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शल्य पर्व · अध्याय 44

शापमुक्त सरस्वती और नमुचि के शिर से इन्द्र की मुक्ति

शापित सरस्वती जो रक्त बहाती है, उसे राक्षस पीते रहते हैं, जब तक तीर्थयात्रा पर आए ऋषि तप और शिव की आराधना से उसे मुक्त नहीं कर देते; भूखे राक्षस ऋषियों से प्रार्थना करते हैं, ऋषि बताते हैं कि कौन-सा अन्न राक्षसों का भाग है, और नदी अरुणा को अपने शरीर में ले आती है, जिसमें स्नान करके राक्षस मुक्त हो जाते हैं। जनमेजय पूछते हैं कि इन्द्र को इस तीर्थ की क्या आवश्यकता पड़ी; वैशम्पायन बताते हैं कि इन्द्र ने प्रतिज्ञा तोड़कर नमुचि को मारा और ब्रह्मा की सलाह से सरस्वती-अरुणा के संगम पर यज्ञ और स्नान करके पाप से छूटे। फिर बलराम सोमतीर्थ को चले जाते हैं।

अध्याय 43अध्याय-सूचीअध्याय 45

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (9.44.1)

सा शप्ता तेन क्रुद्धेन विश्वामित्रेण धीमता । तस्मिंस्तीर्थवरे शुभ्रे शोणितं समुपावहत् ॥

sā śaptā tena kruddhena viśvāmitreṇa dhīmatā | tasmiṃstīrthavare śubhre śoṇitaṃ samupāvahat

क्रुद्ध और बुद्धिमान् विश्वामित्र के शाप से वह उस उत्तम और निर्मल तीर्थ में रक्त बहाने लगी।

श्लोक 2 (9.44.2)

अथाजग्मुस्ततो राजन्राक्षसास्तत्र भारत । तत्र ते शोणितं सर्वे पिबन्तः सुखमासते ॥

athājagmustato rājanrākṣasāstatra bhārata | tatra te śoṇitaṃ sarve pibantaḥ sukhamāsate

तब, हे राजन्, हे भारत, वहाँ राक्षस आ पहुँचे और वहाँ वह रक्त पीते हुए सब सुख से रहने लगे।

श्लोक 3 (9.44.3)

तृप्ताश्च सुभृशं तेन सुखिता विगतज्वराः । नृत्यन्तश्च हसन्तश्च यथा स्वर्गजितस्तथा ॥

tṛptāśca subhṛśaṃ tena sukhitā vigatajvarāḥ | nṛtyantaśca hasantaśca yathā svargajitastathā

उससे खूब तृप्त, सुखी और सन्ताप से रहित होकर वे स्वर्ग जीतने वालों के समान नाचते और हँसते थे।

श्लोक 4 (9.44.4)

कस्यचित्त्वथ कालस्य ऋषयः सुतपोधनाः । तीर्थयात्रां समाजग्मुः सरस्वत्यां महीपते ॥

kasyacittvatha kālasya ṛṣayaḥ sutapodhanāḥ | tīrthayātrāṃ samājagmuḥ sarasvatyāṃ mahīpate

कुछ समय बाद, हे महीपते, तपस्या के धनी ऋषि तीर्थयात्रा करते हुए सरस्वती पर आए।

श्लोक 5 (9.44.5)

तेषु सर्वेषु तीर्थेषु स्वाप्लुत्य मुनिपुङ्गवाः । प्राप्य प्रीतिं परां चापि तपोलुब्धा विशारदाः ॥

teṣu sarveṣu tīrtheṣu svāplutya munipuṅgavāḥ | prāpya prītiṃ parāṃ cāpi tapolubdhā viśāradāḥ

उन सब तीर्थों में भली-भाँति स्नान करके, परम आनन्द पाकर, तप के लोभी और कुशल वे मुनिश्रेष्ठ —

श्लोक 6 (9.44.6)

प्रययुर्हि ततो राजन्येन तीर्थमसृग्वहम् । अथागम्य महाभागास्तत्तीर्थं दारुणं तदा ॥

prayayurhi tato rājanyena tīrthamasṛgvaham | athāgamya mahābhāgāstattīrthaṃ dāruṇaṃ tadā

हे राजन्, उस मार्ग से चले जिससे रक्त बहाने वाला तीर्थ था। तब उस भयंकर तीर्थ में पहुँचकर वे महाभाग मुनि —

