शल्य पर्व · अध्याय 30
व्याधों द्वारा दुर्योधन का पता बताना
सञ्जय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि कृपाचार्य, अश्वत्थामा और कृतवर्मा सरोवर में पड़े दुर्योधन को ढूँढ़ निकालते हैं, उसे उठकर लड़ने के लिए कहते हैं और अश्वत्थामा पाञ्चालों के संहार की शपथ लेता है। भीमसेन के लिए मांस लाने वाले व्याध यह बातचीत सुन लेते हैं और पाण्डवों को समाचार दे देते हैं। युधिष्ठिर अपनी सेना सहित द्वैपायन सरोवर पर पहुँचते हैं और वे तीनों योद्धा हटकर एक बरगद के नीचे आ बैठते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.30.1)
मुहूर्तादिव राजेन्द्र सर्वं शून्यमदृश्यत । मत्तवारणसंघुष्टं शिबिरं विद्रुते बले ॥
muhūrtādiva rājendra sarvaṃ śūnyamadṛśyata | mattavāraṇasaṃghuṣṭaṃ śibiraṃ vidrute bale
हे राजेन्द्र! क्षण भर में ही सब कुछ सूना दिखाई देने लगा। सेना के भाग जाने पर वह शिविर, जो मतवाले हाथियों की चिंघाड़ से गूँजता रहता था, उजाड़ हो गया।
श्लोक 2 (9.30.2)
यत्र शब्देन महता नान्वबुध्यन्महारथाः । तत्र शब्दं न शृणुमो मनुष्यस्यापि कस्यचित् ॥
yatra śabdena mahatā nānvabudhyanmahārathāḥ | tatra śabdaṃ na śṛṇumo manuṣyasyāpi kasyacit
जिस शिविर में पहले भारी कोलाहल के कारण महारथी एक-दूसरे की बात भी नहीं सुन पाते थे, वहाँ अब हमें किसी एक मनुष्य का भी शब्द सुनाई नहीं दे रहा था।
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 3 (9.30.3)
हतेषु सर्वसैन्येषु पाण्डुपुत्रै रणाजिरे । मामकाश्चावशिष्टास्ते किमकुर्वत सञ्जय ॥
hateṣu sarvasainyeṣu pāṇḍuputrai raṇājire | māmakāścāvaśiṣṭāste kimakurvata sañjaya
सञ्जय! रणभूमि में पाण्डवों द्वारा सारी सेनाओं के मारे जाने पर मेरे पक्ष के जो लोग शेष बचे थे, उन्होंने क्या किया?
श्लोक 4 (9.30.4)
कृतवर्मा कृपश्चैव द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् । दुर्योधनश्च मन्दात्मा राजा किमकरोत्तदा ॥
kṛtavarmā kṛpaścaiva droṇaputraśca vīryavān | duryodhanaśca mandātmā rājā kimakarottadā
उस समय कृतवर्मा, कृपाचार्य और पराक्रमी द्रोणपुत्र ने क्या किया? और मन्दबुद्धि राजा दुर्योधन ने क्या किया?
सञ्जय उवाच
श्लोक 5 (9.30.5)
सम्प्राद्रुवत्सु दारेषु क्षत्रियाणां महात्मनाम् । विद्रुते शिबिरे शून्ये भृशोद्विग्नास्त्रयो रथाः ॥
samprādruvatsu dāreṣu kṣatriyāṇāṃ mahātmanām | vidrute śibire śūnye bhṛśodvignāstrayo rathāḥ
महात्मा क्षत्रियों की स्त्रियाँ जब भाग रही थीं और शिविर उजाड़ तथा सूना हो गया था, तब वे तीनों रथी अत्यन्त व्याकुल हो उठे।
श्लोक 6 (9.30.6)
निशम्य पाण्डुपुत्राणां तदा वैजयिनां स्वनम् । विद्रुतं शिबिरं दृष्ट्वा सायाह्ने राजगृद्धिनः । स्थानं नारोचयंस्तत्र ततस्ते ह्रदमभ्ययुः ॥
niśamya pāṇḍuputrāṇāṃ tadā vaijayināṃ svanam | vidrutaṃ śibiraṃ dṛṣṭvā sāyāhne rājagṛddhinaḥ | sthānaṃ nārocayaṃstatra tataste hradamabhyayuḥ
विजयी पाण्डवों का गर्जन सुनकर और सायंकाल शिविर को उजड़ा हुआ देखकर, राजा के हित में लगे हुए वे तीनों वहाँ ठहरना नहीं चाहते थे; इसलिए वे सरोवर की ओर चल पड़े।
श्लोक 7 (9.30.7)
युधिष्ठिरोऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो रणे । हृष्टः पर्यपतद्राजन्दुर्योधनवधेप्सया ॥
yudhiṣṭhiro'pi dharmātmā bhrātṛbhiḥ sahito raṇe | hṛṣṭaḥ paryapatadrājanduryodhanavadhepsayā
हे राजन्! धर्मात्मा युधिष्ठिर भी अपने भाइयों के साथ हर्षित होकर दुर्योधन का वध करने की इच्छा से रणभूमि में दौड़ पड़े।
