शल्य पर्व · अध्याय 33
कृष्ण की फटकार और भीम की चुनौती
कृष्ण क्रोध में युधिष्ठिर से कहते हैं कि दुर्योधन को मनचाहा एकल युद्ध चुनने देना उतावलापन था: गदा-युद्ध में दुर्योधन अधिक निपुण है, और पाण्डव जुए की तरह फिर संकट में डाल दिए गए हैं। भीम दुर्योधन को मारने की प्रतिज्ञा करते हैं, और कृष्ण, सात्यकि तथा अन्य लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। भीम गदा उठाकर दुर्योधन को उसके पुराने अपराध याद दिलाते हैं, और दुर्योधन ललकार का उत्तर ललकार से देता है, जबकि पाण्डव उत्साह बढ़ाते हैं।
सञ्जय उवाच
श्लोक 1 (9.33.1)
एवं दुर्योधने राजन्गर्जमाने मुहुर्मुहुः । युधिष्ठिरस्य सङ्क्रुद्धो वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥
evaṃ duryodhane rājangarjamāne muhurmuhuḥ | yudhiṣṭhirasya saṅkruddho vāsudevo'bravīdidam
हे राजन्, जब दुर्योधन बार-बार गरज रहा था, तब वासुदेव ने युधिष्ठिर पर क्रुद्ध होकर यह कहा —
वासुदेव उवाच
श्लोक 2 (9.33.2)
यदि नाम ह्ययं युद्धे वरयेत्त्वां युधिष्ठिर । अर्जुनं नकुलं चैव सहदेवमथापि वा ॥
yadi nāma hyayaṃ yuddhe varayettvāṃ yudhiṣṭhira | arjunaṃ nakulaṃ caiva sahadevamathāpi vā
"हे युधिष्ठिर, मान लो कि वह इस युद्ध में तुम्हें चुन ले, या अर्जुन को, या नकुल को, या सहदेव को —"
श्लोक 3 (9.33.3)
किमिदं साहसं राजंस्त्वया व्याहृतमीदृशम् । एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति ॥
kimidaṃ sāhasaṃ rājaṃstvayā vyāhṛtamīdṛśam | ekameva nihatyājau bhava rājā kuruṣviti
"तो हे राजन्, यह कैसा दुस्साहस है जो तुमने कह डाला — 'हममें से एक को ही युद्ध में मार दो और राजा बन जाओ'?"
श्लोक 4 (9.33.4)
एतेन हि कृता योग्या वर्षाणीह त्रयोदश । आयसे पुरुषे राजन्भीमसेनजिघांसया ॥
etena hi kṛtā yogyā varṣāṇīha trayodaśa | āyase puruṣe rājanbhīmasenajighāṃsayā
"हे राजन्, इसने भीमसेन को मारने की इच्छा से यहाँ तेरह वर्ष तक लोहे की मूर्ति पर अभ्यास किया है।"
श्लोक 5 (9.33.5)
कथं नाम भवेत्कार्यमस्माभिर्भरतर्षभ । साहसं कृतवांस्त्वं तु ह्यनुक्रोशान्नृपोत्तम ॥
kathaṃ nāma bhavetkāryamasmābhirbharatarṣabha | sāhasaṃ kṛtavāṃstvaṃ tu hyanukrośānnṛpottama
"हे भरतश्रेष्ठ, अब हम क्या करें? हे नृपश्रेष्ठ, तुमने दया के कारण ही यह दुस्साहस कर डाला है।"
श्लोक 6 (9.33.6)
नान्यमस्यानुपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे । ऋते वृकोदरात्पार्थात्स च नातिकृतश्रमः ॥
nānyamasyānupaśyāmi pratiyoddhāramāhave | ṛte vṛkodarātpārthātsa ca nātikṛtaśramaḥ
"मैं युद्ध में इसका कोई दूसरा प्रतिद्वन्द्वी नहीं देखता, केवल पृथापुत्र वृकोदर को छोड़कर, और उसने भी इसका उतना अभ्यास नहीं किया।"
श्लोक 7 (9.33.7)
तदिदं द्यूतमारब्धं पुनरेव यथा पुरा । विषमं शकुनेश्चैव तव चैव विशेषतः ॥
