शल्य पर्व · अध्याय 38
सरस्वती के तट पर बलराम की तीर्थयात्रा
बलराम विनशन, सुभूमिक, गन्धर्वों के तीर्थ, गर्गस्रोत, महाशङ्ख वृक्ष वाले शङ्खतीर्थ, नागधन्वा और पूर्व की ओर के अनेक तीर्थों में जाते हैं, और हर जगह स्नान तथा दान करते हैं। जहाँ सरस्वती लौटकर पूर्वमुखी हुई है, वहाँ वे विस्मित होते हैं, और जनमेजय पूछते हैं कि वह क्यों लौटी। वैशम्पायन बताते हैं कि नैमिष का सत्र समाप्त होने पर नदी के तटों पर इतने ऋषि आ बसे कि बाद में आने वालों को स्थान नहीं मिला; तब दया से सरस्वती ने अनेक कुंज बनाते हुए पीछे मुड़कर उन्हें दर्शन दिए, और वह कुंज 'नैमिषीय' कहलाता है। इसके बाद बलराम सप्तसारस्वत पहुँचते हैं, जहाँ मुनि मङ्कणक ने तप किया था।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (9.38.1)
ततो विनशनं राजन्नाजगाम हलायुधः । शूद्राभीरान्प्रति द्वेषाद्यत्र नष्टा सरस्वती । तस्मात्तामृषयो नित्यं प्राहुर्विनशनेति च ॥
tato vinaśanaṃ rājannājagāma halāyudhaḥ | śūdrābhīrānprati dveṣādyatra naṣṭā sarasvatī | tasmāttāmṛṣayo nityaṃ prāhurvinaśaneti ca
हे राजन्, तब हलधर बलराम विनशन आए, जहाँ शूद्रों और आभीरों के प्रति द्वेष से सरस्वती लुप्त हो गई थी; इसीलिए ऋषि उसे सदा 'विनशन' कहते हैं।
श्लोक 2 (9.38.2)
तत्राप्युपस्पृश्य बलः सरस्वत्यां महाबलः । सुभूमिकं ततोऽगच्छत्सरस्वत्यास्तटे वरे ॥
tatrāpyupaspṛśya balaḥ sarasvatyāṃ mahābalaḥ | subhūmikaṃ tato'gacchatsarasvatyāstaṭe vare
वहाँ भी महाबली बलराम ने सरस्वती में स्नान किया और फिर सरस्वती के सुन्दर तट पर स्थित सुभूमिक तीर्थ को गए।
श्लोक 3 (9.38.3)
तत्र चाप्सरसः शुभ्रा नित्यकालमतन्द्रिताः । क्रीडाभिर्विमलाभिश्च क्रीडन्ति विमलाननाः ॥
tatra cāpsarasaḥ śubhrā nityakālamatandritāḥ | krīḍābhirvimalābhiśca krīḍanti vimalānanāḥ
वहाँ निर्मल मुखों वाली, उज्ज्वल अप्सराएँ सदा अथक रहकर निर्मल क्रीड़ाओं से खेलती रहती हैं।
श्लोक 4 (9.38.4)
तत्र देवाः सगन्धर्वा मासिमासि जनेश्वर । अभिगच्छन्ति तत्तीर्थं पुण्यं ब्राह्मणसेवितम् ॥
tatra devāḥ sagandharvā māsimāsi janeśvara | abhigacchanti tattīrthaṃ puṇyaṃ brāhmaṇasevitam
हे जनेश्वर, वहाँ ब्राह्मणों से सेवित उस पुण्य तीर्थ में देवता और गन्धर्व प्रत्येक मास आते हैं।
श्लोक 5 (9.38.5)
तत्र नृत्यन्ति गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः । समेत्य सहिता राजन्यथाप्राप्तं यथासुखम् ॥
tatra nṛtyanti gandharvāstathaivāpsarasāṃ gaṇāḥ | sametya sahitā rājanyathāprāptaṃ yathāsukham
हे राजन्, वहाँ गन्धर्व नृत्य करते हैं, और अप्सराओं के समूह भी, जैसे आते हैं वैसे इकट्ठे होकर, अपनी इच्छा से सुखपूर्वक।
श्लोक 6 (9.38.6)
तत्र मोदन्ति देवाश्च पितरश्च सवीरुधः । पुण्यैः पुष्पैः सदा दिव्यैः कीर्यमाणाः पुनः पुनः ॥
tatra modanti devāśca pitaraśca savīrudhaḥ | puṇyaiḥ puṣpaiḥ sadā divyaiḥ kīryamāṇāḥ punaḥ punaḥ
वहाँ देवता और पितर लताओं-औषधियों सहित आनन्दित होते हैं, और उन पर बार-बार पवित्र दिव्य पुष्प बरसाए जाते हैं।
