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शल्य पर्व · अध्याय 35

बलराम की तीर्थयात्रा का आरम्भ

जनमेजय पूछते हैं कि दोनों पक्षों में से किसी का साथ न देनेवाले बलराम अन्त में कैसे उपस्थित हुए। वैशम्पायन बताते हैं कि कृष्ण का शान्ति-दौत्य विफल हुआ, बलराम रुष्ट होकर यादवों के साथ सरस्वती के प्रवाह के विपरीत (ऊपर की ओर) तीर्थयात्रा पर निकले, मार्ग भर में ब्राह्मणों के लिए व्यवस्था की गई, और वे तीर्थों में विपुल धन दान करते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे। सरस्वती के तीर्थों का माहात्म्य पूछे जाने पर वैशम्पायन प्रभास से आरम्भ करते हैं, जहाँ शापमुक्त चन्द्रमा फिर प्रकाशित होता है।

अध्याय 34अध्याय-सूचीअध्याय 36

जनमेजय उवाच

श्लोक 1 (9.35.1)

पूर्वमेव यदा रामस्तस्मिन्युद्ध उपस्थिते । आमन्त्र्य केशवं यातो वृष्णिभिः सहितः प्रभुः ॥

pūrvameva yadā rāmastasminyuddha upasthite | āmantrya keśavaṃ yāto vṛṣṇibhiḥ sahitaḥ prabhuḥ

बहुत पहले, जब वह युद्ध उपस्थित हुआ, तब प्रभु बलराम वृष्णियों के साथ केशव से विदा लेकर चले गए थे।

राम उवाच

श्लोक 2 (9.35.2)

साहाय्यं धार्तराष्ट्रस्य न च कर्ताऽस्मि केशव । न चैव पाण्डुपुत्राणां गमिष्यामि यथागतम् ॥

sāhāyyaṃ dhārtarāṣṭrasya na ca kartā'smi keśava | na caiva pāṇḍuputrāṇāṃ gamiṣyāmi yathāgatam

'हे केशव! मैं धृतराष्ट्र-पुत्र की सहायता नहीं करूँगा, और पाण्डुपुत्रों के पास भी नहीं जाऊँगा; जैसे आया था वैसे ही चला जाऊँगा।'

जनमेजय उवाच

श्लोक 3 (9.35.3)

एवमुक्त्वा तदा रामो यातः शत्रुनिबर्हणः । तस्य चागमनं भूयो ब्रह्मञ्शंसितुमर्हसि ॥

evamuktvā tadā rāmo yātaḥ śatrunibarhaṇaḥ | tasya cāgamanaṃ bhūyo brahmañśaṃsitumarhasi

ऐसा कहकर शत्रुओं का संहार करनेवाले बलराम चले गए थे। हे ब्रह्मन्! अब उनके फिर लौट आने का वृत्तान्त आप कहिए।

श्लोक 4 (9.35.4)

आख्याहि मे विस्तरशः कथं राम उपस्थितः । कथं च दृष्टवान्युद्धं कुशलो ह्यसि सत्तम ॥

ākhyāhi me vistaraśaḥ kathaṃ rāma upasthitaḥ | kathaṃ ca dṛṣṭavānyuddhaṃ kuśalo hyasi sattama

विस्तार से मुझे बताइए कि बलराम कैसे लौटे और उन्होंने युद्ध कैसे देखा; हे सत्तम! आप सब जानते हैं।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 5 (9.35.5)

उपप्लाव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु । प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीपं मधुसूदनः ॥

upaplāvye niviṣṭeṣu pāṇḍaveṣu mahātmasu | preṣito dhṛtarāṣṭrasya samīpaṃ madhusūdanaḥ

जब महात्मा पाण्डव उपप्लव्य में ठहरे हुए थे, तब मधुसूदन धृतराष्ट्र के पास भेजे गए —

श्लोक 6 (9.35.6)

शमं प्रति महाबाहो हितार्थं सर्वदेहिनाम् । स गत्वा हास्तिनपुरं धृतराष्ट्रं समेत्य च ॥

śamaṃ prati mahābāho hitārthaṃ sarvadehinām | sa gatvā hāstinapuraṃ dhṛtarāṣṭraṃ sametya ca

हे महाबाहो! शान्ति के लिए, सब प्राणियों के हित के लिए। हस्तिनापुर जाकर और धृतराष्ट्र से मिलकर