श्लोक 8 (9.30.8)
मार्गमाणास्तु सङ्क्रुद्धास्तव पुत्रं जयैषिणः । यत्नतोऽन्वेषमाणास्ते नैवापश्यञ्जनाधिपम् ॥
mārgamāṇāstu saṅkruddhāstava putraṃ jayaiṣiṇaḥ | yatnato'nveṣamāṇāste naivāpaśyañjanādhipam
क्रोध से भरे हुए और विजय चाहने वाले वे आपके पुत्र को ढूँढ़ रहे थे; बड़े यत्न से खोजने पर भी उन्हें वह नरेश कहीं दिखाई नहीं दिया।
श्लोक 9 (9.30.9)
यदा दुर्योधनो युद्धं त्यक्त्वा पद्भ्यां पराक्रमत् । तं ह्रदं प्राविशच्चापि विष्टभ्यापः स्वमायया ॥
yadā duryodhano yuddhaṃ tyaktvā padbhyāṃ parākramat | taṃ hradaṃ prāviśaccāpi viṣṭabhyāpaḥ svamāyayā
जब दुर्योधन युद्ध छोड़कर पैदल ही चल पड़ा, तब उसने उस सरोवर में प्रवेश किया और अपनी माया से जल को स्तम्भित कर दिया।
श्लोक 10 (9.30.10)
यदा तु पाण्डवाः सर्वे सुपरिश्रान्तवाहनाः । ततः स्वशिबिरं प्राप्य व्यतिष्ठन्त ससैनिकाः ॥
yadā tu pāṇḍavāḥ sarve supariśrāntavāhanāḥ | tataḥ svaśibiraṃ prāpya vyatiṣṭhanta sasainikāḥ
जब थके हुए वाहनों वाले सभी पाण्डव अपने शिविर में लौट आए, तब वे अपने सैनिकों सहित वहीं ठहर गए।
श्लोक 11 (9.30.11)
ततः कृपश्च द्रौणिश्च कृतवर्मा च सात्वतः । सन्निविष्टेषु पार्थेषु प्रययुस्तं हदं शनैः ॥
tataḥ kṛpaśca drauṇiśca kṛtavarmā ca sātvataḥ | sanniviṣṭeṣu pārtheṣu prayayustaṃ hadaṃ śanaiḥ
तब पार्थों के जम जाने पर कृपाचार्य, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और सात्वत कृतवर्मा धीरे-धीरे उस सरोवर की ओर गए।
श्लोक 12 (9.30.12)
ते तं ह्रदं समासाद्य यत्र शेते जनाधिपः । अभ्यभाषन्त दुर्धर्षं राजानं सुप्तमम्भसि ॥
te taṃ hradaṃ samāsādya yatra śete janādhipaḥ | abhyabhāṣanta durdharṣaṃ rājānaṃ suptamambhasi
जिस सरोवर में वह नरेश पड़ा था, वहाँ पहुँचकर उन्होंने जल में पड़े हुए उस दुर्धर्ष राजा से कहा।
कृपादय ऊचुः
श्लोक 13 (9.30.13)
राजन्नुत्तिष्ठ युध्यस्व सहास्माभिर्युधिष्ठिरम् । जित्वा वा पृथिवीं भुङ्क्ष्व हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ॥
rājannuttiṣṭha yudhyasva sahāsmābhiryudhiṣṭhiram | jitvā vā pṛthivīṃ bhuṅkṣva hato vā svargamāpnuhi
राजन्! उठो और हमारे साथ युधिष्ठिर से युद्ध करो। या तो विजय पाकर पृथ्वी का भोग करो, या मारे जाकर स्वर्ग प्राप्त करो।
श्लोक 14 (9.30.14)
तेषामपि बलं सर्वं हतं दुर्योधन त्वया । प्रतिविद्धाश्च भूयिष्ठं ये शिष्टास्तत्र सैनिकाः ॥
teṣāmapi balaṃ sarvaṃ hataṃ duryodhana tvayā | pratividdhāśca bhūyiṣṭhaṃ ye śiṣṭāstatra sainikāḥ
दुर्योधन! उनकी सारी सेना तुम्हीं ने मार डाली है, और उनके जो सैनिक बचे हैं, उनमें से अधिकांश घायल हैं।
श्लोक 15 (9.30.15)
न ते वेगं विषहितुं शक्तास्तव विशाम्पते । अस्माभिरपि गुप्तस्य तस्मादुत्तिष्ठ भारत ॥
na te vegaṃ viṣahituṃ śaktāstava viśāmpate | asmābhirapi guptasya tasmāduttiṣṭha bhārata
हे विशाम्पते! हमारे द्वारा रक्षित तुम्हारे वेग को वे सह नहीं सकेंगे। इसलिए हे भारत! उठो।
दुर्योधन उवाच
श्लोक 16 (9.30.16)
दिष्ट्या पश्यामि वो मुक्तानीदृशात्पुरुषक्षयात् । पाण्डुकौरवसम्मर्दाज्जीवमानान्नरर्षभान् ॥
diṣṭyā paśyāmi vo muktānīdṛśātpuruṣakṣayāt | pāṇḍukauravasammardājjīvamānānnararṣabhān
सौभाग्य की बात है कि मैं तुम सब नरश्रेष्ठों को पाण्डवों और कौरवों की इस टक्कर से, इस भीषण नरसंहार से जीवित बचा हुआ देख रहा हूँ।
श्लोक 17 (9.30.17)
