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शल्य पर्व · अध्याय 46

स्कन्द का सेनापति-पद पर अभिषेक

वैशम्पायन बताते हैं कि स्कन्द (कार्तिकेय) का देवताओं की सेना के सेनापति-पद पर अभिषेक कैसे हुआ। बृहस्पति अग्नि में आहुति देते हैं, और देवता, ऋषि, भूतगण, नदियाँ, पर्वत और देवियाँ सरस्वती के पवित्र जल के साथ एकत्र होते हैं; ब्रह्मा और अन्य उनका अभिषेक करते हैं। फिर ब्रह्मा, स्थाणु, देवता और जगत् की महान् शक्तियाँ उन्हें अनुचर देती हैं, जिनके नाम विस्तार से गिनाए गए हैं, और अध्याय का अन्त नाना मुखों और नाना शस्त्रों वाले उन असंख्य गणों से होता है जो हर्ष से उन्हें घेरे रहते हैं।

अध्याय 45अध्याय-सूचीअध्याय 47

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (9.46.1)

ततोऽभिषेकसम्भारान्सर्वान्सम्भृत्य शास्त्रतः । बृहस्पतिः समिद्धेऽग्नौ जुहावाग्निं यथाविधि ॥

tato'bhiṣekasambhārānsarvānsambhṛtya śāstrataḥ | bṛhaspatiḥ samiddhe'gnau juhāvāgniṃ yathāvidhi

तब बृहस्पति ने शास्त्र के अनुसार अभिषेक की सारी सामग्री जुटाकर प्रज्वलित अग्नि में विधिपूर्वक अग्निदेव के लिए आहुति दी।

श्लोक 2 (9.46.2)

ततो हिमवता दत्ते मणिप्रवरशोभिते । दिव्यरत्नाचिते पुण्ये निषण्णं परमासने ॥

tato himavatā datte maṇipravaraśobhite | divyaratnācite puṇye niṣaṇṇaṃ paramāsane

तब कुमार उस पवित्र उत्तम आसन पर विराजमान हुए जो हिमवान् ने दिया था, जो श्रेष्ठ मणियों से शोभित था और दिव्य रत्नों से जड़ा हुआ था;

श्लोक 3 (9.46.3)

सर्वमङ्गलसम्भारैर्विधिमन्त्रपुरस्कृतम् । आभिषेचनिकं द्रव्यं गृहीत्वा देवतागणाः ॥

sarvamaṅgalasambhārairvidhimantrapuraskṛtam | ābhiṣecanikaṃ dravyaṃ gṛhītvā devatāgaṇāḥ

समस्त मङ्गल-सामग्री तथा विधि और मन्त्रों से सम्मानित उन कुमार के लिए देवगणों ने अभिषेक की सामग्री ली;

श्लोक 4 (9.46.4)

इन्द्राविष्णू महावीर्यौ सूर्याचन्द्रमसौ तथा । धाता चैव विधाता च तथा चैवानिलानलौ ॥

indrāviṣṇū mahāvīryau sūryācandramasau tathā | dhātā caiva vidhātā ca tathā caivānilānalau

महापराक्रमी इन्द्र और विष्णु, सूर्य और चन्द्रमा, धाता और विधाता तथा वायु और अग्नि,

श्लोक 5 (9.46.5)

पूष्णा भगेनार्यम्णा च अंशेन च विवस्वता । रुद्रश्च सहितो धीमान्मित्रेण वरुणेन च ॥

pūṣṇā bhagenāryamṇā ca aṃśena ca vivasvatā | rudraśca sahito dhīmānmitreṇa varuṇena ca

पूषा, भग, अर्यमा, अंश और विवस्वान्, तथा बुद्धिमान् रुद्र, मित्र और वरुण के साथ,

श्लोक 6 (9.46.6)

रुद्रैर्वसुभिरादित्यैरश्विभ्यां च वृतः प्रभुः । विश्वैर्देवैर्मरुद्भिश्च साध्यैश्च पितृभिः सह ॥

rudrairvasubhirādityairaśvibhyāṃ ca vṛtaḥ prabhuḥ | viśvairdevairmarudbhiśca sādhyaiśca pitṛbhiḥ saha

और प्रभु कुमार रुद्रों, वसुओं, आदित्यों और दोनों अश्विनीकुमारों से घिरे थे, साथ ही विश्वेदेवों, मरुद्गणों, साध्यों और पितरों से भी,

श्लोक 7 (9.46.7)

गन्धर्वैरप्सरोभिश्च यक्षराक्षसपन्नगैः । देवर्षिभिरसङ्ख्यातैस्तथा ब्रह्मर्षिभिस्तथा ॥

gandharvairapsarobhiśca yakṣarākṣasapannagaiḥ | devarṣibhirasaṅkhyātaistathā brahmarṣibhistathā

गन्धर्वों और अप्सराओं, यक्षों, राक्षसों और नागों से, असंख्य देवर्षियों से तथा ब्रह्मर्षियों से भी,

श्लोक 8 (9.46.8)

वैखानसैर्वालखिल्यैर्वाय्वाहारैर्मरीचिपैः । भृगुभिश्चाङ्गिरोभिश्च यतिभिश्च महात्मभिः ॥

vaikhānasairvālakhilyairvāyvāhārairmarīcipaiḥ | bhṛgubhiścāṅgirobhiśca yatibhiśca mahātmabhiḥ

वैखानसों, वालखिल्यों, वायु का आहार करने वालों और सूर्य-किरणें पीने वालों से, भृगुओं, अङ्गिराओं तथा महात्मा यतियों से,

श्लोक 9 (9.46.9)

सर्वैर्विद्याधरैः पुण्यैर्योगसिद्धैस्तथा वृतः । पितामहः पुलस्त्यश्च पुलहश्च महातपाः ॥

sarvairvidyādharaiḥ puṇyairyogasiddhaistathā vṛtaḥ | pitāmahaḥ pulastyaśca pulahaśca mahātapāḥ

तथा समस्त पुण्यात्मा विद्याधरों और योगसिद्धों से घिरे हुए, पितामह, पुलस्त्य और महातपस्वी पुलह भी आए,

श्लोक 10 (9.46.10)

अङ्गिराः कश्यपोऽत्रिश्च मरीचिर्भृगुरेव च । क्रतुर्हरिः प्रचेताश्च मनुर्दक्षस्तथैव च ॥

aṅgirāḥ kaśyapo'triśca marīcirbhṛgureva ca | kraturhariḥ pracetāśca manurdakṣastathaiva ca

अङ्गिरा, कश्यप, अत्रि, मरीचि और भृगु, क्रतु, हरि, प्रचेता, मनु और दक्ष,

श्लोक 11 (9.46.11)

ऋतवश्च ग्रहाश्चैव ज्योतींषि च विशाम्पते । मूर्तिमत्यश्च सरितो वेदाश्चैव सनातनाः ॥

ṛtavaśca grahāścaiva jyotīṃṣi ca viśāmpate | mūrtimatyaśca sarito vedāścaiva sanātanāḥ

हे प्रजापालक! ऋतुएँ, ग्रह और नक्षत्र, मूर्त रूप धारण किए हुए नदियाँ और सनातन वेद,

श्लोक 12 (9.46.12)

समुद्राश्च ह्रदाश्चैव तीर्थानि विविधानि च । पृथिवी द्यौर्दिशश्चैव पादपाश्च जनाधिप ॥

samudrāśca hradāścaiva tīrthāni vividhāni ca | pṛthivī dyaurdiśaścaiva pādapāśca janādhipa

हे नरेश्वर! समुद्र, सरोवर और नाना तीर्थ, पृथ्वी, आकाश, दिशाएँ और वृक्ष भी वहाँ आए।

श्लोक 13 (9.46.13)

अदितिर्देवमाता च हीः श्रीः स्वाहा सरस्वती । उमा शची सिनीवाली तथैवानुमतिः कुहूः ॥

aditirdevamātā ca hīḥ śrīḥ svāhā sarasvatī | umā śacī sinīvālī tathaivānumatiḥ kuhūḥ

