युद्ध छेड़ा।

श्लोक 24 (9.23.24)

अनन्तरं च निहते द्रोणे ब्रह्मविदां वरे । राधेये च विकर्णे च नैव शाम्यति वैशसम् ॥

anantaraṃ ca nihate droṇe brahmavidāṃ vare | rādheye ca vikarṇe ca naiva śāmyati vaiśasam

"और ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण के, राधापुत्र कर्ण के और विकर्ण के मारे जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 25 (9.23.25)

अल्पावशिष्टे सैन्येऽस्मिन्सूतपुत्रे च पातिते । सपुत्रे वै नरव्याघ्रे नैव शाम्यति वैशसम् ॥

alpāvaśiṣṭe sainye'sminsūtaputre ca pātite | saputre vai naravyāghre naiva śāmyati vaiśasam

"इस सेना के थोड़ी-सी रह जाने पर, और सूतपुत्र के पुत्र-सहित उस पुरुषव्याघ्र के गिरा दिए जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 26 (9.23.26)

श्रुतायुषि हते वीरे जलसन्धे च मागधे । श्रुतायुधे च नृपतौ नैव शाम्यति वैशसम् ॥

śrutāyuṣi hate vīre jalasandhe ca māgadhe | śrutāyudhe ca nṛpatau naiva śāmyati vaiśasam

"वीर श्रुतायु के, मगधराज जलसन्ध के और राजा श्रुतायुध के मारे जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 27 (9.23.27)

भूरिश्रवसि शल्ये च साल्ये चैव जनार्दन । आवन्त्येषु च वीरेषु नैव शाम्यति वैशसम् ॥

bhūriśravasi śalye ca sālye caiva janārdana | āvantyeṣu ca vīreṣu naiva śāmyati vaiśasam

"जनार्दन, भूरिश्रवा, शल्य, शाल्व और अवन्ती के वीरों के मारे जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 28 (9.23.28)

जयद्रथे च निहते राक्षसे चाप्यलायुधे । बाह्लिके सोमदत्ते च नैव शाम्यति वैशसम् ॥

jayadrathe ca nihate rākṣase cāpyalāyudhe | bāhlike somadatte ca naiva śāmyati vaiśasam

"जयद्रथ के, राक्षस अलायुध के, बाह्लिक और सोमदत्त के मारे जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 29 (9.23.29)

भगदत्ते हते शूरे काम्भोजे च सुदारुणे । दुःशासने च निहते नैव शाम्यति वैशसम् ॥

bhagadatte hate śūre kāmbhoje ca sudāruṇe | duḥśāsane ca nihate naiva śāmyati vaiśasam

"शूर भगदत्त के, भयंकर काम्भोज के और दुःशासन के मारे जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 30 (9.23.30)

दृष्ट्वा विनिहताञ्शूरान्पृथङ्माण्डलिकान्नृपान् । बलिनश्च रणे कृष्ण नैव शाम्यति वैशसम् ॥

dṛṣṭvā vinihatāñśūrānpṛthaṅmāṇḍalikānnṛpān | balinaśca raṇe kṛṣṇa naiva śāmyati vaiśasam

"कृष्ण, अलग-अलग मण्डलों के स्वामी उन बलवान शूर राजाओं को रण में मरा देखकर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 31 (9.23.31)

अक्षौहिणीपतीन्दृष्ट्वा भीमसेननिपातितान् । मोहाद्वा यदि वा लोभान्नैव शाम्यति वैशसम् ॥

akṣauhiṇīpatīndṛṣṭvā bhīmasenanipātitān | mohādvā yadi vā lobhānnaiva śāmyati vaiśasam

"भीमसेन के हाथों गिराए गए अक्षौहिणीपतियों को देखकर भी, चाहे मोह से हो या लोभ से, यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 32 (9.23.32)

हतप्रवीरां विध्वस्तां दृष्ट्वा चेमां चमूं रणे । अलम्बले च निहते नैव शाम्यति वैशसम् ॥

hatapravīrāṃ vidhvastāṃ dṛṣṭvā cemāṃ camūṃ raṇe | alambale ca nihate naiva śāmyati vaiśasam

"प्रमुख वीरों के मारे जाने से छिन्न-भिन्न हुई इस सेना को रण में देखकर, और अलम्बल के मारे जाने पर भी यह संहार नहीं थमता।

