शल्य पर्व · अध्याय 24
कौरवों का पलायन और गजसेना का संहार
अर्जुन के बाणों से कौरव-सेना भाग खड़ी होती है; कुछ योद्धा भाग जाते हैं, कुछ सँभलकर फिर युद्ध में लौटते हैं। धृष्टद्युम्न दुर्योधन को घायल कर उसके घोड़े और सारथि मार डालता है, और दुर्योधन घोड़े पर चढ़कर भाग जाता है। तीन हज़ार हाथी पाण्डवों को घेर लेते हैं, पर अर्जुन और भीम उन्हें तोड़ डालते हैं। अश्वत्थामा, कृप और कृतवर्मा दुर्योधन को खोजते हैं, और सञ्जय बताते हैं कि वे कैसे घिरकर सात्यकि के हाथों बन्दी बने।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.24.1)
युध्यतां यतमानानां शूराणामनिवर्तिनाम् । सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जयः ॥
yudhyatāṃ yatamānānāṃ śūrāṇāmanivartinām | saṅkalpamakaronmoghaṃ gāṇḍīvena dhanañjayaḥ
अर्जुन ने गाण्डीव से उन शूरवीरों का संकल्प निष्फल कर दिया जो जूझ रहे थे, प्रयत्न कर रहे थे और पीछे नहीं हटते थे।
श्लोक 2 (9.24.2)
इन्द्राशनिसमस्पर्शानविषह्यान्महौजसः । विसृजन्दृश्यते बाणान्धारा मुञ्चन्निवाम्बुदः ॥
indrāśanisamasparśānaviṣahyānmahaujasaḥ | visṛjandṛśyate bāṇāndhārā muñcannivāmbudaḥ
वे इन्द्र के वज्र के समान स्पर्शवाले, असह्य और महातेजस्वी बाण छोड़ते दिखाई देते थे, जैसे बादल जलधाराएँ बरसाता है।
श्लोक 3 (9.24.3)
तत्सैन्यं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं किरीटिना । सम्प्रदुद्राव सङ्ग्रामात्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥
tatsainyaṃ bharataśreṣṭha vadhyamānaṃ kirīṭinā | sampradudrāva saṅgrāmāttava putrasya paśyataḥ
हे भरतश्रेष्ठ, किरीटधारी के द्वारा मारी जाती हुई वह सेना आपके पुत्र के देखते-देखते युद्ध से भाग खड़ी हुई,
श्लोक 4 (9.24.4)
पितॄन्भ्रातॄन्परित्यज्य वयस्यानपि चापरे ॥
pitṝnbhrātṝnparityajya vayasyānapi cāpare
कुछ पिताओं और भाइयों को छोड़कर, और कुछ मित्रों तक को छोड़कर।
श्लोक 5 (9.24.5)
हतधुर्या रथाः केचिद्धतसूतास्तथा परे । भग्नाक्षयुगचक्रेषाः केचिदासन्विशाम्पते ॥
hatadhuryā rathāḥ keciddhatasūtāstathā pare | bhagnākṣayugacakreṣāḥ kecidāsanviśāmpate
हे प्रजानाथ, कुछ रथों के जुए ढोनेवाले घोड़े मारे जा चुके थे, दूसरों के सारथि; कुछ के धुरे, जुए, पहिए और ईषादण्ड टूट गए थे।
श्लोक 6 (9.24.6)
अन्येषां सायकाः क्षीणास्तथाऽन्ये बाणपीडिताः । अक्षता युगपत्केचित्प्राद्रवन्भयपीडिताः ॥
anyeṣāṃ sāyakāḥ kṣīṇāstathā'nye bāṇapīḍitāḥ | akṣatā yugapatkecitprādravanbhayapīḍitāḥ
किसी के बाण समाप्त हो गए थे, किसी को बाणों की पीड़ा थी; कुछ बिना घाव खाए ही भय से व्याकुल होकर एक साथ भाग खड़े हुए।
श्लोक 7 (9.24.7)
केचित्पुत्रानुपादाय हतभूयिष्ठबान्धवाः । विचुक्रुशुः पितॄंस्त्वन्ये सहायानपरे पुनः ॥
kecitputrānupādāya hatabhūyiṣṭhabāndhavāḥ | vicukruśuḥ pitṝṃstvanye sahāyānapare punaḥ
