शल्य पर्व · अध्याय 36
चन्द्रमा को शाप और प्रभास तीर्थ का नामकरण
जनमेजय पूछते हैं कि सोम को क्षय-रोग क्यों हुआ और वे कैसे स्वस्थ हुए। वैशम्पायन बताते हैं कि दक्ष ने अपनी सत्ताईस कन्याएँ सोम को दीं, सोम केवल रोहिणी का आदर करते रहे, और दो बार कहने पर भी न मानने पर दक्ष ने उन्हें क्षय-रोग का शाप दिया। सोम के क्षीण होने पर औषधियाँ और फिर प्राणी क्षीण होने लगे; देवताओं की प्रार्थना पर दक्ष ने कहा कि चन्द्रमा बारी-बारी से घटेगा-बढ़ेगा और सरस्वती में स्नान करेगा। अमावास्या को प्रभास में स्नान करके सोम फिर चमके; फिर बलराम ने वहाँ स्नान कर दान दिए और चमसोद्भेद तथा उदपान की ओर गए।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (9.36.1)
किमर्थं भगवान्सोमो यक्ष्मणा समगृह्यत । कथं च तीर्थप्रवरे तस्मिंश्चन्द्रो न्यमज्जत ॥
kimarthaṃ bhagavānsomo yakṣmaṇā samagṛhyata | kathaṃ ca tīrthapravare tasmiṃścandro nyamajjata
भगवान् सोम को क्षय-रोग (यक्ष्मा) क्यों हुआ? और उस श्रेष्ठ तीर्थ में चन्द्रमा ने स्नान कैसे किया?
श्लोक 2 (9.36.2)
कथमाप्लुत्य तस्मिंस्तु पुनराप्यायितः शशी । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने ॥
kathamāplutya tasmiṃstu punarāpyāyitaḥ śaśī | etanme sarvamācakṣva vistareṇa mahāmune
और वहाँ स्नान करके शशलक्षण चन्द्रमा फिर कैसे पूर्ण हुआ? हे महामुने! यह सब मुझे विस्तार से बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (9.36.3)
दक्षस्य तनयास्तात प्रादुरासन्विशाम्पते । स सप्तविंशतिं कन्या दक्षः सोमाय वै ददौ ॥
dakṣasya tanayāstāta prādurāsanviśāmpate | sa saptaviṃśatiṃ kanyā dakṣaḥ somāya vai dadau
हे तात! हे विशाम्पते! दक्ष की कन्याएँ उत्पन्न हुईं। उन कन्याओं में से सत्ताईस दक्ष ने सोम को दीं।
श्लोक 4 (9.36.4)
नक्षत्रयोगनिरताः सङ्ख्यानार्थं च ताभवन् । पत्न्यो वै तस्य राजेन्द्र सोमस्य शुभकर्मणः ॥
nakṣatrayoganiratāḥ saṅkhyānārthaṃ ca tābhavan | patnyo vai tasya rājendra somasya śubhakarmaṇaḥ
हे राजेन्द्र! नक्षत्रों के योग में लगी रहनेवाली और गणना के लिए नियुक्त वे कन्याएँ शुभकर्मा सोम की पत्नियाँ बनीं।
श्लोक 5 (9.36.5)
तास्तु सर्वा विशालाक्ष्यो रूपेणाप्रतिमाऽभवन् । अत्यरिच्यत तासां तु रोहिणी रूपसम्पदा ॥
tāstu sarvā viśālākṣyo rūpeṇāpratimā'bhavan | atyaricyata tāsāṃ tu rohiṇī rūpasampadā
वे सब विशाल नेत्रोंवाली और अनुपम रूपवती थीं, फिर भी रोहिणी अपने रूप-वैभव में उन सबसे बढ़कर थी।
श्लोक 6 (9.36.6)
ततस्तस्यां स भगवान्प्रीतिं चक्रे निशाकरः । साऽस्य हृद्या बभूवाथ तस्मात्तां बुभुजे सदा ॥
tatastasyāṃ sa bhagavānprītiṃ cakre niśākaraḥ | sā'sya hṛdyā babhūvātha tasmāttāṃ bubhuje sadā
तब भगवान् निशाकर ने उसमें प्रीति की; वह उनके हृदय को प्रिय हो गई, इसलिए वे सदा उसी का सहवास करते रहे।
श्लोक 7 (9.36.7)
ततस्ताः कुपिताः सर्वा नक्षत्राख्या महात्मनः । ता गत्वा पितरं प्राहुः प्रजापतिमतन्द्रिताः ॥
tatastāḥ kupitāḥ sarvā nakṣatrākhyā mahātmanaḥ | tā gatvā pitaraṃ prāhuḥ prajāpatimatandritāḥ
