Skip to main content

शल्य पर्व · अध्याय 34

गदायुद्ध देखने के लिए बलराम का आगमन

भीम और दुर्योधन के गदायुद्ध के आरम्भ होने पर बलराम यह सुनकर रणभूमि में आते हैं। पाण्डव, श्रीकृष्ण और अन्य राजा उनका सत्कार करते हैं, और वे कहते हैं कि बयालीस दिन बाहर रहकर लौटे हैं तथा अपने दोनों शिष्यों का युद्ध देखना चाहते हैं। युधिष्ठिर उनसे युद्ध देखने को कहते हैं, और वे राजाओं के बीच बैठ जाते हैं; तभी भयंकर द्वन्द्व आरम्भ होता है।

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35

सञ्जय उवाच

श्लोक 1 (9.34.1)

तस्मिन्युद्धे महाराज सुसंवृत्ते सुदारुणे । उपविष्टेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ॥

tasminyuddhe mahārāja susaṃvṛtte sudāruṇe | upaviṣṭeṣu sarveṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu

हे महाराज! जब वह अत्यन्त भयंकर युद्ध छिड़ गया और सब महात्मा पाण्डव बैठे हुए थे,

श्लोक 2 (9.34.2)

ततस्तालध्वजो रामस्तयोर्युद्ध उपस्थिते । श्रुत्वा तच्छिष्ययो राजन्नाजगाम हलायुधः ॥

tatastāladhvajo rāmastayoryuddha upasthite | śrutvā tacchiṣyayo rājannājagāma halāyudhaḥ

तब, हे राजन्! उन दोनों के युद्ध का समय आने पर, अपने उन दोनों शिष्यों के विषय में सुनकर ताड़-ध्वजवाले हलधर बलराम वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 3 (9.34.3)

तं दृष्ट्वा परमप्रीताः पाण्डवाः सहकेशवाः । उपगम्योपसङ्गृह्य विधिवत्प्रत्यपूजयन् ॥

taṃ dṛṣṭvā paramaprītāḥ pāṇḍavāḥ sahakeśavāḥ | upagamyopasaṅgṛhya vidhivatpratyapūjayan

उन्हें देखकर केशव-सहित पाण्डव अत्यन्त प्रसन्न हुए; उन्होंने पास जाकर उनके चरण पकड़े और विधिपूर्वक उनका सत्कार किया।

श्लोक 4 (9.34.4)

पूजयित्वा ततः पश्चादिदं वचनमब्रुवन् । शिष्ययोः कौशलं युद्धे पश्य रामेति पार्थिव ॥

pūjayitvā tataḥ paścādidaṃ vacanamabruvan | śiṣyayoḥ kauśalaṃ yuddhe paśya rāmeti pārthiva

सत्कार कर चुकने के बाद उन्होंने ये वचन कहे — 'हे राम! युद्ध में अपने दोनों शिष्यों की निपुणता देखिए।' हे राजन्!

श्लोक 5 (9.34.5)

अब्रवीच्च तदा रामो दृष्ट्वा कृष्णं सपाण्डवम् । दुर्योधनं च कौरव्यं गदापाणिमवस्थितम् ॥

abravīcca tadā rāmo dṛṣṭvā kṛṣṇaṃ sapāṇḍavam | duryodhanaṃ ca kauravyaṃ gadāpāṇimavasthitam

तब बलराम ने कृष्ण और पाण्डवों को तथा हाथ में गदा लिए खड़े कुरुवंशी दुर्योधन को देखकर कहा।

राम उवाच

श्लोक 6 (9.34.6)

चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृतस्य वै । पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः । शिष्ययोर्वै गदायुद्धं द्रष्टुकामोऽस्मि माधव ॥

catvāriṃśadahānyadya dve ca me niḥsṛtasya vai | puṣyeṇa samprayāto'smi śravaṇe punarāgataḥ | śiṣyayorvai gadāyuddhaṃ draṣṭukāmo'smi mādhava