श्लोक 7 (9.44.7)

दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्याः शोणितेन परिप्लुतम् । पीयमानं च रक्षोभिर्बहुभिर्नृपसत्तम ॥

dṛṣṭvā toyaṃ sarasvatyāḥ śoṇitena pariplutam | pīyamānaṃ ca rakṣobhirbahubhirnṛpasattama

सरस्वती के जल को रक्त से भीगा हुआ और बहुत-से राक्षसों द्वारा पिया जाता हुआ देखा, हे नृपश्रेष्ठ।

श्लोक 8 (9.44.8)

तान्दृष्ट्वा राक्षसान्राजन्मुनयः संशितव्रताः । परित्राणे सरस्वत्याः परं यत्नं प्रचक्रिरे ॥

tāndṛṣṭvā rākṣasānrājanmunayaḥ saṃśitavratāḥ | paritrāṇe sarasvatyāḥ paraṃ yatnaṃ pracakrire

हे राजन्, उन राक्षसों को देखकर कठोर व्रत वाले मुनियों ने सरस्वती की रक्षा के लिए भारी प्रयत्न किया।

श्लोक 9 (9.44.9)

ते तु सर्वे महाभागाः समागम्य महाव्रताः । आहूय सरितां श्रेष्ठामिदं वचनमब्रुवन् ॥

te tu sarve mahābhāgāḥ samāgamya mahāvratāḥ | āhūya saritāṃ śreṣṭhāmidaṃ vacanamabruvan

वे सब महाभाग, महाव्रती मुनि इकट्ठे हुए और श्रेष्ठ नदी को बुलाकर उन्होंने ये वचन कहे —

ऋषय ऊचुः

श्लोक 10 (9.44.10)

कारणं ब्रूहि कल्याणि किमर्थं ते हृदो ह्ययम् । एवमग्राह्यतां यातः श्रुत्वाऽध्यास्यामहे वयम् ॥

kāraṇaṃ brūhi kalyāṇi kimarthaṃ te hṛdo hyayam | evamagrāhyatāṃ yātaḥ śrutvā'dhyāsyāmahe vayam

"हे कल्याणी, कारण बताओ: तुम्हारा यह कुण्ड ऐसी दशा को क्यों पहुँच गया है कि कोई इसके पास नहीं जा सकता? सुनकर हम निश्चय करेंगे कि क्या करना है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 11 (9.44.11)

ततः सा सर्वमाचष्ट यथावृत्तं प्रवेपती । दुःखितामथ तां दृष्ट्वा ऊचुस्ते वै तपोधनाः ॥

tataḥ sā sarvamācaṣṭa yathāvṛttaṃ pravepatī | duḥkhitāmatha tāṃ dṛṣṭvā ūcuste vai tapodhanāḥ

तब काँपती हुई उसने जैसा हुआ था वैसा सब कह सुनाया; और उसे दुःखी देखकर उन तपस्वियों ने कहा —

ऋषय ऊचुः

श्लोक 12 (9.44.12)

कारणं श्रुतमस्माभिः शापश्चैव श्रुतोऽनघे । करिष्यन्ति तु यत्प्राप्तं सर्व एव तपोधनाः ॥

kāraṇaṃ śrutamasmābhiḥ śāpaścaiva śruto'naghe | kariṣyanti tu yatprāptaṃ sarva eva tapodhanāḥ

"हे निष्पाप, हमने कारण सुन लिया और शाप की बात भी सुन ली। जो उचित होगा वह हम सब तपस्वी करेंगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 13 (9.44.13)

एवमुक्त्वा सरिच्छ्रेष्ठामूचुस्तेऽथ परस्परम् । विमोचयामहे सर्वे शापादेतां सरस्वतीम् ॥

evamuktvā saricchreṣṭhāmūcuste'tha parasparam | vimocayāmahe sarve śāpādetāṃ sarasvatīm

श्रेष्ठ नदी से ऐसा कहकर वे आपस में बोले, "आओ, हम सब इस सरस्वती को शाप से मुक्त करें।"

श्लोक 14 (9.44.14)

ते सर्वे ब्राह्मणा राजंस्तपोभिर्नियमैस्तथा । उपवासैश्च विविधैर्यमैः कष्टव्रतैस्तथा ॥

te sarve brāhmaṇā rājaṃstapobhirniyamaistathā | upavāsaiśca vividhairyamaiḥ kaṣṭavrataistathā