श्लोक 33 (9.23.33)

भ्रातॄन्विनिहतान्दृष्ट्वा वयस्यान्मातुलानपि । पुत्रान्विनिहतान्दृष्ट्वा नैव शाम्यति वैशसम् ॥

bhrātṝnvinihatāndṛṣṭvā vayasyānmātulānapi | putrānvinihatāndṛṣṭvā naiva śāmyati vaiśasam

"भाइयों को, मित्रों को और मामाओं तक को मरा देखकर, पुत्रों को मरा देखकर भी यह संहार नहीं थमता।"

श्लोक 34 (9.23.34)

को नु राजकुले जातः कौरवेषु विशेषतः । निरर्थकं महद्वैरं कुर्यादन्यः सुयोधनात् ॥

ko nu rājakule jātaḥ kauraveṣu viśeṣataḥ | nirarthakaṃ mahadvairaṃ kuryādanyaḥ suyodhanāt

"राजकुल में, और विशेषतः कुरुओं में जन्मा सुयोधन के सिवा दूसरा कौन मनुष्य इतना बड़ा निरर्थक बैर रखेगा?

श्लोक 35 (9.23.35)

गुणतोऽभ्यधिकाञ्ज्ञात्वा बलतः शौर्यतोपि वा । अमूढः को नु युध्येत जानन्प्राज्ञो हिताहितम् ॥

guṇato'bhyadhikāñjñātvā balataḥ śauryatopi vā | amūḍhaḥ ko nu yudhyeta jānanprājño hitāhitam

"गुण, बल और शौर्य में शत्रुओं को अपने से बढ़कर जानते हुए हित और अहित को पहचाननेवाला कौन समझदार, अमूढ़ पुरुष उनसे युद्ध करेगा?

श्लोक 36 (9.23.36)

किन्नु तस्य मनो ह्यासीत्त्वयोक्तस्य हितं वचः । प्रशमे पाण्डवैः सार्धं सोन्यस्य शृणुयात्कथम् ॥

kinnu tasya mano hyāsīttvayoktasya hitaṃ vacaḥ | praśame pāṇḍavaiḥ sārdhaṃ sonyasya śṛṇuyātkatham

"पाण्डवों से सन्धि के विषय में आपने उसे जो हितकर वचन कहा, उस समय उसके मन में क्या रहा होगा? फिर वह किसी और की बात कैसे सुनेगा?

श्लोक 37 (9.23.37)

येन शान्तनवो भीष्मो द्रोणो विदुर एव च । प्रत्याख्याताः शमस्यार्थे किन्नु तस्याद्य भेषजम् ॥

yena śāntanavo bhīṣmo droṇo vidura eva ca | pratyākhyātāḥ śamasyārthe kinnu tasyādya bheṣajam

"जिसने शान्ति के लिए कहनेवाले शान्तनु-पुत्र भीष्म, द्रोण और विदुर तक को ठुकरा दिया, उसके लिए अब क्या औषधि है?

श्लोक 38 (9.23.38)

मौर्ख्याद्येन पिता वृद्धः प्रत्याख्यातो जनार्दन । तथा माता हितं वाक्यं भाषमाणा हितैषिणी ॥

maurkhyādyena pitā vṛddhaḥ pratyākhyāto janārdana | tathā mātā hitaṃ vākyaṃ bhāṣamāṇā hitaiṣiṇī

"जनार्दन, उसने मूर्खतावश अपने वृद्ध पिता को ठुकरा दिया, और हित चाहनेवाली माता के हितकर वचन कहने पर उन्हें भी,

श्लोक 39 (9.23.39)

प्रत्याख्याता ह्यसत्कृत्य स कस्मै रोचयेद्वचः । कुलान्तकरणो व्यक्तं जात एष जनार्दन ॥

pratyākhyātā hyasatkṛtya sa kasmai rocayedvacaḥ | kulāntakaraṇo vyaktaṃ jāta eṣa janārdana

"बिना आदर किए ठुकरा दिया; वह किसकी बात मानेगा? जनार्दन, यह स्पष्ट ही कुल का नाश करने के लिए जन्मा है।

श्लोक 40 (9.23.40)

