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शल्य पर्व · अध्याय 31

सरोवर पर युधिष्ठिर की दुर्योधन को ललकार

पाण्डव द्वैपायन सरोवर पर पहुँचते हैं। श्रीकृष्ण के कहने पर कि माया का उत्तर कौशल से दिया जाए, युधिष्ठिर दुर्योधन को उठकर लड़ने के लिए ललकारते हैं। दुर्योधन कहता है कि वह केवल विश्राम के लिए जल में घुसा था, और सारी उजड़ी हुई पृथ्वी युधिष्ठिर को सौंपकर वन जाने की बात कहता है। युधिष्ठिर यह दान अस्वीकार करते हैं, उसके पुराने अपराध याद दिलाते हैं और उठकर युद्ध करने को कहते हैं।

अध्याय 30अध्याय-सूचीअध्याय 32

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.31.1)

ततस्तेष्वपयातेषु रथेषु त्रिषु पाण्डवाः । तं ह्रदं प्रत्यपद्यन्त यत्र दुर्योधनोऽभवत् ॥

tatasteṣvapayāteṣu ratheṣu triṣu pāṇḍavāḥ | taṃ hradaṃ pratyapadyanta yatra duryodhano'bhavat

उन तीनों रथियों के चले जाने पर पाण्डव उस सरोवर पर पहुँचे जहाँ दुर्योधन था।

श्लोक 2 (9.31.2)

आसाद्य च कुरुश्रेष्ठ तदा द्वैपायनं ह्रदम् । स्तम्भितं धार्तराष्ट्रेण दृष्ट्वा तं सलिलाशयम् ॥

āsādya ca kuruśreṣṭha tadā dvaipāyanaṃ hradam | stambhitaṃ dhārtarāṣṭreṇa dṛṣṭvā taṃ salilāśayam

हे कुरुश्रेष्ठ! द्वैपायन सरोवर पर पहुँचकर और उस जलाशय को धृतराष्ट्रपुत्र द्वारा स्तम्भित देखकर,

श्लोक 3 (9.31.3)

वासुदेवमिदं वाक्यमब्रवीत्कुरुनन्दनः । पश्येमां धार्तराष्ट्रेण मायामप्सु प्रयोजिताम् ॥

vāsudevamidaṃ vākyamabravītkurunandanaḥ | paśyemāṃ dhārtarāṣṭreṇa māyāmapsu prayojitām

कुरुनन्दन युधिष्ठिर ने वासुदेव से यह वचन कहा, "देखो, धृतराष्ट्र के पुत्र ने जल में कैसी माया रच रखी है!

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 4 (9.31.4)

विष्टभ्य सलिलं शेते नास्य मानुषतो भयम् । दैवीं मायामिमां कृत्वा सलिलान्तर्गतो ह्ययम् ॥

viṣṭabhya salilaṃ śete nāsya mānuṣato bhayam | daivīṃ māyāmimāṃ kṛtvā salilāntargato hyayam

वह जल को स्तम्भित करके सो रहा है, इसलिए उसे किसी मनुष्य से भय नहीं है। इस दैवी माया को रचकर वह जल के भीतर घुसा हुआ है।

श्लोक 5 (9.31.5)

निकृत्या निकृतिप्रज्ञो न मे जीवन्विमोक्ष्यते । यद्यस्य समरे साह्यं कुरुते वज्रभृत्स्वयम् । तथाप्येनं हतं युद्धे लोका द्रक्ष्यन्ति माधव ॥

nikṛtyā nikṛtiprajño na me jīvanvimokṣyate | yadyasya samare sāhyaṃ kurute vajrabhṛtsvayam | tathāpyenaṃ hataṃ yuddhe lokā drakṣyanti mādhava

छल में निपुण यह दुर्योधन अपने छल से जीवित मुझसे नहीं बच सकेगा। हे माधव! यदि वज्रधारी इन्द्र स्वयं भी युद्ध में इसकी सहायता करें, तो भी संसार इसे युद्ध में मरा हुआ देखेगा।"

वासुदेव उवाच

श्लोक 6 (9.31.6)

मायाविन इमां मायां मायया जहि भारत । मायावी मायया वध्यः सत्यमेतद्युधिष्ठिर ॥

māyāvina imāṃ māyāṃ māyayā jahi bhārata | māyāvī māyayā vadhyaḥ satyametadyudhiṣṭhira

वासुदेव ने कहा, "हे भारत! इस मायावी की माया को माया से ही नष्ट करो। मायावी माया से ही मारा जाना चाहिए; हे युधिष्ठिर! यह सत्य है।

श्लोक 7 (9.31.7)

क्रियाभ्युपायैर्बहुभिर्मायामप्सु प्रयोज्य च । जहि त्वं भरतश्रेष्ठ मायात्मानं सुयोधनम् ॥

kriyābhyupāyairbahubhirmāyāmapsu prayojya ca | jahi tvaṃ bharataśreṣṭha māyātmānaṃ suyodhanam

हे भरतश्रेष्ठ! अनेक उपायों और युक्तियों से जल में माया का प्रयोग करके मायारूप स्वभाव वाले सुयोधन को मार डालो।

श्लोक 8 (9.31.8)