हे राजन्, उन सब ब्राह्मणों ने तपस्याओं, नियमों, अनेक प्रकार के उपवासों, यमों और कठोर व्रतों से —

श्लोक 15 (9.44.15)

आराध्य पशुभर्तारं महादेवं जगत्पतिम् । मोक्षयामासुस्तां देवीं सरिच्छ्रेष्ठां सरस्वतीम् ॥

ārādhya paśubhartāraṃ mahādevaṃ jagatpatim | mokṣayāmāsustāṃ devīṃ saricchreṣṭhāṃ sarasvatīm

पशुपति, जगत् के स्वामी महादेव की आराधना करके उस देवी, श्रेष्ठ नदी सरस्वती को मुक्त करा लिया।

श्लोक 16 (9.44.16)

तेषां तु सा प्रभावेण प्रकृतिस्था सरस्वती । प्रसन्नसलिला जज्ञे यथा पूर्वं तथैव हि । निर्मुक्ता च सरिच्छ्रेष्ठा विबभौ सा यथा पुरा ॥

teṣāṃ tu sā prabhāveṇa prakṛtisthā sarasvatī | prasannasalilā jajñe yathā pūrvaṃ tathaiva hi | nirmuktā ca saricchreṣṭhā vibabhau sā yathā purā

उनके प्रभाव से सरस्वती अपनी स्वाभाविक दशा में आ गई; उसका जल पहले की भाँति स्वच्छ हो गया; और मुक्त हुई वह श्रेष्ठ नदी पहले की तरह शोभित हुई।

श्लोक 17 (9.44.17)

दृष्ट्वा तोयं सरस्वत्या मुनिभिस्तैस्तथा कृतम् । तानेव शरणं जग्मू राक्षसाः क्षुधितास्तथा ॥

dṛṣṭvā toyaṃ sarasvatyā munibhistaistathā kṛtam | tāneva śaraṇaṃ jagmū rākṣasāḥ kṣudhitāstathā

उन मुनियों द्वारा सरस्वती का जल ऐसा कर दिया गया देखकर भूखे राक्षस उन्हीं मुनियों की शरण में गए।

श्लोक 18 (9.44.18)

कृत्वाञ्जलिं ततो राजन्राक्षसाः क्षुधयाऽर्दिताः । ऊचुस्तान्वै मुनीन्सर्वान्कृपायुक्तान्पुनःपुनः ॥

kṛtvāñjaliṃ tato rājanrākṣasāḥ kṣudhayā'rditāḥ | ūcustānvai munīnsarvānkṛpāyuktānpunaḥpunaḥ

हे राजन्, भूख से पीड़ित राक्षसों ने हाथ जोड़कर उन सब दयालु मुनियों से बार-बार कहा —

राक्षसा ऊचुः

श्लोक 19 (9.44.19)

वयं च क्षुधिताश्चैव धर्माद्धीनाश्च शाश्वतात् । न च नः कामकारोऽयं यद्वयं पापकारिणः ॥

vayaṃ ca kṣudhitāścaiva dharmāddhīnāśca śāśvatāt | na ca naḥ kāmakāro'yaṃ yadvayaṃ pāpakāriṇaḥ

"हम भूखे हैं और सनातन धर्म से वंचित हैं; और हम जो पाप करने वाले हैं, यह हमारी अपनी इच्छा से नहीं है।"

श्लोक 20 (9.44.20)

युष्माकं चाप्रसादेन दुष्कृतेन च कर्मणा । पक्षोऽयं वर्धतेऽस्माकं यतः स्मो ब्रह्मराक्षसाः । योषितां चैव पापेन योनिदोषकृतेन च ॥

yuṣmākaṃ cāprasādena duṣkṛtena ca karmaṇā | pakṣo'yaṃ vardhate'smākaṃ yataḥ smo brahmarākṣasāḥ | yoṣitāṃ caiva pāpena yonidoṣakṛtena ca

"आपकी अकृपा और बुरे कर्मों से हमारा यह पक्ष बढ़ता जाता है, क्योंकि हम ब्रह्मराक्षस हैं; और स्त्रियों के पाप से भी, जो योनि के दोष से उत्पन्न होता है।"

श्लोक 21 (9.44.21)

एवं हि वैश्यशूद्राणां क्षत्रियाणां तथैव च । ये ब्राह्मणान्प्रद्विषन्ति ते भवन्तीह राक्षसाः ॥

evaṃ hi vaiśyaśūdrāṇāṃ kṣatriyāṇāṃ tathaiva ca | ye brāhmaṇānpradviṣanti te bhavantīha rākṣasāḥ