देवमाता अदिति, ह्री, श्री, स्वाहा और सरस्वती, उमा, शची, सिनीवाली, अनुमति और कुहू,

श्लोक 14 (9.46.14)

राका च धिषणा चैव पत्न्यश्चान्या दिवौकसाम् । हिमवांश्चैव विन्ध्यश्च मेरुश्चानेकशृङ्गवान् ॥

rākā ca dhiṣaṇā caiva patnyaścānyā divaukasām | himavāṃścaiva vindhyaśca meruścānekaśṛṅgavān

राका और धिषणा तथा स्वर्गवासियों की अन्य पत्नियाँ, हिमवान्, विन्ध्य और अनेक शिखरों वाला मेरु,

श्लोक 15 (9.46.15)

ऐरावतः सानुचरः कलाः काष्ठास्तथैव च । मासार्धमासा ऋतवस्तथा रात्र्यहनी नृप ॥

airāvataḥ sānucaraḥ kalāḥ kāṣṭhāstathaiva ca | māsārdhamāsā ṛtavastathā rātryahanī nṛpa

अपने अनुचरों सहित ऐरावत, कला और काष्ठा, मास और अर्धमास, ऋतुएँ तथा रात और दिन, हे राजन्,

श्लोक 16 (9.46.16)

उच्चैः श्रवा हयश्रेष्ठो नागराजश्च वासुकिः । अरुणो गरुडश्चैव वृक्षाश्चौषधिभिः सह ॥

uccaiḥ śravā hayaśreṣṭho nāgarājaśca vāsukiḥ | aruṇo garuḍaścaiva vṛkṣāścauṣadhibhiḥ saha

श्रेष्ठ अश्व उच्चैःश्रवा और नागराज वासुकि, अरुण और गरुड़, तथा औषधियों सहित वृक्ष,

श्लोक 17 (9.46.17)

धर्मश्च भगवान्देवः समाजग्मुर्हि सङ्गताः । कालो यमश्च मृत्युश्च यमस्यानुचराश्च ये ॥

dharmaśca bhagavāndevaḥ samājagmurhi saṅgatāḥ | kālo yamaśca mṛtyuśca yamasyānucarāśca ye

और भगवान् धर्मदेव भी—ये सब एकत्र हो गए; काल, यम और मृत्यु तथा यम के जो अनुचर हैं वे भी।

श्लोक 18 (9.46.18)

बहुलत्वाच्च नोक्ता ये विविधा देवतागणाः । ते कुमाराभिषेकार्थं समाजग्मुस्ततस्ततः ॥

bahulatvācca noktā ye vividhā devatāgaṇāḥ | te kumārābhiṣekārthaṃ samājagmustatastataḥ

और अन्य नाना देवगण, जिनके नाम संख्या की अधिकता के कारण नहीं कहे गए, कुमार के अभिषेक के लिए इधर-उधर से आ पहुँचे।

श्लोक 19 (9.46.19)

जगृहुस्ते तदा राजन्सर्व एव दिवौकसः । आभिषेचनिकं भाण्डं मङ्गलानि च सर्वशः ॥

jagṛhuste tadā rājansarva eva divaukasaḥ | ābhiṣecanikaṃ bhāṇḍaṃ maṅgalāni ca sarvaśaḥ

हे राजन्! तब उन सभी देवताओं ने अभिषेक के पात्र और सब प्रकार की मङ्गल-वस्तुएँ उठा लीं।

श्लोक 20 (9.46.20)

दिव्यसम्भारसंयुक्तैः कलशैः काञ्चनैर्नृप । सारस्वताभिः पुण्याभिरद्भिस्ताभिरलङ्कृतम् ॥

divyasambhārasaṃyuktaiḥ kalaśaiḥ kāñcanairnṛpa | sārasvatābhiḥ puṇyābhiradbhistābhiralaṅkṛtam

हे राजन्! दिव्य सामग्री से युक्त सोने के कलश थे, जो सरस्वती के पवित्र जल से सुशोभित थे।

श्लोक 21 (9.46.21)

अभ्यषिञ्चन्कुमारं वै सम्प्रहृष्टा दिवौकसः । सैनापत्ये महात्मानमसुराणां भयङ्करम् ॥

abhyaṣiñcankumāraṃ vai samprahṛṣṭā divaukasaḥ | saināpatye mahātmānamasurāṇāṃ bhayaṅkaram

हर्ष से भरे देवताओं ने असुरों को भयभीत करने वाले महात्मा कुमार को सेनापति-पद पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 22 (9.46.22)

पुरा यथा महाराज वरुणं वै जलेश्वरम् । तथाऽभ्यषिञ्चद्भगवान्सर्वलोकपितामहः ॥

purā yathā mahārāja varuṇaṃ vai jaleśvaram | tathā'bhyaṣiñcadbhagavānsarvalokapitāmahaḥ

हे महाराज! जैसे पूर्वकाल में समस्त लोकों के पितामह भगवान् ब्रह्मा ने जलों के स्वामी वरुण का अभिषेक किया था, वैसे ही उन्होंने कुमार का अभिषेक किया।

श्लोक 23 (9.46.23)

कश्यपश्च महातेजा ये चान्ये लोककीर्तिताः । तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो बलिनो वातरंहसः ॥

kaśyapaśca mahātejā ye cānye lokakīrtitāḥ | tasmai brahmā dadau prīto balino vātaraṃhasaḥ

महातेजस्वी कश्यप ने तथा जगत् में प्रसिद्ध अन्य लोगों ने भी वैसा ही किया। तब प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें बलवान् और वायु के समान वेगवाले अनुचर दिए,

श्लोक 24 (9.46.24)

कामवीर्यधरान्सिद्धान्महापारिषदान्प्रभुः । नन्दिसेनं लोहिताक्षं घण्टाकर्णं च सम्मतम् ॥

kāmavīryadharānsiddhānmahāpāriṣadānprabhuḥ | nandisenaṃ lohitākṣaṃ ghaṇṭākarṇaṃ ca sammatam

जो इच्छानुसार बल और पराक्रम धारण करने वाले सिद्ध और महान् पार्षद थे—नन्दिसेन, लोहिताक्ष और सम्मानित घण्टाकर्ण,

श्लोक 25 (9.46.25)

चतुर्थमस्यानुचरं ख्यातं कुमुदमालिनम् । तत्र स्थाणुर्महातेजा महापारिषदं प्रभुः ॥

caturthamasyānucaraṃ khyātaṃ kumudamālinam | tatra sthāṇurmahātejā mahāpāriṣadaṃ prabhuḥ

और चौथे अनुचर के रूप में प्रसिद्ध कुमुदमाली। तब महातेजस्वी प्रभु स्थाणु ने एक महान् पार्षद दिया,

श्लोक 26 (9.46.26)

मायाशतधरं कामं कामवीर्यबलान्वितम् । ददौ स्कन्दाय राजेन्द्र सुरारिविनिबर्हणम् ॥

māyāśatadharaṃ kāmaṃ kāmavīryabalānvitam | dadau skandāya rājendra surārivinibarhaṇam

जो सैकड़ों मायाओं को धारण करने वाला और इच्छानुसार बल-पराक्रम से सम्पन्न, देवशत्रुओं का संहारक काम था; हे राजेन्द्र! उसे उन्होंने स्कन्द को दिया।

श्लोक 27 (9.46.27)

स हि देवासुरे युद्धे दैत्यानां भीमकर्मणाम् । जघान दोर्भ्यां सङ्क्रुद्धः प्रयुतानि चतुर्दश ॥

sa hi devāsure yuddhe daityānāṃ bhīmakarmaṇām | jaghāna dorbhyāṃ saṅkruddhaḥ prayutāni caturdaśa

उसी ने देवासुर-युद्ध में क्रोध से भरकर अपनी दोनों भुजाओं से भयंकर कर्म करने वाले दैत्यों के चौदह प्रयुत वीरों का वध किया था।

श्लोक 28 (9.46.28)

तथा देवा ददुस्तस्मै सेनां नैर्ऋतसङ्कुलाम् । देवशत्रुक्षयकरीमजय्यां विश्वरूपिणीम् ॥

tathā devā dadustasmai senāṃ nairṛtasaṅkulām | devaśatrukṣayakarīmajayyāṃ viśvarūpiṇīm

