शल्य पर्व · अध्याय 27
सहदेव द्वारा उलूक और शकुनि का वध
शकुनि और उलूक सहदेव पर चढ़ाई करते हैं और भीम उसके साथ लड़ते हैं। सहदेव उलूक का सिर काट देता है; भीम की गर्जना से कौरव-सेना भाग उठती है, जिसे दुर्योधन फिर लौटाता है। द्वन्द्व में सहदेव शकुनि के धनुष, खड्ग, गदा और शक्ति को काट डालता है, उसे द्यूत की याद दिलाता है और उसका वध कर देता है; कौरव-सेना भाग खड़ी होती है और पाण्डव शंख बजाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.27.1)
तस्मिन्प्रवृत्ते सङ्ग्रामे गजवाजिनरक्षये । शकुनिः सौबलो राजन्सहदेवं समभ्ययात् ॥
tasminpravṛtte saṅgrāme gajavājinarakṣaye | śakuniḥ saubalo rājansahadevaṃ samabhyayāt
हे राजन्! मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों का संहार करने वाला वह संग्राम जब आरम्भ हो गया, तब सुबलपुत्र शकुनि सहदेव पर चढ़ आया।
श्लोक 2 (9.27.2)
ततोऽस्यापततस्तूर्णं सहदेवः प्रतापवान् । शरौघान्प्रेषयामास पतङ्गानिव शीघ्रगान् । उलूकं च रणे राजन्विव्याध दशभिः शरैः ॥
tato'syāpatatastūrṇaṃ sahadevaḥ pratāpavān | śaraughānpreṣayāmāsa pataṅgāniva śīghragān | ulūkaṃ ca raṇe rājanvivyādha daśabhiḥ śaraiḥ
तब शकुनि को अपने ऊपर टूटते देख पराक्रमी सहदेव ने शीघ्र ही उड़ते हुए पतंगों के समान बाणों की झड़ियाँ छोड़ीं और हे राजन्! रण में उलूक को भी दस बाणों से बींध दिया।
श्लोक 3 (9.27.3)
शकुनिश्च महाराज भीमं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः । नवत्या निशितैर्बाणैः सहदेवमवाकिरत् ॥
śakuniśca mahārāja bhīmaṃ viddhvā tribhiḥ śaraiḥ | navatyā niśitairbāṇaiḥ sahadevamavākirat
और हे महाराज! शकुनि ने भीम को तीन बाणों से बींधकर सहदेव को नब्बे तीखे बाणों से ढक दिया।
श्लोक 4 (9.27.4)
ते शूराः समरे राजन्समासाद्य परस्परम् । विव्यधुर्निशितैर्बाणैः कङ्कबर्हिणवाजितैः । स्वर्णपुङ्खैः शिलाधौतैराकर्णप्रहितैः शरैः ॥
te śūrāḥ samare rājansamāsādya parasparam | vivyadhurniśitairbāṇaiḥ kaṅkabarhiṇavājitaiḥ | svarṇapuṅkhaiḥ śilādhautairākarṇaprahitaiḥ śaraiḥ
हे राजन्! वे शूरवीर रण में एक-दूसरे के निकट पहुँचकर कंक और मोर के पंखों वाले, सोने की पुङ्ख से युक्त, शिला पर तेज किए हुए और कान तक खींचकर छोड़े गए तीखे बाणों से परस्पर एक-दूसरे को बींधने लगे।
श्लोक 5 (9.27.5)
तेषां चापगुणोत्सृष्टा शरवृष्टिर्विशाम्पते । आच्छादयद्दिशः सर्वा धाराभिरिव तोयदः ॥
teṣāṃ cāpaguṇotsṛṣṭā śaravṛṣṭirviśāmpate | ācchādayaddiśaḥ sarvā dhārābhiriva toyadaḥ
हे प्रजापति! उनकी धनुष-डोरियों से छूटी हुई बाणों की वर्षा ने मेघ की जलधाराओं के समान सारी दिशाओं को ढक लिया।
श्लोक 6 (9.27.6)
ततः क्रुद्धो रणे भीमः सहदेवश्च भारत । चेरतुः कदनं सङ्ख्ये कुर्वन्तौ सुमहाबलौ ॥
tataḥ kruddho raṇe bhīmaḥ sahadevaśca bhārata | ceratuḥ kadanaṃ saṅkhye kurvantau sumahābalau
हे भारत! तब युद्ध में क्रुद्ध हुए अत्यन्त बलशाली भीम और सहदेव, दोनों रण में भारी संहार मचाते हुए विचरने लगे।
श्लोक 7 (9.27.7)
ताभ्यां शरशतैश्छन्नं तद्बलं तव भारत । सान्धकारमिवाकाशमभवत्तत्रतत्र ह ॥