कुछ, जिनके अधिकांश बन्धु मारे जा चुके थे, अपने पुत्रों को उठाकर विलाप करने लगे; दूसरे पिताओं के लिए चीखे, और कुछ अपने साथियों के लिए।
श्लोक 8 (9.24.8)
बान्धवांश्च नरव्याघ्र भ्रातॄन्सम्बन्धिनस्तथा । दुद्रुवुः केचिदुत्सृज्य तत्रतत्र विशाम्पते ॥
bāndhavāṃśca naravyāghra bhrātṝnsambandhinastathā | dudruvuḥ kecidutsṛjya tatratatra viśāmpate
हे पुरुषव्याघ्र, हे प्रजानाथ, कुछ लोग बन्धुओं, भाइयों और सम्बन्धियों को जहाँ-तहाँ छोड़कर भाग गए।
श्लोक 9 (9.24.9)
बहवोऽत्र भृशं विद्धा मुह्यमाना महारथाः । निःश्वसन्ति स्म दृश्यन्ते पार्थबाणहता नराः ॥
bahavo'tra bhṛśaṃ viddhā muhyamānā mahārathāḥ | niḥśvasanti sma dṛśyante pārthabāṇahatā narāḥ
यहाँ बहुत-से महारथी, गहरे बिंधे और मूर्च्छित, हाँफते हुए दिखाई देते थे; वे पार्थ के बाणों से मारे गए मनुष्य थे।
श्लोक 10 (9.24.10)
तानन्ये रथमारोप्य ह्याश्वास्य च मुहूर्तकम् । विश्रान्ताश्च वितृष्णाश्च पुनर्युद्धाय जग्मिरे ॥
tānanye rathamāropya hyāśvāsya ca muhūrtakam | viśrāntāśca vitṛṣṇāśca punaryuddhāya jagmire
दूसरों ने उन्हें रथ पर चढ़ाकर क्षणभर आश्वासन दिया, और विश्राम पाकर तथा प्यास बुझाकर वे फिर युद्ध के लिए चल पड़े।
श्लोक 11 (9.24.11)
तानपास्य गताः केचित्पुनरेव युयुत्सवः । कुर्वन्तस्तव पुत्रस्य शासनं युद्धदुर्मदाः ॥
tānapāsya gatāḥ kecitpunareva yuyutsavaḥ | kurvantastava putrasya śāsanaṃ yuddhadurmadāḥ
कुछ युद्ध के मद में चूर, फिर लड़ने को उत्सुक, उन्हें छोड़कर आपके पुत्र की आज्ञा का पालन करते हुए चल दिए।
श्लोक 12 (9.24.12)
पानीयमपरे पीत्वा पर्याश्वास्य च वाहनम् । वर्माणि च समारोप्य केचिद्भरतसत्तम ॥
pānīyamapare pītvā paryāśvāsya ca vāhanam | varmāṇi ca samāropya kecidbharatasattama
दूसरों ने पानी पीकर अपने वाहनों को सुस्ता लिया, और कुछ ने, हे भरतश्रेष्ठ, फिर से कवच पहन लिए।
श्लोक 13 (9.24.13)
समाश्वास्यापरे भ्रातॄन्निक्षिप्य शिबिरेऽपि च । पुत्रानन्ये पितॄनन्ये पुनर्युद्धमरोचयन् ॥
samāśvāsyāpare bhrātṝnnikṣipya śibire'pi ca | putrānanye pitṝnanye punaryuddhamarocayan
और दूसरों ने भाइयों को सान्त्वना देकर शिविर में रख दिया, कुछ ने पुत्रों को और कुछ ने पिताओं को, और फिर युद्ध को चुना।
श्लोक 14 (9.24.14)
सज्जयित्वा रथान्केचिद्यथामुख्यं विशाम्पते । आवृत्य पाण्डवानीकं पुनर्युद्धमरोचयन् ॥
sajjayitvā rathānkecidyathāmukhyaṃ viśāmpate | āvṛtya pāṇḍavānīkaṃ punaryuddhamarocayan
हे प्रजानाथ, कुछ ने क्रम से रथ सजाकर पाण्डवों की सेना को घेर लिया और फिर युद्ध करना चाहा।
श्लोक 15 (9.24.15)
ते शूराः किङ्किणीजालैः समाच्छन्ना बभासिरे । त्रैलोक्यविजये युक्ता यथा दैतेयदानवाः ॥
te śūrāḥ kiṅkiṇījālaiḥ samācchannā babhāsire | trailokyavijaye yuktā yathā daiteyadānavāḥ
घुँघरुओं के जालों से ढके वे शूर, तीनों लोकों को जीतने में लगे दैत्यों और दानवों की तरह शोभित हुए।
श्लोक 16 (9.24.16)