विजेष्यामो वयं सर्वे विश्रान्ता विगतक्लमाः । भवन्तश्च परिश्रान्ता वयं च भृशविक्षताः । उदीर्णं च बलं तेषां तेन युद्धं न रोचये ॥
vijeṣyāmo vayaṃ sarve viśrāntā vigataklamāḥ | bhavantaśca pariśrāntā vayaṃ ca bhṛśavikṣatāḥ | udīrṇaṃ ca balaṃ teṣāṃ tena yuddhaṃ na rocaye
विश्राम करके और थकान मिट जाने पर हम सब विजय पाएँगे। परन्तु तुम थके हुए हो, हम भी बहुत घायल हैं, और उनकी शक्ति बढ़ी हुई है; इसलिए मैं अभी युद्ध करना ठीक नहीं समझता।
श्लोक 18 (9.30.18)
न त्वेतदद्भुतं वीरा यद्वो महदिदं मनः । अस्मासु च परा शक्तिर्न तु कालः पराक्रमे ॥
na tvetadadbhutaṃ vīrā yadvo mahadidaṃ manaḥ | asmāsu ca parā śaktirna tu kālaḥ parākrame
वीरो! तुम्हारा मन इतना ऊँचा है, यह आश्चर्य की बात नहीं; हमारे भीतर भी बड़ी शक्ति है, परन्तु यह पराक्रम दिखाने का समय नहीं है।
श्लोक 19 (9.30.19)
विश्रम्यैकां निशामद्य भवद्भिः सहितो रणे । प्रतियोत्स्याम्यहं शत्रूञ्श्वो न स्याच्च श्रमो मम ॥
viśramyaikāṃ niśāmadya bhavadbhiḥ sahito raṇe | pratiyotsyāmyahaṃ śatrūñśvo na syācca śramo mama
आज की एक रात तुम सबके साथ विश्राम करके मैं कल रणभूमि में शत्रुओं से युद्ध करूँगा; तब मुझे थकान नहीं रहेगी।
सञ्जय उवाच
श्लोक 20 (9.30.20)
एवमुक्तोऽब्रवीद्द्रौणी राजानं युद्धदुर्मदम् । उत्तिष्ठ राजन्भद्रं ते विजेष्यामो वयं परान् ॥
evamukto'bravīddrauṇī rājānaṃ yuddhadurmadam | uttiṣṭha rājanbhadraṃ te vijeṣyāmo vayaṃ parān
ऐसा कहे जाने पर द्रोणपुत्र ने युद्ध के लिए उन्मत्त उस राजा से कहा, "राजन्! उठो, तुम्हारा कल्याण हो; हम शत्रुओं को जीत लेंगे।"
अश्वत्थामोवाच
श्लोक 21 (9.30.21)
इष्टापूर्तेन दानेन सत्येन च जपेन च । शपे राजन्यथा ह्यद्य निहनिष्यामि सोमकान् ॥
iṣṭāpūrtena dānena satyena ca japena ca | śape rājanyathā hyadya nihaniṣyāmi somakān
राजन्! अपने यज्ञ-दान आदि पुण्य कर्मों की, दान की, सत्य की और जप की शपथ खाकर कहता हूँ कि आज मैं सोमकों का संहार अवश्य करूँगा।
श्लोक 22 (9.30.22)
मा स्म यज्ञकृतां प्रीतिमाप्नुयां सज्जनोचिताम् । यदीमां रजनीं व्युष्टां न हि हन्मि परान्रणे ॥
mā sma yajñakṛtāṃ prītimāpnuyāṃ sajjanocitām | yadīmāṃ rajanīṃ vyuṣṭāṃ na hi hanmi parānraṇe
यदि इस रात के बीत जाने तक मैं रणभूमि में शत्रुओं को न मार डालूँ, तो मुझे यज्ञ करने वाले सज्जनों के योग्य वह सुख कभी प्राप्त न हो।
श्लोक 23 (9.30.23)
नाहत्वा सर्वपाञ्चालान्विमोक्ष्ये कवचं विभो । उत्तिष्ठ त्वं ब्रवीम्येतत्तन्मे शृणु जनाधिप ॥
nāhatvā sarvapāñcālānvimokṣye kavacaṃ vibho | uttiṣṭha tvaṃ bravīmyetattanme śṛṇu janādhipa
हे प्रभो! जब तक मैं सब पाञ्चालों को मार न डालूँ, तब तक कवच नहीं उतारूँगा। उठो, मैं तुमसे यह कहता हूँ; हे नरेश! इसे सुनो।
सञ्जय उवाच
श्लोक 24 (9.30.24)
तेषु सम्भाषमाणेषु व्याधास्तं देशमाययुः । मांसभारपरिश्रान्ताः पानीयार्थं यदृच्छया ॥
teṣu sambhāṣamāṇeṣu vyādhāstaṃ deśamāyayuḥ | māṃsabhārapariśrāntāḥ pānīyārthaṃ yadṛcchayā
जब वे इस प्रकार बातें कर रहे थे, तभी मांस का बोझ ढोने से थके हुए कुछ व्याध पानी की खोज में संयोगवश उस स्थान पर आ पहुँचे।
श्लोक 25 (9.30.25)
ते हि नित्यं महाराज भीमसेनस्य लुब्धकाः । मांसभारानुपाजह्नुर्भक्त्या परमया विभो ॥
te hi nityaṃ mahārāja bhīmasenasya lubdhakāḥ | māṃsabhārānupājahnurbhaktyā paramayā vibho
महाराज! वे व्याध प्रतिदिन बड़ी भक्ति से भीमसेन के लिए मांस के बोझ लाया करते थे।
श्लोक 26 (9.30.26)
