शल्य पर्व · अध्याय 42
दाल्भ्य बक द्वारा धृतराष्ट्र के राज्य की आहुति
यदुनन्दन बलराम उस तीर्थ में पहुँचते हैं जहाँ तपस्वी बक दाल्भ्य ने राजा धृतराष्ट्र से अपमानित होकर मरे हुए पशुओं के मांस से उसके राज्य की आहुति दी थी। राज्य क्षीण होने लगा तो राजा ने विद्वान् ब्राह्मणों की सलाह मानकर सरस्वती-तट पर बक से क्षमा माँगी और राज्य छूट गया। फिर बृहस्पति के यज्ञ, सरस्वती पर ययाति के यज्ञ के चमत्कारों और बलराम के वसिष्ठापवाह पहुँचने का वर्णन है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 1 (9.42.1)
ब्रह्मयोनिभिराकीर्णं जगाम यदुनन्दनः । यत्र दाल्भ्यो बको राजन्पश्वर्थं सुमहातपाः । जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं कोपसमन्वितः ॥
brahmayonibhirākīrṇaṃ jagāma yadunandanaḥ | yatra dālbhyo bako rājanpaśvarthaṃ sumahātapāḥ | juhāva dhṛtarāṣṭrasya rāṣṭraṃ kopasamanvitaḥ
यदुकुल को आनन्द देने वाले बलराम ब्राह्मणों से भरे उस स्थान पर गए, जहाँ महातपस्वी बक दाल्भ्य ने, हे राजन्, पशुओं के कारण क्रोध से भरकर धृतराष्ट्र के राज्य की आहुति दी थी।
श्लोक 2 (9.42.2)
तपसा घोररूपेण कर्शयन्देहमात्मनः । क्रोधेन महताऽऽविष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् ॥
tapasā ghorarūpeṇa karśayandehamātmanaḥ | krodhena mahatā''viṣṭo dharmātmā vai pratāpavān
भयंकर तप से अपने शरीर को सुखाते हुए और बड़े क्रोध से भरे हुए उस धर्मात्मा, प्रतापी ऋषि ने ऐसा किया।
श्लोक 3 (9.42.3)
पुरा हि नैमिशीयानां सत्रे द्वादशवार्षिके । वृत्ते विश्वजितोऽन्ते वै पाञ्चालानृषयोऽगमन् ॥
purā hi naimiśīyānāṃ satre dvādaśavārṣike | vṛtte viśvajito'nte vai pāñcālānṛṣayo'gaman
पहले की बात है, नैमिषारण्य के ऋषियों के बारह वर्ष के सत्र में विश्वजित् यज्ञ पूरा हो जाने पर ऋषि पाञ्चालों के पास गए।
श्लोक 4 (9.42.4)
तत्रेश्वरमयाचन्त दक्षिणार्थं मनस्विनः । तत्र ते लेभिरे राजन्पाञ्चालेभ्यो महर्षयः । बलान्वितान्वत्सतरान्निर्व्याधीन्सप्तविंशतिम् ॥
tatreśvaramayācanta dakṣiṇārthaṃ manasvinaḥ | tatra te lebhire rājanpāñcālebhyo maharṣayaḥ | balānvitānvatsatarānnirvyādhīnsaptaviṃśatim
वहाँ उन मनस्वी ऋषियों ने दक्षिणा के लिए राजा से याचना की। हे राजन्, वहाँ उन महर्षियों ने पाञ्चालों से सत्ताईस बलवान् और नीरोग बछड़े पाए।
श्लोक 5 (9.42.5)
तानब्रवीद्बको दाल्भ्यो विभजध्वं पशूनिति । पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम् ॥
tānabravīdbako dālbhyo vibhajadhvaṃ paśūniti | paśūnetānahaṃ tyaktvā bhikṣiṣye rājasattamam
बक दाल्भ्य ने उनसे कहा, "इन पशुओं को आप आपस में बाँट लें। मैं इन पशुओं को छोड़कर राजाओं में श्रेष्ठ राजा से भिक्षा माँगूँगा।"
श्लोक 6 (9.42.6)
एवमुक्त्वा वको राजन्नृषीन्सर्वान्प्रतापवान् । जगाम धृतराष्ट्रस्य भवनं ब्राह्मणोत्तमः ॥
evamuktvā vako rājannṛṣīnsarvānpratāpavān | jagāma dhṛtarāṣṭrasya bhavanaṃ brāhmaṇottamaḥ
हे राजन्, सब ऋषियों से ऐसा कहकर वह प्रतापी श्रेष्ठ ब्राह्मण धृतराष्ट्र के भवन को गया।
श्लोक 7 (9.42.7)
स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् । अयाचत पशून्दाल्भ्यः स चैनं रुषितोऽब्रवीत् ॥
