शल्य पर्व · अध्याय 53
वृद्ध कन्या और शृङ्गवान्
जनमेजय पूछते हैं कि वह कन्या तप में कैसे प्रवृत्त हुई, और वैशम्पायन कुणि गार्ग्य की पुत्री की कथा सुनाते हैं, जिसने किसी को पति नहीं चुना, तप में वृद्ध हो गई, और जिससे नारद ने कहा कि अविवाहित कन्या के लिए लोक नहीं हैं। उसने अपने तप का आधा भाग उसे देने की घोषणा की जो उसका पाणिग्रहण करे; ऋषि शृङ्गवान् ने एक रात्रि की शर्त पर उससे विवाह किया, उस रात वह फिर तरुणी हो गई, और इस तीर्थ में एक रात्रि निवास का फल बताकर वह स्वर्ग चली गई। वहीं ठहरे बलराम शल्य के मारे जाने का समाचार सुनकर शोक करते हैं और ऋषियों से कुरुक्षेत्र का फल पूछते हैं।
जनमेजय उवाच
श्लोक 1 (9.53.1)
कथं कुमारी भगवंस्तपोयुक्ता ह्यभूत्पुरा । किमर्थं च तपस्तेपे को वाऽस्या नियमोऽभवत् ॥
kathaṃ kumārī bhagavaṃstapoyuktā hyabhūtpurā | kimarthaṃ ca tapastepe ko vā'syā niyamo'bhavat
हे भगवन्! प्राचीन काल में वह कुमारी तप में कैसे लग गई थी? उसने किस प्रयोजन से तप किया, और उसका नियम क्या था?
श्लोक 2 (9.53.2)
सुदुष्करमिदं ब्रह्मंस्त्वत्तः श्रुतमनुत्तमम् । आख्याहि तत्त्वमखिलं यथा तपसि सा स्थिता ॥
suduṣkaramidaṃ brahmaṃstvattaḥ śrutamanuttamam | ākhyāhi tattvamakhilaṃ yathā tapasi sā sthitā
हे ब्रह्मन्! यह कार्य अत्यन्त कठिन है, और मैंने आपसे यह अनुपम वृत्तान्त सुना है। जिस प्रकार वह तप में स्थिर रही, वह सब यथार्थ रूप से मुझे बताइए।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 3 (9.53.3)
ऋषिरासीन्महावीर्यः कुणिर्गार्ग्यो महायशाः । स तप्त्वा विपुलं राजंस्तपो वै तपतां वरः । तपसाऽथ सुतां सुभ्रूं समुत्पादितवान्विभुः ॥
ṛṣirāsīnmahāvīryaḥ kuṇirgārgyo mahāyaśāḥ | sa taptvā vipulaṃ rājaṃstapo vai tapatāṃ varaḥ | tapasā'tha sutāṃ subhrūṃ samutpāditavānvibhuḥ
हे राजन्! कुणि गार्ग्य नाम के एक महान् पराक्रमी और यशस्वी ऋषि थे। तपस्वियों में श्रेष्ठ उन समर्थ ऋषि ने विपुल तप करके अपने तप से सुन्दर भौंहों वाली एक पुत्री को उत्पन्न किया।
श्लोक 4 (9.53.4)
तां च दृष्ट्वा मुनिः प्रीतः कुणिर्गार्ग्यो महायशाः । जगाम त्रिदिवं राजन्संत्यज्येह कलेवरम् ॥
tāṃ ca dṛṣṭvā muniḥ prītaḥ kuṇirgārgyo mahāyaśāḥ | jagāma tridivaṃ rājansaṃtyajyeha kalevaram
उसे देखकर प्रसन्न हुए यशस्वी मुनि कुणि गार्ग्य, हे राजन्! यहीं अपना शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गए।
श्लोक 5 (9.53.5)
सुभ्रूः सा ह्यथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा । महता तपसोग्रेण कृत्वाश्रममनिन्दिता ॥
subhrūḥ sā hyatha kalyāṇī puṇḍarīkanibhekṣaṇā | mahatā tapasogreṇa kṛtvāśramamaninditā
कमल के समान नेत्रों वाली, सुन्दर भौंहों वाली और निर्दोष वह कल्याणी कन्या बड़े और उग्र तप के द्वारा अपना आश्रम बनाकर रहने लगी।
श्लोक 6 (9.53.6)
उपवासैः पूजयन्ती पितॄन्देवांश्च सा पुरा । तस्यास्तु तपसोग्रेण महान्कालोऽत्यगान्नृप ॥