tadidaṃ dyūtamārabdhaṃ punareva yathā purā | viṣamaṃ śakuneścaiva tava caiva viśeṣataḥ
"तो यह वही पुराना द्यूत फिर शुरू हो गया है, जो विषम है — जैसे वह शकुनि के लिए था, वैसे ही अब विशेषकर तुम्हारे लिए है।"
श्लोक 8 (9.33.8)
बली भीमः समर्थश्च कृती राजा सुयोधनः । बलवान्वा कृती वेति कृती राजन्विशिष्यते ॥
balī bhīmaḥ samarthaśca kṛtī rājā suyodhanaḥ | balavānvā kṛtī veti kṛtī rājanviśiṣyate
"भीम बलवान् और समर्थ है, परन्तु राजा सुयोधन कुशल है। हे राजन्, बलवान् और कुशल में कुशल ही भारी पड़ता है।"
श्लोक 9 (9.33.9)
सोऽयं राजंस्त्वया शत्रुः समे पथि निवेशितः । न्यस्तश्चात्मा सुविषमे कृच्छ्रमापादिता वयम् ॥
so'yaṃ rājaṃstvayā śatruḥ same pathi niveśitaḥ | nyastaścātmā suviṣame kṛcchramāpāditā vayam
"हे राजन्, तुमने इस शत्रु को समतल मार्ग पर ला खड़ा किया और स्वयं को अत्यन्त विषम स्थिति में दाँव पर लगा दिया; हम संकट में डाल दिए गए हैं।"
श्लोक 10 (9.33.10)
कोऽनु सर्वान्विनिर्जित्य शत्रूनेकेन वैरिणा । कृच्छ्रप्राप्तेन च तथा हारयेद्राज्यमागतम् । पातितश्चैकबाणेन शोचयेदेवमाहवे ॥
ko'nu sarvānvinirjitya śatrūnekena vairiṇā | kṛcchraprāptena ca tathā hārayedrājyamāgatam | pātitaścaikabāṇena śocayedevamāhave
"सब शत्रुओं को जीतकर, एक ही शत्रु से संकट में पड़कर, कौन अपने हाथ आया राज्य गँवा देगा? एक ही प्रहार से गिरकर वह युद्ध में इसी तरह शोक करेगा।"
श्लोक 11 (9.33.11)
न हि पश्यामि तं लोके योऽद्य दुर्योधनं रणे । गदाहस्तं विजेतुं वै शक्तः स्यादमरोऽपि हि ॥
na hi paśyāmi taṃ loke yo'dya duryodhanaṃ raṇe | gadāhastaṃ vijetuṃ vai śaktaḥ syādamaro'pi hi
"मैं संसार में ऐसा कोई नहीं देखता जो आज रण में गदा हाथ में लिए दुर्योधन को जीत सके, अमर देवता भी नहीं।"
श्लोक 12 (9.33.12)
फल्गुनो वा भवान्वाथ माद्रीपुत्रावथापि वा । न समर्थानहं मन्ये गदाहस्तस्य संयुगे ॥
phalguno vā bhavānvātha mādrīputrāvathāpi vā | na samarthānahaṃ manye gadāhastasya saṃyuge
"फल्गुन हो, या तुम, या माद्री के दोनों पुत्र — मैं नहीं मानता कि गदा हाथ में लिए उसके सामने युद्ध में कोई भी समर्थ है।"
श्लोक 13 (9.33.13)
न त्वं भीमो न नकुलः सहदेवोऽथ फल्गुनः । जेतुं न्यायेन शक्तो वै कृती राजा सुयोधनः ॥
na tvaṃ bhīmo na nakulaḥ sahadevo'tha phalgunaḥ | jetuṃ nyāyena śakto vai kṛtī rājā suyodhanaḥ
"न तुम, न भीम, न नकुल, न सहदेव, न फल्गुन — कोई भी कुशल राजा सुयोधन को न्यायपूर्वक नहीं जीत सकता।"
श्लोक 14 (9.33.14)
स कथं वदसे शत्रुं युध्यस्व गदयेति हि । एकं च नो निहत्याजौ भव राजेति भारत ॥
sa kathaṃ vadase śatruṃ yudhyasva gadayeti hi | ekaṃ ca no nihatyājau bhava rājeti bhārata
"फिर तुमने शत्रु से कैसे कह दिया कि 'गदा से लड़ो', और 'हममें से एक को ही रण में मारकर राजा बन जाओ, हे भारत'?"