श्लोक 7 (9.38.7)
आक्रीडभूमिः सा राजंस्तासामप्सरसां शुभा । सुभूमिकेति विख्याता सरस्वत्यास्तटे वरे ॥
ākrīḍabhūmiḥ sā rājaṃstāsāmapsarasāṃ śubhā | subhūmiketi vikhyātā sarasvatyāstaṭe vare
हे राजन्, उन अप्सराओं की वह सुन्दर क्रीड़ाभूमि सरस्वती के श्रेष्ठ तट पर 'सुभूमिका' नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 8 (9.38.8)
तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसु विप्रेषु माधवः । श्रुत्वा गीतं च तद्दिव्यं वादित्राणां च निःस्वनम् ॥
tatra snātvā ca dattvā ca vasu vipreṣu mādhavaḥ | śrutvā gītaṃ ca taddivyaṃ vāditrāṇāṃ ca niḥsvanam
वहाँ स्नान करके और ब्राह्मणों को धन देकर माधव ने वह दिव्य गीत और वाद्यों की ध्वनि सुनी,
श्लोक 9 (9.38.9)
शय्याश्च विपुला दृष्ट्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् । गन्धर्वाणां ततस्तीर्थमागच्छद्रोहिणीसुतः ॥
śayyāśca vipulā dṛṣṭvā devagandharvarakṣasām | gandharvāṇāṃ tatastīrthamāgacchadrohiṇīsutaḥ
और देवों, गन्धर्वों तथा राक्षसों की विशाल शय्याएँ देखकर रोहिणी-पुत्र गन्धर्वों के तीर्थ को आए।
श्लोक 10 (9.38.10)
विश्वावसुमुखास्तत्र गन्धर्वाप्सरसां गणाः । नृत्तवादित्रगीतं च कुर्वन्ति सुमनोरमम् ॥
viśvāvasumukhāstatra gandharvāpsarasāṃ gaṇāḥ | nṛttavāditragītaṃ ca kurvanti sumanoramam
वहाँ विश्वावसु के नेतृत्व में गन्धर्वों और अप्सराओं के समूह अत्यन्त मनोहर नृत्य, वादन और गायन करते हैं।
श्लोक 11 (9.38.11)
तत्र दत्त्वा हलधरो विप्रेभ्यो विविधं वसु । अजाविकं गोखरोष्ट्रं सुवर्णं रजतं तथा ॥
tatra dattvā haladharo viprebhyo vividhaṃ vasu | ajāvikaṃ gokharoṣṭraṃ suvarṇaṃ rajataṃ tathā
वहाँ हलधर ने ब्राह्मणों को नाना प्रकार का धन दिया — बकरी-भेड़, गाय-गधे-ऊँट, सोना और चाँदी।
श्लोक 12 (9.38.12)
भोजयित्वा द्विजान्कामैः सन्तर्प्य च महाधनैः । प्रययौ सहितो विप्रैः स्तूयमानश्च माधवः ॥
bhojayitvā dvijānkāmaiḥ santarpya ca mahādhanaiḥ | prayayau sahito vipraiḥ stūyamānaśca mādhavaḥ
ब्राह्मणों को मनचाहे भोजन कराकर और बड़े-बड़े धनों से तृप्त करके माधव ब्राह्मणों के साथ चले, और वे उनकी स्तुति करते रहे।
श्लोक 13 (9.38.13)
तस्माद्गन्धर्वतीर्थाच्च महाबाहुररिन्दमः । गर्गस्रोतो महातीर्थमाजगामैककुण्डली ॥
tasmādgandharvatīrthācca mahābāhurarindamaḥ | gargasroto mahātīrthamājagāmaikakuṇḍalī
उस गन्धर्व-तीर्थ से शत्रुदमन महाबाहु, एक कुण्डल धारण करने वाले बलराम महातीर्थ गर्गस्रोत पहुँचे।
श्लोक 14 (9.38.14)
तत्र गर्गेण वृद्धेन तपसा भावितात्मना । कालज्ञानगतिश्चैव ज्योतिषां च व्यतिक्रमः ॥
tatra gargeṇa vṛddhena tapasā bhāvitātmanā | kālajñānagatiścaiva jyotiṣāṃ ca vyatikramaḥ
वहाँ तप से शुद्ध-चित्त वृद्ध गर्ग ने काल की गति का ज्ञान और ज्योतिष्कों के व्यतिक्रम को जाना,
श्लोक 15 (9.38.15)
उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय । सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना ॥
