शल्य पर्व · अध्याय 29
दुर्योधन का सरोवर में प्रवेश
धृतराष्ट्र पूछते हैं कि पाण्डवों की सेना में क्या शेष रहा, और सञ्जय बताते हैं: धृष्टद्युम्न के अधीन थोड़ी-सी सेना, और पैदल सरोवर की ओर जाता अकेला दुर्योधन। सञ्जय कहते हैं कि धृष्टद्युम्न और सात्यकि उन्हें मार डालते, पर व्यास ने बचा लिया; फिर घायल दुर्योधन से उनकी भेंट हुई, जिसने कहा कि अन्धे राजा को बता देना कि वह जल में छिपा है, और माया से सरोवर का जल स्तम्भित कर दिया; तब बचे हुए तीनों वीर, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा, यह जान गए। शिविर की स्त्रियाँ नगर की ओर भागती हैं, और युयुत्सु युधिष्ठिर की अनुमति से राजमहिलाओं को हस्तिनापुर पहुँचाते हैं, जहाँ विदुर शोक के साथ उनसे मिलते हैं।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 1 (9.29.1)
निहते मामके सैन्ये निःशेषे शिबिरे कृते । पाण्डवानां बले सूत किन्नु शेषमभूत्तदा ॥
nihate māmake sainye niḥśeṣe śibire kṛte | pāṇḍavānāṃ bale sūta kinnu śeṣamabhūttadā
सूत! जब मेरी सेना मारी जा चुकी और शिविर पूरी तरह खाली हो गया, तब पाण्डवों की सेना में क्या शेष रह गया था?
श्लोक 2 (9.29.2)
एतन्मे पृच्छतो ब्रूहि कुशलो ह्यसि सञ्जय । यच्च दुर्योधनो मानी कृतवांस्तनयो मम । बलक्षयं तथा दृष्ट्वा स एकः पृथिवीपतिः ॥
etanme pṛcchato brūhi kuśalo hyasi sañjaya | yacca duryodhano mānī kṛtavāṃstanayo mama | balakṣayaṃ tathā dṛṣṭvā sa ekaḥ pṛthivīpatiḥ
सञ्जय! मेरे पूछने पर यह मुझे बताओ, क्योंकि तुम इसके जानकार हो; और यह भी बताओ कि सेना का विनाश देखकर अकेले रह गए उस पृथ्वीपति, मेरे अभिमानी पुत्र दुर्योधन ने क्या किया।
सञ्जय उवाच
श्लोक 3 (9.29.3)
रथानां द्वे सहस्रे तु सप्त नागशतानि च । पञ्च चाश्वसहस्राणि पत्तीनामयुतानि च ॥
rathānāṃ dve sahasre tu sapta nāgaśatāni ca | pañca cāśvasahasrāṇi pattīnāmayutāni ca
दो हज़ार रथ, सात सौ हाथी, पाँच हज़ार घोड़े और दस-दस हज़ार की कई टुकड़ियाँ पैदल सैनिक —
श्लोक 4 (9.29.4)
एतच्छेषमभूद्राजन्पाण्डवानां महद्बलम् । परिगृह्य हि यद्युद्धे धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ॥
etaccheṣamabhūdrājanpāṇḍavānāṃ mahadbalam | parigṛhya hi yadyuddhe dhṛṣṭadyumno vyavasthitaḥ
हे राजन्! पाण्डवों की उस विशाल सेना में बस इतना ही शेष रहा, जिसे धृष्टद्युम्न ने युद्ध में अपने साथ समेटकर व्यवस्थित कर रखा था।
श्लोक 5 (9.29.5)
एकाकी भरतश्रेष्ठ ततो दुर्योधनो नृपः । नापश्यत्समरे कञ्चित्सहायं रथिनां वरः ॥
ekākī bharataśreṣṭha tato duryodhano nṛpaḥ | nāpaśyatsamare kañcitsahāyaṃ rathināṃ varaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! तब रथियों में श्रेष्ठ राजा दुर्योधन को युद्ध में कोई भी साथी न दिखा; वह अकेला रह गया।
श्लोक 6 (9.29.6)
नर्दमानान्परान्दृष्ट्वा स्वबलस्य च सङ्क्षयम् । दृष्ट्वा भरतशार्दूलः कश्मलेनाभिसंवृतः । हतं स्वहयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रावद्भयात् ॥
nardamānānparāndṛṣṭvā svabalasya ca saṅkṣayam | dṛṣṭvā bharataśārdūlaḥ kaśmalenābhisaṃvṛtaḥ | hataṃ svahayamutsṛjya prāṅmukhaḥ prādrāvadbhayāt
शत्रुओं को गरजते और अपनी सेना को नष्ट होते देखकर भरतवंश का वह सिंह मूर्च्छा-सी से घिर गया। उसने मारे गए अपने घोड़े को छोड़ दिया और भय से पूर्व की ओर मुँह करके भाग चला।
श्लोक 7 (9.29.7)
एकादशचमूभर्ता पुत्रो दुर्योधनस्तव । गदामादाय तेजस्वी पदातिः प्रस्थितो ह्रदम् ॥
ekādaśacamūbhartā putro duryodhanastava | gadāmādāya tejasvī padātiḥ prasthito hradam
ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओं के स्वामी रहे आपके पुत्र तेजस्वी दुर्योधन गदा लेकर पैदल ही सरोवर की ओर चल पड़े।
श्लोक 8 (9.29.8)
नातिदूरं ततो गत्वा पद्भ्यामेव नराधिपः । सस्मार वचनं क्षत्तुर्धर्मशीलस्य धीमतः ॥
nātidūraṃ tato gatvā padbhyāmeva narādhipaḥ | sasmāra vacanaṃ kṣatturdharmaśīlasya dhīmataḥ
अधिक दूर न जाकर, पैदल चलते हुए उस नरेश को धर्मशील और बुद्धिमान क्षत्ता विदुर की बात याद आई।
श्लोक 9 (9.29.9)
इदं नूनं महाप्राज्ञो विदुरो दृष्टवान्पुरा । महद्व्यसनमस्माकं क्षत्रियाणां च सर्वशः ॥
idaṃ nūnaṃ mahāprājño viduro dṛṣṭavānpurā | mahadvyasanamasmākaṃ kṣatriyāṇāṃ ca sarvaśaḥ
निश्चय ही परम बुद्धिमान विदुर ने बहुत पहले यह देख लिया था — यह महान विपत्ति जो हम पर और सब क्षत्रियों पर आ पड़ी है।
श्लोक 10 (9.29.10)
एवं विचिन्तयानस्तु प्रविविक्षुर्ह्रदं नृपः । दुःखसन्तप्तहृदयो दृष्ट्वा राजन्बलक्षयम् ॥
evaṃ vicintayānastu pravivikṣurhradaṃ nṛpaḥ | duḥkhasantaptahṛdayo dṛṣṭvā rājanbalakṣayam