क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण निहता दैत्यदानवाः । क्रियाभ्युपायैर्बलिभिर्बलिर्बद्धो महात्मना ॥

kriyābhyupāyairindreṇa nihatā daityadānavāḥ | kriyābhyupāyairbalibhirbalirbaddho mahātmanā

ऐसी ही युक्तियों और उपायों से इन्द्र ने दैत्यों और दानवों को मारा; ऐसे ही उपायों से उस महात्मा ने बलवान् बलि को बाँधा।

श्लोक 9 (9.31.9)

क्रियाभ्युपायपूर्वं वै हिरण्याक्षो महासुरः । हिरण्यकशिपुश्चैव क्रिययैव निषूदितौ ॥

kriyābhyupāyapūrvaṃ vai hiraṇyākṣo mahāsuraḥ | hiraṇyakaśipuścaiva kriyayaiva niṣūditau

ऐसी ही युक्तियों से महान् असुर हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु भी केवल कौशल से ही मारे गए।

श्लोक 10 (9.31.10)

वृत्रश्च निहतो राजन्क्रिययैव महाबलः । तथा पौलस्त्यतनयो रावणो नाम राक्षसः । रामेण निहतो राजन्सानुबन्धः सहानुगः ॥

vṛtraśca nihato rājankriyayaiva mahābalaḥ | tathā paulastyatanayo rāvaṇo nāma rākṣasaḥ | rāmeṇa nihato rājansānubandhaḥ sahānugaḥ

हे राजन्! महाबली वृत्र भी केवल कौशल से ही मारा गया। इसी प्रकार पुलस्त्य के वंश में उत्पन्न रावण नामक राक्षस भी अपने बन्धुओं और अनुचरों सहित राम के हाथ से मारा गया।

श्लोक 11 (9.31.11)

क्रियया योगमास्थाय तथा त्वमपि विक्रम ॥

kriyayā yogamāsthāya tathā tvamapi vikrama

तुम भी इसी प्रकार कौशल का सहारा लेकर पराक्रम दिखाओ।

श्लोक 12 (9.31.12)

क्रियाभ्युपायैर्निहतौ मया राजन्पुरातनौ । तारकश्च महादैत्यो विप्रचित्तिश्च वीर्यवान् ॥

kriyābhyupāyairnihatau mayā rājanpurātanau | tārakaśca mahādaityo vipracittiśca vīryavān

हे राजन्! ऐसे ही उपायों से मैंने प्राचीन काल में दो शत्रुओं को मारा था: महान् दैत्य तारक और पराक्रमी विप्रचित्ति को।

श्लोक 13 (9.31.13)

वातापिरिल्वलश्चैव त्रिशिराश्च तथा विभो । सुन्दोपसुन्दावसुरौ क्रिययैव निषूदितौ ॥

vātāpirilvalaścaiva triśirāśca tathā vibho | sundopasundāvasurau kriyayaiva niṣūditau

हे विभो! वातापि, इल्वल और त्रिशिरा तथा सुन्द और उपसुन्द नामक दोनों असुर भी केवल कौशल से ही मारे गए।

श्लोक 14 (9.31.14)

क्रियाभ्युपायैरिन्द्रेण त्रिदिवं भुज्यते विभो । क्रिया बलवती राजन्नान्यत्किंचिद्युधिष्ठिर ॥

kriyābhyupāyairindreṇa tridivaṃ bhujyate vibho | kriyā balavatī rājannānyatkiṃcidyudhiṣṭhira

हे विभो! ऐसे ही उपायों से इन्द्र स्वर्ग का भोग करते हैं। हे राजन्! कौशल ही बलवान् है; हे युधिष्ठिर! और कुछ नहीं।

श्लोक 15 (9.31.15)

दैत्याश्च दानवाश्चैव राक्षसाः पार्थिवास्तथा । क्रियाभ्युपायैर्निहताः क्रियां तस्मात्समाचर ॥

daityāśca dānavāścaiva rākṣasāḥ pārthivāstathā | kriyābhyupāyairnihatāḥ kriyāṃ tasmātsamācara

दैत्य, दानव, राक्षस और राजा भी ऐसे ही उपायों से मारे गए हैं; इसलिए तुम भी कौशल का ही प्रयोग करो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 16 (9.31.16)

इत्युक्तो वासुदेवेन पाण्डवः संशितव्रतः । जलस्थं तं महाराज तव पुत्रं महाबलम् । अभ्यभाषत कौन्तेयः प्रहसन्निव भारत ॥

ityukto vāsudevena pāṇḍavaḥ saṃśitavrataḥ | jalasthaṃ taṃ mahārāja tava putraṃ mahābalam | abhyabhāṣata kaunteyaḥ prahasanniva bhārata

वासुदेव के ऐसा कहने पर दृढ़ व्रत वाले कुन्तीपुत्र पाण्डव ने, हे भारत! जल में स्थित आपके महाबली पुत्र से मुस्कराते हुए-से कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 17 (9.31.17)

सुयोधन किमर्थोऽयमारम्भोऽप्सु कृतस्त्वया । सर्वं क्षत्रं घातयित्वा स्वकुलं च विशाम्पते ॥

suyodhana kimartho'yamārambho'psu kṛtastvayā | sarvaṃ kṣatraṃ ghātayitvā svakulaṃ ca viśāmpate

"सुयोधन! हे विशाम्पते! सारे क्षत्रियवर्ग का और अपने कुल का विनाश कराकर तुमने जल में यह आयोजन क्यों किया है?