tābhyāṃ śaraśataiśchannaṃ tadbalaṃ tava bhārata | sāndhakāramivākāśamabhavattatratatra ha
हे भारत! उन दोनों के सैकड़ों बाणों से आपकी सेना ढक गई और सब ओर आकाश मानो अन्धकार से भर गया।
श्लोक 8 (9.27.8)
अश्वैर्विपरिधावद्भिः शरच्छन्नैर्विशाम्पते । तत्रतत्र कृतो मार्गो विकर्षद्भिर्हतान्बहून् ॥
aśvairviparidhāvadbhiḥ śaracchannairviśāmpate | tatratatra kṛto mārgo vikarṣadbhirhatānbahūn
हे प्रजानाथ! बाणों से ढके घोड़े इधर-उधर दौड़ रहे थे और बहुत-से मरे हुओं को घसीटते हुए उन्होंने जहाँ-तहाँ मार्ग बना दिया।
श्लोक 9 (9.27.9)
निहतानां हयानां च सहैव हयसादिभिः । वर्मभिर्विनिकृत्तैश्च प्रासैश्छिन्नैश्च मारिष ॥
nihatānāṃ hayānāṃ ca sahaiva hayasādibhiḥ | varmabhirvinikṛttaiśca prāsaiśchinnaiśca māriṣa
हे माननीय! मारे गए घोड़ों के अपने सवारों सहित पड़े होने से, कटे हुए कवचों और टूटी हुई बरछियों से,
श्लोक 10 (9.27.10)
ऋष्टिभिः शक्तिभिश्चैव सासिप्रासपरश्वथैः । सञ्छन्ना पृथिवी जज्ञे कुसुमैः शबला इव ॥
ṛṣṭibhiḥ śaktibhiścaiva sāsiprāsaparaśvathaiḥ | sañchannā pṛthivī jajñe kusumaiḥ śabalā iva
तथा ऋष्टियों, शक्तियों, तलवारों, बरछियों और फरसों से पटी हुई पृथ्वी ऐसी हो गई मानो फूलों से चितकबरी हो गई हो।
श्लोक 11 (9.27.11)
योधास्तत्र महाराज समासाद्य परस्परम् । व्यचरन्त रणे क्रुद्धा विनिघ्नन्तः परस्परम् ॥
yodhāstatra mahārāja samāsādya parasparam | vyacaranta raṇe kruddhā vinighnantaḥ parasparam
हे महाराज! वहाँ योद्धा एक-दूसरे के निकट पहुँचकर क्रोध में भरे हुए रण में विचरते और परस्पर मारते थे।
श्लोक 12 (9.27.12)
उद्वृत्तनयनै रोषात्सन्दष्टौष्ठपुटैर्मुखैः । सकुण्डलैर्मही च्छन्ना पद्मकिञ्चल्कसन्निभैः ॥
udvṛttanayanai roṣātsandaṣṭauṣṭhapuṭairmukhaiḥ | sakuṇḍalairmahī cchannā padmakiñcalkasannibhaiḥ
क्रोध से चढ़ी हुई आँखों और दाँतों से भींचे हुए होंठों वाले, कुण्डलों से सजे, कमल के केसर के समान मुखों से पृथ्वी पट गई।
श्लोक 13 (9.27.13)
भुजैश्छिन्नैर्महाराज नागराजकरोपमैः । साङ्गदैः सतनुत्रैश्च सासिप्रासपरश्वथैः ॥
bhujaiśchinnairmahārāja nāgarājakaropamaiḥ | sāṅgadaiḥ satanutraiśca sāsiprāsaparaśvathaiḥ
हे महाराज! गजराजों की सूँड़ जैसी कटी हुई भुजाओं से भी, जो बाजूबन्दों और कवचों से युक्त थीं और तलवारें, बरछियाँ तथा फरसे थामे हुए थीं, पृथ्वी पट गई।
श्लोक 14 (9.27.14)
कबन्धैरुत्थितैश्छिन्नैर्नृत्यद्भिश्चापरैर्युधि । क्रव्यादगणसञ्छन्ना घोराऽभूत्पृथिवी विभो ॥
kabandhairutthitaiśchinnairnṛtyadbhiścāparairyudhi | kravyādagaṇasañchannā ghorā'bhūtpṛthivī vibho
हे विभो! युद्ध में कटे हुए धड़ उठ-उठकर इधर-उधर नाच रहे थे और मांसभक्षी जीवों के झुंड छाए हुए थे, जिससे पृथ्वी भयंकर हो उठी।
श्लोक 15 (9.27.15)
अल्पावशिष्टे सैन्ये तु कौरवेयान्महाहवे । प्रहृष्टाः पाण्डवा भूत्वा निन्यिरे यमसादनम् ॥
alpāvaśiṣṭe sainye tu kauraveyānmahāhave | prahṛṣṭāḥ pāṇḍavā bhūtvā ninyire yamasādanam
उस महायुद्ध में जब सेना थोड़ी ही शेष रह गई, तब पाण्डवों ने हर्षित होकर कौरवों को यमलोक भेज दिया।