हे राजन्! इस प्रकार विचार करते हुए, सेना के विनाश को देखकर दुःख से जलते हृदय वाले उस राजा ने सरोवर में प्रवेश करना चाहा।
श्लोक 11 (9.29.11)
दशैकाक्षौहिणीभर्ता तदा दुर्योधनोऽपि सन् । प्राप्तवान्व्यसनं तीव्रं दैवं हि बलवत्तरम् ॥
daśaikākṣauhiṇībhartā tadā duryodhano'pi san | prāptavānvyasanaṃ tīvraṃ daivaṃ hi balavattaram
ग्यारह अक्षौहिणियों का स्वामी होते हुए भी दुर्योधन पर तब भयंकर विपत्ति आ पड़ी; दैव सचमुच अधिक बलवान है।
श्लोक 12 (9.29.12)
पाण्डवास्तु महाराज धृष्टद्युम्नपुरोगमाः । अभ्यद्रवन्त सङ्क्रुद्धास्तव राजन्बलं प्रति ॥
pāṇḍavāstu mahārāja dhṛṣṭadyumnapurogamāḥ | abhyadravanta saṅkruddhāstava rājanbalaṃ prati
हे महाराज! उधर धृष्टद्युम्न को आगे करके पाण्डव अत्यन्त क्रुद्ध होकर, हे राजन्, आपकी सेना पर टूट पड़े।
श्लोक 13 (9.29.13)
शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां बलानामभिगर्जताम् । सङ्कल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनञ्जयः ॥
śaktyṛṣṭiprāsahastānāṃ balānāmabhigarjatām | saṅkalpamakaronmoghaṃ gāṇḍīvena dhanañjayaḥ
हाथों में शक्ति, ऋष्टि और प्रास लिए गरजती हुई उन सेनाओं का संकल्प धनञ्जय ने गाण्डीव धनुष से व्यर्थ कर दिया।
श्लोक 14 (9.29.14)
तान्हत्वा निशितैर्वाणैः सामात्यान्सह बन्धुभिः । रथे श्वेतहये तिष्ठन्नर्जुनो बह्वशोभत ॥
tānhatvā niśitairvāṇaiḥ sāmātyānsaha bandhubhiḥ | rathe śvetahaye tiṣṭhannarjuno bahvaśobhata
तीखे बाणों से उन्हें उनके मन्त्रियों और बन्धुओं सहित मारकर, श्वेत घोड़ों वाले रथ पर खड़े अर्जुन अत्यन्त शोभित हुए।
श्लोक 15 (9.29.15)
सुबलस्य हते पुत्रे सवाजिरथकुञ्जरे । महावनमिव च्छिन्नमभवत्तावकं बलम् ॥
subalasya hate putre savājirathakuñjare | mahāvanamiva cchinnamabhavattāvakaṃ balam
जब घोड़ों, रथों और हाथियों सहित सुबलपुत्र शकुनि मारा गया, तो आपकी सेना कटे हुए विशाल वन के समान हो गई।
श्लोक 16 (9.29.16)
अनेकशतसाहस्रे बले दुर्योधनस्य ह । नान्यो महारथो राजञ्जीवमानो व्यदृश्यत ॥
anekaśatasāhasre bale duryodhanasya ha | nānyo mahāratho rājañjīvamāno vyadṛśyata
हे राजन्! दुर्योधन की उस अनेक लाखों की सेना में कोई दूसरा महारथी जीवित नहीं दिखाई दिया,
श्लोक 17 (9.29.17)
द्रोणपुत्रादृते वीरात्तथैव कृतवर्मणः । कृपाच्च गौतमाद्राजन्पार्थिवाच्च तवात्मजात् ॥
droṇaputrādṛte vīrāttathaiva kṛtavarmaṇaḥ | kṛpācca gautamādrājanpārthivācca tavātmajāt
केवल वीर द्रोणपुत्र, कृतवर्मा, गौतम कृपाचार्य और आपके अपने पुत्र राजा दुर्योधन को छोड़कर।
श्लोक 18 (9.29.18)
धृष्टद्युम्नस्तु मां दृष्ट्वा हसन्सात्यकिमब्रवीत् । किमनेन गृहीतेन नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥
dhṛṣṭadyumnastu māṃ dṛṣṭvā hasansātyakimabravīt | kimanena gṛhītena nānenārtho'sti jīvatā
धृष्टद्युम्न ने मुझे देखकर हँसते हुए सात्यकि से कहा, "इसे पकड़े रखने से क्या लाभ? इसके जीवित रहने से कोई प्रयोजन नहीं है।"
श्लोक 19 (9.29.19)
धृष्टद्युम्नवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता महारथः । उद्यम्य निशितं खड्गं हन्तुं मामुद्यतस्तदा ॥
dhṛṣṭadyumnavacaḥ śrutvā śinernaptā mahārathaḥ | udyamya niśitaṃ khaḍgaṃ hantuṃ māmudyatastadā
धृष्टद्युम्न की बात सुनकर शिनि के पौत्र महारथी सात्यकि ने तीखी तलवार उठाई और मुझे मारने को तैयार हो गए।
श्लोक 20 (9.29.20)
तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । मुच्यतां सञ्जयो जीवन्न हन्तव्यः कथञ्चन ॥
tamāgamya mahāprājñaḥ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt | mucyatāṃ sañjayo jīvanna hantavyaḥ kathañcana
तब परम बुद्धिमान कृष्णद्वैपायन (व्यास) ने पास आकर कहा, "सञ्जय को छोड़ दो; इसे जीवित रहने दो, किसी भी प्रकार इसका वध नहीं करना चाहिए।"
श्लोक 21 (9.29.21)
द्वैपायनवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता कृताञ्जलिः । ततो मामब्रवीन्मुक्त्वा स्वस्ति सञ्जय साधय ॥
dvaipāyanavacaḥ śrutvā śinernaptā kṛtāñjaliḥ | tato māmabravīnmuktvā svasti sañjaya sādhaya
द्वैपायन की बात सुनकर शिनि के पौत्र ने हाथ जोड़कर मुझे मुक्त कर दिया और कहा, "सञ्जय! तुम्हारा कल्याण हो, अपना कार्य सिद्ध करो।"
श्लोक 22 (9.29.22)
अनुज्ञातस्त्वहं तेन न्यस्तवर्मा निरायुधः । प्रातिष्ठं येन नगरं सायाह्ने रुधिरोक्षितः ॥
anujñātastvahaṃ tena nyastavarmā nirāyudhaḥ | prātiṣṭhaṃ yena nagaraṃ sāyāhne rudhirokṣitaḥ
उनकी अनुमति पाकर मैं कवच उतारे और निहत्था, रक्त से लथपथ, सायंकाल नगर की ओर चल पड़ा।
श्लोक 23 (9.29.23)