utpātā dāruṇāścaiva śubhāśca janamejaya | sarasvatyāḥ śubhe tīrthe viditā vai mahātmanā
तथा, हे जनमेजय, भयंकर और शुभ उत्पातों (शकुनों) को भी; सरस्वती के उस सुन्दर तीर्थ पर उन महात्मा ने यह सब जाना।
श्लोक 16 (9.38.16)
तस्य नाम्ना च तत्तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ॥
tasya nāmnā ca tattīrthaṃ gargasrota iti smṛtam
उनके नाम से वह तीर्थ 'गर्गस्रोत' कहलाता है।
श्लोक 17 (9.38.17)
तत्र गर्गं महाभागमृषयः सुव्रता नृप । उपासाञ्चक्रिरे नित्यं कालज्ञानं प्रति प्रभो ॥
tatra gargaṃ mahābhāgamṛṣayaḥ suvratā nṛpa | upāsāñcakrire nityaṃ kālajñānaṃ prati prabho
हे राजन्, हे प्रभो, वहाँ दृढ़ व्रत वाले ऋषि काल-ज्ञान के लिए महाभाग गर्ग की सदा उपासना किया करते थे।
श्लोक 18 (9.38.18)
तत्र गत्वा महाराज बलः श्वेतानुलेपनः । विधिवद्धि धनं दत्त्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ॥
tatra gatvā mahārāja balaḥ śvetānulepanaḥ | vidhivaddhi dhanaṃ dattvā munīnāṃ bhāvitātmanām
हे महाराज, वहाँ पहुँचकर श्वेत चन्दन लगाए बलराम ने शुद्ध-चित्त मुनियों को विधिपूर्वक धन दिया,
श्लोक 19 (9.38.19)
उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान्विप्रेभ्यो विप्रदाय सः । नीलवासास्तदाऽगच्छच्छङ्घतीर्थं महायशाः ॥
uccāvacāṃstathā bhakṣyānviprebhyo vipradāya saḥ | nīlavāsāstadā'gacchacchaṅghatīrthaṃ mahāyaśāḥ
ब्राह्मणों को ऊँचे-नीचे सब प्रकार के भक्ष्य पदार्थ देकर नीले वस्त्र पहने वे महायशस्वी तब शङ्खतीर्थ गए।
श्लोक 20 (9.38.20)
तत्रापश्यन्महाशङ्खं महामेरुमिवोच्छ्रितम् । श्वेतपर्वतसङ्काशमृषिसङ्घैर्निषेवितम् । सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली ॥
tatrāpaśyanmahāśaṅkhaṃ mahāmerumivocchritam | śvetaparvatasaṅkāśamṛṣisaṅghairniṣevitam | sarasvatyāstaṭe jātaṃ nagaṃ tāladhvajo balī
वहाँ ताल-ध्वज बलवान् बलराम ने महामेरु के समान ऊँचा, श्वेत पर्वत-सा दीखने वाला, ऋषि-समूहों से सेवित, सरस्वती के तट पर उगा हुआ महाशङ्ख नामक वृक्ष देखा।
श्लोक 21 (9.38.21)
यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः । पिशाचाश्चामितबला यत्र सिद्धाः सहस्रशः ॥
yakṣā vidyādharāścaiva rākṣasāścāmitaujasaḥ | piśācāścāmitabalā yatra siddhāḥ sahasraśaḥ
वहाँ अपरिमित तेज वाले यक्ष, विद्याधर और राक्षस, अपरिमित बल वाले पिशाच, और हजारों सिद्ध रहते हैं।
श्लोक 22 (9.38.22)
ते सर्वे ह्यशनं त्यक्त्वा फलं तस्य वनस्पतेः । व्रतैश्च नियमैश्चैव कालेकाले स्म भुञ्जते ॥
te sarve hyaśanaṃ tyaktvā phalaṃ tasya vanaspateḥ | vrataiśca niyamaiścaiva kālekāle sma bhuñjate
वे सब अन्न त्यागकर अपने व्रतों और नियमों के अनुसार समय-समय पर उस वृक्ष का फल खाते हैं।
श्लोक 23 (9.38.23)
प्राप्तैश्च नियमैस्तैस्तैर्विचरन्तः पृथक्पृथक् । अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन्पुरुषर्षभ ॥
prāptaiśca niyamaistaistairvicarantaḥ pṛthakpṛthak | adṛśyamānā manujairvyacaranpuruṣarṣabha
