शल्य पर्व · अध्याय 39
सात सरस्वतियाँ और मङ्कणक का नृत्य
जनमेजय पूछते हैं कि सप्तसारस्वत तीर्थ का यह नाम क्यों पड़ा और मुनि मङ्कणक कौन थे। वैशम्पायन बताते हैं कि अलग-अलग यज्ञों में सरस्वती किन-किन रूपों में आईं — सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला, मनोहरा, सुरेणु, ओघवती और विमलोदका — और वे एक तीर्थ में कैसे एक हुईं। फिर वे मङ्कणक की कथा कहते हैं: आजीवन ब्रह्मचारी मङ्कणक के घायल हाथ से जब शाक का रस बहा तो वे हर्ष से नाचने लगे और उनके साथ सारा जगत् नाचने लगा, यहाँ तक कि महादेव ने अपने अँगूठे पर चोट की और उससे भस्म निकली। लज्जित मुनि ने शिव की स्तुति की, और शिव ने उनके आश्रम में सदा रहने तथा सप्तसारस्वत में अपनी पूजा करने वालों को फल देने का वचन दिया।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (9.39.1)
सप्तसारस्वतं कस्मात्कश्च मङ्कणको मुनिः । कथं सिद्धः स भगवान्कश्चास्य नियमोऽभवत् ॥
saptasārasvataṃ kasmātkaśca maṅkaṇako muniḥ | kathaṃ siddhaḥ sa bhagavānkaścāsya niyamo'bhavat
सप्तसारस्वत तीर्थ का यह नाम क्यों पड़ा, और मुनि मङ्कणक कौन थे? वे पूज्य ऋषि सिद्ध कैसे हुए, और उनका नियम क्या था?
श्लोक 2 (9.39.2)
कस्य वंशे समुत्पन्नः किं चाधीतं द्विजोत्तम । एतन्मे सर्वमाचक्ष्व यथातत्त्वं महामुने ॥
kasya vaṃśe samutpannaḥ kiṃ cādhītaṃ dvijottama | etanme sarvamācakṣva yathātattvaṃ mahāmune
हे द्विजश्रेष्ठ! वे किसके वंश में उत्पन्न हुए और उन्होंने क्या अध्ययन किया? हे महामुने! यह सब मुझे ठीक-ठीक बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (9.39.3)
सप्तनद्यः सरस्वत्या याभिर्व्याप्तमिदं जगत् । आहूता बलवद्भिर्हि तत्रतत्र सरस्वती ॥
saptanadyaḥ sarasvatyā yābhirvyāptamidaṃ jagat | āhūtā balavadbhirhi tatratatra sarasvatī
सरस्वती की सात धाराएँ हैं, जिनसे यह सारा जगत् व्याप्त है; क्योंकि बलशाली पुरुषों ने स्थान-स्थान पर सरस्वती का आवाहन किया था।
श्लोक 4 (9.39.4)
सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला च मनोरमा । सरस्वती चौघवती सुरेणुर्विमलोदका ॥
suprabhā kāñcanākṣī ca viśālā ca manoramā | sarasvatī caughavatī sureṇurvimalodakā
वे हैं — सुप्रभा, काञ्चनाक्षी, विशाला और मनोरमा; सरस्वती, ओघवती, सुरेणु और विमलोदका।
श्लोक 5 (9.39.5)
पितामहस्य महतो वर्तमाने महामखे । वितते यज्ञवाटे च संसिद्धेषु द्विजातिषु ॥
pitāmahasya mahato vartamāne mahāmakhe | vitate yajñavāṭe ca saṃsiddheṣu dvijātiṣu
जब पितामह का महान् यज्ञ चल रहा था, यज्ञशाला का विस्तार हो चुका था और द्विज सब तैयार थे,
श्लोक 6 (9.39.6)
पुण्याहघोषैर्विमलैर्वेदानां निनदैस्तथा । देवेषु चैव व्यग्रेषु तस्मिन्यज्ञविधौ तदा ॥
puṇyāhaghoṣairvimalairvedānāṃ ninadaistathā | deveṣu caiva vyagreṣu tasminyajñavidhau tadā