श्लोक 18 (9.31.18)

जलाशयं प्रविष्टोऽद्य वाञ्छञ्जीवितमात्मनः । उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व सहास्माभिः सुयोधन ॥

jalāśayaṃ praviṣṭo'dya vāñchañjīvitamātmanaḥ | uttiṣṭha rājanyudhyasva sahāsmābhiḥ suyodhana

अपने प्राण बचाने की इच्छा से तुम आज जल में घुस गए हो। राजन्! उठो और हमारे साथ युद्ध करो, सुयोधन!

श्लोक 19 (9.31.19)

स ते दर्पो नरश्रेष्ठ स च मानः क्व ते गतः । यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन्व्यवस्थितः ॥

sa te darpo naraśreṣṭha sa ca mānaḥ kva te gataḥ | yastvaṃ saṃstabhya salilaṃ bhīto rājanvyavasthitaḥ

नरश्रेष्ठ! तुम्हारा वह दर्प और वह अभिमान कहाँ चला गया? राजन्! तुम तो जल को स्तम्भित करके भयभीत होकर बैठे हो।

श्लोक 20 (9.31.20)

सर्वे त्वां शूर इत्येवं जना जल्पन्ति संसदि । व्यर्थं तद्भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशायिनः ॥

sarve tvāṃ śūra ityevaṃ janā jalpanti saṃsadi | vyarthaṃ tadbhavato manye śauryaṃ salilaśāyinaḥ

सभाओं में सब लोग तुम्हें शूर कहते हैं; पर अब जल में सोते हुए तुम्हारी वह शूरता मुझे व्यर्थ ही जान पड़ती है।

श्लोक 21 (9.31.21)

उत्तिष्ठ राजन्युध्यस्व क्षत्रियोऽसि कुलोद्भवः । कौरवेयो विशेषेण कुलं जन्म च संस्मर ॥

uttiṣṭha rājanyudhyasva kṣatriyo'si kulodbhavaḥ | kauraveyo viśeṣeṇa kulaṃ janma ca saṃsmara

राजन्! उठो और युद्ध करो। तुम उत्तम कुल में उत्पन्न क्षत्रिय हो, विशेषतः कौरव हो; अपने कुल और जन्म को स्मरण करो।

श्लोक 22 (9.31.22)

स कथं कौरवे वंशे प्रशंसञ्जन्म चात्मनः । युद्धात्त्रस्ततरस्तोयं प्रविश्य प्रतितिष्ठसि ॥

sa kathaṃ kaurave vaṃśe praśaṃsañjanma cātmanaḥ | yuddhāttrastatarastoyaṃ praviśya pratitiṣṭhasi

कौरव वंश में अपने जन्म की प्रशंसा करने वाले तुम युद्ध से इतने भयभीत होकर जल में घुसकर कैसे बैठे हो?

श्लोक 23 (9.31.23)

अयुद्धेन व्यवस्थानं नैष धर्मः सनातनः ॥

ayuddhena vyavasthānaṃ naiṣa dharmaḥ sanātanaḥ

युद्ध से अलग रहना सनातन धर्म नहीं है।

श्लोक 24 (9.31.24)

अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं रणे राजन्पलायनम् । कथं पारमगत्वा हि युद्धे त्वं वै जिजीविषुः ॥

anāryajuṣṭamasvargyaṃ raṇe rājanpalāyanam | kathaṃ pāramagatvā hi yuddhe tvaṃ vai jijīviṣuḥ

राजन्! रण से भागना आर्यों के योग्य नहीं है और स्वर्ग से वञ्चित करने वाला है। युद्ध का पार पाए बिना तुम जीवित रहना कैसे चाहते हो?

श्लोक 25 (9.31.25)

इमान्निपतितान्दृष्ट्वा पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄंस्तथा । सम्बन्धिनो वयस्यांश्च मातुलान्बान्धवांस्तथा । घातयित्वा कथं तात ह्रदे तिष्ठसि साम्प्रतम् ॥

imānnipatitāndṛṣṭvā putrānbhrātṝnpitṝṃstathā | sambandhino vayasyāṃśca mātulānbāndhavāṃstathā | ghātayitvā kathaṃ tāta hrade tiṣṭhasi sāmpratam

अपने पुत्रों, भाइयों और पिताओं को गिरा हुआ देखकर, तथा सम्बन्धियों, मित्रों, मामाओं और बन्धुओं को मरवाकर, हे तात! तुम अब सरोवर में कैसे पड़े हो?

श्लोक 26 (9.31.26)

शूरमानी न शूरस्त्वं मृषा वदसि भारत । शूरोऽहमिति दुर्बुद्धे सर्वलोकस्य शृण्वतः ॥

śūramānī na śūrastvaṃ mṛṣā vadasi bhārata | śūro'hamiti durbuddhe sarvalokasya śṛṇvataḥ

तुम अपने को शूर मानते हो, पर शूर हो नहीं; हे भारत! सब लोगों के सुनते "मैं शूर हूँ" ऐसा कहकर तुम झूठ बोलते हो, दुर्बुद्धि!

