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शल्य पर्व · अध्याय 55

बलराम को गदायुद्ध का समाचार

कुरुक्षेत्र दर्शन के बाद बलराम एक पुण्य आश्रम में जाते हैं, जहाँ के ऋषि उन्हें शाण्डिल्य की उस वृद्ध ब्राह्मण कन्या की बात बताते हैं जो यहीं से स्वर्ग गई थी। वे सरस्वती के उद्गम तक चढ़ते हैं, कारपचन में स्नान करते हैं और मित्र-वरुण के आश्रम जाते हैं, जहाँ नारद आकर उन्हें बताते हैं कि कौन-कौन मारे गए, दुर्योधन की सेना में केवल कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा शेष हैं, और अब दुर्योधन सरोवर से निकलकर भीम से लड़ने आया है। बलराम सरस्वती की स्तुति में एक श्लोक गाते हैं और अपने दोनों शिष्यों का युद्ध देखने रथ से चल पड़ते हैं। इसके बाद धृतराष्ट्र सञ्जय से पूछते हैं कि उनके पुत्र ने भीम का सामना कैसे किया।

अध्याय 54अध्याय-सूचीअध्याय 56

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 1 (9.55.1)

कुरुक्षेत्रं ततो दृष्ट्वा दत्त्वा देयांश्च सात्वतः । आश्रमं सुमहत्पुण्यमगमज्जनमेजय ॥

kurukṣetraṃ tato dṛṣṭvā dattvā deyāṃśca sātvataḥ | āśramaṃ sumahatpuṇyamagamajjanamejaya

हे जनमेजय! तब कुरुक्षेत्र का दर्शन करके और देने योग्य दान देकर सात्वत (बलराम) एक विशाल और पवित्र आश्रम में पहुँचे।

श्लोक 2 (9.55.2)

मधूकाम्रवणोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसङ्कुलम् । चिरबिल्वयुतं पुण्यं पनसार्जुनसङ्कुलम् ॥

madhūkāmravaṇopetaṃ plakṣanyagrodhasaṅkulam | cirabilvayutaṃ puṇyaṃ panasārjunasaṅkulam

वह आश्रम महुआ और आम के वनों से युक्त था, प्लक्ष और वट के वृक्षों से भरा था, चिरबिल्व से सम्पन्न और पवित्र था, तथा कटहल और अर्जुन वृक्षों से घना था।

श्लोक 3 (9.55.3)

तं दृष्ट्वा यादवश्रेष्ठः प्रवरं पुण्यलक्षणम् । पप्रच्छ तानृषीन्सर्वान्कस्याश्रमवरस्त्वयम् ॥

taṃ dṛṣṭvā yādavaśreṣṭhaḥ pravaraṃ puṇyalakṣaṇam | papraccha tānṛṣīnsarvānkasyāśramavarastvayam

पुण्य के लक्षणों से युक्त उस उत्तम स्थान को देखकर यादवश्रेष्ठ ने उन सब ऋषियों से पूछा — “यह श्रेष्ठ आश्रम किसका है?”

श्लोक 4 (9.55.4)

ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन्हलायुधम् । शृणु विस्तरशो राम यस्यायं पूर्वमाश्रमः ॥

te tu sarve mahātmānamūcū rājanhalāyudham | śṛṇu vistaraśo rāma yasyāyaṃ pūrvamāśramaḥ

हे राजन्! उन सबने महात्मा हलायुध से कहा — “हे राम! विस्तार से सुनिए, यह आश्रम पहले किसका था।

श्लोक 5 (9.55.5)

अत्र विष्णुः पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम् । अत्रास्य विधिवद्यज्ञाः सर्वे वृत्ताः सनातनाः ॥

atra viṣṇuḥ purā devastaptavāṃstapa uttamam | atrāsya vidhivadyajñāḥ sarve vṛttāḥ sanātanāḥ

यहाँ प्राचीन काल में देव विष्णु ने उत्तम तप किया था; यहीं उनके सब सनातन यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न हुए थे।

श्लोक 6 (9.55.6)

अत्रैव ब्राह्मणी वृद्धा कौमारब्रह्मचारिणी । योगयुक्ता दिवं याता तपोयुक्ता विशाम्पते ॥

atraiva brāhmaṇī vṛddhā kaumārabrahmacāriṇī | yogayuktā divaṃ yātā tapoyuktā viśāmpate

यहीं एक वृद्ध ब्राह्मणी, जो कुमारावस्था से ब्रह्मचारिणी थी, योग और तप से युक्त होकर स्वर्ग गई थी, हे प्रजापालक!