श्लोक 7 (9.35.7)

उक्तवान्वचनं पथ्यं हितं चैव विशेषतः ॥

uktavānvacanaṃ pathyaṃ hitaṃ caiva viśeṣataḥ

उन्होंने पथ्य और विशेष रूप से हितकर वचन कहे।

श्लोक 8 (9.35.8)

न च तत्कृतवान्राजा यथाऽख्यातं हि तत्पुरा ॥

na ca tatkṛtavānrājā yathā'khyātaṃ hi tatpurā

परन्तु राजा ने उस पर अमल नहीं किया, जैसा कि पहले ही कहा जा चुका था।

श्लोक 9 (9.35.9)

अनवाप्य शमं तत्र कृष्णः पुरुषसत्तमः । आगच्छत महाबाहुरुपप्लाव्यं जनाधिप ॥

anavāpya śamaṃ tatra kṛṣṇaḥ puruṣasattamaḥ | āgacchata mahābāhurupaplāvyaṃ janādhipa

वहाँ शान्ति न पा सकने पर पुरुषोत्तम कृष्ण, हे जनाधिप! उपप्लव्य लौट आए।

श्लोक 10 (9.35.10)

ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जितः । आजगाम नरव्याघ्रः पाण्डवानामनीकिनीम् । यथोक्तं च यथावृत्तं गत्वा पाण्डवमब्रवीत् ॥

tataḥ pratyāgataḥ kṛṣṇo dhārtarāṣṭravisarjitaḥ | ājagāma naravyāghraḥ pāṇḍavānāmanīkinīm | yathoktaṃ ca yathāvṛttaṃ gatvā pāṇḍavamabravīt

तब धृतराष्ट्र-पुत्रों द्वारा विदा किए गए कृष्ण लौटे; नरश्रेष्ठ वे पाण्डवों की सेना में आए और जैसा कहा गया था तथा जैसा हुआ था वह सब बताकर पाण्डव से बोले।

वासुदेव उवाच

श्लोक 11 (9.35.11)

न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः । निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥

na kurvanti vaco mahyaṃ kuravaḥ kālanoditāḥ | nirgacchadhvaṃ pāṇḍaveyāḥ puṣyeṇa sahitā mayā

'काल से प्रेरित कौरव मेरी बात नहीं मानते। हे पाण्डवो! मेरे साथ पुष्य नक्षत्र में निकल पड़ो।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 12 (9.35.12)

ततो विभज्यमानेषु बलेषु बलिनां वरः । प्रोवाच भ्रातरं कृष्णं रौहिणेयो महामनाः ॥

tato vibhajyamāneṣu baleṣu balināṃ varaḥ | provāca bhrātaraṃ kṛṣṇaṃ rauhiṇeyo mahāmanāḥ

तब सेनाओं की व्यूह-रचना होते समय बलवानों में श्रेष्ठ, उदारचित्त रोहिणीपुत्र ने अपने भाई कृष्ण से कहा।

श्लोक 13 (9.35.13)

तेषामपि महाबाहो साहाय्यं मधुसूदन । क्रियतामिति तत्कृष्णो नास्य चक्रे वचस्तदा ॥

teṣāmapi mahābāho sāhāyyaṃ madhusūdana | kriyatāmiti tatkṛṣṇo nāsya cakre vacastadā

'हे महाबाहो मधुसूदन! उनकी भी सहायता की जाए' — पर कृष्ण ने तब उनका वचन नहीं माना।

श्लोक 14 (9.35.14)

ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः । तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः । मैत्रनक्षत्रयोगे स्म सहितः सर्वयादवैः ॥

tato manyuparītātmā jagāma yadunandanaḥ | tīrthayātrāṃ haladharaḥ sarasvatyāṃ mahāyaśāḥ | maitranakṣatrayoge sma sahitaḥ sarvayādavaiḥ

तब क्रोध से भरे हुए यदुनन्दन, महायशस्वी हलधर सब यादवों के साथ मैत्र नक्षत्र के योग में सरस्वती की तीर्थयात्रा पर चल पड़े।

श्लोक 15 (9.35.15)

आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिन्दमः । युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ॥

āśrayāmāsa bhojastu duryodhanamarindamaḥ | yuyudhānena sahito vāsudevastu pāṇḍavān

शत्रुदमन भोज (कृतवर्मा) ने दुर्योधन का आश्रय लिया; और वासुदेव ने युयुधान के साथ पाण्डवों का।