श्लोक 16 (9.27.16)
एतस्मिन्नन्तरे शूरः सौबलेयः प्रतापवान् । प्रासेन सहदेवस्य शिरसि प्राहरद्भृशम् ॥
etasminnantare śūraḥ saubaleyaḥ pratāpavān | prāsena sahadevasya śirasi prāharadbhṛśam
इसी बीच पराक्रमी सुबलपुत्र ने सहदेव के सिर पर प्रास से जोर का प्रहार किया।
श्लोक 17 (9.27.17)
स विह्वलो महाराज रथोपस्थ उपाविशत् ॥
sa vihvalo mahārāja rathopastha upāviśat
हे महाराज! वह व्याकुल होकर रथ के पिछले भाग में बैठ गया।
श्लोक 18 (9.27.18)
सहदेवं तथा दृष्ट्वा भीमसेनः प्रतापवान् । सर्वसैन्यानि सङ्क्रुद्धो वारयामास भारत ॥
sahadevaṃ tathā dṛṣṭvā bhīmasenaḥ pratāpavān | sarvasainyāni saṅkruddho vārayāmāsa bhārata
हे भारत! सहदेव को इस दशा में देखकर प्रतापी भीमसेन ने क्रोध में भरकर सारी सेनाओं को रोक लिया।
श्लोक 19 (9.27.19)
निर्बिभेद च नाराचैः शतशोऽथ सहस्रशः । स निर्भिद्याकरोच्चैव सिंहनादमरिन्दमः ॥
nirbibheda ca nārācaiḥ śataśo'tha sahasraśaḥ | sa nirbhidyākaroccaiva siṃhanādamarindamaḥ
उसने सैकड़ों और हजारों नाराचों से उन्हें बींध डाला और बींधकर उस शत्रुदमन ने सिंहनाद किया।
श्लोक 20 (9.27.20)
तेन शब्देन वित्रस्ताः सर्वे सहयवारणाः । प्राद्रवन्सहसा भीताः शकुनेश्च पदानुगाः ॥
tena śabdena vitrastāḥ sarve sahayavāraṇāḥ | prādravansahasā bhītāḥ śakuneśca padānugāḥ
उस गर्जना से भयभीत होकर सारे घोड़े और हाथी तथा शकुनि के अनुयायी सहसा डरकर भाग खड़े हुए।
श्लोक 21 (9.27.21)
प्रभग्नानथ तान्दृष्ट्वा राजा दुर्योधनोऽब्रवीत् । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ॥
prabhagnānatha tāndṛṣṭvā rājā duryodhano'bravīt | nivartadhvamadharmajñā yudhyadhvaṃ kiṃ sṛtena vaḥ
उन्हें भागते देखकर राजा दुर्योधन ने कहा, "अधर्म को जानने वालो! लौटो और लड़ो! इस भागने से तुम्हें क्या मिलेगा?
दुर्योधन उवाच
श्लोक 22 (9.27.22)
इह कीर्तिं समाधाय प्रेत्य लोकान्समश्नुते । प्राणाञ्जहाति यो धीरो युद्धे पृष्ठमदर्शयन् ॥
iha kīrtiṃ samādhāya pretya lokānsamaśnute | prāṇāñjahāti yo dhīro yuddhe pṛṣṭhamadarśayan
जो धीर पुरुष युद्ध में पीठ न दिखाकर प्राण त्यागता है, वह यहाँ कीर्ति पाकर परलोक में भी उत्तम लोक प्राप्त करता है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 23 (9.27.23)
एवमुक्तास्तु ते राज्ञा सौबलस्य पदानुगाः । पाण्डवानभ्यवर्तन्त मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ॥
evamuktāstu te rājñā saubalasya padānugāḥ | pāṇḍavānabhyavartanta mṛtyuṃ kṛtvā nivartanam
राजा के ऐसा कहने पर सौबल के अनुयायी मृत्यु को ही अपना लौटना मानकर पाण्डवों की ओर फिर पलट पड़े।
श्लोक 24 (9.27.24)
द्रवद्भिस्तत्र राजेन्द्र कृतः शब्दोऽतिदारुणः । क्षुब्धसागरसङ्काशः क्षुभितैः सर्वतो दिशम् ॥
dravadbhistatra rājendra kṛtaḥ śabdo'tidāruṇaḥ | kṣubdhasāgarasaṅkāśaḥ kṣubhitaiḥ sarvato diśam
हे राजेन्द्र! भागते हुए उन सैनिकों ने सब ओर से क्षुब्ध होकर क्षुब्ध समुद्र के समान अत्यन्त भयंकर कोलाहल किया।
श्लोक 25 (9.27.25)
तांस्ततः पुरतो दृष्ट्वा सौबलस्य पदानुगान् । प्रत्युद्ययुर्महाराज पाण्डवा विजयोद्यताः ॥