हे पुरुषश्रेष्ठ, अपने-अपने नियमों को अपनाकर वे अलग-अलग विचरते और मनुष्यों को दिखाई न देते हुए घूमते थे।
श्लोक 24 (9.38.24)
एवं ख्यातो नरव्याघ्र लोकेऽस्मिन्स वनस्पतिः । तत्र तीर्थं सरस्वत्याः पावनं लोकविश्रुतम् ॥
evaṃ khyāto naravyāghra loke'sminsa vanaspatiḥ | tatra tīrthaṃ sarasvatyāḥ pāvanaṃ lokaviśrutam
हे नरव्याघ्र, इस प्रकार वह वृक्ष इस लोक में प्रसिद्ध है; और वहाँ सरस्वती का पावन तथा लोक-प्रसिद्ध तीर्थ है।
श्लोक 25 (9.38.25)
तस्मिंश्च यदुशार्दूलो दत्त्वा तीर्थे पयस्विनीः । ताम्रायसानि भाण्डानि वस्त्राणि विविधानि च ॥
tasmiṃśca yaduśārdūlo dattvā tīrthe payasvinīḥ | tāmrāyasāni bhāṇḍāni vastrāṇi vividhāni ca
उस तीर्थ में यदुश्रेष्ठ ने दूध देने वाली गायें, ताँबे और लोहे के बर्तन तथा नाना प्रकार के वस्त्र दान किए,
श्लोक 26 (9.38.26)
पूजयित्वा द्विजांश्चैव पूजितश्च तपोधनैः । पुण्यं नैसर्गिकं राजन्नाजगाम हलायुधः ॥
pūjayitvā dvijāṃścaiva pūjitaśca tapodhanaiḥ | puṇyaṃ naisargikaṃ rājannājagāma halāyudhaḥ
ब्राह्मणों का सत्कार किया और तपस्वियों से स्वयं सम्मान पाया; फिर, हे राजन्, हलधर प्रकृति से बने उस पुण्य स्थान को गए।
श्लोक 27 (9.38.27)
तत्र गत्वा मुनीन्दृष्ट्वा नानावेषधरान्बलः । आप्लुत्य सलिले चापि पूजयामास वै द्विजान् ॥
tatra gatvā munīndṛṣṭvā nānāveṣadharānbalaḥ | āplutya salile cāpi pūjayāmāsa vai dvijān
वहाँ जाकर नाना वेश धारण किए मुनियों को देखकर बलराम ने जल में स्नान किया और ब्राह्मणों का सत्कार किया।
श्लोक 28 (9.38.28)
तथैव दत्त्वा विप्रेभ्यः परिभोगान्सुपुष्कलान् । ततः प्रायाद्बलो राजन्दक्षिणेन सरस्वतीम् ॥
tathaiva dattvā viprebhyaḥ paribhogānsupuṣkalān | tataḥ prāyādbalo rājandakṣiṇena sarasvatīm
उसी प्रकार ब्राह्मणों को उपभोग की प्रचुर वस्तुएँ देकर, हे राजन्, बलराम सरस्वती के दक्षिण से होकर आगे चले।
श्लोक 29 (9.38.29)
गत्वा चैवं महाबाहुर्नातिदूरे महायशाः । धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः ॥
gatvā caivaṃ mahābāhurnātidūre mahāyaśāḥ | dharmātmā nāgadhanvānaṃ tīrthamāgamadacyutaḥ
इस प्रकार अधिक दूर न जाकर महाबाहु, महायशस्वी, धर्मात्मा, अच्युत बलराम नागधन्वा तीर्थ पहुँचे,
श्लोक 30 (9.38.30)
यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः सन्निवेशनम् । महाद्युतेर्महाराज बहुभिः पन्नगैर्वृतम् ॥
yatra pannagarājasya vāsukeḥ sanniveśanam | mahādyutermahārāja bahubhiḥ pannagairvṛtam
जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकि का निवास है, हे महाराज, जो बहुत-से नागों से घिरा रहता है।
श्लोक 31 (9.38.31)
ऋषीणां हि सहस्राणि तत्र नित्यं चतुर्दश । यत्र देवाः समागम्य वासुकिं पन्नगोत्तमम् । सर्वपन्नगराजानमभ्यषिञ्चन्यथाविधि ॥
ṛṣīṇāṃ hi sahasrāṇi tatra nityaṃ caturdaśa | yatra devāḥ samāgamya vāsukiṃ pannagottamam | sarvapannagarājānamabhyaṣiñcanyathāvidhi
