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शल्य पर्व · अध्याय 28

शेष सेना का संहार

सौबल के बचे हुए अनुयायी पाण्डवों पर टूट पड़ते हैं और अर्जुन तथा भीम के हाथों कटते हैं। दुर्योधन बचे हुए सैनिकों को इकट्ठा कर एक और आक्रमण की आज्ञा देता है, पर पाण्डव उसे भी नष्ट कर देते हैं और ग्यारहों अक्षौहिणी सेनाएँ समाप्त हो जाती हैं। पृथ्वी को सूनी और पाण्डवों को उल्लसित देखकर अकेला, उदास दुर्योधन भाग निकलने का निश्चय करता है।

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सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.28.1)

ततः क्रुद्धा महाराज सौबलस्य पदानुगाः । त्यक्त्वा जीवितमाक्रन्दे पाण्डवान्पर्यवारयन् ॥

tataḥ kruddhā mahārāja saubalasya padānugāḥ | tyaktvā jīvitamākrande pāṇḍavānparyavārayan

तब हे महाराज! सौबल के अनुयायी क्रुद्ध होकर रणकोलाहल में प्राणों का मोह छोड़कर पाण्डवों को चारों ओर से घेरने लगे।

श्लोक 2 (9.28.2)

तानर्जुनः प्रत्यगृह्णात्सहदेवजये धृतः । भीमसेनश्च तेजस्वी क्रुद्धाशीविषदर्शनः ॥

tānarjunaḥ pratyagṛhṇātsahadevajaye dhṛtaḥ | bhīmasenaśca tejasvī kruddhāśīviṣadarśanaḥ

सहदेव की विजय के लिए दृढ़ संकल्प अर्जुन ने उनका सामना किया, और क्रुद्ध विषधर सर्प जैसी दृष्टि वाले तेजस्वी भीमसेन ने भी।

श्लोक 3 (9.28.3)

शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां सहदेवं जिघांसताम् । सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जयः ॥

śaktyṛṣṭiprāsahastānāṃ sahadevaṃ jighāṃsatām | saṅkalpamakaronmoghaṃ gāṇḍīvena dhanañjayaḥ

शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथों में लिए जो सहदेव को मारना चाहते थे, उनके उस संकल्प को धनंजय ने गाण्डीव से निष्फल कर दिया।

श्लोक 4 (9.28.4)

सङ्गृहीतायुधान्बाहून्योधानामभिधावताम् । भल्लैश्चिच्छेद बीभत्सुः शिरांस्यपि हयानपि ॥

saṅgṛhītāyudhānbāhūnyodhānāmabhidhāvatām | bhallaiściccheda bībhatsuḥ śirāṃsyapi hayānapi

बीभत्सु ने भल्लों से दौड़ते हुए योद्धाओं की शस्त्र थामे भुजाओं को, उनके सिरों को और उनके घोड़ों को भी काट डाला।

श्लोक 5 (9.28.5)

ते हयाः प्रत्यपद्यन्त वसुधां विगतासवः । चरता लोकवीरेण प्रहताः सव्यसाचिना ॥

te hayāḥ pratyapadyanta vasudhāṃ vigatāsavaḥ | caratā lokavīreṇa prahatāḥ savyasācinā

वे घोड़े प्राणहीन होकर पृथ्वी पर गिर पड़े; रण में विचरते हुए लोकवीर सव्यसाची ने उन्हें मार गिराया था।

श्लोक 6 (9.28.6)

ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा स्वबलसङ्क्षयम् । हतशेषान्समानीय क्रुद्धो रथगणान्बहून् ॥

tato duryodhano rājā dṛṣṭvā svabalasaṅkṣayam | hataśeṣānsamānīya kruddho rathagaṇānbahūn

तब राजा दुर्योधन ने अपनी सेना का संहार देखकर क्रोध में बचे हुए बहुत-से रथ-समूहों को इकट्ठा किया,

श्लोक 7 (9.28.7)

कुञ्जरांश्च हयांश्चैव पादातांश्च समन्ततः । उवाच दुःखितान्सर्वान्धार्तराष्ट्र इदं वचः ॥

kuñjarāṃśca hayāṃścaiva pādātāṃśca samantataḥ | uvāca duḥkhitānsarvāndhārtarāṣṭra idaṃ vacaḥ

और चारों ओर से हाथी, घोड़े तथा पैदल सैनिकों को भी जुटाया; फिर धृतराष्ट्र के पुत्र ने उन सब दुखी सैनिकों से यह वचन कहा:

दुर्योधन उवाच

श्लोक 8 (9.28.8)

समासाद्य रणे सर्वान्पाण्डवान्ससुहृद्गणान् । पाञ्चाल्यं चापि सबलं हत्वा शीघ्रं निवर्तत ॥

samāsādya raṇe sarvānpāṇḍavānsasuhṛdgaṇān | pāñcālyaṃ cāpi sabalaṃ hatvā śīghraṃ nivartata

"रण में सब पाण्डवों से उनके मित्रगणों सहित और पाञ्चाल राजकुमार से उसकी सेना सहित भिड़कर, उन्हें मारकर शीघ्र लौट आओ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 9 (9.28.9)

तस्य ते शिरसा गृह्य वचनं युद्धदुर्मदाः । अभ्युद्ययू रणे पार्थांस्तव पुत्रस्य शासनात् ॥

tasya te śirasā gṛhya vacanaṃ yuddhadurmadāḥ | abhyudyayū raṇe pārthāṃstava putrasya śāsanāt

उसके वचन को शिरोधार्य करके युद्ध के मद में चूर वे योद्धा आपके पुत्र की आज्ञा से रण में पृथा के पुत्रों पर टूट पड़े।

