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शल्य पर्व · अध्याय 32

दुर्योधन का सरोवर से उठना

धृतराष्ट्र पूछते हैं कि उनके अभिमानी पुत्र ने पाण्डवों के ताने कैसे सहे, और सञ्जय उन्हें बताते हैं। जल में खड़ा दुर्योधन कहता है कि वह अकेला और निःशस्त्र है, फिर भी सबसे लड़ेगा। युधिष्ठिर उसे अपनी पसंद का शस्त्र चुनने की छूट देते हैं और कहते हैं कि वह किसी एक को भी मार दे तो राज्य उसका होगा; दुर्योधन गदा और एक-एक करके युद्ध माँगता है। ताने सुनकर वह गदा लिए जल से बाहर निकलता है, स्वर्णमय कवच धारण करता है और किसी एक पाण्डव को सामने आने के लिए ललकारता है।

अध्याय 31अध्याय-सूचीअध्याय 33

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 1 (9.32.1)

एवं सन्तर्ज्यमानस्तु मम पुत्रो महीपतिः । प्रकृत्या मन्युमान्वीरः कथमासीत्परन्तपः ॥

evaṃ santarjyamānastu mama putro mahīpatiḥ | prakṛtyā manyumānvīraḥ kathamāsītparantapaḥ

"स्वभाव से अभिमानी और क्रोधी, शत्रुओं को तपाने वाला मेरा वह वीर पुत्र, राजा दुर्योधन, इस प्रकार धमकाए जाने पर कैसा रहा?"

श्लोक 2 (9.32.2)

न हि सन्तर्जना तेन श्रुतपूर्वा कथञ्चन । राजभावेन मान्यश्च सर्वलोकस्य सोऽभवत् ॥

na hi santarjanā tena śrutapūrvā kathañcana | rājabhāvena mānyaśca sarvalokasya so'bhavat

"उसे पहले कभी किसी ने इस तरह नहीं धमकाया था, और राजा होने के कारण सारा संसार उसका सम्मान करता था।"

श्लोक 3 (9.32.3)

यस्यातपत्रच्छायापि स्वका भानोस्तथा प्रभा । खेदायैवाभिमानित्वात्सहेत्सैवं कथं गिरः ॥

yasyātapatracchāyāpi svakā bhānostathā prabhā | khedāyaivābhimānitvātsahetsaivaṃ kathaṃ giraḥ

"जिसके अभिमान के कारण अपने ही छत्र की छाया और सूर्य की प्रभा भी केवल कष्ट देती थी, वह ऐसी बातें कैसे सह सकता था?"

श्लोक 4 (9.32.4)

इयं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम् । प्रसादाद्भ्रियते यस्य प्रत्यक्षं तव सञ्जय ॥

iyaṃ ca pṛthivī sarvā samlecchāṭavikā bhṛśam | prasādādbhriyate yasya pratyakṣaṃ tava sañjaya

"म्लेच्छों और वनों सहित यह समूची पृथ्वी जिसकी कृपा से टिकी हुई है, हे सञ्जय, यह तुमने अपनी आँखों से देखा है।"

श्लोक 5 (9.32.5)

स तथा तर्ज्यमानस्तु पाण्डुपुत्रैर्विशेषतः । विहीनश्च स्वकैर्भृत्यैर्निर्जिते चावृतो भृशम् ॥

sa tathā tarjyamānastu pāṇḍuputrairviśeṣataḥ | vihīnaśca svakairbhṛtyairnirjite cāvṛto bhṛśam

"पाण्डु के पुत्रों द्वारा विशेष रूप से इस तरह धमकाया गया, अपने सेवकों से रहित, और पराजित होकर चारों ओर से घिरा हुआ,"

श्लोक 6 (9.32.6)

स श्रुत्वा कटुका वाचो जययुक्ताः पुनःपुनः । किमब्रवीत्पाण्डवेयांस्तन्ममाचक्ष्व सञ्जय ॥

sa śrutvā kaṭukā vāco jayayuktāḥ punaḥpunaḥ | kimabravītpāṇḍaveyāṃstanmamācakṣva sañjaya

"वह उन विजय-भरी कठोर बातों को बार-बार सुनकर पाण्डवों से क्या बोला? हे सञ्जय, मुझे यह बताओ।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 7 (9.32.7)

तर्ज्यमानस्तदा राजन्नुदकस्थस्तवात्मजः । युधिष्ठिरेण राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितेन ह ॥

tarjyamānastadā rājannudakasthastavātmajaḥ | yudhiṣṭhireṇa rājendra bhrātṛbhiḥ sahitena ha

हे राजन्, जल में खड़े आपके पुत्र को जब भाइयों सहित युधिष्ठिर इस प्रकार फटकार रहे थे, तब हे राजेन्द्र,

श्लोक 8 (9.32.8)

श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो नराधिपः । दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनःपुनः ॥

śrutvā sa kaṭukā vāco viṣamastho narādhipaḥ | dīrghamuṣṇaṃ ca niḥśvasya salilasthaḥ punaḥpunaḥ