tāṃstataḥ purato dṛṣṭvā saubalasya padānugān | pratyudyayurmahārāja pāṇḍavā vijayodyatāḥ
हे महाराज! सौबल के अनुयायियों को सामने आते देखकर विजय के लिए तत्पर पाण्डव उनका सामना करने चले।
श्लोक 26 (9.27.26)
प्रत्याश्वस्य च दुर्धर्षः सहदेवो विशाम्पते । शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा हयांश्चास्य त्रिभिः शरैः । धनुश्चिच्छेद च शरैः सौबलस्य हसन्निव ॥
pratyāśvasya ca durdharṣaḥ sahadevo viśāmpate | śakuniṃ daśabhirviddhvā hayāṃścāsya tribhiḥ śaraiḥ | dhanuściccheda ca śaraiḥ saubalasya hasanniva
हे प्रजानाथ! दुर्धर्ष सहदेव ने संभलकर शकुनि को दस बाणों से और उसके घोड़ों को तीन बाणों से बींध दिया, और मानो हँसते हुए बाणों से सौबल का धनुष काट डाला।
श्लोक 27 (9.27.27)
अथान्यद्धनुरादाय शकुनिर्युद्धदुर्मदः । विव्याध नकुलं षष्ट्या भीमसेनं च सप्तभिः ॥
athānyaddhanurādāya śakuniryuddhadurmadaḥ | vivyādha nakulaṃ ṣaṣṭyā bhīmasenaṃ ca saptabhiḥ
तब युद्ध के मद में चूर शकुनि ने दूसरा धनुष लेकर नकुल को साठ और भीमसेन को सात बाणों से बींध दिया।
श्लोक 28 (9.27.28)
उलूकोऽपि महाराज भीमं विव्याध सप्तभिः । सहदेवं च सप्तत्या परीप्सन्पितरं रणे ॥
ulūko'pi mahārāja bhīmaṃ vivyādha saptabhiḥ | sahadevaṃ ca saptatyā parīpsanpitaraṃ raṇe
हे महाराज! उलूक ने भी रण में अपने पिता की रक्षा की इच्छा से भीम को सात और सहदेव को सत्तर बाणों से बींध दिया।
श्लोक 29 (9.27.29)
तं भीमसेनः समरे विव्याध नवभिः शरैः । शकुनिं च चतुःषष्ट्या पार्श्वस्थांश्च त्रिभिस्त्रिभिः ॥
taṃ bhīmasenaḥ samare vivyādha navabhiḥ śaraiḥ | śakuniṃ ca catuḥṣaṣṭyā pārśvasthāṃśca tribhistribhiḥ
भीमसेन ने रण में उसे नौ बाणों से, शकुनि को चौंसठ से और उसके पार्श्व के योद्धाओं को तीन-तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 30 (9.27.30)
ते हन्यमाना भीमेन नाराचैस्तैलपायितैः । सहदेवं रणे क्रुद्धाश्छादयञ्शरवृष्टिभिः । पर्वतं वारिधाराभिः सविद्युत इवाम्बुदाः ॥
te hanyamānā bhīmena nārācaistailapāyitaiḥ | sahadevaṃ raṇe kruddhāśchādayañśaravṛṣṭibhiḥ | parvataṃ vāridhārābhiḥ savidyuta ivāmbudāḥ
तेल में बुझे नाराचों से भीम की मार खाते हुए वे क्रुद्ध होकर रण में सहदेव पर बाणों की वर्षा करने लगे, जैसे बिजली से युक्त मेघ पर्वत पर जलधाराएँ बरसाते हैं।
श्लोक 31 (9.27.31)
ततोऽस्यापततः शूरः सहदेवः प्रतापवान् । उलूकस्य महाराज भल्लेनापाहरच्छिरः ॥
tato'syāpatataḥ śūraḥ sahadevaḥ pratāpavān | ulūkasya mahārāja bhallenāpāharacchiraḥ
तब हे महाराज! अपने ऊपर टूटते हुए उलूक का सिर वीर और प्रतापी सहदेव ने एक भल्ल से काट डाला।
श्लोक 32 (9.27.32)
स जगाम रथाद्भूमिं सहदेवेन पातितः । रुधिराप्लुतसर्वाङ्गो नन्दयन्पाण्डवान्युधि ॥
sa jagāma rathādbhūmiṃ sahadevena pātitaḥ | rudhirāplutasarvāṅgo nandayanpāṇḍavānyudhi
सहदेव के हाथों गिराया गया वह रक्त से लथपथ अंगों वाला रथ से भूमि पर आ गिरा और रण में पाण्डवों को आनन्दित कर गया।
श्लोक 33 (9.27.33)