तब देवताओं ने उन्हें नैर्ऋतों से भरी हुई सेना दी, जो देवशत्रुओं का नाश करने वाली, अजेय और विश्वरूपा थी।

श्लोक 29 (9.46.29)

जयशब्दं तथा चक्रुर्देवाः सर्वे सवासवाः । गन्धर्वा यक्षरक्षांसि मुनयः पितरस्तथा ॥

jayaśabdaṃ tathā cakrurdevāḥ sarve savāsavāḥ | gandharvā yakṣarakṣāṃsi munayaḥ pitarastathā

तब वासव सहित सब देवताओं ने तथा गन्धर्वों, यक्षों, राक्षसों, मुनियों और पितरों ने जयघोष किया।

श्लोक 30 (9.46.30)

ततः प्रादादनुचरौ यमः कालोपमावुभौ । उन्माथं च प्रमाथं च महावीर्यौ महाद्युती ॥

tataḥ prādādanucarau yamaḥ kālopamāvubhau | unmāthaṃ ca pramāthaṃ ca mahāvīryau mahādyutī

तब यम ने काल और मृत्यु के समान दो अनुचर दिए—उन्माथ और प्रमाथ, जो महापराक्रमी और महातेजस्वी थे।

श्लोक 31 (9.46.31)

सुभ्राजो भास्वरश्चैव यौ तौ सूर्यानुयायिनौ । तौ सूर्यः कार्तिकेयाय ददौ प्रीतः प्रतापवान् ॥

subhrājo bhāsvaraścaiva yau tau sūryānuyāyinau | tau sūryaḥ kārtikeyāya dadau prītaḥ pratāpavān

सुभ्राज और भास्वर, जो सूर्य के अनुगामी थे, उन दोनों को प्रतापी सूर्य ने प्रसन्न होकर कार्तिकेय को दिया।

श्लोक 32 (9.46.32)

कैलासशृङ्गसङ्काशौ श्वेतमाल्यानुलेपनौ । सोमोऽप्यनुचरौ प्रादान्मणिं सुमणिमेव च ॥

kailāsaśṛṅgasaṅkāśau śvetamālyānulepanau | somo'pyanucarau prādānmaṇiṃ sumaṇimeva ca

सोम ने भी दो अनुचर दिए, जो कैलास के शिखरों के समान थे और श्वेत माला तथा अनुलेपन धारण किए हुए थे—मणि और सुमणि।

श्लोक 33 (9.46.33)

ज्वालाजिह्वं तथा ज्योतिरात्मजाय हुताशनः । ददावनुचरौ शूरौ परसैन्यप्रमाथिनौ ॥

jvālājihvaṃ tathā jyotirātmajāya hutāśanaḥ | dadāvanucarau śūrau parasainyapramāthinau

अग्नि ने अपने पुत्र को ज्वालाजिह्व और ज्योति नामक दो शूर अनुचर दिए, जो शत्रुसेना को कुचलने वाले थे।

श्लोक 34 (9.46.34)

परिघं च वटं चैव भीमं च सुमहाबलम् । दहतिं दहनं चैव प्रचण्डौ वीर्यसम्मतौ ॥

parighaṃ ca vaṭaṃ caiva bhīmaṃ ca sumahābalam | dahatiṃ dahanaṃ caiva pracaṇḍau vīryasammatau

परिघ और वट तथा महाबली भीम, दहति और दहन—ये प्रचण्ड और पराक्रम के लिए सम्मानित थे;

श्लोक 35 (9.46.35)

अंशोऽप्यनुचरान्पञ्च ददौ स्कन्दाय धीमते । उत्क्रोशं सत्करं चैव वज्रदण्डधरावुभौ ॥

aṃśo'pyanucarānpañca dadau skandāya dhīmate | utkrośaṃ satkaraṃ caiva vajradaṇḍadharāvubhau

अंश ने भी बुद्धिमान् स्कन्द को ये पाँच अनुचर दिए। उत्क्रोश और सत्कर, जो वज्र-दण्ड धारण करने वाले दोनों थे,

श्लोक 36 (9.46.36)

ददावनलपुत्राय वासवः परवीरहा । तौ हि शत्रून्महेन्द्रस्य जघ्नतुः समरे बहून् ॥

dadāvanalaputrāya vāsavaḥ paravīrahā | tau hi śatrūnmahendrasya jaghnatuḥ samare bahūn

उन्हें शत्रुवीरों के संहारक वासव ने अग्नि-पुत्र को दिया; और उन दोनों ने युद्ध में महेन्द्र के बहुत से शत्रुओं को मारा था।

श्लोक 37 (9.46.37)

चक्रं विक्रमकं चैव सङ्क्रमं च महाबलम् । स्कन्दाय त्रीननुचरान्ददौ विष्णुर्महायशाः ॥

cakraṃ vikramakaṃ caiva saṅkramaṃ ca mahābalam | skandāya trīnanucarāndadau viṣṇurmahāyaśāḥ

चक्र, विक्रमक और महाबली सङ्क्रम—इन तीन अनुचरों को महायशस्वी विष्णु ने स्कन्द को दिया।

श्लोक 38 (9.46.38)

वर्धनं नन्दनं चैव सर्वविद्याविशारदौ । स्कन्दाय ददतुः प्रीतावश्विनौ भिषजां वरौ ॥

vardhanaṃ nandanaṃ caiva sarvavidyāviśāradau | skandāya dadatuḥ prītāvaśvinau bhiṣajāṃ varau

सब विद्याओं में निपुण वर्धन और नन्दन को वैद्यों में श्रेष्ठ दोनों अश्विनीकुमारों ने प्रसन्न होकर स्कन्द को दिया।

श्लोक 39 (9.46.39)

किन्दुं च कुसुमं चैव कुमुदं च महायशाः । डम्बराडम्बरौ चैव ददौ धाता महात्मने ॥

kinduṃ ca kusumaṃ caiva kumudaṃ ca mahāyaśāḥ | ḍambarāḍambarau caiva dadau dhātā mahātmane

किन्दु, कुसुम और कुमुद तथा डम्बर और आडम्बर को महायशस्वी धाता ने महात्मा स्कन्द को दिया।

श्लोक 40 (9.46.40)

वक्रानुवक्रौ बलिनौ मेषवक्त्रौ बलोत्कटौ । ददौ त्वष्टा महामायौ स्कन्दायानुचरावुभौ ॥

vakrānuvakrau balinau meṣavaktrau balotkaṭau | dadau tvaṣṭā mahāmāyau skandāyānucarāvubhau

वक्र और अनुवक्र, जो बलवान्, प्रचण्ड, मेढ़े के मुखवाले और महान् मायावी थे, इन दो अनुचरों को त्वष्टा ने स्कन्द को दिया।

श्लोक 41 (9.46.41)

सुव्रतं सत्यसन्धं च ददौ मित्रो महात्मने । कुमाराय महात्मानौ तपोविद्याधरौ प्रभुः ॥

suvrataṃ satyasandhaṃ ca dadau mitro mahātmane | kumārāya mahātmānau tapovidyādharau prabhuḥ

तप और विद्या को धारण करने वाले दो महात्मा—सुव्रत और सत्यसन्ध—को प्रभु मित्र ने महात्मा कुमार को दिया।

श्लोक 42 (9.46.42)

सुदर्शनीयौ वरदौ त्रिषु लोकेषु विश्रुतौ । सुव्रतं च महात्मानं शुभकर्माणमेव च ॥

sudarśanīyau varadau triṣu lokeṣu viśrutau | suvrataṃ ca mahātmānaṃ śubhakarmāṇameva ca

दो सुन्दर, वर देने वाले और तीनों लोकों में प्रसिद्ध पार्षद—महात्मा सुव्रत और शुभकर्मा—

श्लोक 43 (9.46.43)

कार्तिकेयाय सम्प्रादाद्विधाता लोकविश्रुतौ । पाणीतकं कालिकं च महामायाविनावुभौ ॥

kārtikeyāya samprādādvidhātā lokaviśrutau | pāṇītakaṃ kālikaṃ ca mahāmāyāvināvubhau