sa samīpagato bhūtvā dhṛtarāṣṭraṃ janeśvaram | ayācata paśūndālbhyaḥ sa cainaṃ ruṣito'bravīt
जनों के स्वामी धृतराष्ट्र के पास जाकर दाल्भ्य ने उनसे पशु माँगे; तब राजा ने क्रुद्ध होकर उनसे कहा —
श्लोक 8 (9.42.8)
यदृच्छया मृता दृष्ट्वा गास्तदा नृपसत्तमः । एतान्पशून्नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदीच्छसि ॥
yadṛcchayā mṛtā dṛṣṭvā gāstadā nṛpasattamaḥ | etānpaśūnnaya kṣipraṃ brahmabandho yadīcchasi
अपने आप मरी हुई गायों को देखकर तब श्रेष्ठ राजा ने कहा, "हे नाममात्र के ब्राह्मण, यदि तुम चाहते हो तो इन पशुओं को जल्दी ले जाओ।"
श्लोक 9 (9.42.9)
ऋषिस्त्वथ बकः क्रुद्धश्चिन्तयामास धर्मवित् । अहो वत नृशंसं वै वाक्यमुक्तोऽस्मि संसदि ॥
ṛṣistvatha bakaḥ kruddhaścintayāmāsa dharmavit | aho vata nṛśaṃsaṃ vai vākyamukto'smi saṃsadi
यह वचन सुनकर धर्म को जानने वाले ऋषि बक क्रुद्ध हुए और सोचने लगे, "हाय! भरी सभा में मुझसे कैसी निष्ठुर बात कही गई!"
श्लोक 10 (9.42.10)
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन रोषाविष्टो द्विजोत्तमः । मतिं चक्रे विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपतेः ॥
cintayitvā muhūrtena roṣāviṣṭo dvijottamaḥ | matiṃ cakre vināśāya dhṛtarāṣṭrasya bhūpateḥ
क्षण भर सोचकर क्रोध में भरे हुए उस द्विजश्रेष्ठ ने राजा धृतराष्ट्र के विनाश का निश्चय कर लिया।
श्लोक 11 (9.42.11)
स तूत्कृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तमः । जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्रं नरपतेः पुरा ॥
sa tūtkṛtya mṛtānāṃ vai māṃsāni munisattamaḥ | juhāva dhṛtarāṣṭrasya rāṣṭraṃ narapateḥ purā
तब उस मुनिश्रेष्ठ ने मरे हुए पशुओं का मांस काटकर राजा धृतराष्ट्र के राज्य की आहुति दी।
श्लोक 12 (9.42.12)
अवकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वाल्य पावकम् । बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थितः ॥
avakīrṇe sarasvatyāstīrthe prajvālya pāvakam | bako dālbhyo mahārāja niyamaṃ paramaṃ sthitaḥ
सरस्वती के अवकीर्ण तीर्थ में अग्नि जलाकर बक दाल्भ्य ने, हे महाराज, कठोर नियम का आश्रय लिया हुआ था —
श्लोक 13 (9.42.13)
स तैरेव जुहावाग्नौ राष्ट्रं मांसैर्महातपाः ॥
sa taireva juhāvāgnau rāṣṭraṃ māṃsairmahātapāḥ
उन्हीं मांस-खण्डों से उस महातपस्वी ने राज्य की अग्नि में आहुति दी।
श्लोक 14 (9.42.14)
तस्मिंस्तु विधिवत्सत्रे सम्प्रवृत्ते सुदारुणे । अक्षीयत ततो राष्ट्रं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥
tasmiṃstu vidhivatsatre sampravṛtte sudāruṇe | akṣīyata tato rāṣṭraṃ dhṛtarāṣṭrasya pārthiva
उस अत्यन्त भयंकर यज्ञ के विधिपूर्वक चलते रहने पर, हे राजन्, धृतराष्ट्र का राज्य क्षीण होने लगा।
श्लोक 15 (9.42.15)
छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो । बभूवापहतं तच्चाप्यवकीर्णमचेतनम् ॥
chidyamānaṃ yathānantaṃ vanaṃ paraśunā vibho | babhūvāpahataṃ taccāpyavakīrṇamacetanam
जैसे कुल्हाड़ी से कटता हुआ अनन्त वन हो, हे प्रभो, वैसे ही वह राज्य नष्ट होकर बिखर गया और चेतनाहीन हो गया।
