शल्य पर्व · अध्याय 37
कुएँ में त्रित
बलराम सरस्वती के तट पर त्रित के कुएँ पर पहुँचते हैं, और जनमेजय पूछते हैं कि त्रित उसमें कैसे पहुँचे। वैशम्पायन तीन ऋषि-भाइयों — एकत, द्वित और त्रित — की कथा सुनाते हैं: यज्ञ-दक्षिणा में मिली गायों के लोभी दोनों बड़े भाई भेड़िये के भय से कुएँ में गिरे त्रित को छोड़कर चले जाते हैं। कुएँ में त्रित मन में सोम-यज्ञ की कल्पना करके उसे सम्पन्न करते हैं; देवता अपने भाग लेने आते हैं और उन्हें वर देते हैं, तथा सरस्वती उमड़कर उन्हें बाहर उठा लाती है। त्रित अपने भाइयों को भेड़िया बनने और वानर-रीछ आदि सन्तान होने का शाप देते हैं, और बलराम विनशन की ओर बढ़ते हैं।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (9.37.1)
तस्मान्नदीगतं चापि ह्युदपानं यशस्विनः । त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलायुधः ॥
tasmānnadīgataṃ cāpi hyudapānaṃ yaśasvinaḥ | tritasya ca mahārāja jagāmātha halāyudhaḥ
हे महाराज, वहाँ से हलधर बलराम नदी में स्थित त्रित के यशस्वी कुएँ पर गए।
श्लोक 2 (9.37.2)
तत्र दत्त्वा बहुद्रव्यं पूजयित्वा तथा द्विजान् । उपस्पृश्य च तत्रैव प्रहृष्टो मुसलायुधः ॥
tatra dattvā bahudravyaṃ pūjayitvā tathā dvijān | upaspṛśya ca tatraiva prahṛṣṭo musalāyudhaḥ
वहाँ उन्होंने बहुत धन दान किया, ब्राह्मणों का सत्कार किया, और वहीं आचमन-स्नान करके मूसलधारी बलराम प्रसन्न हुए।
श्लोक 3 (9.37.3)
तत्र धर्मपरो ह्यासीत्त्रितः स सुमहातपाः । कूपे च वसता तेन सोमः पीतो महात्मना ॥
tatra dharmaparo hyāsīttritaḥ sa sumahātapāḥ | kūpe ca vasatā tena somaḥ pīto mahātmanā
वहाँ परम तपस्वी त्रित धर्मपरायण होकर रहे थे; उस कुएँ में रहते हुए ही उन महात्मा ने सोमरस पिया था।
श्लोक 4 (9.37.4)
तत्र चैनं समुत्सृज्य भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् । ततस्तौ वै शशापाथ त्रितो ब्राह्मणसत्तमः ॥
tatra cainaṃ samutsṛjya bhrātarau jagmaturgṛhān | tatastau vai śaśāpātha trito brāhmaṇasattamaḥ
उन्हें वहीं छोड़कर दोनों भाई घर चले गए; तब ब्राह्मणश्रेष्ठ त्रित ने उन दोनों को शाप दिया।
जनमेजय उवाच
श्लोक 5 (9.37.5)
उदपानं कथं ब्रह्मन्कथं च सुमहातपाः । पतितः किं च सन्त्यक्तो भ्रातृभ्यां द्विजसत्तम ॥
udapānaṃ kathaṃ brahmankathaṃ ca sumahātapāḥ | patitaḥ kiṃ ca santyakto bhrātṛbhyāṃ dvijasattama
हे ब्रह्मन्, वह परम तपस्वी कुएँ में कैसे गिरा, और हे द्विजश्रेष्ठ, दोनों भाइयों ने उसे क्यों त्याग दिया?
