शल्य पर्व · अध्याय 43
सरस्वती द्वारा वसिष्ठ को विश्वामित्र से दूर बहा ले जाना
जनमेजय पूछते हैं कि वसिष्ठापवाह तीर्थ का यह नाम कैसे पड़ा; वैशम्पायन विश्वामित्र और वसिष्ठ की तपस्या की होड़ से उपजे वैर की कथा कहते हैं। विश्वामित्र सरस्वती को बुलाकर आदेश देते हैं कि वसिष्ठ को उनके पास ले आए, ताकि वे उन्हें मार सकें। दो शापों के बीच फँसी सरस्वती, वसिष्ठ के कहने पर, अपना किनारा बहाकर उन्हें विश्वामित्र के पास लाती है, पर ब्रह्महत्या के भय से उन्हें पूर्व दिशा की ओर बहा ले जाती है। क्रुद्ध विश्वामित्र उसे एक वर्ष तक रक्त बहाने का शाप देते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (9.43.1)
वसिष्ठापवाहो ब्रह्मन्वै भीमवेगः कथं नु सः । किमर्थं च सरिच्छ्रेष्ठा तमृषिं प्रत्यवाहयत् ॥
vasiṣṭhāpavāho brahmanvai bhīmavegaḥ kathaṃ nu saḥ | kimarthaṃ ca saricchreṣṭhā tamṛṣiṃ pratyavāhayat
जनमेजय ने कहा, "हे ब्रह्मन्, वसिष्ठापवाह का वह भयंकर वेग कैसे हुआ? और श्रेष्ठ नदी ने उस ऋषि को क्यों बहा दिया?"
श्लोक 2 (9.43.2)
कथमस्याभवद्वैरं कारणं किं च तत्प्रभो । शंस पृष्टो महाप्राज्ञ न हि तृप्यामि कथ्यताम् ॥
kathamasyābhavadvairaṃ kāraṇaṃ kiṃ ca tatprabho | śaṃsa pṛṣṭo mahāprājña na hi tṛpyāmi kathyatām
"उनके बीच वैर कैसे हुआ और उसका कारण क्या था, प्रभो? हे महाप्राज्ञ, मैं पूछ रहा हूँ, बताइए; मैं तृप्त नहीं होता। कृपया कहिए।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (9.43.3)
विश्वामित्रस्य विप्रर्षेर्वसिष्ठस्य च भारत । भृशं वैरमभूद्राजंस्तपःस्पर्धाकृतं महत् ॥
viśvāmitrasya viprarṣervasiṣṭhasya ca bhārata | bhṛśaṃ vairamabhūdrājaṃstapaḥspardhākṛtaṃ mahat
वैशम्पायन ने कहा, हे भारत, हे राजन्, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र और वसिष्ठ के बीच तप की होड़ से भारी वैर हो गया था।
श्लोक 4 (9.43.4)
आश्रमो वै वसिष्ठस्य स्थाणुतीर्थेऽभवन्महान् । पूर्वतः पार्श्वतश्चासीद्विश्वामित्रस्य धीमतः ॥
āśramo vai vasiṣṭhasya sthāṇutīrthe'bhavanmahān | pūrvataḥ pārśvataścāsīdviśvāmitrasya dhīmataḥ
स्थाणुतीर्थ में वसिष्ठ का एक विशाल आश्रम था; उसके पूर्व और पार्श्व में बुद्धिमान् विश्वामित्र का आश्रम था।
श्लोक 5 (9.43.5)
यत्र स्थाणुर्महाराज तप्तवान्परमं तपः । तत्रास्य कर्म तद्धोरं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥
yatra sthāṇurmahārāja taptavānparamaṃ tapaḥ | tatrāsya karma taddhoraṃ pravadanti manīṣiṇaḥ
हे महाराज, वहीं स्थाणु ने परम तप किया था, और विद्वान् लोग वहीं उनके उस घोर कर्म का वर्णन करते हैं।
श्लोक 6 (9.43.6)