श्लोक 27 (9.31.27)

न हि शूराः पलायन्ते शत्रून्दृष्ट्वा कथञ्चन । ब्रूहि वा त्वं यया वृत्त्या शूर त्यजसि सङ्गरम् ॥

na hi śūrāḥ palāyante śatrūndṛṣṭvā kathañcana | brūhi vā tvaṃ yayā vṛttyā śūra tyajasi saṅgaram

शूर वीर शत्रुओं को देखकर किसी भी दशा में भागते नहीं। हे शूर! बताओ, तुम किस आधार पर युद्ध छोड़ रहे हो?

श्लोक 28 (9.31.28)

स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व विहाय भयमात्मनः । घातयित्वा सर्वसैन्यं भ्रातॄंश्चैव सुयोधन ॥

sa tvamuttiṣṭha yudhyasva vihāya bhayamātmanaḥ | ghātayitvā sarvasainyaṃ bhrātṝṃścaiva suyodhana

सुयोधन! अपनी सारी सेना और भाइयों को मरवाकर अब भय छोड़कर उठो और युद्ध करो।

श्लोक 29 (9.31.29)

नेदानीं जीविते बुद्धिः कार्या धर्मचिकीर्षया । क्षत्रधर्ममुपाश्रित्य त्वद्विधेन सुयोधन ॥

nedānīṃ jīvite buddhiḥ kāryā dharmacikīrṣayā | kṣatradharmamupāśritya tvadvidhena suyodhana

सुयोधन! अब क्षत्रिय-धर्म का आश्रय लेने वाले तुम जैसे पुरुष को धर्म पालन की इच्छा के बहाने अपने प्राण बचाने में मन नहीं लगाना चाहिए।

श्लोक 30 (9.31.30)

यत्तु कर्णमुपाश्रित्य शकुनिं चापि सौबलम् । दुःशासनं च मोहात्त्वमात्मानं नावबुद्धवान् ॥

yattu karṇamupāśritya śakuniṃ cāpi saubalam | duḥśāsanaṃ ca mohāttvamātmānaṃ nāvabuddhavān

क्योंकि तुमने मोह में पड़कर कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि और दुःशासन का आश्रय लिया और अपने आपको नहीं पहचाना,

श्लोक 31 (9.31.31)

तत्पापं सुमहत्कृत्वा प्रतियुध्यस्व भारत । कथं हि त्वद्विधो मोहाद्रोचयेत पलायनम् ॥

tatpāpaṃ sumahatkṛtvā pratiyudhyasva bhārata | kathaṃ hi tvadvidho mohādrocayeta palāyanam

इस बड़े पाप को करके अब, हे भारत! सामना करो। तुम जैसा पुरुष मोहवश भाग जाना कैसे पसन्द कर सकता है?

श्लोक 32 (9.31.32)

क्व ते तत्पौरुषं यातं क्व च मानः सुयोधन । क्व च विक्रान्तता याता क्व च विस्फूर्जितं महत् ॥

kva te tatpauruṣaṃ yātaṃ kva ca mānaḥ suyodhana | kva ca vikrāntatā yātā kva ca visphūrjitaṃ mahat

सुयोधन! तुम्हारा वह पौरुष कहाँ गया और वह अभिमान कहाँ गया? तुम्हारा पराक्रम कहाँ गया और वह भारी गर्जन कहाँ गया?

श्लोक 33 (9.31.33)

क्व ते कृतास्त्रता याता किं नु शेषे जलाशये । स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व क्षत्रधर्मेण भारत ॥

kva te kṛtāstratā yātā kiṃ nu śeṣe jalāśaye | sa tvamuttiṣṭha yudhyasva kṣatradharmeṇa bhārata

तुम्हारी अस्त्र-कुशलता कहाँ गई कि तुम जल में पड़े हो? हे भारत! उठो और क्षत्रिय-धर्म के अनुसार युद्ध करो।

श्लोक 34 (9.31.34)

अस्मांस्तु वा पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निहतोऽस्माभिर्भूमौ स्वप्स्यसि भारत ॥

asmāṃstu vā parājitya praśādhi pṛthivīmimām | athavā nihato'smābhirbhūmau svapsyasi bhārata

या तो हमें हराकर इस पृथ्वी का शासन करो, या हमारे हाथों मारे जाकर, हे भारत! भूमि पर सो जाओ।

श्लोक 35 (9.31.35)

एष ते परमो धर्मः सृष्टो धात्रा महात्मना । तं कुरुष्व यथातथ्यं पौरुषे स्व व्यवस्थितः ॥

eṣa te paramo dharmaḥ sṛṣṭo dhātrā mahātmanā | taṃ kuruṣva yathātathyaṃ pauruṣe sva vyavasthitaḥ

यही तुम्हारा सबसे बड़ा धर्म है, जिसे महात्मा विधाता ने बनाया है। अपने पौरुष में दृढ़ रहकर उसका ठीक-ठीक पालन करो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 36 (9.31.36)

एवमुक्तो महाराज धर्मपुत्रेण धीमता । सलिलस्थस्तव सुत इदं वचनमब्रवीत् ॥

evamukto mahārāja dharmaputreṇa dhīmatā | salilasthastava suta idaṃ vacanamabravīt