श्लोक 6 (9.37.6)
कूपे कथं च हित्वैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् । कथं च याजयामास पपौ सोमं च वै कथम् । एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन्श्रोतव्यं यदि मन्यसे ॥
kūpe kathaṃ ca hitvainaṃ bhrātarau jagmaturgṛhān | kathaṃ ca yājayāmāsa papau somaṃ ca vai katham | etadācakṣva me brahmanśrotavyaṃ yadi manyase
दोनों भाई उसे कुएँ में छोड़कर घर कैसे चले गए? उसने यज्ञ कैसे कराया और सोम कैसे पिया? हे ब्रह्मन्, यदि आप इसे सुनने योग्य समझें तो मुझे यह सब बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 7 (9.37.7)
आसन्पूर्वयुगे राजन्मुनयो भ्रातरस्त्रयः । एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसन्निभाः ॥
āsanpūrvayuge rājanmunayo bhrātarastrayaḥ | ekataśca dvitaścaiva tritaścādityasannibhāḥ
हे राजन्, पूर्वयुग में तीन भाई मुनि थे — एकत, द्वित और त्रित, जो सूर्य के समान तेजस्वी थे।
श्लोक 8 (9.37.8)
सर्वे प्रजापतिसमाः प्रजावन्तस्तथैव च । ब्रह्मलोकजिताः सर्वे तपसा ब्रह्मवादिनः ॥
sarve prajāpatisamāḥ prajāvantastathaiva ca | brahmalokajitāḥ sarve tapasā brahmavādinaḥ
वे सभी प्रजापति के समान थे, सन्तानवान थे, और तप से ब्रह्मलोक को जीतने वाले ब्रह्मवादी थे।
श्लोक 9 (9.37.9)
तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च । अभवद्गौतमो नित्यं पिता धर्मरतः सदा ॥
teṣāṃ tu tapasā prīto niyamena damena ca | abhavadgautamo nityaṃ pitā dharmarataḥ sadā
उनके तप, नियम और इन्द्रिय-संयम से प्रसन्न होकर सदा धर्म में रत गौतम उनके पिता हुए।
श्लोक 10 (9.37.10)
स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च । जगाम भगवान्स्थानमनुरूपमिवात्मनः ॥
sa tu dīrgheṇa kālena teṣāṃ prītimavāpya ca | jagāma bhagavānsthānamanurūpamivātmanaḥ
बहुत समय के बाद उनका स्नेह पाकर वे भगवान् गौतम अपने योग्य लोक को चले गए।
श्लोक 11 (9.37.11)
राजानस्तस्य ये ह्यासन्याज्या राजन्महात्मनः । ते सर्वे स्वर्गते तस्मिंस्तस्य पुत्रानपूजयन् ॥
rājānastasya ye hyāsanyājyā rājanmahātmanaḥ | te sarve svargate tasmiṃstasya putrānapūjayan
हे राजन्, उन महात्मा के जो राजा यजमान थे, उनके स्वर्ग चले जाने पर वे सब उनके पुत्रों का सम्मान करने लगे।
श्लोक 12 (9.37.12)
तेषां तु कर्मणा राजंस्तथा चाध्ययनेन च । त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्य पिता तथा ॥
teṣāṃ tu karmaṇā rājaṃstathā cādhyayanena ca | tritaḥ sa śreṣṭhatāṃ prāpa yathaivāsya pitā tathā
हे राजन्, कर्म और अध्ययन के बल पर त्रित भी अपने पिता के समान श्रेष्ठता को प्राप्त हुए।
श्लोक 13 (9.37.13)