पुत्रं तु निहतं दृष्ट्वा शकुनिस्तत्र भारत । साश्रुकण्ठो विनिःश्वस्य क्षत्तुर्वाक्यमनुस्मरन् ॥
putraṃ tu nihataṃ dṛṣṭvā śakunistatra bhārata | sāśrukaṇṭho viniḥśvasya kṣatturvākyamanusmaran
हे भारत! अपने पुत्र को मरा हुआ देखकर शकुनि का कण्ठ आँसुओं से भर आया; वह लम्बी साँस लेकर क्षत्ता विदुर की बात का स्मरण करता हुआ,
श्लोक 34 (9.27.34)
चिन्तयित्वा मुहूर्तं स बाष्पपूर्णेक्षणः श्वसन् । सहदेवं समासाद्य त्रिभिर्विव्याध सायकैः ॥
cintayitvā muhūrtaṃ sa bāṣpapūrṇekṣaṇaḥ śvasan | sahadevaṃ samāsādya tribhirvivyādha sāyakaiḥ
क्षणभर सोचकर, आँखों में आँसू भरे और हाँफते हुए सहदेव के पास पहुँचा और उसे तीन बाणों से बींध दिया।
श्लोक 35 (9.27.35)
तानपास्य शरान्मुक्ताञ्शरसङ्घैः प्रतापवान् । सहदेवो महाराज धनुश्चिच्छेद संयुगे ॥
tānapāsya śarānmuktāñśarasaṅghaiḥ pratāpavān | sahadevo mahārāja dhanuściccheda saṃyuge
हे महाराज! प्रतापी सहदेव ने उन छोड़े हुए बाणों को अपने बाण-समूहों से दूर हटाकर युद्ध में उसका धनुष काट डाला।
श्लोक 36 (9.27.36)
छिन्ने धनुषि राजेन्द्र शकुनिः सौबलस्तदा । प्रगृह्य विपुलं खड्गं सहदेवाय प्राहिणोत् ॥
chinne dhanuṣi rājendra śakuniḥ saubalastadā | pragṛhya vipulaṃ khaḍgaṃ sahadevāya prāhiṇot
हे राजेन्द्र! धनुष कट जाने पर सुबलपुत्र शकुनि ने एक विशाल खड्ग उठाकर सहदेव पर फेंका।
श्लोक 37 (9.27.37)
तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते । द्विधा चिच्छेद समरे सौबलस्य हसन्निव ॥
tamāpatantaṃ sahasā ghorarūpaṃ viśāmpate | dvidhā ciccheda samare saubalasya hasanniva
हे प्रजापति! भयंकर रूप वाले उस खड्ग को सहसा अपनी ओर आते देख सहदेव ने रण में मानो सौबल पर हँसते हुए उसे दो टुकड़े कर दिया।
श्लोक 38 (9.27.38)
असिं दृष्ट्वा द्विधा च्छिन्नं प्रगृह्य महतीं गदाम् । प्राहिणोत्सहदेवाय सा मोघा न्यपतद्भुवि ॥
asiṃ dṛṣṭvā dvidhā cchinnaṃ pragṛhya mahatīṃ gadām | prāhiṇotsahadevāya sā moghā nyapatadbhuvi
खड्ग को दो टुकड़े हुआ देखकर शकुनि ने एक भारी गदा उठाकर सहदेव पर चलाई, पर वह व्यर्थ होकर भूमि पर गिर पड़ी।
श्लोक 39 (9.27.39)
ततः शक्तिं महाघोरां कालरात्रीमिवोद्यताम् । प्रेषयामास सक्रुद्धः पाण्डवं प्रति सौबलः ॥
tataḥ śaktiṃ mahāghorāṃ kālarātrīmivodyatām | preṣayāmāsa sakruddhaḥ pāṇḍavaṃ prati saubalaḥ
तब क्रोध में भरे सौबल ने पाण्डुपुत्र पर कालरात्रि के समान उठी हुई एक अत्यन्त भयंकर शक्ति चलाई।
श्लोक 40 (9.27.40)
तामापतन्तीं सहसा शरैः कनकभूषणैः । त्रिधा चिच्छेद समरे सहदेवो हसन्निव ॥
tāmāpatantīṃ sahasā śaraiḥ kanakabhūṣaṇaiḥ | tridhā ciccheda samare sahadevo hasanniva
उसे सहसा अपनी ओर आते देख सहदेव ने मानो हँसते हुए सुनहरे आभूषणों वाले बाणों से रण में उसके तीन टुकड़े कर दिए।
श्लोक 41 (9.27.41)
सा पपात त्रिधा च्छिन्ना भूमौ कनकभूषणा । शीर्यमाणा यथा दीप्ता गगनाद्वै शतह्रदा ॥
sā papāta tridhā cchinnā bhūmau kanakabhūṣaṇā | śīryamāṇā yathā dīptā gaganādvai śatahradā
तीन टुकड़े हुई वह स्वर्ण-भूषित शक्ति आकाश से टूटकर गिरती हुई प्रज्वलित बिजली के समान भूमि पर आ गिरी।