ते तत्र विष्ठितास्तेषां सर्वं तद्वचनं रहः । दुर्योधनवचश्चैव शुश्रुवुः सङ्गता मिथः ॥
te tatra viṣṭhitāsteṣāṃ sarvaṃ tadvacanaṃ rahaḥ | duryodhanavacaścaiva śuśruvuḥ saṅgatā mithaḥ
वहीं छिपकर, एक-दूसरे से सटे हुए, उन्होंने उन लोगों की सारी गुप्त बातचीत और दुर्योधन के वचन भी सुन लिए।
श्लोक 27 (9.30.27)
तेऽपि सर्वे महेष्वासा अयुद्धार्थिनि कौरवे । निर्बन्धं परमं चक्रुस्तदा वै युद्धकाङ्क्षिणः ॥
te'pi sarve maheṣvāsā ayuddhārthini kaurave | nirbandhaṃ paramaṃ cakrustadā vai yuddhakāṅkṣiṇaḥ
युद्ध की इच्छा रखने वाले वे सब महाधनुर्धर उस समय युद्ध न चाहने वाले कुरुराज पर बहुत आग्रह करने लगे।
श्लोक 28 (9.30.28)
तांस्तथा समुदीक्ष्याथ कौरवाणां महारथान् । अयुद्धमनसं चैव राजानं स्थितमम्भसि ॥
tāṃstathā samudīkṣyātha kauravāṇāṃ mahārathān | ayuddhamanasaṃ caiva rājānaṃ sthitamambhasi
कौरवपक्ष के उन महारथियों को इस प्रकार देखकर और राजा को जल में युद्ध की इच्छा के बिना ठहरे हुए देखकर,
श्लोक 29 (9.30.29)
तेषां श्रुत्वा च संवादं राज्ञश्च सलिले सतः । व्याधा ह्यजानन्राजेन्द्र सलिलस्थं सुयोधनम् ॥
teṣāṃ śrutvā ca saṃvādaṃ rājñaśca salile sataḥ | vyādhā hyajānanrājendra salilasthaṃ suyodhanam
और उनकी बातचीत तथा जल में स्थित राजा की बात सुनकर, हे राजेन्द्र! उन व्याधों ने जान लिया कि सुयोधन जल में छिपा है।
श्लोक 30 (9.30.30)
ते पूर्वं पाण्डुपुत्रेण पृष्टा ह्यासन्सुतं तव । यदृच्छोपगतास्तत्र राजानं परिमार्गिताः ॥
te pūrvaṃ pāṇḍuputreṇa pṛṣṭā hyāsansutaṃ tava | yadṛcchopagatāstatra rājānaṃ parimārgitāḥ
इससे पहले पाण्डुपुत्र ने उनसे आपके पुत्र के विषय में पूछा था; और अब वे संयोग से उसी स्थान पर आ पहुँचे थे जहाँ राजा की खोज हो रही थी।
श्लोक 31 (9.30.31)
ततस्ते पाण्डुपुत्रस्य स्मृत्वा तद्भाषितं तदा । अन्योन्यमब्रुवन्राजन्मृगव्याधाः शनैरिव ॥
tataste pāṇḍuputrasya smṛtvā tadbhāṣitaṃ tadā | anyonyamabruvanrājanmṛgavyādhāḥ śanairiva
तब पाण्डुपुत्र की कही हुई बात याद करके, हे राजन्! वे व्याध धीरे-धीरे आपस में कहने लगे।
व्याधा ऊचुः
श्लोक 32 (9.30.32)
दुर्योधनं ख्यापयामो धनं दास्यति पाण्डवः । सुव्यक्तमिह नः ख्यातो ह्रदे दुर्योधनो नृपः ॥
duryodhanaṃ khyāpayāmo dhanaṃ dāsyati pāṇḍavaḥ | suvyaktamiha naḥ khyāto hrade duryodhano nṛpaḥ
"चलो, हम दुर्योधन का पता बता दें; पाण्डव हमें धन देगा। हमें स्पष्ट मालूम हो गया है कि राजा दुर्योधन इसी सरोवर में है।"
श्लोक 33 (9.30.33)
तस्माद्गच्छामहे सर्वे यत्र राजा युधिष्ठिरः । आख्यातुं सलिले सुप्तं दुर्योधनममर्षणम् ॥
tasmādgacchāmahe sarve yatra rājā yudhiṣṭhiraḥ | ākhyātuṃ salile suptaṃ duryodhanamamarṣaṇam
"इसलिए हम सब वहाँ चलें जहाँ राजा युधिष्ठिर हैं, और उन्हें बताएँ कि अमर्षी दुर्योधन जल में पड़ा है।"
श्लोक 34 (9.30.34)
धृतराष्ट्रात्मजं तस्मै भीमसेनाय धीमते । शयानं सलिले सर्वे कथयामो धनुर्भृते ॥
dhṛtarāṣṭrātmajaṃ tasmai bhīmasenāya dhīmate | śayānaṃ salile sarve kathayāmo dhanurbhṛte
"हम सब धनुर्धारी बुद्धिमान भीमसेन को बता देंगे कि धृतराष्ट्र का पुत्र जल में सोया पड़ा है।"
श्लोक 35 (9.30.35)
स नो दास्यति सुप्रीतो धनानि बहुलान्युत । किं नो मांसेन शुष्केण परिक्लिष्टेन शोषिणा ॥
sa no dāsyati suprīto dhanāni bahulānyuta | kiṃ no māṃsena śuṣkeṇa parikliṣṭena śoṣiṇā
"वह प्रसन्न होकर हमें बहुत-सा धन देंगे। इस सूखे, बिगड़े और सिकुड़ते हुए मांस से हमें क्या लेना है?"