उन कठोर बातों को सुनकर विपत्ति में पड़े उस नरेश ने जल में खड़े-खड़े बार-बार लम्बी और गरम साँसें लीं,

श्लोक 9 (9.32.9)

सलिलान्तर्गतो राजा धुन्वन्हस्तौ पुनःपुनः । मनश्चकार युद्धाय राजानं चाभ्यभाषत ॥

salilāntargato rājā dhunvanhastau punaḥpunaḥ | manaścakāra yuddhāya rājānaṃ cābhyabhāṣata

और जल के भीतर बार-बार हाथ झटकते हुए राजा ने युद्ध का निश्चय किया तथा राजा युधिष्ठिर से कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 10 (9.32.10)

यूयं ससुहृदः पार्थाः सर्वे सरथवाहनाः । अहमेकः परिद्यूनो विरथो हतवाहनः ॥

yūyaṃ sasuhṛdaḥ pārthāḥ sarve sarathavāhanāḥ | ahamekaḥ paridyūno viratho hatavāhanaḥ

"तुम सब पाण्डवों के पास मित्र, रथ और वाहन हैं; मैं अकेला हूँ, थका हुआ हूँ, मेरे पास न रथ है, न वाहन — मेरे वाहन मारे जा चुके हैं।"

श्लोक 11 (9.32.11)

आत्तशस्त्रै रथोपेतैर्बहुभिः परिवारितः । कथमेकः पदातिः सन्नशस्त्रो योद्धुमुत्सहे ॥

āttaśastrai rathopetairbahubhiḥ parivāritaḥ | kathamekaḥ padātiḥ sannaśastro yoddhumutsahe

"शस्त्र उठाए और रथों पर चढ़े अनेक योद्धाओं से घिरा मैं अकेला, पैदल और निःशस्त्र होकर लड़ने का साहस कैसे करूँ?"

श्लोक 12 (9.32.12)

एकैकशश्च मां यूयं योधयध्वं युधिष्ठिर । न ह्येको बहुभिर्वीरैर्न्याय्यो योधयितुं युधि ॥

ekaikaśaśca māṃ yūyaṃ yodhayadhvaṃ yudhiṣṭhira | na hyeko bahubhirvīrairnyāyyo yodhayituṃ yudhi

"हे युधिष्ठिर, तुम लोग मुझसे एक-एक करके लड़ो। युद्ध में एक अकेले से बहुत-से वीरों का लड़ना उचित नहीं है।"

श्लोक 13 (9.32.13)

विशेषतो विकवचः श्रान्तश्चापत्समाश्रितः । भृशं विक्षतगात्रश्च श्रान्तवाहनसैनिकः ॥

viśeṣato vikavacaḥ śrāntaścāpatsamāśritaḥ | bhṛśaṃ vikṣatagātraśca śrāntavāhanasainikaḥ

"विशेषकर मेरे पास कवच नहीं है, मैं थका हुआ और संकट में पड़ा हूँ, मेरा शरीर बुरी तरह घायल है, और मेरे वाहन तथा सैनिक थक चुके हैं।"

श्लोक 14 (9.32.14)

न मे त्वत्तो भयं राजन्न च पार्थाद्वृकोदरात् । फल्गुनाद्वासुदेवाद्वा पाञ्चालेभ्योऽथवा पुनः ॥

na me tvatto bhayaṃ rājanna ca pārthādvṛkodarāt | phalgunādvāsudevādvā pāñcālebhyo'thavā punaḥ

"हे राजन्, मुझे तुमसे भय नहीं है, न पृथापुत्र वृकोदर से, न फल्गुन से, न वासुदेव से, और न पाञ्चालों से ही,"

श्लोक 15 (9.32.15)

यमाभ्यां युयुधानाद्वा ये चान्ये तव सैनिकाः । एकः सर्वानहं क्रुद्धो वारयिष्ये युधि स्थितः ॥

yamābhyāṃ yuyudhānādvā ye cānye tava sainikāḥ | ekaḥ sarvānahaṃ kruddho vārayiṣye yudhi sthitaḥ

"न दोनों जुड़वाँ भाइयों से, न युयुधान से, और न तुम्हारे अन्य किसी सैनिक से। क्रोध में भरकर मैं अकेला युद्धभूमि में खड़ा रहकर उन सबको रोक लूँगा।"

श्लोक 16 (9.32.16)

धर्ममूला सतां कीर्तिर्मनुष्याणां जनाधिप । धर्मं चैवेह कीर्तिं च पालयन्प्रब्रवीम्यहम् ॥

dharmamūlā satāṃ kīrtirmanuṣyāṇāṃ janādhipa | dharmaṃ caiveha kīrtiṃ ca pālayanprabravīmyaham

"हे जनाधिप, सज्जनों की कीर्ति धर्म पर ही टिकी होती है। इस लोक में धर्म और कीर्ति की रक्षा करता हुआ मैं यह कहता हूँ —"

श्लोक 17 (9.32.17)