"इसी प्रकार वैश्यों, शूद्रों और क्षत्रियों में जो ब्राह्मणों से द्वेष करते हैं, वे इस लोक में राक्षस हो जाते हैं।"

श्लोक 22 (9.44.22)

शक्तिमन्तोऽपि ये केचिदाश्रितानां च रक्षणम् । न कुर्वन्ति मनुष्यास्ते सम्भवन्तीह राक्षसाः ॥

śaktimanto'pi ye kecidāśritānāṃ ca rakṣaṇam | na kurvanti manuṣyāste sambhavantīha rākṣasāḥ

"जो मनुष्य समर्थ होकर भी अपने आश्रितों की रक्षा नहीं करते, वे भी इस लोक में राक्षस हो जाते हैं।"

श्लोक 23 (9.44.23)

आचार्यमृत्विजं चैव गुरुं वृद्धजनं तथा । प्राणिनो येऽवमन्यन्ते ते भवन्तीह राक्षसाः ॥

ācāryamṛtvijaṃ caiva guruṃ vṛddhajanaṃ tathā | prāṇino ye'vamanyante te bhavantīha rākṣasāḥ

"जो प्राणी आचार्य, ऋत्विज्, गुरु और वृद्ध जनों का अपमान करते हैं, वे इस लोक में राक्षस हो जाते हैं।"

श्लोक 24 (9.44.24)

तत्कुरुध्वमिहास्माकं तारणं द्विजसत्तमाः । शक्ता भवन्तः सर्वेषां लोकानामपि तारणे ॥

tatkurudhvamihāsmākaṃ tāraṇaṃ dvijasattamāḥ | śaktā bhavantaḥ sarveṣāṃ lokānāmapi tāraṇe

"इसलिए हे द्विजश्रेष्ठो, यहाँ हम पर यह कृपा कीजिए और हमारा उद्धार कीजिए; आप तो सब लोकों का भी उद्धार करने में समर्थ हैं।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 25 (9.44.25)

तेषां तु वचनं श्रुत्वा तुष्टुवुस्तां महानदीम् । मोक्षार्थं रक्षसां तेषामूचुः प्रयतमानसाः ॥

teṣāṃ tu vacanaṃ śrutvā tuṣṭuvustāṃ mahānadīm | mokṣārthaṃ rakṣasāṃ teṣāmūcuḥ prayatamānasāḥ

उनकी बात सुनकर मुनियों ने उस महानदी की स्तुति की और एकाग्र मन से राक्षसों की मुक्ति के लिए कहा —

ऋषय ऊचुः

श्लोक 26 (9.44.26)

क्षुतं कीटावपन्नं च यच्चोच्छिष्टाचितं भवेत् । सकेशमवधूतं च रुदितोपहतं च यत् ॥

kṣutaṃ kīṭāvapannaṃ ca yaccocchiṣṭācitaṃ bhavet | sakeśamavadhūtaṃ ca ruditopahataṃ ca yat

"जिस पर छींक पड़ी हो, जिसमें कीड़े गिर गए हों, जो जूठन से ढका हो; जिसमें बाल हो, जिसे फेंका या झाड़ा गया हो, या जो रोने से दूषित हुआ हो,"

श्लोक 27 (9.44.27)

श्वभिः संसृष्टमन्नं च भागोऽसौ रक्षसामिह । तस्माज्ज्ञात्वा सदा विद्वानेतान्यत्नाद्विवर्जयेत् । राक्षसान्नमसौ भुङ्क्ते यो भुङ्क्ते ह्यन्नमीदृशम् ॥

śvabhiḥ saṃsṛṣṭamannaṃ ca bhāgo'sau rakṣasāmiha | tasmājjñātvā sadā vidvānetānyatnādvivarjayet | rākṣasānnamasau bhuṅkte yo bhuṅkte hyannamīdṛśam

"और कुत्तों से छुआ हुआ अन्न — यह यहाँ राक्षसों का भाग है। इसलिए विद्वान् मनुष्य यह जानकर इन सबको सदा यत्नपूर्वक त्याग दे। जो ऐसा अन्न खाता है, वह राक्षसों का अन्न खाता है।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 28 (9.44.28)