सञ्जय उवाच
श्लोक 36 (9.30.36)
एवमुक्त्वा तु ते व्याधाः सम्प्रहृष्टा धनार्थिनः । मांसभारानुपादाय प्रययुः शिबिरं प्रति ॥
evamuktvā tu te vyādhāḥ samprahṛṣṭā dhanārthinaḥ | māṃsabhārānupādāya prayayuḥ śibiraṃ prati
ऐसा कहकर धन चाहने वाले वे व्याध अत्यन्त प्रसन्न हुए और अपने मांस के बोझ उठाकर शिविर की ओर चल पड़े।
श्लोक 37 (9.30.37)
पाण्डवाश्च महाराज लब्धलक्षाः प्रहारिणः । अपश्यमानाः समरे दुर्योधनमवस्थितम् ॥
pāṇḍavāśca mahārāja labdhalakṣāḥ prahāriṇaḥ | apaśyamānāḥ samare duryodhanamavasthitam
महाराज! उधर लक्ष्य साधकर प्रहार करने वाले पाण्डव रणभूमि में दुर्योधन को कहीं ठहरा हुआ नहीं देख पा रहे थे।
श्लोक 38 (9.30.38)
निकृतिज्ञस्य पापस्य तस्याभिगमनेप्सया । चारान्सम्प्रेषयामासुः समन्तात्तद्रणाजिरे ॥
nikṛtijñasya pāpasya tasyābhigamanepsayā | cārānsampreṣayāmāsuḥ samantāttadraṇājire
उस छल जानने वाले पापी तक पहुँचने की इच्छा से उन्होंने रणभूमि में चारों ओर गुप्तचर भेजे।
श्लोक 39 (9.30.39)
आगम्य तु ततः सर्वे नष्टं दुर्योधनं नृपम् । न्यवेदयन्त सहिता धर्मराजस्य सैनिकाः ॥
āgamya tu tataḥ sarve naṣṭaṃ duryodhanaṃ nṛpam | nyavedayanta sahitā dharmarājasya sainikāḥ
सैनिकों ने लौटकर एक साथ धर्मराज को बताया कि राजा दुर्योधन कहीं अदृश्य हो गया है।
श्लोक 40 (9.30.40)
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चाराणां भरतर्षभ । चिन्तामभ्यगमत्तीव्रां निशश्वास च पार्थिवः ॥
teṣāṃ tadvacanaṃ śrutvā cārāṇāṃ bharatarṣabha | cintāmabhyagamattīvrāṃ niśaśvāsa ca pārthivaḥ
हे भरतश्रेष्ठ! गुप्तचरों की बात सुनकर राजा युधिष्ठिर गहरी चिन्ता में पड़ गए और लम्बी साँस लेने लगे।
श्लोक 41 (9.30.41)
अरिशेषे जीवति तु सन्दिग्धो विजयो भवेत् । राज्यं लभे कथं तद्वि पूजितं विजयादिभिः ॥
ariśeṣe jīvati tu sandigdho vijayo bhavet | rājyaṃ labhe kathaṃ tadvi pūjitaṃ vijayādibhiḥ
"जब तक शत्रु जीवित है, विजय संदिग्ध ही रहेगी। विजयी लोग जिस राज्य का आदर करते हैं, उसे मैं कैसे प्राप्त करूँ?"
श्लोक 42 (9.30.42)
अथ स्थितानां पाण्डूनां दीनानां भरतर्षभ । तस्माद्देशादपक्रम्य त्वरिता लुब्धका विभो ॥
atha sthitānāṃ pāṇḍūnāṃ dīnānāṃ bharatarṣabha | tasmāddeśādapakramya tvaritā lubdhakā vibho
हे भरतश्रेष्ठ! जब दुःखी पाण्डव वहाँ ठहरे हुए थे, तभी वे व्याध उस स्थान से शीघ्रता से चलकर, हे विभो!