पुण्याहवाचन की निर्मल घोषणाओं और वेदों के गम्भीर पाठ के साथ, और उस यज्ञ-विधि में देवताओं के भी व्यस्त रहते हुए,
श्लोक 7 (9.39.7)
तत्र चैव महाराज दीक्षिते प्रपितामहे । यजतस्तस्य सत्रेण सर्वकामसमृद्धिना ॥
tatra caiva mahārāja dīkṣite prapitāmahe | yajatastasya satreṇa sarvakāmasamṛddhinā
हे महाराज! वहाँ दीक्षा ले चुके प्रपितामह जब उस यज्ञसत्र का अनुष्ठान कर रहे थे जो सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला था,
श्लोक 8 (9.39.8)
मनसा चिन्तिता ह्यर्था धर्मार्थकुशलैस्तदा । उपतिष्ठन्ति राजेन्द्र द्विजातींस्तत्रतत्र ह ॥
manasā cintitā hyarthā dharmārthakuśalaistadā | upatiṣṭhanti rājendra dvijātīṃstatratatra ha
तब धर्म और अर्थ में कुशल द्विजों के मन में जो-जो अभिलाषाएँ उठती थीं, हे राजेन्द्र! वे स्थान-स्थान पर उनके सामने उपस्थित हो जाती थीं।
श्लोक 9 (9.39.9)
जगुश्च तत्र गन्धर्वा ननृतुश्चाप्सरोगणाः । वादित्राणि च दिव्यानि वादयामासुरञ्जसा ॥
jaguśca tatra gandharvā nanṛtuścāpsarogaṇāḥ | vāditrāṇi ca divyāni vādayāmāsurañjasā
वहाँ गन्धर्व गाते थे, अप्सराओं के समूह नाचते थे और वे सहज ही दिव्य वाद्य बजाते थे।
श्लोक 10 (9.39.10)
तस्य यज्ञस्य सम्पत्त्या तुतुषुर्देवतागणाः । विस्मयं परमं जग्मुः किमु मानुषयोनयः ॥
tasya yajñasya sampattyā tutuṣurdevatāgaṇāḥ | vismayaṃ paramaṃ jagmuḥ kimu mānuṣayonayaḥ
उस यज्ञ की समृद्धि से देवताओं के समूह प्रसन्न हो गए और परम विस्मय में पड़ गए; फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या।
श्लोक 11 (9.39.11)
वर्तमाने यथा यज्ञे पुष्करस्थे पितामहे । अब्रुवन्नृषयो राजन्नायं यज्ञो महागुणः ॥
vartamāne yathā yajñe puṣkarasthe pitāmahe | abruvannṛṣayo rājannāyaṃ yajño mahāguṇaḥ
हे राजन्! पुष्कर में पितामह का वह यज्ञ जब चल रहा था, तब ऋषियों ने कहा — "यह यज्ञ महान् गुणों वाला नहीं है,
श्लोक 12 (9.39.12)
न दृश्यते सरिच्छ्रेष्ठा यस्मादिह सरस्वती । तच्छ्रुत्वा भगवान्प्रीतः सस्माराथ सरस्वतीम् ॥
na dṛśyate saricchreṣṭhā yasmādiha sarasvatī | tacchrutvā bhagavānprītaḥ sasmārātha sarasvatīm
क्योंकि नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती यहाँ दिखाई नहीं देती।" यह सुनकर पूज्य ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उन्होंने सरस्वती का स्मरण किया।
श्लोक 13 (9.39.13)
पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै । सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना तत्र सरस्वती ॥
pitāmahena yajatā āhūtā puṣkareṣu vai | suprabhā nāma rājendra nāmnā tatra sarasvatī
यज्ञ करते हुए पितामह के बुलाने पर पुष्कर में सरस्वती सुप्रभा नाम से वहाँ आईं, हे राजेन्द्र!