तब नक्षत्र नामवाली वे सब पत्नियाँ उन महात्मा पर कुपित हो गईं; वे बिना देर किए अपने पिता प्रजापति के पास गईं और बोलीं —
नक्षत्राण्यूचुः
श्लोक 8 (9.36.8)
सोमो वसति नास्मासु रोहिणीं भजते सदा । ता वयं सहिताः सर्वास्त्वत्सकाशे प्रजेश्वर । वत्स्यामो नियताहारास्तपश्चरणतत्पराः ॥
somo vasati nāsmāsu rohiṇīṃ bhajate sadā | tā vayaṃ sahitāḥ sarvāstvatsakāśe prajeśvara | vatsyāmo niyatāhārāstapaścaraṇatatparāḥ
'सोम हमारे पास नहीं रहते; वे सदा रोहिणी का ही सेवन करते हैं। इसलिए हे प्रजापति! हम सब साथ मिलकर आपके पास रहेंगी, नियमित आहार करती हुई और तपस्या में लगी हुई।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 9 (9.36.9)
श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व सर्वासु मा त्वाऽधर्मो महान्स्पृशेत् ॥
śrutvā tāsāṃ tu vacanaṃ dakṣaḥ somamathābravīt | samaṃ vartasva sarvāsu mā tvā'dharmo mahānspṛśet
उनकी बात सुनकर दक्ष ने सोम से कहा, 'सभी पत्नियों के साथ समान व्यवहार करो, कहीं महान् अधर्म तुम्हें न छू ले।'
श्लोक 10 (9.36.10)
तास्तु सर्वाऽब्रवीद्दक्षो गच्छध्वं शशिनोऽन्तिकम् । समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ॥
tāstu sarvā'bravīddakṣo gacchadhvaṃ śaśino'ntikam | samaṃ vatsyati sarvāsu candramā mama śāsanāt
और दक्ष ने उन सबसे कहा, 'चन्द्रमा के पास जाओ। मेरी आज्ञा से चन्द्रमा सबके साथ समान रूप से रहेगा।'
श्लोक 11 (9.36.11)
विसृष्टास्तास्तथा जग्मुः शीतांशोर्भवनं शुभाः । तथाऽपि सोमो भगवान्पुनरेव महीपते । रोहिण्या सार्धमवसत्प्रीयमाणो मुहुर्मुहुः ॥
visṛṣṭāstāstathā jagmuḥ śītāṃśorbhavanaṃ śubhāḥ | tathā'pi somo bhagavānpunareva mahīpate | rohiṇyā sārdhamavasatprīyamāṇo muhurmuhuḥ
विदा की गई वे शुभ पत्नियाँ शीतल किरणोंवाले चन्द्रमा के भवन में गईं। फिर भी, हे महीपते! भगवान् सोम बार-बार प्रसन्न होकर रोहिणी के साथ ही रहते रहे।
श्लोक 12 (9.36.12)
ततस्ताः सहिताः सर्वा भूयः पितरमब्रुवन् ॥
tatastāḥ sahitāḥ sarvā bhūyaḥ pitaramabruvan
तब वे सब इकट्ठी होकर फिर अपने पिता से बोलीं —
नक्षत्राण्यूचुः
श्लोक 13 (9.36.13)
सोमो वसति नास्मासु नाकरोद्वचनं तव । तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवान्तिके ॥
somo vasati nāsmāsu nākarodvacanaṃ tava | tava śuśrūṣaṇe yuktā vatsyāmo hi tavāntike
'सोम हमारे पास नहीं रहते; उन्होंने आपकी आज्ञा नहीं मानी। हम आपकी सेवा में लगी हुई आपके ही पास रहेंगी।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 14 (9.36.14)
तासां तद्वचनं श्रुत्वा दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व सर्वासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन ॥
tāsāṃ tadvacanaṃ śrutvā dakṣaḥ somamathābravīt | samaṃ vartasva sarvāsu mā tvāṃ śapsye virocana
उनकी बात सुनकर दक्ष ने सोम से कहा, 'सब पत्नियों के साथ समान व्यवहार करो, नहीं तो, हे विरोचन! मैं तुम्हें शाप दूँगा।'
श्लोक 15 (9.36.15)
अनादृत्य तु तद्वाक्यं दक्षस्य भगवाञ्शशी । रोहिण्या सार्धमवसत्ततस्ताः कुपिताः पुनः ॥