तथास्य दृश्यते चेष्टा नीतिश्चैव विशाम्पते । नैष दास्यति नो राज्यमिति मे मतिरच्युत ॥

tathāsya dṛśyate ceṣṭā nītiścaiva viśāmpate | naiṣa dāsyati no rājyamiti me matiracyuta

"हे प्रजानाथ, उसकी चेष्टा और नीति भी ऐसी ही दीखती है। अच्युत, मेरा यह निश्चित मत है कि वह हमें राज्य नहीं देगा।

श्लोक 41 (9.23.41)

उक्तोऽहं बहुशस्तात विदुरेण महात्मना । न जीवन्दास्यते भागं धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ॥

ukto'haṃ bahuśastāta vidureṇa mahātmanā | na jīvandāsyate bhāgaṃ dhārtarāṣṭraḥ suyodhanaḥ

"मित्र, महात्मा विदुर ने मुझसे बहुत बार कहा है कि धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन जीते-जी हमारा भाग नहीं देगा।

श्लोक 42 (9.23.42)

यावत्प्राणा धरिष्यन्ति धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । तावद्युष्मास्वपापेषु प्रचरिष्यति पापकम् ॥

yāvatprāṇā dhariṣyanti dhārtarāṣṭrasya durmateḥ | tāvadyuṣmāsvapāpeṣu pracariṣyati pāpakam

"उन्होंने कहा था कि उस दुर्बुद्धि धृतराष्ट्रपुत्र के प्राण जब तक रहेंगे, तब तक वह तुम निर्दोषों के साथ पाप का आचरण करता रहेगा।

श्लोक 43 (9.23.43)

न च युक्तोऽन्यथा जेतुमृते युद्धेन माधव । इत्यब्रवीत्सदा मां हि विदुरः सत्यदर्शनः ॥

na ca yukto'nyathā jetumṛte yuddhena mādhava | ityabravītsadā māṃ hi viduraḥ satyadarśanaḥ

"माधव, सत्य को देखनेवाले विदुर ने मुझसे सदा यही कहा कि युद्ध के बिना उसे जीतना उचित नहीं है।

श्लोक 44 (9.23.44)

तत्सर्वमद्य जानामि व्यवसायं दुरात्मनः । यदुक्तं वचनं तेन विदुरेण महात्मना ॥

tatsarvamadya jānāmi vyavasāyaṃ durātmanaḥ | yaduktaṃ vacanaṃ tena vidureṇa mahātmanā

"महात्मा विदुर ने जो कहा था, उस दुरात्मा के उस निश्चय को आज मैं पूरी तरह जान गया हूँ।

श्लोक 45 (9.23.45)

यो हि श्रुत्वा वचः पथ्यं जामदग्न्याद्यथातथम् । अवामन्यत दुर्बुद्धिर्ध्रुवं नाशमुखे स्थितः ॥

yo hi śrutvā vacaḥ pathyaṃ jāmadagnyādyathātatham | avāmanyata durbuddhirdhruvaṃ nāśamukhe sthitaḥ

"जो दुर्बुद्धि जमदग्निपुत्र परशुराम से यथावत् हितकर वचन सुनकर भी उसका अनादर करता है, वह निश्चय ही विनाश के मुख में खड़ा है।

श्लोक 46 (9.23.46)

उक्तं हि बहुभिः सिद्धैर्जातमात्रे सुयोधने । एनं प्राप्य दुरात्मानं क्षयं क्षत्रं गमिष्यति ॥

uktaṃ hi bahubhiḥ siddhairjātamātre suyodhane | enaṃ prāpya durātmānaṃ kṣayaṃ kṣatraṃ gamiṣyati

"सुयोधन के जन्म लेते ही बहुत-से सिद्धों ने कहा था कि इस दुरात्मा को पाकर क्षत्रिय-कुल क्षय को प्राप्त होगा।

श्लोक 47 (9.23.47)

तदिदं वचनं तेषां निरुक्तं वै जनार्दन । क्षयं याता हि राजानो दुर्योधनकृते भृशम् ॥

tadidaṃ vacanaṃ teṣāṃ niruktaṃ vai janārdana | kṣayaṃ yātā hi rājāno duryodhanakṛte bhṛśam

"जनार्दन, उनका वह कथन सत्य सिद्ध हुआ है; दुर्योधन के कारण राजा लोग बुरी तरह नष्ट हो गए हैं।