आगम्य सहसा केचिद्रथैः स्वर्णविभूषितैः । पाण्डवानामनीकेषु धृष्टद्युम्नमयोधयन् ॥
āgamya sahasā kecidrathaiḥ svarṇavibhūṣitaiḥ | pāṇḍavānāmanīkeṣu dhṛṣṭadyumnamayodhayan
कुछ सोने से सजे रथों में अचानक आकर पाण्डवों की सेना में धृष्टद्युम्न से युद्ध करने लगे।
श्लोक 17 (9.24.17)
धृष्टद्युम्नोऽपि पाञ्चाल्यः शिखण्डी च महारथः । नाकुलिस्तु शतानीको रथानीकमयोधयन् ॥
dhṛṣṭadyumno'pi pāñcālyaḥ śikhaṇḍī ca mahārathaḥ | nākulistu śatānīko rathānīkamayodhayan
पाञ्चाल धृष्टद्युम्न, महारथी शिखण्डी और नकुलपुत्र शतानीक भी रथसेना से लड़ने लगे।
श्लोक 18 (9.24.18)
पाञ्चाल्यस्तु ततः क्रुद्धः सैन्येन महता वृतः । अभ्यद्रवत्सुसङ्क्रुद्धस्तावकान्हन्तुमुद्यतः ॥
pāñcālyastu tataḥ kruddhaḥ sainyena mahatā vṛtaḥ | abhyadravatsusaṅkruddhastāvakānhantumudyataḥ
तब पाञ्चाल धृष्टद्युम्न, कुपित होकर और विशाल सेना से घिरा हुआ, अत्यन्त क्रोध में आपके योद्धाओं को मारने के लिए टूट पड़ा।
श्लोक 19 (9.24.19)
ततस्त्वापततस्तस्य तव पुत्रो जनाधिप । बाणसङ्घाननेकान्वै प्रेषयामास भारत ॥
tatastvāpatatastasya tava putro janādhipa | bāṇasaṅghānanekānvai preṣayāmāsa bhārata
हे जनाधिप, हे भारत, उसके आक्रमण करने पर आपके पुत्र ने उस पर अनेक बाण-समूह छोड़े।
श्लोक 20 (9.24.20)
धृष्टद्युम्नस्ततो राजंस्तव पुत्रेण धन्विना । नाराचैरर्धनाराचैर्बहुभिः क्षिप्रकारिभिः ॥
dhṛṣṭadyumnastato rājaṃstava putreṇa dhanvinā | nārācairardhanārācairbahubhiḥ kṣiprakāribhiḥ
हे राजन्, तब आपके पुत्र धनुर्धर ने धृष्टद्युम्न पर शीघ्रगामी बहुत-से नाराचों और अर्धनाराचों से प्रहार किया,
श्लोक 21 (9.24.21)
वत्सदन्तैश्च बाणैश्च कर्मारपरिमार्जितैः । अश्वांश्च चतुरो हत्वा बाह्वोरुरसि चार्पितः ॥
vatsadantaiśca bāṇaiśca karmāraparimārjitaiḥ | aśvāṃśca caturo hatvā bāhvorurasi cārpitaḥ
और लोहार के माँजे वत्सदन्त बाणों से भी; उसके चारों घोड़े मारकर उसे दोनों भुजाओं और छाती में बींध दिया।
श्लोक 22 (9.24.22)
सोऽतिविद्धो महेष्वासस्तोत्रार्दित इव द्विपः । तस्याश्वांश्चतुरो बाणैः प्रेषयामास मृत्यवे । सारथेश्चास्य भल्लेन शिरः कायादपाहरत् ॥
so'tividdho maheṣvāsastotrārdita iva dvipaḥ | tasyāśvāṃścaturo bāṇaiḥ preṣayāmāsa mṛtyave | sāratheścāsya bhallena śiraḥ kāyādapāharat
गहरी चोट खाया हुआ वह महाधनुर्धर अंकुश से पीड़ित हाथी की तरह हो उठा; उसने बाणों से उसके चारों घोड़ों को मृत्यु के पास भेज दिया और भल्ल से उसके सारथि का सिर धड़ से अलग कर दिया।
श्लोक 23 (9.24.23)
ततो दुर्योधनो राजा पृष्ठमारुह्य वाजिनः । अपाक्रामद्वतरथो नातिदूरमरिन्दमः ॥
tato duryodhano rājā pṛṣṭhamāruhya vājinaḥ | apākrāmadvataratho nātidūramarindamaḥ
तब राजा दुर्योधन, जिसका रथ नष्ट हो चुका था, घोड़े की पीठ पर चढ़कर, वह शत्रुदमन थोड़ी ही दूर हट गया।
श्लोक 24 (9.24.24)
दृष्ट्वा तु हतविक्रान्तं स्वमनीकं महाबलः । तव पुत्रो महाराज प्रययौ यत्र सौबलः ॥