यत्रेष्ट्वा भगवान्स्थाणुः पूजयित्वा सरस्वतीम् । स्थापयामास तत्तीर्थं स्थाणुतीर्थमिति प्रभो ॥
yatreṣṭvā bhagavānsthāṇuḥ pūjayitvā sarasvatīm | sthāpayāmāsa tattīrthaṃ sthāṇutīrthamiti prabho
वहीं भगवान् स्थाणु ने यज्ञ करके और सरस्वती का पूजन करके उस तीर्थ की स्थापना की; इसी से, हे प्रभो, उसे स्थाणुतीर्थ कहते हैं।
श्लोक 7 (9.43.7)
तत्र तीर्थे सुराः स्कन्दमभ्यषिञ्चन्नराधिप । सैनापत्येन महता सुरारिविनिबर्हणम् ॥
tatra tīrthe surāḥ skandamabhyaṣiñcannarādhipa | saināpatyena mahatā surārivinibarhaṇam
हे नरेश्वर, उसी तीर्थ में देवताओं ने देवशत्रुओं का संहार करने के लिए स्कन्द का महान् सेनापति-पद पर अभिषेक किया।
श्लोक 8 (9.43.8)
तस्मिन्सारस्वते तीर्थे विश्वामित्रो महामुनिः । वसिष्ठं चालयामास तपसोग्रेण तच्छृणु ॥
tasminsārasvate tīrthe viśvāmitro mahāmuniḥ | vasiṣṭhaṃ cālayāmāsa tapasogreṇa tacchṛṇu
उसी सारस्वत तीर्थ में महामुनि विश्वामित्र ने उग्र तप से वसिष्ठ को डिगाने का प्रयत्न किया; उसे सुनिए।
श्लोक 9 (9.43.9)
विश्वामित्रवसिष्ठौ तावहन्यहनि भारत । स्पर्धां तपः कृतां तीव्रां चक्रतुस्तौ तपोधनौ ॥
viśvāmitravasiṣṭhau tāvahanyahani bhārata | spardhāṃ tapaḥ kṛtāṃ tīvrāṃ cakratustau tapodhanau
हे भारत, वे दोनों तपोधन विश्वामित्र और वसिष्ठ प्रतिदिन तप की तीव्र होड़ करते रहे।
श्लोक 10 (9.43.10)
तत्राप्यधिकसन्तप्तो विश्वामित्रो महामुनिः । दृष्ट्वा तेजो वसिष्ठस्य चिन्तामभिजगाम ह ॥
tatrāpyadhikasantapto viśvāmitro mahāmuniḥ | dṛṣṭvā tejo vasiṣṭhasya cintāmabhijagāma ha
वहाँ भी महामुनि विश्वामित्र और अधिक सन्ताप से जलने लगे और वसिष्ठ का तेज देखकर चिन्ता में डूब गए।
श्लोक 11 (9.43.11)
तस्य बुद्धिरियं ह्यासीद्धर्मनित्यस्य भारत । इदं सरस्वती तूर्णं मत्समीपं तपोधनम् ॥
tasya buddhiriyaṃ hyāsīddharmanityasya bhārata | idaṃ sarasvatī tūrṇaṃ matsamīpaṃ tapodhanam
हे भारत, धर्म में सदा निष्ठा रखने वाले उन्हें यह विचार सूझा, "यह सरस्वती तेजी से उस तपस्वी को मेरे पास ले आएगी,
श्लोक 12 (9.43.12)
आनयिष्यति वेगेन वसिष्ठं जपतां वरम् । इहागतं द्विजश्रेष्ठं हनिष्यामि न संशयः ॥
ānayiṣyati vegena vasiṣṭhaṃ japatāṃ varam | ihāgataṃ dvijaśreṣṭhaṃ haniṣyāmi na saṃśayaḥ
"जप करने वालों में श्रेष्ठ वसिष्ठ को अपने वेग से यहाँ ले आएगी; और जब वह द्विजश्रेष्ठ यहाँ आ जाएगा तब मैं उसे मार डालूँगा, इसमें संशय नहीं।"
श्लोक 13 (9.43.13)
एवं निश्चित्य भगवान्विश्वामित्रो महामुनिः । सस्मार सरितां श्रेष्ठां क्रोधसंरक्तलोचनः ॥