तथा सर्वे महाभागा मुनयः पुण्यलक्षणाः । अपूजयन्महाभागं यथास्य पितरं तथा ॥
tathā sarve mahābhāgā munayaḥ puṇyalakṣaṇāḥ | apūjayanmahābhāgaṃ yathāsya pitaraṃ tathā
इसी प्रकार पुण्य-लक्षणों वाले सभी महाभाग मुनि उन महाभाग त्रित का वैसा ही सम्मान करते थे जैसा उनके पिता का करते थे।
श्लोक 14 (9.37.14)
कदाचिद्धि ततो राजन्भ्रातरावेकतद्वितौ । यज्ञार्थं चक्रतुश्चिन्तां तथा वित्तार्थमेव च ॥
kadāciddhi tato rājanbhrātarāvekatadvitau | yajñārthaṃ cakratuścintāṃ tathā vittārthameva ca
हे राजन्, एक बार दोनों भाई एकत और द्वित ने यज्ञ के लिए और धन के लिए भी विचार किया।
श्लोक 15 (9.37.15)
तयोर्बुद्धिः समभवत्त्रितं गृह्य परन्तप । याज्यान्सर्वानुपादाय प्रतिगृह्य पशूंस्ततः । सोमं पास्यामहे हृष्टाः प्राप्य यज्ञं महाफलम् ॥
tayorbuddhiḥ samabhavattritaṃ gṛhya parantapa | yājyānsarvānupādāya pratigṛhya paśūṃstataḥ | somaṃ pāsyāmahe hṛṣṭāḥ prāpya yajñaṃ mahāphalam
हे परंतप, उन दोनों की बुद्धि में यह बात आई कि त्रित को साथ लेकर सब यजमानों के पास जाएँ और उनसे पशु दक्षिणा में लें; फिर महान् फल देने वाला यज्ञ करके प्रसन्न होकर सोमपान करें।
श्लोक 16 (9.37.16)
चक्रुश्चैवं तथा राजन्भ्रातरस्त्रय एव च । यथा ते तु परिक्रम्य याज्यान्सर्वान्पशून्प्रति । याजयित्वा ततो याज्याँल्लब्ध्वा तु सुबहून्पशून् ॥
cakruścaivaṃ tathā rājanbhrātarastraya eva ca | yathā te tu parikramya yājyānsarvānpaśūnprati | yājayitvā tato yājyām̐llabdhvā tu subahūnpaśūn
हे राजन्, तीनों भाइयों ने वैसा ही किया; वे पशुओं के लिए सब यजमानों के पास घूमे, उनके यज्ञ कराए और बहुत-से पशु पाए।
श्लोक 17 (9.37.17)
याज्येन कर्मणा तेन प्रतिगृह्य विधानतः । प्राचीं दिशं महात्मान आजग्मुस्ते महर्षयः ॥
yājyena karmaṇā tena pratigṛhya vidhānataḥ | prācīṃ diśaṃ mahātmāna ājagmuste maharṣayaḥ
उस यज्ञ-कर्म की दक्षिणा विधि से पाकर वे महात्मा महर्षि पूर्व दिशा की ओर आए।
श्लोक 18 (9.37.18)
त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद्याति हृष्टवत् । एकतश्च द्वितश्चैव पृष्ठतः कालयन्पशून् ॥
tritasteṣāṃ mahārāja purastādyāti hṛṣṭavat | ekataśca dvitaścaiva pṛṣṭhataḥ kālayanpaśūn
हे महाराज, त्रित प्रसन्न होकर उनके आगे-आगे चल रहे थे; एकत और द्वित पशुओं को हाँकते हुए पीछे चल रहे थे।
श्लोक 19 (9.37.19)
तयोश्चिन्ता समभवदेकतस्य द्वितस्य च । कथं च स्युरिमा गाव आवाभ्यां हि विना त्रितम् ॥
tayościntā samabhavadekatasya dvitasya ca | kathaṃ ca syurimā gāva āvābhyāṃ hi vinā tritam
तब एकत और द्वित के मन में यह चिन्ता उठी कि त्रित के बिना ये गायें केवल हम दोनों की कैसे हो सकती हैं?