dṛṣṭvā tu hatavikrāntaṃ svamanīkaṃ mahābalaḥ | tava putro mahārāja prayayau yatra saubalaḥ
अपनी सेना का पराक्रम नष्ट हुआ देखकर, हे महाराज, आपका महाबली पुत्र वहाँ गया जहाँ सुबलपुत्र शकुनि था।
श्लोक 25 (9.24.25)
ततो रथेषु भग्नेषु त्रिसाहस्रा महाद्विपाः । पाण्डवान्रथिनः सर्वान्समन्तात्पर्यवारयन् ॥
tato ratheṣu bhagneṣu trisāhasrā mahādvipāḥ | pāṇḍavānrathinaḥ sarvānsamantātparyavārayan
तब रथों के टूट जाने पर तीन हज़ार महाहाथियों ने पाण्डवों के सब रथियों को चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 26 (9.24.26)
ते वृताः समरे पञ्च गजानीकेन भारत । अशोभन्त महाराज ग्रहास्तारागणैरिव ॥
te vṛtāḥ samare pañca gajānīkena bhārata | aśobhanta mahārāja grahāstārāgaṇairiva
हे भारत, हाथियों की सेना से रण में घिरे हुए वे पाँचों, हे महाराज, तारागणों के बीच ग्रहों की तरह शोभित हुए।
श्लोक 27 (9.24.27)
ततोऽर्जुनो महाराज लब्धलक्षो महाभुजः । विनिर्ययौ रथेनैव श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ॥
tato'rjuno mahārāja labdhalakṣo mahābhujaḥ | viniryayau rathenaiva śvetāśvaḥ kṛṣṇasārathiḥ
तब हे महाराज, महाबाहु अर्जुन, जिन्होंने अपना लक्ष्य पा लिया था, श्वेत घोड़ोंवाले और कृष्ण-सारथिवाले उसी रथ में निकल पड़े।
श्लोक 28 (9.24.28)
तैः समन्तात्परिवृतः कुञ्जरैः पर्वतोपमैः । नाराचैर्विमलैस्तीक्ष्णैर्गजानीकमयोधयत् ॥
taiḥ samantātparivṛtaḥ kuñjaraiḥ parvatopamaiḥ | nārācairvimalaistīkṣṇairgajānīkamayodhayat
पर्वतों जैसे उन हाथियों से चारों ओर घिरे हुए उन्होंने निर्मल, तीखे नाराचों से गजसेना से युद्ध किया।
श्लोक 29 (9.24.29)
तत्रैकबाणनिहतानपश्याम महागजान् । पतितान्पात्यमानांश्च निर्भिन्नान्सव्यसाचिना ॥
tatraikabāṇanihatānapaśyāma mahāgajān | patitānpātyamānāṃśca nirbhinnānsavyasācinā
वहाँ हमने सव्यसाची के एक-एक बाण से मारे गए, गिरे हुए और गिराए जाते हुए, विदीर्ण हुए महान् हाथियों को देखा।
श्लोक 30 (9.24.30)
भीमसेनस्तु तान्दृष्ट्वा नागान्मत्तगजोपमः । करेणादाय महतीं गदामभ्यपतद्बली । अथाप्लुत्य रथात्तूर्णं दण्डपाणिरिवान्तकः ॥
bhīmasenastu tāndṛṣṭvā nāgānmattagajopamaḥ | kareṇādāya mahatīṃ gadāmabhyapatadbalī | athāplutya rathāttūrṇaṃ daṇḍapāṇirivāntakaḥ
मतवाले हाथी के समान भीमसेन उन हाथियों को देखकर हाथ में विशाल गदा लेकर उन पर टूट पड़े; वह बली रथ से तुरन्त कूदकर दण्डधारी यमराज की तरह निकल पड़े।
श्लोक 31 (9.24.31)
तमुद्यतगदं दृष्ट्वा पाण्डवानां महारथम् । वित्रेसुस्तावकाः सैन्याः शकृन्मूत्रं च सुस्रुवुः ॥
tamudyatagadaṃ dṛṣṭvā pāṇḍavānāṃ mahāratham | vitresustāvakāḥ sainyāḥ śakṛnmūtraṃ ca susruvuḥ
गदा उठाए हुए पाण्डवों के उस महारथी को देखकर आपकी सेनाएँ काँप उठीं और मल-मूत्र छोड़ने लगीं।
श्लोक 32 (9.24.32)
आविग्नं च बलं सर्वं गदाहस्ते वृकोदरे ॥