श्लोक 48 (9.23.48)

सोऽद्य सर्वान्रणे योधान्निहनिष्यामि माधव ॥

so'dya sarvānraṇe yodhānnihaniṣyāmi mādhava

"माधव, इसलिए आज मैं युद्ध में सब योद्धाओं को मार डालूँगा,

श्लोक 49 (9.23.49)

क्षत्रियेषु हतेष्वाशु शून्ये च शिबिरे कृते । वधाय चात्मनोऽस्माभिः संयुगं रोचयिष्यति ॥

kṣatriyeṣu hateṣvāśu śūnye ca śibire kṛte | vadhāya cātmano'smābhiḥ saṃyugaṃ rocayiṣyati

"और क्षत्रियों के शीघ्र मारे जाने तथा शिविर के सूना हो जाने पर वह अपने ही वध के लिए हमसे युद्ध करना चाहेगा।

श्लोक 50 (9.23.50)

तदन्तं हि भवेद्वैरमनुमानेन माधव । एवं पश्यामि वार्ष्णेय चिन्तयन्प्रज्ञया स्वया । विदुरस्य च वाक्येन चेष्टया च दुरात्मनः ॥

tadantaṃ hi bhavedvairamanumānena mādhava | evaṃ paśyāmi vārṣṇeya cintayanprajñayā svayā | vidurasya ca vākyena ceṣṭayā ca durātmanaḥ

"माधव, उसी से बैर का अन्त होगा, ऐसा मेरा अनुमान है। वार्ष्णेय, अपनी बुद्धि से विचारते हुए, विदुर के कथन और उस दुरात्मा की चेष्टा के आधार पर मैं यही देखता हूँ।

श्लोक 51 (9.23.51)

तस्माद्याहि चमूं वीर यावद्धन्मि शितैः शरैः । दुर्योधनं महाबाहो वाहिनीं चास्य संयुगे ॥

tasmādyāhi camūṃ vīra yāvaddhanmi śitaiḥ śaraiḥ | duryodhanaṃ mahābāho vāhinīṃ cāsya saṃyuge

"इसलिए, वीर, सेना की ओर चलिए, जब तक मैं तीखे बाणों से दुर्योधन को और युद्ध में उसकी सेना को मार नहीं डालता, हे महाबाहो।

श्लोक 52 (9.23.52)

क्षेममद्य करिष्यामि धर्मराजस्य माधव । हत्वैतद्दुर्बलं सैन्यं धार्तराष्ट्रस्य पश्यतः ॥

kṣemamadya kariṣyāmi dharmarājasya mādhava | hatvaitaddurbalaṃ sainyaṃ dhārtarāṣṭrasya paśyataḥ

"माधव, धृतराष्ट्रपुत्र की इस दुर्बल सेना को उसके देखते-देखते मारकर आज मैं धर्मराज का कल्याण करूँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 53 (9.23.53)

अभीशुहस्तो दाशार्हस्तथोक्तः सव्यसाचिना । तद्बलौघममित्राणामभीतः प्राविशद्बलात् ॥

abhīśuhasto dāśārhastathoktaḥ savyasācinā | tadbalaughamamitrāṇāmabhītaḥ prāviśadbalāt

सव्यसाची के ऐसा कहने पर लगाम हाथ में लिए दाशार्ह कृष्ण निर्भय होकर वेग से शत्रुओं की उस सेना-बाढ़ में घुस गए।

श्लोक 54 (9.23.54)

शरासनवनं घोरं शक्तिकण्टकसङ्कुलम् । गदापरिघपाषाणं रथनागमहाद्रुमम् ॥

śarāsanavanaṃ ghoraṃ śaktikaṇṭakasaṅkulam | gadāparighapāṣāṇaṃ rathanāgamahādrumam

वह धनुषों का भयंकर वन था, जो शक्तियों के काँटों से भरा था, जिसमें गदाएँ, परिघ और पत्थर थे, और रथ तथा हाथी जिसके विशाल वृक्ष थे,

श्लोक 55 (9.23.55)