इन दोनों लोकप्रसिद्धों को विधाता ने कार्तिकेय को दिया। पाणीतक और कालिक, जो दोनों महामायावी थे,

श्लोक 44 (9.46.44)

पूषा च पार्षदौ प्रादात्कार्तिकेयाय भारत । बलं चातिबलं चैव महावक्त्रौ महाबलौ ॥

pūṣā ca pārṣadau prādātkārtikeyāya bhārata | balaṃ cātibalaṃ caiva mahāvaktrau mahābalau

इन दोनों पार्षदों को पूषा ने कार्तिकेय को दिया, हे भारत! बल और अतिबल, जो विशाल मुखवाले और अत्यन्त बलवान् थे,

श्लोक 45 (9.46.45)

प्रददौ कार्तिकेयाय वायुर्भरतसत्तम । यमं चातियमं चैव तिमिवक्त्रौ महाबलौ ॥

pradadau kārtikeyāya vāyurbharatasattama | yamaṃ cātiyamaṃ caiva timivaktrau mahābalau

उन्हें वायु ने, हे भरतश्रेष्ठ! कार्तिकेय को दिया। यम और अतियम, जो महाबली थे और जिनके मुख बड़ी तिमि मछलियों जैसे थे,

श्लोक 46 (9.46.46)

प्रददौ कार्तिकेयाय वरुणः सत्यसङ्गरः । सुवर्चसं महात्मानं तथैवाप्यतिवर्चसम् ॥

pradadau kārtikeyāya varuṇaḥ satyasaṅgaraḥ | suvarcasaṃ mahātmānaṃ tathaivāpyativarcasam

उन्हें सत्य-प्रतिज्ञ वरुण ने कार्तिकेय को दिया। महात्मा सुवर्चस और उसी प्रकार अतिवर्चस,

श्लोक 47 (9.46.47)

हिमवान्प्रददौ राजन्हुताशनसुताय वै । काञ्चनं च महात्मानं मेघमालिनमेव च ॥

himavānpradadau rājanhutāśanasutāya vai | kāñcanaṃ ca mahātmānaṃ meghamālinameva ca

उन्हें हिमवान् ने, हे राजन्! अग्नि-पुत्र को दिया। महात्मा काञ्चन और मेघमाली,

श्लोक 48 (9.46.48)

ददावनुचरौ मेरुरग्निपुत्राय भारत । स्थिरं चातिस्थिरं चैव मेरुरेवापरौ ददौ ॥

dadāvanucarau meruragniputrāya bhārata | sthiraṃ cātisthiraṃ caiva merurevāparau dadau

इन दो अनुचरों को मेरु ने अग्नि-पुत्र को दिया, हे भारत! स्थिर और अतिस्थिर नामक दो अन्य अनुचर भी मेरु ने ही दिए,

श्लोक 49 (9.46.49)

महात्मा त्वग्निपुत्राय महाबलपराक्रमौ । उच्छृङ्गं चातिशृङ्गं च महापाषाणयोधिनौ ॥

mahātmā tvagniputrāya mahābalaparākramau | ucchṛṅgaṃ cātiśṛṅgaṃ ca mahāpāṣāṇayodhinau

उस महात्मा ने अग्नि-पुत्र को वे दोनों दिए, जो महान् बल और पराक्रम वाले थे। उच्छृङ्ग और अतिशृङ्ग, जो बड़ी-बड़ी चट्टानों से युद्ध करने वाले थे,

श्लोक 50 (9.46.50)

प्रददावग्निपुत्राय विन्ध्यः पारिषदावुभौ । सङ्ग्रहं विग्रहं चैव समुद्रोऽपि गदाधरौ ॥

pradadāvagniputrāya vindhyaḥ pāriṣadāvubhau | saṅgrahaṃ vigrahaṃ caiva samudro'pi gadādharau

इन दो पार्षदों को विन्ध्य ने अग्नि-पुत्र को दिया; और समुद्र ने भी गदा धारण करने वाले सङ्ग्रह और विग्रह को दिया,

श्लोक 51 (9.46.51)

प्रददावग्निपुत्राय महापारिषदावुभौ । उन्मादं शङ्कुकर्णं च पुष्पदन्तं तथैव च ॥

pradadāvagniputrāya mahāpāriṣadāvubhau | unmādaṃ śaṅkukarṇaṃ ca puṣpadantaṃ tathaiva ca

अग्नि-पुत्र को वे दो महान् पार्षद देते हुए। उन्माद, शङ्कुकर्ण और पुष्पदन्त,

श्लोक 52 (9.46.52)

प्रददावग्निपुत्राय पार्वती शुभदर्शना । जयं महाजयं चैव गङ्गा ज्वलनसूनवे ॥

pradadāvagniputrāya pārvatī śubhadarśanā | jayaṃ mahājayaṃ caiva gaṅgā jvalanasūnave

इन्हें सुन्दर दर्शनवाली पार्वती ने अग्नि-पुत्र को दिया। जय और महाजय को गङ्गा ने अग्नि-पुत्र को दिया।

श्लोक 53 (9.46.53)

प्रददौ पुरुषव्याघ्र वासुकिः पन्नगेश्वरः । एवं साध्याश्च रुद्राश्च वसवः पितरस्तथा ॥

pradadau puruṣavyāghra vāsukiḥ pannageśvaraḥ | evaṃ sādhyāśca rudrāśca vasavaḥ pitarastathā

हे पुरुषव्याघ्र! नागराज वासुकि ने भी दिया। इस प्रकार साध्यों, रुद्रों, वसुओं और पितरों ने,

श्लोक 54 (9.46.54)

सागराः सरितश्चैव गिरयश्च महाबलाः । ददुः सेनागणाध्यक्षाञ्शूलपट्टसधारिणः ॥

sāgarāḥ saritaścaiva girayaśca mahābalāḥ | daduḥ senāgaṇādhyakṣāñśūlapaṭṭasadhāriṇaḥ

समुद्रों, नदियों और महाबली पर्वतों ने सेना-गणों के अध्यक्ष दिए, जो शूल और पट्टस धारण किए हुए थे,

श्लोक 55 (9.46.55)

दिव्यप्रहरणोपेतान्नानावेषविभूषितान् । शृणु नामानि चाप्येषां येऽन्ये स्कन्दस्य सैनिकाः ॥

divyapraharaṇopetānnānāveṣavibhūṣitān | śṛṇu nāmāni cāpyeṣāṃ ye'nye skandasya sainikāḥ

जो दिव्य शस्त्रों से सुसज्जित और नाना वेशों से विभूषित थे। स्कन्द के जो अन्य सैनिक थे उनके नाम भी सुनो,

श्लोक 56 (9.46.56)

विविधायुधसम्पन्नाश्चित्राभरणभूषिताः । शङ्कुकर्णो निकुम्भश्च पद्मः कुमुद एव च ॥

vividhāyudhasampannāścitrābharaṇabhūṣitāḥ | śaṅkukarṇo nikumbhaśca padmaḥ kumuda eva ca

जो नाना प्रकार के आयुधों से सम्पन्न और विचित्र आभूषणों से सजे थे—शङ्कुकर्ण, निकुम्भ, पद्म और कुमुद,

श्लोक 57 (9.46.57)

अनन्तो द्वादशभुजस्तथा कृष्णोपकृष्णकौ । घ्राणश्रवाः कपिस्कन्धः काञ्चनाक्षो जलन्धमः ॥

ananto dvādaśabhujastathā kṛṣṇopakṛṣṇakau | ghrāṇaśravāḥ kapiskandhaḥ kāñcanākṣo jalandhamaḥ

बारह भुजाओं वाला अनन्त, कृष्ण और उपकृष्ण, घ्राणश्रवा, कपिस्कन्ध, काञ्चनाक्ष, जलन्धम,

श्लोक 58 (9.46.58)

अक्षः सन्तर्जनो राजन्कुनदीकस्तमोन्तकृत् । एकाक्षो द्वादशाक्षश्च तथैवैकजटः प्रभुः ॥

akṣaḥ santarjano rājankunadīkastamontakṛt | ekākṣo dvādaśākṣaśca tathaivaikajaṭaḥ prabhuḥ