anādṛtya tu tadvākyaṃ dakṣasya bhagavāñśaśī | rohiṇyā sārdhamavasattatastāḥ kupitāḥ punaḥ
परन्तु भगवान् चन्द्रमा दक्ष की बात की अवहेलना करके रोहिणी के साथ ही रहे; इस पर वे फिर कुपित हो गईं।
श्लोक 16 (9.36.16)
गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदा । सोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव ॥
gatvā ca pitaraṃ prāhuḥ praṇamya śirasā tadā | somo vasati nāsmāsu tasmānnaḥ śaraṇaṃ bhava
उन्होंने फिर पिता के पास जाकर सिर झुकाकर कहा, 'सोम हमारे पास नहीं रहते; इसलिए आप हमारी शरण बनिए।'
नक्षत्राण्यूचुः
श्लोक 17 (9.36.17)
रोहिण्यामेव भगवान्सदा वसति चन्द्रमाः । न त्वद्वचो गणयति नास्मासु स्नेहमिच्छति ॥
rohiṇyāmeva bhagavānsadā vasati candramāḥ | na tvadvaco gaṇayati nāsmāsu snehamicchati
'भगवान् चन्द्रमा सदा रोहिणी के ही साथ रहते हैं; वे आपकी बात की परवाह नहीं करते और हमसे स्नेह नहीं चाहते।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 18 (9.36.18)
तस्मान्नस्त्राहि सर्वा वै यथा नः सोम आविशेत् । तच्छ्रुत्वा भगवान्क्रुद्धो यक्ष्माणं पृथिवीपते ॥
tasmānnastrāhi sarvā vai yathā naḥ soma āviśet | tacchrutvā bhagavānkruddho yakṣmāṇaṃ pṛthivīpate
इसलिए हम सबकी रक्षा कीजिए, जिससे सोम हमारे पास आएँ।' यह सुनकर, हे पृथ्वीपते! भगवान् दक्ष क्रुद्ध हुए,
श्लोक 19 (9.36.19)
ससर्ज रोषात्सोमाय स चोडुपतिमाविशत् । स यक्ष्मणाऽभिभूतात्माक्षीयताहरहः शशी ॥
sasarja roṣātsomāya sa coḍupatimāviśat | sa yakṣmaṇā'bhibhūtātmākṣīyatāharahaḥ śaśī
और क्रोध में सोम पर क्षय-रोग को छोड़ा, जो नक्षत्रपति में प्रविष्ट हो गया। उस रोग से अभिभूत चन्द्रमा दिन-प्रतिदिन क्षीण होने लगा।
श्लोक 20 (9.36.20)
यत्नं चाप्यकरोद्राजन्मोक्षार्थं तस्य यक्ष्मणः । इष्ट्वेष्टिभिर्महाराज विविधाभिर्निशाकरः ॥
yatnaṃ cāpyakarodrājanmokṣārthaṃ tasya yakṣmaṇaḥ | iṣṭveṣṭibhirmahārāja vividhābhirniśākaraḥ
हे राजन्! निशाकर ने उस रोग से छूटने का यत्न भी किया, हे महाराज! अनेक प्रकार के यज्ञ करके।
श्लोक 21 (9.36.21)
न चामुच्यत शापाद्वै क्षयं चैवाधिगच्छति । क्षीयमाणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे ॥
na cāmucyata śāpādvai kṣayaṃ caivādhigacchati | kṣīyamāṇe tataḥ some oṣadhyo na prajajñire
फिर भी वह शाप से मुक्त नहीं हुआ और क्षीण होता ही गया। सोम के क्षीण होने पर औषधियाँ उत्पन्न नहीं होती थीं;
श्लोक 22 (9.36.22)
निरास्वादरसाः सर्वा हतवीर्याश्च सर्वशः । ओषधीनां क्षये जाते प्राणिनामपि सङ्क्षयः ॥
nirāsvādarasāḥ sarvā hatavīryāśca sarvaśaḥ | oṣadhīnāṃ kṣaye jāte prāṇināmapi saṅkṣayaḥ
वे सब रस और स्वाद से रहित और हर प्रकार से वीर्यहीन हो गईं। औषधियों के क्षीण होने पर प्राणियों का भी क्षय होने लगा।
श्लोक 23 (9.36.23)
कृशाश्चासन्प्रजाः सर्वाः क्षीयमाणे निशाकरे । ततो देवाः समागम्य सोममूचुर्महीपते ॥
kṛśāścāsanprajāḥ sarvāḥ kṣīyamāṇe niśākare | tato devāḥ samāgamya somamūcurmahīpate