श्लोक 16 (9.35.16)

रौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः । पाण्डवेयान्पुरस्कृत्य ययावभिमुखः कूरून् ॥

rauhiṇeye gate śūre puṣyeṇa madhusūdanaḥ | pāṇḍaveyānpuraskṛtya yayāvabhimukhaḥ kūrūn

शूर रोहिणीपुत्र के चले जाने पर मधुसूदन पुष्य नक्षत्र में पाण्डवों को आगे करके कौरवों की ओर बढ़े।

श्लोक 17 (9.35.17)

गच्छन्नेव पथिस्थस्तु रामः प्रेष्यानुवाच ह । सम्भारांस्तीर्थयात्रायां सर्वोपकरणानि च ॥

gacchanneva pathisthastu rāmaḥ preṣyānuvāca ha | sambhārāṃstīrthayātrāyāṃ sarvopakaraṇāni ca

मार्ग में जाते-जाते ही बलराम ने सेवकों से कहा — तीर्थयात्रा की सामग्री और सब साधन —

राम उवाच

श्लोक 18 (9.35.18)

आनयध्वं द्वारकाया अग्नीन्वै याजकांस्तथा । सुवर्णरजनं चैव धेनूर्वासांसि वाजिनः ॥

ānayadhvaṃ dvārakāyā agnīnvai yājakāṃstathā | suvarṇarajanaṃ caiva dhenūrvāsāṃsi vājinaḥ

'द्वारका से यज्ञ की अग्नियाँ और याजकों को ले आओ; सोना-चाँदी, गायें, वस्त्र और घोड़े,

श्लोक 19 (9.35.19)

कुञ्जरांश्च रथांश्चैव खरोष्ट्रं वाहनानि च । क्षिप्रमानीयतां सर्वं तीर्थहेतोः परिच्छदम् ॥

kuñjarāṃśca rathāṃścaiva kharoṣṭraṃ vāhanāni ca | kṣipramānīyatāṃ sarvaṃ tīrthahetoḥ paricchadam

हाथी, रथ, गधे, ऊँट और सवारियाँ — तीर्थ के लिए आवश्यक सारी सामग्री शीघ्र लाई जाए।

श्लोक 20 (9.35.20)

प्रतिस्रोतः सरस्वत्या गच्छध्वं शीघ्रगामिनः । ऋत्विजश्चानयध्वं वै शतशश्च द्विजर्षभान् ॥

pratisrotaḥ sarasvatyā gacchadhvaṃ śīghragāminaḥ | ṛtvijaścānayadhvaṃ vai śataśaśca dvijarṣabhān

तुम शीघ्र चलनेवाले लोग सरस्वती के प्रवाह के विपरीत (ऊपर की ओर) जाओ, और ऋत्विजों तथा सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को ले आओ।'

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 21 (9.35.21)

एवं सन्दिश्य तु प्रेष्यान्बलदेवो महाबलः । तीर्थयात्रां ययौ राजन्कुरूणां वैशसे तदा ॥

evaṃ sandiśya tu preṣyānbaladevo mahābalaḥ | tīrthayātrāṃ yayau rājankurūṇāṃ vaiśase tadā

इस प्रकार सेवकों को आदेश देकर महाबली बलदेव, हे राजन्! कौरवों के संहार के समय तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।

श्लोक 22 (9.35.22)

सरस्वत्याः प्रतिस्रोतः समुद्रादभिजग्मिवान् । रामो यदूत्तमः श्रीमांस्तीर्थयात्रामनुस्मरन् ॥

sarasvatyāḥ pratisrotaḥ samudrādabhijagmivān | rāmo yadūttamaḥ śrīmāṃstīrthayātrāmanusmaran

यदुश्रेष्ठ, श्रीमान् बलराम तीर्थयात्रा का स्मरण करते हुए समुद्र से चलकर सरस्वती के प्रवाह के विपरीत (ऊपर की ओर) चल पड़े,

श्लोक 23 (9.35.23)

ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च यथाऽन्यैर्द्विजसत्तमैः । रथैर्गजैस्तथाऽश्वैश्च प्रेष्यैश्च भरतर्षभ । गोखरोष्ट्रप्रयुक्तैश्च यानैश्च बहुभिर्वृतः ॥