श्लोक 7 (9.55.7)

बभूव श्रीमती राजञ्शाण्डिल्यस्य महात्मनः । सुता धृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी ॥

babhūva śrīmatī rājañśāṇḍilyasya mahātmanaḥ | sutā dhṛtavratā sādhvī niyatā brahmacāriṇī

हे राजन्! वह महात्मा शाण्डिल्य की तेजस्विनी पुत्री थी — दृढ़ व्रत वाली, साध्वी, संयमी और ब्रह्मचारिणी।

श्लोक 8 (9.55.8)

साऽपि प्राप्य परं योगं गता स्वर्गमनुत्तमम् । भुक्त्वाऽश्रमेऽश्वमेधस्य फलं फलवतः शुभम् ॥

sā'pi prāpya paraṃ yogaṃ gatā svargamanuttamam | bhuktvā'śrame'śvamedhasya phalaṃ phalavataḥ śubham

वह भी परम योग को प्राप्त होकर, आश्रम में पुण्यवान् अश्वमेध के शुभ फल का भोग करके सर्वोत्तम स्वर्ग को गई।

श्लोक 9 (9.55.9)

गता स्वर्गं महाराज पूजिता च महात्मभिः । अभिगम्याश्रमं पुण्यं स दृष्ट्वा यदुनन्दनः ॥

gatā svargaṃ mahārāja pūjitā ca mahātmabhiḥ | abhigamyāśramaṃ puṇyaṃ sa dṛṣṭvā yadunandanaḥ

हे महाराज! वह महात्माओं से पूजित होकर स्वर्ग गई। उस पुण्य आश्रम में आकर और उसे देखकर यदुनन्दन ने

श्लोक 10 (9.55.10)

ऋषींस्तानभिवाद्याथ पार्श्वे हिमवतोऽच्युतः । सन्ध्याकार्याणि सर्वाणि निर्वर्त्यारुरुहेऽचलम् ॥

ṛṣīṃstānabhivādyātha pārśve himavato'cyutaḥ | sandhyākāryāṇi sarvāṇi nirvartyāruruhe'calam

उन ऋषियों को प्रणाम किया, और हिमालय के पार्श्व में अच्युत ने सब सन्ध्याकर्म पूरे करके पर्वत पर चढ़ाई की।

श्लोक 11 (9.55.11)

नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो बली । पुण्ये तीर्थवरे स्नात्वा विस्मयं परमं गतः ॥

nātidūraṃ tato gatvā nagaṃ tāladhvajo balī | puṇye tīrthavare snātvā vismayaṃ paramaṃ gataḥ

पर्वत की ओर अधिक दूर न जाकर बलशाली तालध्वज ने श्रेष्ठ पवित्र तीर्थ में स्नान किया और वे बहुत विस्मित हुए।

श्लोक 12 (9.55.12)

प्रभवं च सरस्वत्याः प्लक्षप्रस्रवणं बलः । सम्प्राप्तः कारपचनं तीर्थप्रवरमुत्तमम् ॥

prabhavaṃ ca sarasvatyāḥ plakṣaprasravaṇaṃ balaḥ | samprāptaḥ kārapacanaṃ tīrthapravaramuttamam

बलराम सरस्वती के उद्गम प्लक्षप्रस्रवण पहुँचे और फिर श्रेष्ठ तथा उत्तम तीर्थ कारपचन में आए।

श्लोक 13 (9.55.13)

हलायुधस्तु तत्रापि दत्त्वा दानं महाबलः । आप्लुतः सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ । सन्तर्पयामास पितॄन्देवांश्च रणदुर्मदः ॥

halāyudhastu tatrāpi dattvā dānaṃ mahābalaḥ | āplutaḥ salile puṇye suśīte vimale śucau | santarpayāmāsa pitṝndevāṃśca raṇadurmadaḥ

वहाँ भी महाबली हलायुध ने दान दिया और पवित्र, अत्यन्त शीतल, निर्मल और शुद्ध जल में स्नान किया; युद्ध में उग्र उन्होंने पितरों और देवताओं को तृप्त किया।

