शल्य पर्व · अध्याय 54
कुरुक्षेत्र की महिमा
ऋषि बलराम को बताते हैं कि प्रजापति की उत्तरवेदी कुरुक्षेत्र इतना पवित्र क्यों है: राजर्षि कुरु ने वर्षों तक उग्र तप के साथ इसे जोता; इन्द्र के उपहास करने पर और यज्ञों में अपना भाग खो देने की देवताओं की चिन्ता पर इन्द्र ने उन्हें वर दिया कि यहाँ निराहार रहकर या युद्ध में मरने वाले सभी स्वर्ग पाएँगे। ऋषि इस स्थान के अन्य फल, कुरुक्षेत्र की धूल पर इन्द्र की गाथा, इस पवित्र भूमि की सीमाएँ और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर की स्वीकृति भी बताते हैं।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 1 (9.54.1)
प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते । सनातनं राम समन्तपञ्चकम् । समीजिरे यत्र पुरा दिवौकसो । वरेण सत्रेण महावरप्रदाः ॥
prajāpateruttaravedirucyate | sanātanaṃ rāma samantapañcakam | samījire yatra purā divaukaso | vareṇa satreṇa mahāvarapradāḥ
हे राम! इसे प्रजापति की उत्तरवेदी कहा जाता है; यह सनातन समन्तपञ्चक है, जहाँ प्राचीन काल में महान् वर देने वाले देवताओं ने उत्तम सत्र (यज्ञ) किया था।
श्लोक 2 (9.54.2)
पुरा च राजर्षिवरेण धीमता । बहूनि वर्षाण्यमितेन तेजसा । प्रकृष्टमेतत्कुरुणा महात्मना । ततः कुरुक्षेत्रमितीह पप्रथे ॥
purā ca rājarṣivareṇa dhīmatā | bahūni varṣāṇyamitena tejasā | prakṛṣṭametatkuruṇā mahātmanā | tataḥ kurukṣetramitīha paprathe
और प्राचीन काल में बुद्धिमान्, अपरिमित तेज वाले महात्मा राजर्षि कुरु ने बहुत वर्षों तक इसे जोता; इसी से यह यहाँ कुरुक्षेत्र नाम से प्रसिद्ध हुआ।
राम उवाच
श्लोक 3 (9.54.3)
किमर्थं कुरुणा कृष्टं क्षेत्रमेतन्महात्मना । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कथ्यमानं तपोधनाः ॥
kimarthaṃ kuruṇā kṛṣṭaṃ kṣetrametanmahātmanā | etadicchāmyahaṃ śrotuṃ kathyamānaṃ tapodhanāḥ
महात्मा कुरु ने इस क्षेत्र को किसलिए जोता? हे तपोधनो! मैं यह सुनना चाहता हूँ; कृपया बताइए।
ऋषय ऊचुः
श्लोक 4 (9.54.4)
पुरा किल कुरुं राम कर्षन्तं सततोत्थितम् । अभ्येत्य शक्रस्त्रिदिवात्पर्यपृच्छत कारणम् ॥
purā kila kuruṃ rāma karṣantaṃ satatotthitam | abhyetya śakrastridivātparyapṛcchata kāraṇam
हे राम! बहुत पहले की बात है, निरन्तर उद्यत रहकर हल चलाते हुए कुरु के पास इन्द्र स्वर्ग से आए और उन्होंने कारण पूछा —
इन्द्र उवाच
श्लोक 5 (9.54.5)
किमिदं वर्तते कर्म प्रयत्नेन परेण च । राजर्षे किमभिप्रेत्य येनेयं कृष्यते क्षितिः ॥
kimidaṃ vartate karma prayatnena pareṇa ca | rājarṣe kimabhipretya yeneyaṃ kṛṣyate kṣitiḥ
“तुम यह कौन-सा कर्म इतने महान् प्रयत्न से कर रहे हो? हे राजर्षे! किस उद्देश्य से तुम इस भूमि को जोत रहे हो?”