श्लोक 10 (9.28.10)

तानभ्यापततः शीघ्रं हतशेषान्महारणे । शरैराशीविषाकारैः पाण्डवाः समवाकिरन् ॥

tānabhyāpatataḥ śīghraṃ hataśeṣānmahāraṇe | śarairāśīviṣākāraiḥ pāṇḍavāḥ samavākiran

उस महायुद्ध में उन बचे हुए सैनिकों को शीघ्र ही आक्रमण करते देख पाण्डवों ने उन पर विषधर सर्पों के समान बाण बरसाए।

श्लोक 11 (9.28.11)

तत्सैन्यं भरतश्रेष्ठ मुहूर्तेन महात्मभिः । अवध्यत रणं प्राप्य त्रातारं नाभ्यविन्दत ॥

tatsainyaṃ bharataśreṣṭha muhūrtena mahātmabhiḥ | avadhyata raṇaṃ prāpya trātāraṃ nābhyavindata

हे भरतश्रेष्ठ! वह सेना उन महात्माओं के हाथों क्षणभर में रण में मारी जाने लगी और उसे कोई रक्षक नहीं मिला।

श्लोक 12 (9.28.12)

पलायमानं तु भयान्नावतिष्ठति दंशितम् । अश्वैर्विपरिधावद्भिः सैन्येन रजसा वृते ॥

palāyamānaṃ tu bhayānnāvatiṣṭhati daṃśitam | aśvairviparidhāvadbhiḥ sainyena rajasā vṛte

कवचधारी होते हुए भी वे भागते हुए सैनिक भय के मारे टिक न सके; घोड़े इधर-उधर दौड़ रहे थे और सारा स्थान सेना की धूल से ढका हुआ था।

श्लोक 13 (9.28.13)

न प्राज्ञायन्त समरे दिशः सप्रदिशस्तथा । ततस्तु पाण्डवानीकान्निःसृत्य बहवो जनाः ॥

na prājñāyanta samare diśaḥ sapradiśastathā | tatastu pāṇḍavānīkānniḥsṛtya bahavo janāḥ

रण में दिशाएँ और उपदिशाएँ पहचानी नहीं जाती थीं। तब पाण्डव-सेना से बहुत-से लोग निकल पड़े

श्लोक 14 (9.28.14)

अभ्यघ्नंस्तावकान्युद्धे मुहूर्तादिव भारत । ततो निःशेषमभवत्तत्सैन्यं तव भारत ॥

abhyaghnaṃstāvakānyuddhe muhūrtādiva bhārata | tato niḥśeṣamabhavattatsainyaṃ tava bhārata

और हे भारत! मानो क्षणभर में ही युद्ध में आपके सैनिकों को मार गिराया। इस प्रकार हे भारत! आपकी वह सेना पूरी तरह नष्ट हो गई।

श्लोक 15 (9.28.15)

अक्षौहिण्यः समेतास्तु तव पुत्रस्य भारत । एकादश हता युद्धे ताः प्रभो पाण्डुसृञ्जयैः ॥

akṣauhiṇyaḥ sametāstu tava putrasya bhārata | ekādaśa hatā yuddhe tāḥ prabho pāṇḍusṛñjayaiḥ

हे भारत! आपके पुत्र के लिए एकत्र हुई ग्यारह अक्षौहिणी सेनाएँ हे प्रभो! युद्ध में पाण्डवों और सृञ्जयों के हाथों मारी गईं।

श्लोक 16 (9.28.16)

तेषु राजसहस्रेषु तावकेषु महात्मसु । एको दुर्योधनो राजन्नदृश्यत भृशं क्षतः ॥

teṣu rājasahasreṣu tāvakeṣu mahātmasu | eko duryodhano rājannadṛśyata bhṛśaṃ kṣataḥ

आपके उन महात्मा हजारों राजाओं में से हे राजन्! केवल दुर्योधन ही बुरी तरह घायल दिखाई दिया।

श्लोक 17 (9.28.17)

ततो वीक्ष्य दिशः सर्वा दृष्ट्वा शून्यां च मेदिनीम् । विहीनः सर्वयोधैश्च पाण्डवान्वीक्ष्य संयुगे ॥

tato vīkṣya diśaḥ sarvā dṛṣṭvā śūnyāṃ ca medinīm | vihīnaḥ sarvayodhaiśca pāṇḍavānvīkṣya saṃyuge

तब सब दिशाओं में देखकर, पृथ्वी को सूनी पाकर, सब योद्धाओं से रहित होकर और रण में पाण्डवों को देखकर,

श्लोक 18 (9.28.18)

मुदितान्सर्वतः सिद्धान्नर्दमानान्समन्ततः । बाणशब्दरवांश्चैव श्रुत्वा तेषां महात्मनाम् ॥

muditānsarvataḥ siddhānnardamānānsamantataḥ | bāṇaśabdaravāṃścaiva śrutvā teṣāṃ mahātmanām

जो चारों ओर प्रसन्न, सफल और गर्जना कर रहे थे, उन्हें देखकर तथा उन महात्माओं के बाणों की ध्वनि और कोलाहल सुनकर,

श्लोक 19 (9.28.19)

दुर्योधनो महाराज कश्मलेनाभिसंवृतः । अपयाने मनश्चक्रे विहीनबलवाहनः ॥

duryodhano mahārāja kaśmalenābhisaṃvṛtaḥ | apayāne manaścakre vihīnabalavāhanaḥ

हे महाराज! दुर्योधन ने मोह से घिरकर, सेना और वाहनों से रहित होने पर, भाग निकलने का मन बनाया।

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