हे महाराज! बुद्धिमान धर्मपुत्र के ऐसा कहने पर जल में स्थित आपका पुत्र यह वचन बोला।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 37 (9.31.37)

नैतच्चित्रं महाराज यद्भीः प्राणिनमाविशेत् । न च प्राणभयाद्भीतो व्यपयातोऽस्मि भारत ॥

naitaccitraṃ mahārāja yadbhīḥ prāṇinamāviśet | na ca prāṇabhayādbhīto vyapayāto'smi bhārata

"महाराज! प्राणी के मन में भय का आ जाना कोई आश्चर्य नहीं है। और हे भारत! मैं प्राणों के भय से नहीं भागा हूँ।

श्लोक 38 (9.31.38)

अरथश्चानिषङ्गी च निहतः पार्ष्णिसारथिः । एकश्चाप्यगणः सङ्ख्ये प्रत्याश्वासमरोचयम् ॥

arathaścāniṣaṅgī ca nihataḥ pārṣṇisārathiḥ | ekaścāpyagaṇaḥ saṅkhye pratyāśvāsamarocayam

मेरे पास न रथ था, न तरकस; मेरा पार्ष्णि-सारथि मारा जा चुका था; अकेला और बिना सहायकों के युद्ध में मैंने थोड़ा दम लेना चाहा।

श्लोक 39 (9.31.39)

न प्राणहेतोर्न भयान्न विषादाद्विशाम्पते । इदमम्भः प्रविष्टोऽस्मि श्रमात्त्विदमनुष्ठितम् ॥

na prāṇahetorna bhayānna viṣādādviśāmpate | idamambhaḥ praviṣṭo'smi śramāttvidamanuṣṭhitam

हे विशाम्पते! मैं न प्राण बचाने के लिए, न भय से, न विषाद से इस जल में घुसा हूँ; मैंने यह थकान के कारण किया है।

श्लोक 40 (9.31.40)

त्वं चाश्वसिहि कौन्तेय ये चाप्यनुगतास्तव । अहमुत्थाय वः सर्वान्प्रतियोत्स्यामि संयुगे ॥

tvaṃ cāśvasihi kaunteya ye cāpyanugatāstava | ahamutthāya vaḥ sarvānpratiyotsyāmi saṃyuge

हे कुन्तीपुत्र! तुम भी विश्राम कर लो और तुम्हारे साथ जो अनुयायी हैं वे भी। मैं उठकर तुम सबसे युद्ध में लड़ूँगा।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 41 (9.31.41)

आश्वस्ता एव सर्वे स्म चिरं त्वां मृगयामहे । तदिदानीं समुत्तिष्ठ युध्यस्वेह सुयोधन ॥

āśvastā eva sarve sma ciraṃ tvāṃ mṛgayāmahe | tadidānīṃ samuttiṣṭha yudhyasveha suyodhana

युधिष्ठिर ने कहा, "हम सब तो विश्राम पा ही चुके हैं; बहुत समय से तुम्हें खोज रहे हैं। इसलिए सुयोधन! अब उठो और यहीं युद्ध करो।

श्लोक 42 (9.31.42)

हत्वा वा समरे पार्थान्स्फीतं राज्यमवाप्नुहि । निहतो वा रणेऽस्माभिर्वीरलोकमवाप्स्यसि ॥

hatvā vā samare pārthānsphītaṃ rājyamavāpnuhi | nihato vā raṇe'smābhirvīralokamavāpsyasi

या तो युद्ध में पार्थों को मारकर समृद्ध राज्य प्राप्त करो, या हमारे हाथों रण में मारे जाकर वीरों का लोक पाओ।"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 43 (9.31.43)

यदर्थं राज्यमिच्छामि कुरूणां कुरुनन्दन । त इमे निहताः सर्वे भ्रातरो मे जनेश्वर ॥

yadarthaṃ rājyamicchāmi kurūṇāṃ kurunandana | ta ime nihatāḥ sarve bhrātaro me janeśvara

दुर्योधन ने कहा, "हे कुरुनन्दन! जिनके लिए मैं कुरुओं का राज्य चाहता था, वे मेरे सब भाई मारे जा चुके हैं, हे जनेश्वर!

श्लोक 44 (9.31.44)

क्षीणरत्नां च पृथिवीं हतक्षत्रियपुङ्गवाम् । न ह्युत्सहाम्यहं भोक्तुं विधवामिव योषितम् ॥

kṣīṇaratnāṃ ca pṛthivīṃ hatakṣatriyapuṅgavām | na hyutsahāmyahaṃ bhoktuṃ vidhavāmiva yoṣitam

रत्नों से रहित और श्रेष्ठ क्षत्रियों के मारे जाने से विधवा स्त्री के समान बनी हुई इस पृथ्वी का मैं भोग नहीं कर सकता।

श्लोक 45 (9.31.45)

अद्यापि त्वहमाशंसे त्वां विजेतुं युधिष्ठिर । भङ्क्त्वा पाञ्चालपाण्डूनामुत्साहं भरतर्षभ ॥

adyāpi tvahamāśaṃse tvāṃ vijetuṃ yudhiṣṭhira | bhaṅktvā pāñcālapāṇḍūnāmutsāhaṃ bharatarṣabha