शोधयित्वा ततस्तीर्थमृषयस्ते तपोधनाः । मोक्षार्थं राक्षसानां च नदीं तां प्रत्यचोदयन् ॥

śodhayitvā tatastīrthamṛṣayaste tapodhanāḥ | mokṣārthaṃ rākṣasānāṃ ca nadīṃ tāṃ pratyacodayan

तीर्थ को शुद्ध करके उन तपस्वी ऋषियों ने राक्षसों की मुक्ति के लिए उस नदी को प्रेरित किया।

श्लोक 29 (9.44.29)

महर्षीणां मतं ज्ञात्वा ततः सा सरितां वरा । अरुणामानयामास स्वां तनुं पुरुषर्षभ ॥

maharṣīṇāṃ mataṃ jñātvā tataḥ sā saritāṃ varā | aruṇāmānayāmāsa svāṃ tanuṃ puruṣarṣabha

महर्षियों का मत जानकर, हे पुरुषश्रेष्ठ, उस श्रेष्ठ नदी ने अरुणा को अपना ही शरीर बनाकर ला मिलाया।

श्लोक 30 (9.44.30)

तस्यां ते राक्षसाः स्नात्वा तनूस्त्यक्त्वा दिवं गताः । अरुणायां महाराज ब्रह्मवध्यापहा हि सा ॥

tasyāṃ te rākṣasāḥ snātvā tanūstyaktvā divaṃ gatāḥ | aruṇāyāṃ mahārāja brahmavadhyāpahā hi sā

उसमें स्नान करके राक्षस अपने शरीर त्यागकर स्वर्ग चले गए; क्योंकि, हे महाराज, अरुणा में वह नदी ब्रह्महत्या के पाप को नष्ट करने वाली है।

श्लोक 31 (9.44.31)

एतमर्थमभिज्ञाय देवराजः शतक्रतुः । तस्मिंस्तीर्थे वरे स्नात्वा विमुक्तः पाप्मना किल ॥

etamarthamabhijñāya devarājaḥ śatakratuḥ | tasmiṃstīrthe vare snātvā vimuktaḥ pāpmanā kila

यह जानकर देवराज शतक्रतु इन्द्र ने उस उत्तम तीर्थ में स्नान किया और पाप से मुक्त हो गए।

जनमेजय उवाच

श्लोक 32 (9.44.32)

किमर्थं भगवाञ्शक्रो ब्रह्मवध्यामवाप्तवान् । कथमस्मिंश्च तीर्थे वै आप्लुत्याकल्मषोऽभवत् ॥

kimarthaṃ bhagavāñśakro brahmavadhyāmavāptavān | kathamasmiṃśca tīrthe vai āplutyākalmaṣo'bhavat

जनमेजय ने कहा, "भगवान् इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप क्यों लगा? और इस तीर्थ में स्नान करके वे निष्कलंक कैसे हुए?"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 33 (9.44.33)

शृणुष्वैतदुपाख्यानं यथावृत्तं जनेश्वर । यथा बिभेद समयं नमुचेर्वासवः पुरा ॥

śṛṇuṣvaitadupākhyānaṃ yathāvṛttaṃ janeśvara | yathā bibheda samayaṃ namucervāsavaḥ purā

वैशम्पायन ने कहा, हे जनेश्वर, यह कथा जैसी हुई थी वैसी सुनिए: इन्द्र ने पहले नमुचि के साथ की हुई संधि कैसे तोड़ी।

श्लोक 34 (9.44.34)

नमुचिर्वासवाद्भीतः सूर्यरश्मिं समाविशत् । तेनेन्द्रः सख्यमकरोत्समयं चेदमब्रवीत् ॥

namucirvāsavādbhītaḥ sūryaraśmiṃ samāviśat | tenendraḥ sakhyamakarotsamayaṃ cedamabravīt

इन्द्र से डरकर नमुचि सूर्य की एक किरण में समा गया। इन्द्र ने उससे मित्रता की और यह प्रतिज्ञा कही —

इन्द्र उवाच

श्लोक 35 (9.44.35)

न चार्द्रेण न शुष्केण न रात्रौ नापि चाहनि । वधिष्याम्यसुरश्रेष्ठ सखे सत्येन ते शपे ॥

na cārdreṇa na śuṣkeṇa na rātrau nāpi cāhani | vadhiṣyāmyasuraśreṣṭha sakhe satyena te śape