क्रोशमात्रमपक्रान्तं गदापाणिमवस्थितम् । एकं दुर्योधनं राजन्नपश्यं भृशविक्षतम् ॥
krośamātramapakrāntaṃ gadāpāṇimavasthitam | ekaṃ duryodhanaṃ rājannapaśyaṃ bhṛśavikṣatam
लगभग एक कोस आगे निकल जाने पर, हे राजन्, मैंने राजा दुर्योधन को अकेले, हाथ में गदा लिए, बुरी तरह घायल खड़े देखा।
श्लोक 24 (9.29.24)
स तु मामश्रुपूर्णाक्षो नाशक्नोदभिवीक्षितुम् । उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तथा दीनमवस्थितम् ॥
sa tu māmaśrupūrṇākṣo nāśaknodabhivīkṣitum | upapraikṣata māṃ dṛṣṭvā tathā dīnamavasthitam
उसकी आँखें आँसुओं से भरी थीं, वह मेरी ओर देख नहीं पाया; मुझे इस दीन दशा में खड़ा देखकर उसने बस एक नज़र मेरी ओर डाली।
श्लोक 25 (9.29.25)
तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे । मुहूर्तं नाशकं वक्तुमतिदुःखपरिप्लुतः ॥
taṃ cāhamapi śocantaṃ dṛṣṭvaikākinamāhave | muhūrtaṃ nāśakaṃ vaktumatiduḥkhapariplutaḥ
उसे युद्धभूमि में अकेला देखकर मैं भी शोक करने लगा और अत्यन्त दुःख में डूबा होने के कारण क्षण भर कुछ कह न सका।
श्लोक 26 (9.29.26)
यस्य मूर्धाभिषिक्तानां सहस्रमणिमौलिनाम् । आहृत्य च करं सर्वं स्वस्य वेश्म समागतम् ॥
yasya mūrdhābhiṣiktānāṃ sahasramaṇimaulinām | āhṛtya ca karaṃ sarvaṃ svasya veśma samāgatam
जिसके घर हज़ारों मूर्धाभिषिक्त, मणिजटित मुकुट वाले राजा सारा कर लेकर आए थे;
श्लोक 27 (9.29.27)
चतुःसागरपर्यन्ता पृथिवी रत्नभूषिता । कर्णेनैकेन यस्यार्थे करमाहारिता पुरा ॥
catuḥsāgaraparyantā pṛthivī ratnabhūṣitā | karṇenaikena yasyārthe karamāhāritā purā
जिसके लिए कभी अकेले कर्ण ने चारों समुद्रों तक फैली, रत्नों से सजी पृथ्वी से कर वसूल किया था;
श्लोक 28 (9.29.28)
यस्याज्ञा परराष्ट्रेषु कर्णेनैव प्रसारिता । नाभवद्यस्य शस्त्रेषु खेदो राज्ञः प्रशासतः ॥
yasyājñā pararāṣṭreṣu karṇenaiva prasāritā | nābhavadyasya śastreṣu khedo rājñaḥ praśāsataḥ
जिसकी आज्ञा को अकेले कर्ण ने ही दूसरे राज्यों में पहुँचाया, और जिस राजा को शासन करते हुए शस्त्रों के प्रयोग में कभी थकान न हुई;
श्लोक 29 (9.29.29)
आसीनो हास्तिनपुरे क्षेमं राज्यमकण्टकम् । अन्वपालयदैश्वर्यात्कुबेरमपि नास्मरत् ॥
āsīno hāstinapure kṣemaṃ rājyamakaṇṭakam | anvapālayadaiśvaryātkuberamapi nāsmarat
जो हस्तिनापुर में बैठकर निष्कण्टक राज्य की कुशलपूर्वक रक्षा करता था और अपने ऐश्वर्य के कारण कुबेर को भी याद नहीं करता था;
श्लोक 30 (9.29.30)
भवनाद्भवनं राजन्प्रयातुं पृथिवीपते । देवालयप्रदेशे च पन्था यस्य हिरण्मयः ॥
bhavanādbhavanaṃ rājanprayātuṃ pṛthivīpate | devālayapradeśe ca panthā yasya hiraṇmayaḥ
हे राजन्, हे पृथ्वीपते! एक भवन से दूसरे भवन को जाते समय जिसके लिए देवालयों के प्रदेश में भी सोने का मार्ग बन जाता था;
श्लोक 31 (9.29.31)
पताकावृतसूर्यांशुतोरणोच्छ्रितशोभिताः । प्रयाणे पृथिवीभर्तुर्धन्यानामभवन्गृहाः ॥
patākāvṛtasūryāṃśutoraṇocchritaśobhitāḥ | prayāṇe pṛthivībharturdhanyānāmabhavangṛhāḥ
जब पृथ्वी के स्वामी प्रयाण करते थे, तब सूर्य की किरणों को ढकने वाली पताकाओं और ऊँचे तोरणों से भाग्यशालियों के घर शोभित हो उठते थे;
श्लोक 32 (9.29.32)
आरुह्यैरावतप्रख्यं नागमिन्द्रसमो बली । विभूत्या सुमहत्या यः प्रयाति पृथिवीपते ॥
āruhyairāvataprakhyaṃ nāgamindrasamo balī | vibhūtyā sumahatyā yaḥ prayāti pṛthivīpate
जो ऐरावत-जैसे हाथी पर चढ़कर, इन्द्र के समान बलवान, हे पृथ्वीपते, बड़े वैभव के साथ निकलता था —
श्लोक 33 (9.29.33)
तं भृशक्षतसर्वाङ्गं पद्भ्यामेव धरातले । तिष्ठन्तमेकं दृष्ट्वा तु ममाभूत्क्लेश उत्तमः ॥
taṃ bhṛśakṣatasarvāṅgaṃ padbhyāmeva dharātale | tiṣṭhantamekaṃ dṛṣṭvā tu mamābhūtkleśa uttamaḥ
उसे आज सारे शरीर में गहरे घाव लिए, पैदल, अकेला धरती पर खड़ा देखकर मुझे अत्यन्त पीड़ा हुई।
श्लोक 34 (9.29.34)
तस्य चैवंविधस्याद्य जगन्नाथस्य भूपते । आपदप्रतिमैवाभूद्बलीयान्विधिरेव हि ॥
tasya caivaṃvidhasyādya jagannāthasya bhūpate | āpadapratimaivābhūdbalīyānvidhireva hi
ऐसे जगन्नाथ राजा पर आज जैसी विपत्ति आई, उसकी कोई उपमा नहीं थी; विधाता ही सचमुच अधिक बलवान है।
श्लोक 35 (9.29.35)
ततोऽस्मै तदहं सर्वमुक्तवान्ग्रहणं तदा । द्वैपायनप्रसादाच्च जीवतो मोक्षमाहवे ॥
tato'smai tadahaṃ sarvamuktavāngrahaṇaṃ tadā | dvaipāyanaprasādācca jīvato mokṣamāhave
तब मैंने उसे सब बता दिया: कि मैं पकड़ा गया था और द्वैपायन की कृपा से युद्ध में जीवित छूट गया।
श्लोक 36 (9.29.36)
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । भ्रातॄंश्च सर्वसैन्यानि पर्यपृच्छत मां ततः ॥