हे युधिष्ठिर! हे भरतश्रेष्ठ! पाञ्चालों और पाण्डवों का उत्साह तोड़कर मैं अब भी तुम्हें जीतने की आशा रखता हूँ।

श्लोक 46 (9.31.46)

न त्विदानीमहं मन्ये कार्यं युद्धेन कर्हिचित् । द्रोणे कर्णे च संशान्ते निहते च पितामहे ॥

na tvidānīmahaṃ manye kāryaṃ yuddhena karhicit | droṇe karṇe ca saṃśānte nihate ca pitāmahe

परन्तु अब मैं युद्ध से कोई प्रयोजन नहीं देखता; द्रोण और कर्ण शान्त हो गए हैं और पितामह मारे जा चुके हैं।

श्लोक 47 (9.31.47)

अस्त्विदानीमियं राजन्केवला पृथिवी तव । असहायो हि को राजा राज्यमिच्छेत्प्रशासितुम् ॥

astvidānīmiyaṃ rājankevalā pṛthivī tava | asahāyo hi ko rājā rājyamicchetpraśāsitum

राजन्! अब यह पृथ्वी अकेली तुम्हारी ही हो जाए। बिना सहायकों के कौन राजा राज्य पर शासन करना चाहेगा?

श्लोक 48 (9.31.48)

सुहृदस्तादृशान्हत्वा पुत्रान्भ्रातॄन्पितॄनपि । भवद्भिश्च हृते राज्ये को नु जीवेत मादृशः ॥

suhṛdastādṛśānhatvā putrānbhrātṝnpitṝnapi | bhavadbhiśca hṛte rājye ko nu jīveta mādṛśaḥ

ऐसे मित्रों, पुत्रों, भाइयों और पिताओं के मारे जाने तथा तुम्हारे द्वारा राज्य छीन लिए जाने पर मुझ जैसा कौन जीवित रहेगा?

श्लोक 49 (9.31.49)

अहं वनं गमिष्यामि ह्यजिनैः प्रतिवासितः । रतिर्हि नास्ति मे राज्ये हतपक्षस्य भारत ॥

ahaṃ vanaṃ gamiṣyāmi hyajinaiḥ prativāsitaḥ | ratirhi nāsti me rājye hatapakṣasya bhārata

मैं मृगचर्म पहनकर वन में चला जाऊँगा। हे भारत! मेरा पक्ष मारा जा चुका है, इसलिए मुझे राज्य में कोई आनन्द नहीं है।

श्लोक 50 (9.31.50)

हतबान्धवभूयिष्ठा हताश्वा हतकुञ्जरा । एषा ते पृथिवी राजन्भुङ्क्षैनां विगतज्वरः ॥

hatabāndhavabhūyiṣṭhā hatāśvā hatakuñjarā | eṣā te pṛthivī rājanbhuṅkṣaināṃ vigatajvaraḥ

राजन्! यह तुम्हारी पृथ्वी है, जिसके अधिकांश बन्धु मारे जा चुके हैं और घोड़े-हाथी नष्ट हो चुके हैं। इसे चिन्ता-रहित होकर भोगो।

श्लोक 51 (9.31.51)

वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी । न हि मे निर्जनस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो ॥

vanameva gamiṣyāmi vasāno mṛgacarmaṇī | na hi me nirjanasyāsti jīvite'dya spṛhā vibho

मैं मृगचर्म पहनकर वन में ही चला जाऊँगा; हे विभो! अपने जनों से रहित होकर अब मुझे जीवन की कोई इच्छा नहीं है।

श्लोक 52 (9.31.52)

गच्छ त्वं भुङ्क्ष राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम् । हतयोधां नष्टरत्नां शीर्णक्षत्रां यथासुखम् ॥

gaccha tvaṃ bhuṅkṣa rājendra pṛthivīṃ nihateśvarām | hatayodhāṃ naṣṭaratnāṃ śīrṇakṣatrāṃ yathāsukham

हे राजेन्द्र! जाओ और जिसके स्वामी मारे गए, योद्धा नष्ट हो गए, रत्न खो गए और क्षत्रिय सूख गए, उस पृथ्वी को इच्छानुसार भोगो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 53 (9.31.53)

दुर्योधनं तव सुतं सलिलस्थं महायशाः । श्रुत्वा तु करुणं वाक्यमभाषत युधिष्ठिरः ॥

duryodhanaṃ tava sutaṃ salilasthaṃ mahāyaśāḥ | śrutvā tu karuṇaṃ vākyamabhāṣata yudhiṣṭhiraḥ

जल में स्थित आपके पुत्र दुर्योधन की करुण बात सुनकर महायशस्वी युधिष्ठिर ने कहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 54 (9.31.54)

आर्तप्रलापान्मा तात सलिलस्थः प्रभाषथाः । नैतन्मनसि मे राजन्वाशितं शकुनेरिव ॥

ārtapralāpānmā tāta salilasthaḥ prabhāṣathāḥ | naitanmanasi me rājanvāśitaṃ śakuneriva