श्लोक 14 (9.39.14)
तां दृष्ट्वा मुनयस्तुष्टास्त्वरायुक्तां सरस्वतीम् । पितामहं मानयन्तीं क्रतुं ते बहुमेनिरे ॥
tāṃ dṛṣṭvā munayastuṣṭāstvarāyuktāṃ sarasvatīm | pitāmahaṃ mānayantīṃ kratuṃ te bahumenire
पितामह का सम्मान करती हुई सरस्वती को शीघ्रता से आया देखकर मुनि प्रसन्न हुए और उन्होंने उस यज्ञ को बहुत महत्त्व दिया।
श्लोक 15 (9.39.15)
एवमेषा सरिच्छ्रेष्ठा पुष्करेषु सरस्वती । पितामहार्थं सम्भूता तुष्ट्यर्थं च मनीषिणाम् ॥
evameṣā saricchreṣṭhā puṣkareṣu sarasvatī | pitāmahārthaṃ sambhūtā tuṣṭyarthaṃ ca manīṣiṇām
इस प्रकार नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती पुष्कर में पितामह के लिए और विद्वानों के सन्तोष के लिए प्रकट हुईं।
श्लोक 16 (9.39.16)
नैमिषे मुनयो राजन्समागम्य समासते । तत्र चित्राः कथा ह्यासन्वेदं प्रति जनेश्वर ॥
naimiṣe munayo rājansamāgamya samāsate | tatra citrāḥ kathā hyāsanvedaṃ prati janeśvara
हे राजन्! नैमिष में मुनि एकत्र होकर बैठते हैं; हे जनेश्वर! वहाँ वेद के विषय में विचित्र चर्चाएँ हुआ करती थीं।
श्लोक 17 (9.39.17)
यत्र ते मुनयो ह्यासन्नानास्वाध्यायवेदिनः । ते समागम्य मुनयः सस्मारुर्वै सरस्वतीम् ॥
yatra te munayo hyāsannānāsvādhyāyavedinaḥ | te samāgamya munayaḥ sasmārurvai sarasvatīm
वहाँ जो मुनि थे वे अनेक वेदाध्ययनों के ज्ञाता थे; उन मुनियों ने एकत्र होकर सरस्वती का स्मरण किया।
श्लोक 18 (9.39.18)
सा तु ध्याता महाराज मुनिभिः सत्रयाजिभिः । समागतानां राजेन्द्र साहाय्यार्थं महात्मनाम् । आजगाम महाभागा तत्र पुण्या सरस्वती ॥
sā tu dhyātā mahārāja munibhiḥ satrayājibhiḥ | samāgatānāṃ rājendra sāhāyyārthaṃ mahātmanām | ājagāma mahābhāgā tatra puṇyā sarasvatī
हे महाराज! यज्ञसत्र करने वाले मुनियों के स्मरण करने पर वे पुण्यमयी महाभागा सरस्वती वहाँ एकत्र हुए उन महात्माओं की सहायता के लिए आ पहुँचीं, हे राजेन्द्र!
श्लोक 19 (9.39.19)
नैमिषे काञ्चनाक्षी तु मुनीनां सत्रायाजिनाम् । आगता सरितां श्रेष्ठा तत्र भारत पूजिता ॥
naimiṣe kāñcanākṣī tu munīnāṃ satrāyājinām | āgatā saritāṃ śreṣṭhā tatra bhārata pūjitā
नैमिष में यज्ञसत्र करने वाले मुनियों के पास नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती काञ्चनाक्षी के रूप में आईं, और वहाँ, हे भारत! उनका सम्मान हुआ।
श्लोक 20 (9.39.20)
गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम् । आहूता सरितां श्रेष्ठा गययज्ञे सरस्वती ॥
gayasya yajamānasya gayeṣveva mahākratum | āhūtā saritāṃ śreṣṭhā gayayajñe sarasvatī
यज्ञ करते हुए गय के गयदेश में हुए महायज्ञ में नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती गय के यज्ञ में बुलाई गईं।
श्लोक 21 (9.39.21)
गयस्य यजमानस्य गयेष्वेव महाक्रतुम् । विशालां तु गयस्याहुर्ऋषयः संशितव्रताः ॥
gayasya yajamānasya gayeṣveva mahākratum | viśālāṃ tu gayasyāhurṛṣayaḥ saṃśitavratāḥ
यज्ञ करते हुए गय के गयदेश में हुए महायज्ञ में दृढ़ व्रत वाले ऋषि उन्हें गय की विशाला कहते हैं।
श्लोक 22 (9.39.22)
सरित्सा हिमवत्पार्श्वात्प्रस्रुता शीघ्रगामिनी । औद्दालकेस्तथा यज्ञे यजतस्तस्य भारत ॥