evaṃ niścitya bhagavānviśvāmitro mahāmuniḥ | sasmāra saritāṃ śreṣṭhāṃ krodhasaṃraktalocanaḥ
ऐसा निश्चय करके भगवान् महामुनि विश्वामित्र ने क्रोध से लाल आँखें किए हुए उस श्रेष्ठ नदी का स्मरण किया।
श्लोक 14 (9.43.14)
सा ध्याता मुनिना तेन व्याकुलत्वं जगाम ह । गत्वा चैनं महावीर्यं महाकोपं च भामिनी ॥
sā dhyātā muninā tena vyākulatvaṃ jagāma ha | gatvā cainaṃ mahāvīryaṃ mahākopaṃ ca bhāminī
उन मुनि के स्मरण करने पर वह घबरा उठी; और वह सुन्दरी उन महापराक्रमी, महाक्रोधी मुनि के पास जाकर —
श्लोक 15 (9.43.15)
तदा तं वेपमानाङ्गी विवर्णा प्राञ्जलिर्भृशम् । उपतस्थे मुनिवरं विश्वामित्रं सरस्वती ॥
tadā taṃ vepamānāṅgī vivarṇā prāñjalirbhṛśam | upatasthe munivaraṃ viśvāmitraṃ sarasvatī
तब काँपते अंगों वाली, पीली पड़ी हुई सरस्वती हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र के सामने खड़ी हुई।
श्लोक 16 (9.43.16)
हतवीरा यथा नारी साऽभवद्दुःखिता भृशम् । ब्रूहि किं करवाणीति प्रोवाच मुनिसत्तमम् ॥
hatavīrā yathā nārī sā'bhavadduḥkhitā bhṛśam | brūhi kiṃ karavāṇīti provāca munisattamam
वह वीर-पति को खो चुकी स्त्री के समान अत्यन्त दुःखी थी; उसने मुनिश्रेष्ठ से कहा, "कहिए, मैं क्या करूँ?"
श्लोक 17 (9.43.17)
तामुवाच मुनिः क्रुद्धो वसिष्ठं शीघ्रमानय । यावदेनं निहन्म्यद्य तच्छ्रुत्वा व्यथिता नदी ॥
tāmuvāca muniḥ kruddho vasiṣṭhaṃ śīghramānaya | yāvadenaṃ nihanmyadya tacchrutvā vyathitā nadī
क्रुद्ध मुनि ने उससे कहा, "वसिष्ठ को शीघ्र यहाँ ले आ, जिससे मैं आज उसे मार डालूँ।" यह सुनकर नदी व्यथित हो उठी।
श्लोक 18 (9.43.18)
साञ्जलिं तु ततः कृत्वा पुण्डरीकनिभेक्षणा । प्राकम्पत भृशं भीता वायुनेवाहता लता ॥
sāñjaliṃ tu tataḥ kṛtvā puṇḍarīkanibhekṣaṇā | prākampata bhṛśaṃ bhītā vāyunevāhatā latā
तब हाथ जोड़े हुए कमल-नयनी वह नदी भय से हवा की मारी लता के समान बहुत काँपने लगी।
श्लोक 19 (9.43.19)
तथारूपां तु तां दृष्ट्वा मुनिराह महानदीम् । अविचारं वसिष्ठं त्वमानयस्वान्तिकं मम ॥
tathārūpāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā munirāha mahānadīm | avicāraṃ vasiṣṭhaṃ tvamānayasvāntikaṃ mama
उसे ऐसी दशा में देखकर मुनि ने उस महानदी से कहा, "बिना सोचे-विचारे वसिष्ठ को मेरे पास ले आ।"
श्लोक 20 (9.43.20)
सा तस्य वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा पापं चिकीर्षितम् । वसिष्ठस्य प्रभावं च जानन्त्यप्रतिमं भुवि ॥
sā tasya vacanaṃ śrutvā jñātvā pāpaṃ cikīrṣitam | vasiṣṭhasya prabhāvaṃ ca jānantyapratimaṃ bhuvi
उनकी बात सुनकर, उनके पापपूर्ण इरादे को जानकर और पृथ्वी पर वसिष्ठ के अनुपम प्रभाव को भी जानकर,