"तात! जल में रहकर दुःख-भरा प्रलाप मत करो। राजन्! पक्षी की चहचहाहट के समान तुम्हारी यह बात मेरे मन में स्थान नहीं पाती।

श्लोक 55 (9.31.55)

यदि वापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय सुयोधन । नाहमिच्छेयमवनिं त्वया दत्तां प्रशासितुम् ॥

yadi vāpi samarthaḥ syāstvaṃ dānāya suyodhana | nāhamiccheyamavaniṃ tvayā dattāṃ praśāsitum

सुयोधन! यदि तुम देने में समर्थ भी होते, तो भी मैं तुम्हारी दी हुई पृथ्वी पर शासन करना नहीं चाहता।

श्लोक 56 (9.31.56)

अधर्मेण न गृह्णीयां त्वया दत्तां महीमिमाम् । न हि धर्मः स्मृतो राजन्क्षत्रियस्य प्रतिग्रहः ॥

adharmeṇa na gṛhṇīyāṃ tvayā dattāṃ mahīmimām | na hi dharmaḥ smṛto rājankṣatriyasya pratigrahaḥ

मैं तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वी को अधर्म से ग्रहण नहीं करूँगा; क्योंकि राजन्! दान लेना क्षत्रिय का धर्म नहीं माना गया है।

श्लोक 57 (9.31.57)

त्वया दत्तां न चेच्छेयं पृथिवीमखिलामहम् । त्वां तु युद्धे विनिर्जित्य भोक्ताऽस्मि वसुधामिमाम् ॥

tvayā dattāṃ na ceccheyaṃ pṛthivīmakhilāmaham | tvāṃ tu yuddhe vinirjitya bhoktā'smi vasudhāmimām

तुम्हारी दी हुई सारी पृथ्वी मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हें युद्ध में जीतकर ही इस पृथ्वी का भोग करूँगा।

श्लोक 58 (9.31.58)

अनीश्वरश्च पृथिवीं कथं त्वं दातुमिच्छसि । त्वयेयं पृथिवी राजन्किं न दत्ता तदैव हि ॥

anīśvaraśca pṛthivīṃ kathaṃ tvaṃ dātumicchasi | tvayeyaṃ pṛthivī rājankiṃ na dattā tadaiva hi

और जो पृथ्वी का स्वामी नहीं रहा, वह तुम इसे देना कैसे चाहते हो? तब ही तुमने यह पृथ्वी क्यों नहीं दे दी?

श्लोक 59 (9.31.59)

धर्मतो याचमानानां प्रशमार्थं कुलस्य नः । वार्ष्णेयं प्रथमं राजन्प्रत्याख्याय महाबलम् ॥

dharmato yācamānānāṃ praśamārthaṃ kulasya naḥ | vārṣṇeyaṃ prathamaṃ rājanpratyākhyāya mahābalam

राजन्! जब हमने धर्मपूर्वक अपने कुल की शान्ति के लिए माँगा था, तब तुमने महाबली वार्ष्णेय को पहले ही लौटा दिया था।

श्लोक 60 (9.31.60)

किमिदानीं ददासि त्वं को हि ते चित्तविभ्रमः । अभियुक्तस्तु को राजा दातुमिच्छेद्धि मेदिनीं ॥

kimidānīṃ dadāsi tvaṃ ko hi te cittavibhramaḥ | abhiyuktastu ko rājā dātumiccheddhi medinīṃ

अब तुम क्या दे रहे हो? तुम्हारे चित्त को कैसा भ्रम हो गया है? शत्रुओं से घिरा हुआ कौन राजा पृथ्वी देना चाहेगा?

श्लोक 61 (9.31.61)

न त्वमद्य महीं दातुमीशः कौरवनन्दन । आच्छेत्तुं वा बलाद्राजन्स कथं दातुमिच्छसि ॥

na tvamadya mahīṃ dātumīśaḥ kauravanandana | ācchettuṃ vā balādrājansa kathaṃ dātumicchasi

हे कौरवनन्दन! आज तुम पृथ्वी देने के अधिकारी नहीं हो और बल से उसे छीन लेने में भी समर्थ नहीं हो; राजन्! फिर तुम उसे कैसे देना चाहते हो?

श्लोक 62 (9.31.62)

मां तु निर्जित्य सङ्ग्रामे पालयेमां वसुन्धराम् । सूच्यग्रेणापि यद्भूमेरपि भिद्येत भारत ॥

māṃ tu nirjitya saṅgrāme pālayemāṃ vasundharām | sūcyagreṇāpi yadbhūmerapi bhidyeta bhārata

पहले मुझे युद्ध में जीतकर इस पृथ्वी का पालन करो। हे भारत! सुई की नोक भर भी जितनी भूमि बिंध सकती है,

श्लोक 63 (9.31.63)

तन्मात्रमपि तन्मह्यं न ददाति पुरा भवान् । स कथं पृथिवीमेतां प्रददासि विशाम्पते ॥

tanmātramapi tanmahyaṃ na dadāti purā bhavān | sa kathaṃ pṛthivīmetāṃ pradadāsi viśāmpate

उतनी भी तुमने पहले मुझे नहीं दी। हे विशाम्पते! फिर अब इस सारी पृथ्वी को कैसे दे रहे हो?