श्लोक 14 (9.55.14)

तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्ब्राह्मणैः सह । मित्रावरुणयोः पुण्यं जगामाश्रममच्युतः ॥

tatroṣyaikāṃ tu rajanīṃ yatibhirbrāhmaṇaiḥ saha | mitrāvaruṇayoḥ puṇyaṃ jagāmāśramamacyutaḥ

वहाँ तपस्वियों और ब्राह्मणों के साथ एक रात रहकर अच्युत मित्र और वरुण के पवित्र आश्रम को गए।

श्लोक 15 (9.55.15)

इन्द्रोऽग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक् प्रीतिमाप्नुवन् । तं देशं कारपचनात्स तस्मादाजगाम ह ॥

indro'gniraryamā caiva yatra prāk prītimāpnuvan | taṃ deśaṃ kārapacanātsa tasmādājagāma ha

जहाँ पहले इन्द्र, अग्नि और अर्यमा ने आनन्द पाया था, उस स्थान पर वे कारपचन से आए।

श्लोक 16 (9.55.16)

स्नात्वा तत्र च धर्मात्मा परां प्रीतिमवाप्य च । ऋषिभिश्चैव सिद्धैश्च सहितो वै महाबलः । उपविष्टः कथाः शुभ्राः शुश्राव यदुपुङ्गवः ॥

snātvā tatra ca dharmātmā parāṃ prītimavāpya ca | ṛṣibhiścaiva siddhaiśca sahito vai mahābalaḥ | upaviṣṭaḥ kathāḥ śubhrāḥ śuśrāva yadupuṅgavaḥ

वहाँ भी स्नान करके धर्मात्मा और महाबली यदुश्रेष्ठ परम प्रसन्न होकर ऋषियों और सिद्धों के साथ बैठे और उज्ज्वल कथाएँ सुनते रहे।

श्लोक 17 (9.55.17)

तथा तु तिष्ठतां तेषां नारदो भगवानृषिः । आजगामाथ तं देशं यत्र रामो व्यवस्थितः ॥

tathā tu tiṣṭhatāṃ teṣāṃ nārado bhagavānṛṣiḥ | ājagāmātha taṃ deśaṃ yatra rāmo vyavasthitaḥ

जब वे इस प्रकार बैठे थे, तब भगवान् ऋषि नारद उस स्थान पर आए जहाँ राम विराजमान थे।

श्लोक 18 (9.55.18)

जटामण्डलसंवीतः कुशचीरी महातपाः । हेमदण्डधरो राजन्कमण्डलुधरस्तथा ॥

jaṭāmaṇḍalasaṃvītaḥ kuśacīrī mahātapāḥ | hemadaṇḍadharo rājankamaṇḍaludharastathā

हे राजन्! वे जटाओं से घिरे थे, कुश के चीर पहने थे, महातपस्वी थे, सोने का दण्ड और कमण्डलु धारण किए थे,

श्लोक 19 (9.55.19)

महतीं सुखशब्दां तां गृह्य वीणां मनोरमाम् । नृत्ये गीते च कुशलो देवब्राह्मणपूजितः ॥

mahatīṃ sukhaśabdāṃ tāṃ gṛhya vīṇāṃ manoramām | nṛtye gīte ca kuśalo devabrāhmaṇapūjitaḥ

सुखद ध्वनि वाली मनोहर बड़ी वीणा हाथ में लिए, नृत्य और गीत में कुशल, देवताओं और ब्राह्मणों से पूजित,

श्लोक 20 (9.55.20)

प्रभवः कलहानां च नित्यं च कलहप्रियः । तं देशमगमद्यत्र श्रीमान्रामो व्यवस्थितः ॥

prabhavaḥ kalahānāṃ ca nityaṃ ca kalahapriyaḥ | taṃ deśamagamadyatra śrīmānrāmo vyavasthitaḥ

कलहों के उद्गम और सदा कलहप्रिय वे उस स्थान पर आए जहाँ श्रीमान् राम विराजमान थे।

श्लोक 21 (9.55.21)

प्रत्युत्थाय च तं रामः पूजयित्वा यतव्रतम् । देवर्षिं पर्यपृच्छत्स यथावृत्तं कुरून्प्रति ॥

pratyutthāya ca taṃ rāmaḥ pūjayitvā yatavratam | devarṣiṃ paryapṛcchatsa yathāvṛttaṃ kurūnprati