हयपत्तिलताकीर्णं गाहमानो महायशाः । व्यचरत्तत्र गोविन्दो रथेनातिपताकिना ॥

hayapattilatākīrṇaṃ gāhamāno mahāyaśāḥ | vyacarattatra govindo rathenātipatākinā

और घोड़ों तथा पैदलों की लताओं से व्याप्त था। उसमें अवगाहन करते हुए महायशस्वी गोविन्द ऊँची पताकाओंवाले रथ से वहाँ विचरने लगे।

श्लोक 56 (9.23.56)

ते हयाः पाण्डुरा राजन्वहन्तोऽर्जुनमाहवे । दिक्षु सर्वास्वदृश्यन्त दाशार्हेण प्रचोदिताः ॥

te hayāḥ pāṇḍurā rājanvahanto'rjunamāhave | dikṣu sarvāsvadṛśyanta dāśārheṇa pracoditāḥ

हे राजन्, युद्ध में अर्जुन को ढोते हुए वे श्वेत घोड़े, दाशार्ह के हाँकने पर, सब दिशाओं में दिखाई देने लगे।

श्लोक 57 (9.23.57)

ततः प्रायाद्रथेनाजौ सव्यसाची परन्तपः । किरञ्शरशतांस्तीक्ष्णान्वारिधारा घनो यथा ॥

tataḥ prāyādrathenājau savyasācī parantapaḥ | kirañśaraśatāṃstīkṣṇānvāridhārā ghano yathā

फिर शत्रुतापन सव्यसाची रथ से आगे बढ़े, बादल जैसे जलधाराएँ बरसाता है वैसे सैकड़ों तीखे बाण बरसाते हुए।

श्लोक 58 (9.23.58)

प्रादुरासीन्महाञ्शब्दः शराणां नतपर्वणाम् । इषुभिश्छाद्यमानानां समरे सव्यसाचिना ॥

prādurāsīnmahāñśabdaḥ śarāṇāṃ nataparvaṇām | iṣubhiśchādyamānānāṃ samare savyasācinā

समर में सव्यसाची के बाणों से ढके जाते हुए शत्रुओं के बीच झुकी गाँठवाले बाणों का भारी शब्द उठा।

श्लोक 59 (9.23.59)

असज्जन्तस्तनुत्रेषु शरौघाः प्रापतन्भुवि । इन्द्राशनिसमस्पर्शा गाण्डीवप्रेषिताः शराः ॥

asajjantastanutreṣu śaraughāḥ prāpatanbhuvi | indrāśanisamasparśā gāṇḍīvapreṣitāḥ śarāḥ

गाण्डीव से छूटे, इन्द्र के वज्र जैसे स्पर्शवाले बाणों के झुण्ड कवचों में अटके बिना उन्हें भेदकर धरती पर गिरने लगे।

श्लोक 60 (9.23.60)

नरान्नागान्समाहत्य हयांश्चापि विशाम्पते । अपतन्त रणे बाणाः पतङ्गा इव घोषिणः ॥

narānnāgānsamāhatya hayāṃścāpi viśāmpate | apatanta raṇe bāṇāḥ pataṅgā iva ghoṣiṇaḥ

हे प्रजानाथ, मनुष्यों, हाथियों और घोड़ों को बींधकर वे बाण युद्ध में भनभनाते हुए टिड्डी-दलों की तरह गिरते थे।

श्लोक 61 (9.23.61)

आसीत्सर्वमवच्छन्नं गाण्डीवप्रेषितैः शरैः । न प्राज्ञायन्त समरे दिशो वा प्रदिशोपि वा ॥

āsītsarvamavacchannaṃ gāṇḍīvapreṣitaiḥ śaraiḥ | na prājñāyanta samare diśo vā pradiśopi vā

गाण्डीव से छूटे बाणों से सब कुछ ढक गया; युद्ध में न दिशाएँ पहचानी जाती थीं, न उपदिशाएँ।

श्लोक 62 (9.23.62)

सर्वमासीज्जगत्पूर्णं पार्थनामाङ्कितैः शरैः । रुक्मपुङ्खैस्तैलधौतैः कर्मारपरिमार्जितैः ॥

sarvamāsījjagatpūrṇaṃ pārthanāmāṅkitaiḥ śaraiḥ | rukmapuṅkhaistailadhautaiḥ karmāraparimārjitaiḥ

पार्थ के नाम से अंकित, सोने के पंखवाले, तेल से धुले और लोहार के माँजे हुए बाणों से सारा जगत् भर गया।