अक्ष, सन्तर्जन, हे राजन्, कुनदीक, तमोन्तकृत्, एकाक्ष, द्वादशाक्ष और प्रभु एकजट,

श्लोक 59 (9.46.59)

सहस्रबाहुर्विकटो व्याघ्राक्षः क्षितिकम्पनः । पुण्यनामा सुनामा च सुचक्रः प्रियदर्शनः ॥

sahasrabāhurvikaṭo vyāghrākṣaḥ kṣitikampanaḥ | puṇyanāmā sunāmā ca sucakraḥ priyadarśanaḥ

सहस्रबाहु, विकट, व्याघ्राक्ष, क्षितिकम्पन, पुण्यनामा, सुनामा, सुचक्र, प्रियदर्शन,

श्लोक 60 (9.46.60)

परिश्रुतः कोकनदः प्रियमाल्यानुलेपनः । अजोदरो गजशिराः स्कन्धाक्षः शतलोचनः ॥

pariśrutaḥ kokanadaḥ priyamālyānulepanaḥ | ajodaro gajaśirāḥ skandhākṣaḥ śatalocanaḥ

परिश्रुत, कोकनद, प्रियमाल्यानुलेपन, अजोदर, गजशिरा, स्कन्धाक्ष, शतलोचन,

श्लोक 61 (9.46.61)

ज्वालाजिह्वः करालाक्षः शितिकेशो जटी हरिः । परिश्रुतः कोकनदः कृष्णकेशो जटाधरः ॥

jvālājihvaḥ karālākṣaḥ śitikeśo jaṭī hariḥ | pariśrutaḥ kokanadaḥ kṛṣṇakeśo jaṭādharaḥ

ज्वालाजिह्व, करालाक्ष, शितिकेश, जटी, हरि, परिश्रुत, कोकनद, कृष्णकेश, जटाधर,

श्लोक 62 (9.46.62)

चतुर्दंष्ट्रोऽष्टजिह्वश्च मेघनादः पृथुश्रवाः । विद्युताक्षो धनुर्वक्त्रो जाठरो मारुताशनः ॥

caturdaṃṣṭro'ṣṭajihvaśca meghanādaḥ pṛthuśravāḥ | vidyutākṣo dhanurvaktro jāṭharo mārutāśanaḥ

चतुर्दंष्ट्र, अष्टजिह्व, मेघनाद, पृथुश्रवा, विद्युताक्ष, धनुर्वक्त्र, जाठर, मारुताशन,

श्लोक 63 (9.46.63)

उदाराक्षो रथाक्षश्च वज्रनाभो वसुप्रभः । समुद्रवेगो राजेन्द्र शैलकम्पी तथैव च ॥

udārākṣo rathākṣaśca vajranābho vasuprabhaḥ | samudravego rājendra śailakampī tathaiva ca

उदाराक्ष, रथाक्ष, वज्रनाभ, वसुप्रभ, समुद्रवेग, हे राजेन्द्र, और शैलकम्पी,

श्लोक 64 (9.46.64)

वृषो मेषः प्रवाहश्च तथा नन्दोपनन्दकौ । धूम्रः श्वेतः कलिङ्गश्च सिद्धार्थो वरदस्तथा ॥

vṛṣo meṣaḥ pravāhaśca tathā nandopanandakau | dhūmraḥ śvetaḥ kaliṅgaśca siddhārtho varadastathā

वृष, मेष, प्रवाह, नन्द और उपनन्द, धूम्र, श्वेत, कलिङ्ग, सिद्धार्थ और वरद,

श्लोक 65 (9.46.65)

प्रियकश्चैव नन्दश्च गोनन्दश्च प्रतापवान् । आनन्दश्च प्रमोदश्च स्वस्तिको ध्रुवकस्तथा ॥

priyakaścaiva nandaśca gonandaśca pratāpavān | ānandaśca pramodaśca svastiko dhruvakastathā

प्रियक, नन्द और प्रतापी गोनन्द, आनन्द, प्रमोद, स्वस्तिक और ध्रुवक,

श्लोक 66 (9.46.66)

क्षेमवाहः सुवाहश्च सिद्धपात्रश्च भारत । गोव्रजः कनकापीडो महापारिषदेश्वरः ॥

kṣemavāhaḥ suvāhaśca siddhapātraśca bhārata | govrajaḥ kanakāpīḍo mahāpāriṣadeśvaraḥ

क्षेमवाह, सुवाह और सिद्धपात्र, हे भारत, गोव्रज, कनकापीड और महापार्षदों के अधिपति,

श्लोक 67 (9.46.67)

गायनो हसनश्चैव बाणः खड्गश्च वीर्यवान् । वैताली गतिताली च तथा कथकवातिकौ ॥

gāyano hasanaścaiva bāṇaḥ khaḍgaśca vīryavān | vaitālī gatitālī ca tathā kathakavātikau

गायन, हसन, बाण और पराक्रमी खड्ग, वैताली, गतिताली तथा कथक और वातिक,

श्लोक 68 (9.46.68)

हंसजः पङ्कदिग्धाङ्गः समुद्रोन्मादनश्च ह । रणोत्कटः प्रहासश्च श्वेतसिद्धश्च नन्दनः ॥

haṃsajaḥ paṅkadigdhāṅgaḥ samudronmādanaśca ha | raṇotkaṭaḥ prahāsaśca śvetasiddhaśca nandanaḥ

हंसज, पङ्कदिग्धाङ्ग और समुद्रोन्मादन, रणोत्कट, प्रहास, श्वेतसिद्ध और नन्दन,

श्लोक 69 (9.46.69)

कालकण्ठः प्रभासश्च तथा कुम्भाण्डकोदरः । कालकक्षः सितश्चैव भूतानां मथनस्तथा ॥

kālakaṇṭhaḥ prabhāsaśca tathā kumbhāṇḍakodaraḥ | kālakakṣaḥ sitaścaiva bhūtānāṃ mathanastathā

कालकण्ठ, प्रभास और कुम्भाण्डकोदर, कालकक्ष, सित और भूतमथन,

श्लोक 70 (9.46.70)

यज्ञवाहः सुवाहश्च देवयाजी च सोमपः । मज्जानश्च महातेजाः क्रथक्राथौ च भारत ॥

yajñavāhaḥ suvāhaśca devayājī ca somapaḥ | majjānaśca mahātejāḥ krathakrāthau ca bhārata

यज्ञवाह, सुवाह, देवयाजी और सोमप, महातेजस्वी मज्जान, और क्रथ तथा क्राथ, हे भारत,

श्लोक 71 (9.46.71)

तुहरश्च तुहारश्च चित्रदेवश्च वीर्यवान् । मधुरः सुप्रसादश्च किरीटी च महाबलः ॥

tuharaśca tuhāraśca citradevaśca vīryavān | madhuraḥ suprasādaśca kirīṭī ca mahābalaḥ

तुहर और तुहार, पराक्रमी चित्रदेव, मधुर, सुप्रसाद और महाबली किरीटी,

श्लोक 72 (9.46.72)

वत्सलो मधुवर्णश्च कलशोदर एव च । धर्मदो मन्मथकरः सूचीवक्त्रश्च वीर्यवान् ॥

vatsalo madhuvarṇaśca kalaśodara eva ca | dharmado manmathakaraḥ sūcīvaktraśca vīryavān

वत्सल, मधुवर्ण और कलशोदर, धर्मद, मन्मथकर और पराक्रमी सूचीवक्त्र,

श्लोक 73 (9.46.73)

श्वेतवक्त्रः सुवक्त्रश्च चारुवक्त्रश्च पाण्डुरः । दण्डबाहुः सुबाहुश्च रजः कोकिलकस्तथा ॥

śvetavaktraḥ suvaktraśca cāruvaktraśca pāṇḍuraḥ | daṇḍabāhuḥ subāhuśca rajaḥ kokilakastathā