अहमुत्थाय सर्वान्वै प्रतियोत्स्यामि संयुगे । अन्वभ्याशं गतान्सर्वान्निहनिष्यामि भारत ॥

ahamutthāya sarvānvai pratiyotsyāmi saṃyuge | anvabhyāśaṃ gatānsarvānnihaniṣyāmi bhārata

"मैं उठकर युद्ध में तुम सबका सामना करूँगा; हे भारत, जो भी मेरी पहुँच में आएगा, उस हर किसी को मैं मार डालूँगा।"

श्लोक 18 (9.32.18)

अद्य वः सरथान्साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन् । नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये ॥

adya vaḥ sarathānsāśvānaśastro viratho'pi san | nakṣatrāṇīva sarvāṇi savitā rātrisaṃkṣaye

"आज मेरे पास न शस्त्र है, न रथ, फिर भी जैसे रात बीतने पर सूर्य सारे नक्षत्रों को बुझा देता है, वैसे ही मैं रथों और घोड़ों सहित तुम्हें नष्ट कर दूँगा,"

श्लोक 19 (9.32.19)

तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवाः । अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनां ॥

tejasā nāśayiṣyāmi sthirībhavata pāṇḍavāḥ | adyānṛṇyaṃ gamiṣyāmi kṣatriyāṇāṃ yaśasvināṃ

"अपने ही तेज से। हे पाण्डवो, डटे रहो! आज मैं उन यशस्वी क्षत्रियों के ऋण से उऋण हो जाऊँगा —"

श्लोक 20 (9.32.20)

बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मनः । जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयोः ॥

bāhlīkadroṇabhīṣmāṇāṃ karṇasya ca mahātmanaḥ | jayadrathasya śūrasya bhagadattasya cobhayoḥ

"बाह्लीक, द्रोण और भीष्म के, महात्मा कर्ण के; वीर जयद्रथ और भगदत्त, इन दोनों के;"

श्लोक 21 (9.32.21)

मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च । पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुनेः सौबलस्य च ॥

madrarājasya śalyasya bhūriśravasa eva ca | putrāṇāṃ bharataśreṣṭha śakuneḥ saubalasya ca

"मद्रराज शल्य के और भूरिश्रवा के; हे भरतश्रेष्ठ, अपने पुत्रों के और सुबलपुत्र शकुनि के;"

श्लोक 22 (9.32.22)

मित्राणां सुहृदां चैव बान्धवानां तथैव च । आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभिः सह ॥

mitrāṇāṃ suhṛdāṃ caiva bāndhavānāṃ tathaiva ca | ānṛṇyamadya gacchāmi hatvā tvāṃ bhrātṛbhiḥ saha

"तथा अपने मित्रों, सुहृदों और बन्धुओं के भी। तुम्हें भाइयों सहित मारकर आज मैं उस ऋण से मुक्त हो जाऊँगा।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 23 (9.32.23)

एतावदुक्त्वा वचनं विरराम जनाधिपः । सलिलान्तर्गतः श्रीमान्पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥

etāvaduktvā vacanaṃ virarāma janādhipaḥ | salilāntargataḥ śrīmānputro duryodhanastava

इतना कहकर राजा चुप हो गया — आपका वह तेजस्वी पुत्र दुर्योधन जल के भीतर खड़ा ही रहा।

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 24 (9.32.24)

दिष्ट्या त्वमपि जानीषे क्षत्रधर्मं सुयोधन । दिष्ट्या ते वर्तते बुद्धिर्युद्धायैव महाभुज ॥

diṣṭyā tvamapi jānīṣe kṣatradharmaṃ suyodhana | diṣṭyā te vartate buddhiryuddhāyaiva mahābhuja

"सौभाग्य की बात है, सुयोधन, कि तुम भी क्षत्रिय-धर्म को जानते हो; हे महाबाहो, सौभाग्य से तुम्हारा मन युद्ध में ही लगा है।"

श्लोक 25 (9.32.25)

दिष्ट्या शूरोऽसि गान्धारे दिष्ट्या जानासि सङ्गरम् । यस्त्वमेको हि नः सर्वान्सङ्गरे योद्धुमिच्छसि ॥

diṣṭyā śūro'si gāndhāre diṣṭyā jānāsi saṅgaram | yastvameko hi naḥ sarvānsaṅgare yoddhumicchasi

"हे गान्धारीपुत्र, सौभाग्य से तुम शूर हो, सौभाग्य से तुम युद्ध को जानते हो, जो अकेले ही हम सबसे लड़ना चाहते हो।"

श्लोक 26 (9.32.26)

एक एकेन सङ्गम्य यत्ते सम्मतमायुधम् । तत्त्वमादाय युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वयं स्थिताः ॥

eka ekena saṅgamya yatte sammatamāyudham | tattvamādāya yudhyasva prekṣakāste vayaṃ sthitāḥ

"हममें से एक-एक से भिड़ो, जो भी शस्त्र तुम्हें प्रिय हो उसे लेकर लड़ो; हम दर्शक बनकर खड़े रहेंगे।"