upavāsaiḥ pūjayantī pitṝndevāṃśca sā purā | tasyāstu tapasogreṇa mahānkālo'tyagānnṛpa
वह उपवासों से पितरों और देवताओं की पूजा करती रही, और हे राजन्! उसके उग्र तप में बहुत लम्बा समय बीत गया।
श्लोक 7 (9.53.7)
सा पित्रा दीयमानापि पतिं नैच्छदनिन्दिता । आत्मनः सदृशं सा तु भर्तारं नान्वपश्यत ॥
sā pitrā dīyamānāpi patiṃ naicchadaninditā | ātmanaḥ sadṛśaṃ sā tu bhartāraṃ nānvapaśyata
पिता के द्वारा दिए जाने पर भी उस निष्कलंक कन्या ने पति की इच्छा नहीं की; उसे अपने समान कोई पति दिखाई नहीं दिया।
श्लोक 8 (9.53.8)
ततः सा तपसोग्रेण पीडयित्वाऽऽत्मनस्तनुम् । पितृदेवार्चनरता बभूव विजने वने ॥
tataḥ sā tapasogreṇa pīḍayitvā''tmanastanum | pitṛdevārcanaratā babhūva vijane vane
फिर वह उग्र तप से अपने शरीर को सुखाती हुई एकान्त वन में पितरों और देवताओं की पूजा में लगी रही।
श्लोक 9 (9.53.9)
साऽऽत्मानं मन्यमाना तु कृतकृत्यं श्रमान्विता । जगाम वृद्धभावं तु कौमारब्रह्मचारिणी ॥
sā''tmānaṃ manyamānā tu kṛtakṛtyaṃ śramānvitā | jagāma vṛddhabhāvaṃ tu kaumārabrahmacāriṇī
अपने को कृतकृत्य मानती हुई, थकी हुई वह, जो कुमारावस्था से ब्रह्मचारिणी थी, वृद्धावस्था को प्राप्त हो गई।
श्लोक 10 (9.53.10)
वार्धकेन च राजेन्द्र तपसा चैव कर्शिता । सा नाशकद्यदा गन्तुं पदात्पदमपि स्वयम् ॥
vārdhakena ca rājendra tapasā caiva karśitā | sā nāśakadyadā gantuṃ padātpadamapi svayam
हे राजेन्द्र! बुढ़ापे और तप से क्षीण होकर वह ऐसी हो गई कि अपने बल पर एक पग भी नहीं चल सकती थी।
श्लोक 11 (9.53.11)
चकार गमने बुद्धिं परलोकाय वै तदा । मोक्तुकामां तु तां दृष्ट्वा शरीरं नारदोऽब्रवीत् ॥
cakāra gamane buddhiṃ paralokāya vai tadā | moktukāmāṃ tu tāṃ dṛṣṭvā śarīraṃ nārado'bravīt
तब उसने परलोक के लिए प्रस्थान करने का निश्चय किया। उसे शरीर छोड़ने को उद्यत देखकर नारद ने कहा —
नारद उवाच
श्लोक 12 (9.53.12)
असंस्कृतायाः कन्यायाः कुतो लोकास्तवानघे । एवं तु श्रुतमस्माभिर्देवलोके महाव्रते ॥
asaṃskṛtāyāḥ kanyāyāḥ kuto lokāstavānaghe | evaṃ tu śrutamasmābhirdevaloke mahāvrate
“हे निष्पाप! जिस कन्या का संस्कार (विवाह) नहीं हुआ, उसे लोक कहाँ से मिलेंगे? हे महाव्रते! हमने देवलोक में ऐसा ही सुना है।
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 13 (9.53.13)
तपः परमकं प्राप्तं न तु लोकास्त्वया जिताः । तन्नारदवचः श्रुत्वा साऽब्रवीदृषिसंसदि ॥
tapaḥ paramakaṃ prāptaṃ na tu lokāstvayā jitāḥ | tannāradavacaḥ śrutvā sā'bravīdṛṣisaṃsadi
तुमने परम तप तो प्राप्त कर लिया है, पर लोकों को नहीं जीता है।” नारद की यह बात सुनकर उसने ऋषियों की सभा में कहा —
श्लोक 14 (9.53.14)
तपसोऽर्धं प्रयच्छामि पाणिग्राहस्य सत्तमाः । इत्युक्तेऽस्यास्तु जग्राह पाणिं गालवसम्भवः ॥
tapaso'rdhaṃ prayacchāmi pāṇigrāhasya sattamāḥ | ityukte'syāstu jagrāha pāṇiṃ gālavasambhavaḥ