श्लोक 64 (9.31.64)

सूच्यग्रं नात्यजः पूर्वं स कथं त्यजसि क्षितिम् ॥

sūcyagraṃ nātyajaḥ pūrvaṃ sa kathaṃ tyajasi kṣitim

तुमने पहले सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं छोड़ी थी; अब पूरी पृथ्वी कैसे छोड़ रहे हो?

श्लोक 65 (9.31.65)

एवमैश्वर्यमासाद्य प्रशास्य पृथिवीमिमाम् । को हि मूढो व्यवस्येत शत्रोर्दातुं वसुन्धराम् ॥

evamaiśvaryamāsādya praśāsya pṛthivīmimām | ko hi mūḍho vyavasyeta śatrordātuṃ vasundharām

ऐसा ऐश्वर्य पाकर और इस पृथ्वी पर शासन करके कौन मूर्ख शत्रु को भूमि देने का निश्चय करेगा?

श्लोक 66 (9.31.66)

त्वं तु केवलमौर्ख्येण विमूढो नावबुध्यसे । पृथिवीं दातुकामोऽपि जीवंस्त्वं नैव मोक्ष्यसे ॥

tvaṃ tu kevalamaurkhyeṇa vimūḍho nāvabudhyase | pṛthivīṃ dātukāmo'pi jīvaṃstvaṃ naiva mokṣyase

परन्तु तुम केवल मूर्खता के कारण मोह में पड़े हो और समझते नहीं; पृथ्वी देना चाहने पर भी तुम जीवित नहीं छूटोगे।

श्लोक 67 (9.31.67)

अस्मान्वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निहतोऽस्माभिर्व्रज लोकाननुत्तमान् ॥

asmānvā tvaṃ parājitya praśādhi pṛthivīmimām | athavā nihato'smābhirvraja lokānanuttamān

या तो हमें हराकर इस पृथ्वी पर शासन करो, या हमारे हाथों मारे जाकर उत्तम लोकों को जाओ।

श्लोक 68 (9.31.68)

आवयोर्जीवतो राजन्मयि च त्वयि च ध्रुवम् । संशयः सर्वभूतानां विजये नौ भविष्यति ॥

āvayorjīvato rājanmayi ca tvayi ca dhruvam | saṃśayaḥ sarvabhūtānāṃ vijaye nau bhaviṣyati

राजन्! जब तक हम दोनों, मैं और तुम, जीवित हैं, तब तक हम दोनों की विजय के विषय में सब प्राणियों को निश्चय ही संदेह बना रहेगा।

श्लोक 69 (9.31.69)

जीवितं त्वयि दुष्प्रापं मयि यत्परिवर्तते । जीवयेयमहं कामं न तु त्वं जीवितुं क्षमः ॥

jīvitaṃ tvayi duṣprāpaṃ mayi yatparivartate | jīvayeyamahaṃ kāmaṃ na tu tvaṃ jīvituṃ kṣamaḥ

तुम्हारा जीवन बचा रहना कठिन है, क्योंकि वह मुझ पर ही निर्भर है; मैं चाहूँ तो तुम्हें जीवित रख सकता हूँ, पर तुम जीने के योग्य नहीं हो।

श्लोक 70 (9.31.70)

दहने हि कृतो यत्नस्त्वयाऽस्मासु विशेषतः । आशीविषैर्विषैश्चापि जले चापि प्रवेशनैः । त्वया विनिकृता राजन्राज्यस्य हरणेन च ॥

dahane hi kṛto yatnastvayā'smāsu viśeṣataḥ | āśīviṣairviṣaiścāpi jale cāpi praveśanaiḥ | tvayā vinikṛtā rājanrājyasya haraṇena ca

तुमने हमें विशेष रूप से जला डालने का यत्न किया; विषैले सर्पों, विषों और जल में डुबोने के प्रयत्नों से तथा हमारा राज्य हर लेने से, राजन्! तुमने हमारे साथ छल किया,

श्लोक 71 (9.31.71)

अप्रियाणां च वचनैर्द्रौपद्याः कर्षणेन च । एतस्मात्कारणात्पाप जीवितं न विद्यते ॥

apriyāṇāṃ ca vacanairdraupadyāḥ karṣaṇena ca | etasmātkāraṇātpāpa jīvitaṃ na vidyate

और अपमान-भरे वचनों से तथा द्रौपदी के केश खींचने से भी। इसी कारण, हे पापी! अब तुम्हारा जीवन नहीं रह सकता।

श्लोक 72 (9.31.72)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युध्यस्व युद्धे श्रेयो भविष्यति ॥

uttiṣṭhottiṣṭha yudhyasva yuddhe śreyo bhaviṣyati

उठो, उठो और युद्ध करो! युद्ध में ही तुम्हारा कल्याण होगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 73 (9.31.73)

एवं तु विविधा वाचो जययुक्ताः पुनःपुनः । कीर्तयन्ति स्म ते वीरास्तत्रतत्र जनाधिप ॥

evaṃ tu vividhā vāco jayayuktāḥ punaḥpunaḥ | kīrtayanti sma te vīrāstatratatra janādhipa

हे जनाधिप! इस प्रकार वे वीर विजय के विश्वास से भरी हुई अनेक प्रकार की बातें इधर-उधर बार-बार कहते रहे।

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