श्लोक 27 (9.32.27)

अयमिष्टं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् । हत्वैकं भव नो राजा हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ॥

ayamiṣṭaṃ ca te kāmaṃ vīra bhūyo dadāmyaham | hatvaikaṃ bhava no rājā hato vā svargamāpnuhi

"और हे वीर, तुम्हारी एक और इच्छा मैं पूरी करता हूँ — हममें से एक को मारकर हमारे राजा बन जाओ, अथवा मारे जाकर स्वर्ग पाओ।"

दुर्योधन उवाच

श्लोक 28 (9.32.28)

एकश्चेद्योद्धुमाक्रन्दे वरोऽद्य मम दीयताम् । आयुधानामियं चापि मता मे सततं गदा ॥

ekaścedyoddhumākrande varo'dya mama dīyatām | āyudhānāmiyaṃ cāpi matā me satataṃ gadā

"यदि मुझे इस कोलाहल में अकेले ही लड़ना है, तो आज मुझे एक वर दिया जाए: सब शस्त्रों में गदा ही सदा मेरी पसंद है।"

श्लोक 29 (9.32.29)

भ्रातॄणां भवतामेकः शक्यं मां योऽभिमन्यते । पदातिर्गदया सङ्ख्ये स युध्यतु मया सह ॥

bhrātṝṇāṃ bhavatāmekaḥ śakyaṃ māṃ yo'bhimanyate | padātirgadayā saṅkhye sa yudhyatu mayā saha

"तुम भाइयों में से जो कोई मेरा सामना कर सकने की सोचता हो, वह पैदल, गदा लेकर, युद्ध में मुझसे लड़े।"

श्लोक 30 (9.32.30)

वृत्तानि रथयुद्धानि विचित्राणि पदेपदे । इदमेकं गदायुद्धं भवत्वद्याद्भुतं महत् ॥

vṛttāni rathayuddhāni vicitrāṇi padepade | idamekaṃ gadāyuddhaṃ bhavatvadyādbhutaṃ mahat

"रथ-युद्ध तो बहुत हो चुके, जो पग-पग पर विचित्र रहे; आज यह एक गदा-युद्ध हो, जो महान और अद्भुत हो।"

श्लोक 31 (9.32.31)

अन्नानामपि पर्यायं कर्तुमिच्छन्ति मानवाः । युद्धानामपि पर्यायो भवत्वनुमते तव ॥

annānāmapi paryāyaṃ kartumicchanti mānavāḥ | yuddhānāmapi paryāyo bhavatvanumate tava

"मनुष्य भोजन तक में बदलाव चाहते हैं; यदि तुम सहमत हो, तो युद्धों में भी बदलाव हो।"

श्लोक 32 (9.32.32)

गदया त्वां महाबाहो विजेष्यामि सहानुजम् । पाञ्चालान्सृञ्जयांश्चैव ये चान्ये तव सैनिकाः । न हि मे सम्भ्रमो जातु शक्रादपि युधिष्ठिर ॥

gadayā tvāṃ mahābāho vijeṣyāmi sahānujam | pāñcālānsṛñjayāṃścaiva ye cānye tava sainikāḥ | na hi me sambhramo jātu śakrādapi yudhiṣṭhira

"हे महाबाहो, मैं गदा से तुम्हें भाइयों सहित जीत लूँगा, और पाञ्चालों, सृञ्जयों तथा तुम्हारे अन्य सैनिकों को भी। हे युधिष्ठिर, मुझे इन्द्र के सामने भी कभी घबराहट नहीं होती।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 33 (9.32.33)

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारे मां योधय सुयोधन । एक एकेन सङ्गम्य संयुगे गदया बली ॥

uttiṣṭhottiṣṭha gāndhāre māṃ yodhaya suyodhana | eka ekena saṅgamya saṃyuge gadayā balī

"उठो, उठो, हे गान्धारीपुत्र सुयोधन, और मुझसे लड़ो; हे बलवान्, युद्ध में एक के सामने एक होकर गदा से लड़ो।"

श्लोक 34 (9.32.34)

पुरुषो भव गान्धारे युध्यस्व सुसमाहितः । अद्य ते जीवितं नास्ति यदीन्द्रोऽपि तवाश्रयः ॥

puruṣo bhava gāndhāre yudhyasva susamāhitaḥ | adya te jīvitaṃ nāsti yadīndro'pi tavāśrayaḥ

"हे गान्धारीपुत्र, पुरुष बनो और एकाग्र होकर लड़ो। आज तुम्हारा जीवन नहीं बचा, चाहे इन्द्र ही तुम्हारा सहारा क्यों न हो।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 35 (9.32.35)

एतत्स नरशार्दूलो नामृष्यत तवात्मजः । सलिलान्तर्गतः श्वभ्रे महानाग इव श्वसन् ॥

etatsa naraśārdūlo nāmṛṣyata tavātmajaḥ | salilāntargataḥ śvabhre mahānāga iva śvasan