राम ने उठकर कठोर व्रत वाले उन देवर्षि का सत्कार किया और कुरुओं का जैसा वृत्तान्त था, उसके विषय में उनसे पूछा।

श्लोक 22 (9.55.22)

तदाऽस्याकथयद्राजन्नारदः सर्ववेदवित् । सर्वमेतद्यथावृत्तमतीतं कुरुसंक्षयम् ॥

tadā'syākathayadrājannāradaḥ sarvavedavit | sarvametadyathāvṛttamatītaṃ kurusaṃkṣayam

तब हे राजन्! सब वेदों के ज्ञाता नारद ने उन्हें सब कुछ जैसा हुआ था वैसा बताया — कुरुओं का वह बीता हुआ संहार।

श्लोक 23 (9.55.23)

ततोऽब्रवीद्रौहिणेयो नारदं दीनया गिरा । किमवस्थं तु तत्क्षत्रं ये तु तत्राभवन्नृपाः ॥

tato'bravīdrauhiṇeyo nāradaṃ dīnayā girā | kimavasthaṃ tu tatkṣatraṃ ye tu tatrābhavannṛpāḥ

तब रोहिणी-पुत्र ने दीन वाणी में नारद से कहा — “क्षत्रियों की वह जाति अब किस दशा में है, और वहाँ जो राजा थे उनका क्या हुआ?

राम उवाच

श्लोक 24 (9.55.24)

श्रुतमेतन्मया पूर्वं सर्वमेव तपोधन । विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे ॥

śrutametanmayā pūrvaṃ sarvameva tapodhana | vistaraśravaṇe jātaṃ kautūhalamatīva me

हे तपोधन! मैंने यह सब पहले सुना था; पर अब विस्तार से सुनने की मुझे बड़ी उत्सुकता हो गई है।”

नारद उवाच

श्लोक 25 (9.55.25)

पूर्वमेव हतो भीष्मो द्रोणः सिन्धुपतिस्तथा । हतो वैकर्तनः कर्णः पुत्राश्चास्य महारथाः ॥

pūrvameva hato bhīṣmo droṇaḥ sindhupatistathā | hato vaikartanaḥ karṇaḥ putrāścāsya mahārathāḥ

“पहले ही भीष्म मारे गए, द्रोण मारे गए, और वैसे ही सिन्धुराज भी; वैकर्तन कर्ण मारा गया और उसके महारथी पुत्र भी।

श्लोक 26 (9.55.26)

भूरिश्रवा रौहिणेय मद्रराजश्च वीर्यवान् । एते चान्ये च बहवो हतास्तत्र महाबलाः ॥

bhūriśravā rauhiṇeya madrarājaśca vīryavān | ete cānye ca bahavo hatāstatra mahābalāḥ

हे रौहिणेय! भूरिश्रवा और पराक्रमी मद्रराज — ये और अन्य बहुत-से महाबली वहाँ मारे गए।

श्लोक 27 (9.55.27)

प्रियान्प्राणान्परित्यज्य प्रियार्थं कौरवस्य वै । राजानो राजपुत्राश्च समरेष्वनिवर्तिनः ॥

priyānprāṇānparityajya priyārthaṃ kauravasya vai | rājāno rājaputrāśca samareṣvanivartinaḥ

कौरव के प्रिय कार्य के लिए अपने प्रिय प्राण त्यागकर राजा और राजकुमार, जो युद्धों में कभी पीछे नहीं हटते थे, वहाँ मारे गए।

श्लोक 28 (9.55.28)

अहतांस्तु महाबाहो शृणु मे तत्र माधव ॥

ahatāṃstu mahābāho śṛṇu me tatra mādhava

हे महाबाहो माधव! अब मुझसे उनके विषय में सुनिए जो मारे नहीं गए।

श्लोक 29 (9.55.29)

धार्तराष्ट्रबले शेषास्त्रयः समितिमर्दनाः । कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्च वीर्यवान् । तेऽपि वै विद्रुता राम दिशो दश भयात्तदा ॥

dhārtarāṣṭrabale śeṣāstrayaḥ samitimardanāḥ | kṛpaśca kṛtavarmā ca droṇaputraśca vīryavān | te'pi vai vidrutā rāma diśo daśa bhayāttadā