saritsā himavatpārśvātprasrutā śīghragāminī | auddālakestathā yajñe yajatastasya bhārata
वह शीघ्र बहने वाली नदी हिमालय की ढलान से निकली थी; और इसी प्रकार, हे भारत! यज्ञ करते हुए औद्दालकि के यज्ञ में,
श्लोक 23 (9.39.23)
समेते सर्वतः स्फीते मुनीनां मण्डले तदा । उत्तरे कोसलाभागे पुण्ये राजन्महात्मनः ॥
samete sarvataḥ sphīte munīnāṃ maṇḍale tadā | uttare kosalābhāge puṇye rājanmahātmanaḥ
जब कोसल के उत्तरी भाग में, उस महात्मा की पुण्य भूमि में, चारों ओर से मुनियों का बड़ा मण्डल एकत्र हुआ, हे राजन्,
श्लोक 24 (9.39.24)
औद्दालकेन यजता पूर्वं ध्याता सरस्वती । आजगाम सरिच्छ्रेष्ठा तं देशं मुनिकारणात् ॥
auddālakena yajatā pūrvaṃ dhyātā sarasvatī | ājagāma saricchreṣṭhā taṃ deśaṃ munikāraṇāt
तब औद्दालकि ने यज्ञ करते हुए पहले जिनका ध्यान किया था, वे नदियों में श्रेष्ठ सरस्वती मुनियों के कारण उस देश में आईं,
श्लोक 25 (9.39.25)
पूज्यमाना मुनिगणैर्वल्कलाजिनसंवृतैः । मनोहरेति विख्याता सा हि तैर्मनसा वृता ॥
pūjyamānā munigaṇairvalkalājinasaṃvṛtaiḥ | manohareti vikhyātā sā hi tairmanasā vṛtā
वल्कल और मृगचर्म धारण करने वाले मुनिगणों से पूजित होती हुई वे मनोहरा नाम से प्रसिद्ध हुईं, क्योंकि उन्होंने उन्हें मन से वरण किया था।
श्लोक 26 (9.39.26)
सुरेणुर्ऋषभे द्वीपे पुण्ये राजर्षिसेविते । कुरोश्च यजमानस्य कुरुक्षेत्रे महात्मनः । आजगाम महाभागा सरिच्छ्रेष्ठा सरस्वती ॥
sureṇurṛṣabhe dvīpe puṇye rājarṣisevite | kurośca yajamānasya kurukṣetre mahātmanaḥ | ājagāma mahābhāgā saricchreṣṭhā sarasvatī
सुरेणु के रूप में पुण्य ऋषभद्वीप में, जहाँ राजर्षि आया करते थे; और कुरुक्षेत्र में महात्मा कुरु के यज्ञ करते समय महाभागा नदीश्रेष्ठ सरस्वती आईं।
श्लोक 27 (9.39.27)
ओघवत्यपि राजेन्द्र वसिष्ठेन महात्मना । समाहूता कुरुक्षेत्रे दिव्यतोया सरस्वती ॥
oghavatyapi rājendra vasiṣṭhena mahātmanā | samāhūtā kurukṣetre divyatoyā sarasvatī
हे राजेन्द्र! ओघवती के रूप में भी दिव्य जल वाली सरस्वती को महात्मा वसिष्ठ ने कुरुक्षेत्र में बुलाया था।
श्लोक 28 (9.39.28)
दक्षेण यजता चापि गङ्गाद्वारे सरस्वती । सुवेणुरिति विख्याता प्रस्रुता शीघ्रगामिनी ॥
dakṣeṇa yajatā cāpi gaṅgādvāre sarasvatī | suveṇuriti vikhyātā prasrutā śīghragāminī
गङ्गाद्वार में दक्ष के यज्ञ करते समय सरस्वती शीघ्र बहती हुई प्रकट हुईं और सुवेणु नाम से प्रसिद्ध हुईं।
श्लोक 29 (9.39.29)
विमलोदा भगवती ब्रह्मणा यजता पुनः । समाहूता ययौ तत्र पुण्ये हैमवते गिरौ ॥
vimalodā bhagavatī brahmaṇā yajatā punaḥ | samāhūtā yayau tatra puṇye haimavate girau
और पूज्य विमलोदा को ब्रह्मा ने यज्ञ करते हुए फिर बुलाया, तब वे पुण्य हिमालय पर्वत पर गईं।
श्लोक 30 (9.39.30)
एकीभूतास्ततस्तास्तु तस्मिंस्तीर्थे समागताः । सप्तसारस्वतं तीर्थं ततस्तु प्रथितं भुवि ॥
ekībhūtāstatastāstu tasmiṃstīrthe samāgatāḥ | saptasārasvataṃ tīrthaṃ tatastu prathitaṃ bhuvi
तब वे सब एक होकर उस तीर्थ में आ मिलीं, और उसी से पृथ्वी पर सप्तसारस्वत तीर्थ प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 31 (9.39.31)