श्लोक 21 (9.43.21)
साऽभिगम्य वसिष्ठं च इदमर्थमचोदयत् । यदुक्ता सरितांश्रेष्ठा विश्वामित्रेण धीमता ॥
sā'bhigamya vasiṣṭhaṃ ca idamarthamacodayat | yaduktā saritāṃśreṣṭhā viśvāmitreṇa dhīmatā
वह वसिष्ठ के पास गई और बुद्धिमान् विश्वामित्र ने उस श्रेष्ठ नदी से जो कहा था, वह उन्हें बताया।
श्लोक 22 (9.43.22)
उभयोः शापयोर्भीता वेपमाना पुनःपुनः । चिन्तयित्वा महाशापमृषिवित्रासिता भृशम् ॥
ubhayoḥ śāpayorbhītā vepamānā punaḥpunaḥ | cintayitvā mahāśāpamṛṣivitrāsitā bhṛśam
दोनों शापों से डरी हुई, बार-बार काँपती हुई और उस महान् शाप का विचार करती हुई वह ऋषियों से बहुत भयभीत थी।
श्लोक 23 (9.43.23)
तां कृशां च विवर्णां च दृष्ट्वा चिन्तासमन्विताम् । उवाच राजन्धर्मात्मा वसिष्ठो द्विपदां वरः ॥
tāṃ kṛśāṃ ca vivarṇāṃ ca dṛṣṭvā cintāsamanvitām | uvāca rājandharmātmā vasiṣṭho dvipadāṃ varaḥ
उसे दुबली, पीली और चिन्ता में डूबी देखकर मनुष्यों में श्रेष्ठ धर्मात्मा वसिष्ठ ने, हे राजन्, उससे कहा —
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 24 (9.43.24)
पाह्यात्मानं सरिच्छ्रेष्ठे वह मां शीघ्रगामिनी । विश्वामित्रः शपेद्धि त्वां मा कृथास्त्वं विचारणाम् ॥
pāhyātmānaṃ saricchreṣṭhe vaha māṃ śīghragāminī | viśvāmitraḥ śapeddhi tvāṃ mā kṛthāstvaṃ vicāraṇām
"हे श्रेष्ठ नदी, अपनी रक्षा कर; हे तीव्र गति वाली, मुझे बहा ले चल; नहीं तो विश्वामित्र तुझे शाप दे देंगे। देर मत कर।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 25 (9.43.25)
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृपाशीलस्य सा सरित् । चिन्तयामास कौरव्य किं कृत्वा सुकृतं भवेत् ॥
tasya tadvacanaṃ śrutvā kṛpāśīlasya sā sarit | cintayāmāsa kauravya kiṃ kṛtvā sukṛtaṃ bhavet
उनकी बात सुनकर उस नदी ने, हे कुरुवंशी, दयालु स्वभाव के उन मुनि को ध्यान में रखकर सोचा कि क्या करने से सुकृत होगा।
श्लोक 26 (9.43.26)
तस्याश्चिन्ता समुत्पन्ना वसिष्ठो मय्यतीव हि । कृतवान्हि दयां नित्यं तस्य कार्यं हितं मया ॥
tasyāścintā samutpannā vasiṣṭho mayyatīva hi | kṛtavānhi dayāṃ nityaṃ tasya kāryaṃ hitaṃ mayā
उसके मन में यह विचार उठा, "वसिष्ठ ने मुझ पर सदा अत्यन्त दया की है; मुझे उनका हित-कार्य करना चाहिए।"
श्लोक 27 (9.43.27)
अथ कूले स्वके राजञ्जपन्तमृषिसत्तमम् । जुह्वानं कौशिकं प्रेक्ष्य सरस्वत्यभ्यचिन्तयत् ॥
atha kūle svake rājañjapantamṛṣisattamam | juhvānaṃ kauśikaṃ prekṣya sarasvatyabhyacintayat
तब, हे राजन्, अपने किनारे पर जप करते हुए उन ऋषिश्रेष्ठ को और आहुति देते हुए कौशिक को देखकर सरस्वती सोच में पड़ी।