sa muhūrtamiva dhyātvā pratilabhya ca cetanām | bhrātṝṃśca sarvasainyāni paryapṛcchata māṃ tataḥ
क्षण भर मानो सोचकर और होश सँभालकर उसने मुझसे अपने भाइयों और सब सेनाओं के विषय में पूछा।
श्लोक 37 (9.29.37)
तस्मै तदहमाचक्षे सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् । भ्रातॄंश्च निहतान्सर्वान्सैन्यं च विनिपातितम् ॥
tasmai tadahamācakṣe sarvaṃ pratyakṣadarśivān | bhrātṝṃśca nihatānsarvānsainyaṃ ca vinipātitam
मैंने प्रत्यक्ष देखने वाले के रूप में उसे सब बता दिया: कि उसके सब भाई मारे गए और सेना गिरा दी गई।
श्लोक 38 (9.29.38)
त्रयः किल रथाः शिष्टास्तावकानां नराधिप । इति प्रस्थानकाले मां कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥
trayaḥ kila rathāḥ śiṣṭāstāvakānāṃ narādhipa | iti prasthānakāle māṃ kṛṣṇadvaipāyano'bravīt
"हे नरेश्वर! आपके पक्ष के तीन रथी शेष हैं" — प्रस्थान के समय कृष्णद्वैपायन ने मुझसे ऐसा कहा था।
श्लोक 39 (9.29.39)
स दीर्घमिव निःश्वस्य प्रत्यवेक्ष्य पुनः पुनः । असौ मां पाणिना स्पृष्ट्वा पुत्रस्ते पर्यभाषत ॥
sa dīrghamiva niḥśvasya pratyavekṣya punaḥ punaḥ | asau māṃ pāṇinā spṛṣṭvā putraste paryabhāṣata
आपके पुत्र ने मानो लम्बी साँस लेकर, बार-बार मुझे देखते हुए, मुझे हाथ से छूकर कहा:
दुर्योधन उवाच
श्लोक 40 (9.29.40)
त्वदन्यो नेह सङ्ग्रामे कश्चिज्जीवति सञ्जय । द्वितीयं नेह पश्यामि ससहायाश्च पाण्डवाः ॥
tvadanyo neha saṅgrāme kaścijjīvati sañjaya | dvitīyaṃ neha paśyāmi sasahāyāśca pāṇḍavāḥ
सञ्जय! इस युद्ध में तुम्हारे सिवा यहाँ कोई जीवित नहीं है। मैं किसी दूसरे को नहीं देखता, जबकि पाण्डव अपने सहायकों सहित हैं।
श्लोक 41 (9.29.41)
ब्रूयाः सञ्जय राजानं प्रज्ञाचक्षुषमीश्वरम् । दुर्योधनस्तव सुतः प्रविष्टो ह्रदमित्युत ॥
brūyāḥ sañjaya rājānaṃ prajñācakṣuṣamīśvaram | duryodhanastava sutaḥ praviṣṭo hradamityuta
सञ्जय! प्रज्ञा को ही नेत्र बनाने वाले उन स्वामी राजा से कहना: "आपके पुत्र दुर्योधन ने सरोवर में प्रवेश कर लिया है।"
श्लोक 42 (9.29.42)
सुहृद्भिस्तादृशैर्हीनः पुत्रैर्भ्रातृभिरेव च । पाण्डवैश्च हृते राज्ये को नु जीवेत मादृशः ॥
suhṛdbhistādṛśairhīnaḥ putrairbhrātṛbhireva ca | pāṇḍavaiśca hṛte rājye ko nu jīveta mādṛśaḥ
ऐसे मित्रों, पुत्रों और भाइयों से रहित होकर, राज्य के पाण्डवों द्वारा छीन लिए जाने पर, मुझ जैसा कौन जीवित रहेगा?
श्लोक 43 (9.29.43)
आचक्षीथाः सर्वमिदं मां च मुक्तं महाहवात् । अस्मिंस्तोयह्रदे गुप्तं जीवन्तं भृशविक्षतम् ॥
ācakṣīthāḥ sarvamidaṃ māṃ ca muktaṃ mahāhavāt | asmiṃstoyahrade guptaṃ jīvantaṃ bhṛśavikṣatam
उनसे यह सब कहना, और यह भी कि मैं उस महायुद्ध से बच निकला हूँ और इस जल के सरोवर में जीवित, गहरे घाव लिए छिपा हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 44 (9.29.44)
एवमुक्त्वा महाराज प्राविशत्तं महाह्रदम् । अस्तम्भयत तोयं च मायया मनुजाधिपः ॥
evamuktvā mahārāja prāviśattaṃ mahāhradam | astambhayata toyaṃ ca māyayā manujādhipaḥ
हे महाराज! ऐसा कहकर उस नरेश ने उस महासरोवर में प्रवेश किया और अपनी माया से जल को स्तम्भित कर दिया।
श्लोक 45 (9.29.45)
तस्मिन्ह्रदं प्रविष्टे तु त्रीन्रथाञ्श्रान्तवाहनान् । अपश्यं सहितानेकस्तं देशं समुपेयुषः ॥
tasminhradaṃ praviṣṭe tu trīnrathāñśrāntavāhanān | apaśyaṃ sahitānekastaṃ deśaṃ samupeyuṣaḥ
उसके सरोवर में प्रवेश कर जाने पर मैंने अकेले ही तीन रथियों को, जिनके घोड़े थक चुके थे, एक साथ उस स्थान पर आते देखा।
श्लोक 46 (9.29.46)
कृपं शारद्वतं वीरं द्रौणिं च रथिनां वरम् । भोजं च कृतवर्माणं सहिताञ्शरविक्षतान् ॥
kṛpaṃ śāradvataṃ vīraṃ drauṇiṃ ca rathināṃ varam | bhojaṃ ca kṛtavarmāṇaṃ sahitāñśaravikṣatān
वे थे वीर शरद्वान् के पुत्र कृपाचार्य, रथियों में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और भोजवंशी कृतवर्मा; तीनों साथ थे और बाणों से घायल थे।
श्लोक 47 (9.29.47)
ते सर्वं मामभिप्रेक्ष्य तूर्णमश्वाननोदयन् । उपयाय तु मामूचुर्दिष्ट्या जीवसि सञ्जय ॥
te sarvaṃ māmabhiprekṣya tūrṇamaśvānanodayan | upayāya tu māmūcurdiṣṭyā jīvasi sañjaya
उन सबने मुझे देखकर शीघ्र घोड़े हाँके और पास आकर मुझसे कहा, "सञ्जय! सौभाग्य से तुम जीवित हो।"
श्लोक 48 (9.29.48)
अपृच्छंश्चैव मां सर्वे पुत्रं तव जनाधिपम् । कच्चिद्दुर्योधनो राजा स नो जीवति सञ्जय ॥
apṛcchaṃścaiva māṃ sarve putraṃ tava janādhipam | kaccidduryodhano rājā sa no jīvati sañjaya
और उन सबने मुझसे आपके पुत्र राजा के विषय में पूछा: "सञ्जय! क्या राजा दुर्योधन जीवित है?"