इति सप्तसरस्वत्यो नामतः परिकीर्तिताः । सप्तसारस्वतं चैव तीर्थं पुण्यं तथा स्मृतम् ॥
iti saptasarasvatyo nāmataḥ parikīrtitāḥ | saptasārasvataṃ caiva tīrthaṃ puṇyaṃ tathā smṛtam
इस प्रकार सात सरस्वतियों के नाम बताए गए हैं, और इसी प्रकार सप्तसारस्वत तीर्थ पुण्यमय माना गया है।
श्लोक 32 (9.39.32)
शृणु मङ्कणकस्यापि कौमारब्रह्मचारिणः । आपगामवगाढस्य राजन्प्रक्रीडितं महत् ॥
śṛṇu maṅkaṇakasyāpi kaumārabrahmacāriṇaḥ | āpagāmavagāḍhasya rājanprakrīḍitaṃ mahat
अब हे राजन्! बाल्यकाल से ब्रह्मचारी मङ्कणक की उस महान् लीला को सुनिए जो नदी में स्नान करते समय हुई थी।
श्लोक 33 (9.39.33)
दृष्ट्वा यदृच्छया तत्र स्त्रियमम्भसि भारत । स्नायन्तीं रुचिरापाङ्गीं दिग्वाससमनिन्दिताम् ॥
dṛṣṭvā yadṛcchayā tatra striyamambhasi bhārata | snāyantīṃ rucirāpāṅgīṃ digvāsasamaninditām
हे भारत! वहाँ संयोग से उसने जल में स्नान करती हुई एक स्त्री को देखा — सुन्दर कटाक्षों वाली, दिगम्बर और निर्दोष —
श्लोक 34 (9.39.34)
सरस्वत्यां महाराज चस्कन्दे वीर्यमम्भसि । तद्रेतः स तु जग्राह कलशे वै महातपाः ॥
sarasvatyāṃ mahārāja caskande vīryamambhasi | tadretaḥ sa tu jagrāha kalaśe vai mahātapāḥ
हे महाराज! सरस्वती के जल में उसका वीर्य स्खलित हो गया। उन महातपस्वी ने उस वीर्य को एक घड़े में ले लिया।
श्लोक 35 (9.39.35)
ऋषिः परमधर्मात्मा तदा पुरुषसत्तम । सप्तधा प्रविभागं तु कलशस्थं जगाम ह ॥
ṛṣiḥ paramadharmātmā tadā puruṣasattama | saptadhā pravibhāgaṃ tu kalaśasthaṃ jagāma ha
परम धर्मात्मा वह ऋषि, हे पुरुषश्रेष्ठ! तब घड़े में रखा वह वीर्य सात भागों में बँट गया।
श्लोक 36 (9.39.36)
तत्रर्षयः सप्त जाता जज्ञिरे मरुतां गणाः । वायुवेगो वायुबलो वायुहा वायुमण्डलः ॥
tatrarṣayaḥ sapta jātā jajñire marutāṃ gaṇāḥ | vāyuvego vāyubalo vāyuhā vāyumaṇḍalaḥ
उससे सात ऋषि उत्पन्न हुए, जो मरुतों के गण थे — वायुवेग, वायुबल, वायुहा, वायुमण्डल,
श्लोक 37 (9.39.37)
वायुज्वालो वायुरेता वायुचक्रश्च वीर्यवान् । महर्षेश्चरितं यादृक् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥
vāyujvālo vāyuretā vāyucakraśca vīryavān | maharṣeścaritaṃ yādṛk triṣu lokeṣu viśrutam
वायुज्वाल, वायुरेता और पराक्रमी वायुचक्र। उस महर्षि का चरित, जैसा भी था, तीनों लोकों में प्रसिद्ध है।
श्लोक 38 (9.39.38)
पुरा मङ्कणकः सिद्धः कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् । क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् ॥
purā maṅkaṇakaḥ siddhaḥ kuśāgreṇeti naḥ śrutam | kṣataḥ kila kare rājaṃstasya śākaraso'sravat
हे राजन्! हमने सुना है कि पूर्वकाल में सिद्ध मङ्कणक का हाथ कुश की नोक से कट गया था और उससे शाक का रस बह निकला।
श्लोक 39 (9.39.39)
स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टः प्रनृत्तवान् ॥
sa vai śākarasaṃ dṛṣṭvā harṣāviṣṭaḥ pranṛttavān
उस शाक-रस को देखकर वे हर्ष से भर गए और नाचने लगे।
श्लोक 40 (9.39.40)
ततस्तस्मिन्प्रनृत्ते वै स्थावरं जङ्गमं च यत् । प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ॥