श्लोक 42 (9.27.42)
शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा सौबलं च भयार्दितम् । दुद्रुवुस्तावकाः सर्वे भये जाते ससौबलाः ॥
śaktiṃ vinihatāṃ dṛṣṭvā saubalaṃ ca bhayārditam | dudruvustāvakāḥ sarve bhaye jāte sasaubalāḥ
शक्ति को नष्ट और सौबल को भय से पीड़ित देखकर भय फैलते ही आपके सब सैनिक सौबल के साथियों सहित भाग खड़े हुए।
श्लोक 43 (9.27.43)
अथोत्क्रुष्टं महच्चासीत्पाण्डवैर्जितकाशिभिः । धार्तराष्ट्रास्ततः सर्वे प्रायशो विमुखाऽभवन् ॥
athotkruṣṭaṃ mahaccāsītpāṇḍavairjitakāśibhiḥ | dhārtarāṣṭrāstataḥ sarve prāyaśo vimukhā'bhavan
तब विजय से उल्लसित पाण्डवों ने बड़ा भारी जयघोष किया और धृतराष्ट्र के प्रायः सभी सैनिक युद्ध से विमुख हो गए।
श्लोक 44 (9.27.44)
तान्वै विमनसो दृष्ट्वा माद्रीपुत्रः प्रतापवान् । शरैरनेकसाहस्रैर्वारयामास संयुगे ॥
tānvai vimanaso dṛṣṭvā mādrīputraḥ pratāpavān | śarairanekasāhasrairvārayāmāsa saṃyuge
उन्हें उदास देखकर पराक्रमी माद्रीपुत्र ने युद्ध में अनेक सहस्र बाणों से उन्हें रोक दिया।
श्लोक 45 (9.27.45)
ततो गान्धारकैर्गुप्तं पुष्टैरश्वैर्जये धृतम् । आससाद रणे यान्तं सहदेवोऽथ सौबलम् ॥
tato gāndhārakairguptaṃ puṣṭairaśvairjaye dhṛtam | āsasāda raṇe yāntaṃ sahadevo'tha saubalam
फिर सहदेव ने रण में चलते हुए सौबल को जा घेरा, जिसकी रक्षा गान्धार योद्धा कर रहे थे, जिसके घोड़े पुष्ट थे और जो विजय के निश्चय पर डटा था।
श्लोक 46 (9.27.46)
स्वमंशमवशिष्टं तं संस्मृत्य शकुनिं नृप । रथेन काञ्चनाङ्गेन सहदेवः समभ्ययात् ॥
svamaṃśamavaśiṣṭaṃ taṃ saṃsmṛtya śakuniṃ nṛpa | rathena kāñcanāṅgena sahadevaḥ samabhyayāt
हे राजन्! शकुनि को अपने भाग का शेष बचा हुआ शत्रु स्मरण कर सहदेव अपने स्वर्णमय रथ पर उसकी ओर बढ़ा।
श्लोक 47 (9.27.47)
अधिज्यं बलवत्कृत्वा व्याक्षिपन्सुमहद्धनुः । स सौबलमभिद्रुत्य गार्ध्रपत्रैः शिलाशितैः ॥
adhijyaṃ balavatkṛtvā vyākṣipansumahaddhanuḥ | sa saubalamabhidrutya gārdhrapatraiḥ śilāśitaiḥ
धनुष पर मजबूती से प्रत्यंचा चढ़ाकर उसने उस विशाल धनुष को खींचा और गीध के पंखों वाले, शिला पर तेज किए हुए बाणों से सौबल पर टूट पड़कर,
श्लोक 48 (9.27.48)
भृशमभ्यहनत्क्रुद्धस्तोत्रैरिव महाद्विपम् । उवाच चैनं मेधावी विगृह्य स्मारयन्निव ॥
bhṛśamabhyahanatkruddhastotrairiva mahādvipam | uvāca cainaṃ medhāvī vigṛhya smārayanniva
क्रुद्ध होकर उसे वैसे ही कसकर मारा जैसे अंकुशों से महाहाथी को मारा जाता है; और बुद्धिमान सहदेव ने उसे फटकारते हुए मानो याद दिलाते हुए कहा:
सहदेव उवाच
श्लोक 49 (9.27.49)
क्षत्रधर्मे स्थिरो भूत्वा युध्यस्व पुरुषो भव । यत्तदा भाषसे मूढ गृह्णन्नक्षान्सभातले । फलमद्य प्रपद्यस्व कर्मणस्तस्य दुर्मते ॥
kṣatradharme sthiro bhūtvā yudhyasva puruṣo bhava | yattadā bhāṣase mūḍha gṛhṇannakṣānsabhātale | phalamadya prapadyasva karmaṇastasya durmate
"क्षत्रिय-धर्म में स्थिर होकर युद्ध कर, पुरुष बन! मूर्ख! सभा में पासे उठाते समय तूने जो कुछ कहा था, दुर्मते! आज उस कर्म का फल पा ले!