श्लोक 15 (9.33.15)
वृकोदरं समासाद्य संशयो वै जये हि नः । न्यायतो युध्यमानानां कृती ह्येष महाबलः ॥
vṛkodaraṃ samāsādya saṃśayo vai jaye hi naḥ | nyāyato yudhyamānānāṃ kṛtī hyeṣa mahābalaḥ
"वृकोदर के सामने आने पर तो हमारी जीत संदिग्ध है, क्योंकि वह कुशल और महाबली है, और हम न्यायपूर्वक लड़ने वाले हैं।"
श्लोक 16 (9.33.16)
नूनं न राज्यभागेषा पाण्डोः कुन्त्याश्च सन्ततिः । अत्यन्तवनवासाय सृष्टा भैक्ष्याय वा पुनः ॥
nūnaṃ na rājyabhāgeṣā pāṇḍoḥ kuntyāśca santatiḥ | atyantavanavāsāya sṛṣṭā bhaikṣyāya vā punaḥ
"निश्चय ही पाण्डु और कुन्ती की यह सन्तति राज्य के भाग के लिए नहीं बनी; यह तो सदा वनवास या भिक्षा के लिए ही रची गई है।"
भीमसेन उवाच
श्लोक 17 (9.33.17)
मधुसूदन माकार्षीविषादं यदुनन्दन । अद्य पारं गमिष्यामि वैरस्य भृशदुर्गमम् ॥
madhusūdana mākārṣīviṣādaṃ yadunandana | adya pāraṃ gamiṣyāmi vairasya bhṛśadurgamam
"हे मधुसूदन, हे यदुनन्दन, विषाद मत करो। आज मैं इस वैर के अत्यन्त दुर्गम पार को पहुँच जाऊँगा।"
श्लोक 18 (9.33.18)
अहं सुयोधनं सङ्ख्ये हनिष्यामि न संशयः । विजयो वै ध्रुवः कृष्ण धर्मराजस्य दृश्यते ॥
ahaṃ suyodhanaṃ saṅkhye haniṣyāmi na saṃśayaḥ | vijayo vai dhruvaḥ kṛṣṇa dharmarājasya dṛśyate
"मैं युद्ध में सुयोधन को अवश्य मारूँगा, इसमें संदेह नहीं। हे कृष्ण, धर्मराज की विजय निश्चित दिखाई देती है।"
श्लोक 19 (9.33.19)
अध्यर्धेन गुणेनेयं गदा गुरुतरी मम । न तथा धार्तराष्ट्रस्य माकार्षीर्माधव व्यथाम् ॥
adhyardhena guṇeneyaṃ gadā gurutarī mama | na tathā dhārtarāṣṭrasya mākārṣīrmādhava vyathām
"मेरी यह गदा धृतराष्ट्रपुत्र की गदा से डेढ़ गुना भारी है; हे माधव, उसके कारण व्यथित मत हो।"
श्लोक 20 (9.33.20)
अनया गदयाचाहं संयुगे योद्धुमुत्सहे । भवन्तः प्रेक्षकाः सर्वे मम सन्तु जनार्दन ॥
anayā gadayācāhaṃ saṃyuge yoddhumutsahe | bhavantaḥ prekṣakāḥ sarve mama santu janārdana
"इस गदा के साथ मैं युद्ध में लड़ने का साहस करता हूँ; हे जनार्दन, आप सब मेरे दर्शक बने रहें।"
श्लोक 21 (9.33.21)
सामरानपि लोकांस्त्रीन्नानाशस्त्रधरान्युधि । योधयेयं रणे कृष्ण किमुताद्य सुयोधनम् ॥
sāmarānapi lokāṃstrīnnānāśastradharānyudhi | yodhayeyaṃ raṇe kṛṣṇa kimutādya suyodhanam
"हे कृष्ण, मैं देवताओं सहित तीनों लोकों से भी, जो नाना शस्त्र धारण किए हों, रण में लड़ सकता हूँ; फिर आज सुयोधन की तो बात ही क्या!"