tatastasminpranṛtte vai sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca yat | pranṛttamubhayaṃ vīra tejasā tasya mohitam
तब उनके नाचने पर जो कुछ स्थावर और जङ्गम था, वह सब, हे वीर! उनके तेज से मोहित होकर नाचने लगा।
श्लोक 41 (9.39.41)
ब्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः । विज्ञप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप । नायं नृत्येद्यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ॥
brahmādibhiḥ surai rājannṛṣibhiśca tapodhanaiḥ | vijñapto vai mahādeva ṛṣerarthe narādhipa | nāyaṃ nṛtyedyathā deva tathā tvaṃ kartumarhasi
हे राजन्! ब्रह्मा आदि देवताओं और तपस्वी ऋषियों ने ऋषि के लिए महादेव से प्रार्थना की — "हे देव! आप ऐसा कीजिए कि यह नाचे नहीं।"
श्लोक 42 (9.39.42)
ततो देवो मुनिं दृष्ट्वा हर्षाविष्टमतीव ह । सुराणां हितकामार्थं महादेवोऽभ्यभाषत ॥
tato devo muniṃ dṛṣṭvā harṣāviṣṭamatīva ha | surāṇāṃ hitakāmārthaṃ mahādevo'bhyabhāṣata
तब देव महादेव ने मुनि को अत्यन्त हर्ष में डूबा देखकर, देवताओं का हित चाहते हुए, उनसे कहा।
महादेव उवाच
श्लोक 43 (9.39.43)
भोभो ब्राह्मण धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् । हर्षस्थानं किमर्थं च तवेदमधिकं मुने । तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ॥
bhobho brāhmaṇa dharmajña kimarthaṃ nṛtyate bhavān | harṣasthānaṃ kimarthaṃ ca tavedamadhikaṃ mune | tapasvino dharmapathe sthitasya dvijasattama
"अरे ब्राह्मण! तुम तो धर्म को जानने वाले हो, फिर क्यों नाच रहे हो? हे मुने! हे द्विजश्रेष्ठ! धर्म के मार्ग पर स्थित तपस्वी होते हुए तुम्हारे इस अत्यधिक हर्ष का कारण क्या है?"
मङ्कणक उवाच
श्लोक 44 (9.39.44)
किं न पश्यसि मे ब्रह्मन्कराच्छाकरसं स्रुतम् । यं दृष्ट्वा सम्प्रनृत्तो वै हर्षेण महता विभो ॥
kiṃ na paśyasi me brahmankarācchākarasaṃ srutam | yaṃ dṛṣṭvā sampranṛtto vai harṣeṇa mahatā vibho
"हे ब्राह्मण! क्या तुम नहीं देखते कि मेरे हाथ से शाक का रस बह निकला है? उसे देखकर मैं बड़े हर्ष से नाच उठा हूँ, हे विभो!"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 45 (9.39.45)
तं प्रहस्याब्रवीद्देवो मुनिं रागेण मोहितम् । अहं न विस्मयं विप्र गच्छामीति प्रपश्य माम् ॥
taṃ prahasyābravīddevo muniṃ rāgeṇa mohitam | ahaṃ na vismayaṃ vipra gacchāmīti prapaśya mām
देव ने हर्ष से मोहित उस मुनि की ओर हँसकर कहा — "हे विप्र! मुझे तो कोई विस्मय नहीं होता; मुझे देखो।"
श्लोक 46 (9.39.46)
एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठं महादेवेन धीमता । अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽभवत् ॥
evamuktvā muniśreṣṭhaṃ mahādevena dhīmatā | aṅgulyagreṇa rājendra svāṅguṣṭhastāḍito'bhavat
मुनिश्रेष्ठ से ऐसा कहकर बुद्धिमान् महादेव ने, हे राजेन्द्र! अपनी अँगुली के अग्रभाग से अपने अँगूठे पर चोट की।
श्लोक 47 (9.39.47)
ततो भस्म क्षताद्राजन्निर्गतं हिमसन्निभम् ॥
tato bhasma kṣatādrājannirgataṃ himasannibham