वहाँ सदा चौदह हजार ऋषि रहते हैं; वहीं देवताओं ने एकत्र होकर नागों में श्रेष्ठ वासुकि का सब नागराजों के राजा के रूप में विधिपूर्वक अभिषेक किया।
श्लोक 32 (9.38.32)
पन्नगेभ्यो भयं तत्र विद्यते न स्म पौरव ॥
pannagebhyo bhayaṃ tatra vidyate na sma paurava
हे पौरव, वहाँ नागों से कोई भय नहीं रहता।
श्लोक 33 (9.38.33)
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा विप्रेभ्यो रत्नसञ्चयान् । प्रायात्प्राचीं दिशं राजंस्तत्र तीर्थान्यनेकशः ॥
tatrāpi vidhivaddattvā viprebhyo ratnasañcayān | prāyātprācīṃ diśaṃ rājaṃstatra tīrthānyanekaśaḥ
वहाँ भी विधिपूर्वक ब्राह्मणों को रत्नों के ढेर देकर, हे राजन्, वे पूर्व दिशा की ओर गए, जहाँ अनगिनत तीर्थ हैं,
श्लोक 34 (9.38.34)
सहस्रशतसङ्ख्यानि प्रथितानि पदेपदे । आप्लुत्य तत्र तीर्थेषु यथोक्तं तत्र चर्षिभिः ॥
sahasraśatasaṅkhyāni prathitāni padepade | āplutya tatra tīrtheṣu yathoktaṃ tatra carṣibhiḥ
जो लाखों की संख्या में हैं और पग-पग पर प्रसिद्ध हैं। वहाँ उन तीर्थों में, जैसा ऋषियों ने बताया था, स्नान करके,
श्लोक 35 (9.38.35)
दत्त्वा वसु द्विजाग्र्येभ्यो निर्जगाम महाबलः । तत्रस्थानृषिसङ्घांस्तानभिवाद्य हलायुधः ॥
dattvā vasu dvijāgryebhyo nirjagāma mahābalaḥ | tatrasthānṛṣisaṅghāṃstānabhivādya halāyudhaḥ
और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को धन देकर महाबली आगे बढ़े; और वहाँ रहने वाले ऋषि-समूहों को प्रणाम करके हलधर
श्लोक 36 (9.38.36)
ततो रामोऽगमत्तीर्थमृषिभिः सेवितं महत् । यत्र भूयो निववृते प्राङ्मुखा वै सरस्वती ॥
tato rāmo'gamattīrthamṛṣibhiḥ sevitaṃ mahat | yatra bhūyo nivavṛte prāṅmukhā vai sarasvatī
तब बलराम उस महान् तीर्थ को गए जो ऋषियों से सेवित था, और जहाँ सरस्वती पूर्वमुखी होकर फिर लौट पड़ी थी,
श्लोक 37 (9.38.37)
ऋषीणां नैमिषेयाणामवेक्षार्थं महात्मनाम् । निवृत्तां तां सरिच्छ्रेष्ठां तत्र दृष्ट्वा तु लाङ्गली । बभूव विस्मितो राजन्बलः श्वेतानुलेपनः ॥
ṛṣīṇāṃ naimiṣeyāṇāmavekṣārthaṃ mahātmanām | nivṛttāṃ tāṃ saricchreṣṭhāṃ tatra dṛṣṭvā tu lāṅgalī | babhūva vismito rājanbalaḥ śvetānulepanaḥ
नैमिष के महात्मा ऋषियों को दर्शन देने के लिए। वहाँ उस श्रेष्ठ नदी को लौटी हुई देखकर श्वेत चन्दन लगाए हलधर बलराम, हे राजन्, विस्मित हो गए।
जनमेजय उवाच
श्लोक 38 (9.38.38)
कस्मात्सरस्वती ब्रह्मन्निवृत्ता प्राङ्मुखीभवत् । व्याख्यातमेतदिच्छामि सर्वमध्वर्युसत्तम ॥
kasmātsarasvatī brahmannivṛttā prāṅmukhībhavat | vyākhyātametadicchāmi sarvamadhvaryusattama
हे ब्रह्मन्, सरस्वती क्यों लौटकर पूर्वमुखी हुई? हे अध्वर्युओं में श्रेष्ठ, मैं यह सब समझाया जाना चाहता हूँ।
श्लोक 39 (9.38.39)
कस्मिंश्चित्कारणे तत्र विस्मितो यदुनन्दनः । निवृत्ता हेतुना केन कथमेव सरिद्वरा ॥
kasmiṃścitkāraṇe tatra vismito yadunandanaḥ | nivṛttā hetunā kena kathameva saridvarā
और किस कारण से वहाँ यदुनन्दन विस्मित हुए? वह श्रेष्ठ नदी किस हेतु से और कैसे लौटी?