ṛtvigbhiśca suhṛdbhiśca yathā'nyairdvijasattamaiḥ | rathairgajaistathā'śvaiśca preṣyaiśca bharatarṣabha | gokharoṣṭraprayuktaiśca yānaiśca bahubhirvṛtaḥ

हे भरतश्रेष्ठ! ऋत्विजों, मित्रों और अन्य श्रेष्ठ ब्राह्मणों से, तथा रथों, हाथियों, घोड़ों और सेवकों से, और बैल, गधे और ऊँटों से जुते बहुत-से वाहनों से घिरे हुए।

श्लोक 24 (9.35.24)

श्रान्तानां क्लान्तबपुषां शिशूनां विपुलायुषाम् । देशेदेशे तु देयानि दानानि विविधानि च ॥

śrāntānāṃ klāntabapuṣāṃ śiśūnāṃ vipulāyuṣām | deśedeśe tu deyāni dānāni vividhāni ca

थके हुए, शिथिल शरीरवाले, बालकों और दीर्घायु (वृद्ध) जनों के लिए स्थान-स्थान पर नाना प्रकार के दान देने के लिए रखे गए थे;

श्लोक 25 (9.35.25)

अर्चायै चार्थिनां राजन्क्लृप्तानि बहुशस्तथा । तानि यानीह देशेषु प्रतीक्षन्ति स्म भारत ॥

arcāyai cārthināṃ rājanklṛptāni bahuśastathā | tāni yānīha deśeṣu pratīkṣanti sma bhārata

हे राजन्! याचकों के सम्मान के लिए बहुत-से दान नियत कर दिए गए थे; हे भारत! वे मार्ग के स्थानों में प्रतीक्षा करते रहते थे।

श्लोक 26 (9.35.26)

बुभुक्षितानामर्थाय क्लृप्तमन्नं समन्ततः ॥

bubhukṣitānāmarthāya klṛptamannaṃ samantataḥ

भूखों के लिए सब ओर अन्न तैयार रखा गया था।

श्लोक 27 (9.35.27)

योयो यत्र द्विजो भोज्यं भोक्तुं कामयते तदा । तस्यतस्य तु तत्रैवमुपजह्रुस्तदा नृप ॥

yoyo yatra dvijo bhojyaṃ bhoktuṃ kāmayate tadā | tasyatasya tu tatraivamupajahrustadā nṛpa

जो-जो ब्राह्मण जहाँ-जहाँ उस समय भोजन करना चाहता, उस-उसको वहीं भोजन पहुँचा दिया जाता था, हे राजन्!

श्लोक 28 (9.35.28)

तत्रतत्र स्थिता राजन्रौहिणेयस्य शासनात् । भक्ष्यपेयस्य कुर्वन्ति राशींस्तत्र समन्ततः ॥

tatratatra sthitā rājanrauhiṇeyasya śāsanāt | bhakṣyapeyasya kurvanti rāśīṃstatra samantataḥ

रोहिणीपुत्र की आज्ञा से जहाँ-तहाँ नियुक्त मनुष्य सब ओर खाने-पीने की वस्तुओं के ढेर लगाते थे।

श्लोक 29 (9.35.29)

वासांसि च महार्हाणि पर्यङ्कास्तरणानि च । पूजार्थं तत्र क्लृप्तानि विप्राणां सुखमिच्छताम् ॥

vāsāṃsi ca mahārhāṇi paryaṅkāstaraṇāni ca | pūjārthaṃ tatra klṛptāni viprāṇāṃ sukhamicchatām

सुख चाहनेवाले ब्राह्मणों के सम्मान के लिए वहाँ बहुमूल्य वस्त्र, पलंग और बिछौने रखे गए थे।

श्लोक 30 (9.35.30)

यत्र यः स्वपते विप्रो यो वा जागर्ति भारत । तत्रतत्रैव सर्वस्य क्लृप्तं सर्वमपश्यत ॥

yatra yaḥ svapate vipro yo vā jāgarti bhārata | tatratatraiva sarvasya klṛptaṃ sarvamapaśyata

हे भारत! जहाँ कोई ब्राह्मण सोता या जागता, वहीं-वहीं उसके लिए सब कुछ तैयार किया हुआ दिखाई देता था।

श्लोक 31 (9.35.31)

यथासुखं जनः सर्वो याति तिष्ठति वै तदा । यातुकामस्य यानानि पानानि तृषितस्य च ॥

yathāsukhaṃ janaḥ sarvo yāti tiṣṭhati vai tadā | yātukāmasya yānāni pānāni tṛṣitasya ca