श्लोक 63 (9.23.63)

ते दह्यमानाः पार्थेन पावकेनेव कुञ्जराः । पार्थं न प्राजहुर्घोराः वध्यमानाः शितैः शरैः ॥

te dahyamānāḥ pārthena pāvakeneva kuñjarāḥ | pārthaṃ na prājahurghorāḥ vadhyamānāḥ śitaiḥ śaraiḥ

अग्नि से हाथियों की तरह पार्थ के द्वारा जलाए जाते और तीखे बाणों से मारे जाते हुए वे भयंकर योद्धा भी पार्थ को छोड़कर नहीं हटे।

श्लोक 64 (9.23.64)

शरचापधरः पार्थः प्रज्वलन्निव भास्करः । ददाह समरे योधान्कक्षमग्निरिव ज्वलन् ॥

śaracāpadharaḥ pārthaḥ prajvalanniva bhāskaraḥ | dadāha samare yodhānkakṣamagniriva jvalan

धनुष-बाण धारण किए पार्थ, जलते हुए सूर्य के समान, रण में योद्धाओं को ऐसे जलाने लगे जैसे दहकती आग सूखी घास को।

श्लोक 65 (9.23.65)

यथा वनान्ते वनपैर्विसृष्टः । कक्षं दहेत्कृष्णगतिः सुघोषः । भूरिद्रुमं शुष्कलतावितानं । भृशं समृद्धो ज्वलनः प्रतापी ॥

yathā vanānte vanapairvisṛṣṭaḥ | kakṣaṃ dahetkṛṣṇagatiḥ sughoṣaḥ | bhūridrumaṃ śuṣkalatāvitānaṃ | bhṛśaṃ samṛddho jvalanaḥ pratāpī

जैसे वन के छोर पर वनवासियों के छोड़े हुए, काले मार्गवाले और घोर गर्जन करते हुए अग्नि, खूब बढ़कर प्रबल और तेजस्वी होकर, बहुत-से वृक्षों और सूखी लताओं के वितान से भरे सूखे झाड़-झंखाड़ को जला डालते हैं,

श्लोक 66 (9.23.66)

एवं स नाराचगणम्प्रतापी । शरार्चिरुच्चावचतिग्मतेजाः । ददाह सर्वां तव पुत्रसेना- । ममृष्यमाणस्तरसा तरस्वी ॥

evaṃ sa nārācagaṇampratāpī | śarārciruccāvacatigmatejāḥ | dadāha sarvāṃ tava putrasenā- | mamṛṣyamāṇastarasā tarasvī

वैसे ही नाराचों की बौछार से प्रतापी, बाणों की ज्वालाओंवाले, नाना प्रकार के तीक्ष्ण तेजवाले उस वेगवान् वीर ने असहिष्णु होकर आपके पुत्र की समस्त सेना को वेग से जला डाला।

श्लोक 67 (9.23.67)

तस्येषवः प्राणहराः सुमुक्ता । नासज्जन्वै वर्मसु रुक्मपुङ्खाः । न च द्वितीयं प्रमुमोच बाणं । नरे हये वा परमद्विपे वा ॥

tasyeṣavaḥ prāṇaharāḥ sumuktā | nāsajjanvai varmasu rukmapuṅkhāḥ | na ca dvitīyaṃ pramumoca bāṇaṃ | nare haye vā paramadvipe vā

उसके प्राणहारी, भली-भाँति छोड़े गए, सोने के पंखवाले बाण कवचों में अटकते नहीं थे; और वह किसी मनुष्य, घोड़े या विशाल हाथी पर दूसरा बाण नहीं छोड़ता था।

श्लोक 68 (9.23.68)

अनेकरूपाकृतिभिर्हि बाणै- । र्महारथानीकमनुप्रविश्य । स एव एकस्तव पुत्रस्य सेनां । जघान दैत्यानिव वज्रपाणिः ॥

anekarūpākṛtibhirhi bāṇai- | rmahārathānīkamanupraviśya | sa eva ekastava putrasya senāṃ | jaghāna daityāniva vajrapāṇiḥ

अनेक रूप-आकारवाले बाणों से महारथियों की सेना में घुसकर उस अकेले ने ही आपके पुत्र की सेना को वैसे मार गिराया जैसे वज्रधारी इन्द्र ने दैत्यों को।

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