āvignaṃ ca balaṃ sarvaṃ gadāhaste vṛkodare
वृकोदर के हाथ में गदा देखकर सारी सेना घबरा उठी।
श्लोक 33 (9.24.33)
गदया भीमसेनेन भिन्नकुम्भान्निपातितान् । धावमानानपश्याम कुञ्जरान्पर्वतोपमान् ॥
gadayā bhīmasenena bhinnakumbhānnipātitān | dhāvamānānapaśyāma kuñjarānparvatopamān
हमने देखा कि भीमसेन की गदा से कनपटियाँ फटे पर्वत-जैसे हाथी गिराए जा रहे हैं और दूसरे भाग रहे हैं।
श्लोक 34 (9.24.34)
प्राद्रवन्कुञ्जरास्ते तु भीमसेनगदाहताः । पेतुरार्तस्वरं कृत्वा छिन्नपक्षा इवाद्रयः ॥
prādravankuñjarāste tu bhīmasenagadāhatāḥ | peturārtasvaraṃ kṛtvā chinnapakṣā ivādrayaḥ
भीमसेन की गदा से मारे गए वे हाथी भागे और पीड़ा से चीत्कार करते हुए पंख कटे पर्वतों की तरह गिर पड़े।
श्लोक 35 (9.24.35)
प्रभिन्नकुम्भांस्तु बहून्द्रवमाणानितस्ततः । पतमानांश्च सम्प्रेक्ष्य वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥
prabhinnakumbhāṃstu bahūndravamāṇānitastataḥ | patamānāṃśca samprekṣya vitresustava sainikāḥ
फटी कनपटियोंवाले बहुत-से हाथियों को इधर-उधर भागते और गिरते देखकर आपके सैनिक काँप उठे।
श्लोक 36 (9.24.36)
युधिष्ठिरोऽपि सङ्क्रुद्धो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । गार्ध्रपत्रैः शितैर्बाणैर्जघ्नुर्वै गजयोधिनः ॥
yudhiṣṭhiro'pi saṅkruddho mādrīputrau ca pāṇḍavau | gārdhrapatraiḥ śitairbāṇairjaghnurvai gajayodhinaḥ
युधिष्ठिर भी क्रुद्ध होकर, और माद्री के दोनों पाण्डव-पुत्र भी, गीध के पंखवाले तीखे बाणों से हाथियों पर सवार योद्धाओं को मारने लगे।
श्लोक 37 (9.24.37)
धृष्टद्युम्नस्तु समरे पराजित्य नराधिपम् । अपक्रान्ते तव सुते हयपृष्ठे समाश्रिते ॥
dhṛṣṭadyumnastu samare parājitya narādhipam | apakrānte tava sute hayapṛṣṭhe samāśrite
धृष्टद्युम्न ने रण में राजा को हराकर, जब आपका पुत्र हटकर घोड़े की पीठ पर जा बैठा,
श्लोक 38 (9.24.38)
दृष्ट्वा च पाण्डवान्सर्वान्कुञ्जरैः परिवारितान् । धृष्टद्युम्नो महाराज सहसा समुपाद्रवत् ॥
dṛṣṭvā ca pāṇḍavānsarvānkuñjaraiḥ parivāritān | dhṛṣṭadyumno mahārāja sahasā samupādravat
और सब पाण्डवों को हाथियों से घिरा देखकर, हे महाराज, अचानक उनकी ओर दौड़ पड़ा।
श्लोक 39 (9.24.39)
पुत्रः पाञ्चालराजस्य जिघांसुः कुञ्जरान्ययौ । अदृष्ट्वा तु रथानीके दुर्योधनमरिन्दमम् ॥
putraḥ pāñcālarājasya jighāṃsuḥ kuñjarānyayau | adṛṣṭvā tu rathānīke duryodhanamarindamam
पाञ्चालराज का पुत्र हाथियों को मारने की इच्छा से उनकी ओर गया। और रथसेना में शत्रुदमन दुर्योधन को न देखकर,
श्लोक 40 (9.24.40)
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः । अपृच्छन्क्षत्रियांस्तत्र क्व नु दुर्योधनो गतः ॥
aśvatthāmā kṛpaścaiva kṛtavarmā ca sātvataḥ | apṛcchankṣatriyāṃstatra kva nu duryodhano gataḥ
अश्वत्थामा, कृप और सात्वत कृतवर्मा ने वहाँ क्षत्रियों से पूछा, "दुर्योधन कहाँ चले गए?"