धृतराष्ट्र की सेना में युद्ध को कुचल देने वाले तीन ही शेष हैं — कृप, कृतवर्मा और पराक्रमी द्रोणपुत्र। हे राम! वे भी भय से दसों दिशाओं में भाग गए।

श्लोक 30 (9.55.30)

दुर्योधनो हते सैन्ये विद्रुतेषु पदातिषु । ह्रदं द्वैपायनं नाम विवेश भृशदुःखितः ॥

duryodhano hate sainye vidruteṣu padātiṣu | hradaṃ dvaipāyanaṃ nāma viveśa bhṛśaduḥkhitaḥ

सेना के मारे जाने और पैदल सैनिकों के भाग जाने पर अत्यन्त दुःखी दुर्योधन द्वैपायन नामक ह्रद (सरोवर) में घुस गया।

श्लोक 31 (9.55.31)

शयानं धार्तराष्ट्रं तु सलिले स्तम्भिते तदा । पाण्डवाः सह कृष्णेन वाग्भिरुग्राभिरार्दयन् ॥

śayānaṃ dhārtarāṣṭraṃ tu salile stambhite tadā | pāṇḍavāḥ saha kṛṣṇena vāgbhirugrābhirārdayan

जब धृतराष्ट्र का पुत्र जल को स्तम्भित करके उसमें लेटा था, तब पाण्डवों ने कृष्ण के साथ कठोर वाणी से उसे पीड़ित किया।

श्लोक 32 (9.55.32)

स तुद्यमानो बलवान्वाग्भी राम समन्ततः । उत्थितः स ह्रदाद्वीरः प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥

sa tudyamāno balavānvāgbhī rāma samantataḥ | utthitaḥ sa hradādvīraḥ pragṛhya mahatīṃ gadām

हे राम! चारों ओर से उन वचनों से बींधा जाता हुआ वह बलवान् वीर अपनी विशाल गदा लेकर सरोवर से उठ खड़ा हुआ।

श्लोक 33 (9.55.33)

स चाप्युपागतो योद्धुं भीमेन सह साम्प्रतम् । भविष्यति तयोरद्य युद्धं राम सुदारुणम् ॥

sa cāpyupāgato yoddhuṃ bhīmena saha sāmpratam | bhaviṣyati tayoradya yuddhaṃ rāma sudāruṇam

और अब वह भीम से युद्ध करने आ गया है; हे राम! आज उन दोनों में अत्यन्त भयंकर युद्ध होगा।

श्लोक 34 (9.55.34)

यदि कौतूहलं तेऽस्ति व्रज माधव मा चिरम् । पश्य युद्धं महाघोरं शिष्ययोर्यदि मन्यसे ॥

yadi kautūhalaṃ te'sti vraja mādhava mā ciram | paśya yuddhaṃ mahāghoraṃ śiṣyayoryadi manyase

हे माधव! यदि आपको कौतूहल है तो देर न कीजिए, जाइए। यदि उचित समझें तो अपने दोनों शिष्यों का यह महाघोर युद्ध देखिए।”

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 35 (9.55.35)

नारदस्य वचः श्रुत्वा तानभ्यर्च्य द्विजर्षभान् । सर्वान्विसर्जयामास ये तेनाभ्यागताः सह । गम्यतां द्वारकां चेति सोऽन्वशादनुयायिनः ॥

nāradasya vacaḥ śrutvā tānabhyarcya dvijarṣabhān | sarvānvisarjayāmāsa ye tenābhyāgatāḥ saha | gamyatāṃ dvārakāṃ ceti so'nvaśādanuyāyinaḥ

नारद की बात सुनकर उन्होंने उन द्विजश्रेष्ठों का सत्कार किया, और अपने साथ आए सब अनुयायियों को विदा करते हुए आज्ञा दी — “द्वारका जाओ।”

श्लोक 36 (9.55.36)

सोऽवतीर्याचलश्रेष्ठात्प्लक्षप्रस्रवणाच्छुभात् । ततः प्रीतमना रामः श्रुत्वा तीर्थफलं महत् । विप्राणां सन्निधौ श्लोकमगायदिममच्युतः ॥

so'vatīryācalaśreṣṭhātplakṣaprasravaṇācchubhāt | tataḥ prītamanā rāmaḥ śrutvā tīrthaphalaṃ mahat | viprāṇāṃ sannidhau ślokamagāyadimamacyutaḥ