सब लोग अपनी इच्छा के अनुसार रुकते या चलते थे; चलने के इच्छुक के लिए सवारियाँ थीं, प्यासे के लिए पेय,

श्लोक 32 (9.35.32)

बुभुक्षितस्य चान्नानि स्वादूनि भरतर्षभ । उपजह्रुर्नरास्तत्र वस्त्राण्याभरणानि च ॥

bubhukṣitasya cānnāni svādūni bharatarṣabha | upajahrurnarāstatra vastrāṇyābharaṇāni ca

और भूखे के लिए स्वादिष्ट भोजन, हे भरतश्रेष्ठ! लोग वहाँ वस्त्र और आभूषण भी लाकर देते थे।

श्लोक 33 (9.35.33)

स पन्थाः प्रबभौ राजन्सर्वस्यैव सुखावहः । स्वर्गोपमस्तदा वीर नराणां तत्र गच्छताम् ॥

sa panthāḥ prababhau rājansarvasyaiva sukhāvahaḥ | svargopamastadā vīra narāṇāṃ tatra gacchatām

हे राजन्! वह मार्ग सबके लिए सुखदायक होकर शोभित हुआ, और हे वीर! वहाँ जानेवाले लोगों के लिए स्वर्ग के समान था।

श्लोक 34 (9.35.34)

नित्यप्रमुदितोपेतः स्वादुभक्ष्यो जलान्वितः । विपण्यापणपण्यानां नानाजनशतैर्वृतः । नानाद्रुमलतोपेतो नानारत्नविभूषितः ॥

nityapramuditopetaḥ svādubhakṣyo jalānvitaḥ | vipaṇyāpaṇapaṇyānāṃ nānājanaśatairvṛtaḥ | nānādrumalatopeto nānāratnavibhūṣitaḥ

वह सदा आनन्द से भरा, स्वादिष्ट भोजन और जल से सम्पन्न, दुकानों, बाज़ारों और बिकाऊ वस्तुओं तथा सैकड़ों तरह के लोगों से भरा, नाना वृक्षों और लताओं से युक्त और नाना रत्नों से सजा हुआ था।

श्लोक 35 (9.35.35)

ततो महात्मा नियतो मनस्विनां । पुण्येषु तीर्थेषु वसूनि राजन् । ददौ द्विजेभ्यः क्रतुदक्षिणाश्च । यदुप्रवीरो हलभृत्प्रतीतः ॥

tato mahātmā niyato manasvināṃ | puṇyeṣu tīrtheṣu vasūni rājan | dadau dvijebhyaḥ kratudakṣiṇāśca | yadupravīro halabhṛtpratītaḥ

तब उन महात्मा ने, जो उदार मनवालों में संयमी थे, पवित्र तीर्थों में ब्राह्मणों को धन तथा यज्ञ की दक्षिणाएँ दीं — वे यदुवीर हलधर प्रसन्नचित्त थे।

श्लोक 36 (9.35.36)

दोग्ध्रीश्च धेनूश्च सहस्रशो वै । सुवाससः काञ्चनबद्धशृङ्गीः । हयांश्च नानाविधदेशजातान् । यानानि दासांश्च शुभान्द्विजेभ्यः ॥

dogdhrīśca dhenūśca sahasraśo vai | suvāsasaḥ kāñcanabaddhaśṛṅgīḥ | hayāṃśca nānāvidhadeśajātān | yānāni dāsāṃśca śubhāndvijebhyaḥ

हज़ारों दुधारू गायें और अन्य गायें, सुन्दर वस्त्र पहने और सींगों में सोना मढ़ाए हुए; नाना देशों में उत्पन्न घोड़े; सवारियाँ और सुन्दर सेवक — ये सब उन्होंने ब्राह्मणों को दिए।

श्लोक 37 (9.35.37)

रत्नानि मुक्तामणिविद्रुमं चापि । अग्र्यं सुवर्णं रजतं सुशुभ्रम् । अयस्मयं ताम्रमयं च भाण्डं । ददौ द्विजातिप्रवरेषु रामः ॥

ratnāni muktāmaṇividrumaṃ cāpi | agryaṃ suvarṇaṃ rajataṃ suśubhram | ayasmayaṃ tāmramayaṃ ca bhāṇḍaṃ | dadau dvijātipravareṣu rāmaḥ