सञ्जय उवाच
श्लोक 22 (9.33.22)
तथा सम्भाषमाणं तु वासुदेवो वृकोदरम् । हृष्टः सम्पूजयामास वचनं चेदमब्रवीत् ॥
tathā sambhāṣamāṇaṃ tu vāsudevo vṛkodaram | hṛṣṭaḥ sampūjayāmāsa vacanaṃ cedamabravīt
वृकोदर को इस प्रकार बोलते देख वासुदेव हर्षित हुए; उन्होंने उनका सम्मान किया और ये वचन कहे —
वासुदेव उवाच
श्लोक 23 (9.33.23)
त्वामाश्रित्य महाबाहो धर्मराजो युधिष्ठिरः । निहतारिः स्वकां दीप्तां श्रियं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥
tvāmāśritya mahābāho dharmarājo yudhiṣṭhiraḥ | nihatāriḥ svakāṃ dīptāṃ śriyaṃ prāpnotyasaṃśayam
"हे महाबाहो, तुम्हारा सहारा पाकर धर्मराज युधिष्ठिर शत्रुओं को मारकर अपनी दीप्तिमान राजलक्ष्मी निःसंदेह पा लेंगे।"
श्लोक 24 (9.33.24)
त्वया विनिहताः सर्वे धृतराष्ट्रसुता रणे । राजानो राजपुत्राश्च नागाश्च विनिपातिताः ॥
tvayā vinihatāḥ sarve dhṛtarāṣṭrasutā raṇe | rājāno rājaputrāśca nāgāśca vinipātitāḥ
"तुम्हारे हाथों धृतराष्ट्र के सब पुत्र रण में मारे गए; राजा, राजकुमार और हाथी गिरा दिए गए।"
श्लोक 25 (9.33.25)
कलिङ्गा मागधाः प्राच्या गान्धाराः कुरवस्तथा । त्वामासाद्य महायुद्धे निहताः पाण्डुनन्दन ॥
kaliṅgā māgadhāḥ prācyā gāndhārāḥ kuravastathā | tvāmāsādya mahāyuddhe nihatāḥ pāṇḍunandana
"हे पाण्डुनन्दन, कलिङ्ग, मागध, प्राच्य, गान्धार और कुरु लोग महायुद्ध में तुम्हारे सामने आकर मारे गए।"
श्लोक 26 (9.33.26)
हत्वा दुर्योधनं चापि प्रयच्छोर्वीं ससागराम् । धर्मराजाय कौन्तेय यथा विष्णुः शचीपतेः ॥
hatvā duryodhanaṃ cāpi prayacchorvīṃ sasāgarām | dharmarājāya kaunteya yathā viṣṇuḥ śacīpateḥ
"और दुर्योधन को भी मारकर हे कुन्तीपुत्र, सागरों सहित यह पृथ्वी धर्मराज को दे दो, जैसे विष्णु ने शचीपति इन्द्र को दी थी।"
श्लोक 27 (9.33.27)
त्वां च प्राप्य रणे पापो धार्तराष्ट्रो विनङ्क्ष्यति । त्वमस्य सक्थिनी भंक्त्वा प्रतिज्ञां पालयिष्यसि ॥
tvāṃ ca prāpya raṇe pāpo dhārtarāṣṭro vinaṅkṣyati | tvamasya sakthinī bhaṃktvā pratijñāṃ pālayiṣyasi
"पापी धृतराष्ट्रपुत्र युद्ध में तुम्हारा सामना होते ही नष्ट हो जाएगा; तुम उसकी जाँघें तोड़कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी करोगे।"
श्लोक 28 (9.33.28)
यत्नेन ह त्वया पापो योद्धव्यो धृतराष्ट्रजः । कृती च बलवांश्चैव युद्धशौण्डश्च नित्यदा ॥
yatnena ha tvayā pāpo yoddhavyo dhṛtarāṣṭrajaḥ | kṛtī ca balavāṃścaiva yuddhaśauṇḍaśca nityadā
"परन्तु तुम्हें धृतराष्ट्र के उस पुत्र से यत्नपूर्वक लड़ना चाहिए, क्योंकि वह कुशल, बलवान् और सदा युद्ध का उत्साही है।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 29 (9.33.29)