"हे असुरश्रेष्ठ, मित्र, मैं तुम्हें न गीले से मारूँगा, न सूखे से; न रात में, न दिन में — मैं सत्य की शपथ खाता हूँ।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 36 (9.44.36)

एवं स कृत्वा समयं सृष्ट्वा नीहारमीश्वरः । चिच्छेदास्य शिरो राजन्नपां फेनेन वासवः ॥

evaṃ sa kṛtvā samayaṃ sṛṣṭvā nīhāramīśvaraḥ | cicchedāsya śiro rājannapāṃ phenena vāsavaḥ

इस प्रकार प्रतिज्ञा करके प्रभु इन्द्र ने कुहरा रचा और, हे राजन्, जल के फेन से उसका सिर काट डाला।

श्लोक 37 (9.44.37)

तच्छिरो नमुचेश्छिन्नं पृष्ठतः शक्रमन्वियात् । भोभो मित्रह पापेति ब्रुवाणं शक्रमन्तिकात् ॥

tacchiro namuceśchinnaṃ pṛṣṭhataḥ śakramanviyāt | bhobho mitraha pāpeti bruvāṇaṃ śakramantikāt

नमुचि का वह कटा हुआ सिर इन्द्र के पीछे-पीछे चला और पास से "अरे अरे मित्रघाती, पापी!" पुकारता रहा।

श्लोक 38 (9.44.38)

एवं स शिरसा तेन चोद्यमानः पुनः पुनः । पितामहाय सन्तप्त एतमर्थं न्यवेदयत् ॥

evaṃ sa śirasā tena codyamānaḥ punaḥ punaḥ | pitāmahāya santapta etamarthaṃ nyavedayat

उस सिर द्वारा बार-बार टोके जाने पर सन्तप्त इन्द्र ने पितामह से यह बात कही।

श्लोक 39 (9.44.39)

तमब्रवील्लोकगुरुररुणायां यथाविधि । इष्ट्वोपस्पृश देवेन्द्र तीर्थे पापभयापहे ॥

tamabravīllokagururaruṇāyāṃ yathāvidhi | iṣṭvopaspṛśa devendra tīrthe pāpabhayāpahe

लोकगुरु ने उनसे कहा, "हे देवेन्द्र, अरुणा पर विधिपूर्वक यज्ञ करके पाप के भय को हरने वाले उस तीर्थ में स्नान करो।"

ब्रह्मोवाच

श्लोक 40 (9.44.40)

एषा पुण्यजला शक्र कृता मुनिभिरेव तु । निगूढमस्यागमनमिहासीत्पूर्वमेव तु ॥

eṣā puṇyajalā śakra kṛtā munibhireva tu | nigūḍhamasyāgamanamihāsītpūrvameva tu

"हे इन्द्र, यह नदी पवित्र जल वाली है, इसे ऋषियों ने ही ऐसा बनाया है; इसका यहाँ आना पहले से ही छिपा हुआ था।"

श्लोक 41 (9.44.41)

ततोऽभ्येत्यारुणां देवीं प्लावयामास वारिणा । सरस्वत्यारुणायाश्च पुण्योऽयं सङ्गमो महान् ॥

tato'bhyetyāruṇāṃ devīṃ plāvayāmāsa vāriṇā | sarasvatyāruṇāyāśca puṇyo'yaṃ saṅgamo mahān

"फिर वह देवी अरुणा के पास आकर उसे जल से भर गई; और सरस्वती तथा अरुणा का यह महान् संगम पवित्र है।"

श्लोक 42 (9.44.42)

इह त्वं यज देवेन्द्र दद दानान्यनेकशः । अत्राप्लुत्य सुघोरात्त्वं पातकाद्विप्रमोक्ष्यसे ॥

iha tvaṃ yaja devendra dada dānānyanekaśaḥ | atrāplutya sughorāttvaṃ pātakādvipramokṣyase

"हे देवेन्द्र, यहाँ यज्ञ करो और अनेक प्रकार के दान दो। यहाँ स्नान करके तुम इस अत्यन्त घोर पाप से मुक्त हो जाओगे।"

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 43 (9.44.43)

इत्युक्तः स सरस्वत्याः कुञ्जे वै जनमेजय । इष्ट्वा यथावद्बलभिदरुणायामुपास्पृशत् ॥

ityuktaḥ sa sarasvatyāḥ kuñje vai janamejaya | iṣṭvā yathāvadbalabhidaruṇāyāmupāspṛśat