तब, हे राजन्! उस घाव से हिम के समान श्वेत भस्म निकली।
श्लोक 48 (9.39.48)
तद्दृष्ट्वा व्रीडितो राजन्स मुनिः पादयोर्गतः । मेने देवं महादेवमिदं चोवाच विस्मितः ॥
taddṛṣṭvā vrīḍito rājansa muniḥ pādayorgataḥ | mene devaṃ mahādevamidaṃ covāca vismitaḥ
यह देखकर, हे राजन्! वे मुनि लज्जित हो गए और उनके चरणों में गिर पड़े। उन्होंने देव को महादेव जान लिया और विस्मित होकर यह कहा —
मङ्कणक उवाच
श्लोक 49 (9.39.49)
नान्यं देवादहं मन्ये रुद्रात्परतरं महत् । सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक् ॥
nānyaṃ devādahaṃ manye rudrātparataraṃ mahat | surāsurasya jagato gatistvamasi śūladhṛk
"मैं रुद्र से बढ़कर किसी अन्य देव को नहीं मानता। हे शूलधारी! आप ही देवताओं और असुरों के जगत् की गति हैं।
श्लोक 50 (9.39.50)
त्वया सृष्टमिदं विश्वं वदन्तीह मनीषिणः । त्वामेव सर्वं विशति पुनरेव युगक्षये ॥
tvayā sṛṣṭamidaṃ viśvaṃ vadantīha manīṣiṇaḥ | tvāmeva sarvaṃ viśati punareva yugakṣaye
विद्वान् कहते हैं कि यह सारा विश्व आपके द्वारा रचा गया है; युग के अन्त में सब कुछ फिर आप में ही प्रवेश कर जाता है।
श्लोक 51 (9.39.51)
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया । त्वयि सर्वे स्म दृश्यन्ते भावा ये जगति स्थिताः ॥
devairapi na śakyastvaṃ parijñātuṃ kuto mayā | tvayi sarve sma dṛśyante bhāvā ye jagati sthitāḥ
देवता भी आपको पूरी तरह नहीं जान सकते, फिर मैं कैसे जान सकता हूँ? संसार में जो भी भाव स्थित हैं, वे सब आप में दिखाई देते हैं।
श्लोक 52 (9.39.52)
त्वामुपासन्त वरदं देवा ब्रह्मादयोऽनघ । सर्वस्त्वमसि देवानां कर्ता कारयिता च ह ॥
tvāmupāsanta varadaṃ devā brahmādayo'nagha | sarvastvamasi devānāṃ kartā kārayitā ca ha
हे निष्पाप! ब्रह्मा आदि देवता वरदायक आपकी उपासना करते हैं। आप ही सब देवताओं के कर्ता और कराने वाले हैं।
श्लोक 53 (9.39.53)
त्वत्प्रसादात्सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः । त्वं प्रभुः परमैश्वर्यादधिकं भासि शङ्करः ॥
tvatprasādātsurāḥ sarve modantīhākutobhayāḥ | tvaṃ prabhuḥ paramaiśvaryādadhikaṃ bhāsi śaṅkaraḥ
आपकी कृपा से सब देवता यहाँ निर्भय होकर आनन्द करते हैं। आप प्रभु हैं; हे शङ्कर! आप परम ऐश्वर्य से भी अधिक प्रकाशित होते हैं।
श्लोक 54 (9.39.54)
त्वयि ब्रह्मा च विष्णुश्च लोकान्सन्धाय तिष्ठतः । त्वन्मूलं च जगत्सर्वं भूतस्थावरजङ्गमम् ॥
tvayi brahmā ca viṣṇuśca lokānsandhāya tiṣṭhataḥ | tvanmūlaṃ ca jagatsarvaṃ bhūtasthāvarajaṅgamam
आप में स्थित होकर ब्रह्मा और विष्णु लोकों को धारण करते हैं; यह सारा चर और अचर जगत् आप ही में जड़ पकड़े हुए है।
श्लोक 55 (9.39.55)
स्वर्गं च परमं स्थानं नृणामभ्युदयार्थिनाम् । ददासि च प्रसन्नस्त्वं भक्तानां परमेश्वर ॥
svargaṃ ca paramaṃ sthānaṃ nṛṇāmabhyudayārthinām | dadāsi ca prasannastvaṃ bhaktānāṃ parameśvara
अभ्युदय चाहने वाले मनुष्यों को आप स्वर्ग, परम स्थान, देते हैं; हे परमेश्वर! प्रसन्न होकर आप अपने भक्तों को यह देते हैं।
श्लोक 56 (9.39.56)
अनावृत्तिपदं नॄणां नित्यं निश्रेयसार्थिनाम् । ददासि कर्मिणां कर्म भावयन्ध्यानयोगतः ॥