श्वेतवक्त्र, सुवक्त्र, चारुवक्त्र और पाण्डुर, दण्डबाहु, सुबाहु, रज और कोकिलक,

श्लोक 74 (9.46.74)

अचलः कनकाक्षश्च बालानामपि यः प्रभुः । सञ्चारकः कोकनदो गृध्रपत्रश्च जम्बुकः ॥

acalaḥ kanakākṣaśca bālānāmapi yaḥ prabhuḥ | sañcārakaḥ kokanado gṛdhrapatraśca jambukaḥ

अचल और कनकाक्ष, और वह जो बालकों का भी स्वामी है, सञ्चारक, कोकनद, गृध्रपत्र और जम्बुक,

श्लोक 75 (9.46.75)

लोहाजवक्त्रो जवनः कुम्भवक्त्रश्च कुम्भकः । स्वर्णग्रीवश्च कृष्णौजा हंसवक्त्रश्च चन्द्रभः ॥

lohājavaktro javanaḥ kumbhavaktraśca kumbhakaḥ | svarṇagrīvaśca kṛṣṇaujā haṃsavaktraśca candrabhaḥ

लोहाजवक्त्र, जवन, कुम्भवक्त्र और कुम्भक, स्वर्णग्रीव, कृष्णौजा, हंसवक्त्र और चन्द्रभ,

श्लोक 76 (9.46.76)

पाणिकूर्चाश्च शम्बूकः पञ्चवक्त्रश्च शिक्षकः । चाषवक्त्रश्च जम्बूकः शाकवक्त्रश्च कुञ्जलः ॥

pāṇikūrcāśca śambūkaḥ pañcavaktraśca śikṣakaḥ | cāṣavaktraśca jambūkaḥ śākavaktraśca kuñjalaḥ

पाणिकूर्च, शम्बूक, पञ्चवक्त्र और शिक्षक, चाषवक्त्र, जम्बूक, शाकवक्त्र और कुञ्जल।

श्लोक 77 (9.46.77)

योगयुक्ता महात्मानः सततं ब्राह्मणप्रियाः । पैतामहा महात्मानो महापारिषदाश्च ये ॥

yogayuktā mahātmānaḥ satataṃ brāhmaṇapriyāḥ | paitāmahā mahātmāno mahāpāriṣadāśca ye

योग से युक्त, महात्मा और सदा ब्राह्मणों के प्रिय, पितामह से सम्बन्ध रखने वाले महात्मा, जो महापार्षद हैं,

श्लोक 78 (9.46.78)

यौवनस्थाश्च बालाश्च वृद्धाश्च जनमेजय । सहस्रशः पारिषदाः कुमारमुपतस्थिरे ॥

yauvanasthāśca bālāśca vṛddhāśca janamejaya | sahasraśaḥ pāriṣadāḥ kumāramupatasthire

हे जनमेजय! युवा, बालक और वृद्ध—हज़ारों पार्षद कुमार की सेवा में उपस्थित हुए।

श्लोक 79 (9.46.79)

वक्त्रैर्नानाविधैर्ये तु शृणु ताञ्जनमेजय । कूर्मकुक्कुटवक्त्राश्च शशोलूकमुखास्तथा ॥

vaktrairnānāvidhairye tu śṛṇu tāñjanamejaya | kūrmakukkuṭavaktrāśca śaśolūkamukhāstathā

हे जनमेजय! जिनके मुख नाना प्रकार के थे, उनके विषय में सुनो। कुछ के मुख कछुए और मुर्गे के, कुछ के खरगोश और उल्लू के थे,

श्लोक 80 (9.46.80)

खरोष्ट्रवदनाश्चान्ये वराहवदनास्तथा । मार्जारशशवक्त्राश्च दीर्घवक्त्राश्च भारत ॥

kharoṣṭravadanāścānye varāhavadanāstathā | mārjāraśaśavaktrāśca dīrghavaktrāśca bhārata

अन्य गधे और ऊँट के मुखवाले थे, अन्य सूअर के मुखवाले; कुछ बिल्ली और खरगोश के मुखवाले तथा कुछ लम्बे मुखवाले थे, हे भारत,

श्लोक 81 (9.46.81)

नकुलोलूकवक्त्राश्च काकवक्त्रास्तथा परे । आखुबभ्रुकवक्त्राश्च मयूरवदनास्तथा ॥

nakulolūkavaktrāśca kākavaktrāstathā pare | ākhubabhrukavaktrāśca mayūravadanāstathā

नेवले और उल्लू के मुखवाले, कौओं के मुखवाले अन्य, चूहे और भूरे नेवले के मुखवाले तथा मोर के मुखवाले,

श्लोक 82 (9.46.82)

मत्स्यमेषाननाश्चान्ये अजाविमहिषाननाः । ऋक्षशार्दूलवक्त्राश्च द्वीपिसिंहाननास्तथा ॥

matsyameṣānanāścānye ajāvimahiṣānanāḥ | ṛkṣaśārdūlavaktrāśca dvīpisiṃhānanāstathā

मछली और मेढ़े के मुखवाले अन्य, बकरे, भेड़ और भैंसे के मुखवाले, रीछ और बाघ के मुखवाले, तथा चीते और सिंह के मुखवाले,

श्लोक 83 (9.46.83)

भीमा गजाननाश्चैव तथा नक्रमुखाश्च ये । गरुडाननाः कङ्कुमुखा वृककाकमुखास्तथा ॥

bhīmā gajānanāścaiva tathā nakramukhāśca ye | garuḍānanāḥ kaṅkumukhā vṛkakākamukhāstathā

भयंकर हाथी के मुखवाले और मगर के मुखवाले, गरुड़ के मुखवाले, कङ्क पक्षी के मुखवाले, तथा भेड़िये और कौए के मुखवाले,

श्लोक 84 (9.46.84)

गोखरोष्ट्रमुखाश्चान्ये वृषदंशमुखास्तथा । महाजठरपादाङ्गास्तारकाक्षाश्च भारत ॥

gokharoṣṭramukhāścānye vṛṣadaṃśamukhāstathā | mahājaṭharapādāṅgāstārakākṣāśca bhārata

अन्य गाय, गधे और ऊँट के मुखवाले, बिलाव के मुखवाले, विशाल पेट, पैर और अङ्गों वाले, और तारों जैसी आँखों वाले, हे भारत,

श्लोक 85 (9.46.85)

पारावतमुखाश्चान्ये तथा वृषमुखाः परे । कोकिलाभाननाश्चान्ये श्येनतित्तिरिकाननाः ॥

pārāvatamukhāścānye tathā vṛṣamukhāḥ pare | kokilābhānanāścānye śyenatittirikānanāḥ

अन्य कबूतर के मुखवाले और अन्य बैल के मुखवाले, कोयल के मुखवाले, बाज और तीतर के मुखवाले,

श्लोक 86 (9.46.86)

कृकलासमुखाश्चैव विरजोम्बरधारिणः । व्यालवक्त्राः शूलमुखाश्चण्डवक्त्राः शुभाननाः ॥

kṛkalāsamukhāścaiva virajombaradhāriṇaḥ | vyālavaktrāḥ śūlamukhāścaṇḍavaktrāḥ śubhānanāḥ

गिरगिट के मुखवाले, निर्मल वस्त्र धारण करने वाले, सर्प के मुखवाले, शूल जैसे मुखवाले, उग्र मुखवाले और सुन्दर मुखवाले,

श्लोक 87 (9.46.87)

आशीविषाश्चीरधरा गोनासावदनास्तथा । स्थूलोदराः कृशाङ्गाश्च स्थूलाङ्गाश्च कृशोदराः ॥

āśīviṣāścīradharā gonāsāvadanāstathā | sthūlodarāḥ kṛśāṅgāśca sthūlāṅgāśca kṛśodarāḥ

कुछ विषैले सर्पों जैसे, कुछ चीर पहने हुए, कुछ गोनास सर्पों के मुखवाले, मोटे पेट और पतले अङ्गों वाले, मोटे अङ्गों और पतले पेट वाले,

श्लोक 88 (9.46.88)