तब उस तीर्थ के महान् फल को सुनकर प्रसन्न मन से राम उस श्रेष्ठ पर्वत, पवित्र प्लक्षप्रस्रवण से उतरे और ब्राह्मणों की उपस्थिति में अच्युत ने यह श्लोक गाया —

राम उवाच

श्लोक 37 (9.55.37)

सरस्वतीवाससमा कुतो रतिः । सरस्वतीवाससमाः कुतो गुणाः । सरस्वतीं प्राप्य दिवं गता जनाः । सदा स्मरिष्यन्ति नदीं सरस्वतीम् ॥

sarasvatīvāsasamā kuto ratiḥ | sarasvatīvāsasamāḥ kuto guṇāḥ | sarasvatīṃ prāpya divaṃ gatā janāḥ | sadā smariṣyanti nadīṃ sarasvatīm

“सरस्वती के तट पर निवास के समान आनन्द कहाँ है? सरस्वती के तट पर निवास के समान गुण कहाँ हैं? सरस्वती को पाकर स्वर्ग गए लोग सदा सरस्वती नदी का स्मरण करेंगे।

श्लोक 38 (9.55.38)

सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या । सरस्वती लोकशुभावहा सदा । सरस्वतीं प्राप्य जनाः सुदुष्कृतं । सदा न शोचन्ति परत्र चेह च ॥

sarasvatī sarvanadīṣu puṇyā | sarasvatī lokaśubhāvahā sadā | sarasvatīṃ prāpya janāḥ suduṣkṛtaṃ | sadā na śocanti paratra ceha ca

सरस्वती सब नदियों में पुण्यतम है; सरस्वती सदा संसार का कल्याण करने वाली है। सरस्वती को पाकर लोग, चाहे उनके पाप कितने ही बड़े हों, न परलोक में शोक करते हैं, न इस लोक में।”

वैशम्पायन उवाच

श्लोक 39 (9.55.39)

ततो मुहुर्मुहुः प्रीत्या प्रेक्षमाणः सरस्वतीम् । हयैर्युक्तं रथं शुभ्रमारुरोह परन्तपः ॥

tato muhurmuhuḥ prītyā prekṣamāṇaḥ sarasvatīm | hayairyuktaṃ rathaṃ śubhramāruroha parantapaḥ

तब बार-बार प्रेम से सरस्वती को निहारते हुए शत्रुओं को तपाने वाले बलराम घोड़ों से जुते अपने उज्ज्वल रथ पर चढ़ गए।

श्लोक 40 (9.55.40)

स शीघ्रगामिना तेन रथेन यदुपुङ्गवः । दिदृक्षुरभिसम्प्राप्तः शिष्ययुद्धमुपस्थितम् ॥

sa śīghragāminā tena rathena yadupuṅgavaḥ | didṛkṣurabhisamprāptaḥ śiṣyayuddhamupasthitam

उस तेज़ चलने वाले रथ से यदुश्रेष्ठ देखने की इच्छा से वहाँ पहुँचे जहाँ उनके शिष्यों का युद्ध आरम्भ होने को था।

श्लोक 41 (9.55.41)

एवं तदभवद्युद्धं तुमुलं जनमेजय । यत्र दुःखान्वितो राजा धृतराष्ट्रोऽब्रवीदिदम् ॥

evaṃ tadabhavadyuddhaṃ tumulaṃ janamejaya | yatra duḥkhānvito rājā dhṛtarāṣṭro'bravīdidam

हे जनमेजय! इस प्रकार वह भयंकर युद्ध हुआ, जिसके विषय में दुःख से भरे राजा धृतराष्ट्र ने यह कहा —

धृतराष्ट्र उवाच

श्लोक 42 (9.55.42)

रामं सन्निहितं श्रुत्वा गदायुद्ध उपस्थिते । मम पुत्रः कथं भीमं प्रत्ययुध्यत सञ्जय ॥

rāmaṃ sannihitaṃ śrutvā gadāyuddha upasthite | mama putraḥ kathaṃ bhīmaṃ pratyayudhyata sañjaya

“सञ्जय! यह सुनकर कि राम समीप पहुँच गए हैं और गदायुद्ध आरम्भ होने को है, मेरे पुत्र ने भीम का सामना कैसे किया?”

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