निशाकर के क्षीण होने पर सब प्राणी दुर्बल हो गए। तब, हे महीपते! देवताओं ने इकट्ठे होकर सोम से कहा —
देवा ऊचुः
श्लोक 24 (9.36.24)
किमिदं भवतो रूपमीदृशं सम्प्रकाशते । कारणं ब्रूहि नः सर्वं येनेदं ते महद्भयम् ॥
kimidaṃ bhavato rūpamīdṛśaṃ samprakāśate | kāraṇaṃ brūhi naḥ sarvaṃ yenedaṃ te mahadbhayam
'आपका रूप ऐसा क्यों दिखाई देता है? हमें पूरा कारण बताइए, जिससे आपको यह महान् भय हुआ है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (9.36.25)
श्रुत्वा तु कारणं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम् । एवमुक्तः प्रत्युवाच सर्वांस्ताञ्शशलक्षणः ॥
śrutvā tu kāraṇaṃ tvatto vidhāsyāmastato vayam | evamuktaḥ pratyuvāca sarvāṃstāñśaśalakṣaṇaḥ
आपसे कारण सुनकर हम तदनुसार उपाय करेंगे।' यह कहे जाने पर शश-चिह्नवाले चन्द्रमा ने उन सबको उत्तर दिया —
श्लोक 26 (9.36.26)
शापस्य कारणं चैव यक्ष्माणं च तथाऽऽत्मनः । देवास्तस्य वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाऽब्रुवन् ॥
śāpasya kāraṇaṃ caiva yakṣmāṇaṃ ca tathā''tmanaḥ | devāstasya vacaḥ śrutvā gatvā dakṣamathā'bruvan
शाप का कारण और अपने क्षय-रोग का वृत्तान्त बताया। उसकी बात सुनकर देवता दक्ष के पास गए और बोले —
देवा ऊचुः
श्लोक 27 (9.36.27)
प्रसीद भगवन्सोमे शापोऽयं विनिवर्त्यताम् । असौ हि चन्द्रमाः क्षीणः किञ्चिच्छेषो हि लक्ष्यते ॥
prasīda bhagavansome śāpo'yaṃ vinivartyatām | asau hi candramāḥ kṣīṇaḥ kiñciccheṣo hi lakṣyate
'हे भगवन्! सोम पर प्रसन्न हों; यह शाप लौटा लिया जाए। यह चन्द्रमा क्षीण हो गया है; उसका थोड़ा-सा अंश ही शेष दिखाई देता है।
श्लोक 28 (9.36.28)
क्षयाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चैव गताः क्षयम् । वीरुदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च । तथा नरा लोकगुरो प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
kṣayāccaivāsya deveśa prajāścaiva gatāḥ kṣayam | vīrudoṣadhayaścaiva bījāni vividhāni ca | tathā narā lokaguro prasādaṃ kartumarhasi
हे देवेश! उनके क्षय से प्रजा भी क्षीण हो गई — लताएँ, औषधियाँ और अनेक प्रकार के बीज, और मनुष्य भी। हे लोकगुरो! आप कृपा कीजिए।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 29 (9.36.29)
एवमुक्तस्ततो देवान्प्राह वाक्यं प्रजापतिः । नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तयितुमञ्जसा ॥
evamuktastato devānprāha vākyaṃ prajāpatiḥ | naitacchakyaṃ mama vaco vyāvartayitumañjasā
यह कहे जाने पर प्रजापति ने देवताओं से कहा, 'मेरा यह वचन सहज ही पलटा नहीं जा सकता।
दक्ष उवाच
श्लोक 30 (9.36.30)
हेतुना तु महाभागा निवर्तिष्यति केनचित् । समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः ॥
hetunā tu mahābhāgā nivartiṣyati kenacit | samaṃ vartatu sarvāsu śaśī bhāryāsu nityaśaḥ
परन्तु हे महाभाग देवताओ! किसी उपाय से यह निवृत्त हो जाएगा। चन्द्रमा सदा सभी पत्नियों के साथ समान रूप से रहे।
श्लोक 31 (9.36.31)