श्लोक 20 (9.37.20)
तावन्योन्यं समाभाष्य एकतश्च द्वितश्च ह । यदूचतुर्मिथः पापौ तन्निबोध जनेश्वर ॥
tāvanyonyaṃ samābhāṣya ekataśca dvitaśca ha | yadūcaturmithaḥ pāpau tannibodha janeśvara
हे जनेश्वर, एकत और द्वित उन दोनों पापियों ने आपस में बात करके जो कहा, वह सुनिए।
एकतद्वितावूचतुः
श्लोक 21 (9.37.21)
त्रितो यज्ञेषु कुशलस्तथा वेदेषु निष्ठितः । ततस्त्रितो बहुतरं गावः समुपलप्स्यते ॥
trito yajñeṣu kuśalastathā vedeṣu niṣṭhitaḥ | tatastrito bahutaraṃ gāvaḥ samupalapsyate
"त्रित यज्ञों में कुशल है और वेदों में निष्ठावान है; इसलिए त्रित को और भी बहुत-सी गायें मिल जाएँगी।"
श्लोक 22 (9.37.22)
तदावां सहितौ भूत्वा गाः प्रकाल्य व्रजावहे । त्रितोऽपि गच्छतां काममावाभ्यां वै विनाकृतः ॥
tadāvāṃ sahitau bhūtvā gāḥ prakālya vrajāvahe | trito'pi gacchatāṃ kāmamāvābhyāṃ vai vinākṛtaḥ
"इसलिए हम दोनों साथ मिलकर गायों को हाँककर चल दें; त्रित हमसे अलग होकर जहाँ चाहे चला जाए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (9.37.23)
तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थानां वृकोऽभवत् । तत्र कूपो विदूरेऽभूत्सरस्वत्यास्तटे महान् ॥
teṣāmāgacchatāṃ rātrau pathisthānāṃ vṛko'bhavat | tatra kūpo vidūre'bhūtsarasvatyāstaṭe mahān
रात में जब वे चले आ रहे थे, तब मार्ग में एक भेड़िया आ खड़ा हुआ; और सरस्वती के तट पर वहीं एक बड़ा कुआँ था।
श्लोक 24 (9.37.24)
अथ त्रितो वृकं दृष्ट्वा पथि तिष्ठन्तमग्रतः । तद्भयादपसर्पन्वै तस्मिन्कूपे पपात ह । अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभयङ्करे ॥
atha trito vṛkaṃ dṛṣṭvā pathi tiṣṭhantamagrataḥ | tadbhayādapasarpanvai tasminkūpe papāta ha | agādhe sumahāghore sarvabhūtabhayaṅkare
मार्ग में आगे खड़े भेड़िये को देखकर त्रित उसके भय से पीछे हटे और उस कुएँ में गिर पड़े, जो अथाह, अत्यन्त भयंकर और सब प्राणियों को डराने वाला था।
श्लोक 25 (9.37.25)
त्रितस्ततो महाराज कूपस्थो मुनिसत्तमः । आर्तनादं ततश्चक्रे तौ तु शुश्रुवतुर्मुनी ॥
tritastato mahārāja kūpastho munisattamaḥ | ārtanādaṃ tataścakre tau tu śuśruvaturmunī
हे महाराज, तब कुएँ में पड़े मुनिश्रेष्ठ त्रित ने आर्तनाद किया; उन दोनों मुनियों ने उसे सुना।
श्लोक 26 (9.37.26)
तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ । वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ॥
taṃ jñātvā patitaṃ kūpe bhrātarāvekatadvitau | vṛkatrāsācca lobhācca samutsṛjya prajagmatuḥ
त्रित को कुएँ में गिरा जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़िये के भय और लोभ से उन्हें छोड़कर चले गए।
श्लोक 27 (9.37.27)
भ्रातृभ्यां पशुलुब्धाभ्यामुत्सृष्टः स महातपाः । उदपाने तदा राजन्निर्जले पांसुसंवृते ॥
bhrātṛbhyāṃ paśulubdhābhyāmutsṛṣṭaḥ sa mahātapāḥ | udapāne tadā rājannirjale pāṃsusaṃvṛte
हे राजन्, पशुओं के लोभी भाइयों से त्यागे गए वे महातपस्वी जलहीन, धूल से ढके उस कुएँ में पड़े रहे।
श्लोक 28 (9.37.28)
त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते । निमग्नं भरतश्रेष्ठ नरके दुष्कृती यथा ॥
trita ātmānamālakṣya kūpe vīruttṛṇāvṛte | nimagnaṃ bharataśreṣṭha narake duṣkṛtī yathā
हे भरतश्रेष्ठ, त्रित ने देखा कि वे लता और घास से ढके उस कुएँ में ऐसे डूबे हुए हैं जैसे कोई पापी नरक में।
श्लोक 29 (9.37.29)
ततो ह्यचिन्तयत्प्राज्ञो मृतभूतो ह्यसोमपः । सोमः कथं तु पातव्य इहस्थेन मया भवेत् ॥
tato hyacintayatprājño mṛtabhūto hyasomapaḥ | somaḥ kathaṃ tu pātavya ihasthena mayā bhavet
तब उन बुद्धिमान ने सोचा — सोमपान से वंचित वे मृतक-जैसे थे — "यहाँ रहते हुए मैं सोम कैसे पी सकूँगा?"