श्लोक 28 (9.43.28)
इदमन्तरमित्येवं ततः सा सरितां वरा । कूलापहारमकरोत्स्वेन वेगेन सा सरित् ॥
idamantaramityevaṃ tataḥ sā saritāṃ varā | kūlāpahāramakarotsvena vegena sā sarit
"यही अवसर है" — ऐसा सोचकर उस श्रेष्ठ नदी ने अपने वेग से किनारे को ही बहा ले गई।
श्लोक 29 (9.43.29)
तेन कूलापहारेण मैत्रावरुणिरौह्यत । उह्यमानः स तुष्टाव तदा राजन्सरस्वतीम् ॥
tena kūlāpahāreṇa maitrāvaruṇirauhyata | uhyamānaḥ sa tuṣṭāva tadā rājansarasvatīm
उस किनारे के कटकर बह जाने से मित्रावरुण के पुत्र वसिष्ठ बह चले, और बहते हुए, हे राजन्, उन्होंने सरस्वती की स्तुति की।
वसिष्ठ उवाच
श्लोक 30 (9.43.30)
पितामहस्य सरसः प्रवृत्ताऽसि सरस्वति । व्याप्तं चेदं जगत्सर्वं तवैवाम्भोभिरुत्तमैः ॥
pitāmahasya sarasaḥ pravṛttā'si sarasvati | vyāptaṃ cedaṃ jagatsarvaṃ tavaivāmbhobhiruttamaiḥ
"हे सरस्वती, तुम पितामह के सरोवर से निकली हो; तुम्हारे ही उत्तम जल से यह सारा जगत् व्याप्त है।"
श्लोक 31 (9.43.31)
त्वमेवाकाशगा देवि मेघेषु सृजसे पयः । सर्वाश्चापस्त्वमेवेति यथा वयमधीमहि ॥
tvamevākāśagā devi megheṣu sṛjase payaḥ | sarvāścāpastvameveti yathā vayamadhīmahi
"हे देवि, तुम्हीं आकाश में चलकर मेघों में जल बरसाती हो; तुम्हीं सब जल हो, ऐसा हम पढ़ते हैं।"
श्लोक 32 (9.43.32)
पुष्टिर्द्युतिस्तथा कीर्तिः सिद्धिर्बुद्धिरमा तथा । त्वमेव वाणी स्वाहा त्वं तवायत्तमिदं जगत् । त्वमेव सर्वभूतेषु वससीह चतुर्विधा ॥
puṣṭirdyutistathā kīrtiḥ siddhirbuddhiramā tathā | tvameva vāṇī svāhā tvaṃ tavāyattamidaṃ jagat | tvameva sarvabhūteṣu vasasīha caturvidhā
"तुम पुष्टि, द्युति, कीर्ति, सिद्धि, बुद्धि और रमा हो; तुम्हीं वाणी और स्वाहा हो; यह जगत् तुम्हारे ही अधीन है। तुम्हीं चार रूपों में सब प्राणियों में निवास करती हो।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 33 (9.43.33)
एवं सरस्वती राजन्स्तूयमाना महर्षिणा । वेगेनोवाह तं विप्रं विश्वामित्राश्रमं प्रति ॥
evaṃ sarasvatī rājanstūyamānā maharṣiṇā | vegenovāha taṃ vipraṃ viśvāmitrāśramaṃ prati
हे राजन्, महर्षि की इस प्रकार स्तुति पाकर सरस्वती उन्हें वेग से विश्वामित्र के आश्रम की ओर बहा ले गई।
श्लोक 34 (9.43.34)
न्यवेदयत चाभीक्ष्णं विश्वामित्राय तं मुनिम् ॥
nyavedayata cābhīkṣṇaṃ viśvāmitrāya taṃ munim
और उसने विश्वामित्र को बार-बार बताया कि मुनि आ गए हैं।
श्लोक 35 (9.43.35)
तमानीतं सरस्वत्या दृष्ट्वा कोपसमन्वितः । अथान्वेषत्प्रहरणं वसिष्ठान्तकरं तदा ॥