श्लोक 49 (9.29.49)
आख्यातवानहं तेभ्यस्तदा कुशलिनं नृपम् । तच्चैव सर्वमाचक्षं यन्मां दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥
ākhyātavānahaṃ tebhyastadā kuśalinaṃ nṛpam | taccaiva sarvamācakṣaṃ yanmāṃ duryodhano'bravīt
तब मैंने उन्हें बताया कि राजा कुशल हैं, और दुर्योधन ने मुझसे जो कुछ कहा था वह सब भी उन्हें सुना दिया,
श्लोक 50 (9.29.50)
ह्रदं चैवाहमाचक्षं यं प्रविष्टो नराधिपः । अश्वत्थामा तु तद्राजन्निशम्य वचनं मम ॥
hradaṃ caivāhamācakṣaṃ yaṃ praviṣṭo narādhipaḥ | aśvatthāmā tu tadrājanniśamya vacanaṃ mama
तथा उस सरोवर के बारे में भी बताया जिसमें राजा ने प्रवेश किया था। हे राजन्! मेरी बात सुनकर अश्वत्थामा ने
श्लोक 51 (9.29.51)
तं ह्रदं विपुलं प्रेक्ष्य करुणं पर्यदेवयत् । अहो धिक्स न जानाति जीवतोऽस्मान्नराधिप । पर्याप्ता हि वयं तेन सह योधयितुं परान् ॥
taṃ hradaṃ vipulaṃ prekṣya karuṇaṃ paryadevayat | aho dhiksa na jānāti jīvato'smānnarādhipa | paryāptā hi vayaṃ tena saha yodhayituṃ parān
उस विशाल सरोवर को देखकर करुण विलाप किया, "हाय, धिक्कार है! हे राजन्, वह नहीं जानता कि हम जीवित हैं। हम उसके साथ मिलकर शत्रुओं से लड़ने में पूरी तरह समर्थ हैं।"
श्लोक 52 (9.29.52)
ते तु तत्र चिरं कालं विलप्य च महारथाः । प्राद्रवन्रथिनां श्रेष्ठा दृष्ट्वा पाण्डुसुतान्रणे ॥
te tu tatra ciraṃ kālaṃ vilapya ca mahārathāḥ | prādravanrathināṃ śreṣṭhā dṛṣṭvā pāṇḍusutānraṇe
वे महारथी, रथियों में श्रेष्ठ, वहाँ बहुत देर तक विलाप करने के बाद युद्ध में पाण्डुपुत्रों को देखकर भाग निकले।
श्लोक 53 (9.29.53)
ते तु मां रथमारोप्य कृपस्य सुपरिष्कृतम् । सेनानिवेशमाजग्मुर्हतशेषास्त्रयो रथाः ॥
te tu māṃ rathamāropya kṛpasya supariṣkṛtam | senāniveśamājagmurhataśeṣāstrayo rathāḥ
उन्होंने मुझे कृपाचार्य के सुसज्जित रथ में बैठा लिया, और बचे हुए वे तीनों रथी शिविर में आ पहुँचे।
श्लोक 54 (9.29.54)
तत्र गुल्माः परिक्षिप्ताः सूर्ये चास्तमिते सति । सर्वे विचुक्रुशुः श्रुत्वा पुत्राणां तव संक्षयम् ॥
tatra gulmāḥ parikṣiptāḥ sūrye cāstamite sati | sarve vicukruśuḥ śrutvā putrāṇāṃ tava saṃkṣayam
वहाँ चारों ओर तैनात टुकड़ियाँ, सूर्य के अस्त हो जाने पर, आपके पुत्रों के विनाश की बात सुनकर सब चीख उठीं।
श्लोक 55 (9.29.55)
ततो वृद्धा महाराज योषितां रक्षिणो नराः । राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ॥
tato vṛddhā mahārāja yoṣitāṃ rakṣiṇo narāḥ | rājadārānupādāya prayayurnagaraṃ prati
तब हे महाराज! स्त्रियों की रक्षा करने वाले वृद्ध पुरुष राजमहिलाओं को साथ लेकर नगर की ओर चल पड़े।
श्लोक 56 (9.29.56)
तत्र विक्रोशमानानां रुदतीनां च सर्वशः । प्रादुरासीन्महाञ्शब्दः श्रुत्वा तद्बलसङ्क्षयम् ॥
tatra vikrośamānānāṃ rudatīnāṃ ca sarvaśaḥ | prādurāsīnmahāñśabdaḥ śrutvā tadbalasaṅkṣayam
वहाँ चारों ओर चीखती और रोती हुई उन स्त्रियों में सेना के विनाश की बात सुनकर बड़ा कोलाहल उठा।
श्लोक 57 (9.29.57)
ततस्ता योषितो राजन्रुदन्त्यो वै मुहुर्मुहुः । कुरर्य इव शब्देन नादयन्त्यो महीतलम् ॥
tatastā yoṣito rājanrudantyo vai muhurmuhuḥ | kurarya iva śabdena nādayantyo mahītalam
तब हे राजन्! वे स्त्रियाँ बार-बार रोती हुई, कुररी पक्षियों की तरह अपने स्वर से धरती को गुँजाने लगीं।
श्लोक 58 (9.29.58)
आजघ्नुः करजैश्चापि पाणिभिश्च शिरांस्युत । लुलुचुश्च तदा केशान्क्रोशन्त्यस्तत्रतत्र ह ॥
ājaghnuḥ karajaiścāpi pāṇibhiśca śirāṃsyuta | lulucuśca tadā keśānkrośantyastatratatra ha
वे नखों और हाथों से अपने सिर पीटने लगीं और इधर-उधर चिल्लाती हुई अपने केश नोचने लगीं।
श्लोक 59 (9.29.59)
हाहाकारविनादिन्यो विनिघ्नन्त्य उरांसि च । शोचन्त्यस्तत्र रुरुदुः क्रन्दमाना विशाम्पते ॥
hāhākāravinādinyo vinighnantya urāṃsi ca | śocantyastatra ruruduḥ krandamānā viśāmpate
हे प्रजापालक! "हाय! हाय!" पुकारती और छाती पीटती हुई वे शोक करती, रोती और विलाप करती थीं।
श्लोक 60 (9.29.60)
ततो दुर्योधनामात्याः साश्रुकण्ठा भृशातुराः । राजदारानुपामन्त्र्य प्रययुर्नगरं प्रति ॥