रत्न — मोती, मणियाँ और मूँगे — तथा उत्तम सोना, चमकती चाँदी, और लोहे तथा ताँबे के बर्तन, राम ने श्रेष्ठ द्विजों को दिए।

श्लोक 38 (9.35.38)

एवं स वित्तं प्रददौ महात्मा । सरस्वतीतीर्थगतेषु भूरि । ययौ क्रमेणाप्रतिमप्रभावः । ततः कुरुक्षेत्रमुदारवृत्तः ॥

evaṃ sa vittaṃ pradadau mahātmā | sarasvatītīrthagateṣu bhūri | yayau krameṇāpratimaprabhāvaḥ | tataḥ kurukṣetramudāravṛttaḥ

इस प्रकार उन महात्मा ने सरस्वती के तीर्थों में आए हुए लोगों को प्रचुर धन दिया; फिर उदार आचरणवाले, अनुपम प्रभाववाले बलराम क्रम से कुरुक्षेत्र पहुँचे।

जनमेजय उवाच

श्लोक 39 (9.35.39)

सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे । फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्म निर्वृत्तिमेव च ॥

sārasvatānāṃ tīrthānāṃ guṇotpattiṃ vadasva me | phalaṃ ca dvipadāṃ śreṣṭha karma nirvṛttimeva ca

हे द्विपदों में श्रेष्ठ! सरस्वती के तीर्थों के गुण और उत्पत्ति, उनका फल और वहाँ कर्म की सिद्धि मुझसे कहिए।

श्लोक 40 (9.35.40)

यथाक्रमेण भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वशः । ब्रूहि ब्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ॥

yathākrameṇa bhagavaṃstīrthānāmanupūrvaśaḥ | brūhi brahmavidāṃ śreṣṭha paraṃ kautūhalaṃ hi me

हे भगवन्! हे ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ! तीर्थों को यथाक्रम एक-एक करके बताइए; मुझे बड़ा कौतूहल है।

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 41 (9.35.41)

तीर्थानां च फलं राजन्गुणोत्पत्तिं च सर्वशः । मयोच्यमानं वै पुण्यं शृणु राजेन्द्र कृत्स्नशः ॥

tīrthānāṃ ca phalaṃ rājanguṇotpattiṃ ca sarvaśaḥ | mayocyamānaṃ vai puṇyaṃ śṛṇu rājendra kṛtsnaśaḥ

हे राजन्! तीर्थों का फल और उनके गुणों की उत्पत्ति मैं पूर्ण रूप से कहता हूँ; हे राजेन्द्र! मेरे द्वारा कही जाती इस पुण्य कथा को सम्पूर्ण रूप से सुनिए।

श्लोक 42 (9.35.42)

पूर्वं महाराज यदुप्रवीर । ऋत्विक्सुहृद्विप्रगणैश्च सार्धम् । पुण्यं प्रभासं समुपाजगाम । यत्रोडुराड्यक्ष्मणा क्षीयमाणः ॥

pūrvaṃ mahārāja yadupravīra | ṛtviksuhṛdvipragaṇaiśca sārdham | puṇyaṃ prabhāsaṃ samupājagāma | yatroḍurāḍyakṣmaṇā kṣīyamāṇaḥ

हे महाराज! पहले यदुवीर बलराम ऋत्विजों, मित्रों और ब्राह्मण-समूहों के साथ पवित्र प्रभास तीर्थ पहुँचे, जहाँ क्षय-रोग से क्षीण होता हुआ नक्षत्रराज चन्द्रमा

श्लोक 43 (9.35.43)

विमुक्तशापः पुनराप्य तेजः । सर्वं जगद्भासयते नरेन्द्र । एतत्तु तीर्थप्रवरं पृथिव्यां । प्रभासनात्तस्य ततः प्रभासः ॥

vimuktaśāpaḥ punarāpya tejaḥ | sarvaṃ jagadbhāsayate narendra | etattu tīrthapravaraṃ pṛthivyāṃ | prabhāsanāttasya tataḥ prabhāsaḥ

शाप से मुक्त होकर और अपना तेज फिर पाकर, हे नरेन्द्र! सारे जगत् को प्रकाशित करता है। यह पृथ्वी का श्रेष्ठ तीर्थ है, और वहाँ उसके प्रकाशित होने से इसका नाम प्रभास पड़ा।

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