tamānītaṃ sarasvatyā dṛṣṭvā kopasamanvitaḥ | athānveṣatpraharaṇaṃ vasiṣṭhāntakaraṃ tadā
सरस्वती द्वारा लाए गए वसिष्ठ को देखकर विश्वामित्र क्रोध से भर उठे और तब वसिष्ठ का अन्त करने वाला कोई शस्त्र ढूँढ़ने लगे।
श्लोक 36 (9.43.36)
तं तु क्रुद्धमभिप्रेक्ष्य ब्रह्मवध्याभयान्नदी । अपोवाह वसिष्ठं तु प्राचीं दिशमतन्द्रिता । उभयोः कुर्वती वाक्यं वञ्चयित्वा च गाधिजम् ॥
taṃ tu kruddhamabhiprekṣya brahmavadhyābhayānnadī | apovāha vasiṣṭhaṃ tu prācīṃ diśamatandritā | ubhayoḥ kurvatī vākyaṃ vañcayitvā ca gādhijam
उन्हें क्रुद्ध देखकर ब्रह्महत्या के भय से नदी ने बिना आलस्य के वसिष्ठ को पूर्व दिशा की ओर बहा दिया; इस प्रकार उसने दोनों की बात रखी और गाधिपुत्र विश्वामित्र को छल लिया।
श्लोक 37 (9.43.37)
ततोऽपवाहितं दृष्ट्वा वसिष्ठमृषिसत्तमम् । अब्रवीत्त्वथ सङ्क्रुद्धो विश्वामित्रः सरस्वतीम् ॥
tato'pavāhitaṃ dṛṣṭvā vasiṣṭhamṛṣisattamam | abravīttvatha saṅkruddho viśvāmitraḥ sarasvatīm
ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठ को इस प्रकार बहाकर ले जाया गया देखकर अत्यन्त क्रुद्ध विश्वामित्र ने सरस्वती से कहा —
विश्वामित्र उवाच
श्लोक 38 (9.43.38)
यस्मान्मां त्वं सरिच्छ्रेष्ठे वञ्चयित्वा पुनर्गता । शोणितं वह कल्याणि राक्षसानां च सम्मतम् ॥
yasmānmāṃ tvaṃ saricchreṣṭhe vañcayitvā punargatā | śoṇitaṃ vaha kalyāṇi rākṣasānāṃ ca sammatam
"हे श्रेष्ठ नदी, क्योंकि तू मुझे छलकर चली गई, इसलिए हे कल्याणी, तू रक्त बहा, जो राक्षसों को प्रिय है।"
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 39 (9.43.39)
ततः सरस्वती शप्ता विश्वामित्रेण धीमता । अवहच्छोणितोन्मिश्रं तोयं संवत्सरं तदा ॥
tataḥ sarasvatī śaptā viśvāmitreṇa dhīmatā | avahacchoṇitonmiśraṃ toyaṃ saṃvatsaraṃ tadā
बुद्धिमान् विश्वामित्र के इस प्रकार शाप देने पर सरस्वती तब एक वर्ष तक रक्त मिला हुआ जल बहाती रही।
श्लोक 40 (9.43.40)
अथर्षयश्च देवाश्च गन्धर्वाप्सरसस्तदा । सरस्वतीं तथा दृष्ट्वा बभूवुर्भृशदुःखिताः ॥
atharṣayaśca devāśca gandharvāpsarasastadā | sarasvatīṃ tathā dṛṣṭvā babhūvurbhṛśaduḥkhitāḥ
तब ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ सरस्वती को ऐसी दशा में देखकर बहुत दुःखी हुए।
श्लोक 41 (9.43.41)
एवं वसिष्ठापवाहो लोके ख्यातो जनाधिप । आगच्छच्च पुनर्मार्गं स्वमेव सरितां वरा ॥
evaṃ vasiṣṭhāpavāho loke khyāto janādhipa | āgacchacca punarmārgaṃ svameva saritāṃ varā
इस प्रकार, हे जनाधिप, वसिष्ठापवाह नाम से यह तीर्थ लोक में प्रसिद्ध हुआ; और श्रेष्ठ नदी बाद में फिर अपने ही मार्ग पर लौट आई।