tato duryodhanāmātyāḥ sāśrukaṇṭhā bhṛśāturāḥ | rājadārānupāmantrya prayayurnagaraṃ prati
तब दुर्योधन के मन्त्री, आँसुओं से रुँधे कण्ठ वाले और अत्यन्त व्याकुल, राजमहिलाओं को सम्बोधित करके नगर की ओर चल पड़े।
श्लोक 61 (9.29.61)
वेत्रव्यासक्तहस्ताश्च द्वाराध्यक्षा विशाम्पते । शयनीयानि शुभ्राणि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च । समादाय ययुस्तूर्णं नगरं दाररक्षिणः ॥
vetravyāsaktahastāśca dvārādhyakṣā viśāmpate | śayanīyāni śubhrāṇi spardhyāstaraṇavanti ca | samādāya yayustūrṇaṃ nagaraṃ dārarakṣiṇaḥ
हे प्रजापति! हाथों में बेंत थामे द्वारपाल और स्त्रियों के रक्षक उजले शयन-आसनों और बहुमूल्य बिछौनों को लेकर तुरन्त नगर की ओर चल दिए।
श्लोक 62 (9.29.62)
आस्थायाश्वतरीयुक्तान्स्यन्दनानपरे पुनः । स्वान्स्वान्दारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ॥
āsthāyāśvatarīyuktānsyandanānapare punaḥ | svānsvāndārānupādāya prayayurnagaraṃ prati
दूसरे लोग खच्चरियों से जुते रथों पर चढ़कर अपनी-अपनी स्त्रियों को साथ ले नगर की ओर चल पड़े।
श्लोक 63 (9.29.63)
अदृष्टपूर्वा या नार्यो भास्करेणापि वेश्मसु । ददृशुस्ता महाराज जना याताः पुरं प्रति ॥
adṛṣṭapūrvā yā nāryo bhāskareṇāpi veśmasu | dadṛśustā mahārāja janā yātāḥ puraṃ prati
हे महाराज! जिन स्त्रियों को घरों में सूर्य ने भी कभी नहीं देखा था, उन्हें नगर की ओर जाते हुए लोगों ने देखा।
श्लोक 64 (9.29.64)
ताः स्त्रियो भरतश्रेष्ठ सौकुमार्यसमन्विताः । प्रययुर्नगरं तूर्णं हतस्वपतिबान्धवाः ॥
tāḥ striyo bharataśreṣṭha saukumāryasamanvitāḥ | prayayurnagaraṃ tūrṇaṃ hatasvapatibāndhavāḥ
हे भरतश्रेष्ठ! वे सुकुमार स्त्रियाँ, जिनके पति और बन्धु मारे जा चुके थे, शीघ्रता से नगर को चल पड़ीं।
श्लोक 65 (9.29.65)
आगोपालाविपालेभ्यो द्रवन्तो नगरं प्रति । ययुर्मनुष्याः सम्भ्रान्ता भीमसेनभयार्दिताः ॥
āgopālāvipālebhyo dravanto nagaraṃ prati | yayurmanuṣyāḥ sambhrāntā bhīmasenabhayārditāḥ
ग्वालों और गड़रियों से लेकर सभी लोग भीमसेन के भय से पीड़ित होकर घबराहट में नगर की ओर भागे।
श्लोक 66 (9.29.66)
अपिचैषां भयं तीव्रं पार्थेभ्योऽभूत्सुदारुणम् । प्रेक्षमाणास्तदाऽन्योन्यमाधावन्नगरं प्रति ॥
apicaiṣāṃ bhayaṃ tīvraṃ pārthebhyo'bhūtsudāruṇam | prekṣamāṇāstadā'nyonyamādhāvannagaraṃ prati
उन्हें पार्थों का भी भीषण और अत्यन्त भयंकर भय हो गया; वे एक-दूसरे को देखते हुए नगर की ओर दौड़ पड़े।
श्लोक 67 (9.29.67)
तस्मिंस्तथा वर्तमाने विद्रवे भृशदारुणे । युयुत्सुः शोकसम्मूढः प्राप्तकालमचिन्तयत् ॥
tasmiṃstathā vartamāne vidrave bhṛśadāruṇe | yuyutsuḥ śokasammūḍhaḥ prāptakālamacintayat
उस अत्यन्त भयंकर भगदड़ के बीच शोक से मूढ़ हुए युयुत्सु ने सोचा कि अब समय के अनुसार क्या करना उचित है।
श्लोक 68 (9.29.68)
जितो दुर्योधनः सङ्ख्ये पाण्डवैर्भीमविक्रमैः । एकादशचमूभर्ता भ्रातरश्चास्य सूदिताः ॥
jito duryodhanaḥ saṅkhye pāṇḍavairbhīmavikramaiḥ | ekādaśacamūbhartā bhrātaraścāsya sūditāḥ
भयंकर पराक्रम वाले पाण्डवों ने युद्ध में दुर्योधन को जीत लिया; ग्यारह सेनाओं का वह स्वामी और उसके भाई मारे गए।
श्लोक 69 (9.29.69)
हताश्च कुरवः सर्वे भीष्मद्रोणपुरःसराः । अहमेको विमुक्तस्तु भाग्ययोगाद्यदृच्छया ॥
hatāśca kuravaḥ sarve bhīṣmadroṇapuraḥsarāḥ | ahameko vimuktastu bhāgyayogādyadṛcchayā
भीष्म और द्रोण के साथ सब कौरव मारे गए; केवल मैं अकेला भाग्य के योग से, संयोगवश बच गया हूँ।
श्लोक 70 (9.29.70)
विद्रुतानि च सर्वाणि शिबिराद्वै समन्ततः । इतस्ततः पलायन्ते हतनाथा हतौजसः ॥
vidrutāni ca sarvāṇi śibirādvai samantataḥ | itastataḥ palāyante hatanāthā hataujasaḥ
और सारे शिविर चारों ओर बिखर गए हैं; जिनके स्वामी मारे गए और बल नष्ट हो गया, वे लोग इधर-उधर भाग रहे हैं,
श्लोक 71 (9.29.71)
अदृष्टपूर्वा दुःखार्ता भयव्याकुललोचनाः । हरिणा इव वित्रस्ता वीक्षमाणा दिशो दश ॥
adṛṣṭapūrvā duḥkhārtā bhayavyākulalocanāḥ | hariṇā iva vitrastā vīkṣamāṇā diśo daśa
ऐसी दुःखी दशा में जैसी पहले कभी नहीं देखी गई, भय से व्याकुल आँखों वाले, डरे हुए हिरनों की तरह दसों दिशाओं में ताकते हुए।