श्लोक 16 (9.42.16)
दृष्ट्वा तथाऽवकीर्णं तु राष्ट्रं च मनुजाधिपः । बभूव दुर्मना राजा चिन्तयामास च प्रभुः ॥
dṛṣṭvā tathā'vakīrṇaṃ tu rāṣṭraṃ ca manujādhipaḥ | babhūva durmanā rājā cintayāmāsa ca prabhuḥ
अपने राज्य को इस प्रकार नष्ट होते देखकर वह नरेश उदास हो गया और वह राजा चिन्ता में पड़ गया।
श्लोक 17 (9.42.17)
मोक्षार्थमकरोद्यत्नं ब्राह्मणैः सहितः पुरा । न च श्रेयोऽध्यगच्छत्तु क्षीयते राष्ट्रमेव च ॥
mokṣārthamakarodyatnaṃ brāhmaṇaiḥ sahitaḥ purā | na ca śreyo'dhyagacchattu kṣīyate rāṣṭrameva ca
पहले उसने ब्राह्मणों के साथ मिलकर राज्य को छुड़ाने का प्रयत्न किया था, पर उसे कोई भला उपाय नहीं मिला और राज्य क्षीण होता ही गया।
श्लोक 18 (9.42.18)
यदा स पार्थिवः खिन्नस्ते च विप्रास्तदाऽनघ ॥
yadā sa pārthivaḥ khinnaste ca viprāstadā'nagha
जब वह राजा थक गया और वे ब्राह्मण भी, हे निष्पाप —
श्लोक 19 (9.42.19)
यदा चापि न शक्नोति राष्ट्रं मोक्षयितुं नृपः । अथ विप्रादिकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय ॥
yadā cāpi na śaknoti rāṣṭraṃ mokṣayituṃ nṛpaḥ | atha viprādikāṃstatra papraccha janamejaya
और जब राजा राज्य को छुड़ा न सका, तब, हे जनमेजय, उसने वहाँ ब्राह्मणों तथा अन्य जानकारों से पूछा।
श्लोक 20 (9.42.20)
ततो विप्रादिकाः प्राहुः पशुविप्रकृतस्त्वया । मांसैरभिजुहोतीदं तव राष्ट्रं मुनिर्बकः ॥
tato viprādikāḥ prāhuḥ paśuviprakṛtastvayā | māṃsairabhijuhotīdaṃ tava rāṣṭraṃ munirbakaḥ
तब ब्राह्मण आदि ने कहा, "तुमने पशुओं के विषय में एक ब्राह्मण का अपमान किया; इसी कारण मुनि बक मांस से तुम्हारे राज्य की आहुति दे रहे हैं।"
विप्रादिका ऊचुः
श्लोक 21 (9.42.21)
तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यास्य क्षयो महान् । तस्यैतत्तपसः कर्म येन तेऽद्य लयो महान् ॥
tena te hūyamānasya rāṣṭrasyāsya kṣayo mahān | tasyaitattapasaḥ karma yena te'dya layo mahān
"उनकी आहुति के कारण तुम्हारे इस राज्य का भारी क्षय हो रहा है। यह उनके तप का ही फल है, जिससे आज तुम पर यह भारी विनाश आया है।"
श्लोक 22 (9.42.22)
यदीच्छसि महाबाहो शान्तिं राष्ट्रस्य भूमिप । अपां कुञ्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय पार्थिव ॥
yadīcchasi mahābāho śāntiṃ rāṣṭrasya bhūmipa | apāṃ kuñje sarasvatyāstaṃ prasādaya pārthiva
"हे महाबाहो, हे भूपति, यदि तुम अपने राज्य की शान्ति चाहते हो तो सरस्वती के जल-कुण्ड में जाकर उन्हें प्रसन्न करो, हे राजन्।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (9.42.23)
सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा बकमब्रवीत् । निपत्य शिरसा भूमौ प्राञ्जलिर्भरतर्षभ ॥
sarasvatīṃ tato gatvā sa rājā bakamabravīt | nipatya śirasā bhūmau prāñjalirbharatarṣabha
तब वह राजा सरस्वती के तट पर जाकर, हे भरतश्रेष्ठ, भूमि पर सिर टेककर और हाथ जोड़कर बक से बोला —
धृतराष्ट्र उवाच
श्लोक 24 (9.42.24)
प्रसादये त्वां भगवन्नपराधं क्षमस्व मे । मम दीनस्य लुब्धस्य मौर्ख्येण हतचेतसः । त्वं गतिस्त्वं च मे नाथः प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥
prasādaye tvāṃ bhagavannaparādhaṃ kṣamasva me | mama dīnasya lubdhasya maurkhyeṇa hatacetasaḥ | tvaṃ gatistvaṃ ca me nāthaḥ prasādaṃ kartumarhasi
"भगवन्, मैं आपको मनाता हूँ; मेरा अपराध क्षमा कीजिए। मैं दीन और लोभी हूँ, मूर्खता से मेरी बुद्धि मारी गई थी। आप ही मेरी गति हैं, आप ही मेरे स्वामी हैं; आप मुझ पर कृपा करने योग्य हैं।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (9.42.25)
तं तथा विलपन्तं तु शोकोपहतचेतसम् । दृष्ट्वा तस्य कृपा जज्ञे राष्ट्रं तस्य व्यमोचयत् ॥
taṃ tathā vilapantaṃ tu śokopahatacetasam | dṛṣṭvā tasya kṛpā jajñe rāṣṭraṃ tasya vyamocayat
उसे इस प्रकार विलाप करते और शोक से व्याकुल देखकर ऋषि के मन में दया उमड़ी और उन्होंने राज्य को छोड़ दिया।
श्लोक 26 (9.42.26)
ऋषिः प्रसन्नस्तस्याभूत्संरम्भं च विहाय सः । मोक्षार्थं तस्य राज्यस्य जुहाव पुनराहुतिम् ॥
ṛṣiḥ prasannastasyābhūtsaṃrambhaṃ ca vihāya saḥ | mokṣārthaṃ tasya rājyasya juhāva punarāhutim
ऋषि उस पर प्रसन्न हो गए और क्रोध त्यागकर उस राज्य को मुक्त करने के लिए उन्होंने फिर आहुति दी।
श्लोक 27 (9.42.27)
मोक्षयित्वा ततो राष्ट्रं प्रतिगृह्य पशून्बहून् । हृष्टात्मा नैमिशारण्यं जगाम पुनरेव सः ॥
mokṣayitvā tato rāṣṭraṃ pratigṛhya paśūnbahūn | hṛṣṭātmā naimiśāraṇyaṃ jagāma punareva saḥ
राज्य को मुक्त करके और बहुत-से पशु लेकर वे प्रसन्न मन से फिर नैमिषारण्य को चले गए।
श्लोक 28 (9.42.28)
धृतराष्ट्रोऽपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामनाः । स्वमेव नगरं राजन्प्रतिपेदे महर्द्धिमत् ॥
dhṛtarāṣṭro'pi dharmātmā svasthacetā mahāmanāḥ | svameva nagaraṃ rājanpratipede maharddhimat
और धर्मात्मा, स्वस्थचित्त तथा उदार मन वाले राजा धृतराष्ट्र, हे राजन्, अपने उसी नगर को लौट गए, जो अब बड़ी समृद्धि से भरा था।
श्लोक 29 (9.42.29)
तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधीः । असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम् ॥
tatra tīrthe mahārāja bṛhaspatirudāradhīḥ | asurāṇāmabhāvāya bhavāya ca divaukasām
हे महाराज, उसी तीर्थ में उदार बुद्धि वाले बृहस्पति ने असुरों के विनाश और देवताओं के कल्याण के लिए —
श्लोक 30 (9.42.30)
मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततोऽसुराः । दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे ॥
māṃsairabhijuhāveṣṭimakṣīyanta tato'surāḥ | daivatairapi sambhagnā jitakāśibhirāhave
मांस से भी यज्ञ किया; इससे असुर क्षीण होने लगे और विजय से दीप्त देवताओं ने युद्ध में उन्हें तोड़ डाला।
श्लोक 31 (9.42.31)
तत्रापि विधिवद्दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः । वाजिनः कुञ्जरांश्चैव रथांश्चाश्वतरीयुतान् ॥
tatrāpi vidhivaddattvā brāhmaṇebhyo mahāyaśāḥ | vājinaḥ kuñjarāṃścaiva rathāṃścāśvatarīyutān
वहाँ भी उन महायशस्वी ने ब्राह्मणों को विधिपूर्वक घोड़े, हाथी और खच्चरों से जुते रथ दिए,
श्लोक 32 (9.42.32)
रत्नानि च महार्हाणि धनं धान्यं च पुष्कलम् । ययौ तीर्थं महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते ॥