ततस्तु सात्यकी राजन्पूजयामास पाण्डवम् । विविधाभिश्च तं वाग्भिर्भीमसेनं जनेश्वर ॥
tatastu sātyakī rājanpūjayāmāsa pāṇḍavam | vividhābhiśca taṃ vāgbhirbhīmasenaṃ janeśvara
तब हे राजन्, सात्यकि ने पाण्डुपुत्र का सम्मान किया, और हे जनेश्वर, नाना प्रकार के वचनों से भीमसेन की प्रशंसा की।
श्लोक 30 (9.33.30)
पाञ्चालाः पाण्डवेयाश्च धर्मराजपुरोगमाः । तद्वचो भीमसेनस्य सर्व एवाभ्यपूजयन् ॥
pāñcālāḥ pāṇḍaveyāśca dharmarājapurogamāḥ | tadvaco bhīmasenasya sarva evābhyapūjayan
धर्मराज को आगे करके पाञ्चालों और पाण्डवों ने भीमसेन के उन वचनों का सभी ने आदर किया।
श्लोक 31 (9.33.31)
ततो भीमबलो भीमो युधिष्ठिरमथाब्रवीत् । सृञ्जयैः सह तिष्ठन्तं तपन्तमिव भास्करम् ॥
tato bhīmabalo bhīmo yudhiṣṭhiramathābravīt | sṛñjayaiḥ saha tiṣṭhantaṃ tapantamiva bhāskaram
तब भयंकर बलशाली भीम ने सृञ्जयों के साथ खड़े, तपते सूर्य के समान युधिष्ठिर से कहा —
भीमसेन उवाच
श्लोक 32 (9.33.32)
अहमेतेन सङ्गम्य संयुगे योद्धुमुत्सहे । न हि शक्तो रणे जेतुं मामेष पुरुषाधमः ॥
ahametena saṅgamya saṃyuge yoddhumutsahe | na hi śakto raṇe jetuṃ māmeṣa puruṣādhamaḥ
"मैं उससे भिड़कर युद्ध में लड़ने को तैयार हूँ; यह अधम पुरुष रण में मुझे जीत नहीं सकता।"
श्लोक 33 (9.33.33)
अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि निहितं हृदये भृशम् । सुयोधने धार्तराष्ट्रे खाण्डवेऽग्निमिवार्जुनः ॥
adya krodhaṃ vimokṣyāmi nihitaṃ hṛdaye bhṛśam | suyodhane dhārtarāṣṭre khāṇḍave'gnimivārjunaḥ
"जैसे अर्जुन ने खाण्डव में अग्नि को छोड़ा था, वैसे ही आज मैं धृतराष्ट्रपुत्र सुयोधन पर अपने हृदय में गहरे बसे क्रोध को छोड़ दूँगा।"
श्लोक 34 (9.33.34)
शल्यमद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम् । निहते गदया पापे अद्य राजन्सुखी भव ॥
śalyamadyoddhariṣyāmi tava pāṇḍava hṛcchayam | nihate gadayā pāpe adya rājansukhī bhava
"हे पाण्डव, आज मैं तुम्हारे हृदय में चुभा हुआ काँटा निकाल दूँगा। उस पापी को गदा से मार गिराने पर, हे राजन्, आज तुम सुखी हो जाओ।"
श्लोक 35 (9.33.35)
अद्य कीर्तिमयीं मालां प्रतिमोक्ष्ये तवानघ । प्राणाञ्श्रियं च राज्यं च मोक्ष्यतेऽद्य सुयोधनः ॥
adya kīrtimayīṃ mālāṃ pratimokṣye tavānagha | prāṇāñśriyaṃ ca rājyaṃ ca mokṣyate'dya suyodhanaḥ
"हे निष्पाप, आज मैं तुम्हें कीर्ति की माला पहनाऊँगा; आज सुयोधन अपने प्राण, श्री और राज्य छोड़ देगा।"
श्लोक 36 (9.33.36)
राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मया हतम् । स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत्तच्छकुनिबुद्धिजम् ॥
rājā ca dhṛtarāṣṭro'dya śrutvā putraṃ mayā hatam | smariṣyatyaśubhaṃ karma yattacchakunibuddhijam