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 40 (9.38.40)
पूर्वं कृतयुगे राजन्नैमिषेयास्तपस्विनः । वर्तमाने सुविपुले सत्रे द्वादशवार्षिके ॥
pūrvaṃ kṛtayuge rājannaimiṣeyāstapasvinaḥ | vartamāne suvipule satre dvādaśavārṣike
हे राजन्, पूर्वकाल में कृतयुग में नैमिष के तपस्वी बारह वर्ष तक चलने वाले एक बहुत बड़े सत्र में लगे हुए थे।
श्लोक 41 (9.38.41)
ऋषयो बहवो राजंस्तत्सत्रमभिपेदिरे । उषित्वा च महाभागास्तस्मिन्सत्रे यथाविधि ॥
ṛṣayo bahavo rājaṃstatsatramabhipedire | uṣitvā ca mahābhāgāstasminsatre yathāvidhi
हे राजन्, उस सत्र में बहुत-से ऋषि आए; और उन महाभागों ने उस सत्र में विधिपूर्वक निवास किया,
श्लोक 42 (9.38.42)
निवृत्ते नैमिषे ये वै सत्रे द्वादशवार्षिके । आजग्मुर्ऋषयस्तत्र बहवस्तीर्थकारणात् ॥
nivṛtte naimiṣe ye vai satre dvādaśavārṣike | ājagmurṛṣayastatra bahavastīrthakāraṇāt
और जब नैमिष का बारह वर्ष का वह सत्र समाप्त हुआ, तब तीर्थों के लिए बहुत-से ऋषि वहाँ आए।
श्लोक 43 (9.38.43)
ऋषीणां बहुलत्वात्तु सरस्वत्या विशाम्पते । तीर्थानि नगरायन्ते कूले वै दक्षिणोत्तरे ॥
ṛṣīṇāṃ bahulatvāttu sarasvatyā viśāmpate | tīrthāni nagarāyante kūle vai dakṣiṇottare
हे प्रजापालक, ऋषियों की बहुतायत के कारण सरस्वती के दक्षिण और उत्तर दोनों तटों के तीर्थ नगरों जैसे हो गए।
श्लोक 44 (9.38.44)
समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमाः । तीर्थलोभान्नरव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिताः ॥
samantapañcakaṃ yāvattāvatte dvijasattamāḥ | tīrthalobhānnaravyāghra nadyāstīraṃ samāśritāḥ
हे नरव्याघ्र, समन्तपञ्चक तक वे श्रेष्ठ ब्राह्मण तीर्थों के लोभ से नदी के तट पर बस गए।
श्लोक 45 (9.38.45)
जुह्वतां तत्र तेषां तु मुनीनां भावितात्मनाम् । स्वाध्यायेनातिमहता बभूवुः पूरिता दिशः ॥
juhvatāṃ tatra teṣāṃ tu munīnāṃ bhāvitātmanām | svādhyāyenātimahatā babhūvuḥ pūritā diśaḥ
वहाँ आहुति देते हुए उन शुद्ध-चित्त मुनियों के महान् वेदपाठ के घोष से सब दिशाएँ भर गईं।
श्लोक 46 (9.38.46)
अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां हूयमानैर्महात्मनाम् । अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ॥
agnihotraistatasteṣāṃ hūyamānairmahātmanām | aśobhata saricchreṣṭhā dīpyamānaiḥ samantataḥ
उन महात्माओं के चारों ओर जलते और आहुति पाते हुए अग्निहोत्रों से वह श्रेष्ठ नदी सुशोभित हुई।
श्लोक 47 (9.38.47)
वालखिल्या महाराज अश्मकुट्टाश्च तापसाः । दन्तोलूखलिनश्चान्ये सम्प्रक्षालास्तथा परे ॥
vālakhilyā mahārāja aśmakuṭṭāśca tāpasāḥ | dantolūkhalinaścānye samprakṣālāstathā pare
हे महाराज, वहाँ वालखिल्य और अश्मकुट्ट तपस्वी थे, दाँतों को ही ओखली बनाने वाले दूसरे थे, और अन्य सम्प्रक्षाल थे;
श्लोक 48 (9.38.48)
वायुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः । नानानियमयुक्ताश्च तथा स्थण्डिलशायिनः ॥
vāyubhakṣā jalāhārāḥ parṇabhakṣāśca tāpasāḥ | nānāniyamayuktāśca tathā sthaṇḍilaśāyinaḥ
वायु, जल और पत्तों पर जीने वाले तपस्वी, नाना नियमों से बँधे हुए, तथा भूमि पर सोने वाले भी थे।