श्लोक 72 (9.29.72)
दुर्योधनस्य सचिवा ये केचिदवशेषिताः । राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति । प्राप्तकालमहं मन्ये प्रवेशं तैः सह प्रभो ॥
duryodhanasya sacivā ye kecidavaśeṣitāḥ | rājadārānupādāya prayayurnagaraṃ prati | prāptakālamahaṃ manye praveśaṃ taiḥ saha prabho
दुर्योधन के जो कोई मन्त्री बचे हैं, वे राजमहिलाओं को लेकर नगर को जा रहे हैं। हे प्रभो, मैं समझता हूँ कि उनके साथ नगर में प्रवेश करने का समय आ गया है।
श्लोक 73 (9.29.73)
युधिष्ठिरमनुज्ञाय वासुदेवं तथैव च । एतमर्थं महाबाहुरुभयोः सन्न्यवेदयत् ॥
yudhiṣṭhiramanujñāya vāsudevaṃ tathaiva ca | etamarthaṃ mahābāhurubhayoḥ sannyavedayat
युधिष्ठिर और वासुदेव से भी अनुमति लेकर उस महाबाहु ने यह बात दोनों के सामने रखी।
श्लोक 74 (9.29.74)
तस्य प्रीतोऽभवद्राजा नित्यं करुणवेदिता । परिष्वज्य महाबाहुर्वैश्यापुत्रं व्यसर्जयत् ॥
tasya prīto'bhavadrājā nityaṃ karuṇaveditā | pariṣvajya mahābāhurvaiśyāputraṃ vyasarjayat
सदा करुणा का भाव रखने वाले राजा उससे प्रसन्न हुए; और उन्होंने वैश्यापुत्र उस महाबाहु को गले लगाकर विदा किया।
श्लोक 75 (9.29.75)
ततः स रथमास्थाय द्रुतमश्वानचोदयत् । संवाहयितवांश्चापि राजदारान्पुरं प्रति ॥
tataḥ sa rathamāsthāya drutamaśvānacodayat | saṃvāhayitavāṃścāpi rājadārānpuraṃ prati
तब वह रथ पर चढ़ा, उसने शीघ्रता से घोड़ों को हाँका और राजमहिलाओं को भी नगर पहुँचवाया।
श्लोक 76 (9.29.76)
तैश्चैव सहितः क्षिप्रमस्तं गच्छति भास्करे । प्रविष्टो हास्तिनपुरं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः ॥
taiścaiva sahitaḥ kṣipramastaṃ gacchati bhāskare | praviṣṭo hāstinapuraṃ bāṣpakaṇṭho'śrulocanaḥ
सूर्य के अस्त होते-होते उनके साथ शीघ्र ही उसने हस्तिनापुर में प्रवेश किया; उसका कण्ठ रुँधा था और आँखों में आँसू थे।
श्लोक 77 (9.29.77)
अपश्यत महाप्राज्ञं विदुरं साश्रुलोचनम् । राज्ञः समीपान्निष्क्रान्तं शोकोपहतचेतसम् ॥
apaśyata mahāprājñaṃ viduraṃ sāśrulocanam | rājñaḥ samīpānniṣkrāntaṃ śokopahatacetasam
उसने परम बुद्धिमान विदुर को देखा, जिनकी आँखें आँसुओं से भरी थीं और जो शोक से व्याकुल चित्त लिए राजा के पास से निकले थे।
श्लोक 78 (9.29.78)
तमब्रवीत्सत्यधृतिः प्रणतं त्वग्रतः स्थितम् ॥
tamabravītsatyadhṛtiḥ praṇataṃ tvagrataḥ sthitam
सत्य में दृढ़ विदुर ने सामने झुककर खड़े उससे कहा:
विदुर उवाच
श्लोक 79 (9.29.79)
दिष्ट्या कुरुक्षये वृत्ते अस्मिंस्त्वं पुत्र जीवसि । विना राज्ञः प्रवेशाद्वै किमसि त्वमिहागतः । एतद्वै कारणं सर्वं विस्तरेण निवेदय ॥
diṣṭyā kurukṣaye vṛtte asmiṃstvaṃ putra jīvasi | vinā rājñaḥ praveśādvai kimasi tvamihāgataḥ | etadvai kāraṇaṃ sarvaṃ vistareṇa nivedaya
पुत्र! सौभाग्य से इस कुरुओं के संहार के बीत जाने पर तुम जीवित हो। राजा के नगर-प्रवेश के बिना तुम यहाँ क्यों आए हो? इसका पूरा कारण विस्तार से मुझे बताओ।
युयुत्सुरुवाच
श्लोक 80 (9.29.80)
निहते शकुनौ तत्र सज्ञातिसुतबान्धवे । हतशेषपरीवारो राजा दुर्योधनस्ततः । स्वकं स हयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद्भयात् ॥
nihate śakunau tatra sajñātisutabāndhave | hataśeṣaparīvāro rājā duryodhanastataḥ | svakaṃ sa hayamutsṛjya prāṅmukhaḥ prādravadbhayāt
शकुनि के अपने जाति-बन्धुओं, पुत्रों और सम्बन्धियों सहित मारे जाने पर, राजा दुर्योधन अपने बचे-खुचे परिवार के साथ अपना घोड़ा छोड़कर भय से पूर्व की ओर मुँह करके भाग गया।
श्लोक 81 (9.29.81)
अपक्रान्ते तु नृपतौ स्कन्धावारनिवेशनात् । भयव्याकुलितं सर्वं प्राद्रावन्नगरं प्रति ॥
apakrānte tu nṛpatau skandhāvāraniveśanāt | bhayavyākulitaṃ sarvaṃ prādrāvannagaraṃ prati
राजा के छावनी से चले जाने पर भय से काँपती सारी सेना नगर की ओर भाग पड़ी।
श्लोक 82 (9.29.82)
ततो राज्ञः कलत्राणि भ्रातॄणां चास्य सर्वतः । वाहनेषु समारोप्य अध्यक्षाः प्राद्रावन्भयात् ॥
tato rājñaḥ kalatrāṇi bhrātṝṇāṃ cāsya sarvataḥ | vāhaneṣu samāropya adhyakṣāḥ prādrāvanbhayāt
तब अध्यक्षों ने राजा और उसके भाइयों की स्त्रियों को सब ओर से वाहनों पर चढ़ाया और भय से भाग निकले।