"और राजा धृतराष्ट्र आज मेरे हाथ से अपने पुत्र का मारा जाना सुनकर शकुनि की बुद्धि से उपजे उस अशुभ कर्म को याद करेंगे।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 37 (9.33.37)
इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठो गदामुद्यम्य वीर्यवान् । उदतिष्ठत युद्धाय शक्रो वृत्रमिवाह्वयन् ॥
ityuktvā bharataśreṣṭho gadāmudyamya vīryavān | udatiṣṭhata yuddhāya śakro vṛtramivāhvayan
यह कहकर भरतश्रेष्ठ उस पराक्रमी ने गदा उठाई और वृत्र को ललकारते इन्द्र की तरह युद्ध के लिए खड़े हो गए।
श्लोक 38 (9.33.38)
तदाह्वानममृष्यन्वै तव पुत्रोऽतिवीर्यवान् । प्रत्युपस्थित एवाशु मत्तो मत्तमिव द्विपम् ॥
tadāhvānamamṛṣyanvai tava putro'tivīryavān | pratyupasthita evāśu matto mattamiva dvipam
आपका अतिपराक्रमी पुत्र उस ललकार को न सह सका और मत्त हाथी के सामने दूसरे मत्त हाथी की तरह तुरन्त सामने आ खड़ा हुआ।
श्लोक 39 (9.33.39)
गदाहस्तं तव सुतं युद्धाय समुपस्थितम् । ददृशुः पाण्डवाः सर्वे कैलासमिव शृङ्गिणम् ॥
gadāhastaṃ tava sutaṃ yuddhāya samupasthitam | dadṛśuḥ pāṇḍavāḥ sarve kailāsamiva śṛṅgiṇam
सब पाण्डवों ने आपके पुत्र को गदा हाथ में लिए युद्ध के लिए सामने खड़ा देखा, मानो शिखरों वाला कैलास हो।
श्लोक 40 (9.33.40)
तमेकाकिनमासाद्य धार्तराष्ट्रं महाबलम् । वियूथमिव मातङ्गं समहृष्यन्त पाण्डवाः ॥
tamekākinamāsādya dhārtarāṣṭraṃ mahābalam | viyūthamiva mātaṅgaṃ samahṛṣyanta pāṇḍavāḥ
झुण्ड से बिछड़े हाथी के समान अकेले उस महाबली धृतराष्ट्रपुत्र के सामने आकर पाण्डव हर्षित हुए।
श्लोक 41 (9.33.41)
न सम्भ्रमो न च भयं न च ग्लानिर्न च व्यथा । आसीद्दुर्योधनस्यापि स्थितः सिंह इवाहवे ॥
na sambhramo na ca bhayaṃ na ca glānirna ca vyathā | āsīdduryodhanasyāpi sthitaḥ siṃha ivāhave
दुर्योधन में भी न घबराहट थी, न भय, न ग्लानि, न व्यथा; वह रण में सिंह की तरह खड़ा था।
श्लोक 42 (9.33.42)
समुद्यतगदं दृष्ट्वा कैलासमिव शृङ्गिणम् । भीमसेनस्तदा राजन्दुर्योधनमथाब्रवीत् ॥
samudyatagadaṃ dṛṣṭvā kailāsamiva śṛṅgiṇam | bhīmasenastadā rājanduryodhanamathābravīt
हे राजन्, शिखरों वाले कैलास के समान उसे गदा उठाए देखकर भीमसेन ने तब दुर्योधन से कहा।
भीमसेन उवाच
श्लोक 43 (9.33.43)
राज्ञापि धृतराष्ट्रेण त्वया चास्मासु यत्कृतम् । स्मर तद्दुष्कृतं कर्म यद्भूतं वारणावते ॥
rājñāpi dhṛtarāṣṭreṇa tvayā cāsmāsu yatkṛtam | smara tadduṣkṛtaṃ karma yadbhūtaṃ vāraṇāvate
"राजा धृतराष्ट्र ने और तुमने हमारे साथ जो किया, वारणावत में जो वह पापकर्म हुआ, उसे याद करो।"
श्लोक 44 (9.33.44)