“हे श्रेष्ठजनो! जो मेरा पाणिग्रहण करेगा, उसे मैं अपने तप का आधा भाग देती हूँ।” ऐसा कहे जाने पर गालव के वंशज ने उसका हाथ थाम लिया।
श्लोक 15 (9.53.15)
ऋषिः प्राक् शृङ्गवान्नाम समयं चेममब्रवीत् । समयेन तवाद्याहं पाणिं स्प्रक्ष्यामि शोभने ॥
ṛṣiḥ prāk śṛṅgavānnāma samayaṃ cemamabravīt | samayena tavādyāhaṃ pāṇiṃ sprakṣyāmi śobhane
शृङ्गवान् नाम के उन ऋषि ने पहले यह शर्त रखी — “हे शोभने! मैं आज इस शर्त पर तुम्हारा हाथ ग्रहण करूँगा कि
श्लोक 16 (9.53.16)
यद्येकरात्रं वस्तव्यं त्वया सह मयेति ह । तथेति सा प्रतिश्रुत्य तस्मै पाणिं ददौ तदा ॥
yadyekarātraṃ vastavyaṃ tvayā saha mayeti ha | tatheti sā pratiśrutya tasmai pāṇiṃ dadau tadā
मुझे तुम्हारे साथ एक रात रहना होगा।” “ऐसा ही हो” कहकर उसने स्वीकार किया और तब उसे अपना हाथ दे दिया।
श्लोक 17 (9.53.17)
यथादृष्टेन विधिना हुत्वा चाग्निं विधानतः । चक्रे च पाणिग्रहणं तस्योद्वाहं च गालविः ॥
yathādṛṣṭena vidhinā hutvā cāgniṃ vidhānataḥ | cakre ca pāṇigrahaṇaṃ tasyodvāhaṃ ca gālaviḥ
शास्त्र में देखी हुई विधि से अग्नि में विधिपूर्वक आहुति देकर गालवि ने उसका पाणिग्रहण और विवाह-संस्कार सम्पन्न किया।
श्लोक 18 (9.53.18)
सा रात्रावभवद्राजंस्तरुणी वरवर्णिनी । दिव्याभरणवस्त्रा च दिव्यगन्धानुलेपना ॥
sā rātrāvabhavadrājaṃstaruṇī varavarṇinī | divyābharaṇavastrā ca divyagandhānulepanā
हे राजन्! उस रात वह सुन्दर वर्ण वाली तरुणी हो गई; वह दिव्य आभूषण और वस्त्र पहने थी तथा दिव्य गन्ध का लेप लगाए थी।
श्लोक 19 (9.53.19)
तां दृष्ट्वा गालविः प्रीतो दीपयन्तीमिव श्रिया । उवास च क्षपामेकां प्रभाते साऽब्रवीच्च तम् ॥
tāṃ dṛṣṭvā gālaviḥ prīto dīpayantīmiva śriyā | uvāsa ca kṣapāmekāṃ prabhāte sā'bravīcca tam
तेज से दीप्त-सी लगती हुई उसे देखकर गालवि प्रसन्न हुए। उन्होंने उसके साथ वह एक रात बिताई, और प्रभात होने पर उसने उनसे कहा —
कुणिगार्ग्यकन्योवाच
श्लोक 20 (9.53.20)
यस्त्वया समयो विप्र कृतो मे तपतां वर । तेनोषिताऽस्मि भद्रं ते स्वस्ति तेऽस्तु व्रजाम्यहम् ॥
yastvayā samayo vipra kṛto me tapatāṃ vara | tenoṣitā'smi bhadraṃ te svasti te'stu vrajāmyaham
“हे विप्र! हे तपस्वियों में श्रेष्ठ! आपने मेरे साथ जो शर्त की थी, उसके अनुसार मैं आपके साथ रह चुकी। आपका कल्याण हो, आपका मंगल हो; अब मैं जाती हूँ।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 21 (9.53.21)
सा तु ध्यात्वाऽब्रवीद्भूयो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः । वसते रजनीमेकां तर्पयित्वा दिवौकसः ॥
sā tu dhyātvā'bravīdbhūyo yo'smiṃstīrthe samāhitaḥ | vasate rajanīmekāṃ tarpayitvā divaukasaḥ
पर कुछ सोचकर उसने फिर कहा — “जो कोई इस तीर्थ में एकाग्र मन से देवताओं को तृप्त करके एक रात निवास करेगा,
कुणिगार्ग्यकन्योवाच
श्लोक 22 (9.53.22)