सरस्वत्या वरे तीर्थे निमज्जञ्शशलक्षणः । पुनर्वर्धिष्यते देवास्तद्वै सत्यं वचो मम ॥
sarasvatyā vare tīrthe nimajjañśaśalakṣaṇaḥ | punarvardhiṣyate devāstadvai satyaṃ vaco mama
सरस्वती के उत्तम तीर्थ में स्नान करने से शश-चिह्नवाला चन्द्रमा फिर बढ़ेगा, हे देवताओ! मेरा यह वचन सत्य है।
श्लोक 32 (9.36.32)
मासार्धं च क्षयं सोमो नित्यमेव गमिष्यति । मासार्धं तु पुनर्वृद्धिं सत्यमेतद्वचो मम ॥
māsārdhaṃ ca kṣayaṃ somo nityameva gamiṣyati | māsārdhaṃ tu punarvṛddhiṃ satyametadvaco mama
सोम प्रत्येक मास में आधे मास तक सदा क्षीण होगा, और आधे मास फिर बढ़ेगा; मेरा यह वचन सत्य है।
श्लोक 33 (9.36.33)
समुद्रं पश्चिमं गत्वा सरस्वत्यब्धिसङ्गमम् । आराधयतु देवेशं ततः कान्तिमवाप्स्यति ॥
samudraṃ paścimaṃ gatvā sarasvatyabdhisaṅgamam | ārādhayatu deveśaṃ tataḥ kāntimavāpsyati
पश्चिम समुद्र में जाकर, जहाँ सरस्वती समुद्र से मिलती है, वह देवेश की आराधना करे; तब उसे कान्ति फिर प्राप्त होगी।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 34 (9.36.34)
सरस्वतीं ततः सोमः स जगामर्षिशासनात् । प्रभासं प्रथमं तीर्थं सरस्वत्या जगाम ह ॥
sarasvatīṃ tataḥ somaḥ sa jagāmarṣiśāsanāt | prabhāsaṃ prathamaṃ tīrthaṃ sarasvatyā jagāma ha
तब सोम ऋषि (दक्ष) की आज्ञा से सरस्वती के पास गए; वे सरस्वती के प्रथम तीर्थ प्रभास में पहुँचे।
श्लोक 35 (9.36.35)
अमावास्यां महातेजास्तत्रामज्जन्महाद्युतिः । लोकान्प्रभासयामास शीतांशुत्वमवाप च ॥
amāvāsyāṃ mahātejāstatrāmajjanmahādyutiḥ | lokānprabhāsayāmāsa śītāṃśutvamavāpa ca
अमावास्या के दिन महातेजस्वी, महाद्युतिमान् चन्द्रमा ने वहाँ स्नान किया; उसने लोकों को प्रकाशित किया और अपना शीतल किरणों का स्वरूप फिर पाया।
श्लोक 36 (9.36.36)
देवास्तु सर्वे राजेन्द्र प्रसादं प्राप्य पुष्कलम् । सोमेन सहिता भूत्वा दक्षस्य प्रमुखेऽभवन् ॥
devāstu sarve rājendra prasādaṃ prāpya puṣkalam | somena sahitā bhūtvā dakṣasya pramukhe'bhavan
और हे राजेन्द्र! सब देवता भरपूर कृपा पाकर सोम के साथ दक्ष के सम्मुख उपस्थित हुए।
श्लोक 37 (9.36.37)
ततः प्रजापतिः सर्वा विससर्जाथ देवताः । सोमं च भगवान्प्रीतो भूयो वचनमब्रवीत् ॥
tataḥ prajāpatiḥ sarvā visasarjātha devatāḥ | somaṃ ca bhagavānprīto bhūyo vacanamabravīt
तब प्रजापति ने सब देवताओं को विदा किया और प्रसन्न होकर भगवान् दक्ष ने सोम से फिर कहा —
दक्ष उवाच
श्लोक 38 (9.36.38)
मावमंस्थाः स्त्रियः पुत्र मा च विप्रान्कदाचन । गच्छ युक्तः सदा भूत्वा कुरु वै शासनं मम ॥
māvamaṃsthāḥ striyaḥ putra mā ca viprānkadācana | gaccha yuktaḥ sadā bhūtvā kuru vai śāsanaṃ mama
'पुत्र! स्त्रियों का अपमान मत करना, और ब्राह्मणों का भी कभी नहीं। जाओ; सदा सावधान रहकर मेरी आज्ञा का पालन करो।'
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (9.36.39)
स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् । प्रजाश्च मुदिता भूत्वा ईजिरे च यथा पुरा ॥
sa visṛṣṭo mahārāja jagāmātha svamālayam | prajāśca muditā bhūtvā ījire ca yathā purā