श्लोक 50 (9.27.50)
निहतास्ते दुरात्मानो येऽस्मानवहसन्पुरा । दुर्योधनः कुलाङ्गारः शिष्टस्त्वं चास्य मातुलः ॥
nihatāste durātmāno ye'smānavahasanpurā | duryodhanaḥ kulāṅgāraḥ śiṣṭastvaṃ cāsya mātulaḥ
जिन दुष्टात्माओं ने पहले हमारी हँसी उड़ाई थी, वे मारे जा चुके हैं। कुल का अंगार दुर्योधन और उसका मामा तू ही शेष है।
श्लोक 51 (9.27.51)
अद्य ते निहनिष्यामि क्षुरेणोन्मथितं शिरः । वृक्षात्फलमिवाविद्धं लगुडेन प्रमाथिना ॥
adya te nihaniṣyāmi kṣureṇonmathitaṃ śiraḥ | vṛkṣātphalamivāviddhaṃ laguḍena pramāthinā
आज मैं क्षुर-बाण से तेरा सिर काट गिराऊँगा, जैसे वृक्ष से फल को तोड़ने वाले डंडे से फल को गिरा दिया जाता है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 52 (9.27.52)
एवमुक्त्वा महाराज सहदेवो महाबलः । सङ्क्रुद्धो रणशार्दूलो वेगेनाभिजगाम तम् ॥
evamuktvā mahārāja sahadevo mahābalaḥ | saṅkruddho raṇaśārdūlo vegenābhijagāma tam
हे महाराज! ऐसा कहकर महाबली सहदेव, वह नरशार्दूल, क्रोध में भरकर वेग से उस पर झपटा।
श्लोक 53 (9.27.53)
अभिगम्य सुदुर्धर्षः सहदेवो युधां पतिः । विकृष्य बलवच्चापं क्रोधेन प्रज्वलन्निव ॥
abhigamya sudurdharṣaḥ sahadevo yudhāṃ patiḥ | vikṛṣya balavaccāpaṃ krodhena prajvalanniva
पास जाकर दुर्धर्ष और योद्धाओं के स्वामी सहदेव ने क्रोध से मानो जलते हुए अपने बलवान धनुष को खींचकर,
श्लोक 54 (9.27.54)
शकुनिं दशभिर्विद्ध्वा चतुर्भिश्चास्य वाजिनः । छत्रं ध्वजं धनुश्चास्य च्छित्त्वा सिंह इवानदत् ॥
śakuniṃ daśabhirviddhvā caturbhiścāsya vājinaḥ | chatraṃ dhvajaṃ dhanuścāsya cchittvā siṃha ivānadat
शकुनि को दस और उसके घोड़ों को चार बाणों से बींध दिया, उसका छत्र, ध्वज और धनुष काट डाला और सिंह के समान गर्जना की।
श्लोक 55 (9.27.55)
छिन्नध्वजधनुश्छत्रः सहदेवेन सौबलः । कृतो विद्धश्च बहुभिः सर्वमर्मसु सायकैः ॥
chinnadhvajadhanuśchatraḥ sahadevena saubalaḥ | kṛto viddhaśca bahubhiḥ sarvamarmasu sāyakaiḥ
सहदेव द्वारा ध्वज, धनुष और छत्र से हीन कर दिया गया सौबल बहुत-से बाणों से सब मर्मस्थानों में बींध दिया गया।
श्लोक 56 (9.27.56)
ततो भूयो महाराज सहदेवः प्रतापवान् । शकुनेः प्रेषयामास शरवृष्टिं दुरासदाम् ॥
tato bhūyo mahārāja sahadevaḥ pratāpavān | śakuneḥ preṣayāmāsa śaravṛṣṭiṃ durāsadām
फिर हे महाराज! प्रतापी सहदेव ने शकुनि पर दुर्निवार बाणों की वर्षा की।
श्लोक 57 (9.27.57)
ततस्तु क्रुद्धः सुबलस्य पुत्रो । माद्रीसुतं सहदेवं विमर्दे । प्रासेन जाम्बूनदभूषणेन । जिघांसुरेकोऽभिपपात शीघ्रम् ॥
tatastu kruddhaḥ subalasya putro | mādrīsutaṃ sahadevaṃ vimarde | prāsena jāmbūnadabhūṣaṇena | jighāṃsureko'bhipapāta śīghram
तब सुबल का पुत्र क्रुद्ध होकर अकेला ही सोने से सजे प्रास को लेकर, माद्रीपुत्र सहदेव को मारने की इच्छा से, युद्ध की भीड़ में शीघ्रता से उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 58 (9.27.58)
माद्रीसुतस्तस्य समुद्यतं तं । प्रासं सुवृत्तौ च भुजौ रणाग्रे । भल्लैस्त्रिभिर्युगपत्सञ्चकर्त । ननाद चोच्चैस्तरसाऽऽजिमध्ये ॥
mādrīsutastasya samudyataṃ taṃ | prāsaṃ suvṛttau ca bhujau raṇāgre | bhallaistribhiryugapatsañcakarta | nanāda coccaistarasā''jimadhye
पर माद्रीपुत्र ने रण के अग्रभाग में तीन भल्लों से एक साथ उसके उठाए हुए प्रास को और उसकी सुडौल दोनों भुजाओं को काट डाला और युद्ध के बीच बड़े वेग से ऊँचे स्वर में गर्जना की।
श्लोक 59 (9.27.59)
तस्याशुकारी सुसमाहितेन । सुवर्णपुङ्खेन दृढायसेन । भल्लेन सर्वावरणातिगेन । शिरः शरीरात्प्रममाथ भूयः ॥