ऐसा कहे जाने पर, हे जनमेजय, बल का संहार करने वाले इन्द्र ने सरस्वती के कुञ्ज में विधिपूर्वक यज्ञ करके अरुणा में स्नान किया।

श्लोक 44 (9.44.44)

स मुक्तः पाप्मना तेन ब्रह्मवध्याकृतेन च । जगाम संहृष्टमनास्त्रिदिवं त्रिदशेश्वरः ॥

sa muktaḥ pāpmanā tena brahmavadhyākṛtena ca | jagāma saṃhṛṣṭamanāstridivaṃ tridaśeśvaraḥ

वे ब्रह्महत्या से उत्पन्न उस पाप से मुक्त हो गए, और तैंतीस देवताओं के स्वामी इन्द्र हर्षित मन से स्वर्ग को चले गए।

श्लोक 45 (9.44.45)

शिरस्तच्चापि नमुचेस्तत्रैवाप्लुत्य भारत । लोकान्कामदुघान्प्राप्तमक्षयान्राजसत्तम ॥

śirastaccāpi namucestatraivāplutya bhārata | lokānkāmadughānprāptamakṣayānrājasattama

और नमुचि का वह सिर भी वहीं स्नान करके, हे भारत, हे राजश्रेष्ठ, सब कामनाएँ पूरी करने वाले अक्षय लोकों को प्राप्त हुआ।

श्लोक 46 (9.44.46)

तत्राप्युपस्पृश्य बलो महात्मा । दत्त्वा च दानानि पृथग्विधानि । अवाप्य धर्मं परमार्यकर्मा । जगाम सोमस्य महत्सुतीर्थम् ॥

tatrāpyupaspṛśya balo mahātmā | dattvā ca dānāni pṛthagvidhāni | avāpya dharmaṃ paramāryakarmā | jagāma somasya mahatsutīrtham

वहाँ भी स्नान करके, अनेक प्रकार के दान देकर और धर्म का फल पाकर श्रेष्ठ कर्म करने वाले महात्मा बलराम सोम के महान् और उत्तम तीर्थ को चले गए।

श्लोक 47 (9.44.47)

यत्रायजद्राजसूयेन सोमः । साक्षात्पुरा विधिवत्पार्थिवेन्द्र । अत्रिर्धीमान्ब्रह्मपुत्रो बभूव । होता यस्मिन्क्रतुमुख्ये महात्मा ॥

yatrāyajadrājasūyena somaḥ | sākṣātpurā vidhivatpārthivendra | atrirdhīmānbrahmaputro babhūva | hotā yasminkratumukhye mahātmā

जहाँ पूर्वकाल में स्वयं सोम ने, हे नरेन्द्र, राजसूय यज्ञ विधिपूर्वक किया था, और उस श्रेष्ठ यज्ञ में ब्रह्मा के पुत्र बुद्धिमान् महात्मा अत्रि होता बने थे;

श्लोक 48 (9.44.48)

यस्यान्तेऽभूत्सुमहद्दानवानां । दैतेयानां राक्षसानां च देवैः । सङ्ग्रामो वै तारकाख्यः सुतीव्रो । यत्र स्कन्दस्तारकाख्यं जघान ॥

yasyānte'bhūtsumahaddānavānāṃ | daiteyānāṃ rākṣasānāṃ ca devaiḥ | saṅgrāmo vai tārakākhyaḥ sutīvro | yatra skandastārakākhyaṃ jaghāna

जिसके अन्त में दानवों, दैत्यों और राक्षसों के साथ देवताओं का अत्यन्त भीषण, तारक नामक महान् संग्राम हुआ, जहाँ स्कन्द ने तारक को मारा;

श्लोक 49 (9.44.49)

सैनापत्यं लब्धवान्दैवतानां । महासेनो यत्र दैत्यान्तकर्ता । साक्षाच्चैवं न्यवसत्कार्तिकेयः । सदा कुमारो यत्र स प्लक्षराजः ॥

saināpatyaṃ labdhavāndaivatānāṃ | mahāseno yatra daityāntakartā | sākṣāccaivaṃ nyavasatkārtikeyaḥ | sadā kumāro yatra sa plakṣarājaḥ

जहाँ दैत्यों का अन्त करने वाले महासेन ने देवताओं का सेनापतित्व पाया; जहाँ सदा कुमार रहने वाले कार्तिकेय साक्षात् निवास करते थे; और जहाँ वह प्लक्षराज वृक्ष खड़ा है।

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