विदा किए जाने पर वह, हे महाराज! अपने निवास को चला गया; और प्रजा प्रसन्न होकर पहले की भाँति यज्ञ करने लगी।
श्लोक 40 (9.36.40)
एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकरः । प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं महत् ॥
evaṃ te sarvamākhyātaṃ yathā śapto niśākaraḥ | prabhāsaṃ ca yathā tīrthaṃ tīrthānāṃ pravaraṃ mahat
इस प्रकार मैंने तुम्हें सब बता दिया कि निशाकर को कैसे शाप मिला और प्रभास कैसे तीर्थों में महान् और श्रेष्ठ हुआ।
श्लोक 41 (9.36.41)
अमावास्यां महाराज नित्यशः शशलक्षणः । स्नात्वाह्याप्यायते श्रीमान्प्रभासे तीर्थउत्तमे ॥
amāvāsyāṃ mahārāja nityaśaḥ śaśalakṣaṇaḥ | snātvāhyāpyāyate śrīmānprabhāse tīrthauttame
हे महाराज! प्रत्येक अमावास्या को श्रीमान् शशलक्षण चन्द्रमा उस उत्तम तीर्थ प्रभास में स्नान करके पुनः पुष्ट होता है।
श्लोक 42 (9.36.42)
अतश्चैतत्प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप । प्रभां हि परमां लेभे तस्मिंश्चामज्ज्य चन्द्रमाः ॥
ataścaitatprajānanti prabhāsamiti bhūmipa | prabhāṃ hi paramāṃ lebhe tasmiṃścāmajjya candramāḥ
और इसी से लोग इसे प्रभास कहते हैं, हे भूमिप! क्योंकि उसमें स्नान करके चन्द्रमा ने परम प्रभा पाई।
श्लोक 43 (9.36.43)
लोकान्प्रभासयामास पुपोष च वपुस्तथा । तत्र स्नात्वा हलीरामो दत्वा प्रीतोऽथ दक्षिणाः ॥
lokānprabhāsayāmāsa pupoṣa ca vapustathā | tatra snātvā halīrāmo datvā prīto'tha dakṣiṇāḥ
उसने लोकों को प्रकाशित किया और अपने शरीर को भी पुष्ट किया। वहाँ स्नान करके हलधर राम ने प्रसन्न होकर दक्षिणाएँ दीं।
श्लोक 44 (9.36.44)
ततस्तु चमसोद्भेदमभीतस्त्वगमद्बली । चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथयन्त्युत ॥
tatastu camasodbhedamabhītastvagamadbalī | camasodbheda ityevaṃ yaṃ janāḥ kathayantyuta
फिर वह बलशाली निर्भय होकर चमसोद्भेद तीर्थ गया, जिसे लोग इसी नाम से कहते हैं।
श्लोक 45 (9.36.45)
तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुधः । उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥
tatra dattvā ca dānāni viśiṣṭāni halāyudhaḥ | uṣitvā rajanīmekāṃ snātvā ca vidhivattadā
वहाँ हलधर ने उत्तम दान दिए, एक रात निवास किया और विधिपूर्वक स्नान किया।
श्लोक 46 (9.36.46)
उदपानमथागच्छत्त्वरावान्केशवाग्रजः । आद्यं स्वस्त्ययनं चैव तत्रावाप्य महाबलः ॥
udapānamathāgacchattvarāvānkeśavāgrajaḥ | ādyaṃ svastyayanaṃ caiva tatrāvāpya mahābalaḥ
फिर केशव के बड़े भाई शीघ्रता से उदपान तीर्थ गए, और वहाँ उन महाबली ने सर्वप्रथम कल्याणकारी फल पाया।
श्लोक 47 (9.36.47)
स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्च जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र निगूढां तां सरस्वतीम् ॥
snigdhatvādoṣadhīnāṃ ca bhūmeśca janamejaya | jānanti siddhā rājendra nigūḍhāṃ tāṃ sarasvatīm
हे जनमेजय! औषधियों और भूमि की आर्द्रता के कारण, हे राजेन्द्र! सिद्ध लोग वहाँ छिपी हुई सरस्वती को पहचानते हैं।