कुरुरुवाच
श्लोक 6 (9.54.6)
इह ये पुरुषाः क्षेत्रे जनिष्यन्ति शतक्रतो । ते गमिष्यन्ति सुकृतां लोकान्पापविवर्जितान् ॥
iha ye puruṣāḥ kṣetre janiṣyanti śatakrato | te gamiṣyanti sukṛtāṃ lokānpāpavivarjitān
“हे शतक्रतो! जो मनुष्य इस क्षेत्र में उत्पन्न होंगे, वे पापरहित पुण्यात्माओं के लोकों में जाएँगे।”
ऋषय ऊचुः
श्लोक 7 (9.54.7)
अपहास्य तु तं शक्रो जगाम त्रिदिवं पुनः । राजर्षिरप्यनिर्विण्णः कर्षत्येव वसुन्धराम् ॥
apahāsya tu taṃ śakro jagāma tridivaṃ punaḥ | rājarṣirapyanirviṇṇaḥ karṣatyeva vasundharām
इन्द्र उनका उपहास करके फिर स्वर्ग लौट गए; और राजर्षि निर्बाध रूप से पृथ्वी को जोतते ही रहे।
श्लोक 8 (9.54.8)
आगम्यागम्य चैवैनं भूयोभूयोऽपहास्य च । शतक्रतुरनिर्विण्णं पृष्ट्वापृष्ट्वा जगाम ह ॥
āgamyāgamya caivainaṃ bhūyobhūyo'pahāsya ca | śatakraturanirviṇṇaṃ pṛṣṭvāpṛṣṭvā jagāma ha
शतक्रतु बार-बार आकर और बार-बार उपहास करके, उस अविचलित राजर्षि से पूछ-पूछकर चले जाते थे।
श्लोक 9 (9.54.9)
यदा तु तपसोग्रेण चकर्ष वसुधां नृपः । ततः शक्रोऽब्रवीद्देवान्राजर्षेर्यच्चिकीर्षितम् ॥
yadā tu tapasogreṇa cakarṣa vasudhāṃ nṛpaḥ | tataḥ śakro'bravīddevānrājarṣeryaccikīrṣitam
जब राजा ने उग्र तप के साथ पृथ्वी को जोता, तब इन्द्र ने देवताओं को बता दिया कि राजर्षि क्या करना चाहते हैं।
श्लोक 10 (9.54.10)
एतच्छ्रुत्वाऽब्रुवन्देवाः सहस्राक्षमिदं वचः । वरेण च्छन्द्यतां शक्र राजर्षिर्यदि शक्यते ॥
etacchrutvā'bruvandevāḥ sahasrākṣamidaṃ vacaḥ | vareṇa cchandyatāṃ śakra rājarṣiryadi śakyate
यह सुनकर देवताओं ने सहस्राक्ष से यह कहा — “हे इन्द्र! यदि हो सके तो राजर्षि को वर देकर मना लीजिए।
देवा ऊचुः
श्लोक 11 (9.54.11)
यदि ह्यत्र प्रसूता वै स्वर्गं गच्छन्ति मानवाः । अस्माननिष्ट्वा क्रतुभिर्भागो नो न भविष्यति ॥
yadi hyatra prasūtā vai svargaṃ gacchanti mānavāḥ | asmānaniṣṭvā kratubhirbhāgo no na bhaviṣyati
यदि यहाँ उत्पन्न हुए मनुष्य स्वर्ग जाने लगें, तो यज्ञों से हमारी पूजा किए बिना ही वे जाएँगे, और हमारा भाग नहीं रहेगा।”
ऋषय ऊचुः
श्लोक 12 (9.54.12)
आगम्य च ततः शक्रस्तदा राजर्षिमब्रवीत् । अलं खेदेन भवतः क्रियतां वचनं मम ॥
āgamya ca tataḥ śakrastadā rājarṣimabravīt | alaṃ khedena bhavataḥ kriyatāṃ vacanaṃ mama
तब इन्द्र ने राजर्षि के पास आकर कहा — “अब तुम्हारा परिश्रम बहुत हुआ; मेरी बात मानो।
इन्द्र उवाच
श्लोक 13 (9.54.13)
मानवा ये निराहारा देहं त्यक्ष्यन्त्यतन्द्रिताः । युधि वा निहताः सम्यगपि तिर्यग्गता नृप ॥
mānavā ye nirāhārā dehaṃ tyakṣyantyatandritāḥ | yudhi vā nihatāḥ samyagapi tiryaggatā nṛpa
जो मनुष्य यहाँ निराहार रहकर, आलस्यरहित होकर शरीर छोड़ेंगे, अथवा युद्ध में भलीभाँति मारे जाएँगे, हे राजन्! या पशु-पक्षी की योनि में भी मरेंगे,
ऋषय ऊचुः
श्लोक 14 (9.54.14)
ते स्वर्गभाजो राजेन्द्र भवन्त्विह हतास्तु ये । तथास्त्विति ततो राजा कुरुः शक्रमुवाच ह ॥
te svargabhājo rājendra bhavantviha hatāstu ye | tathāstviti tato rājā kuruḥ śakramuvāca ha
हे राजेन्द्र! वे और जो यहाँ मारे जाएँगे, सभी स्वर्ग के भागी हों।” तब राजा कुरु ने इन्द्र से कहा — “ऐसा ही हो।”
श्लोक 15 (9.54.15)