ह्रस्वग्रीवा महाकर्णा नानाव्यालविभूषणाः । गजेन्द्रचर्मवसनास्तथा कृष्णाजिनाम्बराः ॥

hrasvagrīvā mahākarṇā nānāvyālavibhūṣaṇāḥ | gajendracarmavasanāstathā kṛṣṇājināmbarāḥ

छोटी गर्दन और बड़े कानों वाले, नाना प्रकार के सर्पों से विभूषित, गजराज के चर्म को वस्त्र बनाए हुए और कृष्णमृग का चर्म ओढ़े हुए,

श्लोक 89 (9.46.89)

स्कन्धेमुखा महाराज तथाप्युदरतोमुखाः । पृष्ठेमुखा हनुमुखास्तथा जङ्घामुखा अपि ॥

skandhemukhā mahārāja tathāpyudaratomukhāḥ | pṛṣṭhemukhā hanumukhāstathā jaṅghāmukhā api

हे महाराज! कंधों पर मुखवाले और उसी प्रकार पेट पर मुखवाले, पीठ पर मुखवाले, ठोड़ी पर मुखवाले और जाँघों पर भी मुखवाले,

श्लोक 90 (9.46.90)

पार्श्वाननाश्च बहवो नानादेशमुखास्तथा । तथा कीटपतङ्गानां सदृशास्या गणेश्वराः ॥

pārśvānanāśca bahavo nānādeśamukhāstathā | tathā kīṭapataṅgānāṃ sadṛśāsyā gaṇeśvarāḥ

बहुत-से बगल में मुखवाले और नाना स्थानों पर मुखवाले, तथा कीट और पतङ्गों जैसे मुखवाले गणेश्वर,

श्लोक 91 (9.46.91)

नानाव्यालमुखाश्चान्ये बहुबाहुशिरोधराः । नानावृक्षभुजाः केचित्कटिशीर्षास्तथा परे ॥

nānāvyālamukhāścānye bahubāhuśirodharāḥ | nānāvṛkṣabhujāḥ kecitkaṭiśīrṣāstathā pare

अन्य नाना सर्पों जैसे मुखवाले, बहुत भुजाओं और बहुत सिरों वाले, कुछ नाना वृक्षों जैसी भुजाओं वाले, और कुछ कमर पर सिरवाले,

श्लोक 92 (9.46.92)

भुजङ्गभोगवदना नानागुल्मनिवासिनः । चीरसंवृतगात्राश्च नानाकनकवाससः ॥

bhujaṅgabhogavadanā nānāgulmanivāsinaḥ | cīrasaṃvṛtagātrāśca nānākanakavāsasaḥ

सर्प के फनों जैसे मुखवाले, नाना झाड़ियों में रहने वाले, चीर से ढके शरीरवाले, और नाना प्रकार के सुनहरे वस्त्र पहने हुए,

श्लोक 93 (9.46.93)

नानावेषधराश्चैव नानामाल्यानुलेपनाः । नानावस्त्रधराश्चैव चर्मवासस एव च ॥

nānāveṣadharāścaiva nānāmālyānulepanāḥ | nānāvastradharāścaiva carmavāsasa eva ca

नाना वेश धारण किए, नाना माला और अनुलेपन वाले, नाना वस्त्र धारण किए और चर्म ओढ़े हुए,

श्लोक 94 (9.46.94)

उष्णीषिणो मुकुटिनः सुग्रीवाश्च सुवर्चसः । किरीटिनः पञ्चशिखास्तथा काञ्चनमूर्धजाः ॥

uṣṇīṣiṇo mukuṭinaḥ sugrīvāśca suvarcasaḥ | kirīṭinaḥ pañcaśikhāstathā kāñcanamūrdhajāḥ

पगड़ी बाँधे, मुकुट पहने, सुन्दर गर्दन वाले और तेजस्वी, किरीट धारण किए, पाँच शिखाओं वाले और सुनहरे केशों वाले,

श्लोक 95 (9.46.95)

त्रिशिखा द्विशिखाश्चैव तथा सप्तशिखाः परे । शिखण्डिनो मुकुटिनो मुण्डाश्च जटिलास्तथा ॥

triśikhā dviśikhāścaiva tathā saptaśikhāḥ pare | śikhaṇḍino mukuṭino muṇḍāśca jaṭilāstathā

तीन शिखाओं वाले, दो शिखाओं वाले और अन्य सात शिखाओं वाले, चोटी वाले, मुकुटधारी, मुण्डित और जटाधारी,

श्लोक 96 (9.46.96)

चित्रमालाधराः केचित्केचिद्रोमाननास्तथा । विग्रहैकरसा नित्यमजेताः सुरसत्तमैः ॥

citramālādharāḥ kecitkecidromānanāstathā | vigrahaikarasā nityamajetāḥ surasattamaiḥ

कुछ रंग-बिरंगी मालाएँ पहने, कुछ रोम से भरे मुखवाले, सदा एक-से रूप वाले और श्रेष्ठ देवताओं के लिए भी अजेय,

श्लोक 97 (9.46.97)

कृष्णा निर्मांसवक्त्राश्च दीर्घपृष्ठास्तनूदराः । स्थूलपृष्ठा ह्रस्वपृष्ठाः प्रलम्बोदरमेहनाः ॥

kṛṣṇā nirmāṃsavaktrāśca dīrghapṛṣṭhāstanūdarāḥ | sthūlapṛṣṭhā hrasvapṛṣṭhāḥ pralambodaramehanāḥ

काले, मांसरहित मुखवाले, लम्बी पीठ और पतले पेट वाले, मोटी पीठ वाले और छोटी पीठ वाले, लटकते हुए लम्बे पेट और जननेन्द्रिय वाले,

श्लोक 98 (9.46.98)

महाभुजा ह्रस्वभुजा ह्रस्वगात्राश्च वामनाः । कुब्जाश्च ह्रस्वजङ्घाश्च हस्तिकर्णशिरोधराः ॥

mahābhujā hrasvabhujā hrasvagātrāśca vāmanāḥ | kubjāśca hrasvajaṅghāśca hastikarṇaśirodharāḥ

लम्बी भुजाओं वाले और छोटी भुजाओं वाले, छोटे शरीर के बौने, कुबड़े, छोटी जाँघों वाले, हाथी जैसे कान और गर्दन वाले,

श्लोक 99 (9.46.99)

हस्तिनासाः कूर्मनासा वृकनासास्तथा परे । दीर्घोच्छ्वासा दीर्घजङ्घा विकराला ह्यधोमुखाः ॥

hastināsāḥ kūrmanāsā vṛkanāsāstathā pare | dīrghocchvāsā dīrghajaṅghā vikarālā hyadhomukhāḥ

हाथी की नाक वाले, कछुए की नाक वाले और भेड़िये की नाक वाले, लम्बी साँस वाले, लम्बी जाँघों वाले, विकराल और नीचे की ओर मुख वाले,

श्लोक 100 (9.46.100)

महादंष्ट्रा ह्रस्वदंष्ट्राश्चतुर्दंष्ट्रास्तथा परे । वारणेन्द्रनिभाश्चान्ये भीमा राजन्सहस्रशः ॥

mahādaṃṣṭrā hrasvadaṃṣṭrāścaturdaṃṣṭrāstathā pare | vāraṇendranibhāścānye bhīmā rājansahasraśaḥ

बड़ी दाढ़ों वाले, छोटी दाढ़ों वाले और चार दाढ़ों वाले, अन्य गजराजों के समान, हे राजन्! हज़ारों की संख्या में भयंकर,

श्लोक 101 (9.46.101)

सुविभक्तशरीराश्च दीप्तिमन्तः स्वलङ्कृताः । पिङ्गाक्षाः शङ्कुकर्णाश्च रक्तनासाश्च भारत ॥

suvibhaktaśarīrāśca dīptimantaḥ svalaṅkṛtāḥ | piṅgākṣāḥ śaṅkukarṇāśca raktanāsāśca bhārata

सुगठित शरीरवाले, तेजस्वी और भली-भाँति सजे हुए, पीली आँखों वाले, खूँटी जैसे कानों वाले और लाल नाक वाले, हे भारत,

श्लोक 102 (9.46.102)