चत्वारिंशतमष्टौ च द्वौ चाष्टौ सम्यगाचरेत् । यो ब्रह्मचर्यं वर्षाणि फलं तस्य लभेत सः ॥
catvāriṃśatamaṣṭau ca dvau cāṣṭau samyagācaret | yo brahmacaryaṃ varṣāṇi phalaṃ tasya labheta saḥ
वह चालीस और आठ वर्ष, तथा दो और आठ वर्ष तक भलीभाँति ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले को मिलने वाला फल पाएगा।”
वैशम्पायन उवाच
श्लोक 23 (9.53.23)
एवमुक्त्वा ततः साध्वी देहं त्यक्त्वा दिवं गता । ऋषिरप्यभवद्दीनस्तस्या रूपं विचिन्तयन् ॥
evamuktvā tataḥ sādhvī dehaṃ tyaktvā divaṃ gatā | ṛṣirapyabhavaddīnastasyā rūpaṃ vicintayan
ऐसा कहकर वह साध्वी शरीर त्यागकर स्वर्ग चली गई। ऋषि भी उसके रूप का चिन्तन करते हुए दीन हो गए।
श्लोक 24 (9.53.24)
समयेन तपोऽर्धं च कृच्छ्रात्प्रतिगृहीतवान् । साधयित्वा तदाऽऽत्मानं तस्याः स गतिमाप्तवान् । दुःखितो भरतश्रेष्ठ तस्या रूपबलात्कृतः ॥
samayena tapo'rdhaṃ ca kṛcchrātpratigṛhītavān | sādhayitvā tadā''tmānaṃ tasyāḥ sa gatimāptavān | duḥkhito bharataśreṣṭha tasyā rūpabalātkṛtaḥ
शर्त के अनुसार उसने बड़ी कठिनाई से उसके तप का आधा भाग ग्रहण किया था; अपने को सिद्ध करके वह उसी की गति को प्राप्त हुआ। हे भरतश्रेष्ठ! उसके रूप के प्रभाव से अभिभूत होकर वह दुःखी रहा।
श्लोक 25 (9.53.25)
एतत्ते वृद्धकन्याया व्याख्यातं चरितं महत् । तथैव ब्रह्मचर्यं च स्वर्गस्य च गतिः शुभा ॥
etatte vṛddhakanyāyā vyākhyātaṃ caritaṃ mahat | tathaiva brahmacaryaṃ ca svargasya ca gatiḥ śubhā
इस प्रकार मैंने तुम्हें वृद्ध कन्या का यह महान् चरित, तथा ब्रह्मचर्य और स्वर्ग की शुभ गति का वर्णन सुनाया।
श्लोक 26 (9.53.26)
तत्रस्थश्चापि शुश्राव हतं शल्यं हलायुधः ॥
tatrasthaścāpi śuśrāva hataṃ śalyaṃ halāyudhaḥ
वहीं ठहरे हुए हलायुध (बलराम) ने सुना कि शल्य मारे गए।
श्लोक 27 (9.53.27)
तत्रापि दत्त्वा दानानि द्विजातिभ्यः परन्तपः । शुशोच शल्यं सङ्ग्रामे निहतं पाण्डवैस्तदा ॥
tatrāpi dattvā dānāni dvijātibhyaḥ parantapaḥ | śuśoca śalyaṃ saṅgrāme nihataṃ pāṇḍavaistadā
वहाँ भी ब्राह्मणों को दान देकर उन शत्रुनाशक ने पाण्डवों द्वारा युद्ध में मारे गए शल्य के लिए शोक किया।
श्लोक 28 (9.53.28)
समन्तपञ्चकद्वारात्ततो निष्क्रम्य माधवः । पप्रच्छर्षिगणारामः कुरुक्षेत्रस्य यत्फलम् ॥
samantapañcakadvārāttato niṣkramya mādhavaḥ | papraccharṣigaṇārāmaḥ kurukṣetrasya yatphalam
तब ऋषिगण के संग में रमने वाले माधव ने समन्तपञ्चक के द्वार से निकलकर पूछा कि कुरुक्षेत्र का फल क्या है।
श्लोक 29 (9.53.29)
ते पृष्टा यदुसिंहेन कुरुक्षेत्रफलं विभो । समाचख्युर्महात्मानस्तस्मै सर्वं यथातथम् ॥
te pṛṣṭā yadusiṃhena kurukṣetraphalaṃ vibho | samācakhyurmahātmānastasmai sarvaṃ yathātatham
हे विभो! यदुसिंह के पूछने पर उन महात्मा ऋषियों ने कुरुक्षेत्र के फल का सारा वृत्तान्त जैसा था वैसा ही उनसे कह सुनाया।