श्लोक 30 (9.37.30)
स एवमभिसञ्चिन्त्य तस्मिन्कूपे महातपाः । ददर्श वीरुधं तत्र लम्बमानां यदृच्छया ॥
sa evamabhisañcintya tasminkūpe mahātapāḥ | dadarśa vīrudhaṃ tatra lambamānāṃ yadṛcchayā
इस प्रकार उस कुएँ में विचार करते हुए उन महातपस्वी ने संयोग से लटकती हुई एक लता देखी।
श्लोक 31 (9.37.31)
पांसुग्रस्ते ततः कूपे न्यखनत्सलिलं मुनिः । अग्नीन्सङ्कल्पयामास होतॄनात्मानमेव च ॥
pāṃsugraste tataḥ kūpe nyakhanatsalilaṃ muniḥ | agnīnsaṅkalpayāmāsa hotṝnātmānameva ca
धूल से भरे उस कुएँ में मुनि ने खोदकर जल निकाला; और उन्होंने मन में अग्नियों, होताओं और अपनी भी कल्पना की।
श्लोक 32 (9.37.32)
ततस्तां वीरुधं सोमं सङ्कल्प्य सुमहातपाः । ऋचो यजूंषि सामानि मनसा चिन्तयन्मुनिः ॥
tatastāṃ vīrudhaṃ somaṃ saṅkalpya sumahātapāḥ | ṛco yajūṃṣi sāmāni manasā cintayanmuniḥ
फिर उस लता को सोम मानकर उन महातपस्वी मुनि ने ऋचाओं, यजुर्मन्त्रों और सामों का मन में चिन्तन करते हुए,
श्लोक 33 (9.37.33)
ग्रावाणः शर्कराः कृत्वा प्रचक्रेऽभिषवं नृप । आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ॥
grāvāṇaḥ śarkarāḥ kṛtvā pracakre'bhiṣavaṃ nṛpa | ājyaṃ ca salilaṃ cakre bhāgāṃśca tridivaukasām
हे राजन्, कंकड़ों को सोम कूटने के पत्थर बनाकर उन्होंने सोम निचोड़ा; जल को घी बनाया और स्वर्गवासियों के भाग निश्चित किए।
श्लोक 34 (9.37.34)
सोमस्याभिषवस्याग्रे प्रवृत्तस्तुमुलो ध्वनिः । स चाविशद्दिवं राजन्स्वरश्चैव त्रितस्य वै ॥
somasyābhiṣavasyāgre pravṛttastumulo dhvaniḥ | sa cāviśaddivaṃ rājansvaraścaiva tritasya vai
हे राजन्, सोम निचोड़ने के आरम्भ में भारी ध्वनि उठी, और त्रित का वह स्वर स्वर्ग तक जा पहुँचा।
श्लोक 35 (9.37.35)
समवाप च तं यज्ञं यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः ॥
samavāpa ca taṃ yajñaṃ yathoktaṃ brahmavādibhiḥ
और उन्होंने ब्रह्मवादियों के बताए अनुसार उस यज्ञ को पूरा किया।
श्लोक 36 (9.37.36)
वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः । आविग्नं त्रिदिवं सर्वं कारणं च न बुध्यते ॥
vartamāne mahāyajñe tritasya sumahātmanaḥ | āvignaṃ tridivaṃ sarvaṃ kāraṇaṃ ca na budhyate
उन महात्मा त्रित का महायज्ञ जब चल रहा था, तब सारा स्वर्ग व्याकुल हो उठा और कारण समझ न सका।
श्लोक 37 (9.37.37)
ततः सुतुमुलं शब्दं शुश्रावाथ बृहस्पतिः । श्रुत्वा चैवाब्रवीत्सर्वान्देवान्देवपुरोहितः ॥
tataḥ sutumulaṃ śabdaṃ śuśrāvātha bṛhaspatiḥ | śrutvā caivābravītsarvāndevāndevapurohitaḥ
तब बृहस्पति ने वह भारी कोलाहल सुना; उसे सुनकर देवताओं के पुरोहित ने सब देवताओं से कहा।
बृहस्पतिरुवाच
श्लोक 38 (9.37.38)
त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः । स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान्देवानपि महातपाः ॥
tritasya vartate yajñastatra gacchāmahe surāḥ | sa hi kruddhaḥ sṛjedanyāndevānapi mahātapāḥ