tasyāśukārī susamāhitena | suvarṇapuṅkhena dṛḍhāyasena | bhallena sarvāvaraṇātigena | śiraḥ śarīrātpramamātha bhūyaḥ
फिर शीघ्रता से प्रहार करने वाले सहदेव ने भली-भाँति सँधे हुए, सोने की पुङ्ख वाले, दृढ़ लोहे के, सब कवचों को भेदने वाले भल्ल से उसके शरीर से सिर अलग कर दिया।
श्लोक 60 (9.27.60)
शरेण कार्तस्वरभूषितेन । दिवाकराभेण सुसंहितेन । हृतोत्तमाङ्गो युधि पाण्डवेन । पपात भूमौ सुबलस्य पुत्रः ॥
śareṇa kārtasvarabhūṣitena | divākarābheṇa susaṃhitena | hṛtottamāṅgo yudhi pāṇḍavena | papāta bhūmau subalasya putraḥ
सुवर्ण से सजे, सूर्य के समान दीप्तिमान और तीखे बाण से पाण्डुपुत्र द्वारा सिर कट जाने पर सुबल का पुत्र युद्ध में भूमि पर गिर पड़ा।
श्लोक 61 (9.27.61)
स तच्छिरो वेगवता शरेण । सुवर्णपुङ्खेन शिलाशितेन । प्रावेरयत्कुपितः पाण्डुपुत्रो । यत्तत्कुरूणामनयस्य मूलम् ॥
sa tacchiro vegavatā śareṇa | suvarṇapuṅkhena śilāśitena | prāverayatkupitaḥ pāṇḍuputro | yattatkurūṇāmanayasya mūlam
क्रुद्ध पाण्डुपुत्र ने सोने की पुङ्ख वाले, शिला पर तेज किए हुए वेगवान बाण से उस सिर को दूर उछाल दिया, जो कौरवों के अन्याय की जड़ था।
श्लोक 62 (9.27.62)
भुजौ सुवृत्तौ प्रचकर्त वीरः । पश्चात्कबन्धं रुधिरावसिक्तम् । विस्पन्दमानं निपपात घोरं । रथोत्तमात्पार्थिव पार्थिवस्य ॥
bhujau suvṛttau pracakarta vīraḥ | paścātkabandhaṃ rudhirāvasiktam | vispandamānaṃ nipapāta ghoraṃ | rathottamātpārthiva pārthivasya
उस वीर ने उसकी सुडौल भुजाएँ भी काट दीं; फिर हे राजन्! उस राजा का रक्त से भीगा, छटपटाता हुआ भयंकर धड़ उसके उत्तम रथ से गिर पड़ा।
श्लोक 63 (9.27.63)
हृतोत्तमाङ्गं शकुनिं समीक्ष्य । भूमौ शयानं रुधिरार्द्रगात्रम् । योधास्त्वदीया भयनष्टसत्वा । दिशः प्रजग्मुः प्रगृहीतशस्त्राः ॥
hṛtottamāṅgaṃ śakuniṃ samīkṣya | bhūmau śayānaṃ rudhirārdragātram | yodhāstvadīyā bhayanaṣṭasatvā | diśaḥ prajagmuḥ pragṛhītaśastrāḥ
सिर कटे शकुनि को रक्त से भीगे अंगों सहित भूमि पर पड़ा देखकर आपके योद्धा भय से साहस खो बैठे और हाथों में शस्त्र लिए सब दिशाओं में भाग गए।
श्लोक 64 (9.27.64)
प्रविद्रुताः शुष्कमुखा विसञ्ज्ञा । गाण्डीवघोषेण समाहताश्च । भयार्दिता भग्नरथाश्वनागाः । पदातयश्चैव सधार्तराष्ट्राः ॥
pravidrutāḥ śuṣkamukhā visañjñā | gāṇḍīvaghoṣeṇa samāhatāśca | bhayārditā bhagnarathāśvanāgāḥ | padātayaścaiva sadhārtarāṣṭrāḥ
वे भागे जा रहे थे, उनके मुँह सूख गए थे, वे बेसुध थे और गाण्डीव की टंकार से आहत थे; भय से पीड़ित होकर, रथ, घोड़े और हाथी टूट जाने पर पैदल सैनिक भी धृतराष्ट्र के पुत्रों सहित भाग खड़े हुए।
श्लोक 65 (9.27.65)
ततो रथाच्छकुनिं पातयित्वा । मुदान्विता भारत पाण्डवेयाः । शङ्खान्प्रदध्मुः समरेऽतिहृष्टाः । सकेशवाः सैनिकान्हर्षयन्तः ॥
tato rathācchakuniṃ pātayitvā | mudānvitā bhārata pāṇḍaveyāḥ | śaṅkhānpradadhmuḥ samare'tihṛṣṭāḥ | sakeśavāḥ sainikānharṣayantaḥ
तब हे भारत! शकुनि को रथ से गिराकर हर्ष से भरे पाण्डवों ने केशव के साथ अत्यन्त प्रसन्न होकर रण में अपने सैनिकों को हर्षित करते हुए शंख बजाए।
श्लोक 66 (9.27.66)
तं चापि सर्वे प्रतिपूजयन्तो । दृष्ट्वा ब्रुवाणाः सहदेवमाजौ । दिष्ट्या हतो नैकृतिको महात्मा । सहात्मजो वीर रणे त्वयेति ॥
taṃ cāpi sarve pratipūjayanto | dṛṣṭvā bruvāṇāḥ sahadevamājau | diṣṭyā hato naikṛtiko mahātmā | sahātmajo vīra raṇe tvayeti
और सब लोग रण में सहदेव को देखकर उसका सम्मान करते हुए बोले, "हे वीर! सौभाग्य से तुमने उस महाधूर्त को उसके पुत्र सहित युद्ध में मार डाला!"