श्लोक 41 (9.24.41)
तेऽपश्यमाना राजानं वर्तमाने जनक्षये । मन्वाना निहतं तत्र तव पुत्रं महारथाः । विवर्णवदना भूत्वा पर्यपृच्छन्त ते सुतम् ॥
te'paśyamānā rājānaṃ vartamāne janakṣaye | manvānā nihataṃ tatra tava putraṃ mahārathāḥ | vivarṇavadanā bhūtvā paryapṛcchanta te sutam
जन-संहार के चलते राजा को न देखकर, आपके पुत्र को वहीं मारा गया मानते हुए वे महारथी, उदास मुखवाले होकर, आपके पुत्र के विषय में पूछने लगे।
श्लोक 42 (9.24.42)
आहुः केचिद्वते सूते प्रयातो यत्र सौबलः । हित्वा पाञ्चालराजस्य तदनीकं दुरुत्सहम् ॥
āhuḥ kecidvate sūte prayāto yatra saubalaḥ | hitvā pāñcālarājasya tadanīkaṃ durutsaham
कुछ ने कहा कि सारथि के मारे जाने पर वे पाञ्चालराज की उस दुर्जेय सेना को छोड़कर वहाँ चले गए हैं जहाँ सुबलपुत्र शकुनि है।
श्लोक 43 (9.24.43)
अपरे त्वब्रुवंस्तत्र क्षत्रिया भृशविक्षताः । दुर्योधनेन किं कार्यं द्रक्ष्यध्वं यदि जीवति । युध्यध्वं सहिताः सर्वे किं वो राजा करिष्यति ॥
apare tvabruvaṃstatra kṣatriyā bhṛśavikṣatāḥ | duryodhanena kiṃ kāryaṃ drakṣyadhvaṃ yadi jīvati | yudhyadhvaṃ sahitāḥ sarve kiṃ vo rājā kariṣyati
दूसरे क्षत्रिय, जो बुरी तरह घायल थे, वहाँ बोले: "दुर्योधन से क्या काम? यदि वे जीवित होंगे तो देख लोगे। तुम सब मिलकर लड़ो; राजा तुम्हारा क्या करेगा?"
श्लोक 44 (9.24.44)
ते क्षत्रियाः क्षतैर्गात्रैर्हतभूयिष्ठवाहनाः । शरैः सम्पीड्यमानास्तु नातिव्यक्तमथाब्रुवन् ॥
te kṣatriyāḥ kṣatairgātrairhatabhūyiṣṭhavāhanāḥ | śaraiḥ sampīḍyamānāstu nātivyaktamathābruvan
घावों से भरे अंगोंवाले, अधिकांश वाहनों के मारे जाने से त्रस्त वे क्षत्रिय बाणों से पीड़ित होकर कुछ अस्पष्ट स्वर में बोले।
क्षत्रिया ऊचुः
श्लोक 45 (9.24.45)
इदं सर्वं बलं हन्मो येन स्म परिवारिताः । एते सर्वे गजान्हत्वा उपयान्ति स्म पाण्डवाः ॥
idaṃ sarvaṃ balaṃ hanmo yena sma parivāritāḥ | ete sarve gajānhatvā upayānti sma pāṇḍavāḥ
"जिस सेना ने हमें घेर रखा है, उस सारी सेना को हम मार डालें। ये सब पाण्डव हाथियों को मारकर हमारे पास आ रहे हैं।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 46 (9.24.46)
श्रुत्वा तु वचनं तेषामश्वत्थामा महाबलः । भित्त्वा पाञ्चालराजस्य तदनीकं दुरुत्सहम् ॥
śrutvā tu vacanaṃ teṣāmaśvatthāmā mahābalaḥ | bhittvā pāñcālarājasya tadanīkaṃ durutsaham
उनकी बात सुनकर महाबली अश्वत्थामा पाञ्चालराज की उस दुर्जेय सेना को भेदकर,
श्लोक 47 (9.24.47)
कृपश्च कृतवर्मा च प्रययौ यत्र सौबलः । रथानीकं परित्यज्य शूराः सुदृढधन्विनः ॥