द्रौपदी च परामृष्टा सभामध्ये रजस्वला । द्यूते च वञ्चितो राजा शकुनेर्बुद्धिलाघवात् ॥
draupadī ca parāmṛṣṭā sabhāmadhye rajasvalā | dyūte ca vañcito rājā śakunerbuddhilāghavāt
"और रजस्वला द्रौपदी को सभा के बीच पकड़ा गया; और शकुनि की चतुराई से राजा युधिष्ठिर जुए में ठगे गए।"
श्लोक 45 (9.33.45)
यानि चान्यानि दुष्टात्मन्पापानि कृतवानसि । अनागःसु च पार्थेषु तस्य पश्य महत्फलम् ॥
yāni cānyāni duṣṭātmanpāpāni kṛtavānasi | anāgaḥsu ca pārtheṣu tasya paśya mahatphalam
"और हे दुष्टात्मा, निरपराध पृथापुत्रों के प्रति तुमने जो-जो और पाप किए, उनका अब बड़ा फल देख लो।"
श्लोक 46 (9.33.46)
त्वत्कृते निहतः शेते शरतल्पे महायशाः । गाङ्गेयो भरतश्रेष्ठः सर्वेषां नः पितामहः ॥
tvatkṛte nihataḥ śete śaratalpe mahāyaśāḥ | gāṅgeyo bharataśreṣṭhaḥ sarveṣāṃ naḥ pitāmahaḥ
"तुम्हारे कारण यशस्वी गाङ्गेय, भरतश्रेष्ठ, हम सबके पितामह, मारे जाकर बाणों की शय्या पर पड़े हैं।"
श्लोक 47 (9.33.47)
हतो द्रोणश्च कर्णश्च हतः शल्यः प्रतापवान् । वैराग्नेरादिकर्ता च शकुनिर्निहतो रणे ॥
hato droṇaśca karṇaśca hataḥ śalyaḥ pratāpavān | vairāgnerādikartā ca śakunirnihato raṇe
"द्रोण मारे गए, कर्ण मारा गया, प्रतापी शल्य मारा गया, और वैर का आदि कारण शकुनि रण में मारा गया।"
श्लोक 48 (9.33.48)
भ्रातरस्ते हताः शूराः पुत्राश्च सहसैनिकाः । राजानश्च हताः शूराः समरेष्वनिवर्तिनः ॥
bhrātaraste hatāḥ śūrāḥ putrāśca sahasainikāḥ | rājānaśca hatāḥ śūrāḥ samareṣvanivartinaḥ
"तुम्हारे शूर भाई मारे गए, और पुत्र सेनाओं सहित मारे गए; युद्ध से कभी न लौटने वाले शूर राजा भी मारे गए।"
श्लोक 49 (9.33.49)
एते चान्ये च निहता बहवः क्षत्रियर्षभाः । प्रातिकामी तथा पापो द्रौपद्याः क्लेशकृद्धतः ॥
ete cānye ca nihatā bahavaḥ kṣatriyarṣabhāḥ | prātikāmī tathā pāpo draupadyāḥ kleśakṛddhataḥ
"ये और अन्य बहुत-से क्षत्रियश्रेष्ठ मारे गए; और द्रौपदी को कष्ट देने वाला पापी प्रातिकामी भी मारा गया।"
श्लोक 50 (9.33.50)
अवशिष्टस्त्वमेवैकः कुलघ्नोऽधमपूरुषः । त्वामप्यद्य हनिष्यामि गदया नात्र संशयः ॥
avaśiṣṭastvamevaikaḥ kulaghno'dhamapūruṣaḥ | tvāmapyadya haniṣyāmi gadayā nātra saṃśayaḥ
"हे कुलघाती, अधम पुरुष, अब केवल तुम अकेले बचे हो। आज मैं तुम्हें भी गदा से मारूँगा, इसमें संदेह नहीं।"
श्लोक 51 (9.33.51)
अद्य तेऽहं रणे दर्पं सर्वं नाशयिता नृप । राज्याशां विपुलां चापि पाण्डवेषु च दुष्कृतम् ॥
adya te'haṃ raṇe darpaṃ sarvaṃ nāśayitā nṛpa | rājyāśāṃ vipulāṃ cāpi pāṇḍaveṣu ca duṣkṛtam
"हे राजन्, आज मैं रण में तुम्हारा सारा दर्प, राज्य की तुम्हारी विशाल आशा और पाण्डवों के प्रति तुम्हारा किया हुआ अपराध नष्ट कर दूँगा।"
दुर्योधन उवाच