anāvṛttipadaṃ nṝṇāṃ nityaṃ niśreyasārthinām | dadāsi karmiṇāṃ karma bhāvayandhyānayogataḥ
जो सदा परम कल्याण चाहते हैं उन्हें आप न लौटने वाला पद देते हैं, और कर्म करने वालों को ध्यानयोग से कर्म को फलित करते हुए उनका कर्म देते हैं।
श्लोक 57 (9.39.57)
न वृथाऽस्ति महादेव प्रसादस्ते महेश्वर । यस्मात्त्वयोपकरणात्करोमि कमलेक्षण ॥
na vṛthā'sti mahādeva prasādaste maheśvara | yasmāttvayopakaraṇātkaromi kamalekṣaṇa
हे महादेव! हे महेश्वर! आपकी कृपा कभी व्यर्थ नहीं होती, क्योंकि हे कमलनयन! आपकी सहायता से ही मैं कर्म करता हूँ।
श्लोक 58 (9.39.58)
प्रपद्ये शरणं शंभुं सर्वदा सर्वतः स्थितम् । कर्मणा मनसा वाचा तमेवाभिभजाम्यहम् ॥
prapadye śaraṇaṃ śaṃbhuṃ sarvadā sarvataḥ sthitam | karmaṇā manasā vācā tamevābhibhajāmyaham
मैं सर्वत्र और सदा विद्यमान शम्भु की शरण लेता हूँ; कर्म, मन और वाणी से मैं उन्हीं की उपासना करता हूँ।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 59 (9.39.59)
एवं स्तुत्वा महादेवं स ऋषिः प्रणतोऽभवत् ॥
evaṃ stutvā mahādevaṃ sa ṛṣiḥ praṇato'bhavat
इस प्रकार महादेव की स्तुति करके वह ऋषि प्रणाम करने लगा।
मङ्कणक उवाच
श्लोक 60 (9.39.60)
यदिदं चापलं देव कृतमेतत्स्मयादिकम् । ततः प्रसादयामि त्वां तपो मे न क्षरेदिति ॥
yadidaṃ cāpalaṃ deva kṛtametatsmayādikam | tataḥ prasādayāmi tvāṃ tapo me na kṣarediti
"हे देव! मैंने जो यह चपलता और अभिमान आदि किया है, उसके लिए मैं आपको प्रसन्न करता हूँ, जिससे मेरा तप क्षीण न हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 61 (9.39.61)
ततो देवः प्रीतमनास्तमृषिं पुनरब्रवीत् । तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात्सहस्रधा ॥
tato devaḥ prītamanāstamṛṣiṃ punarabravīt | tapaste vardhatāṃ vipra matprasādātsahasradhā
तब प्रसन्न मन वाले देव ने उस ऋषि से फिर कहा — "हे विप्र! मेरी कृपा से तुम्हारा तप हज़ार गुना बढ़े।
महादेव उवाच
श्लोक 62 (9.39.62)
आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सार्धमहं सदा । सप्तसारस्वते चास्मिन्यो मामर्चिष्यते नरः ॥
āśrame ceha vatsyāmi tvayā sārdhamahaṃ sadā | saptasārasvate cāsminyo māmarciṣyate naraḥ
मैं सदा तुम्हारे साथ इस आश्रम में रहूँगा; और जो मनुष्य यहाँ इस सप्तसारस्वत तीर्थ में मेरी पूजा करेगा,
श्लोक 63 (9.39.63)
न तस्य दुर्लभं किञ्चिद्धवितेह परत्र वा । सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः ॥
na tasya durlabhaṃ kiñciddhaviteha paratra vā | sārasvataṃ ca te lokaṃ gamiṣyanti na saṃśayaḥ
उसके लिए इस लोक या परलोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं होगा, और वे सारस्वत लोक को जाएँगे, इसमें सन्देह नहीं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 64 (9.39.64)
एतन्मङ्कणकस्यापि चरितं भूरितेजसः । स हि पुत्रः सुकन्यायामुत्पन्नो मातरिश्वना ॥
etanmaṅkaṇakasyāpi caritaṃ bhūritejasaḥ | sa hi putraḥ sukanyāyāmutpanno mātariśvanā
महातेजस्वी मङ्कणक का यही चरित है; वे सुकन्या से वायु (मातरिश्वा) द्वारा उत्पन्न पुत्र थे।