kṛpaśca kṛtavarmā ca prayayau yatra saubalaḥ | rathānīkaṃ parityajya śūrāḥ sudṛḍhadhanvinaḥ
तथा कृप और कृतवर्मा भी, वे दृढ़ धनुर्धर शूर, रथसेना को छोड़कर वहाँ चले गए जहाँ सुबलपुत्र था।
श्लोक 48 (9.24.48)
ततस्तेषु प्रयातेषु धृष्टद्युम्नपुरस्कृताः । आययुः पाण्डवा राजन्विनिघ्नन्तः स्म तावकान् ॥
tatasteṣu prayāteṣu dhṛṣṭadyumnapuraskṛtāḥ | āyayuḥ pāṇḍavā rājanvinighnantaḥ sma tāvakān
हे राजन्, उनके चले जाने पर धृष्टद्युम्न को आगे किए पाण्डव आपके योद्धाओं को मारते हुए आ पहुँचे।
श्लोक 49 (9.24.49)
दृष्ट्वा तु तानापततः सम्प्रहृष्टान्महारथान् । पराक्रान्तास्ततो वीरा निराशा जीविते तदा ॥
dṛṣṭvā tu tānāpatataḥ samprahṛṣṭānmahārathān | parākrāntāstato vīrā nirāśā jīvite tadā
उन आनन्द से भरे महारथियों को आक्रमण करते देखकर पराक्रमी वीर तब जीवन से निराश हो गए।
श्लोक 50 (9.24.50)
विवर्णमुखभूयिष्ठमभवत्तावकं बलम् । परिक्षीणायुधान्दृष्ट्वा तानहं परिवारितान् ॥
vivarṇamukhabhūyiṣṭhamabhavattāvakaṃ balam | parikṣīṇāyudhāndṛṣṭvā tānahaṃ parivāritān
आपकी सेना के अधिकांश मुख पीले पड़ गए। उन्हें घिरा हुआ और शस्त्रहीन देखकर मैंने,
श्लोक 51 (9.24.51)
राजन्बलेन त्र्यङ्गेन त्यक्त्वा जीवितमात्मनः । आत्मना पञ्चमोऽयुध्यं पाञ्चालस्य बलेन ह ॥
rājanbalena tryaṅgena tyaktvā jīvitamātmanaḥ | ātmanā pañcamo'yudhyaṃ pāñcālasya balena ha
हे राजन्, तीन अंगों की सेना के साथ प्राणों का मोह छोड़कर, अपने को पाँचवाँ रखकर, पाञ्चाल की सेना से युद्ध किया।
श्लोक 52 (9.24.52)
तस्मिन्देशे व्यवस्थाय यत्र शारद्वतः स्थितः । सम्प्रद्रुता वयं पञ्च किरीटिशरपीडिताः ॥
tasmindeśe vyavasthāya yatra śāradvataḥ sthitaḥ | sampradrutā vayaṃ pañca kirīṭiśarapīḍitāḥ
जहाँ शरद्वान् का पुत्र कृप खड़ा था, उसी स्थान पर टिककर भी हम पाँचों किरीटी के बाणों से पीड़ित होकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 53 (9.24.53)
धृष्टद्युम्नं महारौद्रं तत्र नोऽभूद्रणो महान् । जितास्तेन वयं सर्वे व्यपयाम रणात्ततः ॥
dhṛṣṭadyumnaṃ mahāraudraṃ tatra no'bhūdraṇo mahān | jitāstena vayaṃ sarve vyapayāma raṇāttataḥ
हमने महाभयंकर धृष्टद्युम्न से युद्ध किया और वहाँ हमारा बड़ा युद्ध हुआ; उसके हाथों हम सब हार गए और रण से हट गए।
श्लोक 54 (9.24.54)
अथापश्यं सात्यकिं तमुपायातं महारथम् । रथैश्चतुः शतैर्वीरो मामभ्यद्रवदाहवे ॥
athāpaśyaṃ sātyakiṃ tamupāyātaṃ mahāratham | rathaiścatuḥ śatairvīro māmabhyadravadāhave
तब मैंने महारथी सात्यकि को आते देखा; वह वीर चार सौ रथों के साथ युद्ध में मुझ पर टूट पड़ा।
श्लोक 55 (9.24.55)