श्लोक 83 (9.29.83)
ततोऽहं समनुज्ञाप्य राजानं सहकेशवम् । प्रविष्टो हास्तिनपुरं रक्षन्लोकस्य वाच्यताम् ॥
tato'haṃ samanujñāpya rājānaṃ sahakeśavam | praviṣṭo hāstinapuraṃ rakṣanlokasya vācyatām
तब मैं राजा से और केशव से अनुमति लेकर, लोगों की निन्दा से बचने के लिए हस्तिनापुर में आ गया हूँ।
सञ्जय उवाच
श्लोक 84 (9.29.84)
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वैश्यापुत्रेण भाषितम् । प्राप्तकालमिति ज्ञात्वा विदुरः सर्वधर्मवित् । अपूजयदमेयात्मा युयुत्सुं वाक्यमब्रवीत् ॥
etacchrutvā tu vacanaṃ vaiśyāputreṇa bhāṣitam | prāptakālamiti jñātvā viduraḥ sarvadharmavit | apūjayadameyātmā yuyutsuṃ vākyamabravīt
वैश्यापुत्र की कही हुई यह बात सुनकर और यह जानकर कि समय आ गया है, सब धर्मों को जानने वाले अपरिमित आत्मा विदुर ने युयुत्सु का सम्मान किया और कहा:
विदुर उवाच
श्लोक 85 (9.29.85)
प्राप्तकालमिदं सर्वं ब्रुवता भरतक्षये । रक्षितः कुलधर्मश्च सानुक्रोशतया त्वया ॥
prāptakālamidaṃ sarvaṃ bruvatā bharatakṣaye | rakṣitaḥ kuladharmaśca sānukrośatayā tvayā
भरतवंश के इस विनाश के बीच तुमने समय के योग्य बात कही है; और दया के कारण तुमने कुलधर्म की रक्षा की है।
श्लोक 86 (9.29.86)
दिष्ट्या त्वामिह सङ्ग्रामादस्माद्वीरक्षयात्पुरम् । समागतमपश्याम ह्यंशुमन्तमिव प्रजाः ॥
diṣṭyā tvāmiha saṅgrāmādasmādvīrakṣayātpuram | samāgatamapaśyāma hyaṃśumantamiva prajāḥ
बेटा! सौभाग्य से हम तुम्हें वीरों के इस संहार से नगर में आया हुआ देख रहे हैं, जैसे प्रजा तेजस्वी सूर्य को लौटा हुआ देखती है।
श्लोक 87 (9.29.87)
अन्धस्य नृपतेर्यष्टिर्लुब्धस्यादीर्घदर्शिनः । बहुशो याच्यमानस्य दैवोपहतचेतसः । त्वमेको व्यसनार्तस्य ध्रियसे पुत्र सर्वथा ॥
andhasya nṛpateryaṣṭirlubdhasyādīrghadarśinaḥ | bahuśo yācyamānasya daivopahatacetasaḥ | tvameko vyasanārtasya dhriyase putra sarvathā
पुत्र! तुम ही उस अन्धे राजा की लाठी हो, जो लोभी और अदूरदर्शी है, जिससे बहुत बार याचना की गई और जिसका चित्त दैव से मारा गया है; विपत्ति में पड़े उसको तुम अकेले ही हर प्रकार से सँभाले हुए हो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 88 (9.29.88)
अद्य त्वमिह विश्रान्तः श्वोऽभिगन्ता युधिष्ठिरम् । एतावदुक्त्वा वचनं विदुरः साश्रुलोचनः । युयुत्सुं समनुज्ञाप्य प्रविवेश नृपक्षयम् ॥
adya tvamiha viśrāntaḥ śvo'bhigantā yudhiṣṭhiram | etāvaduktvā vacanaṃ viduraḥ sāśrulocanaḥ | yuyutsuṃ samanujñāpya praviveśa nṛpakṣayam
"आज तुम यहाँ विश्राम करो; कल युधिष्ठिर के पास जाना।" इतना कहकर, आँखों में आँसू लिए विदुर युयुत्सु को विदा करके राजभवन में चले गए।
श्लोक 89 (9.29.89)
पौरजानपदैर्दुःखाद्धाहेति भृशनादितम् । निरानन्दं गतश्रीकं हृताराममिवाशयम् । शून्यरूपमपध्वस्तं दुःखाद्दुःखतरोऽभवत् ॥
paurajānapadairduḥkhāddhāheti bhṛśanāditam | nirānandaṃ gataśrīkaṃ hṛtārāmamivāśayam | śūnyarūpamapadhvastaṃ duḥkhādduḥkhataro'bhavat
नगर पौरजनों और जनपदवासियों के दुःख से "हाय! हाय!" की पुकार से गूँज रहा था; आनन्दहीन, शोभा से रहित, उजाड़ दिए गए उद्यान वाले घर के समान, सूना और ध्वस्त; उसे देखकर विदुर और भी अधिक दुःखी हो गए।
श्लोक 90 (9.29.90)
विदुरः सर्वधर्मज्ञो विक्लवेनान्तरात्मना । विवेश नगरे राजन्निशश्वास शनैः शनैः ॥
viduraḥ sarvadharmajño viklavenāntarātmanā | viveśa nagare rājanniśaśvāsa śanaiḥ śanaiḥ
हे राजन्! सब धर्मों के ज्ञाता विदुर, व्याकुल अन्तःकरण से, धीरे-धीरे बार-बार निःश्वास लेते हुए नगर में गए।
श्लोक 91 (9.29.91)
युयुत्सुरपि तां रात्रिं स्वगृहे न्यवसत्तदा । वन्द्यमानः स्वकैश्चापि नाभ्यनन्दत्सुदुःखितः । चिन्तयानः क्षयं तीव्रं भरतानां परस्परम् ॥
yuyutsurapi tāṃ rātriṃ svagṛhe nyavasattadā | vandyamānaḥ svakaiścāpi nābhyanandatsuduḥkhitaḥ | cintayānaḥ kṣayaṃ tīvraṃ bharatānāṃ parasparam
युयुत्सु ने भी वह रात अपने घर में बिताई; अपने लोगों द्वारा सम्मानित होने पर भी वह अत्यन्त दुःखी रहा और उसे प्रसन्नता न हुई; वह भरतवंशियों के परस्पर हुए भीषण विनाश का चिन्तन करता रहा।