आपके पुत्र उस नरशार्दूल से यह सहा नहीं गया; जल में खड़ा वह बिल में बैठे महानाग की तरह फुफकारने लगा।

श्लोक 36 (9.32.36)

तथाऽसौ वाक्प्रतोदेन तुद्यमानः पुनःपुनः । वचो न ममृषे राजन्नुत्तमाश्वः कशामिव ॥

tathā'sau vākpratodena tudyamānaḥ punaḥpunaḥ | vaco na mamṛṣe rājannuttamāśvaḥ kaśāmiva

हे राजन्, शब्दों के चाबुक से बार-बार मारे जाने पर वह उसे वैसे ही न सह सका जैसे उत्तम घोड़ा कोड़े को नहीं सहता।

श्लोक 37 (9.32.37)

सङ्क्षोभ्य सलिलं वेगाद्गदामादाय वीर्यवान् । अद्रिसारमयीं गुर्वीं काञ्चनाङ्गदभूषणाम् । अन्तर्जलात्समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव निःश्वसन् ॥

saṅkṣobhya salilaṃ vegādgadāmādāya vīryavān | adrisāramayīṃ gurvīṃ kāñcanāṅgadabhūṣaṇām | antarjalātsamuttasthau nāgendra iva niḥśvasan

जल को वेग से मथकर उस पराक्रमी ने लोहे की बनी, सोने के बाजूबन्दों से सजी अपनी भारी गदा उठाई और नागराज की तरह फुफकारता हुआ जल के भीतर से उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 38 (9.32.38)

स भित्त्वा स्तम्भितं तोयं स्कन्धे कृत्वायसीं गदाम् । उदतिष्ठत पुत्रस्ते प्रतपन्रश्मिवानिव ॥

sa bhittvā stambhitaṃ toyaṃ skandhe kṛtvāyasīṃ gadām | udatiṣṭhata putraste pratapanraśmivāniva

उसने अपने रोके हुए जल को चीरा और लोहे की गदा कंधे पर रखकर आपका पुत्र किरणों से तपते सूर्य के समान उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 39 (9.32.39)

ततः शैक्यायसीं गुर्वीं जातरूपपरिष्कृताम् । गदां परामृशद्धीमान्धार्तराष्ट्रो महाबलः ॥

tataḥ śaikyāyasīṃ gurvīṃ jātarūpapariṣkṛtām | gadāṃ parāmṛśaddhīmāndhārtarāṣṭro mahābalaḥ

तब बुद्धिमान और महाबली धृतराष्ट्रपुत्र ने अपनी भारी लोहे की गदा, जो चमड़े की पट्टियों से कसी और सोने से सजी थी, थाम ली।

श्लोक 40 (9.32.40)

गदाहस्तं तु तं दृष्ट्वा सशृङ्गमिव पर्वतम् । प्रजानामिव सङ्क्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् ॥

gadāhastaṃ tu taṃ dṛṣṭvā saśṛṅgamiva parvatam | prajānāmiva saṅkruddhaṃ śūlapāṇimiva sthitam

उन्होंने उसे गदा हाथ में लिए देखा — शिखरों वाले पर्वत की तरह, और प्राणियों पर कुपित त्रिशूलधारी शिव की तरह खड़ा।

श्लोक 41 (9.32.41)

सगदो भारतो भाति प्रतपन्भास्करो यथा ॥

sagado bhārato bhāti pratapanbhāskaro yathā

गदा लिए वह भारत जलते हुए सूर्य के समान दमक रहा था।

श्लोक 42 (9.32.42)

तमुत्तीर्णं महाबाहुं गदाहस्तमरिन्दमम् । मेनिरे सर्वभूतानि दण्डपाणिमिवान्तकम् ॥

tamuttīrṇaṃ mahābāhuṃ gadāhastamarindamam | menire sarvabhūtāni daṇḍapāṇimivāntakam

जल से निकले उस गदाधारी, महाबाहु, शत्रुदमन को सभी प्राणियों ने दण्ड हाथ में लिए यमराज के समान माना।

श्लोक 43 (9.32.43)

वज्रहस्तं यथा शक्रं शूलहस्तं यथा हरम् । ददृशुः सर्वपाञ्चालाः पुत्रं तव जनाधिप ॥

vajrahastaṃ yathā śakraṃ śūlahastaṃ yathā haram | dadṛśuḥ sarvapāñcālāḥ putraṃ tava janādhipa

हे जनाधिप, सब पाञ्चालों ने आपके पुत्र को वज्र हाथ में लिए इन्द्र और त्रिशूल हाथ में लिए शिव के समान देखा।

श्लोक 44 (9.32.44)

तमुत्तीर्णं तु सम्प्रेक्ष्य समहृष्यन्त सर्वशः । पाञ्चालाः पाण्डवेयाश्च तेऽन्योन्यस्य तलान्ददुः ॥

tamuttīrṇaṃ tu samprekṣya samahṛṣyanta sarvaśaḥ | pāñcālāḥ pāṇḍaveyāśca te'nyonyasya talāndaduḥ