धृष्टद्युम्नादहं मुक्तः कथञ्चिच्छ्रान्तवाहनात् । पतितो माधवानीकं दुष्कृती नरकं यथा ॥
dhṛṣṭadyumnādahaṃ muktaḥ kathañcicchrāntavāhanāt | patito mādhavānīkaṃ duṣkṛtī narakaṃ yathā
थके हुए वाहनोंवाले धृष्टद्युम्न से जैसे-तैसे छूटकर मैं पापी के नरक में गिरने की तरह माधव की सेना में जा गिरा।
श्लोक 56 (9.24.56)
तत्र युद्धमभूद्धोरं मुहूर्तमतिदारुणम् ॥
tatra yuddhamabhūddhoraṃ muhūrtamatidāruṇam
वहाँ कुछ देर तक बड़ा भयंकर और अत्यन्त घोर युद्ध हुआ।
श्लोक 57 (9.24.57)
सात्यकिस्तु महाबाहुर्मम हत्वा परिच्छदम् । जीवग्राहमगृह्णान्मां मूर्च्छितं पतितं भुवि ॥
sātyakistu mahābāhurmama hatvā paricchadam | jīvagrāhamagṛhṇānmāṃ mūrcchitaṃ patitaṃ bhuvi
महाबाहु सात्यकि ने मेरे परिजनों और साज-सामान को नष्ट कर, भूमि पर मूर्च्छित पड़े हुए मुझे जीवित पकड़ लिया।
श्लोक 58 (9.24.58)
ततो मुहूर्तादिव तद्गजानीकमविध्यत । गदया भीमसेनेन नाराचैरर्जुनेन च ॥
tato muhūrtādiva tadgajānīkamavidhyata | gadayā bhīmasenena nārācairarjunena ca
तब क्षणभर में ही भीमसेन की गदा और अर्जुन के नाराचों से वह गजसेना छिन्न-भिन्न हो गई।
श्लोक 59 (9.24.59)
अभिपिष्टैर्महानागैः समन्तात्पर्वतोपमैः । नातिप्रसिद्धैव गतिः पाण्डवानामजायत ॥
abhipiṣṭairmahānāgaiḥ samantātparvatopamaiḥ | nātiprasiddhaiva gatiḥ pāṇḍavānāmajāyata
चारों ओर पर्वत-जैसे महाहाथियों के कुचल दिए जाने से पाण्डवों का मार्ग कठिनाई से ही दिखाई देता था।
श्लोक 60 (9.24.60)
रथमार्गं ततश्चक्रे भीमसेनो महाबलः । पाण्डवानां महाराज व्यपाकर्षन्महागजान् ॥
rathamārgaṃ tataścakre bhīmaseno mahābalaḥ | pāṇḍavānāṃ mahārāja vyapākarṣanmahāgajān
तब महाबली भीमसेन ने, हे महाराज, पाण्डवों के रथों के लिए मार्ग बनाया और महाहाथियों को खींचकर हटा दिया।
श्लोक 61 (9.24.61)
अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः । अपश्यन्तो रथानीके दुर्योधनसमरिन्दमम् । राजानं मृगयामासुस्तव पुत्रं महारथम् ॥
aśvatthāmā kṛpaścaiva kṛtavarmā ca sātvataḥ | apaśyanto rathānīke duryodhanasamarindamam | rājānaṃ mṛgayāmāsustava putraṃ mahāratham
अश्वत्थामा, कृप और सात्वत कृतवर्मा रथसेना में शत्रुदमन दुर्योधन को न देखकर आपके महारथी पुत्र राजा को खोजने लगे,
श्लोक 62 (9.24.62)
परित्यज्य च पाञ्चाल्यं प्रयाता यत्र सौबलः । राज्ञोऽदर्शनसंविग्ना वर्तमाने जनक्षये ॥
parityajya ca pāñcālyaṃ prayātā yatra saubalaḥ | rājño'darśanasaṃvignā vartamāne janakṣaye
और पाञ्चाल को छोड़कर वहाँ चले गए जहाँ सुबलपुत्र था, राजा को न देख पाने से व्याकुल, जब जन-संहार चल रहा था।