श्लोक 43 (9.30.43)
आजग्मुः शिबिरं हृष्टा दृष्ट्वा दुर्योधनं नृपम् । वार्यमाणाः प्रविष्टाश्च भीमसेनस्य पश्यतः ॥
ājagmuḥ śibiraṃ hṛṣṭā dṛṣṭvā duryodhanaṃ nṛpam | vāryamāṇāḥ praviṣṭāśca bhīmasenasya paśyataḥ
राजा दुर्योधन को देखकर हर्षित होते हुए शिविर में आ पहुँचे; रोके जाने पर भी वे भीमसेन के देखते-देखते भीतर चले गए।
श्लोक 44 (9.30.44)
ते तु पाण्डवमासाद्य भीमसेनं महाबलम् । तस्मै तत्सर्वमाचख्युर्यद्वृत्तं यच्च वै श्रुतम् ॥
te tu pāṇḍavamāsādya bhīmasenaṃ mahābalam | tasmai tatsarvamācakhyuryadvṛttaṃ yacca vai śrutam
उन्होंने पाण्डव महाबली भीमसेन के पास पहुँचकर जो कुछ हुआ था और जो कुछ सुना था, वह सब उन्हें बता दिया।
श्लोक 45 (9.30.45)
ततो वृकोदरो राजन्दत्त्वा तेषां धनं बहु । धर्मराजाय तत्सर्वमाचचक्षे परन्तपः ॥
tato vṛkodaro rājandattvā teṣāṃ dhanaṃ bahu | dharmarājāya tatsarvamācacakṣe parantapaḥ
हे राजन्! तब शत्रुतापन वृकोदर ने उन्हें बहुत धन दिया और यह सारा समाचार धर्मराज को कह सुनाया।
भीमसेन उवाच
श्लोक 46 (9.30.46)
असौ दुर्योधनो राजन्विज्ञातो मम लुब्धकैः । संस्तभ्य सलिलं शेते यस्यार्थे परितप्यसे ॥
asau duryodhano rājanvijñāto mama lubdhakaiḥ | saṃstabhya salilaṃ śete yasyārthe paritapyase
"राजन्! मेरे व्याधों ने दुर्योधन का पता लगा लिया है। जिसके लिए आप सन्ताप कर रहे हैं, वह जल को स्तम्भित करके उसी में पड़ा हुआ है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 47 (9.30.47)
तद्वचो भीमसेनस्य प्रियं श्रुत्वा विशाम्पते । अजातशत्रुः कौन्तेयो हृष्टोऽभूत्सह सोदरैः ॥
tadvaco bhīmasenasya priyaṃ śrutvā viśāmpate | ajātaśatruḥ kaunteyo hṛṣṭo'bhūtsaha sodaraiḥ
हे विशाम्पते! भीमसेन की वह प्रिय बात सुनकर कुन्तीपुत्र अजातशत्रु अपने भाइयों के साथ बहुत प्रसन्न हुए।
श्लोक 48 (9.30.48)
तं च श्रुत्वा महेष्वासं प्रविष्टं सलिलह्रदे । क्षिप्रमेव ततोऽगच्छन्पुरस्कृत्य जनार्दनम् ॥
taṃ ca śrutvā maheṣvāsaṃ praviṣṭaṃ salilahrade | kṣiprameva tato'gacchanpuraskṛtya janārdanam
यह सुनकर कि वह महाधनुर्धर सरोवर के जल में घुस गया है, वे जनार्दन को आगे करके तुरन्त वहाँ चल पड़े।
श्लोक 49 (9.30.49)
ततः किलकिलाशब्दः प्रादुरासीद्विशाम्पते । पाण्डवानां प्रहृष्टानां पाञ्चालानां च सर्वशः ॥
tataḥ kilakilāśabdaḥ prādurāsīdviśāmpate | pāṇḍavānāṃ prahṛṣṭānāṃ pāñcālānāṃ ca sarvaśaḥ
हे विशाम्पते! तब हर्ष में भरे हुए पाण्डवों और पाञ्चालों का हर्षनाद चारों ओर गूँज उठा।
श्लोक 50 (9.30.50)
सिंहनादांस्ततश्चक्रुः क्ष्वेडाश्च भरतर्षभ । त्वरिताः क्षत्रिया राजन्नुदक्रोशन्परस्परम् ॥
siṃhanādāṃstataścakruḥ kṣveḍāśca bharatarṣabha | tvaritāḥ kṣatriyā rājannudakrośanparasparam
हे भरतश्रेष्ठ! उन्होंने सिंहनाद और ललकारें कीं; हे राजन्! उतावले क्षत्रिय एक-दूसरे को पुकारने लगे।
श्लोक 51 (9.30.51)
ज्ञातः पापो धार्तराष्ट्रो दृष्टश्चेत्यसकृद्रणे । प्राक्रोशन्सोमकास्तत्र हृष्टरूपाः समन्ततः ॥
jñātaḥ pāpo dhārtarāṣṭro dṛṣṭaścetyasakṛdraṇe | prākrośansomakāstatra hṛṣṭarūpāḥ samantataḥ
"पापी धृतराष्ट्रपुत्र का पता लग गया, वह दीख गया!" इस प्रकार प्रसन्न होकर सोमक योद्धा रणभूमि में चारों ओर बार-बार चिल्लाने लगे।
श्लोक 52 (9.30.52)