पृथुदंष्ट्रा महादंष्ट्राः स्थूलौष्ठा हरिमूर्धजाः । नानापादौष्ठदंष्ट्राश्च नानाहस्तशिरोधराः ॥

pṛthudaṃṣṭrā mahādaṃṣṭrāḥ sthūlauṣṭhā harimūrdhajāḥ | nānāpādauṣṭhadaṃṣṭrāśca nānāhastaśirodharāḥ

चौड़ी दाढ़ों और बड़ी दाढ़ों वाले, मोटे होंठों और पीले केशों वाले, नाना प्रकार के पैर, होंठ और दाढ़ों वाले, तथा नाना प्रकार के हाथ और गर्दन वाले,

श्लोक 103 (9.46.103)

नानाचर्मभिराच्छन्ना नानाभाषाश्च भारत । कुशला देशभाषासु जल्पन्तोऽन्योन्यमीश्वराः ॥

nānācarmabhirācchannā nānābhāṣāśca bhārata | kuśalā deśabhāṣāsu jalpanto'nyonyamīśvarāḥ

नाना प्रकार के चर्मों से ढके हुए, नाना भाषाएँ बोलने वाले, हे भारत! देश-देश की भाषाओं में निपुण, आपस में बातें करते हुए वे ईश्वर-तुल्य गण,

श्लोक 104 (9.46.104)

हृष्टाः परिपतन्ति स्म महापारिषदास्तथा । दीर्घग्रीवा दीर्घनखा दीर्घपादशिरोभुजाः ॥

hṛṣṭāḥ paripatanti sma mahāpāriṣadāstathā | dīrghagrīvā dīrghanakhā dīrghapādaśirobhujāḥ

हर्षित होकर वे महापार्षद उछल-कूद रहे थे; लम्बी गर्दन, लम्बे नख, लम्बे पैर, लम्बे सिर और लम्बी भुजाओं वाले,

श्लोक 105 (9.46.105)

पिङ्गाक्षा नीलकण्ठाश्च लम्बकर्णाश्च भारत । वृकोदरनिभाश्चैव केचिदञ्जनसन्निभाः ॥

piṅgākṣā nīlakaṇṭhāśca lambakarṇāśca bhārata | vṛkodaranibhāścaiva kecidañjanasannibhāḥ

पीली आँखों वाले, नीले कण्ठवाले, लम्बे कानों वाले, हे भारत, कुछ भेड़िये जैसे पेट वाले, कुछ काजल जैसे काले,

श्लोक 106 (9.46.106)

श्वेताक्षा लोहितग्रीवाः पिङ्गाक्षाश्च तथा परे । कल्माषा बहवो राजंश्चित्रवर्णाश्च भारत ॥

śvetākṣā lohitagrīvāḥ piṅgākṣāśca tathā pare | kalmāṣā bahavo rājaṃścitravarṇāśca bhārata

सफ़ेद आँखों वाले, लाल गर्दन वाले और अन्य पीली आँखों वाले, बहुत-से चितकबरे, हे राजन्, और रंग-बिरंगे, हे भारत,

श्लोक 107 (9.46.107)

चामरापीडकनिभाः श्वेतलोहितराजयः । नानावर्णाः सवर्णाश्च मयूरसदृशप्रभाः ॥

cāmarāpīḍakanibhāḥ śvetalohitarājayaḥ | nānāvarṇāḥ savarṇāśca mayūrasadṛśaprabhāḥ

चँवर के गुच्छों जैसे, श्वेत और लाल रेखाओं से चिह्नित, नाना रंगों के और एक रंग के, मोर के समान आभा वाले।

श्लोक 108 (9.46.108)

पुनः प्रहरणान्येषां कीर्त्यमानानि मे शृणु । शेषैः कृतः पारिषदैरायुधानां परिग्रहः ॥

punaḥ praharaṇānyeṣāṃ kīrtyamānāni me śṛṇu | śeṣaiḥ kṛtaḥ pāriṣadairāyudhānāṃ parigrahaḥ

अब फिर उनके शस्त्रों के विषय में सुनो, जो मैं बता रहा हूँ। शेष पार्षदों ने आयुध धारण किए थे।

श्लोक 109 (9.46.109)

पाशोद्यतकराः केचिद्व्यादितास्याः खराननाः । पृष्ठाक्षा नीलकण्ठाश्च तथा परिघबाहवः ॥

pāśodyatakarāḥ kecidvyāditāsyāḥ kharānanāḥ | pṛṣṭhākṣā nīlakaṇṭhāśca tathā parighabāhavaḥ

कुछ हाथों में फंदे उठाए थे, मुख फाड़े हुए गधे के मुखवाले, पीठ में आँखों वाले, नीले कण्ठवाले और लोहे के डंडों जैसी भुजाओं वाले थे,

श्लोक 110 (9.46.110)

शतघ्नीचक्रहस्ताश्च तथा मुसलपाणयः । असिमुद्गरहस्ताश्च दण्डहस्ताश्च भारत ॥

śataghnīcakrahastāśca tathā musalapāṇayaḥ | asimudgarahastāśca daṇḍahastāśca bhārata

कुछ हाथों में शतघ्नी और चक्र लिए, कुछ मूसल लिए, तलवार और मुद्गर हाथ में लिए और दण्ड हाथ में लिए, हे भारत,

श्लोक 111 (9.46.111)

गदाभुशुण्डिहस्ताश्च तथा तोमरपाणयः । आयुधैर्विविधैर्घोरैर्महात्मानो महाजवाः ॥

gadābhuśuṇḍihastāśca tathā tomarapāṇayaḥ | āyudhairvividhairghorairmahātmāno mahājavāḥ

हाथों में गदा और भुशुण्डी लिए तथा तोमर लिए, महात्मा और अत्यन्त वेगवान्, नाना भयंकर आयुध धारण किए,

श्लोक 112 (9.46.112)

महाबला महावेगा महापारिषदास्तथा । अभिषेकं कुमारस्य दृष्ट्वा हृष्टा रणप्रियाः ॥

mahābalā mahāvegā mahāpāriṣadāstathā | abhiṣekaṃ kumārasya dṛṣṭvā hṛṣṭā raṇapriyāḥ

महाबली, महावेगवान् वे महापार्षद, युद्धप्रेमी, कुमार का अभिषेक देखकर हर्षित हुए,

श्लोक 113 (9.46.113)

घण्टाजालपिनद्धाङ्गा ननृतुस्ते महौजसः । एते चान्ये च बहवो महापारिषदा नृप ॥

ghaṇṭājālapinaddhāṅgā nanṛtuste mahaujasaḥ | ete cānye ca bahavo mahāpāriṣadā nṛpa

घण्टों के जाल से अङ्गों को ढके हुए वे महापराक्रमी नाच उठे। हे राजन्! ये और अन्य बहुत-से महापार्षद

श्लोक 114 (9.46.114)

उपतस्थुर्महात्मानं कार्तिकेयं यशस्विनम् । दिव्याश्चाप्यान्तरिक्षाश्च पार्थिवाश्चानिलोपमाः ॥

upatasthurmahātmānaṃ kārtikeyaṃ yaśasvinam | divyāścāpyāntarikṣāśca pārthivāścānilopamāḥ

महात्मा और यशस्वी कार्तिकेय की सेवा में उपस्थित हुए। दिव्य, अन्तरिक्ष के और पृथ्वी के, वायु के समान वेगवान्,

श्लोक 115 (9.46.115)

व्यादिष्टा दैवतैः शूराः स्कन्दस्यानुचराऽभवन् । तादृशानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च । अभिषिक्तं महात्मानं परिवार्योपतस्थिरे ॥

vyādiṣṭā daivataiḥ śūrāḥ skandasyānucarā'bhavan | tādṛśānāṃ sahasrāṇi prayutānyarbudāni ca | abhiṣiktaṃ mahātmānaṃ parivāryopatasthire

देवताओं द्वारा नियुक्त किए गए वे शूर स्कन्द के अनुचर बन गए। ऐसे हज़ारों, प्रयुत और अर्बुद गण अभिषिक्त महात्मा स्कन्द को घेरकर उनकी सेवा में उपस्थित रहे।

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