श्लोक 49 (9.38.49)
आसन्वै मुनयस्तत्र सरस्वत्याः समीपतः । शोभयन्तः सरिच्छ्रेष्ठां गङ्गामिव दिवौकसः ॥
āsanvai munayastatra sarasvatyāḥ samīpataḥ | śobhayantaḥ saricchreṣṭhāṃ gaṅgāmiva divaukasaḥ
वे मुनि वहाँ सरस्वती के समीप रहते थे और उस श्रेष्ठ नदी को वैसे ही सुशोभित करते थे जैसे देवता गंगा को।
श्लोक 50 (9.38.50)
शतशश्च समापेतुर्ऋषयः सत्रयाजिनः । तेऽवकाशं न ददृशुः सरस्वत्या महाव्रताः । तेऽवकाशं न ददृशुः कुरुक्षेत्रे महाव्रताः ॥
śataśaśca samāpeturṛṣayaḥ satrayājinaḥ | te'vakāśaṃ na dadṛśuḥ sarasvatyā mahāvratāḥ | te'vakāśaṃ na dadṛśuḥ kurukṣetre mahāvratāḥ
सत्र करने वाले सैकड़ों ऋषि आ पहुँचे; उन महाव्रतियों को सरस्वती के तट पर स्थान न मिला, और कुरुक्षेत्र में भी उन महाव्रतियों को स्थान न मिला।
श्लोक 51 (9.38.51)
ततो यज्ञोपवीतैः स्वैस्तत्र कृत्वा सरस्वतीम् । जुहुवुश्चाग्निहोत्रांश्च चक्रुश्च विविधाः क्रियाः ॥
tato yajñopavītaiḥ svaistatra kṛtvā sarasvatīm | juhuvuścāgnihotrāṃśca cakruśca vividhāḥ kriyāḥ
तब उन्होंने अपने यज्ञोपवीतों से वहाँ सरस्वती को बनाकर अग्निहोत्र की आहुतियाँ दीं और नाना प्रकार के कर्म किए।
श्लोक 52 (9.38.52)
ततस्तमृषिसङ्घातं निराशं चिन्तयान्वितम् । दर्शयामास राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती ॥
tatastamṛṣisaṅghātaṃ nirāśaṃ cintayānvitam | darśayāmāsa rājendra teṣāmarthe sarasvatī
तब, हे राजेन्द्र, ऋषियों के उस समूह को निराश और चिन्ता में डूबा देखकर सरस्वती उनके लिए प्रकट हुई।
श्लोक 53 (9.38.53)
ततः कुञ्जान्बहून्कृत्वा सन्निवृत्ता सरस्वती । ऋषीणां पुण्यतपसां कारुण्याज्जनमेजय ॥
tataḥ kuñjānbahūnkṛtvā sannivṛttā sarasvatī | ṛṣīṇāṃ puṇyatapasāṃ kāruṇyājjanamejaya
हे जनमेजय, तब पुण्य तप वाले ऋषियों पर दया करके सरस्वती बहुत-से कुंज बनाती हुई लौट पड़ी।
श्लोक 54 (9.38.54)
ततो निवृत्त्य राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती । भूयः प्रतीच्यभिमुखी प्रसुस्राव सरिद्वरा ॥
tato nivṛttya rājendra teṣāmarthe sarasvatī | bhūyaḥ pratīcyabhimukhī prasusrāva saridvarā
हे राजेन्द्र, तब उनके लिए लौटकर श्रेष्ठ नदी सरस्वती फिर पश्चिम की ओर मुख करके बहने लगी।
श्लोक 55 (9.38.55)
अमोघा गमनं कृत्वा तेषां भूयो जगाम ह । अत्यद्भुतं महच्चक्रे तदा राजन्महानदी ॥
amoghā gamanaṃ kṛtvā teṣāṃ bhūyo jagāma ha | atyadbhutaṃ mahaccakre tadā rājanmahānadī
उनके पास अपना आना सफल करके वह फिर आगे बढ़ गई। हे राजन्, उस महानदी ने तब अत्यन्त अद्भुत और महान् कार्य किया।
श्लोक 56 (9.38.56)
एवं स कुञ्जो राजन्वै नैमिषीय इति स्मृतः । कुरुश्रेष्ठ कुरुक्षेत्रे कुरुष्व महतीं क्रियाम् ॥
evaṃ sa kuñjo rājanvai naimiṣīya iti smṛtaḥ | kuruśreṣṭha kurukṣetre kuruṣva mahatīṃ kriyām
हे राजन्, इस प्रकार वह कुंज 'नैमिषीय' नाम से स्मरण किया जाता है। हे कुरुश्रेष्ठ, कुरुक्षेत्र में महान् कर्म करो।
श्लोक 57 (9.38.57)
तत्र कुञ्जान्बहून्दृष्ट्वा निवृत्तां च सरस्वतीम् । बभूव विस्मयस्तत्र रामस्याथ महात्मनः ॥
tatra kuñjānbahūndṛṣṭvā nivṛttāṃ ca sarasvatīm | babhūva vismayastatra rāmasyātha mahātmanaḥ