उसे उठा हुआ देखकर पाञ्चाल और पाण्डव सब हर्षित हो उठे और एक-दूसरे के हाथ पर ताली देने लगे।

श्लोक 45 (9.32.45)

अवहासं तु तं मत्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव । उद्वृत्य नयने क्रुद्धो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥

avahāsaṃ tu taṃ matvā putro duryodhanastava | udvṛtya nayane kruddho didhakṣuriva pāṇḍavān

उसे अपना उपहास समझकर आपका पुत्र दुर्योधन क्रोध से आँखें तरेरकर ऐसे देखने लगा मानो पाण्डवों को भस्म कर देना चाहता हो।

श्लोक 46 (9.32.46)

त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा सन्दष्टदशनच्छदः । प्रत्युवाच ततस्तान्वै पाण्डवान्सह केशवान् ॥

triśikhāṃ bhrukuṭīṃ kṛtvā sandaṣṭadaśanacchadaḥ | pratyuvāca tatastānvai pāṇḍavānsaha keśavān

भौंहों में तीन बल डालकर और होंठ चबाते हुए उसने केशव सहित पाण्डवों को उत्तर दिया।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 47 (9.32.47)

अस्यावहासस्य फलं प्रतिमोक्ष्यथ पाण्डवाः । गमिष्यथ हताः सद्यः सपाञ्चाला यमक्षयम् ॥

asyāvahāsasya phalaṃ pratimokṣyatha pāṇḍavāḥ | gamiṣyatha hatāḥ sadyaḥ sapāñcālā yamakṣayam

"हे पाण्डवो, इस उपहास का फल तुम भोगोगे; पाञ्चालों सहित तुम आज ही मारे जाकर यमलोक जाओगे।"

सञ्जय उवाच

श्लोक 48 (9.32.48)

उत्थितश्च जलात्तस्मात्पुत्रो दुर्योधनस्तव । अतिष्ठत गदापाणी रुधिरेण समुक्षितः ॥

utthitaśca jalāttasmātputro duryodhanastava | atiṣṭhata gadāpāṇī rudhireṇa samukṣitaḥ

जल से निकलकर आपका पुत्र दुर्योधन गदा हाथ में लिए, रक्त से लथपथ खड़ा हो गया।

श्लोक 49 (9.32.49)

तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम् । शरीरं स्म तदा भाति स्रवन्निव महीधरः ॥

tasya śoṇitadigdhasya salilena samukṣitam | śarīraṃ sma tadā bhāti sravanniva mahīdharaḥ

रक्त से सने और जल से भीगे उसके शरीर की शोभा तब ऐसी थी जैसे झरनों से बहता कोई पर्वत हो।

श्लोक 50 (9.32.50)

तमुद्यतगदं वीरं मेनिरे तत्र पाण्डवाः । वैवस्वतमिव क्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् ॥

tamudyatagadaṃ vīraṃ menire tatra pāṇḍavāḥ | vaivasvatamiva kruddhaṃ śūlapāṇimiva sthitam

वहाँ पाण्डवों ने गदा उठाए उस वीर को क्रुद्ध यमराज और त्रिशूल उठाए खड़े शिव के समान माना।

श्लोक 51 (9.32.51)

स मेघनिनदो हर्षान्नर्दन्निव च गोवृषः । आजुहाव ततः पार्थान्गदया युधि वीर्यवान् ॥

sa meghaninado harṣānnardanniva ca govṛṣaḥ | ājuhāva tataḥ pārthāngadayā yudhi vīryavān

मेघ के समान गरजती आवाज़ में, हर्ष से साँड़ की तरह दहाड़ते हुए उस पराक्रमी ने पाण्डवों को गदा-युद्ध के लिए ललकारा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 52 (9.32.52)

एकैकेन च मां यूयमासीदत युधिष्ठिर । न ह्येको बहुभिर्न्याय्यो वीरो योधयितुं युधि ॥

ekaikena ca māṃ yūyamāsīdata yudhiṣṭhira | na hyeko bahubhirnyāyyo vīro yodhayituṃ yudhi

"हे युधिष्ठिर, तुम लोग एक-एक करके मेरे सामने आओ। युद्ध में एक वीर से बहुतों का लड़ना उचित नहीं।"

श्लोक 53 (9.32.53)

न्यस्तवर्मा विशेषेण श्रान्तश्चाप्सु परिप्लुतः । भृशं विक्षतगात्रश्च हतवाहनसैनिकः ॥

nyastavarmā viśeṣeṇa śrāntaścāpsu pariplutaḥ | bhṛśaṃ vikṣatagātraśca hatavāhanasainikaḥ

"मैंने कवच उतार दिया है, मैं थका हुआ और पानी में भीगा हुआ हूँ, मेरा शरीर बुरी तरह घायल है, और मेरे वाहन तथा सैनिक मारे जा चुके हैं।"

श्लोक 54 (9.32.54)