तेषामाशु प्रयातानां रथानां तत्र वेगिनाम् । वभूव तुमुलः शब्दो दिवस्पृक् पृथिवीपते ॥
teṣāmāśu prayātānāṃ rathānāṃ tatra veginām | vabhūva tumulaḥ śabdo divaspṛk pṛthivīpate
हे पृथ्वीपते! तेज़ी से जाते हुए उनके वेगवान रथों का भारी कोलाहल उठा, जो आकाश को छूने लगा।
श्लोक 53 (9.30.53)
दुर्योधनं परीप्सन्तस्तत्रतत्र युधिष्ठिरम् । अन्वयुस्त्वरितास्ते वै राजानं श्रान्तवाहनाः ॥
duryodhanaṃ parīpsantastatratatra yudhiṣṭhiram | anvayustvaritāste vai rājānaṃ śrāntavāhanāḥ
दुर्योधन को पकड़ने की इच्छा से वे थके वाहनों वाले योद्धा इधर-उधर से शीघ्रता करते हुए राजा युधिष्ठिर के पीछे-पीछे चले।
श्लोक 54 (9.30.54)
अर्जुनो भीमसेनश्च माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । धृष्टद्युम्नश्च पाञ्चाल्यः शिखण्डी चापराजितः ॥
arjuno bhīmasenaśca mādrīputrau ca pāṇḍavau | dhṛṣṭadyumnaśca pāñcālyaḥ śikhaṇḍī cāparājitaḥ
अर्जुन, भीमसेन, माद्री के दोनों पाण्डव पुत्र, पाञ्चाल धृष्टद्युम्न और अपराजित शिखण्डी,
श्लोक 55 (9.30.55)
उत्तमौजा युधामन्युः सात्यकिश्च महारथः । पाञ्चालानां च ये शिष्टा द्रौपदेयाश्च भारत । हयाश्च सर्वे नागाश्च शतशश्च पदातयः ॥
uttamaujā yudhāmanyuḥ sātyakiśca mahārathaḥ | pāñcālānāṃ ca ye śiṣṭā draupadeyāśca bhārata | hayāśca sarve nāgāśca śataśaśca padātayaḥ
उत्तमौजा, युधामन्यु, महारथी सात्यकि, पाञ्चालों में जो शेष बचे थे वे, और हे भारत! द्रौपदी के पुत्र, साथ ही सभी घोड़े, हाथी और सैकड़ों पैदल सैनिक भी चले।
श्लोक 56 (9.30.56)
ततः प्राप्तो महाराज धर्मराजः प्रतापवान् । द्वैपायनह्रदं घोरं यत्र दुर्योधनोऽभवत् ॥
tataḥ prāpto mahārāja dharmarājaḥ pratāpavān | dvaipāyanahradaṃ ghoraṃ yatra duryodhano'bhavat
महाराज! तब प्रतापी राजा धर्मराज उस भयंकर द्वैपायन सरोवर पर पहुँचे, जहाँ दुर्योधन था,
श्लोक 57 (9.30.57)
शीतामलजलं हृद्यं द्वितीयमिव सागरम् । मायया सलिलं स्तभ्य यत्राभूत्ते स्थितः सुतः ॥
śītāmalajalaṃ hṛdyaṃ dvitīyamiva sāgaram | māyayā salilaṃ stabhya yatrābhūtte sthitaḥ sutaḥ
जो शीतल और निर्मल जल से भरा हुआ मनोहर सरोवर था, मानो दूसरा समुद्र हो, और जहाँ आपका पुत्र माया से जल को स्तम्भित करके खड़ा था।
श्लोक 58 (9.30.58)
अत्यद्भुतेन विधिना दैवयोगेन भारत । सलिलान्तर्गतः शेते दुर्दर्शः कस्यचित्प्रभो । मानुषस्य मनुष्येन्द्र गदाहस्तो जनाधिपः ॥
atyadbhutena vidhinā daivayogena bhārata | salilāntargataḥ śete durdarśaḥ kasyacitprabho | mānuṣasya manuṣyendra gadāhasto janādhipaḥ
हे भारत! अत्यन्त अद्भुत उपाय से और दैव के योग से वह जल के भीतर पड़ा हुआ था; हे प्रभो! हे नरेन्द्र! कोई भी मनुष्य उसे नहीं देख सकता था। वह राजा हाथ में गदा लिए हुए था।
श्लोक 59 (9.30.59)
ततो दुर्योधनो राजा सलिलान्तर्गतो वसन् । शुश्रुवे तुमुलं शब्दं जलदोपमनिःस्वनम् ॥
tato duryodhano rājā salilāntargato vasan | śuśruve tumulaṃ śabdaṃ jaladopamaniḥsvanam
तब जल के भीतर रहते हुए राजा दुर्योधन ने मेघों की गर्जना जैसा भीषण कोलाहल सुना।
श्लोक 60 (9.30.60)
युधिष्ठिरश्च राजेन्द्र तं ह्रदं सह सोदरैः । आजगाम महाराज तव पुत्रवधाय वै ॥
yudhiṣṭhiraśca rājendra taṃ hradaṃ saha sodaraiḥ | ājagāma mahārāja tava putravadhāya vai
हे महाराज! युधिष्ठिर भी आपके पुत्र का वध करने के लिए अपने भाइयों के साथ उस सरोवर पर आ पहुँचे,