'मुझे निकले हुए आज बयालीस दिन हो गए। मैं पुष्य नक्षत्र में चला था और श्रवण में लौटा हूँ। हे माधव! मैं अपने दोनों शिष्यों का गदायुद्ध देखना चाहता हूँ।'

सञ्जय उवाच

श्लोक 7 (9.34.7)

ततो युधिष्ठिरो राजा परिष्वज्य हलायुधम् । स्वागतं कुशलं चास्मै पर्यपृच्छद्यथातथम् ॥

tato yudhiṣṭhiro rājā pariṣvajya halāyudham | svāgataṃ kuśalaṃ cāsmai paryapṛcchadyathātatham

तब राजा युधिष्ठिर ने हलधर को गले लगाकर उनके आगमन का स्वागत किया और यथोचित रूप से उनका कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 8 (9.34.8)

कृष्णौ चापि महेष्वासावभिवाद्य हलायुधम् । सस्वजाते परिप्रीतौ प्रीयमाणौ यशस्विनौ ॥

kṛṣṇau cāpi maheṣvāsāvabhivādya halāyudham | sasvajāte pariprītau prīyamāṇau yaśasvinau

दोनों महाधनुर्धर कृष्णों — वासुदेव और अर्जुन — ने भी हलधर को प्रणाम किया, और वे दोनों यशस्वी प्रसन्न होकर उनसे गले मिले।

श्लोक 9 (9.34.9)

माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः । अभिवाद्य स्थिता राजन्रौहिणेयं महाबलम् ॥

mādrīputrau tathā śūrau draupadyāḥ pañca cātmajāḥ | abhivādya sthitā rājanrauhiṇeyaṃ mahābalam

माद्री के दोनों शूरवीर पुत्र और द्रौपदी के पाँचों पुत्र, हे राजन्! महाबली रोहिणीपुत्र को प्रणाम करके खड़े रहे।

श्लोक 10 (9.34.10)

भीमसेनोऽथ बलवान्पुत्रस्तव जनाधिप । तथैव चोद्यतगदौ पूजयामासतुर्बलम् ॥

bhīmaseno'tha balavānputrastava janādhipa | tathaiva codyatagadau pūjayāmāsaturbalam

हे जनाधिप! तब बलवान् भीमसेन और आपके पुत्र दुर्योधन ने भी, दोनों गदा उठाए हुए, उसी प्रकार बलराम का सत्कार किया।

श्लोक 11 (9.34.11)

स्वागतेन च ते तत्र प्रतिपूज्य पुनःपुनः । पश्य युद्धं महाबाहो इति ते राममब्रुवन् ॥

svāgatena ca te tatra pratipūjya punaḥpunaḥ | paśya yuddhaṃ mahābāho iti te rāmamabruvan

वहाँ बार-बार स्वागत और सत्कार करके उन्होंने बलराम से कहा, 'हे महाबाहो! युद्ध देखिए।'

श्लोक 12 (9.34.12)

एवमुचुर्महात्मानं रौहिणेयं नराधिपाः ॥

evamucurmahātmānaṃ rauhiṇeyaṃ narādhipāḥ

इस प्रकार राजाओं ने महात्मा रोहिणीपुत्र से कहा।

श्लोक 13 (9.34.13)

परिष्वज्य तदा रामः पाण्डवान्सह सृञ्जयान् । अपृच्छत्कुशलं सर्वान्पार्थिवांश्चामितौजसः । तथैव ते समासाद्य पप्रच्छुस्तमनामयम् ॥

pariṣvajya tadā rāmaḥ pāṇḍavānsaha sṛñjayān | apṛcchatkuśalaṃ sarvānpārthivāṃścāmitaujasaḥ | tathaiva te samāsādya papracchustamanāmayam

तब बलराम ने पाण्डवों और सृञ्जयों को गले लगाया और अपरिमित तेजवाले सब राजाओं से कुशल पूछा; उन्होंने भी पास आकर उनसे उनकी कुशल पूछी।

श्लोक 14 (9.34.14)