ratnāni ca mahārhāṇi dhanaṃ dhānyaṃ ca puṣkalam | yayau tīrthaṃ mahābāhuryāyātaṃ pṛthivīpate
बहुमूल्य रत्न तथा बहुत-सा धन और अनाज भी दिया; फिर, हे पृथ्वीपते, वे महाबाहु ययाति के तीर्थ को गए।
श्लोक 33 (9.42.33)
तत्र यज्ञे ययातेश्च महाराज सरस्वती । सर्पिः पयश्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मनः ॥
tatra yajñe yayāteśca mahārāja sarasvatī | sarpiḥ payaśca susrāva nāhuṣasya mahātmanaḥ
हे महाराज, नहुषपुत्र महात्मा ययाति के यज्ञ में वहाँ सरस्वती घी और दूध बहाने लगी।
श्लोक 34 (9.42.34)
तत्रेष्ट्वा पुरुषव्याघ्रो ययातिः पृथिवीपतिः । आक्रामदूर्ध्वं मुदितो लेभे लोकांश्च पुष्कलान् ॥
tatreṣṭvā puruṣavyāghro yayātiḥ pṛthivīpatiḥ | ākrāmadūrdhvaṃ mudito lebhe lokāṃśca puṣkalān
वहाँ यज्ञ करके पुरुषश्रेष्ठ राजा ययाति प्रसन्न होकर ऊपर के लोकों को चढ़े और बहुत-से लोक पाए।
श्लोक 35 (9.42.35)
पुनस्तत्र च राज्ञस्तु ययातेर्यजतः प्रभोः । औदार्यं परमं कृत्वा भक्तिं चात्मनि शाश्वतीम् । ददौ कामान्ब्राह्मणेभ्यो यान्यान्यो मनसेच्छति ॥
punastatra ca rājñastu yayāteryajataḥ prabhoḥ | audāryaṃ paramaṃ kṛtvā bhaktiṃ cātmani śāśvatīm | dadau kāmānbrāhmaṇebhyo yānyānyo manasecchati
और वहाँ फिर यज्ञ करते हुए प्रभु ययाति ने परम उदारता और अपने भीतर स्थिर भक्ति दिखाते हुए, ब्राह्मणों को वह सब दिया जो-जो वे मन में चाहते थे।
श्लोक 36 (9.42.36)
यो यत्र स्थित एवेह आहूतो यज्ञसंस्तरे । तस्यतस्य सरिच्छ्रेष्ठा गृहादि शयनादिकम् । षड्रसं भोजनं चैव दानं नानाविधं तथा ॥
yo yatra sthita eveha āhūto yajñasaṃstare | tasyatasya saricchreṣṭhā gṛhādi śayanādikam | ṣaḍrasaṃ bhojanaṃ caiva dānaṃ nānāvidhaṃ tathā
यज्ञ-स्थल में बुलाया हुआ जो भी जहाँ खड़ा होता, उस-उसके लिए श्रेष्ठ नदी घर, शय्या आदि, छह रसों वाला भोजन और अनेक प्रकार के दान प्रस्तुत कर देती।
श्लोक 37 (9.42.37)
ते मन्यमाना राज्ञस्तु सम्प्रदानमनुत्तमम् । राजानं तुष्टुवुः प्रीता दत्त्वा चैवाशिषः शुभाः ॥
te manyamānā rājñastu sampradānamanuttamam | rājānaṃ tuṣṭuvuḥ prītā dattvā caivāśiṣaḥ śubhāḥ
राजा के इस दान को सर्वोत्तम मानकर वे प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा की स्तुति की तथा उसे शुभ आशीर्वाद दिए।
श्लोक 38 (9.42.38)
तत्र देवाः सगन्धर्वाः प्रीता यज्ञस्य सम्पदा । विस्मिता मानुषाश्चासन्दृष्ट्वा तां यज्ञसम्पदम् ॥
tatra devāḥ sagandharvāḥ prītā yajñasya sampadā | vismitā mānuṣāścāsandṛṣṭvā tāṃ yajñasampadam
वहाँ गन्धर्वों सहित देवता यज्ञ की सम्पदा से प्रसन्न हुए और उस यज्ञ-वैभव को देखकर मनुष्य चकित रह गए।
श्लोक 39 (9.42.39)
ततस्तालकेतुर्महाधर्मकेतुर् । महात्मा कृतात्मा महादाननित्यः । वसिष्ठापवाहं महाभीमवेगं । धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम ॥
tatastālaketurmahādharmaketur | mahātmā kṛtātmā mahādānanityaḥ | vasiṣṭhāpavāhaṃ mahābhīmavegaṃ | dhṛtātmā jitātmā samabhyājagāma
तब तालध्वज बलराम — महान् धर्म की ध्वजा, महात्मा, कृतात्मा, सदा महादान देने वाले, धैर्यवान् और जितेन्द्रिय — अत्यन्त भयंकर वेग वाले वसिष्ठापवाह तीर्थ में आए।