ततस्तमभ्यनुज्ञाप्य प्रहृष्टेनान्तरात्मना । जगाम त्रिदिवं भूयः क्षिप्रं बलनिषूदनः ॥
tatastamabhyanujñāpya prahṛṣṭenāntarātmanā | jagāma tridivaṃ bhūyaḥ kṣipraṃ balaniṣūdanaḥ
उनकी अनुमति लेकर, प्रसन्न मन से बल का संहार करने वाले इन्द्र शीघ्र ही फिर स्वर्ग चले गए।
श्लोक 16 (9.54.16)
एवमेतद्यदुश्रेष्ठ कृष्टं राजर्षिणा पुरा । शक्रेण चाभ्यनुज्ञातः पुण्ये प्राणान्मुमोच ह ॥
evametadyaduśreṣṭha kṛṣṭaṃ rājarṣiṇā purā | śakreṇa cābhyanujñātaḥ puṇye prāṇānmumoca ha
हे यदुश्रेष्ठ! इस प्रकार राजर्षि ने प्राचीन काल में इसे जोता था; और इन्द्र की अनुमति से उन्होंने इस पुण्य क्षेत्र में प्राणों का त्याग किया।
श्लोक 17 (9.54.17)
शक्रेण चाभ्यनुज्ञातं ब्रह्माद्यैश्च सुरैस्तथा । नातः परतरं पुण्यं भूमेः स्थानं भविष्यति ॥
śakreṇa cābhyanujñātaṃ brahmādyaiśca suraistathā | nātaḥ parataraṃ puṇyaṃ bhūmeḥ sthānaṃ bhaviṣyati
इसे इन्द्र ने तथा ब्रह्मा आदि देवताओं ने भी अनुमोदित किया: इससे बढ़कर पुण्यमय स्थान पृथ्वी पर और कोई नहीं होगा।
श्लोक 18 (9.54.18)
इह तप्स्यन्ति ये केचित्तपः परमकं नराः । देहत्यागेन ते सर्वे यास्यन्ति ब्रह्मणः क्षयम् ॥
iha tapsyanti ye kecittapaḥ paramakaṃ narāḥ | dehatyāgena te sarve yāsyanti brahmaṇaḥ kṣayam
जो कोई मनुष्य यहाँ परम तप करेंगे, वे सब देहत्याग के द्वारा ब्रह्मलोक को जाएँगे।
श्लोक 19 (9.54.19)
ये पुनः पुण्यभाजो वै दानं दास्यन्ति मानवाः । तेषां सहस्रगुणितं भविष्यत्यचिरेण वै ॥
ye punaḥ puṇyabhājo vai dānaṃ dāsyanti mānavāḥ | teṣāṃ sahasraguṇitaṃ bhaviṣyatyacireṇa vai
और जो पुण्यशील मनुष्य यहाँ दान देंगे, उनका वह दान शीघ्र ही हज़ार गुना हो जाएगा।
श्लोक 20 (9.54.20)
ये चेह नित्यं मनुजा निवत्स्यन्ति शुभैषिणः । यमस्य विषयं ते तु न द्रक्ष्यन्ति कदाचन ॥
ye ceha nityaṃ manujā nivatsyanti śubhaiṣiṇaḥ | yamasya viṣayaṃ te tu na drakṣyanti kadācana
और जो कल्याण चाहने वाले मनुष्य यहाँ नित्य निवास करेंगे, वे कभी यमलोक को नहीं देखेंगे।
श्लोक 21 (9.54.21)
यक्ष्यन्ति ये च क्रतुभिर्महद्भिर्मनुजेश्वराः । तेषां त्रिविष्टपे वासो यावद्भूमिर्धरिष्यति ॥
yakṣyanti ye ca kratubhirmahadbhirmanujeśvarāḥ | teṣāṃ triviṣṭape vāso yāvadbhūmirdhariṣyati
और जो राजा यहाँ बड़े-बड़े यज्ञों से यजन करेंगे, उनका स्वर्ग में निवास तब तक रहेगा जब तक पृथ्वी टिकी रहेगी।
श्लोक 22 (9.54.22)
अपि चात्र स्वयं शक्रो जगौ गाथां सुराधिपः । कुरुक्षेत्रनिबद्धां वै तां शृणुष्व हलायुध ॥
api cātra svayaṃ śakro jagau gāthāṃ surādhipaḥ | kurukṣetranibaddhāṃ vai tāṃ śṛṇuṣva halāyudha
यहाँ स्वयं देवेश्वर इन्द्र ने कुरुक्षेत्र से सम्बद्ध एक गाथा गाई थी; हे हलधारी! उसे सुनिए।
इन्द्र उवाच
श्लोक 23 (9.54.23)
पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद्वायुना समुदीरिताः । अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥
pāṃsavo'pi kurukṣetrādvāyunā samudīritāḥ | api duṣkṛtakarmāṇaṃ nayanti paramāṃ gatim
“कुरुक्षेत्र की धूल भी, यदि वायु से उड़ाई जाए, तो पापकर्म करने वाले को भी परम गति तक पहुँचा देती है।
श्लोक 24 (9.54.24)