प्रत्यभ्यर्च्य हली सर्वान्क्षत्रियांश्च महात्मनः । कृत्वा कुशलसम्प्रश्नं संविदं च यथावयः ॥

pratyabhyarcya halī sarvānkṣatriyāṃśca mahātmanaḥ | kṛtvā kuśalasampraśnaṃ saṃvidaṃ ca yathāvayaḥ

हलधर ने सब महात्मा क्षत्रियों का भी सत्कार के बदले सत्कार किया; सबसे कुशल पूछा और प्रत्येक से उसकी आयु के अनुसार अभिवादन तथा बातचीत की।

श्लोक 15 (9.34.15)

जनार्दनं सात्यकिं च प्रेम्णा सम्परिषस्वजे । मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय कुशलं पर्यपृच्छत ॥

janārdanaṃ sātyakiṃ ca premṇā sampariṣasvaje | mūrdhni caitāvupāghrāya kuśalaṃ paryapṛcchata

उन्होंने जनार्दन और सात्यकि को प्रेम से गले लगाया और दोनों का मस्तक सूँघकर उनसे कुशल पूछी।

श्लोक 16 (9.34.16)

तौ च तं विधिवद्राजन्पूजयामासतुर्गुरुम् । ब्रह्माणमिव देवेशमिन्द्रोपेन्द्रौ मुदान्वितौ ॥

tau ca taṃ vidhivadrājanpūjayāmāsaturgurum | brahmāṇamiva deveśamindropendrau mudānvitau

हे राजन्! उन दोनों ने भी विधिपूर्वक अपने गुरु का सत्कार किया, जैसे इन्द्र और उपेन्द्र प्रसन्न होकर देवेश्वर ब्रह्मा का करते हैं।

श्लोक 17 (9.34.17)

ततोऽब्रवीद्धर्मसुतो रौहिणेयमरिन्दमम् । इदं भ्रात्रोर्महायुद्धं पश्य रामेति भारत ॥

tato'bravīddharmasuto rauhiṇeyamarindamam | idaṃ bhrātrormahāyuddhaṃ paśya rāmeti bhārata

तब धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने शत्रुदमन रोहिणीपुत्र से कहा, 'हे राम! हे भारत! इन दोनों भाइयों का यह महायुद्ध देखिए।'

श्लोक 18 (9.34.18)

तेषां मध्ये महाबाहुः श्रीमान्केशवपूर्वजः । न्यविशत्परमप्रीतः पूज्यमानो महारथैः ॥

teṣāṃ madhye mahābāhuḥ śrīmānkeśavapūrvajaḥ | nyaviśatparamaprītaḥ pūjyamāno mahārathaiḥ

उनके बीच महाबाहु, शोभाशाली, केशव के बड़े भाई, महारथियों से सम्मानित होते हुए, अत्यन्त प्रसन्न होकर बैठ गए।

श्लोक 19 (9.34.19)

स बभौ राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः । दिवीव नक्षत्रगणैः परिवीतो निशाकरः ॥

sa babhau rājamadhyastho nīlavāsāḥ sitaprabhaḥ | divīva nakṣatragaṇaiḥ parivīto niśākaraḥ

राजाओं के बीच बैठे हुए, नीले वस्त्र और श्वेत कान्तिवाले वे ऐसे शोभित हुए जैसे आकाश में नक्षत्रों के समूह से घिरा हुआ चन्द्रमा।

श्लोक 20 (9.34.20)

ततस्तयोः सन्निपातस्तुमुलो रोमहर्षणः । आसीदन्तकरो राजन्वैरस्यान्तं विधित्सतोः ॥

tatastayoḥ sannipātastumulo romaharṣaṇaḥ | āsīdantakaro rājanvairasyāntaṃ vidhitsatoḥ

तब, हे राजन्! उन दोनों की भीषण और रोमांचकारी भिड़न्त हुई, जो प्राणों का अन्त करनेवाली थी; क्योंकि दोनों अपने वैर का अन्त कर देना चाहते थे।

अध्याय 33अध्याय-सूचीअध्याय 35