श्लोक 61 (9.30.61)
महता शङ्खनादेन रथनेमिस्वनेन च । ऊर्ध्वं धुन्वन्महारेणुं कम्पयंश्चापि मेदिनीम् ॥
mahatā śaṅkhanādena rathanemisvanena ca | ūrdhvaṃ dhunvanmahāreṇuṃ kampayaṃścāpi medinīm
शंखों की भारी ध्वनि और रथों के पहियों की घर्घराहट के साथ, ऊपर धूल का बड़ा बादल उड़ाते हुए और पृथ्वी को कँपाते हुए।
श्लोक 62 (9.30.62)
यौधिष्ठिरस्य सैन्यस्य श्रुत्वा शब्दं महारथाः । कृतवर्मा कृपो द्रौणी राजानमिदमब्रुवन् ॥
yaudhiṣṭhirasya sainyasya śrutvā śabdaṃ mahārathāḥ | kṛtavarmā kṛpo drauṇī rājānamidamabruvan
युधिष्ठिर की सेना का कोलाहल सुनकर महारथी कृतवर्मा, कृपाचार्य और द्रोणपुत्र ने राजा से यह कहा।
कृपादय ऊचुः
श्लोक 63 (9.30.63)
इमे ह्यायान्ति संहृष्टाः पाण्डवा जितकाशिनः । अपयास्यामहे तावदनुजानातु नो भवान् ॥
ime hyāyānti saṃhṛṣṭāḥ pāṇḍavā jitakāśinaḥ | apayāsyāmahe tāvadanujānātu no bhavān
"ये विजय के मद में भरे हुए पाण्डव हर्षित होकर आ रहे हैं। हम कुछ समय के लिए यहाँ से हट जाते हैं; आप हमें आज्ञा दीजिए।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 64 (9.30.64)
दुर्योधनस्तु तच्छ्रुत्वा तेषां तत्र तरस्विनाम् । तथेत्युक्त्वा ह्रदं तं वै माययाऽस्तम्भयत्प्रभो ॥
duryodhanastu tacchrutvā teṣāṃ tatra tarasvinām | tathetyuktvā hradaṃ taṃ vai māyayā'stambhayatprabho
उन पराक्रमी योद्धाओं की बात सुनकर दुर्योधन ने "ऐसा ही हो" कहा और हे प्रभो! फिर अपनी माया से उस सरोवर को स्तम्भित कर दिया।
श्लोक 65 (9.30.65)
ते त्वनुज्ञाप्य राजानं भृशं शोकपरायणाः । जग्मुर्दूरे महाराज कृपप्रभृतयो रथाः ॥
te tvanujñāpya rājānaṃ bhṛśaṃ śokaparāyaṇāḥ | jagmurdūre mahārāja kṛpaprabhṛtayo rathāḥ
हे महाराज! राजा से आज्ञा लेकर, शोक में डूबे हुए कृपाचार्य आदि वे रथी दूर चले गए।
श्लोक 66 (9.30.66)
ते गत्वा दूरमध्वानं न्यग्रोधं प्रेक्ष्य मारिष । न्यविशन्त भृशं श्रान्ताश्चिन्तयन्तो नृपं प्रति ॥
te gatvā dūramadhvānaṃ nyagrodhaṃ prekṣya māriṣa | nyaviśanta bhṛśaṃ śrāntāścintayanto nṛpaṃ prati
हे माननीय! बहुत दूर जाकर उन्होंने एक बरगद का वृक्ष देखा और राजा की चिन्ता करते हुए, बहुत थके हुए, वे उसके नीचे बैठ गए।
श्लोक 67 (9.30.67)
विष्टभ्य सलिलं सुप्तो धार्तराष्ट्रो महाबलः । पाण्डवाश्चापि सम्प्राप्तास्तं देशं युद्धमीप्सवः ॥
viṣṭabhya salilaṃ supto dhārtarāṣṭro mahābalaḥ | pāṇḍavāścāpi samprāptāstaṃ deśaṃ yuddhamīpsavaḥ
महाबली धृतराष्ट्रपुत्र जल को स्तम्भित करके उसी में सोया पड़ा था, और युद्ध चाहने वाले पाण्डव भी उस स्थान पर आ पहुँचे थे।
श्लोक 68 (9.30.68)
कथं नु युद्धं भविता कथं राजा भविष्यति । कथं नु पाण्डवा राजन्प्रतिपत्स्यन्ति कौरवम् ॥
kathaṃ nu yuddhaṃ bhavitā kathaṃ rājā bhaviṣyati | kathaṃ nu pāṇḍavā rājanpratipatsyanti kauravam
युद्ध कैसे होगा? राजा कैसे बचेगा? और हे राजन्! पाण्डव कौरव के साथ कैसा व्यवहार करेंगे?
श्लोक 69 (9.30.69)
इत्येवं चिन्तयानास्तु रथेभ्योऽश्वान्विमुच्य ते । तत्रासाञ्चक्रिरे राजन्कृपप्रभृतयो रथाः ॥
ityevaṃ cintayānāstu rathebhyo'śvānvimucya te | tatrāsāñcakrire rājankṛpaprabhṛtayo rathāḥ
हे राजन्! इस प्रकार सोचते हुए कृपाचार्य आदि रथियों ने रथों से घोड़े खोल दिए और वहीं बैठ गए।