अवश्यमेव योद्धव्यं सर्वैरेव मया सह । युक्तं त्वयुक्तमित्येतद्वेत्सि त्वं चैव सर्वदा ॥

avaśyameva yoddhavyaṃ sarvaireva mayā saha | yuktaṃ tvayuktamityetadvetsi tvaṃ caiva sarvadā

"फिर भी तुम सबको मुझसे लड़ना ही होगा; और यह उचित है या अनुचित, इसे तुम सदा जानते ही हो।"

युधिष्ठिर उवाच

श्लोक 55 (9.32.55)

मा भूदियं तव प्रज्ञा कथमेकं सुयोधन । यदाऽभिमन्युं बहवो जघ्नुर्युधि महारथाः ॥

mā bhūdiyaṃ tava prajñā kathamekaṃ suyodhana | yadā'bhimanyuṃ bahavo jaghnuryudhi mahārathāḥ

"हे सुयोधन, तुम्हारी यह सोच न टिके: अकेले से लड़ने की बात तुम कैसे कहते हो, जब बहुत-से महारथियों ने मिलकर युद्ध में अभिमन्यु को मारा था?"

श्लोक 56 (9.32.56)

क्षत्रधर्मं भृशं क्रूरं निरपेक्षं सुनिर्घृणम् । अन्यथा तु कथं हन्युरभिमन्युं तथागतम् ॥

kṣatradharmaṃ bhṛśaṃ krūraṃ nirapekṣaṃ sunirghṛṇam | anyathā tu kathaṃ hanyurabhimanyuṃ tathāgatam

"क्षत्रिय का धर्म अत्यन्त क्रूर, निर्मम और निर्दय होता है; नहीं तो अभिमन्यु को उस दशा में रहते हुए वे कैसे मारते?"

श्लोक 57 (9.32.57)

सर्वे भवन्तो धर्मज्ञाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः । न्यायेन युध्यतां प्रोक्ता शक्रलोकगतिः परा ॥

sarve bhavanto dharmajñāḥ sarve śūrāstanutyajaḥ | nyāyena yudhyatāṃ proktā śakralokagatiḥ parā

"तुम सब धर्म के जानने वाले हो, सब प्राण त्यागने वाले शूर हो; जो न्यायपूर्वक लड़ते हैं, उनके लिए इन्द्रलोक की परम गति बताई गई है।"

श्लोक 58 (9.32.58)

यद्येकस्तु न हन्तव्यो बहुभिर्धर्म एव तु । तदाऽभिमन्युं बहवो निजघ्नुस्त्वन्मते कथम् ॥

yadyekastu na hantavyo bahubhirdharma eva tu | tadā'bhimanyuṃ bahavo nijaghnustvanmate katham

"यदि बहुतों को एक को नहीं मारना चाहिए, यही धर्म है, तो तुम्हारे मत से बहुतों ने अभिमन्यु को कैसे मारा?"

श्लोक 59 (9.32.59)

सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् । पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥

sarvo vimṛśate jantuḥ kṛcchrastho dharmadarśanam | padasthaḥ pihitaṃ dvāraṃ paralokasya paśyati

"संकट में पड़ा हर प्राणी धर्म पर विचार करता है; देहली पर खड़ा होकर वह परलोक का द्वार बन्द देखता है।"

श्लोक 60 (9.32.60)

आमुञ्च कवचं वीर मूर्धजान्यमयस्व च । यच्चान्यदपि ते नास्ति तदप्यादत्स्व भारत ॥

āmuñca kavacaṃ vīra mūrdhajānyamayasva ca | yaccānyadapi te nāsti tadapyādatsva bhārata

"हे वीर, कवच पहन लो, अपने केश बाँध लो, और हे भारत, जो कुछ और तुम्हारे पास नहीं है, उसे भी ले लो।"

श्लोक 61 (9.32.61)

इममेकं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् । पञ्चानां पाण्डवेयानां येन त्वं योद्धुमिच्छसि ॥

imamekaṃ ca te kāmaṃ vīra bhūyo dadāmyaham | pañcānāṃ pāṇḍaveyānāṃ yena tvaṃ yoddhumicchasi

"और हे वीर, मैं तुम्हारी एक और इच्छा पूरी करता हूँ — पाँचों पाण्डवों में से जिसके साथ तुम लड़ना चाहो, उसे चुन लो,"

श्लोक 62 (9.32.62)

तं हत्वा वै भवान्राजा हतो वा स्वर्गमाप्नुहि । ऋते च जीविताद्वीर युद्धे किं कुर्म ते प्रियम् ॥

taṃ hatvā vai bhavānrājā hato vā svargamāpnuhi | ṛte ca jīvitādvīra yuddhe kiṃ kurma te priyam

"उसे मारकर राजा बन जाओ, अथवा मारे जाकर स्वर्ग पाओ। हे वीर, तुम्हारे प्राणों को छोड़कर, इस युद्ध में हम तुम्हारा और क्या प्रिय कर सकते हैं?"