"त्रित का यज्ञ चल रहा है; हे देवताओ, हम वहाँ चलें। वह महातपस्वी क्रुद्ध हो गया तो दूसरे देवताओं की भी सृष्टि कर सकता है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (9.37.39)
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सहिताः सर्वदेवताः । प्रययुस्तत्र यत्रास्ते त्रितयज्ञश्च वर्तते ॥
tacchrutvā vacanaṃ tasya sahitāḥ sarvadevatāḥ | prayayustatra yatrāste tritayajñaśca vartate
उनकी बात सुनकर सब देवता एक साथ वहाँ गए जहाँ त्रित का यज्ञ हो रहा था।
श्लोक 40 (9.37.40)
ते तत्र गत्वा विबुधास्तं कूपं यत्र स त्रितः । ददृशुस्तं महात्मानं दीक्षितं यज्ञकर्मसु ॥
te tatra gatvā vibudhāstaṃ kūpaṃ yatra sa tritaḥ | dadṛśustaṃ mahātmānaṃ dīkṣitaṃ yajñakarmasu
उन देवताओं ने उस कुएँ पर पहुँचकर, जहाँ त्रित थे, यज्ञ-कर्मों में दीक्षित उन महात्मा को देखा।
श्लोक 41 (9.37.41)
दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम् । ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् ॥
dṛṣṭvā cainaṃ mahātmānaṃ śriyā paramayā yutam | ūcuścainaṃ mahābhāgaṃ prāptā bhāgārthino vayam
परम शोभा से युक्त उन महात्मा को देखकर वे उनसे बोले — "हे महाभाग, हम अपना भाग पाने की इच्छा से आए हैं।"
श्लोक 42 (9.37.42)
अथाब्रवीदृषिर्देवान्पश्यध्वं मां दिवौकसः । अस्मिन्प्रतिभये कूपे निमग्नं नष्टचेतसम् ॥
athābravīdṛṣirdevānpaśyadhvaṃ māṃ divaukasaḥ | asminpratibhaye kūpe nimagnaṃ naṣṭacetasam
तब ऋषि ने देवताओं से कहा — "हे स्वर्गवासियो, देखिए, इस भयानक कुएँ में डूबे हुए मुझे, जिसकी चेतना खो गई है।"
श्लोक 43 (9.37.43)
ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि । मन्त्रयुक्तान्समददात्तेन प्रीतास्तदाऽभवन् ॥
tatastrito mahārāja bhāgāṃsteṣāṃ yathāvidhi | mantrayuktānsamadadāttena prītāstadā'bhavan
हे महाराज, तब त्रित ने उन्हें उनके भाग विधि के अनुसार मन्त्रों सहित अर्पित किए, और वे उससे प्रसन्न हो गए।
श्लोक 44 (9.37.44)
ततो यथाविधि प्राप्तान्भागान्प्राप्य दिवौकसः । प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान्यान्मनसेच्छति ॥
tato yathāvidhi prāptānbhāgānprāpya divaukasaḥ | prītātmāno dadustasmai varānyānmanasecchati
विधिपूर्वक अपने भाग पाकर प्रसन्न-मन स्वर्गवासी देवताओं ने उन्हें वे सब वर दिए जिन्हें वे मन से चाहते थे।
श्लोक 45 (9.37.45)
स तु वव्रे वरं देवांस्त्रातुमर्हथ मामितः । यश्चाम्भोपस्पृशेत्कूपे स सोमपगतिं लभेत् ॥
sa tu vavre varaṃ devāṃstrātumarhatha māmitaḥ | yaścāmbhopaspṛśetkūpe sa somapagatiṃ labhet
उन्होंने देवताओं से वर माँगा — "आप मुझे यहाँ से उबारें; और जो कोई इस कुएँ में जल का स्पर्श करे, उसे सोमपान करने वालों की गति मिले।"
श्लोक 46 (9.37.46)
तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती । तयोत्क्षिप्तस्त्रितस्तस्थौ पूजयंस्त्रिदिवौकसः ॥