वहाँ बहुत-से कुंज और लौटी हुई सरस्वती को देखकर महात्मा बलराम को बड़ा विस्मय हुआ।
श्लोक 58 (9.38.58)
उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद्यदुनन्दनः । दत्त्वा देयान्द्विजातिभ्यो भाण्डानि विविधानि च ॥
upaspṛśya tu tatrāpi vidhivadyadunandanaḥ | dattvā deyāndvijātibhyo bhāṇḍāni vividhāni ca
वहाँ भी विधिपूर्वक स्नान करके यदुनन्दन ने ब्राह्मणों को दान तथा नाना प्रकार के बर्तन दिए,
श्लोक 59 (9.38.59)
भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्राह्मणेभ्यः प्रदाय च । ततः प्रायाद्बलो राजन्पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥
bhakṣyaṃ bhojyaṃ ca vividhaṃ brāhmaṇebhyaḥ pradāya ca | tataḥ prāyādbalo rājanpūjyamāno dvijātibhiḥ
और ब्राह्मणों को नाना प्रकार के भक्ष्य और भोज्य पदार्थ देकर, हे राजन्, ब्राह्मणों से सम्मान पाते हुए बलराम आगे चले,
श्लोक 60 (9.38.60)
सरस्वतीतीर्थवरं नानाद्विजगणायुतम् । बदरेङ्गुदश्यामाकाप्लक्षाश्वत्थबिभीतकैः ॥
sarasvatītīrthavaraṃ nānādvijagaṇāyutam | badareṅgudaśyāmākāplakṣāśvatthabibhītakaiḥ
सरस्वती के श्रेष्ठ तीर्थ की ओर, जो ब्राह्मणों के अनेक समूहों से भरा था, और बेर, इंगुदी, श्यामाक, पाकड़, पीपल और बहेड़े के वृक्षों से सुशोभित था,
श्लोक 61 (9.38.61)
कङ्कोलैश्च पलाशैश्च करीरैः पीलुभिस्तथा । सरस्वतीतीर्थरुहैस्तरुभिर्विविधैस्तथा ॥
kaṅkolaiśca palāśaiśca karīraiḥ pīlubhistathā | sarasvatītīrtharuhaistarubhirvividhaistathā
कंकोल, पलाश, करील और पीलु से, तथा सरस्वती के तट पर उगने वाले नाना प्रकार के अन्य वृक्षों से,
श्लोक 62 (9.38.62)
करुषकवरैश्चैव बिल्वैराम्रातकैस्तथा । अतिमुक्तकषण्डैश्च पारिजातैश्च शोभितम् ॥
karuṣakavaraiścaiva bilvairāmrātakaistathā | atimuktakaṣaṇḍaiśca pārijātaiśca śobhitam
उत्तम करुषक, बेल और आमड़ा से, तथा अतिमुक्तक की झाड़ियों और पारिजात से शोभित,
श्लोक 63 (9.38.63)
कदलीवनभूयिष्ठं दृष्टिकान्तं मनोहरम् । वाय्वम्बुफलपर्णादैर्दन्तोलूखलिकैरपि ॥
kadalīvanabhūyiṣṭhaṃ dṛṣṭikāntaṃ manoharam | vāyvambuphalaparṇādairdantolūkhalikairapi
केलों के वनों से भरा, आँखों को प्रिय और मनोहर, तथा वायु, जल, फल और पत्ते खाकर रहने वाले और दाँतों को ओखली बनाने वाले तपस्वियों से युक्त,
श्लोक 64 (9.38.64)
तथाऽश्मकुट्टैर्वातेयैर्मुनिभिर्बहुभिर्वृतम् । स्वाध्यायघोषसङ्घुष्टं मृगयूथशताकुलम् ॥
tathā'śmakuṭṭairvāteyairmunibhirbahubhirvṛtam | svādhyāyaghoṣasaṅghuṣṭaṃ mṛgayūthaśatākulam
और अश्मकुट्ट तथा वायु पर जीने वाले अनेक मुनियों से घिरा, वेदाध्ययन की ध्वनि से गूँजता और सैकड़ों मृग-यूथों से भरा,
श्लोक 65 (9.38.65)
अहिंस्रैर्धर्मपरमैर्नृभिरत्यर्थसेवितम् । सप्तसारस्वतं तीर्थमाजगाम हलायुधः । यत्र मङ्कणकः सिद्धस्तपस्तेपे महामुनिः ॥
ahiṃsrairdharmaparamairnṛbhiratyarthasevitam | saptasārasvataṃ tīrthamājagāma halāyudhaḥ | yatra maṅkaṇakaḥ siddhastapastepe mahāmuniḥ
अहिंसक और परम धर्मनिष्ठ मनुष्यों से अत्यन्त सेवित उस सप्तसारस्वत तीर्थ में हलधर पहुँचे, जहाँ सिद्ध महामुनि मङ्कणक ने तप किया था।