सञ्जय उवाच

श्लोक 63 (9.32.63)

ततस्तव सुतो राजन्वर्म जग्राह काञ्चनम् । विचित्रं च शिरस्त्राणं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥

tatastava suto rājanvarma jagrāha kāñcanam | vicitraṃ ca śirastrāṇaṃ jāmbūnadapariṣkṛtam

हे राजन्, तब आपके पुत्र ने सोने का कवच और जाम्बूनद स्वर्ण से सजा विचित्र शिरस्त्राण उठा लिया।

श्लोक 64 (9.32.64)

सोऽवबद्धशिरस्त्राणः शुभकाञ्चनवर्मभृत् । रराज राजन्पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ॥

so'vabaddhaśirastrāṇaḥ śubhakāñcanavarmabhṛt | rarāja rājanputraste kāñcanaḥ śailarāḍiva

शिरस्त्राण बाँधे और सुन्दर स्वर्ण-कवच पहने आपका पुत्र हे राजन्, स्वर्णमय पर्वतराज के समान शोभित हुआ।

श्लोक 65 (9.32.65)

सन्नद्धः सगदी राजन्सज्जः सङ्ग्राममूर्धनि । अब्रवीत्पाण्डवान्सर्वान्पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥

sannaddhaḥ sagadī rājansajjaḥ saṅgrāmamūrdhani | abravītpāṇḍavānsarvānputro duryodhanastava

हे राजन्, कवच पहने, गदा लिए, युद्ध के अग्रभाग में तैयार खड़े आपके पुत्र दुर्योधन ने सब पाण्डवों से कहा।

दुर्योधन उवाच

श्लोक 66 (9.32.66)

भ्रातॄणां भवतामेको युध्यतां गदया मया । सहदेवेन वा योत्स्ये भीमेन नकुलेन वा ॥

bhrātṝṇāṃ bhavatāmeko yudhyatāṃ gadayā mayā | sahadevena vā yotsye bhīmena nakulena vā

"तुम भाइयों में से कोई एक मुझसे गदा से लड़े; मैं सहदेव से, या भीम से, या नकुल से लड़ूँगा,"

श्लोक 67 (9.32.67)

अथवा फल्गुनेनाद्य त्वया वा भरतर्षभ । योत्स्येऽहं सङ्गरं प्राप्य विजेष्ये च रणाजिरे ॥

athavā phalgunenādya tvayā vā bharatarṣabha | yotsye'haṃ saṅgaraṃ prāpya vijeṣye ca raṇājire

"अथवा आज फल्गुन से, या हे भरतश्रेष्ठ, तुमसे ही; मैं रणभूमि में उतरकर लड़ूँगा और जीतूँगा।"

श्लोक 68 (9.32.68)

अहमद्य गमिष्यामि वैरस्यान्तं सुदुर्गमम् । गदया पुरुषव्याघ्र हेमपट्टनिबद्धया ॥

ahamadya gamiṣyāmi vairasyāntaṃ sudurgamam | gadayā puruṣavyāghra hemapaṭṭanibaddhayā

"हे पुरुषव्याघ्र, आज सोने की पट्टियों से कसी इस गदा से मैं इस वैर का अत्यन्त दुर्गम अन्त पा लूँगा।"

श्लोक 69 (9.32.69)

गदायुद्धे न मे कश्चित्सदृशोऽस्तीति चिन्तये । गदया वो हनिष्यामि सर्वानेव समागतान् ॥

gadāyuddhe na me kaścitsadṛśo'stīti cintaye | gadayā vo haniṣyāmi sarvāneva samāgatān

"मैं समझता हूँ कि गदा-युद्ध में कोई मेरे समान नहीं है। यहाँ एकत्र तुम सब को मैं गदा से मार डालूँगा।"

श्लोक 70 (9.32.70)

न मे समर्थाः सर्वे वै योद्धुं न्यायेन केचन । न युक्तमात्मना वक्तुमेवं गर्वोद्धतं वचः । अथवा सफलं ह्येतत्करिष्ये भवतां पुरः ॥

na me samarthāḥ sarve vai yoddhuṃ nyāyena kecana | na yuktamātmanā vaktumevaṃ garvoddhataṃ vacaḥ | athavā saphalaṃ hyetatkariṣye bhavatāṃ puraḥ

"तुममें से कोई भी न्यायपूर्वक मुझसे लड़ने में समर्थ नहीं। अपने मुँह से ऐसी घमण्ड-भरी बात कहना मुझे शोभा नहीं देता; अथवा मैं इसे तुम सबके सामने सच करके दिखाऊँगा।"

श्लोक 71 (9.32.71)

अस्मिन्मुहूर्ते सत्यं वा मिथ्या वै तद्भविष्यति । गृह्णातु च गदां यो वै योत्स्यतेऽद्य मया सह ॥

asminmuhūrte satyaṃ vā mithyā vai tadbhaviṣyati | gṛhṇātu ca gadāṃ yo vai yotsyate'dya mayā saha

"इसी क्षण यह सच या झूठ सिद्ध हो जाएगा। जो आज मुझसे लड़ेगा, वह गदा उठा ले।"

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