tatra cormimatī rājannutpapāta sarasvatī | tayotkṣiptastritastasthau pūjayaṃstridivaukasaḥ
हे राजन्, तब वहाँ तरंगों वाली सरस्वती उमड़ आई; उसके द्वारा ऊपर उठाए गए त्रित स्वर्गवासियों का सम्मान करते हुए खड़े हुए।
श्लोक 47 (9.37.47)
तथेति चोक्त्वा विबुधा जग्मू राजन्यथाऽऽगताः । त्रितश्चाभ्यागमत्प्रीतः स्वमेव निलयं तदा ॥
tatheti coktvā vibudhā jagmū rājanyathā''gatāḥ | tritaścābhyāgamatprītaḥ svameva nilayaṃ tadā
"ऐसा ही हो" कहकर देवता, हे राजन्, जैसे आए थे वैसे ही चले गए; और त्रित भी प्रसन्न होकर तब अपने निवास को लौट गए।
श्लोक 48 (9.37.48)
क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा । उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ॥
kruddhastu sa samāsādya tāvṛṣī bhrātarau tadā | uvāca paruṣaṃ vākyaṃ śaśāpa ca mahātapāḥ
फिर क्रोध से भरे उन महातपस्वी ने उन दोनों ऋषि-भाइयों के पास पहुँचकर कठोर वचन कहे और उन्हें शाप दिया।
त्रित उवाच
श्लोक 49 (9.37.49)
पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ । तस्माद्वृकाकृती रौद्रौ दंष्ट्रिणावभितश्चरौ ॥
paśulubdhau yuvāṃ yasmānmāmutsṛjya pradhāvitau | tasmādvṛkākṛtī raudrau daṃṣṭriṇāvabhitaścarau
"तुम दोनों पशुओं के लोभी हो, क्योंकि तुम मुझे छोड़कर भाग गए थे; इसलिए तुम भेड़ियों के आकार के, भयंकर और दाढ़ों वाले होकर चारों ओर भटकोगे।"
श्लोक 50 (9.37.50)
भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा । प्रसवश्चैव युवयोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः ॥
bhavitārau mayā śaptau pāpenānena karmaṇā | prasavaścaiva yuvayorgolāṅgūlarkṣavānarāḥ
"इस पाप-कर्म के कारण मेरे शाप से तुम वैसे ही हो जाओगे; और तुम दोनों की सन्तानें लंगूर, रीछ और वानर होंगी।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 51 (9.37.51)
इत्युक्तेन तदा तेन क्षणादेव विशाम्पते । तथाभूतावदृश्येतां वचनात्सत्यवादिनः ॥
ityuktena tadā tena kṣaṇādeva viśāmpate | tathābhūtāvadṛśyetāṃ vacanātsatyavādinaḥ
हे प्रजापालक, उनके ऐसा कहते ही उसी क्षण उस सत्यवादी के वचन से वे दोनों वैसे ही रूप में दिखाई दिए।
श्लोक 52 (9.37.52)
तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोयं हलायुधः । दत्त्वा च विविधान्देयान्पूजयित्वा च वै द्विजान् ॥
tatrāpyamitavikrāntaḥ spṛṣṭvā toyaṃ halāyudhaḥ | dattvā ca vividhāndeyānpūjayitvā ca vai dvijān
वहाँ भी अपरिमित पराक्रम वाले हलधर ने जल का स्पर्श किया, नाना प्रकार के दान दिए और ब्राह्मणों का सत्कार किया।
श्लोक 53 (9.37.53)
उदपानं च तं वीक्ष्य प्रशस्य च पुनःपुनः । नदीगतमदीनात्मा प्राप्तो विनशनं तदा ॥
udapānaṃ ca taṃ vīkṣya praśasya ca punaḥpunaḥ | nadīgatamadīnātmā prāpto vinaśanaṃ tadā
नदी में स्थित उस कुएँ को देखकर और बार-बार उसकी प्रशंसा करके अविचल चित्त बलराम तब विनशन पहुँचे।