श्लोक 52 (9.33.52)
किं कत्थितेन बहुना युध्यस्वाद्य मया सह । अद्य तेऽहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां वृकोदर ॥
kiṃ katthitena bahunā yudhyasvādya mayā saha | adya te'haṃ vineṣyāmi yuddhaśraddhāṃ vṛkodara
"इतनी डींग से क्या लाभ? आज मुझसे लड़ो। हे वृकोदर, आज मैं तुम्हारा युद्ध का चाव निकाल दूँगा।"
श्लोक 53 (9.33.53)
किं न पश्यसि मां पाप गदायुद्धे व्यवस्थितम् । हिमवच्छिखराकारां प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥
kiṃ na paśyasi māṃ pāpa gadāyuddhe vyavasthitam | himavacchikharākārāṃ pragṛhya mahatīṃ gadām
"अरे पापी, क्या तुम नहीं देखते कि मैं हिमालय के शिखर जैसी विशाल गदा थामे गदा-युद्ध के लिए खड़ा हूँ?"
श्लोक 54 (9.33.54)
गदिनं कोऽद्य मां पाप हन्तुमुत्सहते रिपुः । न्यायतो युध्यमानश्च देवेष्वपि पुरन्दरः ॥
gadinaṃ ko'dya māṃ pāpa hantumutsahate ripuḥ | nyāyato yudhyamānaśca deveṣvapi purandaraḥ
"हे पापी, गदा लिए खड़े मुझे आज कौन शत्रु मारने का साहस करता है? और न्यायपूर्वक लड़ते हुए मुझे तो देवताओं में इन्द्र भी नहीं मार सकता।"
श्लोक 55 (9.33.55)
मा वृथा गर्ज कौन्तेय शारदाभ्रमिवाजलम् । दर्शयस्व बलं युद्धे यावन्नासून्निहन्मि ते ॥
mā vṛthā garja kaunteya śāradābhramivājalam | darśayasva balaṃ yuddhe yāvannāsūnnihanmi te
"हे कौन्तेय, जलरहित शरद् ऋतु के बादल की तरह व्यर्थ मत गरजो। मेरे तुम्हारे प्राण लेने से पहले युद्ध में अपना बल दिखा लो।"
सञ्जय उवाच
श्लोक 56 (9.33.56)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पाण्डवाः सहसृञ्जयाः । सर्वे सम्पूजयामासुस्तद्वचो विजिगीषवः ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā pāṇḍavāḥ sahasṛñjayāḥ | sarve sampūjayāmāsustadvaco vijigīṣavaḥ
उसकी बात सुनकर सृञ्जयों सहित पाण्डवों ने, जो सब विजय की इच्छा रखते थे, उन वचनों का अभिनन्दन किया।
श्लोक 57 (9.33.57)
उन्मत्तमिव मातङ्गं तलशब्देन मानवाः । भूयः संहर्षयामासू राजन्दुर्योधनं द्विषः ॥
unmattamiva mātaṅgaṃ talaśabdena mānavāḥ | bhūyaḥ saṃharṣayāmāsū rājanduryodhanaṃ dviṣaḥ
हे राजन्, जैसे लोग ताली की आवाज़ से उन्मत्त हाथी को उकसाते हैं, वैसे ही आपके शत्रुओं ने दुर्योधन को फिर उत्तेजित किया।
श्लोक 58 (9.33.58)
बृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हया हेषन्ति चासकृत् । शस्त्राणि सम्प्रदीप्यन्ते पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥
bṛṃhanti kuñjarāstatra hayā heṣanti cāsakṛt | śastrāṇi sampradīpyante pāṇḍavānāṃ jayaiṣiṇām
वहाँ हाथी चिंघाड़ने लगे, घोड़े बार-बार हिनहिनाने लगे, और विजय चाहने वाले पाण्डवों के शस्त्र चमक उठे।