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् । इत्येवं निश्चितो भूत्वा तेन स्वर्गं गमिष्यति ॥
kurukṣetraṃ gamiṣyāmi kurukṣetre vasāmyaham | ityevaṃ niścito bhūtvā tena svargaṃ gamiṣyati
“मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा; मैं कुरुक्षेत्र में रहूँगा” — जो ऐसा निश्चय कर लेता है, वह उसी निश्चय से स्वर्ग जाएगा।
श्लोक 25 (9.54.25)
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् । तथा स्थानं च मौनं च वीरासनमुपास्महे ॥
kurukṣetraṃ gamiṣyāmi kurukṣetre vasāmyaham | tathā sthānaṃ ca maunaṃ ca vīrāsanamupāsmahe
“मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा; मैं कुरुक्षेत्र में रहूँगा” — इसी प्रकार हम स्थान, मौन और वीरासन का अभ्यास करते हैं।
श्लोक 26 (9.54.26)
एवं प्रलपमानोऽपि चिन्तयंश्च मुहुर्मुहुः । दूरस्थो यदि वा तिष्ठँल्लभेत्स्वर्गं सुनिश्चितम् ॥
evaṃ pralapamāno'pi cintayaṃśca muhurmuhuḥ | dūrastho yadi vā tiṣṭham̐llabhetsvargaṃ suniścitam
जो केवल यही बार-बार कहता और बार-बार इसका चिन्तन करता है, वह दूर रहता हो या समीप, निश्चय ही स्वर्ग पाएगा।”
ऋषय ऊचुः
श्लोक 27 (9.54.27)
सुरर्षभा ब्राह्मणसत्तमाश्च । तथा नृगाद्या नरदेवमुख्याः । इष्ट्वा महार्हैः क्रतुभिर्नृसिंह । सन्त्यज्य देहान्सुगतिं प्रपन्नाः ॥
surarṣabhā brāhmaṇasattamāśca | tathā nṛgādyā naradevamukhyāḥ | iṣṭvā mahārhaiḥ kratubhirnṛsiṃha | santyajya dehānsugatiṃ prapannāḥ
हे नरसिंह! देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मणों में उत्तम तथा नृग आदि प्रमुख राजा महँगे यज्ञों से यजन करके और देहों का त्याग करके सद्गति को प्राप्त हुए हैं।
श्लोक 28 (9.54.28)
तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं । रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च । एतत्कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं । प्रजापतेरुत्तरवेदिरुच्यते ॥
tarantukārantukayoryadantaraṃ | rāmahradānāṃ ca macakrukasya ca | etatkurukṣetrasamantapañcakaṃ | prajāpateruttaravedirucyate
तरन्तुक और अरन्तुक के बीच का, तथा रामह्रदों और मचक्रुक के बीच का जो प्रदेश है — यही कुरुक्षेत्र समन्तपञ्चक है, जिसे प्रजापति की उत्तरवेदी कहा जाता है।
श्लोक 29 (9.54.29)
शिवं महापुण्यमिदं दिवौकसां । सुसम्मतं स्वर्गगुणैः समन्वितम् । अतश्च सर्वे निहता नृपा रणे । यास्यन्ति पुण्यां गतिमक्षयां सदा ॥
śivaṃ mahāpuṇyamidaṃ divaukasāṃ | susammataṃ svargaguṇaiḥ samanvitam | ataśca sarve nihatā nṛpā raṇe | yāsyanti puṇyāṃ gatimakṣayāṃ sadā
यह मंगलमय, महान् पुण्यमय, देवताओं द्वारा सम्मानित और स्वर्ग के गुणों से युक्त स्थान है; इसीलिए यहाँ युद्ध में मारे गए सभी राजा सदा के लिए पुण्य और अक्षय गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 30 (9.54.30)
इत्युवाच स्वयं शक्रः सह ब्रह्मादिभिस्तदा । तच्चानुमोदितं सर्वं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरैः ॥
ityuvāca svayaṃ śakraḥ saha brahmādibhistadā | taccānumoditaṃ sarvaṃ brahmaviṣṇumaheśvaraiḥ
इस प्रकार तब ब्रह्मा आदि के साथ स्वयं इन्द्र ने कहा, और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर ने यह सब अनुमोदित किया।